रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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बुधवार, 9 नवंबर 2011

उड़ीसा की नाट्य परंपरा


किशोर महांति
उड़ीसा के आदिवासी अंचलों में घोड़ा नाच, पाटुआ नाच, आदिवासी नृत्यों की परंपरा अब भी विद्यमान है। आदिवासी नृत्य प्रिय हुआ करते हैं। नृत्य और संगीत उनका जीवन है। दिनभर की थकान के बाद दलबद्ध होकर तबले की ताल पर स्त्री-पुरुष नृत्य करते हुए अपार आनंद का अनुभव करते हैं। वे लोग जीवन की जटिलता के भीतर रहना पसंद नहीं करते।


उनके परिश्रम भरे जीवन में यही नृत्य-गीत उनकी प्रेरक शक्ति है। उनके नृत्य और गीतों में उनकी सामाजिक परिस्थिति, व्यक्तिगत चित्र, प्राकृतिक सौंदर्य की झांकी हमें देखने को मिलती है। वे लोग शिकार के समय, युद्ध के समय, फसल की बुवाई, कटाई, आमदनी के समय इन नृत्य गीतों के ज़रिये आनंद की खोज़ करते हैं। इनमें से परजा, कंध, कोया तथा गंड प्रजापति के आदिवासियों का नृत्य बड़ा ही हृदयस्पर्शी होता है। उड़ीसा के आदिवासियों के नृत्य में सामंजस्य होते हुए भी कुछ अलगाव रहता है। कालाहांडी जिले का घूमरा नृत्य बहुत प्राचीन नृत्य है। यहाँ का देशिया नाच बहुत ही मनोरंजक है और उड़िया लोक-नृत्य में अन्यतम है। इसके प्रचार- प्रसार की दिशा में यथासंभव ध्यान नहीं दिया गया है, फिर भी इसकी शैली में अपना निरालापन बरकरार है।
देशिया-अर्थ से स्पष्ट है ग्राम्य और देशिया नाटक अर्थात ग्राम्य नाटक। चूँकि यह देशी नाटक होता है इसलिए इसकी भाषा ग्रामीण होती है। इसमें आदिवासी भाषा की बहुलता देखने कि मिलती है। साथ ही संस्कृत के शब्दों का भी प्रभाव देखा जाता है। देशिया नाटकों के रचयिता, निर्देशक तत्कालीन संस्कृत, तेलगु नाटकों से प्रभावित हुए हैं, यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

यह नाटक खुले मंचों में मंचस्थ हुआ करता था। चारों तरफ़ दर्शक बैठते थे, और ठीक मध्य भाग में नाटक मंचस्थ होता था। इन नाटकों की कथावस्तु प्रायः रामायण तथा महाभारत या पुराणों की कहानी पर आधारित होती है। पहले तो इन नाटकों के संचालन का दायित्व जो लोग लेते थे, उन्हें 'नाट्यगुरु' कहा जाता था। इन नाट्यगुरुओं की विशेषता ही होती है कि वे रामायण, महाभारत की कथावस्तु के बारे में दक्षता हासिल किए होते हैं। अभिनय ज्ञान, वाद्ययंत्र-संगीत का ज्ञान उसके पास पर्याप्त होता था। हालाँकि इन नाट्यगुरुओं का उद्देश्य धन उपार्जन नहीं होता था, बल्कि कला तथा मनोरंजन की ओर वे अपना ध्यान देते थे।

समय के साथ-साथ इन नाटकों में परिवर्तन आया। पंडित तथा सुधी वर्गों में इस पर आलोचना होने लगी। पंडित विश्वनाथ कविराज के साहित्यदर्पण में भारतीय नाट्य पद्धति पर विस्तार से चर्चा हुई है। बारहवीं शताब्दी में इन पर संस्कृत का प्रभाव पड़ा। तेरहवीं, चौदहवीं शताब्दी तक ये बलिष्ठ रूप धारण किए हुए थे। गजपति पुरुषोत्तम देव कृत वेणी संहार तत्कालीन संस्कृत नाटक, भारतीय नाट्यकला के लिए अत्यंत प्रचलित कथानक है।  गीतिनाट्य, गीताभिनय, लीला, स्वांग की तरह देशिया नाटक भी संगीताश्रयी था। इनमें संगीत का प्रभाव इतना होता था कि वाद्य और वचनिका गौण मालूम होने लगता था। इससे साफ जाहिर होता है कि तत्कालीन लोगों की मनोवृत्ति ही संगीत प्रेम की था।

प्राचीन काल में संगीत, भजन, चउतिसा, चउपदी कोइली आदि छंद काव्य साहित्य को रसवंत किया करते थे। इसलिए पुरातन साहित्य की विशेषता ही है रसबोध। उसमें प्रेरणा आवेग के माध्यम से स्पष्ट होती है। सिर्फ़ आवेग ही नहीं, अनुभूति और इस बोध की कोमल, तरल झंकार ही है। अतः देशिया नाटकों के रचयिता निश्चित रूप से संगीत शास्त्र में पारंगत थे। विभिन्न राग-रागिनियों, ताल मान, लय के संपर्क में संपूर्ण दक्षता हासिल करने के बाद में वे लोग संगीत की सृष्टि और प्रयोग के संपर्क में आगे बढ़े। देशिया नाटकों में कर्नाटकी संगीत पद्धति तथा हिंदुस्तानी संगीत पद्धति दोनों प्रकार की शैली का प्रयोग हुआ। इसमें अभिनेता संगीत गान नहीं करते या वचनिका परिवेषण नहीं होता, प्रत्येक अभिनेता अभिनय द्वारा अपनी बात कहता है। पात्रों का चयन नाट्यगुरुओं का काम होता है। प्रत्येक नाटक में द्वारी (द्वारपाल), विदूषक जैसे आवश्यक चरित्र हुआ करते थे। नट-नटी तथा संधी की भूमिका नाटकों में अवतारणा करनी और नाटकों की विषयवस्तु का संयोजन का काम करती है। नट-नटी या संधी मंच पर आकर नाटक दर्शकों के सामने नाटक के मंचन की अनुमति माँगते हैं। वे विघ्न विनाशक गणेश या देवी सरस्वती की पूजा-वंदना करते हैं।
स्वांग गीतिनाट्य तथा गीताभिनय में विदूषक तथा द्वारी का संयोजन जितना चित्ताकर्षक होता है, उतना ही हास्य रस से भरा हुआ भी। वह राजा से लेकर मंत्री तक, महारानी से लेकर राजकुमारी तक सबके पास बगैर रोक-टोक सबके पास आ जा सकता है और उन्हें अपने हास्य रस से ओतप्रोत करता है। इस तरह सुंदर हास्य रस प्रदान कर वह दर्शकों को आनंद प्रदान करता है। वह फारसी मिश्रित उड़िया का प्रयोग कर लोगों को हँसाता है। देशिया नाटकों में मुखौटा पहनकर अभिनय किया जाता था। मुखौटा एक प्रतीक होता है। राम, लक्ष्मण, सीता जैसे चरित्रों को छोड़कर अन्य सभी मुखौटा पहनते है। यह प्रथा बहुत प्राचीन है। सखी नाटकों, कालीदुर्गा नृत्य, भालू नृत्य, बाघ नृत्य आदि में मुखौटा व्यवहार में लाया जाता है। खासकर इन नाटकों में वानर सेना और राक्षस मुखौटे पहनते है। दशानन रावण के दस सिर, इन मुखौटों द्वारा ही संभव होते हैं।

देशिया नाटकों की विषय-वस्तु इतनी अधिक लंबी होती है कि उसे पूरा होने में एक से अधिक रात की आवश्यकता होती है। रंगमंच पर जब राजा, रानी या अन्य चरित्र प्रवेश करते हैं तब वे उनके आगमन की सूचना दे देते हैं। इन देशिया नाटकों में शब्दाडंबर भले ही न हो, लेकिन अलंकारिता के पर्याप्त प्रमाण देखने को मिलते हैं। यमक और उपमा का प्रयोग इसे और भी सरस, सुंदर बना देता है। भारतीय काव्य साहित्य के विभिन्न संप्रदायों में रस का महत्व सर्वाधिक रूप से स्वीकृत है। रस भेद में शृंगार रस को श्रेष्ठ रस माना जाता है। महाकवि कालिदास, भट्ट, माघ, श्रीहर्ष, जयदेव जैसे महान कवियों ने अपनी कला का प्रदर्शन इन रसों के माध्यम से किया है। साहित्य के सभी रसों में शृंगार, वीर और हास्य रस के चमत्कार से जो प्रदर्शन होता है, वह दर्शकों को आनंद देता है। देशिया में भी रस को बहुत महत्व दिया गया है।

'प्रह्लाद चरित्र', 'गंडावध', 'अग्निपरीक्षा', 'चंद्रकलाहरण', 'वाणा पराजय लीला', 'धनुलीला', 'कुंभासुर वध', और 'जलंधर वध' आदि अनेक देशिया नाटक लोगों को मोहित करने में सहायक हुए हैं। कुछ का नाट्यरूप में मंचन भी हुआ है। जयपुर के महाराजा मचंद्रदेव चतुर्थ के लिखे कुछ देशिया नाटक बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें 'कुंभासुर वध' को मील का पत्थर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उसी तरह राजा विक्रमदेव भी कला के पुजारी थे। कला, साहित्य और संस्कृति के प्रचार- प्रसार की दिशा में उनकी कोशिश भी बहुत प्रशंसनीय है। उनके द्वारा रचित 'जलंधर वध' काफी लोकप्रिय हुआ था। इस तरह हमें तात्कालिक राजा-महाराजाओं के शास्त्र ज्ञान तथा पांडित्य की झलक देखने को मिलती है। कोरापुट जिले के जयपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में इन नाटकों के अभिनय देखने को मिलते हैं। फसल की आमदनी के बाद (पौष पूर्णिमा के बाद) से ही नाट्य दल अपने सामान के साथ विभिन्न स्थानों में नाटक के मंचन के लिए निकल आते हैं। इस समय उनके आनंद और उल्लास का ठिकाना नहीं रहता। वे लोग कई-कई रातें जागकर इन नाटकों का मंचन करते हैं। वे लोग व्यवसायिक वृत्ति से नाटक नहीं करते, बल्कि अपनी खुशी और आनंद के लिए नाटक करते हैं। इस तरह वे खुद आनंद लेते हुए दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

दिवस के सूर्यालोक तथा रात्रि के घने अंधकार में मशाल की लौ में होने वाले देशिया नाटक आज परिवर्तन की धारा के साथ ताल देकर आगे बढ़ रहे हैं। युग के परिवर्तन के साथ-साथ दर्शकों की रुचि में भी परिवर्तन आया है। देशिया, नाटकों में संपूर्ण बदलाव न होने पर भी मंच प्रस्तुति, आलोक, सज्जा, शब्द ग्रहण, पोशाकों में परिवर्तन देखने को मिलता है। अब कहीं-कहीं पेट्रोमैक्स के बदले बिजली के बल्बों का प्रयोग, अभिनव मंच-सज्जा, सुरुचिपूर्ण पोशाकों का व्यवहार नाटकों को मार्जित तथा रुचिपूर्ण कह रहा है। मगर अभिनेताओं के अभिनय में परंपरा का पालन किया जाता है। आदिवासी बहुल अंचलों में अब तक लोक नाटक (देशिया नाटक) की धारा अपरिवर्तित होकर रही है, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।

हिंदी रूपांतर सिद्धार्थ मानसिंह महापात्र

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

मलयालम नाट्य साहित्य और रंगमंच

यद्यपि केरल में अनेक नाट्य कलारूप प्रचलित रहे हैं तथापि मलयालम में नाटक साहित्य का विकास 19 वीं शताब्दी के अंत में ही हुआ था। मलयालम की पहली नाट्यकृति मौलिक न होकर अनुवाद थी। केरल वर्मा वलियकोयित्तंपुरान का ‘अभिज्ञानशाकुन्तळम’ अनुवाद (1882) था। ‘मणिप्रवाळशाकुंतळम’ नाम से अभिहित इस अनुवाद के कारण आगे जाकर मौलिक नाटकों तथा अनूदित नाटकों की रचना में वृद्धि हुई। 

