रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

रविवार, 18 दिसंबर 2011

ग्रामीण भारत का महानायक भिखारी


♦ निराला

18 दिसंबर 2011 से भिखारी ठाकुर के 125वीं जयंती वर्ष की शुरुआत हो रही है। पोस्टरों में, पंफलेटों में, हाथों-हाथ बांटे जा रहे नेवता पत्रों में और अखबारों में कई आयोजन-प्रयोजन, उत्सव-महोत्सव की सूचनाएं एक-दूजे से दनादन टकरा रही हैं। एक-दूजे को ठेलकर हाशिये पर कर देने की कोशिश के साथ। हाल के वर्षों में भटकते भदेस भोजपुरी जमात के लिए सबसे मजबूत अवलंबन की तरह साबित होते दिख रहे हैं भिखारी। स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय के बाद अब अंतरराष्‍ट्रीय बाजार को तेजी से भिखारी में संभावनाएं दिखने लगी हैं। उनके नाम पर आनेवाले दिनों में आयोजनों की संख्या और बढ़ेगी, इसके संकेत मिल रहे हैं। यह अच्छा है – नहीं अच्छा है जैसे पारंपरिक बहस में पड़ने का इरादा छोड़ मेरे जैसे लोग इससे आनंदित हैं। बहुत सुकून मिल रहा है। वरना आज से 25 साल पहले 1987 में भिखारी ठाकुर का जन्म शताब्दी वर्ष भी पड़ा था और गुमनामी में ही गुजर भी गया था। जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर देश नहीं अपने बिहार में भी भिखारी के नाम पर किसी बड़े आयोजन की जानकारी नहीं मिलती। न सरकारी स्तर पर, न संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर से। रांची में अश्विनी कुमार पंकज जैसे तब के जुनूनी युवा रंगकर्मी ने जरूर जन्मशताब्दी वर्ष का आयोजन अपने स्तर से बड़े फलक पर किया था। बिदेसिया पत्रिका निकालकर, सम्मेलन आदि आयोजित कर।

बहरहाल, शताब्दी वर्ष की धुंध से निकल कर अब चमचमाते सवा सौवें साल की यात्रा पर पहुंच चुके हैं भिखारी। भिखारी ने खुद लिखा था कि मरने के 50 बरिस बाद उनका चहुंओर नाम होगा और सौ बरिस बाद वे महानायक सरीखे हो जाएंगे। मौलिकता की तलाश में भटकते और बेताब इस देस-काल ने भिखारी के कहे अनुसार उतना इंतजार नहीं किया। मृत्यु के चौथे दशक में ही खूब नाम हो गया है भिखारी का। बाजार और सरोकार के बीच भिखारी का आकलन कई आयामों से बहुत पहले ही किया जा चुका है। अनगढ़ हीरा, लोकनाट्य सम्राट, भोजपुरी के शेक्सपीयर, रायबहादुर आदि-आदि कई उपनाम, उपाधियां जीते-जी भिखारी के नाम रहीं। लेकिन बंद गलियों में ही घूमकर खुद पर अगराने-इतरानेवाले एक बड़े जमात की नजर में भिखारी आज भी नचनिया, लवंडा, नटकिया की परिधि में सिमटे हुए हैं। यह वही जमात है, जो रोजगार के लिए पलायन कर देश-दुनिया के कोने-कोने में फैलने की प्रक्रिया पर तो अपने को सबसे ज्यादा प्रगतिशील कहता है लेकिन अपने अहाते में लौटते ही मध्ययुगीन होने को बेताब-सा रहता है। यह जमात भिखारी के व्यक्तित्व, कृतित्व का सारा तानाबाना भदेस भोजपुरी से जोड़कर उसी परिधि में समेट देने की कोशिश करता है। बहुतेरे को अटपटा लगता है यह नजरिया, मेरे जैसे छोटी समझ वाले इसी नजरिये में सुकून की तलाश कर रहे हैं।
जहां से भिखारी की ताकत को कमतर कर आंका जाता है, भिखारी वहीं सबसे ज्यादा मजबूत होते हुए दिखते हैं। बस, एक सवाल के साथ कि जिंदगी भर भोजपुरी-भोजपुरी रटते रहने वाले और भोजपुरीभाषी होने पर गर्व करनेवाले भिखारी अपने जमाने में, अपने जमात के साथ, एक बड़े जमात के बीच जो कर रहे थे, वह क्या सिर्फ भदेस भोजपुरी इलाके भर में सिमटने या समेट देने भर का मामला बनता है!
