रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

तो अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अनुदान महाविद्यालय भी होगा. - राजेश चन्द्र


मित्रो,
एकाधिक विश्वस्त सूत्रों के अनुसार संस्कृति विभाग, भारत सरकार ने रंगमंच के क्षेत्र में दिए जाने वाले सभी प्रकार के अनुदानों (प्रोडक्शन ग्रांट, इंडीविजुअल ग्रांट, सैलरी ग्रांट और बिल्डिंग ग्रांट आदि) का मामला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को सौंपने का निर्णय किया है और हस्तांतरण की यह प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। इससे पहले भी उसने इसी तरह के एक आत्मघाती निर्णय के अंतर्गत भारत रंग महोत्सव के आयोजन का काम विद्यालय को सौंप दिया था जिसका दूरगामी प्रभाव अत्यंत विनाशकारी साबित हो चुका है और यह वार्षिक आयोजन आज भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची, ताक़त के बेजा इस्तेमाल और पक्षपात का पर्याय बन चुका है। 
गौर करने वाली बात है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मूल रूप से एक प्रशिक्षण संस्थान है पर यह अपने बुनियादी उद्देश्य में भी अधिकांशतः असफल ही रहा है। यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले अधिकांश रंगकर्मी आजीविका की तलाश में मुंबई का रुख करते हैं और उनमें से अपवादस्वरूप ही कोई रंगमंच की तरफ वापस लौटता है। विद्यालय के पास योग्य शिक्षकों का भयावह अभाव तो है ही, उसके पास रंगमंच के उन्नयन की कोई व्यापक दृष्टि है इसका भी अब तक उसने परिचय नहीं दिया है। 
देश की संस्कृति, संस्कृतिकर्म और कलाकर्म के संरक्षण और प्रोत्साहन का काम सरकार का है और इसके निर्वहन के लिए उसने कई अकादमियां और क्षेत्रीय केंद्र बना रखे हैं। यह बात अलग है कि इन संस्थानों ने अब तक कोई बुनियादी काम करने के बजाय अधिकांशतः मेले और तमाशे आयोजित करने की तरफ ही अपना ध्यान लगाया है। इस देश की लोक विरासतों के संरक्षण और लोक कलाकारों के प्रोत्साहन की दिशा में इन संस्थानों ने अब तक कोई उल्लेखनीय पहल की हो, ऐसा कोई उदाहरण मिलना मुश्किल है। सरकार इन संस्थानों का बजटरी ऑडिट तो कराती है पर आज तक उसने इनके काम काज की फंक्शनल या सोशल ऑडिट कराने के बारे में क्यों नहीं सोचा यह एक रहस्य ही है। 
संस्कृति और कलाओं के संरक्षण का काम अफसरशाही के बजाय संस्कृति के स्वायत्त संस्थानों और कलाकारों की प्रतिनिधि समितियों के माध्यम से हो इस बात से किसे ऐतराज हो सकता है, पर यह काम संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थाओं के जिम्मे होना चाहिए न कि किसी नाट्य विद्यालय के। विद्यालय का काम शिक्षण-प्रशिक्षण तक सीमित रहना चाहिए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का देश के कला और संस्कृति जगत से, उसके प्रमुख सवालों से दूर दूर तक कोई संपर्क नहीं रहा है। उसके पास इस बात की शायद ही कोई जानकारी हो कि देश के सुदूरवर्ती गाँवों क़स्बों में किस प्रकार का रंगमंच हो रहा है और किन स्थितियों में हो रहा है। उसे तो दिल्ली में होने वाले रंगमंच की भी शायद ही कोई जानकारी होगी !
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अगर अपने रंग-प्रशिक्षण के मॉड्यूल को दुरुस्त करने, उसमें भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विषयों और ज्वलंत मुद्दों को शामिल करने, प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले रंगकर्मियों को रंगमंच के क्षेत्र में ही आजीविका भी मिल सके- ऐसे उपाय करने, देश के सक्रिय नाट्य दलों और रंगकर्मियों को एक मंच पर लाने तथा उनके बीच एक पुल का निर्माण करने तथा रंगमंच के क्षेत्र में शोध और दस्तावेजीकरण को प्रोत्साहित करने की तरफ अपना ध्यान लगाता तो न केवल उसकी एक सार्थक भूमिका बनती बल्कि देश में बेहतर रंगमंच का एक आधार भी तैयार होता परन्तु उसकी ऐसी कोई मंशा आज तक सामने नहीं आई है। अगर भारत रंग महोत्सव के आयोजन की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के हाथ से निकल जाए तो उसका क्या होगा इस स्थिति की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। 
हालत यह है कि यह नाट्य विद्यालय सालों भर भारत रंग महोत्सव की तैयारियों में ही लगा रहता है। अभी तक इस आयोजन की कोई पारदर्शी नीति अथवा कार्यप्रणाली विकसित कर पाने में भी वह नाकाम ही रहा है और इस आयोजन को लेकर आज तक गम्भीर सवाल उठाये जाते रहे हैं। अनुदान बांटने और उसकी प्रक्रियाओं को संचालित करने के लिए क्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास कोई आधारभूत ढांचा, कार्य-योजना, आवश्यक कार्मिक और कोई ऐसी नीति मौजूद है जिसके आधार पर वह यह दावा कर सके कि इन प्रक्रियाओं के संचालन के लिए वह एक सक्षम संस्था है?
अगर सरकार और उसके संस्कृति विभाग ने यह स्वीकार कर लिया है कि उनके द्वारा दिए जाने वाले अनुदानों की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता और भ्रष्टाचार व्याप्त है, या वे देश के कलाकर्म और रंगकर्म की वास्तविकताओं का पता कर पाने में सक्षम नहीं हैं तो उन्हें आत्म-मंथन और व्यापक सुधार की पहल करनी चाहिए न कि यह ज़िम्मेदारी भी एक नाट्य विद्यालय के कन्धों पर डाल देनी चाहिए ताकि बाद में अपना गिरेबान साफ़ और कला-जगत का गिरेबान कलंकित दिखा सकें। 
एक रंगकर्मी के नाते मैं ऐसी कोशिशों की भर्त्स्ना करता हूँ। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को यह अतिरिक्त ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहिए क्योंकि वह इसके लिए सक्षम संस्था नहीं है। उसकी दृष्टि का दायरा अत्यंत सीमित है। अगर अंधे के हाथ में रेवड़ी होगी तो वह फिर फिर अपने को ही देगा ! देश के रंगकर्मियों को पता लगाना चाहिए कि क्या वास्तव में ऐसी कोशिशें चल रही हैं? अगर यह तथ्य सही है तो इसका पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिए। 
राजेश चन्द्र के फेसबुक वाल से साभार.

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बुक शॉप की ठसक. - राजेश चन्द्र

दिल्ली में अच्छी पुस्तक एवं पत्र-पत्रिकाओं के लिए विक्रय-केन्द्र न के बराबर हैं। कुछ साल पहले तक मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन का एक पुस्तक केंद्र हुआ करता था, जहाँ हिंदी के श्रेष्ठ प्रकाशनों की पुस्तकों के अलावा पत्र-पत्रिकाएं और नाटकों की स्क्रिप्ट भी मिल जाती थी। यह एक रहस्य ही रह गया कि पाठकों की भरपूर आवाजाही के बावजूद यह केंद्र बंद क्यों हुआ। इसे पुस्तक संस्कृति के विरुद्ध एक साज़िश के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? आज पुस्तक प्रेमी वांछित पुस्तकों की खोज में हलकान होते अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का पुस्तक विक्रय केंद्र इस अभाव को पाटने का एक बेहतर माध्यम हो सकता था परन्तु प्रशासनिक उदासीनता, सरकारी ठसक, घनघोर अव्यवस्था और अपमानजनक माहौल की वजह से यह केंद्र भी लगभग मृतप्राय है। यहाँ एक तो वांछित पुस्तकें नहीं होतीं, और अगर संयोग से मिल भी जाती हैं तो उन्हें अधिकतम मूल्य पर खरीदना पड़ता है। एक और बात ध्यान देने लायक है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स्वयं अधिकतम छूट लेकर पुस्तकों की खरीद करता है और फिर उन्हीं पुस्तकों को अधिकतम मूल्य पर बेचता है।
बड़े प्रकाशकों से कम मूल्य पर किताबें लेने को तो एक दृष्टि से उचित ठहराया जा सकता है पर सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के कारण घाटा सह कर निकाली जाने वाली लघु पत्रिकाओं से अगर इस एवज में 25 से 50 प्रतिशत तक छूट मांगी जाती है कि उन्हें विक्रय पटल उपलब्ध कराया जा रहा है तो यह बात गैर-वाजिब लगती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसा संस्थान केवल मुनाफा कमाने के उद्देश्य से विक्रय केंद्र चला रहा हो यह बात मुनासिब नहीं लगती। तब फिर इस अव्यवस्था का कारण क्या हो सकता है? विक्रय केंद्र के साथ आदान-प्रदान का मेरा अनुभव तो महज एक साल का है पर लघुपत्रिकाओं के प्रकाशन से जुड़े जो लोग वहाँ कई साल से आ-जा रहे हैं उनमे से कई तो नाम लेते ही मानो फट पड़ते हैं। पत्रिकाओं के विक्रय से प्राप्त राशि का भुगतान ले लेना सबके बस की बात नहीं होती। बिल लेकर जाने में डर लगता है मानो कोई अपराध करने जा रहे हों। एक मित्र जो अरसे से लघुपत्रिका आंदोलन का "अलाव" जलाये रख रहे हैं, उन्हें पिछले आठ सालों से पत्रिका के विक्रय की राशि नही प्राप्त हुई। एक से तीन साल वाले मित्र तो कई होंगे। आज इस पुस्तक विक्रय केंद्र में अगर गिनती की महज 4 -5 पत्रिकाएं ही दिखाई देती हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि बाक़ी सैकड़ों पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया है। इसके पीछे जो कारण हैं वे बर्ताव और माहौल से ज्यादा जुड़े हुए हैं। ऐसा ही रहा तो यह केंद्र भी जल्दी ही एक अतीत बन जायेगा।
समकालीन रंगमंच के प्रवेशांक (जनवरी 2013) का बिल मैंने उसी साल फरवरी माह में विक्रय केंद्र में जमा किया था। तब से लेकर सितम्बर माह तक हर बार पूछने पर यही बताया जाता रहा कि आपका बिल सम्बंधित विभाग को भेज दिया गया है। विक्रय प्रभारी कहते रहे कि अभी रानावि के पास इतने पैसे नहीं कि वह आपके 1100 रुपये चुका सके। थक हार कर जब अक्टूबर में मैंने अकाउंट सेक्शन में जाकर पता किया तो उन्होंने बताया कि इस नाम का कोई बिल हमारे पास नहीं आया। मैंने दुबारा विक्रय केंद्र से संपर्क किया और कहा कि आप मुझे मेरे बिल से सम्बंधित पूरा ब्यौरा दीजिये। थोड़ी देर इधर उधर झाँकने के बाद उन्होंने छान-बीन करने का अभिनय किया और तभी बिल उनकी किसी फ़ाइल में नमूदार हुआ। मैंने उनसे सादर बिल वापस मांग लिया। इस घटना के बाद से पत्रिका अक्सर विक्रय पटल से गायब रहने लगी और पूछे जाने पर कोई संतोषप्रद जवाब कभी नहीं मिला। 
2014 के भारंगम के दिनों में मैंने पत्रिका के लिए रानावि के विज्ञापन की मांग करते हुए एक आवेदन विक्रय केंद्र में दिया। ऐसा करने के लिए स्वयं निदेशक महोदय ने कहा था। लगभग एक सप्ताह तक केंद्र का चक्कर काटने के बाद भी जब वह आवेदन आगे नहीं बढ़ाया गया तो मुझे निदेशक महोदय को यह बात बतानी पड़ी। उन्होंने कहा कि आप विक्रय केंद्र से अपना आवेदन वापस ले लीजिये। मैंने ऐसा करना चाहा तो पहले तो साफ़ मना कर दिया गया कि यहाँ ऐसा नहीं होता। फिर जब वही से निदेशक से बात की गयी तो उन्होंने भुनभुनाते हुए बिल वापस किया। यह बात अलग है कि निदेशक महोदय द्वारा उसी क्षण स्वीकृति देने के बाद आवेदन पुनः विक्रय केंद्र के हाथ आ गया और ऊंट को फिर से पहाड़ के नीचे आना पड़ा। वहाँ से विज्ञापन आदेश प्राप्त करने में लगभग 10 दिनों तक नाकों चने चबाने पड़े। विज्ञापन आदेश में नीचे एक नोट लिखा था कि हम जिन्हे विज्ञापन देते हैं उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपनी पत्रिका हमें कम से कम 50 प्रतिशत की छूट के साथ विक्रय हेतु उपलब्ध कराएँगे। 7,500 रुपये का विज्ञापन, पत्रिका के विक्रय से प्राप्त होने वाली राशि 1500 रुपये और उसमें भी 50 प्रतिशत की कटौती! विज्ञापन पाने की कोई खुशी नहीं हुई। 
पिछले 26 मार्च को एक बार फिर हिम्मत करते हुए मैंने विज्ञापन और पत्रिका के दो अंकों (प्रवेशांक की 50 और अंक -2 की 150 प्रतियां) का बिल विक्रय केंद्र को दिया। उन्होंने लगभग डांटते हुए कहा कि आपलोग हद करते हैं। यह कोई वक़्त है बिल देने का? जानते नहीं मार्च क्लोजिंग चल रही है? मैंने विनम्रता के साथ कहा कि ले लीजिये न लगे हाथ पेमेंट हो जायेगा। तब उन्होंने चेहरा लाल-पीला करते हुए बिल जमा कर लिया। 1 अप्रैल को उनका फ़ोन आया कि आपने यह कैसा बिल दिया है भाई साहब? इतनी प्रतियां कब और किसको दी थीं आपने? आपके पास कोई रिसीविंग हो तो ले आइये वर्ना यह भुगतान नहीं हो पायेगा। जब मैंने कहा कि आप तो जानते हैं कि आपने कोई रिसीविंग कभी दी ही नही है तो कहाँ से दूँ? जवाब में वहाँ से फ़ोन काट दिया गया। अब मैंने अपने जमा किये गए और आगामी बिलों को भी भगवान के भरोसे छोड़ दिया है। जो भी होगा देखा जायेगा।

राजेश चन्द्र – रंगकर्मी, नाटककार, कवि, नाट्य समीक्षक और समकालीन रंगमंच पत्रिका के सम्पादक हैं. इनसे rajchandr@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.  