1884 में सी. वी. रामन पिळ्ळै ने ‘चन्द्रमुखी विलासम’ नामक प्रहसन (हास्य नाटक) की रचना की। तदनन्तर अनेक नाटक लिखे गए। यथा - कोडुंगल्लूर कोच्चुण्णि तंपुरान का ‘कल्याणी नाटकम’ (1889), ‘उमा विवाहम्’ (1893), कुञ्ञिक्कुट्टन तंपुरान का ‘लक्षणासंगम’ (1891), ‘गंगावतरणम्’ (1892), ‘चन्द्रिका’ (1892), चंगनाश्शेरी रवि वर्मा का ‘कविसभारंजनम्’ (1892), वयस्करा मूस का ‘मनोरमा विजयम’ (1893), के. सी. केशव पिळ्ळै का ‘लक्ष्मीकल्याणम्’ (1893), ‘राधामाधवम्’ (1893), नडुवत्त् अच्छन नंपूतिरि का ‘भगवद्दूत’ (1892), कण्डत्तिल वरगीस माप्पिळा का ‘इब्रायक्कुट्टि’, तोट्टक्काट्टु इक्कावम्मा का ‘सुभद्रार्ज्जुनम’ (1891), पोळच्चिरक्कल कोच्चीप्पन माप्पिळा का ‘मरियाम्मा’ (1903) आदि। उन दिनों मंच पर तमिल संगीत नाटक धूम मचा रहे थे। नाटक लिखने के आग्रह के कारण कई लोगों ने कलात्मक मूल्य रहित नाटकों का सृजन किया, तो उनकी हँसी बनाने नाटक भी लिखे गए। इस प्रकार लिखे गए हास्य नाटक हैं - मुंशी रामक्कुरुप्प का ‘चक्की चंकरम’ (1893), शीवोळ्ळि नारायणन नंपूतिरि का ‘दुस्पर्शा नाटकम्’ (1900), के. सी. नारायणन नंपियार का ‘चक्की चंकरम’ (1893) आदि। सी. वी. रामन पिळ्ळै ने ‘पण्डत्ते पाच्चन’ (1917), ‘कुरुप्पिल्लाकळरि’ (1909), ‘पापिचेल्लेण्डम पाताळम्’ (1918), ‘डाक्टर्कु किट्टिया मिच्चम्’ (1918) आदि प्रहसन लिखे।


ई. वी. कृष्णपिळ्ळै की देन

पत्रकार एवं कहानीकार के रूप में ख्यात ई. वी. कृष्णपिळ्ळै ने प्रारंभ में नाटक को एक साहित्य विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उनके नाटक हैं - ‘सीतालक्ष्मी’ (1926), ‘राजा केशवदास’ (1929), ‘प्रणयक्कम्मिशन’ (1932), ‘बी. ए. मायावी’ (1933), ‘विस्मृति’ (1932), ‘माया मनुषन’ (1934), ‘विवाहक्कम्मट्टम’ (1935), ‘इरविक्कुट्टिप्पिळ्ळै’ (1934), श्पेण्णरशुनाडु’ आदि। ई. वी. के साथ 1940 तक की कालावधि में अनेक नाटककार हुए। इन्होंने अधिकतर ऐतिहासिक तथा सामाजिक नाटक लिखे।

1930 से 1950 तक की कालावधि में अनेक नाटककारों ने नाट्य साहित्य क्षेत्र में पदार्पण किया। यथा - एन. पी. चेल्लप्पन नायर (मिन्नल प्रणयम्, लेडी डॉक्टर, वनराज कुमारी, प्रणयजांबवान, एटमबोम्ब, लेफ्टनेन्ट नाणी), टी. एन. गोपी नाथन नायर (पिन्तिरिप्पन प्रस्थानम), चेलनाट्टु अच्युत मेनन, एम. पी. शिवदास मेनन, तिक्कोडियन, जगति एन. के. आचारी, कैनिक्करा पद्मनाभ पिळ्ळै (वेलुत्तंपि दळवा, काल्वरियिले कल्पादपम), अप्पन तंपुरान, कप्पना कृष्ण मेनन, वैलोप्पिळ्ळि श्रीधर मेनन, कैनिक्करा कुमार पिळ्ळै, मूर्काेत्तु कुमारन, एन. वी. कृष्ण वारियर, ई. एम. कोवूर, के. पद्मनाभन नायर, वी. कृष्णन तंपी आदि।

नाटक का वसंत

1940 - 1950 दशकों में नाटक लोकप्रिय साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हो गए और कई नाटक लिखे गए। इस काल में नाटक के क्षेत्र में अनेक प्रयोग हुए और नाट्य लेखन गंभीर साहित्यिक कर्म बन गया। इसी युग में मलयालम के श्रेष्ठ नाटककार साहित्य क्षेत्र में उतरे, जिनकी संख्या काफी है - एन. कृष्ण पिळ्ळै (भग्नभवनम्), कन्यका, बलाबलम्, अनुरंञ्जनम्, मुडक्कुमुतल, अष़िमुखत्तेक्कु), जी. शंकर पिळ्ळै (स्नेहदूतन), सी. एन. श्रीकंठन नायर (नष्टक्कच्चवडम्), के. सुरेन्द्गन (बलि), पुलिमाना परमेश्वरन पिळ्ळै (समत्ववादी), कैनिक्करा कुमार पिळ्ळै (प्रेम परिणामम्, अग्निपरीक्षा), कैनिक्करा पद्मनाभ पिळ्ळै (यवनिका, विधिमंडपम्, अग्निपंजरम्), सी. जे. थॉमस (1128 में क्रैम 27, अवन् वीण्डुम वरुन्नु), टी. एन. गोपी नाथन नायर (पूक्कारि, प्रतिध्वनि, अकवुम पुरवुम, परिवर्त्तनम, मृगम, निलावुम निष़लुम, निष़ल्कूत्तु), इडश्शेरी गोविन्दन नायर (कूट्टुकृषि), एम. गोविन्दन (नी मनुष्यने कोल्लरुत्), एरूर वासुदेव (जीवितम् अवसानिक्कुन्निल्ला), एस. एल. पुरम सदानन्दन (ओरालकूडि कळ्ळनायि), के. टी. मुहम्मद (इत् भूमियाण्, वेळिच्चम विळक्कन्वेषिक्कुन्नु, चुवन्न घटिकारम्, करवट्टा पशु), तिक्कोडियन (जीवितम्, प्रसविक्कात्ता अम्मा), चेरुकाडु (तरवाडित्तम, स्नेहबंधंगल), ओंचेरी (ई वेळिच्चम निंगल्कुल्लताण्), तोप्पिल भासी (निंगलेन्ने कम्यूनिस्टाक्कि, सर्वेक्कल्लु, मुडियनाय पुत्रन), पी. केशवदेव (ञानिप्पा कम्यूनिष्टावुम, मन्त्रियाक्कोल्ले, तस्करासंघम, नी. मरिच्चु, नाटककृत्तु, मुन्नोट्टु, कोल्लनुम कोल्लत्तीं ओन्नु, ओणब्लाउज़, मष़यंगुम कुडयिगुंम), पोन्कुन्नम वर्की (पूजा, प्रेमविप्लवम्, जेताक्कल, स्वर्गम नाणिक्कुन्नु, वषी तुरन्नु, विशरिक्कु काट्टुवेण्डा, ञानोरधिकप्पट्टाण्), तकषी़ शिवशंकर पिळ्ळै (तोट्टिल्ला), वैक्कम मुहम्मद बषीर (कथाबीजम्), एस. के. पोट्टेक्काड (अच्छन), कारूर नीलकंठ पिळ्ळै (मण्णुम पेण्णुम, ती कोण्डु कळिक्करुत), नागवळ्ळि आर. एस. कुरुप (मेवार माणिक्यम्, आभिजात्यम्, पोलिञ्ञ दीपम्, समत्वम्) आदि।

विश्व के अन्य भागों में लिखे गए नाटकों से परिचय ने केरलीय नाट्य रचना पर भी प्रभाव डाला। यदि देखा जाए तो स्वीडिश नाट्यकार हेन्ट्रिक इब्सन् का प्रभाव एन. कृष्ण पिळ्ळै के नाटकों पर पड़ा है। कृष्ण पिळ्ळै के नाटकों ने इस गलत धारणा को निर्मूल साबित किया कि नाटक केवल निरर्थक हसी मज़ाक सुनाकर ठहाका मारने के लिए है। बाद में मलयालम नाटकों पर इब्सन का प्रत्यक्ष - परोक्ष प्रभाव पड़ने लगा। पुळिमाना परमेश्वरन पिळ्ळै ने यूरोपीय एक्स्प्रेशनिज़्म (अभिव्यंजनावाद) और सी. जे. थॉमस ने एपिक नाट्य मंच की परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं। कम्यूनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक प्रचार के लिए कायंकुळम में स्थापित के. पी. ए. सी. नाट्यसंघ तथा उसके द्वारा मंचन के लिए तोप्पिल भासी द्वारा लिखित नाटकों ने लोकप्रियता के क्षेत्र में नया इतिहास रचा। 1940 - 1960 का कालखण्ड रंगवेदी का वसंतकाल था। इस कालखण्ड में नाट्यसंघ और ग्रामीण नाट्य प्रवर्त्तन ने संयुक्त रुप से नाटक को जनप्रिय बनाया।

आधुनिक रंगमंच

1970 से व्यावसायिक नाटकों के साथ आधुनिक प्रयोगवादी नाटक का भी प्रस्तुतीकरण आरंभ हुआ। नाटक की इस नवीन विधा के उदाहरण हैं -‘तनतु नाटकवेदी’ यानि ‘निजी नाट्यमंच’। कहानी, कविता, उपन्यास और चित्रकला में प्रस्तुत हुई नव धारा के तत्त्वों ने नाटक में भी परिवर्त्तन प्रस्तुत किए। 1970 में प्रचलित नवनाट्यों के प्रमुख प्रयोक्ता थे सी. एन. श्रीकंठन नायर, जी. शंकर पिळ्ळै, एवं कावालम नारायण पणिक्कर आदि। ‘नाटकक्कळरि’ (नाट्य शिक्षणालय) ने भी आधुनिक नाटकों को समृद्ध किया। अगस्त 1967 में जी. शंकर पिळ्ळै के प्रयास से शास्तामकोट्टा में पहला ‘नाट्यकळरि’ की स्थापना हुई। सी. एन. श्रीकंठन नायर कळरि (शिक्षणालय) के निर्देशक थे। इस कलरि को सफल बनाने वाले दूसरे नाटककार थे एस. रामानुजम, पी. के. वेणुक्कुट्टन नायर, जी. अरविन्दन, अय्यप्प पणिक्कर, एम. वी. देवन आदि।

आधुनिक नाट्य साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं का अवलोकन कीजिए - सी. एन. श्रीकंठन नायर का ‘साकेतम्’, ‘लंकालक्ष्मी’, ‘कलि’, जी. शंकर पिळ्ळै का ‘भरत वाक्यं’, ‘बन्दी’, ‘करुत्तदैवत्ते तेडि’, ‘किरातं’, कावालम नारायण पणिक्कर का ‘अवनवन कडम्बा’, ‘दैवत्तार’, ‘साक्षी’, ‘तिरुवाष़ित्तान’, आर. नरेन्द्र प्रसाद का ‘सौपर्णिका’, ‘इरा’, ‘वेळ्ळियाष़्च’, ‘पडिप्पुरा’, वयला वासुदेवन पिळ्ळै का ‘अग्नि’, ‘कुचेलगाथा’, ‘वरवेल्प’, टी. पी. सुकुमारन का ‘दक्षिणायनं’, एन. प्रभाकरन का ‘पुलिजन्मम्’, पी. बालचन्द्रन का ‘पावं उस्मान’, पी. एम. ताज का ‘कडुक्का’, ‘चूळा’, मधुमास्टर का ‘कलिगुला’ आदि।

1980 - 1990 के दशकों में युवा पीढ़ी नाट्यक्षेत्र में सक्रिय हुई। उन्होंने आधुनिक नाटक को समृद्ध बनाने का प्रयास किया। इस श्रेणी में पी. बालचन्द्रन, रामचन्द्रन मोकेरी, डॉ. एस. जनार्दनन, एन. शशिधरन, जयप्रकाश कुळूरु, सतीश के. सतीश, सुधीर परमेश्वरन, सिविक चन्द्रन, के. वी. श्रीजा, एम. सजिता आदि नाम उल्लेखनीय हैं। वर्तमान काल में प्रकाशन क्षेत्र से यह ज्ञात होता है कि साहित्य विधा के रूप में नाटक के पाठकों की संख्या काफी कम है। आज रंगमंच के क्षेत्र में पूर्ववर्ती काल की भाँति व्यावसायिक नाट्यसंघ, क्षेत्रीय कला समितियाँ, ललित कला सहकारी समितियाँ, अमेच्युअर नाट्यसंघ, कैम्पस थियेटर आदि सक्रिय नहीं हैं।

विचार प्रचार का रंगमंच 

जिन नाटककारों ने सामाजिक सुधार के लिए नाटक को हथियार बनाया उनमें प्रमुख हैं - वी. टी. भट्टतिरिप्पाडु, एम. पी. भट्टतिरिप्पाडु, के. दामोदरन, वी. कृष्णन तंपी आदि। नंपूतिरि समाज में प्रचलित कुरीतियों का पर्दाफाश करते हुए वी. टी. भट्टतिरिप्पाडु ने ‘अडुक्कलयिल निन्नु अरंगत्तेक्कु’ (1930) नाम से जो नाटक लिखा वह मलयालम नाटक साहित्य में सुवर्ण अक्षरों में अंकित है। एम. पी. भट्टतिरिप्पाडु का ‘ऋतुमति’ (1939), के. दामोदरन का ‘पाट्टबाक्कि’ (1938) आदि नाटक भी वैचारिक अवधारणा को लिए हुए थे।

