रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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सोमवार, 5 नवंबर 2012

तुगलक की तुगलकी !


उम्मीदों पर कितना खरा उतरा तुगलक ? पड़ताल जारी है. प्रस्तुत है तुगलक पर युवा कहानीकार व रंग दर्शक आलोक झा  की प्रतिक्रिया. 

फिरोजशाह कोटला किले में नाटक तुगलक के इस प्रदर्शन को भानू भारती का कहें या गिरीश कर्नाड का ! भानू ने चूँकि इसे निर्देशित किया इसलिए तत्काल तो हम इसे उन्हीं से संबद्ध कर के देखते हैं । लेकिन यह नाटक किसी भी निर्देशक से ज्यादा कर्नाड का नाटक है । कारण है उनका तर्कपूर्ण कल्पनाशीलता से भरा लेखन ! मुहम्मद बिन तुगलक के संबंध में इतिहास सबके लिए उतना ही उपलब्ध है जितना गिरीश के लिए परंतु उन्होंने इसके बीच से जिस प्रकार कथा-सूत्र निकाले हैं वह इतिहास में नहीं है । इतिहास के कथानक को उससे बाहर जाकर भी ऐतिहासिक रूप से निर्मित कर जाना लेखक की सफलता की पहचान है । मुहम्मद बिन तुगलक के संबंध में जितनी कहानियाँ और अफवाहें प्रचलित है उनमें कोई तारतम्य नहीं है वे सब कुछ घटनाएँ हैं जो अलग- थलग बिखरी पड़ी हैं |लेखक ने उनके बीच अपनी कल्पना से जो दृश्य निर्मित किए हैं वे कतई उस काल और घटनाओं से बाहर के नहीं लगते हैं । ऐसे कथानक पर काम करना किसी भी निर्देशक और कलाकार के लिए कठिन नहीं रह जाता ! कोटला किले में इस नाटक का प्रदर्शन निर्देशक को इस बात की अतिरिक्त सुविधा देता है कि वह आसपास के वातावरण का अधिकतम उपयोग कर सके । लेकिन यह सुविधा दर्शकों के लिए कष्टकारी हो जाती है । उनके लिए बार बार अपना फोकस नए तरीके से बदलना एवं उनकी महत्वपूर्ण दृश्यों से बहुत ज्यादा दूरी नाटक का रस ग्रहण करने में व्यवधान की स्थिति निर्मित कर रहे थे । और कभी कभी तो दर्शक केवल संवाद पर निर्भर थे ।
इस नाटक को कर्नाड ने मूल रूप से कन्नड में लिखा था जिसका हिंदुस्तानी में अनुवाद ब.व.कारंत ने किया । कारंत के काम की जितनी भी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है संवादों से कभी लगा ही नहीं कि यह अनूदित नाटक है मूल नहीं ! जबकि इधर कुछ नाटक तो बहुत ही वाहियात रूप से देश की सबसे बड़ी नाट्य संस्था एनएसडी के देखे जिसके हिंदुस्तानी में अनूदित संवाद कभी दर्शकों को जोड़ ही नहीं पाए ! जब ऐसी स्थिति बनती है तो दृश्य पर दबाव बढ़ जाता है क्योंकि दर्शकों जो ग्रहण करना है वह संवाद की तरफ से तो कम ही हो जाता है । पर एक अच्छे अनुवाद ने ऐसी किसी भी स्थिति को उपस्थित ही नहीं होने दिया ! दृश्य कलाओं में खासकर नाटकों में कलाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है । अंततः उन्हीं के माध्यम से ही तो लेखक और निर्देशक दर्शकों से संवाद स्थापित करते हैं । 