बुधवार, 1 मई 2013

सांस्कृतिक नीति : रंगकर्म: राजनीति: गुटबाज़ी -बापी बोस



बापी बोस 
यह अवधारणा सही है या गलत है, जिसके तहत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बना है, यह अलग बात है। उसके कई स्वरूप हैं, जिसमें रंगमंच के शैक्षिक कार्यक्रम, अलग-अलग तरह की नाट्य प्रस्तुति,नाटक के उत्सव करने, दूर दराज के इलाकों में कार्यशालाएं आयोजित करने, रंगमंडल, बाल रंगमंडल, थिएटर-इन-एजुकेशन, पत्रिका प्रकाशन, हिंदी और अंग्रेजी में पुस्तकों के प्रकाशन जैसी (सच पूछिये तो भारत के सांस्कृतिक जीवन में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का आगमन एक मील का पत्थर, एक सांस्कृतिक घटना है। आज यह इस महादेश का सबसे बड़ा नाट्य शिक्षण प्रतिष्ठान दुनिया में अपनी विविधता के लिये जाना जाता है) उसकी योजनाएं अच्छी हैं। 
अब इससे क्या हासिल हुआ या हो रहा है इस पर सवाल उठते हैं और उठते रहेंगे भी। पर इस बीच कुछ अच्छी चीज तो हुई है सारा का सारा बेकार गया ऐसा नहीं कह सकते। इसका यह मतलब भी नहीं कि आप यह कहते फिरें कि हिन्दुस्तान के नाटक का कर्णधार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ही है। मैं स्वयं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के निर्देशकों में रहा हूं पर मैं यह मानता हूं कि आज भी हिन्दुस्तान के रंगमंच की जो प्राण-धारा है वह दूरदराज के एमेच्योर नाट्य दलों द्वारा किया जाने वाला रंगमंच है जो देश भर में फैला है। यह बात अलग है कि वे इसे जीविका के तौर पर नहीं कर पाते, पर शायद यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है। इधर-उधर से आजीविका का जुगाड़ करके शाम के तीन-चार घंटे रंगमंच करने वाले ये जो रंगकर्मी हैं वे अपना काम बड़ी ईमानदारी के साथ करते हैं। वो बिकाऊ नहीं हैं, वे जेब से नहीं हृदय से नाटक करते हैं। अगर उनका अभिनय बहुत समर्थ नहीं है, तो इस दिशा में प्रयास किए जाने की जरूरत है। सिर्फ कला के व्याकरण के आधार पर आप उनके योगदान को कम करके नहीं आंक सकते। अगर सोद्देश्यता की बात करें, सामाजिक प्रभाव और सरोकार की बात करें तो हम उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। इस मामले में तो वे वास्तव में काबिले-तारीफ हैं। वही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अथवा अलग-अलग प्रदेशों में जो विश्वविद्यालयों के नाट्य विभाग हैं वे क्या कर रहे हैं? अब थिएटर में रोजी नहीं है ओर रंगकर्मी मुंबई चले जाते हैं तो आप उन्हें कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते। आपने कौन-सी ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि वे थिएटर में रुक सकें? थिएटर करके गुजारा करना बहुत मुश्किल बात है पर वह एक अलग मसला है। 
मैं यह कहना चाहता था कि जो पुनर्जागरण आजादी के बाद हमारे देश के सांस्कृतिक क्षेत्र में, कला विधाओं में आया था, उसका विकास नहीं हुआ। उसमें निरंतरता नहीं लाई जा सकी। कला और संस्कृति के संवर्द्धन के लिए एक राष्ट्रीय अकादमी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए संगीत नाटक अकादमी बनी। यह अच्छी बात है। जब साठ के दशक में पहली बार राष्ट्रीय सेमिनार हुआ था जिसे राउंड टेबल कान्फ्रैंस के नाम से जाना जाता है- जहां बड़े-बड़े लोग इकट्ठा हुए और नारा दिया कि ‘गो बैक टू द रूट्स!‘‘ कुछ अच्छे काम उस दौरान हुए भी पर सरकारी अफसरशाही के कारण सब कुछ ठप्प हो गया। 
यह बात सच है कि परंपरागत अथवा लोकनाट्य के तरह-तरह के तत्वों की आधुनिक रंगमंच में प्रचंड संभावना है, और इस बात का प्रमाण हमारे विभ्न्नि नाट्य विभूतियों जैसे- हबीब तनवीर, शीला भटिया, ब.व. कारंत, बाद में डाॅ. विजया मेहता, डाॅ. जब्बार पटेल, बंसी कौल, रतन थियम आदि की प्रस्तुतियों का आकलन करने से साफ दिखाई पड़ता है। दर्शकों ने अगर इन प्रस्तुतियों को गले लगाया तो उनकी बाहरी चमक-दमक से या ‘सरफेस क्वालिटी- सुपरफीसियल एप्रोच‘ में मतवाला होकर नहीं बल्कि जिन प्रस्तुतियों में लोक और परंपरा के तत्व उनकी ‘इनहेरेंट क्वालिटी‘ बन कर आयीं उन्हीं प्रस्तुतियों का दर्शक वर्ग ने स्वागत किया। इनमें से कुछ ता अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी अपनी छाप छोड़ गये। यह बात अलग है कि इनमें से ज्यादातर प्रस्तुतियों को आज ‘म्यूजियम पीस‘ के हिसाब से ही देखना अच्छा लगता है। वे आज के जीवन और यथार्थ की जटिलताओं को स्पष्ट नहीं करतीं।
जब सुरेश अवस्थी आए तो एक नया स्लोगन आया- ‘इन सर्च आॅफ इंडियननेस इन इंडियन थिएटर!‘ यानी भारतीय रंगमंच में भारतीयता की तलाश। अच्छे.अच्छे प्रयोग भी हुए, किंतु उसका आगे चल कर जो हश्र हुआ वह सब लोग जानते हैं। जैसे बाढ़ की तरह उस समय समूचे देश में फैल गयी थीं इस किस्म की अद्भुत नाट्य प्रस्तुतियां। जैसे तैसे कैसे भी परंपरागत अथवा लोक नाट्य तत्व किसी प्रस्तुति में जबरदस्ती घुसेड़ कर एक ‘एगमार्क‘ सटीक भारतीय नाट्य प्रस्तुति की जाये। खैर इसका मकसद कितना सही या गलत था इस बात का इतिहास गवाह है। किंतु साथ में यह भी एक प्रामाणिक सत्य है कि इस आंदोलन को दिशा देने के लिये वह केवल सरकारी नाट्य कर्म में सीमित नहीं रहा (विशेष रूप से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक के पद पर रहते हुए श्री ब.व. कारंत के समय में विद्यालय के नाट्य पाठ्य-क्रम में) बल्कि बाढ़ की तरह सरकार के विभिन्न प्रतिष्ठानों से लगातार ढेर सारा अर्थ बहाया गया था। लगातार। साथ में तरह-तरह की सुविधाओं के प्रलोभन, सरकारी आर्थिक अनुदान, विदेशी ग्रांट, तरह-तरह के सम्मान, पुरस्कार, आई सीसीआर की कृपादृष्टि, विदेश यात्राएं आदि आदि। शर्त केवल एक कि आपकी नाट्य प्रस्तुति एक सटीक ‘एगमार्क‘ भारतीय नाट्य प्रस्तुति हो। यह जो रंगमंच का खेल शुरू हुआ, बाद में इस कदर हास्यास्पद बन गया कि जिसकी कोई परंपरा नहीं थी, किसी भी लोक नाट्य शैली के साथ जिसका दूर दूर तक कहीं कोई आत्मिक लगाव, जुड़ाव या संबंध नहीं था, जिसका मिट्टी के साथ कभी कोई परिचय नहीं रहा था, वह भी बैठ गया इस ‘शइनिंग इंडिया‘ की सिल्क साड़ी बुनने। 
उसमें कुछ अच्छी बातें भी हुईं पर उस काम की शुरुआत संगीत नाटक अकादमी के प्रोत्साहन से पहले ही हो चुकी थी। भारतीयता के नारे के साथ सरकारी संरक्षण में यह जो रंगमंच शुरू हुआ उसमें ज्यादातर जड़ों से कटे हुए लोग काम कर रहे थे और इसलिए उसका जो स्वरूप सामने आया वह हास्यास्पद था। उन्होंने भारतीयता को फार्मूले में ढाल लिया था- ‘‘दीप प्रज्ज्वलित कर एक चम्मच शंखनाद, दो चम्मच पताका हिलाने के साथ मंगलाचरण अथवा गणेश वंदना, तीन चम्मच चंडा अथवा नक्कारों का भीम गर्जन साथ में, श्लोक अथवा शंख चक्र गदा पद्म आदि के कुछ छींटे छिड़क दो, हिला.डुलाकर इसे गरम करो और चूल्हे से जब उतारो तो उसे सजा कर ढाई चम्मच शास्त्रीय नृत्य की मुद्राओं के साथ तश्तरी में पेश कर दो।‘‘ यह था उनका भारतीय रंगमंच। और आपको तभी फंडिंग मिलेगी, आपको तभी विदेश भेजेंगे जब आपके नाटक में इस किस्म की भारतीयता होगी। अब जाहिर है इस थिएटर को फ्लाॅप होना ही था। वे थिएटर को 16वीं शताब्दी में लेकर जाना चाहते थे। अतीत को स्मरण करना तो ठीक है, पर आप अपने दर्शक को पिछड़ा हुआ, देशकाल से कटा हुआ समझेंगे यह कैसे चलेगा? हमारे यहां भी पढ़े-लिखे लोग हैं, हमारे यहां भी ज्ञान-विज्ञान का विकास हुआ है, दुनिया के साथ-साथ हमारे भी मस्तिष्क का विकास हो रहा है, हमारे समाज में भी आधुनिक विकास हुआ है और उसकी वजह से नई समस्याएं पैदा हो रही हैं तो अगर हमारा रंगमंच आधुनिक प्रश्नों के हल नहीं ढूंढेगा तो वह कैसे हमारा रंगमंच कहलाएगा? कैसे हमारा जनमानस उसे स्वीकृति देगा? 
देश की अर्थव्यवस्था में दो दशक पहले जो भूचाल आया उसने संस्कृति को भी गहरे प्रभावित किया है। संस्कृति को जिस तरह से नियंत्रित करने की राजनीतिक प्रवृत्ति सामने आई है, वह कोई एक नयी परिघटना नहीं है। जिन लोगों ने इस देश की सत्ता पर सबसे ज्यादा समय तक कब्जा बनाये रखा है, उन्होंने ही सबसे ज्यादा संस्कृति को नियंत्रित करने का भी प्रयास किया है। उत्पल दत्त को दो-दो बार जेल में डाला गया, बहुत सारे रंगकर्मियों के साथ ऐसा हुआ। जब दूसरी पार्टी सत्ता में आई तो हबीब साहब के साथ क्या हुआ यह सबको मालूम है। रंगकर्मी या किसी भी माध्यम का कलाकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए क्या सरकार या प्रशासन से अनुमति लेगा? आप असहमत होइये, वह आपका अधिकार है, पर अपनी असहमति थोपने का आपको कैसे अधिकार मिल सकता है? यह तो जबर्दस्ती है। आप लोगों को तय करने दीजिए न कि उन्हें क्या पढ़ना है क्या देखना है। आप कौन होते हैं कलाकार को टोकने वाले? सत्ता का हर जगह यही चरित्र दिखाई पड़ता है। यह प्रवृत्ति बहुत घातक है।