1960 - 1970 का काल

1960 - 1970 कालखण्ड की विशेषता यह है कि इस कालखण्ड में व्यावसायिक रंगमंच का विकास हुआ तथा इसी दृष्टि से नाटक रचे गए। इसी काल में सी. एन. श्रीकंठन नायर के प्रसिद्ध ‘रामायण नाटकत्रय’ का प्रथम नाटक ‘कांचनसीता’ (1965) मंचित हुआ। इसी समय जी. शंकर पिळ्ळै के कुछ नाटक मंचित हुए जो आधुनिक रंगमंच में नवीन प्रयोग माने जाते हैं।

1960 - 1970 काल में केरल में अनेक नाट्य संघ प्रचलित हुए। जैसे कि - के. पी. एसी., कोल्लम कालिदास कलाकेन्द्रम, पी. जे. एन्टेनी का नाट्यसंघ, तिरुवनन्तपुरम में कलानिलयम कृष्णन नायर का स्थायी रंगमंच, कोट्टयम में केरल थियेटर्स आदि। तोप्पिल भासी ने के. पी. ए. सी. के लिए अनेक नाटक लिखे (अश्वमेधम, शरशय्या, युद्धकाण्डम, कूट्टुकुडुम्बम और तुलाभारम) जिनमें प्रायः सभी का फिल्मीकरण हुआ। अन्य प्रसिद्ध नाटक हैं कलानिलयम नाटकवेदी के लिए जगति एन. के. आचारि द्वारा लिखित ‘कायंकुळम कोच्चुण्णि’, ‘इळयिडत्तु राणी’, ‘उम्मिणित्तंका’, ‘ताजमहल’ आदि। इसके अतिरिक्त वैक्कम चन्द्रशेखरन नायर का ‘डॉक्टर’, पी. जे. एन्टनी का ‘कडलिरंपुन्नु’, कालडी गोपी का ‘एष़ु रात्रिकळ’ आदि भी प्रसिद्ध हुए। व्यावसायिक रंगमंच के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं वैक्कम चन्द्रशेखरन नायर, कालडी गोपी, ए. एन. गणेश, पोन्कुन्नम वर्की, सी. जी. गोपीनाथ, पोन्कुन्नम दामोदरन, के. टी. मुहम्मद, एस. एल. पुरम सदानंदन आदि।

इस काल के व्यावसायिक नाटक एवं नाट्य प्रस्तुति में विशिष्ट महत्व रखने वाले नाटककार और निर्देशक थे श्री. एन. एन. पिळ्ळै। उनके द्वारा मंचित नाटक अत्यन्त लोकप्रिय रहे थे। उनमें से कुछ हैं - ‘आत्मबलि’, ‘प्रेतलोकम्’, ‘क्रोसबेल्ट’, ‘मरणनृत्तम’, ‘वैन ग्लास’, ‘जन्मांतरम्’, ‘ञान स्वर्गत्तिल’, ‘मेहरबानी’, ‘विषमवृत्तम्’, ‘कापालिका’, ‘ईश्वरन अरस्टिल’ आदि। एन. एन. पिळ्ळै ने सामाजिक व्यवहार की मर्यादाओं पर सवाल किया और संवादों को प्रधानता दी तथा नाट्यभाषा में द्वि अर्थक शब्दों का समावेश किया। उन्होंने ‘नाटक दर्पणम्’ नामक नाट्य लक्षण ग्रंथ भी लिखा।

सी. एल. जोस के नाटक अमेच्युअर रंगमंच को पसंद आए। क्षेत्रीय कला समितियों द्वारा उनकी व्यापक स्तर पर प्रस्तुति हुई। इसके अतिरिक्त पी. वी. कुर्याक्कोस, कडवूर जी. चन्द्रन पिळ्ळै, परवूर जॉर्ज, पी. आर. चन्द्रन आदि के नाटकों को भी व्यापक प्रचार मिला।

बाद में जी. शंकरपिळ्ळै आधुनिक रंगवेदी के प्रमुख प्रयोक्ताओं में एक बने। उनके द्वारा लिखे नाटकों में प्रधान हैं - ‘पोय्मुखंगल’, ‘ओलप्पांपु’, ‘पे पिडिच्च लोकम’, ‘कष़ुकन्मार’, ‘रक्षा पुरुषन्मार’। इसके अतिरिक्त सी. एन. श्रीकंठन नायर के ‘मान्यतयुडे मरा’, ‘एट्टिले पशु’ आदि नाटक भी इसी काल में लिखे गए।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

मराठी रंगमंच का इतिहास -मेधा साठे

मराठी रंगमंच की ऐतिहासिक परंपरा है। इसका प्रारंभ १८४३ से हुआ। आरंभ काल में ऐतिहासिक विषयों तथा पुराणों के आधार पर नाटकों में स्‍वदेश प्रेम, स्‍वतंत्रता के प्रति आस्‍था से संबंधित विषय रहे। इन नाटकों पर तिलक, चिपलुणकर जैसी विभूतियों के विचारों का प्रभाव था।

१८८० में अण्‍णासाहेब किर्लोस्‍कर लिखित 'संगीत शाकुंतल' का मंचन हुआ। संगीत नाटक, कीर्तन, ऑपेरा, शास्‍त्रीय संगीत, महफिल, तमाशा, कर्नाटक संगीत से एकदम अलग नाट्याविष्‍कार था। १९१० से मराठी रंगमंच ने सुवर्णकाल देखा, जिसमें किर्लोस्‍कर और गोविंद बल्‍लाल देवल के बाद कृष्‍णाजी प्रभाकर खाडिलकर, राम गणेश गडकरी जैसे सिद्धहस्‍त लेखकों ने 'मानापमान', 'स्‍वयंवर', 'एकच प्‍याला' जैसे अनेक अजरामर नाटकों को जन्‍म दिया, जिनका मंचन आज भी हो रहा है। उस ज़माने में महिलाओं को नाटक में काम करना मना था, जिसके कारण किसी मोहक काबिल सुरीली आवाज के आदमी को ही स्‍त्री की भूमिका निभानी पड़ती थी। स्‍त्री की भूमिका करने वालों में और उन्‍हें ज्‍़यादा अमर बनाने वालों में प्रमुख नाम नारायणराव राजहंस का लिया जाता है, जो 'बालगंधर्व' के नाम से प्रख्‍यात हैं, जिन्‍होंने अपने गायन और रूप से सबका मन मोह लिया था। उनकी समकालीन महिलाएं तो उनके किये गए फैशन को अपनाती थीं। मास्‍टर दीनानाथ मंगेशकर, नानासाहेब फाटक, भालचंद्र पेंढारकर ने अपने गाँवों में रंगमंच पर इतिहास रचा। शुरू-शुरू में इन नाटकों की अवधि पाँच अंकों की रहती थी जो रात में १० बजे शुरू होकर सुबह पाँच बजे तक चलते थे। बदलते समय के अनुसार उसे कम कर दिया गया और धीरे-धीरे नाटक ३ अंकों का बन गया। अब तो २ अंक के नाटक होने लगे हैं, जिनकी अवधि ढाई या तीन घंटे होती है।
'संगीत-नाटक' मराठी रंगमंच की विश्‍व रंगमंच को एक महत्‍वपूर्ण देन है। नाट्यानंद, काव्‍यानंद और स्‍वरानंद का संगम अर्थात् 'नाट्यसंगीत'। संगीत नाटकों की परंपरा इस आधुनिकता और पश्चिमीकरण के भंवर में भी अपना स्‍थान अक्षुण्‍ण बनाए हुए है। समय के अनुसार 'संगीत-नाटक' में आविष्‍कार होते गए और नए-नए प्रयोग किए गए। लोगों की रुचि देखकर उसमें सरलता लाई गई। इसमें पं. जितेन्‍द्र अभिषेकी का कार्य महत्‍वपूर्ण रहा। उन्‍होंने सुगम नाट्यगीत तैयार कर अपनी अलग पहचान बनाई। १९६० से ८० की अवधि में विद्याधर गोखले और वसंत कानेटकर जैसी विभूतियों ने, सभी दर्शकों को भानेवाले संगीत नाटकों की निर्मिती की। आज के दौर में तो पार्श्‍वसंगीत के आधार पर रिकार्ड किए गए गाने पेश किए जाते हैं। इस प्रकार नया रूप लेकर पेश किए गए नाटकों को सभी लोगों ने पसंद किया। श्रीकांत मोघे, प्रशांत दामले जैसे अभिनेताओं ने 'लेकुरे उदंड जाहली', 'एका लग्‍नाची गोष्‍ट', जैसे नाटकों को लोकप्रिय बनाया। अब तो मराठी नाटकों में सामूहिक नृत्य भी होता है।

रंगमंच का इतिहास सामाजिक परिवर्तन से भी जुड़ा है क्‍योंकि अत्रे, रांगणेकर के नाटकों में महिला कलाकारों ने रंगमंच पर काम करना प्रारंभ किया। उस जमाने में ज्‍योत्‍सना भोळे, मीनाक्षी, जयमाला शिलेदार जैसी अनेक अभिनेत्रियों ने रंगमंच की सेवा की। आचार्य अत्रे, पु.ल. देशपांडे ने अपने हास्‍य नाटकों को लोगों के बीच अजर-अमर बनाया है। पु.ल. देशपांडे के 'बटाट्याची चाळ' तो एकपात्री प्रयोग का रिकार्ड है। उन्‍होंने अपना अलग दर्शकवर्ग तैयार किया।

मराठी दर्शकों का सबसे पसंदीदा नाट्य प्रकार है 'फार्स', जिसमें स्वर ऊँचा अभिनय चटकीला होता है। 'फार्स' नाट्यकृति को लोकप्रिय बनाने में बबन प्रभु और आत्‍माराम भेंडे दोनों का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। 'दिनूच्‍या सासूबाई राधाबाई', झोपी गेलेला जागा झाला' ये उनके फार्स तो बहुत ही लोकप्रिय रहे थे और आज भी लोकप्रिय हैं। मराठी नाटकों में अनेक नवीनतम विषयों को स्‍थान दिया गया। महिलाओं पर आधारित समस्‍याओं पर नाट्यलेखन हुआ जिसने समाज के जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 'संगीत शारदा', 'एकच प्‍याला' जैसे नाटक तो कालजयी कृतियों के उदाहरण हैं। 'कुलवधु', 'महानंदा', 'चारचौघी', 'आई रिटायर होतेय' स्‍त्री-जीवन से संबंधित थे जिन्‍होंने विचारों को प्रेरित किया।

महाराष्‍ट्र में मराठी नाट्यकला में प्रोत्‍साहन बच्‍चों को बचपन से दिया जाता है। यहाँ की बालरंगमंच काफी विकसित है। सुधा करमरकर की 'लिटल थिएटर' संस्‍था तथा 'कुमार कला केन्‍द्र' ने अनेक बालकलाकार रंगमंच को दिये। अनेक मराठी नाटकों का हिन्‍दी, गुजराती में अनुवाद हुआ है। इस रंगमंच के कई कलाकारों ने हिन्‍दी, गुजराती, अंग्रेजी रंगमंच तथा सिनेमाजगत में नाम कमाया है। डॉ. मोहन आगाशे, रमेश देव, सीमा, नाना पाटेकर, डॉ. श्रीराम लागू, रोहिणी हट्टंगड़ी, रीमा लागू, सदाशिव अमरापूरकर, मोहन जोशी जैसे कई दिग्‍गजों के नाम इस सूची के चमकते सितारे हैं।

बदलते समय के अनुसार मराठी नाटक भी तकनीकी रूप से बदलता जा रहा है। इसमें नए-नए प्रयोग किये जा रहे हैं। नए-नए स्वरूप में नाटक की प्रस्‍तुति हो रही है। मराठी नाटकों का सेट नया मोड़ लेता नज़र आ रहा है। पहले रंगीन परदों से सेट बनाए जाते थे फिर घूमते रंगमंच का प्रयोग किया गया जिससे सेट बदलने की अवधि कम हुई। प्रकाश, ध्वनि आदि में भी नयापन आ रहा है और नाटक बदलता जा रहा है।

सिनेमा कलाकारों की तुलना में नाट्य कलाकारों की मेहनत अधिक होती है, किन्‍तु उन्‍हें मेहनताना कम मिलता है, मनोरंजन कर ने नाट्य व्‍यवसाय को पंगु बना दिया है। कला तो कला है, लेकिन राजाश्रय और लोकाश्रय के बिना उसका फलना फूलना मुमकिन नहीं है। मराठी नाटक, नाटककारों, कलाकारों को प्रोत्‍साहन देने तथा उनकी कला को रंगमंच प्रदान करने के लिए 'मराठी राज्‍य नाट्य स्‍पर्धा' का आयोजन होता है, जिसमें अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, दिल्‍ली जैसे अन्‍य राज्‍यों से भी प्रविष्टियाँ आती हैं।