मान लेते हैं कि भिखारी कोई समाजसुधारक लोकनाटककार वगैरह नहीं थे। प्रोफेशनल नटकिया और नाच में पारंगत लौंडा भर ही थे, जो मंडली के लिए भोजन-पानी के रूप में माला उठाने की सामर्थ्‍य रखनेवाले के कहे पर ही समूह के साथ गंतव्य तक कूच करते थे। वह नाटक करते थे। उनके नाटकों में मरदाना ही मेहरारू बनकर पाठ करता था। चौपाई, बहरत, दोहा, सवइया को साधता था। भिखारी की मंडली नौटंकी ही किया करती थी, सो दैहिक भाषा का तारतम्य बिठाने के लिए नाचना भी खूब पड़ता था। वह अभिनय का अभिन्न हिस्सा होता था, बहुतेरे ने उसे लौंडा नाच कहा। ठीक है कि वह लौंडा नाच ही था, तो उस लौंडा नाच का असर कहां-कहां और किस-किस रूप में पड़ रहा था, यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
महिला गवइयों व तवायफों का जमाना था, तो उनका सुनना-गुनना कोठे-कोठियों के बाद राजदरबारों व जमींदारों के अहाते तक ही ज्यादातर सीमित रहा। फिर बाईजी युग का अवतरण हुआ। बाईजी माने भदेस भाषा में रंडी। बाई जी भी बड़े लोगों के यहां ही शादी-ब्याह व अन्य आयोजनों में जातीं। जिनके पास पैसा हो, वही शामियाने में, महफिल में बाईजी को नचवा पाता। मुंह में रुपइया लेकर बाईजी के होठों से खिंचवाकर ईनाम देने का खेल खेलता। गोलियों से शमियाना छेद-छेद होता। इस मजावादी मनोरंजन का रोमांच कुछ ही लोगों की पहुंच में होता। शामियाने या महफिल के अंदर और इर्द-गिर्द पहुंचने की इजाजत सबको नहीं होती थी। एक बड़ा तबका उस रोमांच से वंचित रहता। इच्छाओं-आकांक्षाओं का दमन कर। उसकी इच्छा भी होती थी कि वह भी बाईजी को पास से देखे, रुपइया लुटाये, मुंह में रुपइया फंसाकर उसे उसके मुंह में दे, हाथ-गाल छू ले। लेकिन ऐसी आकांक्षा और इच्छा रखनेवाले तबके की नियति थी कि वह मन में ही ऐसे ख्वाब पाले। दूर से ही यह सब देख-सुनकर सब्र करे। खुद की आकांक्षा के साथ घुटता रहे। भिखारी जैसे लोगों ने लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर नाच वाली मनोरंजन की लोकप्रिय विधा पर खास वर्ग के प्रभुत्व को तोड़ दिया। मरद से मेहरारू का रूप धरे लौंडा को नचाना सबके बस में हो गया। लौंडा सबके यहां पहुंचने लगा। चैता से लेकर बियाह-शादी तक में। बाईजी की तरह ही मरद से मेहरारू बने लौंडा पर रुपइया लुटाने लगा एक तबका। खुलकर सिटी भी बजाने लगा, करीब से देखने, हाथों-गालों को छू लेने की हसरत पूरी करने लगा।
लौंडा नाच ने बाईजी के नाच को जितनी चुनौती नहीं दी, उससे ज्यादा चुनौती उन्हें दी, जो मनोरंजन की इस विधा पर तवायफों के बाद बाईजी रूपी संस्करण पर भी बपौती रूप से अपना ही अधिकार जमाये बैठे थे। भिखारी को कोई लौंडा भी कहता है, तो इसी वजह से सुकून मिलता है कि उस पारंगत लौंडा ने अपने नाच के बहाने एक बड़े साम्राज्य का खात्मा किया। वर्षों की जकड़न को तोड़ा।