मैंने एक नाटक किया था ‘दिल्ली चलो‘ नाम से सुभाष चंद्र बोस पर। यह नाटक नेताजी सुभाष की जन्मशताब्दी आजाद हिन्द फौज की 50वीं सालगिरह और आजादी की पचासवीं वर्षगांठ पर लालकिले में 1997 में प्रस्तुत किया गया था। रानावि रंगमंडल की इस प्रस्तुति को संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से राष्ट्र को समर्पित किया गया था। तेरह प्रस्तुतियों के बाद मेरे इस नाटक ‘दिल्ली चलो‘ को बंद करवा दिया गया। जिस समय यह नाटक बंद हुआ, तेरह प्रदेशों की सरकारें उस नाटक को स्पांसर करने के लिए तैयार थीं। सिंगापुर से बुलावा आया था कि यह नाटक हमारे यहां भी होना चाहिए। इंग्लैंड में तत्कालीन भारतीय राजदूत लक्ष्मीमल सिंघवी थे। वे हमारे देश के कानून के बहुत बड़े जानकार थे और संयोगवश उस समय भारत आए हुए थे। उन्होंने नाटक देखा तो हैरान हो गए। उन्होंने जोर डाल कर कहा था कि दुनिया को पता चलना चाहिए कि हमे बकरी का दूध पीकर आजादी नहीं मिली है। हमने भी खून बहाए हैं, लाशें हमारी भी गिरी हैं। हमने भी रक्तरंजित क्रांति की है और यह नाटक इस तथ्य को सामने लाता है। नाटक को बंद कर दिया गया, नाटक की हत्या कर दी गई सिर्फ इस वजह से कि एक बंगाली इस नाटक का निर्देशक था। यह सब करने वाले कौन थे . मेरे गुरू थे। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं उनका विरोध कर रहा हूं या असम्मान कर रहा हूं।
ठीक ऐसा ही इससे पहले मेरे द्वारा निर्देशित नटी विनोदिनी के साथ हुआ। ये दोनों नाटक कलात्मकता और बाॅक्स आॅफिस दोनों ही कसौटियों के हिसाब से उस दौर के सभी नाटकों से आगे थे। आप मेरी बात पर यकीन मत कीजिये। मैं रानावि रंगमंडल के टिकटों की बिक्री के रिकाॅडर््स और तत्कालीन अखबारों की समीक्षाओं के जरिये अपनी बात को साबित कर सकता हूं। इस प्रस्तुति की अलकाजी साहब ने हिंदुस्तान टाइम्स, फस्र्ट सिटी मैगजीन, तथा विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर आकाशवाणी को दिये गये अपने साक्षात्कार में काफी सराहना की थी। बस निगाह बदल गयी सबकी- और ये सारे मेरे गुरू थे। आज भी रानावि रंगमंडल के कर्मचारियों से पूछिये कि वे क्या कहते हैं इन दोनों नाटकों के बारे में। रानावि रंगमंडल में ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ मेरे साथ ही हुआ था बल्कि मेरे एक सीनियर के साथ भी यही बर्ताव किया गया था।
एक कलाकार अन्याय का प्रतिकार केसे करेगा? वह तो अपने गुस्से का इजहार अपने माध्यम में ही कर सकता है। गाली गलौज, झगड़ा करना उसका काम नहीं है। आप अच्छा नाटक करके ही इसका जवाब दे सकते हैं। अपने ही छात्र के साथ यह बर्ताव करके कौन सी मिसाल पेश की आपने? साहित्य कला परिषद रंगमंडल ने संन्यासी की तलवार और श्रीराम सेंटर रेपर्टरी ने तुरुप का पत्ता के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया था। चारों तरफ घटिया राजनीति, गुटबाजी, प्रतिभावान कलाकारों को दबाने की कोशिश! मेरा अपराध यह है कि मैं इन सबमें कभी शामिल नहीं रहा। आप यह साबित कर दीजिये मैं इन सबमें शामिल हूं, मैं रंगकर्म छोड़ दूंगा। मैं हमेशा अपनी अस्मिता के साथ जीना चाहता था। यह सब मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आपको मालूम होना चाहिए कि एक जेनुइन कलाकार के चारों तरफ किस तरह से दीवार खड़ी की जाती है हमारे यहां। किस तरह की चालबाजियों का उसे शिकार बनाया जाता है। कौआ कभी एक दूसरे का मांस नहीं खाता। किंतु हम खाते हैं। अभिमन्यु की तरह- सबने घेर कर मारा है। दुख की बात यह है आज हमारा थिएटर भी क्षेत्रवाद का शिकार है। यह कश्मीरी, यह कन्नड़भाषी हिंदी क्षेत्र में क्या कर रहा है? वह बंगाली, ओडि़या, मलयाली यहां क्या कर रहा है? अगर मेरा नाम बापी खान या बापी शर्मा होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती। 
एक फ्रीलांस निर्देशक जब कोई प्राॅडक्शन करता है और सफल होता है, उसे देखते हुए उसको एक-दो और काम मिल जाते हैं जिससे उसकी रोजी-रोटी चलती है। फिर एक निर्देशक की जिंदगी में कुछेक माइलस्टोन प्राॅडक्शन होता है जिससे उसकी एक पहचान बनती है और यह पहचान भी उसे रोजी दिलाने में मदद करती है। इन प्रातिष्ठानिक अधिकारियों से कोई यह तो पूछे कि ऐसी हरकतें करने से पहले क्या कभी उनके मन में इस कटु सत्य का कोई खयाल आया था? मेरे चार मेगा प्राॅडक्शंस को एक के बाद एक गलत राजनीति के तहत बंद करवाया गया। अंततः 2002 में मुझे भी अपना समूह (सर्कल थिएटर कंपनी) बनाना पड़ा क्योंकि मुझे नाटक करना था। अब कोई मेरा नाटक बंद नहीं करवा सकता। यह तो इस प्रदेश की जनता का कमाल है कि उन्होंने शुरू से ही मुझे गले लगाया, सर आंखों पर बिठाया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उन्हीं की बदौलत। उन्होंने मुझे इन प्रातिष्ठानिक अधिकारियों द्वारा दफनाये जाने से बचा लिया। मैं इस प्रदेश की जनता का, हिंदी थिएटर का शुक्रगुजार हूं। हां साथ में जरूर शुक्रगुजार हूं इन प्रातिष्ठानिक नाट्य विभूतियों का, जिन्होंने अगर मुझे इतना दुत्कारा या अपमानित नहीं किया होता तो शायद मैं भी आज यहां नहीं होता। 
सत्ता हर जगह कुछ लोगों को गोद लेने की कोशिश करती है पर ज्यादातर रंगकर्मी आज भी ऐसे हैं जो सरकार और उसके संस्थानों की जी हजूरी नहीं करते। संस्कृति के जो संस्थान सरकार ने बनाए हैं, वे अपने उद्देश्य में बुरी तरह असफल रहे हैं। मैंने नजदीक से उन्हें जाना है। लूट जैसे शब्द वहां बौने लगते हैं। ये तो तालाब की ही चोरी कर ले रहे हैं मछलियों की तो औकात ही क्या? तालाब रहेगा तो मछलियां आती रहेंगी। आप उनकी चोरी करते रहेंगे, पर ये तो इतने बेलगाम और बेशर्म हैं कि पूरा तालाब ही गटक जाते हैं। 
अनंत शोषण है चारों तरफ कलाकारों का। जरा बताइयेगा, यह जो हमारे जोनल कल्चरल सेंटर्स हैं इनका क्या काम है? देश की संस्कृति के विकास के लिये इनका क्या योगदान रहा है? ये जितने कल्चरल सेंटर हैं, अगर चाहते तो कलाओं का काफी विकास कर सकते थे। नाट्य प्रशिक्षण, स्थानीय समूहों के प्रोत्साहन, छोटे छोटे रंगमंडलों के निर्माण, नाटककारों की कार्यशालाएं आयोजित करने जैसे बुनियादी काम करके वे काफी फायदा पहुंचा सकते थे, पर उन्होंने सारा ध्यान तमाशे आयोजित करने की तरफ लगाया। ग्रामीण क्षेत्रों में, दूर-दराज के इलाकों में जो कलाएं मर रही हैं, दम तोड़ रही हैं, विलुप्त हो गई हैं, उन्हें बचाने केे लिए, उनसे जुड़े कलाकारों को जिन्दा रखने के लिए उन्होंने अब तक क्या किया है? ये संस्थान शुरुआती दिनों की अपनी घोषित नीति से, जमीनी सच्चाइयों के बरक्स अपने आप को कहां पाते हैं? विस्तार कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के काम काज पर मुझे शर्म आती है। इसने नाट्य प्रशिक्षण के नाम पर बहुत बड़ा गोरखधंधा चला रखा है अगर कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो। मैं तो कहता हूं कि इनकी जांच होनी चाहिए। कौन लोग पढ़ाने आते हैं यहां पर? सिर्फ नाटक में स्नातक हो जाने से कोई पढ़ाने के काबिल नहीं हो जाता। पढ़ाना एक अलग किस्म का दायित्व है, उसके लिए अलग किस्म की योग्यता, कौशल का होना जरूरी है। हिन्दुस्तान के सबसे सफलतम फुटबाॅल कोच रहीम साहब थे और उनकी कोचिंग में हमने ओलंपिक में चैथा स्थान हासिल किया था। खुद रहीम साहब ने कोलकाता में कभी भी प्रथम श्रेणी का फुटबाॅल नहीं खेला। 
आप बहुत अच्छा रंगकर्म कर सकते हैं पर जरूरी नहीं है कि आप सिखाने लायक भी हों। सिखाना एक नितांत भिन्न किस्म का क्रियाकलाप है, अध्यवसाय है। जो लोग रंगकर्म ओर शिक्षण दोनों के उस्ताद हैंए जब वे पढ़ाते हैं तो कमाल हो जाता है। पढ़ाना एक तरह से जिन्दगी के अनुभव बांटना है। जिसके अनुभव ज्यादा सशक्त हैं, जिसने अच्छा रंगकर्म किया है वही नये रंगकर्मियों को सही राह दिखा सकता है। यह बात पूरी दुनिया में आज साबित हो चुकी है कि हमें प्राथमिक स्तर पर सबसे काबिल शिक्षकों की जरूरत होती है। क्योंकि वही गीली मिटटी को सही आकार दे सकते हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे को सस्ता वाला हारमोनियम देकर कहन- बेटा अभी इससे गाना सीखो। बाद में जब अच्छी तरह से सीख जाओगे तब अच्छा वाला हारमोनियम खरीद कर देंगे। मैं कहता हूं यही पर आपने बड़ी गलती कर दी। उसे अभी से अच्छा वाला हारमोनियम लाकर देना होगा। सस्ते हारमोनियम में- उसका ट्यून, साउंड टोन, नोट, स्केल सब कुछ गलत होता है। एक बार गलत ट्यूनिंग, गलत ट्रेनिंग हो गई तो आप तमाम उम्र उसे ठीक नहीं कर पाएंगे। 
मैं जब नाट्य विद्यालय के स्नातकों को भारंगम में साधनसेवियों की तरह दोयम दर्जे का काम करते देखता हूं तो मुझे शर्म आती है कि सिर्फ पैसों की खातिर वे क्यों ऐसा काम करने को मजबूर हैं? आप झूठ बोलते हैं जब यह कहते हैं कि वे टेक्नीकल डायरेक्टर हैं। वे सिर्फ साधनसेवी होते हैं। हाॅल की व्यवस्था देखना, अतिथियों को होटल ले जाना और लाना, उन्हें खाना खिलाना, उनके लिए गाड़ी का प्रबंध करना, टेंट लगवाना यह सारा काम उनसे करवाया जाता है। यह बहुत शर्म की बात है। हां यह सच है कि ये बच्चे गरीब हैं। उन्हें पैसा चाहिये! तो फिर क्या आप इसीलिये उनका इतना असम्मान करेंगे? आप उनको दिशा क्यों नहीं देते? 

यह आलेख अधूरा है। यहाँ आलेख के बीच बीच के कुछ हिस्से रखे गए हैं। .....पूरा लेख पढ़ें समकालीन रंगमंच के आगामी अप्रैल-जून अंक में। प्रस्तुति : राजेश चन्द्र. सम्पादक, समकालीन रंगमंच.