अब तो मराठी नाटककला सात समुंदर पार जा पहुँची है। वहाँ जा कर बसे मराठी लोग वहां पर मराठी नाटक करते हैं, उनका आदर किया जाता है। भारतीय नाट्यकलाकारों को आमंत्रित कर यहां के नाटक वहां नाट्य महोत्‍सवों में मंचित किये जाते हैं। इस प्रकार नाट्यकला का आदान प्रदान किया जा रहा है। यह मराठी साहित्‍य और रंगमंच को गौरवान्वित करने वाली घटना है।

बिहार का रंगमंच - अनीस अंकुर

बिहार में रंगमंच लंबे समय से संकट के दौर से गुजर रहा है। पटना, आरा, गया, बेगूसराय, मधुबनी, कटिहार एवं सहरसा, के अलावा मसौढ़ी जैसे एकाघ शहर व कस्बे ही ऐसे हैं जहाँ नियमित रंगमंच हो रहा है। बिहार जैसे पिछड़े समाज में भी रंगमंच, विषेषकर पिछले दो-तीन दषकों से, अपनी स्थायी जगह बनाता जा रहा है। तमाम कठिनाईयों व दुष्वारियों के बावजूद रंगमंच हो रहा है। बगैर राज्य के समर्थन के, बगैर समाज के सहयोग के, हर वर्ष बड़ी संख्या में रंगकर्मियों के पलायन के बावजूद बिहार में नाटक निरंतर किया जा रहा है। नाटकों के महोत्सव आयोजित हो रहे हैं। पूर्णकालिक रंगकर्मियों की इतनी बड़ी संख्या, जितनी आज है, कभी न थी।

आर्ट व कल्चर के नाम पर आजकल सरकार एवं कारपोरेट हाउस दोनों काफी फंडिंग करती है। लेकिन नाटक को, रंगमंच को उसका हजारवां हिस्सा भी प्राप्त नहीं होता। फिर भी वो क्या चीज है कि नाटक खत्म नहीं हो रहा? हर पाँच-दस वर्ष पर कला, संस्कृति के स्थापित सूरमा बड़े निर्णायक स्वर में ये घोषणा करते हैं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया, फिल्म, टेलीविजन एवं उनके सैंकड़ो चैनल रंगमंच को अप्रासंगिक बना देंगे। पता नहीं कितनी दफे, कितने मंचों से रंगमंच का मर्सिया पढ़ा गया होगा। फिर भी नाटक का होना समाप्त नहीं हुआ है।

यह अवष्य है कि नाटकों का स्वरूप अब पहले की तरह नहीं हैं। नाटकों के लिए स्पेस भी निस्संदेह घटा है फिर भी जिन परिस्थतियों में नाटक दुधर्ष संघर्ष में जुटा है वह वर्तमान दौर में जिजीविषा की एक प्रेरणादायक मिसाल है।

अपना समाज जिस संक्रमण के दौर से गुजर रहा है उसमें लगभग हर चीज, संकट पैदा कर रही है। लेकिन नाटक के साथ ऐसा नहीं है। मुख्यधारा की राजनीति, मीडिया, नौकरशाही, न्यायपालका तक लगभग हर प्रमुख संस्था व्यापक समाज के लिए संकट बन चुकी है। यहां तक कि अकादमिक जगत में भी पहले जैसी पेषागत ईमानदारी नहीं है। अपने समाज का जो बौद्धिक-वैचारिक प्रोफाइल हुआ करता था उसमें भी बड़े पैमाने पर तब्दीली आ चुकी है। यह भी व्यापक समाज के लिए संकट बन कर खड़ा है पर नाटक समाज के कोई संकट नहीं पैदा कर रहा।

बिहार के रंगमंच की सबसे खास बात है इसका प्रयोगधर्मी होना। नाटकों को लेकर इतने किस्म के प्रयोग बिहार के रंगमंच पर हुए हैं कि उसकी गिनती संभव नहीं। प्यारे मोहन सहाय एवं सतीष आनंद, परवेज अख्तर, से लेकर आज के नये युवा निर्देषकों तक सबके साथ विषेष बात है कि सबके अंदर कुछ नया करने की आकांक्षा रहती है। बिहार के रंगमंच के प्रयोगधर्मी होने की एक मुख्य वजह इस राज्य का एक खास चरित्र रहा है। बिहार काफी लम्बे समय से सामाजिक-राजनीतिक हलचलों का केन्द्र रहा है। कई विद्वानों का मानना है कि पिछले ढाई हजार वर्षों से बिहार एक बेचैन प्रदेष रहा है। बुद्ध के वक्त से लेकर आज तक जितनी तरह के आंदोलन बिहार में हुए उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। बिहार के रंगमंच पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। समाज को बेहतर बनाने की कई तरह की कोषिषों की प्रयोगभूमि बना है बिहार। यदि आधुनिक समय में देखें तो आजादी के आंदोलन से किसान आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, वामपंथी आंदोलन, नक्सली आंदोलन सबको अच्छा-खासा समर्थन इस राज्य में मिला। इन तमाम आंदोलन की सबसे खास बात थी इनमें आमलोगों की व्यापक पैमाने पर भागीदारी। बिहार के सामाजिक जीवन की यह विषेषता यहां के कला संस्कृति में भी अभिव्यक्त हुई है। कला के लगभग तमाम अनुषासनों की विषिष्टता रही उसका जनोन्मुख होना। जैसे पेंटिंग में देखें तो ‘पटना कलम’ इस देष में चित्रकला के क्षेत्र में पहली ऐसी षैली थी जिसने पहली बार आम आदमी को चित्रकला के केंद्र में लाया। ठीक इसी तरह साहित्य में देखें तो फणीष्वर नाथ रेणु, नागार्जुन से लेकर आज के साहित्यकारों तक सबकी केंद्रीय चिंता आम आदमी है। खुद साहित्य में भी कई किस्म के प्रयोगों और षैलियों का जन्मदाता बिहार रहा है। संगीत में पटना हिंदी इलाके की एकमात्र ऐसी जगह रही है जहां षास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में भी श्रोताओं और आम दर्षकों की विषाल संख्या उसमें भाग लेती रही है। दषहरे के मौकों पर आम जनता की व्यापक भागीदारी वाले संगीत सभाओं का आयोजन इस राज्य की विषिष्टता रही है। यहां के रंगमंच में भी प्रारंभ से ही आम जनता के सरोकारों से जुड़ना यहां के रंगकर्मियों की प्राथमिक चिंता रही है। पटना पूरे हिंदी इलाके का एकमात्र ऐसा स्थल माना जाता है जहां नुक्कड़ नाटक अभी भी बड़े पैमान पर लोकप्रिय है। दूसरे हिंदी प्रदेषों में नुक्कड़ नाटकों का जितने बड़े पैमाने एन.जी.ओकरण हुआ है बिहार उससे अपेक्षाकृत कम हुआ है। ऐसा इस कारण हुआ कि यहाॅं के रंगमंच में षुरूआत से ही आम जीवन के लिए रंगमंच करनेवाली प्रतिबद्ध धारा बेहद सषक्त और प्रभावषाली रही है। दूसरे प्रदेषों में नुक्कड़ नाटक जहाॅं ठहराव का षिकार है वहीं बिहार में यह विधा लगातार लोकप्रिय होती जा रही है। बिहार, विषेषकर, पटना में नुक्कड़ नाटक कुछ वर्षों पहले तक केवल वाम रूझानोवाले नाट्य संगठन किया करते थे लेकिन आज इसे पटना का हर नाट्य दल करता है। नये नुक्कड़ नाटकों की रचनाएं हुई हसन इमाम और संतोष झा लिखित नुक्कड़ नाटकों के मंचन बिहार के अलावा दूसरे हिंदी प्रदेषों में भी किए गए। देष भर में चर्चित ‘पटना पुस्तक मेला’ में हर दिन होने वाले नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्षन इसकी निरंतर बढ़ती लोकप्रियता का सूचक है। प्रेरणा, इप्टा, अभियान, हिरावल, अक्षरा आर्ट्स, मंच आर्ट ग्रुप, निर्माण कला मंच,एच.एम.टी आदि संगठनों की इस विधा में खास सक्रियता बनी हुई है।

यदि मंच नाटकों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो हर साल पटना में विभिन्न संस्थाओं, द्वारा अलग-अलग नाटकों के मंचन होते रहते हैं। कम से कम चार-पांच महोत्सवों का आयोजन होता है। प्रमुख महोत्सवों में ‘बिहार आर्ट थियेटर’ द्वारा जनवरी माह में आयोजित होने वाला ‘पटना थियेटर फेस्टीवल’, ‘प्रांगण’ द्वारा फरवरी में ‘पाटलिपुत्र नाट्य महोत्सव’, ‘निर्माण कला मंच’ द्वारा अगस्त में स्थापना दिवस समारोह एवं दिसंबर माह में ‘इप्टा’ द्वारा ‘भिखारी ठाकुर नाट्य महोत्सव’ है। बीच-बीच में मंच आर्ट ग्रुप भी जुलाई माह में ‘पावस नाट्य महोत्सव’ का आयोजन कर लेती है। थियेटर के लिए संसाधनों की जितनी किल्लत है वैसे में चार-पाच महोत्सवों का आयोजन कर लेना आसान काम नहीं। महोत्सवों के अलावा भी वर्ष भर रंग गतिविधियां बनी रहती पटना में होने वाले मंच नाटकों में विषयवस्तु और शैली में एक विविधता बनी रहती है। प्रयोगध्र्मिता, जैसा की उपर कहा गया है, यहा की सबसे खास पहचान रही है। विदेषी नाटकों के अनुवाद से लेकर से स्थानीय फोक पर आधारित नाटकों सब तरह की प्रस्तुतियां पटना रंगमंच पर होती रही है। इधर कुछ वर्षों से नये लिखे जाने वाले नाटकों पर अधिक जोर रहा है। बिहार के चर्चित रंग निर्देषक संजय उपाध्याय ने ज्यादातर बिहार के नाटककारों द्वारा लिखे नाटकों के मंचन में विषेष दिलचस्पी, हाल के दिनों में, दिखलायी है। उदाहरणस्वरूप रवीन्द्र भारती, उषा किरण खान, हृषीकेष सुलभ, श्रीकांत किषोर जैसे नाटककारों के लिखे नाटक इन दिनों खेले गए। विषेषकर हृषीकेष सुलभ ने अपने कुछ नाटकों से पूरे हिंदी प्रदेष में अपनी खास पहचान बनायी है उनके नाटकों, हाल के दिनों में ‘बटोही’, ‘धरती आबा’ और पूर्व में ‘अमली’ और ‘माटी की गाड़ी’ राष्टीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है। अस्सी के दषक में सतीष आनंद ने ‘अमली’ और माटीगाड़ी जैसी प्रस्तुतियों के जरिए ‘बिदेषिया’षैली को स्थापित किया। इस दौर में सतीष आनंद और हृषीकेष सुलभ की जोड़ी बिहार के रंगमंच की एक ‘परिघटना’ के रूप में देखा जाता है। हालांकि दुभाग्र्यवष यह जोड़ी आगे बरकरार नहीं रह पायी। 1974 के व्यापक प्रभावों वाले जयप्रकाष नारायण के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन में ‘जुलूस’ जैसे नुक्कड़ नाटकों के जरिए सतीष आनंद ने भागीदारी निभाकर भविष्य के आंदोलनों और आम जनता से जुड़ाव रखने वाले रंगमंच की नींव डाली। इसी कड़ी में सबसे चर्चित नाम परवेज अख्तर का है जिन्हें ‘दूर देष की कथा’, मुक्ति पर्व जैसे बेहद सफल नाटकों के जरिए प्रसिद्धि मिली। ये दोनों नाटक क्रमषः जावेद अख्तर और अविनाष चंद्र मिश्र द्वारा लिखे गए थे। ये दोनों बिहार में रहने वाले रचनाकार हैं। इन तमाम बातों से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि जब-जब बिहार से जुड़े रचनाकारों के साथ मिलकर रंग निर्देषकों ने काम किया उसे न सिर्फ राष्ट्ीय पहचान और स्वीकृति मिली बल्कि स्थानीय जनता का भी व्यापक समर्थन मिला।

बिहार के नाटककारों में भागलपूर के ‘दिषा’ से अपने नाट्य लेखन की षुरूआत करने वाले राजेष कुमार का विशेष योगदान रहा है। ‘जनतंत्र के मुर्गे’, ‘भ्रष्टाचार का अचार’ जैसे लोकप्रिय नुक्कड़ नाटकों के अलावा हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण मंच नाटकों की भी रचना की है। राजेष कुमार के नाटकों की सबसे खास बात ये रही है कि इसने अपने नाटकों के माध्यम से महत्वपूर्ण समकालीन सामाजिक हलचलों पर वैचारिक हस्तक्षेप करने की कोषिष की है। चर्चित कथाकार मधुकर सिंह ने भी एक-दो अच्छे नाटक लिखे। इसी प्रकार श्रीकांत किषोर ने कई महत्वपूर्ण नाटकों की रचना की है। श्रीकांत किषोर के नाटकों का परवेज अख्तर और संजय उपाध्याय जैसे निर्देषकों काफी सफल मंचन किया है। इनके नाटक भी अपने बौद्धिक आवेगों और नये किस्म की रंगयुक्तियों के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं। नुक्कड़ नाटकों के क्षेत्र में देखें तो बिहार के हसन इमाम और संतोष झा ने नयी जमीन तोड़ी है इनके लिखे नाटक सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि दूसरे हिंदी इलाकों में भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। बिहार की इस सर्जनात्मक उर्जा के पीछे बिहार के सामाजिक जीवन में चल रही बेचैनी और छटपटाहट है। बिहारी समाज अपने पुराने ढांचे से निकलना चाहता है। पुराने समाज से निकलने की यह अकुलाहट इस राज्य के तमाम रचनाकारों में दिखाई पड़ती है।