'तुगलक' के इस प्रदर्शन में कलाकारों ने जो अभिनय प्रस्तुत किया वह सहज रूप बेहतरीन नहीं कहा जा सकता । हालाँकि जिस तरह से रंगमंच और , सिने जगत के बहुत से लोग ले लिए गए थे उससे उच्च कोटि के अभिनय की उम्मीद थी । मुख्य भूमिका में आए यशपाल शर्मा और तीन-चार अन्य कलाकारों को छोड़ दिया जाए तो बहुत से कलाकार अपने बेहतर रूप में नहीं नजर आ रहे थे । अभिनय में लंबा अनुभव रखने के बाद भी उस दिन की प्रस्तुति में अपने अभिनय को पुराने स्तर तक नहीं ले जा पाने की कसक उन कलाकारों को भी होगी ! हिमानी शिवपुरी अपने फिल्मी स्वरूप से बाहर नहीं आ पाई, फिल्मी तौर तरीकों की आदत लगातार मंच पर भी बनी रही । वहीं यशपाल शर्मा ने अपने फिल्मी व्यक्तित्व को हत्या के एक-दो दृश्यों को छोड़कर कभी हावी होने नहीं दिया । वे तुगलक के रूप में बहुत जाँच रहे थे और जिस सहजता से उन्होंने उस चरित्र को जिया वह प्रशंसनीय है ! आगे जब भी इस नाटक का प्रदर्शन होगा यशपाल शर्मा का नाम जरूर लिया जाएगा । उन्होंने निश्चय ही मुख्य भूमिका को मुख्य रूप से निभाया । इस नाटक में सहायक कलाकारों की एक टोली भी काम कर रही थी । वे जब भी मंच पर आते लगता कि ये कलाकार किसी ऐतिहासिक नाटक नहीं बल्कि आधुनिक नाटक को अंजाम देने आए हों । समकालीन संदर्भ में इस नाटक का प्रदर्शन राष्ट्र राज्य की बहुत सी विफलताओं से संबंध जोडता दिखाई देता है । जबतक हम मुहम्मद बिन तुगलक को सकारात्मक भाव से देखते हैं तबतक वह हमें हमारे समय से बाहर दिखाई देता है । जैसे ही उसे भाव निरपेक्ष कर देते हैं उसी क्षण वह हमारी राज्य-व्यवस्था की अजीबोगरीब नीतियों का प्रतीक नजर आने लगता है । मुहम्मद बिन तुगलक के लिए लाख तर्क विकसित कर उसकी स्थिति को जस्टिफाई करने की कोशिश करें लेकिन इतना स्वीकार करना ही होगा कि उसकी नीतियाँ उसके ही मन की उपज थी और उसके पीछे कोई सुचिंतित ठोस आधार नहीं था ! सारे मामले झोंक में लिए गए निर्णयों से लगते हैं । और ठीक यहीं पर यह नाटक समकालीन हो उठता है । वह नाटक का नायक तो लगता है पर जनता का नायक नहीं हो पाता ! यहाँ सरकारी नीतियों से मिलान की स्वतंत्रता लेते हुए यह कहना अनुचित नहीं जान पड़ता कि नीतियों को लागू करने से पहले देश के सभी पक्षों के गहन अध्ययन की आवश्यकता है अन्यथा राज्य की संपत्ति को हथियाने वाले हर शासन काल में रहे हैं फिर योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं !

सोमवार, 24 सितंबर 2012

ये तस्वीर तुम्हें फिल्मों में काम दिला सकती है।


बड़ी बात बातचीत के लहजे में भी कही जा सकती है . मंडी हॉउस के हकीकत के एक अंश को बड़ी इमानदारी से पेश कर रहें आलोक झा . यह आलेख उनके ब्लॉग लोकरंजन  में शहर दिल्ली और मैं - १ शीर्षक से प्रकाशित है. - माडरेटर मंडली.

दिल्ली के मंडी हाउस इलाके को दिल्ली से बिल्कुल अलग करके देखना पड़ता है । यह आम दिल्ली नहीं है ! आरंभ में जब मैं नया नया दिल्ली आया था तो नाटकों का क्रेज था पर यह नहीं जानता था कि यहाँ नाटक होते कहाँ पर हैं ! और दूसरे यह भी कि उस समय मैं दिल्ली से अपरिचित तो था ही साथ ही दिल्ली के विस्तार से डर भी लगता था ! बाद में मंडी हाउस का पता चला कि वहाँ ढेर सारे प्रेक्षागृह हैं जहाँ नाटक आयोजित होते हैं ! इसके साथ ही यह भी कि वहाँ हर आधे घंटे में एक फिल्म बनती है , लगती है और उतरते ही अभिनेता को रातोंरात सुपरहिट बना देती है । शायद मेरे लिए ही उन दिनों सुरेंद्र शर्मा के ग्रुप ने आ 'रंगभूमि' को नाटक के रूप में पेश किया और हमारी एक परिचित उसमें एक छोटा सा किरदार कर रही थी । नाटक देखा तो पाया कि ये तो हमारे शहर के नाटकों से बिल्कुल अलग है ! मंच सज्जा तो बेहतरीन थी ! सुविधाएँ रहने पर साधारण अभिनेता भी अलग ही नजर आने लगते हैं जो मैंने बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के संदर्भ में भी महसूस की । हमारे यहाँ तो आज भी लड़की का किरदार निभाने के लिए लड़की नहीं मिलती । इसीलिए वहाँ एक तो ऐसे नाटक ही किए जाते हैं जिनमें स्त्रियों की भूमिका ही नहीं होती और यदि एक दो स्त्री चरित्र हैं तो उनकी भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं । बहरहाल जब मैं 'रंगभूमि' देखकर निकला तो मैं लगा मंडी हाउस के भूगोल को देखने ! तब वहाँ आज की तरह मेट्रो नहीं बनी थी फिर भी रोशनी और चमक - दमक का अंदाज वही था । मेरे लिए यह अनुभव बड़ा ही रोचक रहा क्योंकि उसके बाद तो उधर जाने की आदत पड़ गयी ! इस आदत को विकसित करने में रितेश का भी बराबर योगदान है । नाटकों के प्रति उसका जुनून गहरा है । उन दिनों हमारे पास दिल्ली विश्वविद्यालय का बस पास हुआ करता था सो कहीं भी कभी भी चलने में सोचने तक की आवश्यकता नहीं थी ! धीरे - धीरे मैं दिल्ली से परिचित होता गया फिर ये उतनी आक्रामक और विस्तृत नहीं रह गई ! फिर तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय , साहित्य अकादमी , त्रिवणी कला केंद्र , श्रीराम सेंटर , कमानी , एलटीजी , बंगाली मार्केट ये सब आम शब्दों जैसे लगने लगे ! इनके साथ जो महाकाव्यीय भाव थे वे सब जाते रहे ! इस इलाके में लगता था कि चाय की दुकान के आसपास मँडराने वाला कुत्ता भी अभिनेता ही है और जो उसकी चाल है वह कोई गंभीर अदा है ! मनुष्यों की तो बात जाने ही दीजिए ! श्रीराम सेंटर के पास एक चाय नाश्ते की दुकान है, उसके बाजू में एक गराज जिसके मालिक का हुक्का और उसके गुड़गुडाने का अंदाज लाजवाब ! हमारे जैसे दर्शकों के अलावा वहाँ जो भी हैं अभिनेता ही हैं । लगता है उन्हें ही देखकर शेक्सपीयर ने कहा था ' दुनिया एक रंगमंच है और हम उसके अभिनेता ' ! एक दोपहर में यूँ ही किसी इंतजार में वहीं श्रीराम सेंटर के चौराहे पर बैठा था वहाँ एक लड़की एक व्यक्ति से बातें कर रही थी । उसके हाथ में उसका पोर्टफोलियो था । व्यक्ति उसकी तस्वीरें देखता जा रहा था । वह एक फोटो पर जाकर रुख गया और कहने लगा कि ये तस्वीर तुम्हें फिल्मों में काम दिला सकती है। लड़की की आँखें चमक उठी उसने फिर से बताया कि वह कई नाटकों में अभिनय कर चुकी है । व्यक्ति ने कहा मुख्य भूमिका तो मिलना थोड़ा कठिन है पर बहन ,भाभी का किरदार तो पक्का मिल जाएगा । लड़की की आँखों की चमक थोड़ी कम हुई ! तभी वहाँ एक और व्यक्ति आया । वही रंगमंचीय पात्र एक बार को शक हो जाए कि यहाँ कोई नाटक तो नहीं चल रहा ! उसने पहले व्यक्ति को 'हाय' किया और बिना पूछे ही पोर्टफोलियो लेकर देखने लगा ! एक तस्वीर पर जाकर वह भी रुख गया । उसने कहा तुम्हारी ये तस्वीर तुम्हें लीड रोल दिला सकती है और वो मैं तुम्हें दिलाउँगा ! फिर वह उठ कर एक कोने में चला गया लड़की भी पीछे -पीछे ! बातें होने लगी ! 'सर मैंने कई नाटकों में रोल किया है ' 'तुम मेरे घर पर क्यो नहीं आती ! वहीं बातें करते हैं । डरो मत मेरे पत्नी भी है तुम्हारी तो बहन ही हुई !' बड़ी चालाकी से वह लड़की साली बना ली गई थी ! थोड़ी देर बाद सब जाने लगे । जाते जाते लड़की ने अगले संडे उस व्यक्ति के घर आने का वादा भी दिया ! मेरा इंतजार जारी था !