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

मैंने सिर्फ नाम के लिए काम नहीं किया. - दिनेश ठाकुर


सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, ‘अंक’ रंग संस्था के संस्थापक दिनेश ठाकुर से डॉ० कुसुमलता मलिक की बातचीत का संक्षिप्त अंश. विस्तृत साक्षात्कार दिनेश ठाकुर के निधन से ठीक 6 महीने पहले मुंबई में उनके आवास पर लिया गया था। इस साक्षात्कार में दिनेश ठाकुर ने हिंदी रंगमंच के समकालीन मुद्दों पर उसी बेबाकी से अपनी राय रखी है जिसके लिए वे जाने जाते हैं. पूरा साक्षात्कार पढ़ें समकालीन रंगमंच के शीघ्र प्रकाश्य अप्रैल-जून अंक में।



डॉ० कुसुमलता- क्या आपने कभी सिर्फ नाम के लिए काम किया है? प्रश्न बहुत तीखा है लेकिन मैंने थियेटर में लोगों को ऐसा करते देखा है। लोग अधिकांशत प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद खेलते हैं। विख्यात जीवित लोगों से जुड़ने के लिए उनकी कृतियों के नाट्य रूपांतर करते हैं और खेलते हैं। इसी तरह की जुगाड़बन्दी, नाम पाने के लिए जुगत बैठाने की कोशिश लोग करते हैं। क्या आपने कभी ऐसी कोई कोशिश की है?

दिनेश ठाकुर- डॉ० साहब! मैं बहुत ईमानदारी और विश्वास के साथ यह बताना चाहता हूं कि मैंने अपने थियेटर के इन 40-42 वर्षों में कभी कोई ऐसी कोशिश नहीं की जो मेरे सिद्धांतों के विपरीत हो। मेरे जीवन का उद्देश्य सिर्फ नाटक खेलना रहा है। उसमें नाम भी मिल जाए तो कोई बुरी बात नहीं पर मैंने सिर्फ नाम के लिए काम नहीं किया। मैंने क्लासिक भी उठाए पर सिर्फ काम के लिए नाम के लिए नहीं।

डॉ० कुसुमलता- ठाकुर साहब! हिन्दी की रंग समीक्षा बहुत पिछड़ी है। ज्मगज की आलोचना तो फिर भी कुछ मिल जाती है पर ज्मगज पर आधारित किए गए प्रदर्शनों की रंग समीक्षा अधिकांशत नहीं होती, कुछेक के सिर्फ ब्यौरे भर अखबारों में छप जाते हैं। इससे हिन्दी रंग चिन्तन में एक वैक्यूम (शून्य) नजर आता है। इससे रंगकर्म के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ता है?

दिनेश ठाकुर- देखिए डॉ० साहब! जो आप कह रही हैं वह तो यथार्थ है उससे इंकार नहीं किया जा सकता। यदि हमारे खेले गए नाटकों की निरंतर समीक्षा होती रहे तो हमें सहूलियत ही होगी। पर ऐसा होता नहीं है। ब्यौरे ही बड़ी मुश्किल से छपते हैं। हर प्रदर्शन के तो ब्यौरे भी नहीं छपते। खैर! लोगों ने ‘आधे-अधूरे’ को भाषा की दृष्टि से किया। ‘घासीराम कोतवाल’ को राजनीतिक चेतना की दृष्टि से किया। पर उन्हें अपनी समीक्षायें भी खुद ही करनी पड़ीं। मैं तो इस ओर ज्यादा ध्यान ही नहीं देता। हमने अपना काम चुन लिया है। हमारा काम है थियेटर करना बाकी समीक्षक-दर्शक जानें।

डॉ० कुसुमलता- ठाकुर साहब इसी के साथ एक और प्रश्न उभरता है मंच का। यानि प्रोसिनियम थियेटर का। संस्कृत नाट्यकाल में नाटक दरबारों में हुआ करते थे यानि एक खास किस्म की दरबारी मानसिकता, एक खास वर्ग, एक खास विषय और थियेटर का एक खास तरीका। धीरे-धीरे नाटक लोक की ओर बढ़ा, संस्कृत से प्राकृत और प्राकृत से अन्य लोक भाषाओं में। मध्यकाल तक आते-आते बहुत से लोक नाट्य रूप पुनः जीवित हो उठे। इसके अन्य कई और ऐतिहासिक कारण भी रहे हैं, उनमें मैं नहीं जाऊंगी। यह पृष्ठभूमि मैं इसलिए उद्धृत कर रही हूं चूंकि मुझे आज भी ऐसा अनुभव होता है कि लोकनाट्य रूपों की क्रांतिकारी रंग चेतना के प्रसार एवं प्रभाव को देखने के बावजूद हिन्दी के रंगकर्मी उस पुरानी दरबारी, खास (टाइप्ड) मानसिकता से बाहर नहीं निकल सके हैं-विशेष रूप से निर्देशक। हमारी परम्परा में रंगमंच रचा जाता था। आज मंच पर यथार्थवादी थियेटर का प्रभाव इतना ज्यादा है कि बने-बनाये सेट पर नाटक दिखाया जाता है। इससे तीन सवाल उभरते हैं पहला-मंच मुक्ति का, दूसरा-नाटक के यथार्थवादी स्वरूप का और तीसरा-अभिनय के स्वरूप का।

दिनेश ठाकुर- आप थोड़ा और खोलकर समझाइये तो मैं कुछ कहूं।

डॉ० कुसुमलता- मंच मुक्ति से तात्पर्य है कि नाटक गांव-कस्बों तक पहुंचे जहां बंद प्रेक्षागृह नहीं होते वहां भी अस्थायी मंच रच कर अथवा बिना मंच के नाटक अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके। आपने बंद प्रेक्षागृह वाले मंच की अवधारणा को कितना तोड़ा है? यथार्थवादी स्वरूप से मतलब उस खास रियलिस्टिक फाॅर्म से है जो मंच पर हूबहू भौतिक सामग्री को दिखा कर जीवन को उसके बीच दिखाना चाहता है। क्या आप ऐसे थियेटर को पसंद करते हैं? या परम्पराशील रचनात्मक थियेटर के हामी हैं? तीसरा अभिनय के स्वरूप से मेरा तात्पर्य था कि अभिनय कला कहीं-न-कहीं आंतरिक रूप से संकुचित हो रही है। उपर्युक्त दोनों स्थितियों में अभिनेता को अपने आंगिक अभिनय कौशल से सामग्री का सृजन नहीं करना पड़ता। अपने भाव-भंगिमाओं एवं मुद्राओं से वातावरण का सृजन नहीं करना पड़ता। अतः उसकी कला कहीं-न-कहीं सीमित हो जाती है, संकुचित हो जाती है। आप अभिनय के किस स्वरूप को श्रेष्ठ समझते हैं?

दिनेश ठाकुर- देखिए! प्रोसिनियम थियेटर से मुझे कोई आपत्ति नहीं है पर हम लोग ऐसी बहुत-सी जगहों पर नाटक करते रहे हैं जहां मंच के बगैर हमें नाटक करना होता है। काॅलेजों के क्लास रूम, अस्पताल, होटल, मैदान, रेस्तरां ऐसी बहुत-सी जगहों पर हम लोग नाटक करते रहे हैं। इसलिए जरूरत के हिसाब से मंच के प्रोसिनियम थियेटर वाली अवधारणा स्वयं टूट जाती है। दूसरी बात, यथार्थवादी फाॅर्म के नाटक भी हों। मुझे कोई आपत्ति नहीं। आपत्ति वहां होती है जहां लोग सब कुछ हूबहू दिखाने पर उतारू हो जाते हैं। आपको यदि सभी-कुछ दिखाना है तो फिल्म कीजिए, थियेटर क्यों करते हैं। थियेटर में अभिनय के रचने के लिए जगह रहनी चाहिए। अभिनय वही वास्तविक अभिनय होता है जो निरंतर कुछ नया करता चले। इसलिए जब हम एक ही नाटक को कई-कई बार करते हैं तो पहले शो से लेकर 20-25 शो तक नाटक का हर शो पहले किए गए शो से कुछ अर्थों में अलग होता है। यह सब अभिनय का ही कमाल है।

डॉ० कुसुमलता- ठाकुर साहब! अब बात सीधी पटरी पर आ गयी है यानि रफ्तार पकड़ चुकी है। कुछ निर्देशक मानते हैं रंगकर्म एक खचीर्ली विधा है, उसके व्यय को वहन करना असम्भव है, इसलिए नाटक पिछड़ा हुआ है। कुछ निर्देशक ऐसे भी हैं जो नाटक को उतनी खर्चीली विधा तो नहीं मानते पर यह जरूर मानते हैं कि नाटक बिना संसाधनों के नहीं चल सकता। उसके दूसरे बैरियर्स हटा दिए जाने चाहिए जो सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत उस पर लगाए जाते हैं। उदाहरण के लिए-नाटक के प्रदर्शन की अनुमति लेना, पुलिस थाने में स्क्रिप्ट भेजना इत्यादि। अब शो होगा तो उसके लिए दर्शक जुटाना भी एक समस्या है। नाटक के प्रचार के लिए पोस्टर, पैम्फ्लेट्स, ब्राॅशर्स इत्यादि का खर्चा होता है तो कुल मिलाकर आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं कि नाटक लाखों-करोड़ों रुपयों का खेल है या फिर ठीक-ठाक रोजी रोटी की विधा।

दिनेश ठाकुर- अभी मैंने सुना दिल्ली में भानु भारती जी ने करोड़ों रुपयों में ‘अंधायुग’ का प्रदर्शन किया। यह भी सुना कि कलाकार रिहर्सल करने के लिए हवाई जहाज से मुम्बई आए थे। देखिए कोई खर्च कर रहा है इसमें दिक्कत यह है कि हम काम करने के सही तरीके को भूल जाते हैं। एक भानु भारती को पैसा मिल गया उन्होंने नाटक भी कर दिया। मैं यह नहीं कहता कि खराब किया होगा, अच्छा ही किया होगा मुझे उससे कोई शिकायत नहीं। शिकायत की बात यह है कि सैकड़ों नाट्य समूह हैं जो अच्छे नाटक करना चाहते हैं। कुछ अच्छे नाटक कर भी रहे हैं पर अच्छा नाटक किए जाने की जो करोड़ों रुपयों वाली परम्परा डाली जा रही है वह किसी भी दृष्टि से मुझे उचित प्रतीत नहीं होती। मैं ऐसे नाटक को ठीक नहीं समझता जिसका व्यय करोड़ों रुपए हों। कहां से इतना पैसा आए और कैसी परम्परा आगे बढ़ेगी? मेरी निगाह में नाटक खूब हों, कम-से-कम खर्च में हों, पर अधिक-से-अधिक रंगकर्म करने वालों को लाभ पहुंचे।

डॉ० कुसुमलता- ठाकुर साहब! हमारे देश की कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति नहीं है। लोकतंत्र है, अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है पर सांस्कृतिक नीति के अभाव में क्या थियेटर जैसी सामूहिक कला फल-फूल सकती है? जो किसी हद तक रोटी नहीं दे पाती। कोई आदमी यदि उम्र भर थियेटर करना चाहे जैसे कि आपने किया तो उसके क्या रास्ते हैं? उसे थियेटर से रोटी और नजरिया दोनों पैदा करना है वह यह कैसे कर सकता है?

दिनेश ठाकुर- कुसुमलता जी! जहां तक मेरी बात है मेरे लिए नजरिया तो बहुत बड़ी बात रहा है पर रोटी उतनी बड़ी बात नहीं रही। आप एक मुट्ठी चने पर भी बसर कर सकते हैं और 56 प्रकार के भोजन पर भी। अगर मुझे रोटी नहीं मिली तो मैं भूखा भी सोया हूं पर अपने नजरिए को नहीं भूला। इसलिए जीवन के लिए नजरिया बड़ी बात है। किसी भी साधना में दुःख सहना पड़ता है। दुख सहे बगैर नजरिया नहीं बनता पर रोटी बन जाती है।

डॉ० कुसुमलता- आज हम तमाम तरह के शोर के बीच जी रहे हैं। लोग मनुष्यता की बात करते हैं पर उनमें स्वयं मनुष्यता नहीं मिलती। प्रेम चाहते हैं दूसरों से, पर स्वयं दूसरों को देना नहीं चाहते। थियेटर के माध्यम से आप जिन जीवन मूल्यों को समाज में बढ़ाना चाहते हैं उन पर कैसे काम करते हैं? क्या काम सबसे पहले स्क्रिप्ट से आरम्भ होता है?

दिनेश ठाकुर- देखिए! दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है पर मुझे ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि मुझमें क्या हो रहा है। मेरे जीवन-मूल्य व्यक्ति से समाज की ओर जाते हैं। व्यक्ति समाज की एक सजीव, क्रियाशील, चिन्तनशील, संवेदनशील इकाई है। यदि वह स्वस्थ मानसिकता से परिपूर्ण है तो समाज में उसी का विस्तार होगा। हम उन्हीं व्यक्तियों को पूजनीय मानते हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व के माध्यम से समाज को आदर्श दिए। इसलिए मेरा बल भी व्यक्ति पर अधिक रहता है। यानि कुल मिलाकर मुझमें यदि कुछ आदर्श हैं तो मैं अपने नाट्य-समूह में भी कुछ आदर्श रखूंगा। जाहिर-सी बात है मेरे द्वारा प्रदर्शित नाटकों में भी कुछ आदर्श होंगे और जो दर्शक देख रहा है, निरंतर मेरे प्रदर्शनों को परख रहा है वह भी मुझसे कुछ आदर्शों की अपेक्षा रखेगा। इसलिए मेरी दृष्टि में व्यक्ति से समाज बनता है।

डॉ० कुसुमलता- तो क्या समाज का व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता?