सतीष आनंद को बिहार में आधुनिक हिंदी रंगमंच को स्थापित करने का श्रेय जाता है। उनके पष्चात परवेज अख्तर, संजय उपाध्याय, तनवीर अख्तर अनिरूद्ध पाठक, राजीव रंजन श्राीवास्तव, विजय कुमार जैसे निर्देषकों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इनके मंचित नाटकों को राष्ट्ीय पहचान मिली। सतीष आनंद और संजय उपाध्याय ने भिखारी ठाकुर के प्रख्यात नाटक ‘बिदेसिया’ को पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय बना दिया। ठीक ऐसे ही राष्ट्ीय नाट्य विद्यालय से प्रषिक्षित विजय कुमार ने हरिषंकर परसाई की मषहूर व्यंग्य रचना ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’’ का पूरे देष भर में मंचन किया। ठीक इसी प्रकार चर्चित रंगकर्मी राजीव रंजन श्रीवास्तव के ‘बाथे में बिदेषिया’ को भी व्यापक स्वीकृति मिली। इन सभी प्रस्तुतियों की सबसे खास बात ये थी कि इनमें बिहार की अपनी भाषा और अंदाज को पकड़ने को कोषिष अपने तईं की है। बिहार, खासकर पटना और मधुबनी में मैथिली रंगमंच का भी सषक्त मौजूदगी है। कुणाल मैथिली में काम करनेवाले आधुनिक रंगकर्मी माने जाते हैं। मैथिली रंगमंच में हालांकि परंपरा के प्रति गहरा अनुराग अभी मौजूद है लेकिन इधर कुछ वर्षों से आधुनिक प्रवृत्तियां भी निरंतर मजबूत होती जा रही है।

बिहार के रंगकर्मियों की एक अन्य विषेषता रंगमंच से इतर जाकर कला और संस्कृति के सवालों पर प्रतिक्रिया करना रहा है। अस्सी के दषक में ‘प्रेमचंद रंगषाला मुक्ति अभियान’ के लिए बनी ‘कलाकार संघर्ष समिति’, पटना आर्ट काॅलेज के लिए बनी ‘संस्कृतियों की समन्वय समिति’ से लेकर प्रवीण की हत्या के खिलाफ बनी ‘हिंसा के विरूद्ध संस्कृतिकर्मी’ के बैनर तले पटना के रंगर्किर्मयों ने एकजुट होकर समय-समय पर अभियान चलाया है।

बिहार के रगंमंच के आगे का रास्ता वही रंगकर्मी बढ़ा पायेंगे जो बिहार की सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों और बेचैनी को सृजनात्मक और रंगमंचीय षक्ल देने में सक्षम होंगे। बिहार में यह काम रंगमंच के क्षेत्र में उन्नत माने जाने वाले राज्यों की तुलना में पीछे है। बिहार का रंगमंच जितना ज्यादा मुठभेड़ समकालीन सवालों से करेगा उतना ही वह रंगमंच के लिए इस तेजी से बदलते समाज में अपने लिए स्पेस बना पाएगा। एक दूसरे अर्थ में कहा जाए तो एक पिछड़े और सामंती प्रभावों वाले समाज में बिहार का रंगमंच आधुनिकता की परियोजना को जितना आगे बढ़ा पाने में सक्षम होगा उतनी ही उसकी उपादेयता भी सिद्ध होगी।

अनीश अंकुर रंगकर्मी एवं पत्रकार हैं।

आंध्र प्रदेश की नाट्य शैलियाँ - एम.एस. मूर्ति

रंगमंच एक दृश्‍य काव्‍य है, इसमें दृश्‍यों के आधार पर कहानी/घटना दिखायी जाती है। प्राचीन काल से वर्तमान तक आंध्र प्रदेश में प्रचलित रंगमंच की मुख्‍य शैलियाँ है :- १.बुर्रकथा (तुक्‍कड़ प्रस्‍तुति और लोकगीत), २.हरि कथा, ३.विधि नाटकम्, ४.कोलाटम्, ५.साधारण नाटक, ६.गायक-दल, ७.तोलुबोम्‍मलाट


१. बुर्रकथा

लोक रीतियों में बुर्रकथा बहुत ही प्राचीन एवं प्रचलित है। बुर्रकथा तीन व्‍यक्तियों द्वारा प्रस्‍तुत की जाती है। इसमें एक प्रधान गायक होता है और दो सहयोगी होते हैं। प्रधान गायक तथा सहगायकों द्वारा सहगान किया जाता है। तीनों आंध्र में प्रचलित लम्‍बी ढोल का प्रयोग करते हैं। कथा की प्रस्‍तुति गद्य एवं पद्य में होती है। कथा में नाटकीय प्रभाव लाने के लिए बीच-बीच में वाद्यकार का रूकना, आगे की ओर कदम बढ़ाना या ढोल की ताल के अनुरूप चक्‍कर काटना या नृत्‍य भंगिमाओं का अभिनय करना शामिल होता है ताकि कहानी/घटना या नृत्‍य भंगिमाओं का अभिनय करना शामिल होता है ताकि कहानी/घटना के भाव प्रभावी रूप से प्रस्‍तुत हों। बुर्रकथा में अधिकांश सामाजिक, स्‍वतंत्रता आंदोलन की घटनाएं, नीति कहानियाँ, आदि प्रस्‍तुत की जाती हैं।

२. हरिकथा

महाकाव्‍यों और पुराणों की कहानियों का उपयोग हरिकथा में परम्‍परागत रूप से किया जाता है। भारत वर्ष की प्राचीन संस्‍कृति, जो ऋषि-मुनियों द्वारा दी गई है, उसे हरिदास (हरि के सेवक) द्वारा गायन, गद्य, पद्य एवं नृत्‍य के अभिनय द्वारा हरिकथा की प्रस्‍तुति की जाती है। हरिदास एक गायक, कहानी-वाचक, समसामयिक जीन के विश्‍लेषक, भाषाविज्ञानी, कवि, नाटककार, निर्माता, निर्देशक और मुख्‍यत: भगवान और समाज के बीच में एक कड़ी की भूमिका निभाता है।

रामायण, महाभारत, भागवत, आदि की घटनाओं, सत्‍य हरिश्‍चंद्र, नल चरित्र, भक्‍त प्रह्लाद, भक्‍त ध्रुव, भक्‍त मार्कंडेय, आदि कथाओं को कमनीय ढंग से हरिदासों द्वारा प्रस्‍तुत किया जाता है।

३. विधि नाटकम्

आंध्रप्रदेश के ग्रामों में भ्रमणशील नाटक मण्‍डलियों द्वारा की गई प्रस्‍तुतियों को 'विधि नाटकम.' यानि 'खुला मंच पर नाटक' कहते हैं। पश्चिमी नाटकों के आगमन से पूर्व, विधि नाटकम् की अहम भूमिका रही आज़ादी के आंदोलन में। संस्‍कृति की रक्षा, भक्ति, ज्ञान, नीति के प्रस्‍तुतिकर्ता आदि के रूप में विधि नाटकम् कार्य निर्वाह करता है। पश्चिमी नाटक संस्‍कृति के साथ-साथ बड़े-बड़े मंच के सेट, फ्लड लाइट्स, आदि के विधि नाटकम् ग्रामों और छोटे-छोटे शहरों में आयोजित किए जाते हैं। सिनेमा के आगमन के बाद भी विधि नाटकम् ने अपना महत्‍व खोया नहीं। विधि नाटकम् को सफल बनाने का श्रेय आंध्र की मण्‍डलियों को जाता है। उन्‍होंने परिश्रम करके, समय के अनुरूप नाटकों का एक भण्‍डार सृजित किया है जो अभी भी विशाल श्रोतागणों के सामने प्रस्‍तुत किये जा रहे हैं। 'हिटलर प्रभावम्' सफलता पूर्वक विधि नाटक की मण्‍डलियों द्वारा प्रस्‍तुत किया जा रहा है।

४. कोलाटम्

'कोलाटम्' आंध्र प्रदेश का लोकप्रिय लोकनृत्‍य है, जो गुजरात राज्‍य के 'गर्भा' और 'रास' नृत्‍यों से मिलता जुलता है। 'कोलाटम्' नृत्‍य में उत्‍साह और शक्ति का प्रदर्शन दिखाई पड़ता है। कोलाटम् पुरूष प्रधान नृत्‍य है। स्‍त्री प्रधान नृत्‍य है - 'लम्‍बाडी' और 'बतकम्‍मा', जो उत्‍सव, त्‍यौहार आदि के समय नृत्‍य नाटकों में उपयोग किया जाता है।

५. नाटक

वर्तमान समाज में हो रही घटनाओं, राजनीति, भ्रष्‍टाचार, परिवार कल्‍याण आदि विषयों पर आधारित नाटकों को 'नाटक' कहा जाता है। इन नाटकों को शहरों और नगरों के कम्‍यूनिटी हाल/ऑडिटोरियम आदि में पेश किया जाता है, जिनमें बड़े-बड़े फ्लड लाइट्स आदि की व्‍यवस्‍था होती है।

६. गायक दल

गायक भिक्षुक दल पूरे भारत वर्ष में पाये जाते हैं। आंध्र प्रदेश में इन दलों की संख्‍या काफी अधिक है। गायक दल विचित्र वेश में दिखाई देते हैं और एक ग्राम से दूसरे ग्राम घूमते रहते हैं। गायक दल अपनी प्रस्‍तुति गायन द्वारा प्रस्‍तुत करते हैं। वे भविष्‍यवाणी, औषधों को बेचना, बीमारियों के निदान, साधारण जनता को अच्‍छे एवं परोपकार गुण से रहने के लिए प्रेरित करते हैं। गायक दल समाज में पाये जाने वाले अवगुणों को अपने गायन कौशल द्वारा बता कर, इलाज करते हैं।

७. तोलुबोम्‍मलाट

गुडियाँ बनाकर उन्‍हें नचाते हुए अभिनय कराते हुए नेपथ्‍य में कथन एवं संगीत की प्रस्‍तुतिकरण को 'तोलुबोम्‍मलाट' कहा जाता है। यह भी एक प्रचलित रंगमंच की शैली है। वर्तमान में यह शैली छोटे गाँवों में ही देखने को मिलती है। उपरोक्‍त शैली आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जा सकती है। इतिहास, स्‍वतंत्रता आंदोलन की घटनाएं रामायण, महाभारत, पुराणों, आदि कहानियों की प्रस्‍तुति 'तोलुबोम्‍मलाट' में प्रस्‍तुत की जाती है। कमलहासन की हिंदी फिल्‍म 'इंडियन' में 'तोलुबोम्‍मलाट' के दृश्‍य दिखाये गये हैं।

८. कलापम

कलापम चरित्र चित्रण की गीति-नाट्य शैली है। नाटक की इस विधा में गायन और हाव भावों की मदद से पात्र का चरित्र चित्रण किया जाता है। यह किसी एक घटना की अभिव्‍यक्ति होती है। इसके विषय आमतौर पर सामाजिक और मनोविज्ञानिक होते हैं। इसमें मुख्‍य पात्र की सहायता दोनों का काम करता है। मुख्‍य पात्र अभिनय करता है और दूसरा पात्र निरूपण तथा व्‍याख्‍यायन का कार्य करता है। प्रमुख पात्र नांदी अ‍थवा मंगलाचरण द्वारा स्‍वयं का परिचय देता है। 'कलापम' के गीत आमतौर पर नृत्‍याधारित होते हैं। नृत्‍य और गीत का संगुंफन किया जाता है। 'कलापम' की दो मुख्‍य शैलियाँ हैं; एक तो शास्‍त्रीय शैली है, जिसे कुचीपुड़ी नृत्‍यकारों ने अपना कर विकसित किया है। दूसरी शैली में 'कलापम' के मूल रूप को ही अभिनीत किया जाता है। 'कलापम' के प्रमुख स्‍वरूप हैं : 'भाम कलापम' और 'गौल्‍ल कलापम'। इसके अन्‍य प्रचलित स्‍वरूप हैं - कोरांजीवेशम, कूरमुलावेशम, पंथलुपंथनीवेशम। इनमें भी 'भाम कलापम' का दर्जा काफी ऊंचा माना जाता है, क्‍योंकि कुचीपुड़ी ने इसे शास्‍त्रीय अभिनय के आदर्श के रूप में स्‍वयं में समाहित किया है। कुचीपुड़ी की रेपरटरी द्वारा अपनाए जाने के बाद 'गोल्‍ल कलापम' का दर्जा भी शास्‍त्रीय स्‍तर तक पहुंच गया। 'भाम कलापम' और 'गोल्‍ल कलापम' में मुख्‍य अंतर यह है कि 'भाम कलापम' समाज के उच्‍च वर्ग में प्रदर्शित किया जाता है और 'गोल्‍ल कलापम' मुख्‍यत: ग्रामीण जनता के मनोरंजन के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है। 'गोल्‍ल कलापम' में विश्‍व के उद्भव और मानव के जन्‍म की कथा कही जाती है। इसमें एक विद्वान ब्राह्मण और दूध बेचने वाली एक महिला अथवा 'गोल्‍ला' महिला के बीच वार्तालाप के जरिए यह कथा कही जाती है।