भिखारी नटकिया थे, ठेठ गंवई नौटंकीबाज। भदेस भोजपुरी में रचते-बकते थे। बिना पैसा लिये कहीं नहीं जाते थे। सट्टा बुक होने पर ही हिलते-डोलते थे। मंगनी में समाजसेवा करते फिरते हो, ऐसी चर्चा बहुत कम या न के बराबर ही आती है। तब भिखारी के बारे में यह धारणा बहुतेरे में है, तो यह भी ठीक है। लौंडा कहे जाने की तरह सुकून देनेवाली धारणा है यह भी। अब यहां पर भी थोड़ी देर ठहर कर भिखारी को समझने का वक्त है।
भिखारी अपने जमाने के बिल्कुल प्रोफेशनल कलाकार थे। उनके खाते में दर्जन भर से अधिक नाटक थे। बिदेसिया, भाई विरोध, बेटी वियोग, विधवा विलाप, कलियुग प्रेम, राधेश्याम बहार, गंगा स्नान, पुत्र बध, गबरघिचोर, बिरहा बहार, नकल भांड़ आ नेटुआ के, ननद भउजाई आदि। असम से लेकर बनारस तक, धनबाद से लेकर छपरा-आरा तक जाते थे तो वे किसी नाटक-नौटंकी का शो कर सकते थे लेकिन क्यों लोग बिदेसिया, बेटीबेचवा और गबरघिचोर की जिद करते थे। पैसा देकर मनोरंजन के लिए हल्के फुल्के विषय को छोड़ बेटीबेचवा और गबरघिचोर के पीछे क्यों दिवानी थी गंवई जनता। क्या भिखारी के जमाने में जनता उकतायी हुई थी, परंपराओं को तोड़ने की अकुलाहट थी समाज में या भिखारी नब्ज ऐसे दबाते थे कि बेचैन हो जाता था लोगों का मन। बिदेसिया रंडी, घरवाली और मरद के बीच के रिश्ते के ताना-बाना के साथ पलायन की पीड़ा है। पति के जाने के बाद स्‍त्री मन की पीड़ा को भिखारी ने संजोया है इसमें। बेटी वियोग अथवा बेटी बेचवा में सामाजिक प्रचलन के खिलाफ संवेदनात्मक व भावुक अपील है। रुला देनेवाले बहरत-दोहा और चैपाइयों की भरमार है इसमें। संवेदना, अपनी ही परंपरा पर चोट करने के लिए लोग भिखारी को क्योंकर पैसा देकर बुलाते थे, उसी की फरमाइश क्यों करते थे! भिखारी के बारे में यहीं सोचने की जरूरत है। और इन सबसे इतर गबरघिचोर की बात करें तो वह अपने आप में इस कदर का मजबूत कथानक वाला प्लॉट है, जिससे संभ्रांत तबका आज अत्याधुनिक होने के बावजूद हिल जाये। गबरघिचोर में एक बच्चे का बाप तय करने के बहाने स्त्री की यौन आकांक्षा की स्वतंत्रता पर मुहर लगवाते हैं भिखारी और तब का गंवई मन इसे ही बार-बार दिखाने की मांग कर रहा था। कुछ तो वजह रही होगी। भिखारी के रास्ते समाज का नजरिया साफ दिखता है कि वह बदलाव की आकांक्षा हमेशा रखता था, बनी बनायी रूढ़ परंपराओं को तोड़ने के लिए बेचैन था। आज राजनीति और समाजसेवी इस दिशा में दो कदम आगे चलते हैं तो समूची वाहवाही को अपने खाते में करने को बेताब रहते हैं। भिखारी प्रोफेशनलिज्म को बरकरार रखते हुए तभी यह कर रहे थे, वह भी भोजपुरी पट्टी के उस बंद समाज की गलियों में, जहां आज भी सामंती व्यवस्था कू्ररतम रूप दिखा देती है।