दिनेश ठाकुर- पड़ता है। नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव पड़ता है पर व्यक्ति अपने नजरिए से ऊपर उठ सकता है।

डॉ० कुसुमलता- ठाकुर साहब! आठवें दशक में नाटक की घेरेबंदी का एक दौर सामने आया था। नाटक जैसी अनुष्ठानमूलक सामूहिक कला में भी रंगमंच की घेरेबन्दी के चलते चैकीदारी का ही नहीं बल्कि अलम्बरदारी का प्रश्न मुख्य हो गया था। निर्देशकों का कहना था कि हमें नाटककार की जरूरत नहीं। हम किसी भी थीम पर नाटक तैयार कर सकते हैं। रंगमंच का सूत्र हमारे अपने हाथ में है। अभिनेताओं का मानना यह था कि रंगमंच पर आखिरकार काम तो हमें ही करना होता है। इसलिए हमारा सूत्र किसी दूसरे के हाथ में क्यों हो? हम किसी थीम पर नाटक तैयार भी कर सकते हैं, उसे निर्देशित भी कर सकते हैं और अभिनीत भी कर सकते हैं। इसलिए आखिरकार रंगमंच अभिनेता का ही होता है। आपकी इस विषय में क्या राय है?

दिनेश ठाकुर- देखिए कुसुमलता जी! बहसें बहुत होती हैं। इसी तरह प्रयोग भी बहुत होते हैं। सवाल यह है कि इन बहसों या प्रयोगों से निकला क्या? आप तब लडि़ए जब लड़ना सिर्फ जीत हासिल करने के लिए नहीं बल्कि किन्हीं जीवन मूल्यों के लिए जरूरी हो। इन झगड़े-टंटों से रंगमंच को आखिरकार कुछ भी तो सार तत्व नहीं मिला।

डॉ० कुसुमलता- लेकिन नाटककार अथवा रचनाकार को तो बाहर का आदमी समझा गया और इसी समझ के चलते आज तक हिन्दी में नाटककार को वह दर्जा नहीं मिल सका है और न ही वह लाभ मिल पाता है जो एक निर्देशक या अभिनेता को मिल रहा है। इसी कारण हिन्दी की मूल नाट्य रचनाओं पर काम बहुत कम होता है?

दिनेश ठाकुर- देखिए डॉ० साहब! नाटककार को बाहर का आदमी समझने वाली सोच रंगकर्म के लिए हितकारी नहीं है। स्क्रिप्ट एक आधार है जिससे रंगमंच का विकास होता है। आप थीम बनाकर जो नाटक करते हैं उनके दो-चार-छः-दस शो हो सकते हैं किन्तु सैकड़ों हजारों नहीं। जबकि मूल नाट्य रचनाओं के सैकड़ों-हजारों शो होते हैं और उसके बावजूद उनमें काम करने की संभावनाएं बची रहती हैं। इसलिए आपकी बात सही है कि नाटककार को बाहर का आदमी समझने वाली सोच किसी भी भाषा के रंगकर्म के लिए उचित नहीं।

प्रस्तुति : राजेश चन्द्र, सम्पादक, समकालीन रंगमंच.

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

कल्चर को जोड़ने वाली नीति की दरकार : वामन केंद्रे


समकालीन रंगमंच का कवर 
....हमारे समाज में बहुत सी ऐसी कलाएं हैं जो लुप्त होने की कगार पर हैं। दूरदराज इलाकों में भाषाएं मर रही हैं, बोलियां लुप्त होती जा रही हैं, पारंपरिक कलाएं अंतिम सांस ले रही हैं। सांस्कृतिक नीति में इस बात की सुनिश्चितता होनी चाहिए कि तमाम योजनाओं का लाभा उन संस्कृतियों को सबसे पहले मिले, जो अस्तित्व के संकट से गुजर रही हैं। आज क्लासिकल गाने वाले देश-विदेश में घूमते नज़र आते हैं। उनका प्रोग्राम भी फाइव स्टार होटलों में भी होता है, मगर लोक गायक झुग्गियों में बदतर हालात में पड़े हैं। उनकी कोई सुध लेने वाला भी नहीं। जि़न्दगीभर कला को नई उंचाई देने वाला लोक कलाकार भी आखिरी क्षणों में इतना तक नहीं जुटा पाता कि आराम से गुजर-बसर कर सके। 
सांस्कृतिक नीति के केन्द्र में आम कलाकार या संस्कृतिकर्मी हो, उसे आगे लाने की सोच हो। सामाजिक स्तर पर भी ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिससे जूझने की जरूरत है। आखिर क्यों, जल्लाद का बेटा ही जल्लाद का काम करे? लावणी करने वाले परिवार की बेटी ही क्यों इस पेशे में आए? श्मशान का जोगी हर बार उसी का बेटा क्यों हो? कई सारी लोक कलाएं ऐसी हैं जिसे छोटी जातियों के लोग परंपरा से निभाते चले आ रहे हैं, मगर उन्हें कोई सम्मान नहीं मिलता। उत्तर भारत के प्रसिद्ध लोक नाट्य नौटंकी में काम करने वाले लगभग सारे कलाकार दलित हैं। तैयम दलिह ही क्यों करे? ज्ञात हो कि ये केरल का एक फार्म है जिसमें दलित को इस लिए प्रसाद के तौर पर दारू पिलाई जाती है क्योंकि वो सिर पर भारी बोझ रखके घटों तक रस्मों को बिना थके निभाता रहे। सांस्कृतिक नीति इंसानियत के नाते इस अन्याय के बारे में गंभीरता से विचार करने वाली और जाति-धर्म से परे हो। इसमें इन कलाओं को भी सम्मान दिलाने की बात हो ताकि बाकी लोग भी इस दिशा में आएं और पारंपरिक दासता से कलाओं को मुक्ति मिल सके।
तमाम पहलुओं को गौर से देखा जाए तो बड़ा ही जटिल विषय है, एक सर्वमान्य सांस्कृतिक नीति का निर्माण। मगर इसकी जरूरत भी है। इससे कलाओं के नैसर्गिक रूप से फलने-फूलने में मदद मिलेगी। इसके जरिए ये सुनिश्चित करना हेागा कि कोई भी संस्कृति कभी अविष्कार में आना चाहे तो वो डरे नहीं और ना ही इससे जुड़े कलाकारों के लिए रोजी-रोटी का कोई संकट सामने खड़ा हो।
इसकी शुरुआत उन्हीं पहाड़, जंगल, गांव और तालुकों से करने की जरूरत है जहां से कलाओं का जन्म हुआ। फिर यहां से चलकर इसे मेट्रो तक आने की जरूरत है। यानी कि Projection of Culture of this country at of all. कल्चरल नीति का एक दूसरा पहलू है कि ऐसी नीति की जरूरत आखिर क्यों है, जबकि पिछले पांच हजार सालों से भी ज्यादा समय ये यहां के लोगों ने बिना किसी सहयोग के संस्कृति को बचाके रखा। ये भी तो हो सकता है कि एकल सांस्कृतिक नीति संस्कृति की उन्मुक्त धारा को ही नियंत्रित करने लगे। इसके खतरे तो हैं मगर हम उस मोड़ पर खड़े हैं कि खतरा मोल लेने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है। कुछ खास तरह की कला और उससे जुड़े कलाकार ही सुख-सुविधा, सम्मान के भागी बनते हैं बाकी गुमनामी में जीने पर विवश हैं। उसे देखते हुए एक काॅमन और सर्वमान्य पालिसी होना बेहद जरूरी है। 
देखा जाए तो ना चाहते हुए भी सांस्कृतिक कर्म पर राज्यों और सरकारों का थोड़ा बहुत नियंत्रण तो है। वही तय करता है कि कौन सा फार्म राज्य का प्रतिनिधित्व करेगा, कौन सी टीम विदेश जाएगी। किन लोगों को पुरस्कार दिया जाएगा। कौन से लोग राज्यसभा में बैठेंगे? किन्हें अकादमियों का कारोबार सौंपा जाएगा आदि-आदि। सरकार नियंत्रण तो रखती है मगर इस दिशा में ढेलाभर भी नहीं खर्च करना चाहती। मैं प्लानिंग कमीशन का मेंबर था। एक बार मैंने सवाल किया कि देश के कुल बजट में कल्चर का कितना हिस्सा है, तो मुझे बताया गया कि प्वाइंट जीरो जीरो जीरो के बाद समथिंग है। जिस देश में संस्कृति के नाम पर एक भी परसेंट बजट हिस्सेदारी नहीं हो वहां कलाकारों की क्या हालत होगी और किस तरही की कल्चरल प्रोग्रेस होगी
बामन केंद्रे 
कल्चरल पालिसी बनने से कम से कम कलाकारों की एक आवाज़ तो सामने आएगी। उनकी हिस्सेदारी बढ़ेगी। इस दिशा में केन्द्रीय स्तर पर हालत बेहद खराब हैं। सरकार के लिए Culture is the last priority. जिसे कोई काम नहीं देना हो उसे कल्चरल मिनिस्टर बना दिया जाता है। भले ही केन्द्रीय स्तर पर कोई काम ना हुआ हो मगर महाराष्ट में पिछले तीन सालों से पालिसी है। यहां का कोई भी विधायक या मंत्री आपको ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपने जीवन में एक बार चेहरे पर सफेदी ना पोती हो। कहने का मतलब है कि स्टूडेंट पीरियड से लेकर बड़े होने तक वो कभी ना कभी नाटक या आर्ट के दूसरे फार्म से जरूर जुड़ा होता है। यही वज़ह है कि जब वो सत्ता में जाते हैं तो उनके दिल में इन कलाओं के प्रति सम्मान करते है । उसके विकास के लिए वो काम भी करते हैं। यशवंत राव जी की कोशिशों का नतीजा है कि यहां पर थिएटर देश के बाकी हिस्सों से बेहतर स्थिति में है। यहां थिएटर पर कोई टैक्स नहीं है। थिएटर की गाडि़यों पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगता है। लेकिन ऐसे कल्चरल सेंसिटव लोग देश की राजनीति में कम ही हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि कला रहे या ना रहे, कलाकार मरे या जीये। ले दे करके राजसभा में कलाकारों को थोड़ी बहुत जगह मिलती है मगर यहां भी राजनीति है। वे फिल्मी कलाकार जो पार्टियों को वोट दिलाने या उनके लिए चुनाव के दौरान भीड़ जुटाने का काम कर सकते हैं आसानी से इस कोटे से सांसद बना दिए जाते हैं। सांसद बनने के बाद ये उस क्षेत्र के बारे में सवाल तक नहीं उठाते जिस क्षेत्र से ये चुनके आए हैं। अव्वल तो रेखा, लता, सचिन जैसी तमाम फिल्मी हस्तियां संसद में पहुंचने के बाद कार्रवाई में भाग ही नहीं लेती। इनकी उपस्थिति औसत से भी नीचे होती है। शबाना आजमी जैसी हस्तियां जो फिल्म और थिएटर से समान तौर पर जुड़ी हैं, उनसे अपेक्षा होती है। ये सामाजिक मुद्दों पर अपनी सक्रियता भी दिखाती हैं मगर इनके मुद्दे कल्चर से जुड़े ना होकर राजनीतिक ज्यादा होते हैं। इस मामले में भूपेन हजारिका और हबीव तनवीर साहब अपवाद रहे हैं। 
कभी सांस्कृतिक कोटे के तहत गए सांसदों को इसके संरक्षण के लिए लड़ते नहीं देखा गया। ऐसा नहीं है कि थिएटर या फिर कल्चर से रुचि लेने वाले लोग ही राजनीति में नहीं हैं। स्व. विलास राव जी, रामकृष्ण हेगड़े के साथ ही शरद पवार, सुशील कुमार शिंदे, लाल कृष्ण आडवाणी जैसे राजनेता कल्चरल एक्टिविटी को पसंद करने वाले रहे हैं। जहां तक महाराष्ट के नेताओं की बात है, राज्य में तो ये खूब बढ़-चढ़के कल्चरल एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं, लेकिन केन्द्र में जाने के बाद कुछ नहीं करते। 
भारत को छोड़ दिया जाए तो दुनिया में तमाम ऐसे देश हैं जहां संस्कृतिकर्म बड़ी इज़्जत की नज़र से देखा जाता है। सरकारें ऐसे लोगों को गोद ले लेती हैं जो इस कार्य को आगे बढ़ाने की दिशा में अग्रसर होते हैं। सरकारी संरक्षण के बाद से उनके लिए रोजी-रोटी की समस्या गौण हो जाती है। लिहाजा, वो अपना काम बखूबी कर पाता है। हमारे यहां ऐसी परंपरा नहीं है। यहां संस्कृतिकर्मी को निजी रिस्क पर आगे बढ़ना होता है। उसके सामने सबसे बड़ी समस्या आजीविका की होती है। अगर हमारे यहां भी ये बात लागू हो जाए तो आर्ट और कल्चर के किसी भी फार्म में उतरने से पहले कलाकार को सोचना नहीं पड़ेगा। और वो बिना किसी डर के अपने फार्म में बेहतरीन प्रदर्शन कर सकेगा। देश में कल्चरल हेरीटेज को समृद्ध बनाने के लिए आर्टिस्ट में नए विश्वास पैदा करने वाली, उनके लिए रोजी-रोटी की समस्या को दूर करने वाली सांस्कृतिक नीति की दरकार है। 
देश के नीति निर्धारकों के लिए कल्चर सबसे लास्ट प्रेयारिटी होती है। इसी का नतीजा है कि लोगों के बीच ह्यूमन इमोशन गायब होते जा रहे हैं। देश में बलात्कार और अपराध की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इसे रोकने में कल्चर की बड़ी भूमिका है। वास्तव में संस्कृति मानसिक आरोग्य का वाहक है। इंसान के बीच में जो भी गुस्सा या फिर बुराई है वो कल्चर के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। संस्कृतिकर्म में चाहे कलाकार, श्रोता, दर्शक या फिर मैनजेरियल किसी भी रूप में जुड़ा व्यक्ति शांत होगा, किसी भी प्रतिक्रिया में फिजिकल एक्शन से वो हमेशा बेचेगा। इसे देखते हुए कल्चरल एजुकेशन को अनिवार्य बनाने की जरूरत है। पहली कक्षा से लेकर काॅलेज स्तर तक बच्चों को कल्चरल एजुकेशन से जोड़ा जाए तभी उसे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का ज्ञान हो सकेगा। और बड़े होने पर वो इसके रूपों से जुड़ सकेगा, उसे अपना सकेगा। इससे ह्यूमन इमोशन को बढ़ावा भी मिलेगा। कल्चरल पाॅलिसी की बदौलत सांस्कृतिक समुद्र से कचरा साफ करने, कलाकारों के स्वाभिमान की रक्षा करने कलाओं के अस्तित्व को बचाने में मदद मिलेगी। 