९. पगति वेशालु

तेलुगु में 'पगति' शब्‍द का अर्थ है दिन का समय। अत: 'पगति वेशालु' का अर्थ हुआ दिन के समय किसी और का वेष धारण कर, किया जानेवाला प्रदर्शन। यह नाटक कई दिनों तक एक के बाद एक प्रदर्शित किया जाता है। एक बार के प्रदर्शन में तीन से चार कलाकार तक भाग लेते हैं। इसका अभिनय हर घर के दरवाज़े के आगे किया जाता है। प्रदर्शन के अंतिम दिन कलाकार या तो अपनी सामान्‍य वेशभूषा अथवा 'अर्धना‍रीश्‍वर' के वेश में आते हैं और लोगों से उपहार स्‍वीकार करते हैं। कलाकारों द्वारा बनाए जानेवाले वेश कई प्रकार के होते हैं और सबका प्रयोजन अलग-अलग होता है। वेश किसी न किसी समाज तथा उसके तौर तरीकों को प्रदर्शित करता है। ये नाट्य प्रदर्शन समाज पर एक व्‍यंग्‍य के रूप में भी हो सकते हैं और इनका उद्देश्‍य समाज में प्रचलित कुरीतियों तथा बुराइयों को दूर काना भी हो सकता है। कुछ प्रचलित वेश हैं - सोमायाजुलू तथा सोमीदेवम्‍मा (अर्थात् पुरातनपंथी ब्राह्मण और उसकी पत्‍नी); धास्‍थीकन पंथुलु, कोमती धूर्त 'बनिया' तथा हंसी मजाक से भरपूर राजस्‍व इंस्‍पेक्‍टर भट्टू। इन सामाजिक पात्रों के अतिरिक्‍त पौराणिक और ऐतिहासिक वेशों में भी कलाकार प्रदर्शन करते हैं जैसे अर्धनारीश्‍वर, शक्ति, बेताल इत्‍यादि। उपर्युक्‍त दो प्रकार के वेशधारियों के अतिरिक्‍त तीसरे प्रकार के वेशधारी भी होते हैं जो आमतौर पर विनोदी पात्र होते हैं। इस वर्ग में मोदीबंदावल्‍लु, सिंगी सिंगाड़ आदि आते हैं। 'पगति वेशम्' १९वीं सदी के एक स्‍वतंत्र कला रूप से ही निकला हुआ रूप है।

१०. वलाकम्

'वलाकम' का अर्थ है जीवन पद्धति अथवा शैली। यह नाट्य रूप गौरम्‍मा उत्‍सव के साथ जुड़े रीति-रिवाज़ों से उभरा है। उत्‍सव के दिन देवी गौरम्‍मा को घटम् के रूप में गांव के मध्‍य में लाया जाता है। देवी की प्रतिष्‍ठा के उपरांत 'वलाकम' प्रारंभ होता है। रीति के अनुसार एक बड़े ताड़ का पत्‍ता लगाकर गांव के किसी एक व्‍यक्ति की पूंछ बनाई जाती है। शरीर पर काले धब्‍बे चित्रित किए जाते हैं और पूंछ में आग लगाई जाती है। अभिनेता कार्यक्रम स्‍थल के बीचों बीच आकर लोगों का उपहास करता है। वह लोगों को डराता धमकाता है और किसी किसी को जलते पत्‍ते से छूकर दंडित भी करता है। फिर वह गांव के कुछ प्रख्‍यात लोगों की नकल उतारता है। श्रोता इससे बहुत प्रसन्‍न होते हैं और ऐसा दर्शाते हैं कि उनकी भी उन लोगों के बारे में यही राय है। लेकिन फिर भी इस सब के पीछे हास्‍य ही रहता है और किसी का उपहास करने की मन्‍शा नहीं होती।

११. चिरताल रामायणम्

चिरताल रामायणम्, चिरताल भजन से निकला एक रूप ही है। यह मुख्‍य रूप से नृत्‍य रूप है जोकि रामनवमी के उत्‍सव के दौरान चिरतालु बजाकर किया जाता है। दो लंबी लकड़ी के टुकड़ों से चिरताल बनाया जाता है। जिसके सिरे अंडाकर होते हैं। इसके सिरों पर टिन के दो गोल प्‍लेटें लगी होती हैं जिससे कि खनकती आवाज पैदा होती है। नर्तक एक चक्र में जिसे गुंडम् कहते हैं, नृत्‍य करते हैं और लगातार चिरतालु बजाते रहते हैं। कभी-कभी वे मंच पर भी चले जाते हैं, जो नृत्‍य स्‍थल से थोड़ा ऊंचा होता है। नर्तक परिचय गान अथवा 'प्रवेश दारूवु' द्वारा स्‍वयं का परिचय देते हैं। गाने के अंत में भगवान राम का गुणगार किया जाता है (रामचंद्र महाराज की जय)। परिचय गान के अंत में तेज गति का नृत्‍य किया जाता है। इस नाट्य रूप में प्रयोग किए जाने वाले संवाद गाने के रूप (संवाद दारूव) में होते हैं। नृत्‍य नायक जिसे 'बुद्देरी खान' कहा जाता है, नृत्‍य की गति में तेजी अथवा कमी लाने के लिए सीटी बजाता है। कभी-कभी अन्‍य पात्रों के साथ हंसी मजाक करता है और गंभीरता कम करने के लिए हास्‍य के वातावरण का निर्माण करता है। शुरू में इस नाट्य रूप के विषय रामायण से ही लिए जाते थे, आजकल भागवत, महाभारत, बालनागम्‍मा और खम्‍मामा भी इसमें शामिल किए गये हैं।

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

कोलकाता का हिंदी रंग इतिहास

कोलकाता में हिन्दीभाषी समुदाय बहुत लंबे समय से और बहुत बड़ी तादाद में निवास करता आया है । यहां हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है । इसके शुरूआती दौर में तो पारसी शैली के व्यावसायिक नाटक ही छाए रहे । 1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति की स्थापना हुई । यह हिंदी में पहला गैरव्यावसायिक रंग प्रयास था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं। माधव शुक्ल के कोलकाता आगमन और भोलानाथ बर्मन के साथ ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना से कोलकाता के हिन्दी रंगमंच को अपेक्षित गति व प्रतिष्ठा मिली जिसका सतत विकास आज के समर्थ नाट्य आंदोलन में देखा जा सकता है । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर कंपनियों ने कोलकाता में पारसी शैली के नाटक प्रदर्शित करने शुरू कर दिए थे । मूनलाइट, मिनर्वा, कोरिंथियन आदि थियेटरों में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नाटक खेले जाने लगे थे । मनोरंजन करना और पैसा कमाना इनका एकमात्र उद्देश्य था । वृहत्तर सामाजिक संदर्भों से इनका कोई गहरा सरोकार नहीं था परंतु भारी संख्या में आम जनता को रंगमंच की ओर आकर्षित कर लेना इनकी बड़ी सफलता थी । सरल उर्दू या हिन्दुस्तानी में खेले जाने वाले इन नाटकों की भाषानीति नारायण प्रसाद ‘बेताब’ के ‘महाभारत’ नाटक के इस उद्धरण द्वारा समझी जा सकती है :



" न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी जबान गोया मिली-जुली हो ।
अलग रहे दूध से न मिसरी, डली-डली दूध में घुली हो ।।



किन्तु पारसी नाटकों की प्रवृत्ति बाजारू और रुचि हल्की थी । अभिनय कला में भी एक तरह का उथलापन था । तिनाटकीयता के साथ आकस्मिकता और चमत्कार का संयोग उसे और भी भोंडा बनाता था । किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारी रंगयात्रा का प्रारंभिक चरण था और व्यावसायिकता के दबाव के बावजूद पारसी शैली के कई नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय भावनाओं और आकांक्षाओं को निरूपित करने का खतरा मोल ले रहे थे । हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा में पारसी नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत लंबे समय तक हिन्दी का गैरव्यावसायिक रंगमंच भी इनकी शैली से खासा प्रभावित रहा । 1930 तक पारसी शैली का थियेटर जिंदा रहा। सिनेमा के प्रचलन के बाद स्थाई रूप से इनका पर्दा गिर गया । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच समानांतर चलते रहे । देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार था । हिन्दी जाति के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं। माधव शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’ गाते हुए देखना इनके लिए असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते थे ।



1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने स्पष्ट लिखा है कि "आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे कि "संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है । राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर रही है :



"स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।



1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर इसी रान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं। राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी द्वारा निर्देशित ‘भक्त हलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी । पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी नाटकों के द्वारा जागृति लाकर राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे ।



परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का ‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई। अत: यह नाटक ‘भामाशाह की राजभक्ति’ नाम से खेला गया। इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर ‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक ‘विश्व प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।

लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं। माधव शुक्ल के हाथों में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां, शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए । ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे । 1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :



" हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।

पं। माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही उद्घोष करता है :
"आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।



"हिन्दी नाट्य परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने 1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’ नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और ‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण- सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’ नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में डी।एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’ ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । इस काल में कई सामाजिक विषयों पर भी नाटक खेले गये थे, जिसका मारवाड़ी समाज में काफ़ी प्रभाव पड़ा था। जिनमें प्रमुख रूप से दो नाटक- 'समाज दर्पण' और 'फ़ैशनेबुल लुगाई' का जिक्र मिलता है। स्व.गोरधन दास चौधरी द्वारा लिखीत नाटक- ' समाज दर्पण ' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में खेला गया था, इसमें खास बात समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करना था। इस नाटक में बाल विवाह, वृद्ध विवाह, मृतक भोज, ब्रह्मपुरी, परदा प्रथा, सड़कों पर नाच-गाना, जीमनवार- सज्जनगोठ (शादी के अवसर पर भोजन करवाना) जैसी समस्या पर तीखा और व्यंग्यात्मक तरीके से प्रहार किया गया था। इस नाटक में 'स्व. मनसुख रामजी मोर' ने खुद मुख्य भूमिका निभाई थी। 'फ़ैशनेबुल लुगाई' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में ''स्व. काली प्रसाद खेतान के जातिय बहिष्कार'' को लेकर नाटक खेला गया था, जिसमें खुद स्व.काली प्रसाद खेतान ने मुख्य किरदार की भूमिका निभाई थी। इस नाटक के लेखक भी स्व.गोरधन दास चौधरी थे। जिसको लेकर उस जमाने में समाज के बीच काफ़ी हलचल पैदा हो गई थी। 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का प्रदर्शन किया गया । 1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी, सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ । 22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया । ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे- बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की दिशा में अत्यंत स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने ‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व ‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया ।



इसी वर्ष कृष्णाचार्य के संपादन में ‘हिन्दी नाट्य साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है । 1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल ‘भूचाल’,'खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे । अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक खेला । ‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’, ‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए ख्यात है ।



श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के नाटकों का निर्देशन किया है ।



1976 में रंगकर्मी ने कोलकाता के नाट्य परिदृश्य में ‘एंट्री’ ली और सबसे सक्रिय नाट्यदल के रूप में उभरकर आया । पिछले पच्चीस वर्षों में उषा गांगुली जैसे समर्पित रंग व्यक्तित्व और संगठनकर्ता के नेतृत्व में ‘महाभोज’, ‘लोक कथा’, ‘होली’, ‘वामा’, ‘कोर्ट मार्शल’, ‘रूदाली’, ‘खोज’ व ‘बेटी आई’ के प्रदर्शन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नाट्य दल के रूप में सराहा जाता है । ‘हिम्मत माई’ व ‘शोभा यात्रा’ के मंचन के पश्चात उषा गांगुली ने न केवल एक समर्थ अभिनेत्री और सफल निर्देशक के रूप में वरन विशिष्ट नाट्य समालोचक एवं व्याख्याकार के रूप में भी अपने को स्थापित किया है । उषा गांगुली ने हिन्दी रंगमंच को अधिक जनोन्मुख तो बनाया ही, साथ ही बांग्ला रंगमंच की गौरवशाली परंपरा से गहरे जुड़े बांग्लाभाषी दर्शकों के बीच भी हिन्दी नाटकों को प्रतिष्ठा प्रदान की ।