यहां चाहें तो भिखारी से ज्यादा श्रेय समाज को दे सकते हैं, जिसने सामंती जकड़न में जकड़ी रंडी नाच के मुकाबले लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर अपने लिए रास्ता ढूंढ लिया। एक प्रोफेशनल कलाकार से बार-बार बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटीबेचवा आदि दिखाने की मांग कर उसे समाजसुधारक नटकिया बना दिया। समाज ही रहा होगा, जिसने भिखारी में नायकत्व के तत्व ढूंढकर, सांस्कृतिक राजनीति को चुनावी राजनीति से आगे निकल जाने दिया। समाज भिखारी को सामने रख कला के जरिये बदलाव की मुहिम में शामिल हो गया। लौंडा नाच से मनोरंजन के साम्राज्य पर वर्चस्व बनाये सामंती हेकड़ी को तोड़ते हुए अवाम शायद सांस्कृतिक और आर्थिक मुक्ति भी चाहता था, इसीलिए बिदेसिया की मांग सबसे ज्यादा थी और वह गंवई भारत का लोकप्रिय महाकाव्य बन गया।
भिखारी बिदेसिया की शुरुआत में ही दर्शकों से सवाल करते थे – बिदेसी के? प्यारी सुंदरी के? रखेलिन के? ‘कोलावेरी’ गाने की वर्चुअल दुनिया से बाहर की रीयल दुनिया में समाज आज भी उनके सवाल का जवाब देने के लिए क्यों तैयार नहीं है? एक ‘लौंडा’ के सारे तीखे सवाल सांस्कृतिक जड़ता और सामंती ठसक पर लगातार प्रहार कर रहे हैं और हमारी नजर ‘नाच’ तक सिमटी हुई है। भिखारी और उनका बिदेसिया भोजपुरी का ही नहीं वरन भारतीय समाज का लोक महाकाव्य है। लौंडा रचित इस महाकाव्य को आधी सदी पहले अपने समाज ने जो अर्थ दिया था, क्या हम उसे आज के संदर्भ विस्तार देने की दृष्टि विकसित कर सकते हैं?
कहने को समाज आज ज्यादा विकसित हो गया है, लेकिन नायकत्व की तलाश में भटक रहा है। हर रोज घर में बैठ टीवी के सामने नये नायक की तलाश करता है, पत्र-पत्रिकाओं में सर्वेक्षण के जरिये आनेवाली श्रेष्‍ठ सेक्सी सुंदरियों में नायकत्व की तलाश करता है। विकसित और आधुनिक समाज का सौंदर्यबोध और कला की परख की क्षमता वहीं टिक गयी है। असली कलाकर्म, संस्कृतिकर्म को हाशिये पर डाल राजनीति से ही समूचे बदलाव की कामना घर में बैठे-बैठे कर भंवरजाल में फंसता जा रहा है समाज। भिखारी के 125वें जयंती वर्ष में थोड़ी देर रुक कर सोचने की जरूरत है…!
nirala
(निराला। युवा और प्रखर पत्रकार। प्रभात खबर से लंबे समय के जुड़ाव के बाद फिलहाल तहलका के झारखंड-बिहार संवाददाता। उनसे niralabidesia@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
आलेख प्रभात खबर के रांची संस्करण से साभार.

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