प्रस्तुति : राजेश चन्द्र, सम्पादक, समकालीन रंगमंच. पूरा लेख पढ़ें समकालीन रंगमंच के आगामी अप्रैल-जून अंक में । अंक 22 अप्रैल के बाद उपलब्ध रहेगा।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

समकालीन रंगमंच का आगामी अंक

आवरण - असीम त्रिवेदी 

समकालीन रंगमंच का आगामी अंक "सांस्कृतिक नीति क्यों नहीं" विषय पर केन्द्रित है। आज का रंग-परिदृश्य अजीब किस्म की विडम्बनाओं एवं विरोधाभासों का शिकार है जहाँ एक तरफ हम देखते हैं कि महानगरों से लेकर छोटे शहरों-कस्बों तक सरकारी-गैरसरकारी रंग-महोत्सवों की धूम है और करोड़ों करोड़ खर्च करके नाटक आयोजित हो रहे हैं, वही दूसरी तरफ देश भर में फैला हुआ रंगमंच तमाम तरह की बुनियादी सुविधाओं एवं संसाधनों से महरूम है। देश में संस्कृति और रंगमंच के विकास के लिए स्थापित किये गए हमारे संस्थान आज हर वर्ष लम्बी-चौड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन के नाम पर अकूत धन खर्च कर रहे हैं पर एक रंगकर्मी को रंगकर्म करने के लिए कहीं कोई सहूलियत हासिल नहीं है। रंग मंडलियों के पास न तो रिहर्सल के लिए कोई जगह है, न मंचन के लिए प्रेक्षागृह। न तो हमारे युवा रंगकर्मियों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है और जो दस-बीस रंगकर्मी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करते भी हैं तो रंगमंच में उनके लिए टिकने का कोई इंतज़ाम नहीं है। हमारे भारत जैसे देश में, जहाँ निरक्षरता, कुपोषण, बाल-मजदूरी, बाल यौन-शोषण, कन्या-भ्रूण-हत्या, स्त्रियों के ऊपर हिंसा और बर्बरता जैसी समस्याएँ विकराल स्वरुप धारण कर चुकी हैं वहां के रंगमंच तथा उसके प्रशिक्षण का आधार क्या हो, प्रदर्शनों में कितने संसाधन खर्च किये जाएँ इसको लेकर गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है। सरकार प्रत्येक वर्ष रंगकर्म के क्षेत्र में काम करने वाले प्रतिभावान रंगकर्मियों को स्कॉलरशिप, फेलोशिप और पुरस्कार देती है, विभिन्न नाट्य मंडलियों को नाटकों के मंचन, उत्सवों के आयोजन एवं उनकी व्यावसायिक टोलियों (रेपर्टरीज़) के लिए सीमित-असीमित अनुदान भी देती है पर इस तरह लाभान्वित हो रहे रंगकर्मियों एवं नाट्य दलों की योग्यता का आधार क्या है इस सम्बन्ध में कोई दिशा-निर्देश या नीति तक मौजूद नहीं। इन सरकारी अनुदानों का ज़्यादातर हिस्सा उन रंगकर्मियों तक नहीं पहुँच पा रहा जिन्हें वास्तव में इनकी ज़रुरत होती है। अगर हम सरसरी तौर पर भी देखें तो यह समझने में कोई मुश्किल नहीं आती कि लाभान्वितों की इस सूची में हर बार एक से नाम ही मौजूद रहा करते हैं। इस तरह के विरोधाभासों को देख कर क्या ऐसा नहीं लगता कि अपने देश में भी एक ऐसी समेकित सांस्कृतिक नीति का होना अत्यंत आवश्यक है जो संसाधनों एवं सुविधाओं तक देश के सभी निवासियों की सामान रूप से पहुँच सुनिश्चित करें? क्या इस सम्बन्ध में कोई स्पष्ट नीति नहीं होनी चाहिए कि सरकार द्वारा प्रायोजित नाट्य-उत्सवों में किस प्रकार के नाटकों को अवसर दिया जाना चाहिए? क्या संस्कृति और रंगमंच के उत्सवों में शामिल होने का हक देश के उन लोगों को नहीं है जो सुदूर गाँवों-कस्बों में रहते हैं? क्या उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं पर केन्द्रित नाटक हमारे राष्ट्रीय समारोहों का हिस्सा नहीं बन सकते? सवाल कई हैं और अक्सर हम इन सवालों से कन्नी काट कर निकल जाने के आदी होते जा रहे हैं। क्या अभी वक़्त नहीं आया है कि हम इन गंभीर मुद्दों पर रुक कर थोडा विमर्श करें? इस विषय पर हमारे दौर के प्रमुख रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों जैसे- प्रसन्ना, बंसी कौल, रामगोपाल बजाज, बापी बोस, एम. के. रैना, वामन केंद्रे, राजेश कुमार, अरुण पाण्डेय, अशोक वाजपयी, अनिल रंजन भौमिक, रामजी राय, अनिल चमड़िया आदि का क्या सोचना है? क्या वे एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति की ज़रुरत को महसूस करते हैं या यथास्थिति के पक्ष में हैं? आइये समकालीन रंगमंच के नए अंक में इस महत्वपूर्ण विषय पर हुई बातचीत का हिस्सा बनें और एक बदलाव की दिशा में एकजुट हों।
- राजेश चन्द्र संपादक एवं प्रकाशक, समकालीन रंगमंच, दिल्ली।

रविवार, 27 जनवरी 2013

जयपुर में समकालीन रंगमंच


राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर में चल रहे साहित्य उत्सव के दौरान रंगमंच पर आधारित पत्रिका समकालीन रंगमंच का भी शहर में संस्था रंगशीर्ष के सहयोग से लोकार्पण हुआ। पत्रिका का विमोचन प्रख्यात साहित्यकार और चिंतक डॉ. अशोक वाजपेयी ने किया। पिंक सिटी प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में रंगमंच की आवाज़ बनने का मिशन लिए इस पत्रिका और रंगकर्मियों के साथ साथ समाज के बीच ऐसी पत्रिका की आवश्यक्ता और रंगमंच के वर्तमान परिदृश्य को लेकर एक परिचर्चा भी हुई। इस परिचर्चा और समारोह में अशोक वाजपेयी के अलावा जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद श्री राजाराम भादू, राजस्थान के वरिष्ठ रंगकर्मी श्री अशोक राही, इप्टा जयपुर के युवा थिएटर निर्देशक श्री संजय विद्रोही ने भी हिस्सा लिया। कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन देते हुए पत्रिका के सम्पादक राजेश चंद्र ने उस पीड़ा और संघर्ष के बारे में बात की, जिससे हिंदी का एक आम रंगकर्मी गुज़रता है। राजेश चंद्र ने कहा कि उस घनीभूत पीड़ा और संघर्ष की भावना से ही इस पत्रिका का जन्म हुआ है, जिसे आगे ले जाना रंगकर्मियों के साथ साथ रंगमंच के दर्शकों के हाथ भी है। राजेश चंद्र ने पत्रिका की ज़रूरत के बारे में कहा कि ये हिंदी की पहली ग़ैर संस्थानिक पत्रिका है, और ये ही इसकी आवश्यक्ता है। मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए डॉ. अशोक वाजपेयी ने रंगकर्म को सबसे अनोखी कला बताते हुए, दर्शक और रंगकर्मी के सम्बंधों के धागों को पिरो दिया। डॉ. वाजपेयी ने रंगकर्मियों और रंगमंच की दुर्दशा के लिए सरकारी तंत्र के साथ साथ राजनैतिक नेतृत्व को भी दोषी ठहराते हुए, इस पत्रिका को अपनी शुभकामनाएं दीं और रंगमंच के आने वाले भविष्य के लिए दिल्ली के बाहर विकेंद्रित नाट्य समूहों की ज़िम्मेदारी को अहम बताया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी वक्ताओं ने समकालीन रंगमंच के उज्ज्वल भविष्य के लिए सकरात्मक कामनाएं की और पत्रिका के लिए अमूल्य सुझाव भी दिए।
Rajasthan's capital Jaipur the pink city in literature-based magazine on contemporary theatre during the Festival Theatre in the city of rangashirsh was also the organization. the eminent writer and thinker magazine released. Ashok Vajpayee. Pink City Press Club held a program in the mission theatre voice along with the magazine and rangakarmiyon to society often of a magazine and a discussion on the current landscape of theatre. in addition to the discussion and the senior writer Jaipur Ashok Vajpayee and Shri Rajaram bhadu shikshavidSenior Theatre personality, Rajasthan Shri Ashok, Jaipur, young theater director passer, IPTA Mr. Sanjay rebel also welcome udbodhan. program, magazine editor Rajesh Chandra has talked about the pain and conflict, which is a common Hindi Theatre personality swims. Rajesh Chandra said that a sense of anguish and conflict that the condensed magazine is bornThat move forward together with the theatre audience hand rangakarmiyon. Rajesh Chandra said that the need of the magazine it is the first Hindi non institutional magazine, and as it is often speaking as keynote speaker Dr.. Ashok Vajpayee rangakarm, the most unique art, and theatre personality of the sambandhon threads to piro. Dr. Vajpayee rangakarmiyon and theatre along with Government for the plight of the system blame the political leadership, the magazine also wishes for the future of theatre and courted Delhi vindicator out of theatrical groups responsible for key present in the program speakers. contemporary theatre for a bright future of positive factor for invaluable suggestions and desires of the magazine. (Translated by Bing)