अभी हाल ही में काशीनाथ सिंह की सुप्रसिद्ध रचना पर ‘काशीनामा’ और मंटो की कहानियों पर आधारित तीन नाटकों की श्रृंखला के सफल मंचन द्वारा उन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता को प्रदर्शित किया है । कोलकाता की एक शताब्दी से चली आ रही हिन्दी रंग परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में लगभग एक दर्जन नाट्य दल अपनी सक्रियता से इसे पुष्ट कर रहे हैं । महेश जायसवाल ने अपने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज को जन संस्कृति के वृहत्तर सरोकारों से जोड़ा है । विपरीत परिस्थितियों में भी प्रताप जायसवाल ने न केवल अपनी टोली ‘अभिनय’ को बचाए रखा, बल्कि ‘मिस्टर अभिमन्यु’, ‘रावणलीला’ व ‘दुस्समय’ जैसी कई नाट्य प्रस्तु्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप जारी रखा । स्पंदन, लिटिल थैस्पीयन, अकृत, रंगकृति, प्रयास, कला सृजन अकादमी, नीलांबर व कलाकार जैसी रंग संस्थाएं लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास कराती रही हैं । सामूहिकता और सृजनात्मकता के लिए यह कठिन समय है । नाटक की तो संरचना ही सामूहिकता और सृजनात्मकता के पायों पर टिकी है । नाटक के होने का अर्थ है एकांतिकता और बंजरपन का न होना । एक समर्थ नाट्य आंदोलन जीवंत और गतिशील समाज की पहचान है । जिस भाषा में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली जैसे तपे हुए नाट्य व्यक्तित्व सक्रिय हों, जिसमें नाट्य शोध संस्थान जैसी अद्वितीय संस्था का अस्तित्व हो, जिसमें आज भी संसाधनों के अभाव के बावजूद सामूहिकता के बल पर नाटकों का मंचन संभव हो तो गैरजरूरी हताशा का कोई कारण दिखाई नहीं देता ।

[संदर्भ:'वागर्थ' के मार्च-अप्रैल २००२ अंक प्रियंकर पालीवल द्वारा लिखित ]




अनामिका:‘अनामिका’ की स्थापना कलकत्ता में 22 दिसंबर 1955 को हुई। संस्था के गठन के लिए पहली बैठक जुलाई-अगस्त 1955 में बुलाई गई थी। अध्यक्ष पद के लिए गोविंद प्रसाद कानोड़िया और मंत्री पद के लिए प्रतिभा अग्रवाल तथा श्यामानंद जालान का चुनाव हुआ। संस्था ने आगामी दो तीन बैठकों में अपने मूल उद्देश्य, नियमावली तथा कार्यक्रम निश्चित किए और सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों पर आधारित ‘पन्त प्रवाहिनी’ कार्यक्रम के साथ 22 दिसंबर 1955 को जनता के समक्ष आई। और तबसे यही दिन स्थापना दिवस के रूप में माना जाने लगा।


‘अनामिका’ का प्रथम कार्यक्रम ही साहित्यिक था- सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों का व्याख्या एवं विवरण युक्त गायन। मार्च सन् 1956 में आर. जी. आनंद लिखित ‘हम हिन्दुस्तानी है’ ‘अनामिका’ की पहली नाट्य-प्रस्तुति थी।



सन् 1959 में जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की नृत्य रूपक के रूप में प्रस्तुति साहित्य, संगीत एवं नाटक की त्रिवेणी थी, ‘अनामिका’ के मूल उद्देश्यों की सार्थक- समन्वित अभिव्यक्ति थी। इस काल में सौमेन टैगोर, भूपेन हजारिका (गुवाहाटी), चंद्रबदन सी. मेहता (बड़ौदा), चाल्र्स एल्सन (न्यूयार्क), पं.नारायण आचार्य (वाराणसी), कल्याणमल लोढ़ा (कलकत्ता) जैसे विद्वानों को ‘अनामिका’ ने अपने बीच पाया भवानी प्रसाद मिश्र और कैलाश वाजपेयी जैसे कवियों की कविताओं का रसास्वादन किया।


नाट्य क्षेत्र में ‘अनामिका’ को जो यश मिला, जो उसकी उपलब्धि हुई, उसने उसे नाट्य-प्रस्तुतियों पर ही अधिक ध्यान देने को प्रेरित किया। सन् 1959 में ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा ‘नए हाथ’ के मंचन पर प्रथम पुरस्कार की प्राप्ति ने इस धारणा की पुष्टि की। सन् 1961 में रवीद्र जन्म-शतावार्षिकी के अवसर पर ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा आयोजित विशेष समारोह में रवीन्द्रनाथ के ‘घरे बाइरे’ उपन्यास का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत करने के लिए ‘अनामिका’ के आमंत्रित होने पर उक्त धारणा को और बल मिला।



‘अनामिका’ के प्रारंभिक पाँच वर्षों के इतिहास को हम देखें तो एक ओर हमें कार्यक्रमों की विविधता दिखलाई पड़ती है, दूसरी ओर हिंदी नाटक एवं रंगमंच को ठोस धरातल प्रदान करने की चेष्टा। सन् 1956 से 1960 के बीच ‘हम हिन्दुस्तानी है’ (आर. जी. आनंद, मार्च 1956: श्यामानंद जालान), ‘नए हाथ’ (विनोद रस्तोगी, अप्रैल 1957: बद्रीप्रसाद तिवारी), ‘चाय पाटियाँ’ (संतोष नारायण नौटियाल, जनवरी 1959: संतोष नारायण नौटियाल), ‘जनता का शत्रु’ (हेनरिक इब्सन, मार्च 1959: श्यामानन्द जालान) तथा ‘आषाढ़ का एक दिन’ (मोहन राकेश, सितंबर 1960: श्यामानन्द जालान) पूर्णांग नाटक प्रस्तुत किए गए तथा ‘संगमरमर पर एक रात’ (धर्मवीर भारती, सितंबर 1956), ‘सत्य किरण’ (कृष्ण किशोर श्रीवास्तव, सितंबर 1956), ‘नदी प्यासी थी’ (धर्मवीर भारती, जनवरी 1956), ‘पाटलीपुत्र के खँडहर में’ (कमलाकांत वर्मा, सितंबर 1957), ‘अँजो दीदी’ (अश्क, सितंबर 1958), तथा ‘नवज्योति की नई हीरोइन’ (सत्येन्द्र शरत, सितंबर 1958) एकांकी प्रस्तुत किए गए।



‘अनामिका’ की गतिविधियों का दूसरा पंचवर्षीय चरण सन् 1961 से 1965 तक था। इन वर्षों में ‘घर-बाहर’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1961: श्यामानन्द जालान), ‘छपते-छपते’ (मिहिल सेबेशियन, 1963: श्यामानन्द जालान), ‘शेष रक्षा’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1963: प्रतिभा अग्रवाल), ‘मादा कैक्टस’ (लक्ष्मीनारायण लाल, 1964: श्यामानन्द जालान), ‘छलावा’ (परितोष गार्गी, 1964: प्रतिभा अग्रवाल) एवं ‘कांचन रंग’ (शंभु मित्र तथा अमित मैत्र, 1965: कृष्ण कुमार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें से ‘मादा कैक्टस’ को छोड़कर अन्य सब अनुवाद एवं रूपान्तर थे।



सन् 1966 में अमृत लाल नागर के ‘सुहाग के नूपुर’ का नाट्यरूपांतर (प्रतिभा अग्रवाल) और मोहन राकेश का ‘लहरों के राजहंस’ (श्यामानन्द जालान), सन् 1967 में लक्ष्मीनारायण लाल का ‘दर्पण’ (बद्री तिवारी), ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘शुतुरमुर्ग’ (श्यामानन्द जालान), शिवकुमार जोशी का ‘साप-उतारा’ सन् 1968 में बादल सरकार का एवं ‘इन्द्रजीत’ (श्यामानन्द जालान), लुइजी पिरैडेलो के ‘राइट यूँ आर इफयू थिंक सो’ का भारतीय रूपान्तर ‘मनमाने की बात’ (प्रतिभा अग्रवाल), सन् 1969 में आर्थर मिलर के 'आल माई सन्स’ का भारतीय रूपान्तर ‘मेरे बच्चे’ (शिवकुमार जोशी), सन् 1970 में मोहन राकेश का ‘आधे-अधूरे’ (श्यामानन्द जालान), बादल सरकार का ‘बल्लभपुर की रूप कथा’ (कृष्ण कुमार) तथा ‘राम-श्याम-जदु’ (बादल सरकार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें ‘साप-उतारा’, ‘रूप कथा एवं राम-श्याम-जदु’ हास्यरस प्रधान नाटक थे, शेष सभी गंभीर। गंभीर नाटक होने के कारण इन सभी प्रस्तुतियों का महत्व था तथापि, इनमें ‘लहरों के राजहंस’, शुतुरमुर्ग’, एवं ‘इन्द्रजीत’ तथा ‘आधे-अधूरे’ विभिन्न दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं।



सन् 1971 से ‘अनामिका’ की गतिविधियों ने जोर पकड़ा। मई 1970 से प्रारंभ की गई रविवारीय प्रदर्शन की योजना ने ‘अनामिका’ के कार्यकर्ताओं को सत क्रियाशील रहने को बाध्य किया। 1971 के प्रारंभ में ‘पगला-घोड़ा’ (श्यामानन्द जालान) का मंचन हुआ। भावनाओं के आलोड़न को बड़ी तीव्रता से प्रस्तुत करने वाला बादल सरकार का यह नाटक लोकप्रिय हुआ। उसी समय ‘बहु-रूपी’ ने भी इसे बँग्ला में प्रस्तुत किया। दोनों प्रदर्शन महीनों तक साथ-साथ चले और चर्चा का विषय रहे। मई 1971 में रविवारीय कार्यक्रम को एक वर्ष पूरा हुआ।

सन् 1970 और 1971 के दो बाल नाटकों का उल्लेख इसी प्रसंग में आवश्यक है।


प्रथम वर्ष श्यामा जैन द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘कृतघ्न मनुष्य’ तथा 1971 में आत्मानन्द द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘मासूम’ बाल नाटक बड़े लोकप्रिय हुए। सच पूछिए तो कलकत्ता में तभी से बाल नाटक प्रस्तुत करने की परंपरा सी चल पड़ी। 1973 में ‘अनामिका’ ने ही श्यामाजी के एक और नाटक ‘सुधीर और शैल’ का मंचन किया।



सन् 1972 में पुनः तीन नए नाटक प्रस्तुत किए गए- ‘कहत कबीरा’ (लेखन एवं निर्देशन: शिवकुमार जोशी), ‘हय बदन’ (गिरीश कार्नाड निर्देशन: राजेन्द्रनाथ) तथा ‘चटनी टमाटर की’ (गणेश बागचीय निर्देशन: शिवकुमार झुनझुनवाला)। ‘कहत कबीरा’ में मंच पर छोटा सा चकी मंच (12 फिट) भी लगाकर दृश्य परिवर्तन करने का नया प्रयोग किया गया। ‘हय बदन’ के निर्देशन के लिए दिल्ली से श्री राजेन्द्रनाथ को आमंत्रित किया गया।

इसी वर्ष श्री बसंत पोद्दार के एकालाप ‘सेर सिवराज ह’ के छह प्रदर्शन भी ‘अनामिका’ के तत्वावधान में किए गए।



सन् 1973 में पुनः तीन नाटकों- ‘लँगड़ी टाँग’ (हरि शंकर परसाई), ‘अबूहसन’ (बादल सरकार), ‘इस अँधेरे से’ (अमृत राय) तथा दो एकांकियों- ‘सेतुबंध’ एवं ‘नायक खलनायक विदूषक’ (सुरेन्द्र वर्मा) के साथ ही बसंत पोद्दार का एकालाप ‘अग्नि-पुत्र’ प्रस्तुत किए गए। प्रथम दोनों नाटकों का निर्देशन विमल लाठ ने, तीसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने, तथा एकांकियों का प्रतिभा अग्रवाल ने किया।


सन् 1974 में ‘सारी-रात’ (बादल सरकार), ‘प्रयोग’ (कमलाकान्त वर्मा), ‘बड़ी बुआजी’ (बादल सरकार) तथा ‘चन्द्रगुप्त’ (प्रसाद) प्रस्तुत किए गए। ‘सारी रात’ की प्रस्तुति अत्यंत प्रभावपूर्ण हुई। स्त्री-पुरुष के संबंधों की उलझनों और घुटन को बड़ी गहराई से इस नाटक में बादल सरकार ने चित्रित किया है और उसे उतनी ही निष्ठा एवं गहराई के साथ निर्देशक शिवकुमार झुनझुनवाला ने उभारा तथा स्त्री की भूमिका में अभिनय करने वाली कलाकार यामा ने जिया। इस प्रस्तुति से ‘अनामिका’ एवं निर्देशक दोनों को प्रतिष्ठा मिली।



सन् 1975 में ‘अनामिका’ ने केवल दो नाटक प्रस्तुत किए- शिवकुमार जोशी रचित ‘लक्ष्मण रेखा’ और बादल सरकार रचित ‘बाकी इतिहास’। प्रथम का निर्देशन स्वयं नाट्यकार ने किया और दूसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने। इसी वर्ष अगस्त में ‘लक्ष्मण रेखा’ का दूरदर्शन से प्रसारण भी हुआ।


अप्रैल सन् 1976 में रवि दवे के निर्देशन में प्रेमचन्द की अमर कृति ‘गोदान’ का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत किया गया। ‘अनामिका’ की इस प्रस्तुति ने साहित्य एवं नाट्य मर्मज्ञ, सामान्य दर्शक, छात्र वर्ग, ग्रामीण वातावरण में पले लोगों- तात्पर्य यह कि समाज के हर वर्ग के मन को को स्पर्श किया।
सन् 1976 में ही मणि मधुकर रचित ‘दुलारी बाई’ का मंचन हुआ, निर्देशक वे स्वयं थे।
अक्टूबर 1976 से ‘अनामिका’ ने एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया- ‘नाटक’। तीन अंकों के बाद इसका नाम बदलना पड़ा- ‘नाट्य वार्ता’।



सन् 1977 में ‘अनामिका’ केवल दो नए नाटक कर पाई- ‘देना-पावना और मिस आलूवालिया’। मिस आलूवालिया का निर्देषन किया स्व0 षेखर चटर्जी व गोपाल कलवानी ने। इस नाटक के 150 के करीब प्रदर्षन हुए। इसमें श्री कलवानी के अभिनय को बहुत ही सराहा गया। शरतचन्द्र की शतवार्षिकी के अवसर पर ‘देना पावना’ विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया एवं निर्देशन भी उन्होंने ही किया।



सन् 1978 प्रस्तुतियों की दृष्टि से अधिक सक्रिय वर्ष था। इस साल ‘वंशवृक्ष’, ‘एक था गधा’, ‘शरशय्या’ तथा ‘सूरदास’- चार नाटक प्रस्तुत हुए। कन्नड़ के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘वंशवृक्ष’ का रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया।

इस साल की अंतिम प्रस्तुति ‘सूरदास’ थी। ‘सूरदास पंचशती समारोह समिति’ के आमंत्रण पर इसे विशेष रूप से तैयार किया गया पहला प्रदर्शन समिति द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सूर संगोष्ठी के अवसर पर 11 दिसंबर को किया गया। सूर-प्रेमियों ने इसे खूब सराहा, किन्तु नाट्य-प्रेमियों की दृष्टि में सूर के जीवन, दृष्टि और पदों को प्रस्तुत करने वाली यह कृति शिथिल रही।



सन् 1979 में दो नाटक हुए- ‘कथा एक कंस की’ तथा ‘हिमालय की छाया’। दया प्रकाश सिन्हा रचित ‘कथा एक कंस की’ एक सशक्त कृति है। ‘हिमालय की छाया’ वसंत काने टकर की बहुचर्चित कृति है। इसका निर्देशन शिवकुमार जोषी ने किया। इसमें साठ-सत्तर वर्ष के बूढ़े की प्रमुख भूमिका में प्रदीप अरोड़ा ने बहुत सशक्त अभिनय किया। साथ ही सुस्मिता सिंघी (अब गुप्ता) ने माँ की भूमिका में अत्यन्त प्राणवान अभिनय किया। उसके लिए यह पहली महत्वपूर्ण भूमिका थी।


22 दिसंबर सन् 1979 को ‘अनामिका’ ने पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश किया। सन् 1980 को रजत जयन्ती वर्ष घोषित किया गया और अवसर के उपयुक्त वर्ष व्यापी कार्यक्रम आयोजित किया गया।


जनवरी 1980 में पाँच दिनों का ‘अनामिका’- नाट्योत्सव आयोजित हुआ, जिसमें तीन पुराने नाटकों की पुनरावृत्ति हुई तथा दो नए नाटक प्रस्तुत किए गए। सन् 1957 में प्रस्तुत ‘नए हाथ’ के तीन कलाकार भँवरमल सिंघी, नरेन्द्र अग्रवाल तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुरानी भूमिकाओं में अभिनय किया, शेष कलाकार नए रहे। इसी प्रकार सर्वप्रथम सन् 1969 में प्रस्तुत ‘बल्लभपुर की रूपकथा’ की पुनरावृत्ति हुई, जिसमें उत्तम राम नागर, आत्मानंद तथा नरेन्द्र अग्रवाल अपनी पुरानी भूमिकाओं में उतरे, रामगोपाल बागला नई में। सन् 1970 में प्रस्तुत ‘आधे-अधूरे’ के मूल कलाकारों में कृष्णकुमार तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुनः नई प्रस्तुति में अभिनय किया, शेष नए कलाकार लिए गए। सन् 1974 में अनामिका द्वारा आयोजित नाट्योत्सव में जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त की प्रस्तुति एक चुनौती थी। पूरे परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को सीमित सफलता मिली। केवल महोत्सव में एक प्रदर्शन होकर रह गया। इस प्रस्तुति के बाद निर्देशन में अंतराल रहा, सन् 1978 में शरद जोशी का 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ' को प्रस्तुत किया। ‘गोदान’ (1976), ‘आधे-अधूरे’ (1980), ‘नये हाथ’ (1980, पुनः मंचन), ‘रेशमी रूमाल’ (1988), ‘इस पार उस पार’ तथा ‘साँझ ढले’ (1985) आदि।



नई प्रस्तुतियों में ‘हानूश’ उल्लेखनीय है। भीष्म साहनी का यह नाटक दर्शकों द्वारा प्रशंसित हुआ, निर्देशक थे रवि दवे।‘अनामिका’ ने अपनी रजत जयंती मनाकर एक पड़ाव पार किया। उसके सामने उज्ज्वल किन्तु संघर्षमय भविष्य है।श्यामानन्द जालान ‘अनामिका’ के महत्वपूर्ण निर्देशक थे, सब उनकी कुशलता के कायल थे, कोई समस्या नहीं थी। सन् 1971 में अनामिका से श्री श्यामानन्द जालान का अलग होना, इस घटना को कोलकाता का कोई नट्य प्रेमी भुला नहीं पायेगा। श्यामानन्द जालान ने अनामिका में रहते हुए, अनामिका की ही एक अन्य कलाकार ' चेतना' से पहली पत्नी 'किरण' के रहते-रह्ते ही दूसरा विवाह कर लिया, जो 'अनामिका' जैसी संस्था के नाम पे बदनुमा धब्बा था । श्यामानन्दजी के ‘अनामिका’ से अलग होने पर निर्देंशक का भार दूसरों के कंधों पर देने को बाध्य होना पड़ा। हालांकि इस विघटन के बाद अनामिका का प्रदर्शन कम और प्रभावहीन होता चला गया श्री भंवरमल सिंघी व शुशीला सिंघी के देहावसान पश्चात तो यह संस्था प्रायः मृत सी हो गई है।

अनामिका से श्यामानन्द जालान अलग होने के बाद 1972 में ‘पदातिक’ नाम से नई संस्था का जन्म दिया। जिसके तत्वाधान में शुरूआती वर्ष में ‘गिधाड़े’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘हजार चैरासी की माँ तथा शकुंतला’ नाटकों का संचय किया गया। ‘पदातिक’ बन जाने के बाद कलकत्ते के हिन्दी रंगमंच में नए दौर की शुरुआत हुई। आज कोलकात्ता जैसे शहर में ‘पदातिक’ एक शिक्षण संस्थान के रूप में काफी चर्चित हो गई है। जिसका एक मात्र श्रेय श्री श्यामानन्द जी जालान को ही जाता है।



पदातिक 1949- नया समाज, 1950- विवाह का दिन, 1951- समस्या, 1952- अलग अलग रास्ता, 1953- एक थी राजकुमारी, 1954- कोणार्क, 1955- चंद्रगुप्त, 1956- हम हिन्दुस्तानी है, 1956- संगमरमर पर एक रात, 1956- सत्य किरण, 1957- नदी प्यासी थी, 1957- पाटलीपुत्र के खंडहर में, 1957- नये हाथ, 1958- अंजो दीदी, 1958- नवज्योती के नयी हिरोइन, 1958- नीली झील, 1959- जनता का शत्रु, 1959- कामायनी (डांस ड्रामा), 1960- आशाढ़ का एक दिन, 1961- घर और बाहर, 1963- शेष रक्षा, 1963- छपते छपते, 1964- मादा कैक्टस, 1966- लहरों के राजहंस, 1967- शुतुरमुर्ग, 1968- मन माने की बात, 1968- एवम् इंद्रजीत, 1970- आधे अधूरे, 1971- पगला घोड़ा, 1972- पंछी ऐसे आते हैं, 1972- तुगलक (बांग्ला),1973- सखाराम बाइंडर, 1977- गुड वुमन आफ सेटजुआन, 1978- हजार चैरासी की माँ, 1980- कौवा चला हंस की चाल, 1980- शकुंतलम्, 1981- पंक्षी ऐसे आते हैं, 1982- उद्वास्त धर्मशाला, 1982- बीबियों का मदरसा, 1983- आधे अधूरे, 1985- मुखिया मनोहरलाल, 1987- कन्यादान, 1987- क्षुदितो पाशाण, 1988- राजा लियर, 1989- बीबियों का मदरसा, 1991- सखाराम बाइंडर, 1992- आधार यात्रा, 1995- रामकथा रामकहानी, 1998- कौवा चला हंस की चाल, 2000- खामोश अदालत जारी है, 2006- माधवी, 2008- लहरों के राजहंस।

नोट: निर्देषक और अभिनेता के रूप में इन नाटकों में श्री श्यामानन्द जालान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।



अकृतः श्री गोपाल कलवानी द्वारा निर्मित नाट्य-संस्था है जिसका मूल उद्देश्य है कोलकाता में हिन्दी नाट्य-मंच पर व्याप्त षून्य में से गुजरते हुए उसे इकाइयों, दहाइयों एवं ईश्वर चाहे तो अनगिनत संख्याओं में परिवर्तित करना ।



हिंदी नाट्य-मंच जिसका स्वर्णिम अतीत आसमान की ऊँचाइयाँ पाने के बाद बादलों के पीछे ओझल होता प्रतीत हो रहा था, बादलों के साये में से उसके अलौकिक आलोक का उद्दीपन आपको नजर आये, उसे उसका वर्तमान मिल जाए । ‘अकृत’ नाटक के साथ-साथ कला एवं संस्कृति के हर क्षेत्र में कार्य करने को प्रस्तुत है। गीत-संगीत नृत्य, चित्रकला व साहित्य सभी लौह कड़ियों से एक ऐसी मजबूत श्रृंखला बने जिसे चाहकर भी कोई तोड़ न पाये-अकृत के कार्य कलापों में यही भावना परिलक्षित होगी । इसके प्रमाण स्वरूप ‘अकृत’ की पहली प्रस्तुति ‘मायाजाल’ है। विजयदान की राजस्थानी कहानी ‘अमित लालसा’ पर आधारित यह संगीतमय नाटक दर्शकों को खूब पंसद आया। निर्देशक गोपाल कलवानी ने स्वरचित गीतों और लोक नृत्यों के माध्यम से इसे लोक नाटक का रूप दे दिया है ।



उमा झुनझुवाला द्वारा संचालित संस्था ने कथा-कोलाज-1 और कथा कोलाज-2 (2007 में) ‘?’ प्रश्नचिन्ह (हिन्दी, 2007 में), मंटों की कहानी पर आधारित नाट्य मंटों ने कहा (उर्दू 2006) यादों के बूझे हुए सवेरे (उर्दू 2005) हयवदन (नेपाली 2004 में), शुतुरमुर्ग (हिन्दी 2004 में), काँच के खिलौने (हिन्दी 2002 में) लाहौर (हिन्दी 1999) सुलगते चिनार (उर्दू 1996) महाकाल (हिन्दी 1995) और जब आधार नहीं रहते हैं (हिन्दी 1997) और भी कई नाटकों मे आपकी संस्था ने महत्व पूर्ण पार्ट अदा किया है जिसमें बड़े भाई साहब (हिन्दी उर्दू 2006) रक्सी को श्रृष्टीकर्ता (नेपाली 2003) नमक की गुड़ीया (उर्दू 2001) तमसीली मुशायेरा (उर्दू 1998) सतगति (हिन्दी उर्दू 1994) और आग अब भी जल रही है (हिन्दी 1994) प्रमुख हैं। आपकी संस्था द्वारा कई स्ट्रीट नाटकों का भी मंचन किया गया-जिनमें ब्लैक संडे, किस्सा कुर्सी का, अटलबाबू-पटलबाबू, हाहाकार, खेल-खेल में आदि प्रमुख हैं।


प्रस्तुति: शंभू चौधरी