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

'समकालीन रंगमंच' पत्रिका का प्रवेशांक


महोत्सवों में सरकारें आज जिस तरह दखल दे रही हैं वह मेरे विचार से एक खतरनाक प्रवृत्ति है। सरकार को जहां काम करना चाहिए वो है फंडिंग और सब्सिडी। दिक्कत तब होती है जब सरकार सेंसर की तरह काम करने लगती है। अगर वह हमारे काम की काट-छांट करने लगे तो ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक तो नहीं कह सकते। दूसरा एक खतरा यह भी है कि सरकार के पास चूंकि यह अधिकार होता है कि वह लोगों या समूहों को चुन सकती है, तो इसके कारण पक्षपात होने का खतरा रहता है। ऐसे में काम की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता। दूसरी एक बात यह भी है कि सरकार का जो अधिकारी वर्ग है वह महोत्सव पर हावी हो जाता है और यह बिल्कुल गलत है। महोत्सवों के लिये नाटकों का चुनाव लोकतान्त्रिक तरीके से होना चाहिये। एक पूरा पैनल होना चाहिए जो प्रविष्टियों में से कुछ नाटकों को चुने, अलग-अलग जगह के नाटक हों उसमें, उस पर चर्चा हो और फिर चुनाव किया जाये। मतलब कोई एक तरीका हो जिस पर अमल किया जाये। मुझे शक है कि सरकार सच में इस तरह की किसी प्रक्रिया को अपनाती होगी। सरकार के पास काफी फण्ड होता है उदाहरण के तौर पर जैसे एनएसडी के महोत्सव के लिए काफी फंड उपलब्ध रहता है। तो जो नाटक आये होते हैं उन्हें काफी पैसा दिया जाता है जिसे वो अपने बाकी नाटकों में इस्तेमाल कर सकते हैं, उन नाटकों में जिनसे कुछ कम फायदा हुआ हो। इस तरह का एक सिस्टम होना चाहिए। मुझे लगता है इस तरह सरकार अपनी अहम भूमिका निभा सकती है और यह भी कर सकती है कि महोत्सवों को दिल्ली या अन्य मुख्य शहरों के अलावा छोटे शहरों, गांव-कस्बों तक ले जाया जाये। दिल्ली में आयोजन करना काफी आसान है क्योंकि यह केंद्र है। इस तरह का सिस्टम बनाया जाना चाहिए कि अगर एक महोत्सव में 20 नाटक हैं तो 5 नाटक आम लोगों के चुने हुए हों और उन्हें अलग-अलग शहरों और देशों में भी ले जाया जाये। इस तरह सरकार एक बड़ा योगदान कर सकती है। ( ‘समकालीन रंगमंच’ के प्रवेशांक में प्रकाशित अंग्रेज़ी के प्रख्यात नाटककार श्री महेश दत्ताणी के आलेख "सांस्कृतिक नीति का अभाव एक बड़ी समस्या" से। )
निर्देशकों में सामान्यतः ये भ्रम बना रहता है कि उनके अंदर कुछ ऐसा है जिस कारण एक अभिनेता उसके साथ जुड़ कर काम करना और अपना कलात्मक विकास करना चाहता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। अच्छे निर्देशक माने जाने वाले रंगकर्मियों के साथ जुड़ कर काम करने के बजाए, बिहार जैसे पिछड़े समाज में, एक रंगकर्मी संबंधों को, रिश्तों को बात व्यवहार को ज्यादा तरजीह देते हैं। ऐसे में फिर संगठक की भूमिका अहम हो जाती है। कई ऐसे अच्छे निर्देशक अच्छे अभिनेताओं की कमी का रोना रोते नजर आते हैं और मजबूरी में एकल प्रदर्शनों की ओर रूख कर जाते हैं। वैसे भी रंगमंच के अखिल भारतीय बाजार में एकल प्रदर्शन लगातार अपनी जगह बनाता जा रहा है। संगठन बनाने की दुरूहता से बचने का सरल समाधान। किसी एक अभिनेता से समीकरण बिठाकर एक प्रस्तुति तैयार कर ली जाती है और फिर शुरू हो गयी देश भर के प्रायोजित महोत्सवों में भागीदारी निभाने की कवायद। जो हाल पटना रंगमंच का हुआ है वही हाल लगभग पूरे हिंदी रंगमंच में हुआ होगा। लेकिन इन सब बातों पर कोई विमर्श, बहस-मुबाहिसा नहीं है। साहित्य में देखिए कितने विमर्श हैं, तीखी बहसें हैं इस कारण साहित्यकार ज्यादा महत्व भी पाते हैं। इसके बरक्स रंगमंव में खासकर कहीं कोई उद्वेलन नहीं। राजेंद्र यादव, नामवर सिंह एक दूसरे पर भीषण वैचारिक हमला करते हैं, एक-दूसरे के काम की खूब आलोचना-प्रत्यालोचना हुआ करती है।लेकिन रंगमंच में सब जगह सहमति का माहौल है। शायद ही कोई बड़ा रंगकर्मी अपने समानधर्मा दूसरे रंगकर्मी के काम की आलोचना करता है, कि कैसा थियेटर वो कर रहा है? थियेटर के माध्यम से कौन से मूल्य वो परोस रहा है? कैसा रंग-सौदर्य सामने ला रहा है जैसी कहीं कोई बात-चीत नहीं। जो थोड़ी बहुत बातचीत है भी वो इतनी पुरानी व दुहराव से भरी है कि ऊब पैदा होती है। हिंदी रंगमंच का रंगकर्मी सबसे ज्यादा आलोचना, बहस-मुबाहिसे से भागता है। संगठन के अप्रासंगिक होते चले जाने के चारित्रिक लक्षण हैं ये। ( समकालीन रंगमंच के प्रवेशांक में प्रकाशित अनीश अंकुर के आलेख "संगठन की ओर लौटना होगा थियेटर को" का एक अंश। )
इसमें कोई शक नहीं, जब से वर्णवादी व्यवस्था ने समाज को वर्ण के आधार पर बांटा, रंगमंच भी बंट गया। रंगमंच का एक वर्ग सत्ता से जुड़ा तो दूसरा सत्ता के बाहर जो लोग गांवों-देहातों, जंगलों में रहते थे, उनसे। रंगमंच का यह वर्गीय विभाजन आज भी है जिसे होने वाले रंग महोत्सवों में आसानी से देखा जा सकता है। आज देश भर में सालों भर कोई न कोई रंग महोत्सव चलता ही रहता है, और यह केवल महानगरों में ही नहीं, छोटे -छोटे शहरों तक चल रहा हैं। इन रंग महोत्सवों में किस तरह के नाटक हो रहे हैं, इनका मूल उद्वेश्य क्या है, जानना जरूरी है। या कहिए, विश्लेषण करने की जरूरत है कि ये रंग महोत्सव किस मकसद को लेकर किये जा रहे हैं।
मीडिया में अधिकतर जिन रंग महोत्सवों की चर्चा रहती है, वे सत्ता से जुड़ी हुई ही होती हैं। स्थानीय पहलकदमी व जन सरोकारों से जुड़े जो रंग महोत्सव होते हैं, भले वे आम जन मानस में लोकप्रिय होते हैं, तथाकथित मीडिया से दूर ही रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से, जब से अन्य विधाओं की तरह रंगमंच में प्रतिरोध का स्वर उठा है, सत्ता की तरफ से यह प्रयास होने लगा है कि कैसे प्रतिरोध के स्वर को भोथरा कर दिया जाए, उसका रूप विकृत कर दिया जाए, चरित्र ही बदल दिया जाए। नुक्कड़ नाटक की आज जो दुर्गति है, सत्ता की उसी साजिश का ही परिणाम है। जब से विदेशी पूंजी हमारे मुल्क में बेरोक-टोक आने लगी है, उदारवाद के बहाने बंहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमारे घरों में घुसने लगी हैं, लोग आर्थिक रूप से कमजोर होने लगे हैं, कृषि उद्योग जर्जर होने लगे हैं, मजदूर बेरोजगार होने लगे हैं, किसान जमीन के सवाल को लेकर सड़क पर आ गये हैं। जिस तरह जर-जमीन-जंगल को लूटने का षडयंत्र हो रहा है, उसके प्रतिरोध में केवल संगठन ही नहीं, अब कला व संस्कृति भी आने लगी है। नाटक के इस स्वर को कुंद करने के लिए सत्ता वर्ग पिछले कुछ वर्षों से अनवरत प्रयास में है। विदेशी पूंजी भी इनकी ताल में ताल मिला रही है। ऐसे अनेकों विदेशी फाउन्डेशन के नाम अब तो स्पष्ट सामने आ गये हैं जिनका एक ही मकसद है- बड़े- बड़े रंग महोत्सवों की आड़ में प्रतिरोध की संस्कृति को परम्परा की जड़ की तरफ ढ़केलना। ( समकालीन रंगमंच में प्रकाशित प्रख्यात नाटककार और संस्कृतिकर्मी राजेश कुमार के आलेख "महोत्सवों का वर्गीय चरित्र" से। )

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

पेंसिल से ब्रश तक - राजेश चन्द्र


प्रस्तुति का एक दृश्य 

एक भारतीय के तौर पर शर्मिंदा होने के लिए इतना कम नहीं कि भारत का एक ख्यात सपूत जिसे दुनिया भारत का पिकासो मानती है, उस मकबूल फिदा हुसैन को अपनी आखिरी सांसें भारत में लेने का अवसर नहीं मिला। यह उनकी आखि़री इच्छा थी। एक हिन्दू के तौर पर तो यह और भी शर्मिंदा होने की बात है कि जिस धर्म की पहचान उसकी सहिष्णुता और सामंजस्य की वजह से थी, उसके कुछ तथाकथित झंडाबरदारों ने हुसैन की चित्रकला पर धर्मविरोधी होने का फतवा जारी किया क्योंकि हुसैन कुछ अलग ढंग से सोचने वाले मुसलमान थे। हिन्दुत्व की संघी शैली कलाकारों और साहित्यकारों को किसी भी किस्म की आजादी देने के पक्ष में नहीं रही है। भारतीय जनता ने मांग रखी थी कि हुसैन का पार्थिव शरीर भारत लाया जाए और उसे दिल्ली की जामा मस्जिद के निकट दफनाया जाए, पर सरकार का कहना था कि ऐसा करना सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक होगा। भारतीय राजनीति के पाखंड और धर्मांधता के आगे आत्मसमर्पण का यह एक विरल उदाहरण है। सरकार ने एक ऐसे कलाकार को जिसे भारत रत्न कहने से ज्यादा गौरवशाली कुछ नहीं हो सकता था, महज पद्मश्री के लायक माना। पर इस कृत्य से भारत के जनमानस में शीर्ष स्थान पर प्रतिष्ठित हुसैन का अपमान किया जाना कभी संभव नहीं होगा जो उसे अपना आत्मीय और श्रेष्ठ चितेरा मानता है।
एम.एफ. हुसैन की जो छवि जनमानस में बसी है उसमें वे एक जिप्सी नजर आते हैं-साफ-शफ्फाक वस्त्रभूषा, लंबी-सी एक पारंपरिक कूंची, जिसे वे एक सोंटे की तरह उपयोग में लाते थे और नंगे पैर चलने की उनकी सनक। उनका मनमौजी और दबंग व्यक्तित्व उनके चित्रों में भी प्रतिबिम्बित होता है। उनकी आश्चर्यजनक प्रसिद्धि के पीछे उन विवादों की भी बड़ी भूमिका रही जो साये की तरह उनके साथ लगे रहे और जिनकी वजह से उन्होंने आत्मनिर्वासन तक की यात्रा की। महाराष्ट्र के पंढरपुर में 17 सितंबर 1915 को जन्मे एम.एफ. हुसैन के वालिद साहब एक एकाउंटेंट थे। हुसैन जब सिर्फ 18 महीने के थे, उनकी मां जुनैब दुनिया से रुखसत हो गईं थीं। उनकी कोई तस्वीर तक मौजूद नहीं थी और जब हुसैन बड़े हुए तो उन्हें मां का चेहरा तक याद नहीं था। यही वजह है कि हुसैन ने उम्र भर जितनी भी स्त्री छवियां गढ़ीं कभी भी उनका चेहरा नहीं उकेरा। एम.एफ. हुसैन की चित्रकला पर यूरोप के आधुनिकतावादियों का प्रभाव स्वीकार किया जाता है। उनके विषय, जो श्रृंखलाओं में अभिव्यक्त होते रहे हैं-उनमें इतनी विविधता पाई जाती है कि आश्चर्य होता है। महात्मा गांधी से लेकर मदर टेरेसा, रामायण, महाभारत, अंग्रेजी राज और भारतीय ग्रामीण तथा शहरी जीवन के चित्रणों से समृद्ध उनकी चित्रकृतियों की संख्या 60,000 से भी अधिक है।
मुम्बई के ख्यात नाट्य दल ‘एकजुट’ द्वारा विगत 13 से 22 अप्रैल के बीच दिल्ली के श्रीराम सेंटर में आयोजित ‘एकजुट नाट्य समारोह’ के अंतर्गत 13 और 14 अप्रैल को वरुण गौतम द्वारा लिखित और नादिरा ज़हीर बब्बर द्वारा निर्देशित नाटक ‘पेंसिल से ब्रश तक’ का मंचन किया गया। फिल्म और टीवी की दुनिया के कई चर्चित अभिनेताओं की उपस्थिति वाले इस नाटक में अत्यंत सुरुचिकर और प्रभावशाली तरीके से चित्रकार एम.एफ. हुसैन के जीवन का प्रस्तुतीकरण किया गया। नाटक हुसैन के उस विलक्षण कला-जीवन को समेटने का एक स्तुत्य प्रयास है, जो एक छोटे से गांव पंढरपुर से शुरू होकर दुनिया की महानतम ऊंचाइयों तक फैला हुआ है। नाटक में हुसैन के जीवन के तीन चरणों को क्रमशः अरुण गोंडारकर (बाल्यकाल), अनूप सोनी (युवावस्था) और टाम आल्टर (उत्तरकाल) जैसे समर्थ अभिनेताओं ने प्रस्तुत किया। इनके अतिरिक्त अन्य सहयोगी भूमिकाओं में जूही बब्बरसोनी और हनीफ पटनी ने भी हुसैन के विविध जीवन प्रसंगों को रूपाचित करने में अहम भूमिका निभाई।
नाटक ‘पेंसिल से ब्रश तक’ हुसैन के पंढरपुर गांव वाले पुश्तैनी घर से प्रारंभ होता है जहां मातृहीन बालक मकबूल अपने बाबा के आत्मीयता और वात्सल्य के गर्माहट भरे संरक्षण में पलते हुए कला और स्वाभिमानी जीवन का प्रारंभिक पाठ पढ़ता है। अपने वालिद की दूसरी शादी और नई मां के आगमन से असहज स्थिति जीते हुए मकबूल के कोमल और एकाकी मन पर तब एक और वज्रपात होता है जब उसके एकमात्र भावनात्मक संबल बाबा भी उसे छोड़ जाते हैं। इस आघात के अवसाद से मकबूल अभी मुक्त भी नहीं होता कि उसके वालिद उसे बोर्डिंग स्कूल भेजने का फैसला सुना देते हैं। इस नाटकीय घटनाक्रम में निर्णायक मोड़ तब उपस्थित होता है जब 19 वर्ष की उम्र में संभावनाओं की एक नई ज़मीन तलाशने मकबूल सपनों के शहर मुंबई चले आते हैं। मुंबई के बीहड़ फुटपाथों पर रात गुज़ारते हुए हुसैन सिनेमा के होर्डिंग बनाने का काम शुरू करते हैं और उनकी गुमनामी के दिन तब समाप्त होते हैं जब वे 1947 में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप में शामिल होते हैं। फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा के नेतृत्व में चला यह आंदोलन भारतीय कला जगत में इसलिए एक खास मुकाम रखता है क्योंकि इसने न सिर्फ भारतीय चित्रकला को पारंपरिक और रूढ़ बंगाली शैली से मुक्ति दिलाई बल्कि उसे एक आधुनिक पश्चिमी शैली से अनुप्राणित भी किया। हुसैन ने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1952 में ज्यूरिख़ की एकल चित्र प्रदर्शनी ने विश्व स्तर पर एक महानतम चित्रकार के तौर पर उनकी विलक्षण यात्रा को नित नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने की पटकथा रच दी।
एम.एफ. हुसैन उन गिने-चुने व्यक्तियों में आते हैं जो आजीवन भारतीय सभ्यता की बहुधार्मिक, समन्वित संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रति समर्पित रहे। अपनी हरेक सांस में वे आधुनिकता, प्रगति और सहिष्णुता जीते रहे। उनके निर्वासन का संपूर्ण कथासार हमारी प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था की असफलता को उजागर करता है जिसने उनकी सुरक्षित वतन वापसी को असंभव बना दिया। यह पूरी कथा अभिव्यक्ति की आज़ादी, सृजनात्मकता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की पराजय-कथा है। यह संघी हिन्दुत्व के उस फासीवादी एजेन्डे की एक ज्वलंत प्रस्तावना है जो प्रजातांत्रिक मूल्यों को कुचल कर एक धर्मांध राष्ट्र के निर्माण के लिए संकल्पित है। प्रस्तुति में हुसैन के जीवन संघर्ष के इस अनिवार्य पक्ष पर जिस तरह की खामोशी है वह स्तब्ध करती है।

राजेश चन्द्र 
राजेश चन्द्र रंगकर्मी, नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, अनुवादक एवं पत्रकार | पटना रंगमंच से लंबे समय तक जुडाव | विगत दो दशकों से रंग-आन्दोलनों, कविता, संपादन और पत्रकारिता में सक्रिय | हिंदी की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, आलेख तथा समीक्षाएँ प्रकाशित | वर्तमान में दिल्ली में निवास | दैनिक समाचार पत्र "दैनिक भास्कर" के दिल्ली संस्करण के लिए रंगमंच विषय पर नियमित लेखन | उनसे rajchandr@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है |२१ अप्रैल २०१२ को दैनिक भास्कर में प्रकाशित.

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

मनुष्यता के संहार का उत्सव और आधा चांद -- राजेश चन्द्र

प्रस्तुति का एक दृश्य 
वैश्वीकरण बाजार के सार्वभौमत्व के दर्शन पर आधारित है। यह हर चीज़ को यहां तक कि सांस्कृतिक रचनाओं को भी विकाऊ माल में बदल देता है। यह मुख्यतः नई तकनीक जिसे लोकप्रिय भाषा में आईटी कहा जा रहा है, से पैदा हो रहा है। यह सूचना तकनीक वित्तीय लेन-देन में तीव्रता लाने के कारण सारी दुनिया को बाजार से जोड़ देती है। अब लक्ष्य मानव मुक्ति के लिए जनता के बीच एकजुटता नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के रूप में व्यक्तियों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता ही आज के समाज का नियम है। परस्पर सहयोग पर नहीं बल्कि अंतहीन प्रतियोगिता पर टिका होगा।वैश्वीकरण की विचाराधारा को आज जनता की चेतना में वैश्वीकरण से जुड़े सांस्कृतिक हमलों के साथ निरंतर ढाला जा रहा है। केबल टीवी से जुड़ा हमारे देश के मध्यम वर्ग का प्रत्येक घर बुर्जुआ मूल्यों की पाठशाला बन गया है और विज्ञापन तथा प्रचार तबाही की उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। कहा जा रहा है कि जो लोग वैश्वीकरण की यात्रा में शामिल नहीं होंगे वे तकनीकी, आर्थिक और सांस्कृतिक लिहाज से पिछड़ जाएंगे। इसके अनुसार वैश्वीकरण की चालिका शक्ति सर्वशक्तिमान सूचना तकनीक है और भविष्य उन्हीं का है जो इस तकनीक में पारंगत हो जाएंगे। यह वस्तुतः पूंजीवादी समाज व्यवस्था के विकास का एक चरण है जिसका प्रभावी उपकरण है विज्ञापन। इसमें विचारों, अभिरुचियों, इच्छाओं और मूल्यों की सांस्कृतिक विचाराधरा के रूप में अभिव्यक्ति होती है। वह भविष्य के सपनों को जगाता है और बार-बार पुनरावृत्ति के द्वारा उन्हें सामाजिक विश्वास में बदल देता है। इस तरह जो संरचना तैयार होती है वह पाशविकता और अमानवीयता के मूल्यों का सृजन करती है।विज्ञापन में व्यक्त अर्थहीनता से असहनीय और हतोत्साहित करने वाला परिवेश निर्मित होता है जिसमें व्यक्ति के बजाए वस्तु को सर्वशक्तिमान करने वाला परिवेश निर्मित होता है और मनुष्य को वस्तुओं के आगे समर्पण करने के लिए तैयार किया जाता है। यहां जिस सौंदर्य या सुंदरता की अभिव्यक्ति होती है वह वस्तुतः यथर्थ से पलायन है। इसके तृप्तिदायक चित्र व्यक्ति को आभिजात्य समाज की आभासी आनंदावस्था में ले जाते हैं। विज्ञापन में दर्शाया जाने वाला आभिजात्यवाद पूरी तरह खोखला है जिसकी अंतर्वस्तु मर चुकी है। विज्ञापन का समाज आभिजात्यों का समाज है जिसमें भावुकता और मिथ्या भावमयता का बोलबाला है और यह रूप पूंजीवादी व्यवस्था के अमानुषीकरण की बृहत्तर प्रक्रिया का ही अंग है।
विगत 28 और 29 मार्च को श्रीराम सेंटर के द्वितीय वर्ष के छात्रों द्वारा प्रस्तुत किए गए नाटक ‘आधा चांद’ में बाजारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया में यथार्थ को अयथार्थ में और मनुष्य को अमानुष में बदल देने की अमानवीयता को उजागर करने का श्रमसाध्य प्रयास किया गया है। नाटक बाजार-चेतना से जुड़े व्यक्तिवाद पर करारा प्रहार करता है, जिसे सिर्फ प्रभाव की चिंता है और वह दुनिया को बदलना नहीं चाहता। प्रख्यात नाटककार, निर्देशक और सामाजिक कार्यकर्ता त्रिपुरारी शर्मा द्वारा लिखित निर्देशित यह नया नाटक कुशलता के साथ चित्रण करता है कि पूंजीवादी समाज में केवल वस्तुओं का मूल्य होता है और मनुष्य भी वस्तुओं के बीच में एक वस्तु बन जाता है। इतना ही नहीं वह उन वस्तुओं में भी सबसे ज्यादा नपुंसक, सबसे ज्यादा घृणास्पद वस्तु बन जाता है और वस्तु का विज्ञापन उसे तर्क-बुद्धि के बजाए तर्कातीत दिशा की ओर ले जाता है। अंततः वह एक ऐसे समाज का प्रवक्ता बन जाता है जिसमें सफलता ही सब कुछ है मनुष्य कुछ भी नहीं। इस तरह एक ऐसे व्यक्ति की मनोसंरचना तैयार होती है जो समाज में किसी का भी नहीं होता और न ही उसकी कोई विशिष्ट पहचान होती है। अपनी परिणति में वह सामाजिक उत्तरदायित्वों और विचारधाराओं से पलायन कर जाता है। खुद को वह एक ऐसे काल्पनिक पर्दें में कैद कर लेता है जिसके बाहर आसपास की चीजों और व्यक्तियों की पहचान धुंधली हो जाती है। वस्तु को सामाजिक हैसियत से जोड़ कर पेश करने की मानसिकता उसे उस विचाराधारा का एक औजार बना देती है जिसका मूलमंत्र है भोग करो, खूब भोग करो और मर जाओ।नाटक की कथा के केंद्र में कॉल सेंटर में कार्यरत युवाओं का एक समूह है जो अपनी आकांक्षाओं, सपनों और अस्तित्व के लिए जूझता हुआ उस अनिवार्य विडंबना का शिकार बन जाता है जिसे बाजार और वैश्वीकरण की शक्तियों ने उसके लिए निर्धारित कर रखी है। वास्तविक दुनिया और वर्चुअल स्पेस के बीच की असंगति, विरोधाभास और तर्कहीनता में जीते हुए इन युवाओं की सारी संभावनाएं कारपोरेट्स की अनियंत्रित और अमानुषिक प्रतिस्पद्र्धा सोख लेती है और वे रीढ़विहीन होकर खुद को इस अंतहीन दलदल में धंसता हुआ चुपचाप देखते रह जाते हैं। दिन के दस घंटे अंग्रेजी बोलते,  फास्ट फूड खाते, एयरकंडीशन का मज़ा लेते और एक सुरक्षित लगने वाली दुनियां में जीते हुए वे झूठ बोलने के अभ्यस्त हो जाते हैं और यह झूठ उनकी निजी जिंदगियों में शामिल हो जाता है। वास्तविक जीवन का नाटक और आभासी स्वर्ग एक सम्मोहन उन्हें एक ऐसी हास्यापद स्थिति में ला देता है जहां वे अपने ही संहार का उत्सव मनाने के लिए अभिशप्त होते हैं।निर्देशक त्रिपुरारी शर्मा ने प्रस्तुति की शैली विसंगतिवादी रखी है जिससे संवादों की अर्थध्वनियों का सूक्ष्म और प्रभावोत्पादक निरूपण संभव हुआ है। त्रिपुरारी शर्मा लंबे समय से हिंदी रंगमंच में सक्रिय तो हैं ही एक सजग और संवेदनशील नाटककार तथा निर्देशक के तौर पर भी उनकी काफी प्रतिष्ठा है। अपने नाटकों में अक्सर वे ऐसे चरित्र और स्थितियां लेकर आती रही हैं जिन्हें दर्शक पहचानते भी हैं और जिनके बाहरी और भीतरी संघर्ष को समझ कर उससे अपने आप को जोड़ते भी रहे हैं। उनके नाटक सचमुच के जीवित इंसानों की जिंदगी की सच्ची और विश्वसनीय तस्वीर पेश करते हैं पर हाल के दिनों में उनके नाटकों का रूप जटिल और दुरूह होता गया है जिसके कारण आम दर्शक नाटक से जुड़ नहीं पाते। इस क्रम में उनके दो नाटकों बीच शहर और आधा चांद का नाम लिया जा सकता है जिनमें एक विशिष्ट प्रकार की नाट्य-युक्तियों और शिल्प पद्धतियों का अत्यधिक प्रयोग सामने आया है और इस कारण वे विशिष्ट प्रकार के दर्शकों को ही आर्कषित करने में कामयाब हुए हैं। यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इसके पीछे कलात्मकता, उद्देश्यपरकता अथवा व्यावसायिकता का कोई दबाव काम कर रहा है। निश्चित रूप से वे किसी नई रंगभाषा के अन्वेषण में जुटी हो सकती है, पर इस प्रक्रिया में दर्शकों की उपेक्षा के प्रश्न पर भी उन्हें गंभीरता से सोचना होगा।


राजेश चन्द्र 
राजेश चन्द्र रंगकर्मी, नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, अनुवादक एवं पत्रकार | पटना रंगमंच से लंबे समय तक जुडाव | विगत दो दशकों से रंग-आन्दोलनों, कविता, संपादन और पत्रकारिता में सक्रिय | हिंदी की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, आलेख तथा समीक्षाएँ प्रकाशित | वर्तमान में दिल्ली में निवास | दैनिक समाचार पत्र "दैनिक भास्कर" के दिल्ली संस्करण के लिए रंगमंच विषय पर नियमित लेखन | उनसे rajchandr@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है | आलेख दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित |