रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

16वें भारत रंग महोत्सव का 14वां दिन

भारंगम के चौदहवें दिन भी स्त्री केंद्रित प्रस्तुतियों का सिलसिला जारी रहा. इस क्रम में दो प्रस्तुति कोलकाता से ही थी. एक बांग्ला में पार्थप्रतिम देब निर्देशित नांदिकार की प्रस्तुति नाचनीतो दूसरी रमनजीत कौर निर्देशित बावरे मन के सपने’. नाचनी इस भारंगम की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति रही.  अधिक लंबाई के बावजूद दर्शकों को बांधे रखा.  प्रस्तुति में बांग्ला रंगमंच के स्टार अभिनेता रूद्रप्रसाद सेन गुप्ता, स्वातिलेखा सेन गुप्ता, सोहिनी सेन गुप्ता, देब शंकर हालदार आदि अभिन्य कर रहे थे.  ‘नाचनीनाचने वाली स्त्रियों के बारे में है. नाचनी की स्थिति के बारे में उम्र के ढलान पर खड़ी कुसमी बराबर कहती है कि नाचनी का कोई मां नहीं, बाप नहीं, बंधु नहींयानी उसके लिये रिश्ते नहीं है. वह केवल दर्शकों के मंनोरंजन के लिये है. नाचनियों की स्थिति इतनी कठीन है कि मौत के बाद  उनका अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता. लेकिन इस प्रस्तुति में कुसुमी को विस्थापित करने आई बिजुली बाला उसका अंतिम संस्कार करने की ठानती है और सामाजिक जड़ता को चुनौती देती है. प्रस्तुति नाचने वाली स्त्रियों के बहाने समाज की जाति व्यवस्था और पितृसत्ता और पुरूषों कि प्रवृति की आलोचना करता है. नाचनेवाली स्त्रियां हमेशा समाज के निचली जाती से आती हैं इसलिये वो दोहरे शोषण का शिकार हैं. उसका शरीर सबके लिये उपभोग्य है.  नाचने से इतर उसकी कोई भूमिका नहीं. मंच के पिछले हिस्से पर सांकेतिक दृश्य की गई है. नाटक की प्रस्तुति प्रक्रिया का संकेत प्रस्तुति में ही है. नाच की तैयारी और नाच की प्रस्तुति से आख्यान बनता और  टूटता है, संगीत प्रस्तुति को जोड़ती है. पात्रों की गति और प्रवेश प्रस्थान को एक लय दिया गया है. यह प्रस्तुति बताती है कि अनुभवी अभिनेता कभी भी अपने आप को शैली विशेष में बांधते नहीं वे प्रस्तुति की योजना के अनुसार अपने को बदलते रहते हैं. प्रस्तुति के दौरान आत्म विसर्जित होने को आतुर कुसमी की भूमिका मेम स्वातिलेखा जब दर्शकों के बीच से गुजरती हैं या बिजुली बाला कुसमी के मौत पर विलाप करती है तो रूह सिहरा देती हैं.
बावरे मन के सपनेमध्यमवर्ग की महिलाओं के  शांत से दिखते जीवन में चल रहे उथल पुथल की टोह लेता है. नाटकीय आख्यान के विकसित होने के क्रम में उन्हें उद्घाटित करते हुए चलता है. इस नाटक की प्रस्तुति प्रक्रिया में सभी महिलाएं शामिल है, इसलिये विवरण प्रभावी और प्रामाणिक लगते हैं यद्यपि इनमें कुछ क्लिशे बन चुके दृश्यों और घटनाओं का भी जिक्र है. अभिनेता भी अपेक्षाकृत कम अनुभवी है . नाटक  का आलेख अभिनेता के अनुभवों और कुछ महिला लेखन को आधार बना कर विकसित किया गया है.  दृश्यबंध में महिलाओं का स्पेस बनाय अगया है. इसमें अचार बनाती, पापड़ बेलती, पेंटिंग करती, कपड़े धोती, तकिया बनाती, गिटार बजाती और शापिंग कर के लौटती हुई महिलांए है. इनको जोड़ने वाली केंद्रिय पात्र अम्मा है जो अपनी बेटी से मिलने के लिये लंदन जाने की तैयारी कर रही हैं. इस तैयारी के क्रम में ही ये पात्र अपने जीवन के कटु  यथार्थ को एक दूसरे से साझा करते हैं. प्रस्तुति इस बात उभारती है कि मध्यमवर्गीय घर की ये महिलाएं अपने छॊटे छोटे सपनों को अक्सर दबाती आई हैं. अपनी इच्छा को स्थगित किया है लेकिन फिर भी इनसे अतिरिक्त मांग की गई है. इनका दमन हुआ है और इनमें इसी तरह जीने का आदत डाली गई है, इनमें से कुछ ऐसी भी है जो इस आदत से तंग आ कर इस घेरे को तोड़ देना चाहती हैं.   प्रस्तुति में कभी कभि अतिरेक लगता है कि लेकिन अब के हालात में यह बताना आवश्यक है कि पितृसत्ता की स्वतंत्रता और महात्वकांक्षा के भवन पर किसकी वेदना सिसक रही है. बावरा मन देखने चला एक सपना स्थिति को पूरी तरह से अभिव्यक्त करता है. रमनजीत कौर के निर्देशन में नीलम मान सिंह चौधरी का स्पष्ट असर है, उनकी परिकल्पनाओं में ही उन्होंने दृश्य रचे हैं.

अमितेश कुमार का यह आलेख रंगविमर्श ब्लॉग से साभार. अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

रविवार, 19 जनवरी 2014

16वें भारत रंग महोत्सव का 13वां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख रंगविमर्श ब्लॉग से साभार. अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

हमारे समय में आदिवासी जीवन या उनके परिवेश पर आया संकट नया नहीं है इसके स्रोत एतिहासिक हैं. आधुनिक समय के इस संकट का करीबी रिश्ता अंग्रेजी शासन से जुड़ता है जब उसने जंगल की सामग्रियों की राज्य की संपति घोषित कर दिया, जमीन का बंदोबस्त करके स्थानीय सामंत पैदा किये जिसके तले मेहनतकश जातियां जो इन जमीनों या वनोपजों पर निर्भर थी, उनके शोषण का मार्ग खोल दिया. आदिवासियों को पता चला कि ये नदिया उनकी नहीं है ये तेंदू पत्ते उनके नहीं है. लकड़ी के लिये सरकार की इजाजत लेनी पड़ेगी. झूम खेती वह नहीं कर सकते. उनकी दिनचर्या और पेशेवर जीवन का तरीका राज्य के नियमों के हिसाब से अपराध हो गया. लेकिन इस सबके साथ अंग्रेजों ने इसाई मिशनरी को इनके जीवन में प्रवेश कराया जो इन्हें अंग्रेजी शासन के अनुकूल करने  और व्यापक पैमाने धर्मांतरण कराने की कोशिश की जो हुआ भी. लेकिन उत्पीड़न और शोषण ने आदिवासियों समुदायों को विद्रोह के लिये भी प्रेरित किया. बिरसा मुंडा इन विद्रोहों के अग्रणी नायक है जिन्हें भगवान का दर्जा दिया गया है. हृषिकेश सुलभ रचित और संजय उपाध्याय निर्देशित प्रस्तुति ‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा के बहाने आदिवासियों की स्थिति और उनकी संघर्ष चेतना को दिखाता है. प्रस्तुति बिरसा के बनने के कारणों में जाती है कि बिरसा को धरती आबा बनने की जरूरत क्यों पड़ी ? फिर वह उसके संघर्ष की व्यापकता को प्रस्तुत करता है. जंगलों पर साहबों दिकुओं का कब्जा,  अंग्रेजों के कानून जिसने जगंल के लोगों से जंगल को छीन लिया है से बिरसा व्यथित हो जाते हैं. अपने लोगों की व्यथा उसे विद्रोह के लिये प्रेरित करती है और उनका विद्रोह पहले अपने ही भगवान और अंधविश्वासों से होता है. क्योंकि वह जानते है कि ये सब आदमी के द्वारा बनाये गये हैं. और भूख से बड़ा कोई भी नहीं है. प्रस्तुति इस बात पर जोर देती है कि नायक और भगवान समाज द्वारा गढ़े जाते हैं और वे ऐसे लोग होते हैं जो अपने समाज के दुखों को दूर करने का प्रयास करते हैं. बिरसा जीते जी भगवान बन जाते हैं. जंगलों में आदिवासियों को संगठित कर अन्याय का प्रतिकार करते हैं. प्रस्तुति में ऐतिहासिक तथ्यों का भी व्यापक ब्यौरा है. प्रस्तुति का संचालक सूत्रधार है जो धानी की भूमिका में भी बदलता रहता है. धानी बिरसा के संघर्षों का साक्षी भी है. धानी की भूमिका में शुभ्रो और बिरसा मुंडा की भूमिका में सुमन ने उम्दा अभिनय किया है.  अन्य अभिनेता इनका उस तरह साथ नहीं दे पाते.  नाटक का संगीत पक्ष उम्दा है, यह संजय उपाध्याय की शैली की विशेष बात है. रंग संगीत को वह नाटकीय आख्यान के अनिवार्य अंग की तरह बरतते हैं.  संगीत में आदिवासी धुनों और गीत हैं जो  कथ्य के साथ साथ परिवेश को आधार देते हैं. उल्लेखनीय पक्ष है सारंगी की आवाज जो नाटक के मार्मिक स्थलों को गहराई देती है.  नाटक में ऐसे अनेक कार्यव्यापार है जिसको नेपथ्य में होना चाहिये था. मंच पर इनका कुशल संयोजन नहीं होने से यह अनावश्यक भाग दौड़ की तरह लगता है. प्रस्तुति में वर्तमान से जुड़ने की जबरदस्त संभावना है लेकिन यही यह कमजोर पड़ जाती है. आदिवासियों को उनके परिवेश से बेदखल करने के लिये नये नये कानून राज्य द्वारा आरोपित किये जा रहे हैं. बिरसा के लौटने का यह अनुकूल समय है, जब उनका समुदाय  राज्य और उग्रवादियों के बीच फंस गया है. उन्हें बिरसा के नेतृत्व की जरूरत है. प्रस्तुति इसके रेखांकन में विफ़ल है.
भारंगम में इस बार नाट्य प्रदर्शनों के साथ  नाटक जगत से जुड़ी अन्य गतिविधियां भी हो रही हैं, इस क्रम इसी क्रम में महेश दत्तानी की किताब ‘मी एंड माइ प्लेज’ का विमोचन एल.टी.जी. प्रेक्षागृह में हुआ और इसके बाद संजय महर्षि के द्वारा रंगमंच पर बनी चार वृतचित्रों  का भी प्रदर्शन किया गया.  

शनिवार, 18 जनवरी 2014

16 वें भारत रंग महोत्सव का ग्यारहवां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख रंगविमर्श ब्लॉग से साभार. अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

जन संहार के अस्त्रों की वैश्विक होड़, वर्चस्व की आकांक्षा, जंगलों की सफाई, जंगल बनते शहर, जान, ये सब ऐसे प्रश्न है जो  दिन प्रति दिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहे हैं. अधिकांश जीवन इनसे गाफ़िल हो कर क्षण को पकड़ने में व्यस्त है. बांग्ला प्रस्तुति ‘हे मानुष’ मनुष्यों द्वारा व्यापक संहार के हथियारों के निर्माण और उससे होने वाले विनाश को अपनी विषयवस्तु बनाता है. इसे प्रदर्शित कतने का संदर्भ बिंदू महाभारत और दूसरा विश्व युद्ध है. महाभारत का संदर्भ ‘अंधा युग’ से लिया गया  है जिसे दूसरे विश्व युद्ध के साये में मनुष्य के अस्तित्व पर आये संकट और मनुष्यता को बचाने की चिंता के साथ लिख अगया था. प्रस्तुति भी ‘अंधा युग’ में वर्णित भविष्य के आसन्न संकट और दूसरे  विश्व युद्ध में हुए हिरोशिमा और नागासाकी विस्फोट की विभिषिका को चित्रित करते हुए मनुष्य की निजता की खोज का संदेश देती है. लेकिन प्रस्तुति में अभिनय और दृश्य सरंचना कमजोर है.
गौरी रामानारायण की प्रस्तुति ‘नाईट्स एंड’ में रंगमंचीय भाषा की खोज और कथ्य की गंभीरता का संतुलन है. इस प्रस्तुति में त्वरा है तो ठहराव भी है.  नाटक में दो चरित्र हैं जिनके अधिकतर संवाद एकालाप में है जो इनकी अंदर और बाहर की यात्रा और उस परिवेश के बारे में बताता है  जिनसे ये घिरे हैं.  प्रस्तुति शहरों के उस लालच को दिखाता है  जिसका संक्रमण वह गांव और शहर तक भी पहूंचाता है.  शहर इस लालच को छिपा कर सभ्य बना रहता है जबकि गांव और इसकी आबादी अपराधी सिद्ध हो जाती है. कथकली नर्तक  कृष्णन अपने गांव से भाग कर दूर राजस्थान में जंगल का रक्षक बन गया है. अपने एकांत में नृत्य, प्रकृति और उसके जीव उसे शांति देते हैं. कबीले की लड़की चांदनी है जो छूपकर उसका ध्यान रखती है. कृष्णन के माध्यम से प्रस्तुति कलाकार की कला के बाहर जिम्मेदारी क्या है? क्या समाज में भी कोई सक्रिय भूमिका है? इत्यादि  सवालों से जूझती है. तो चांदनी के जरिये हाशिये के कुछ समुदायों की विपन्न स्थिति से जुड़े प्रश्न पूछती है, जो अभी भी अपराधी जाति में चिह्नित हैं. इनकी जीवन शैली भी अब बचा पायेगी? उनकी बेदखली को कैसे रोका जा सकता है? सवाल पूछने से आगे यह समाधान में भी जाती है. कृष्णन  अपराधी माने जानी वाली मोगिया जनजाति, जो पहले शिकारियों को मदद करती थी, की मदद से बाघों के सरंक्षण में लग जाता है. प्रस्तुति में कुछ मार्मिक स्थल हैं जब कृष्णन अपने अतीत की वेदनाओं को कथकली के अभिनयों से जोड़ता है. अभिनय पक्ष उम्दा है. ऐसी ठहराव वाली प्रस्तुति आधुनिक रंगमंच  पर दुर्लभ है जो उद्वेलित भी करती है और शांत भी.
‘उन्हें पूरे शहर एक’ जंगल बनते हुए शहर  और उसमें पनपते मानवीय संबंधों  की कोलाजनुमा प्रस्तुति है. तेजी से पसरते हुए महानगर में जीवन कई छॊरों पर है जिसके विरोधी रंगों से  शहर बनता है. ये आपस में मिलते भी हैं लेकिन अधिकांशतः अनजान रहते हैं. इस शहर में एक सिरे पर लोग इतने अधिक विपन्न हैं कि वो हिंसात्मक हो रहे हैं.  दूसरी तरफ़ अर्थ इतना अधिक है कि उसे घोड़ों की रेस में गंवाया जा रहा है. एक तरफ़ जिंदगी गलीज मोहल्लों और गलियों में है एक आलीशान अपार्टमेंट और कोठियों में.  एक सिरे पर कौन बनेगा करोड़पति बनने के सपने देखते हुए निरंतर छले जा रहे हैं दूसरी तरफ़ वे भी है जो उन्हें छल रहे हैं.  ये अलग रंग परस्पर मिलते  भी है, अपार्टमेंट का जीवन इन झुग्गियों में रहने वालों के बिना रूक जाता है, शहर की इमारते गांवों के श्रम पर निर्भर हैं. हर तरफ़ मूल्य छीज रहे हैं विपन्नता में भी और संपन्नता में भी.  झूठ अब आदत बन चुका  है.  लालच हावी है और हर चीज की कीमत है.  शहर का जीवन इन्हीं विरोधी रंगो के मेल और उनके अलगाव से बनता है. गिरिश कर्नाड के नाटक को निर्देशक मोहित ताकलकर एक राजनीतिक दृष्टि से व्याखयायित किया है.  जनसंख्या के दबाव में फैलते शहर, उसमें बनती सड़को, कटते पेड़ों और बढ़ते यातायात  इत्यादि अनेक कोण प्रस्तुति में उभरते हैं. के  दृश्यों को शहर में पाये जाने वाले शोर , कौन बनेगा करोड़पति के धून की पार्शध्वनि के साथ जोड़ा गया है मराठी रंगमंच के दिग्गज अभिनेत इस प्रस्तुति में है जो चरित्र को उसकी निजता और समूह में भी चित्रित करते हैं. मोहित इस बार उम्मीद पर खरे हैं.  

16 वें भारत रंग महोत्सव का दसवां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख रंगविमर्श ब्लॉग से साभार. अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

सोलहवें भारंगम का उल्लेख अगर किया जायेगा तो पारम्परिक शैलियों की प्रस्तुतियों के लिये. आधुनिक प्रस्तुतियां एक के बाद एक मंच पर दम तोड़ दे रही है. साधारण प्रस्तुतियां दर्शकों को कोफ़्त में डाल रही है, चयन प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है और सवाल उठने लगा है कि क्या ऐसी प्रस्तुतियों से ही भारंगम को अंतरराष्ट्रीय मंच बनाया जाएगा? लेकिन इसी बीच पारंपरिक शैलियां दर्शकों को आनंदित कर रही हैं और ये बता रही हैं कि शैली पुरानी नहीं होती बल्कि वह् भी नवीनता से अपने को लैस करते रहती है और इन शैलियों में हस्तक्षेप कर इन्हें परिष्कृत कर व्यापक दर्शकों तक रंगमंच को पहूंचाया  जा सकता है. ऐसी ही एक प्रस्तुति भारंगम के ओपेन लान में हुई. लान की व्यवस्था को बद्ल दिया गया था. बीच में मंच बनाया गया था जिसके चारो ओर दर्शक थे. मंच के एक सिरे पर वादक मंडली बैठी थी और एक कोने से पात्र प्रवेश-प्रस्थान कर रहे थे. सुमंगलीला नाम की इस प्रस्तुति पर हिंदी सिनेमा का असर भी था. नायक की देह भाषा हिंदी सिनेमा के नायकों की तरह थी. इस नाटक में एक चमात्कारिक दृश्य भी दिखा, नायक को राक्षस के द्वारा कैद कर लिया गया है, अचानक वह कैद से छूट कर राक्षस पर हमला बोल देता है लेकिन राक्षस  उसे मार देता है. नायिका विलाप करने लगती है लेकिन अचानक उसे लगता है कि वह सपना देख रही थी. सपना के इस दृश्य का दर्शको आभास भी बाद में हुआ. यह दिखाता हुआ कि प्रस्तुति कैसे दर्शकों को अपने गिरफ्त में लिये रहती है, और मनचाही जगह पर उन्हेम ले जाती है. अभिनय शैली में मेलोड्रामा भी मौजूद है.  प्रस्तुति में तादात्मय स्थापित करने की क्षमता थी कि मणिपूरी नहीं समझने वाले दर्शक भी आनंदित हो रहे थे. कम से कम साधनों से लार्जर दैन लाईफ़ छवियां निर्मित की जा रही थी. आधुनिक रंगमंच को इन शैलियों से अभी बहुत कुछ सीखना है जो हेठी में रहती है लेकिन ये शैलियां आधुनिक रंगमंच से सीखती रहती हैं.
 ‘द डायरी आफ एन फ्रैंक’ चीन के केंद्रिय नाट्य प्रशिक्षण अकादमी की प्रस्तुति थी. प्रस्तुति यथार्थवादी शैली की है. मंच को एक डिनिंग रूम के स्पेस मे बदला गया है, जहां अधिकांश कार्यव्यापार होता है. पूरे स्पेस को विशाल पर्दे से ढंका गया है जिसे पर विडियो प्रोजेक्शन होता है. इस प्रोजेक्शन में हम द्वितीय विश्वयुद्ध की कुछ छवि देखते हैं जिसमें यहुदियों पर आये संकट की भी झलक है. अभिनेता यथार्थवादी शैली के अभिनय का प्रदर्शन कर रहे थे, चीनी अभिनेताओं  की देह भाषा यूरोपियों की तरह लग रही थी, अभिनय में संयम था और हड़बड़ी नही थी. आम तौर पर छात्र प्रस्तुति होने का जो दबाव या प्रशिक्षण की झलक  अभिनय में मिलती है वह नहीं थी. इसके लिये इस प्रस्तुति की सराहना की जानी चाहिये. गौरतलब है कि यथार्थवाद ही वह शैली है जो दुनिया के रंगमंच में एक सी पाइ आती है. एक तरफ़ यह जहां औपनिवेशिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है दूसरी तरफ़ आधुनिकता और समाजवादी समानता की आकांक्षा का भी प्रतिनिधित्व करता है. ‘द डायरी आफ एन फ्रैंक’ एक चर्चित कृति रही है. जो दूसरे विश्व युद्ध के समय  यहूदियों की स्थिति की विपन्नाता और उन पर हो रहे अत्याचार को एक किशोरी की डायरी के माध्यम से प्रकाशित करती है. एन फ्रैंक की डायरी को उसके पिता ने प्रकाशित करवाया था. यह पच्चीस महीनों के अंदर घटित घटनाओं के प्रभाव को एक कमरे में बैठ कर दर्ज करती है. दूसरे विश्वयुद्ध की घटनाओं का यहुदियों पर पड़ने वाला प्रभाव इस में दर्ज है इससे वह भय साफ़ पता चलता है जिसके साये में ये जी रहे थे. यहूदियों की जीजिविषा का भी पता चलता है. इस डायरी पर फिल्म भी बन चुकी है. प्रस्तुति स्थिति की भयावहता का वातावरण रचने में कामयाब होती है. एक ही घर में जहां राशन दिन पर दिन घटता जा रहा और लोग बढ़ गये हैं, जहां लगातार यहुदियों के मारे जाने, विस्थापित होने की खबरे आ रही हैं वहां  मानविय संवेदना कैसे बची रहती है. एन फ्रैंक इसकी केंद्रीय प्रतीक है वह  पूरानी चीजों को मिला जुला कर घर के सदस्यों को उनके व्यक्तित्व के हिसाब से उपहार देती है. कठिन परिस्थितियों में उसने व्यवहार भूलाये नहीं है, विपदा के समय ही हल्की फूल्की घटनाएं घर में होती रहती है जो उनके जीवन के तनाव को कम करती है. 

बुधवार, 15 जनवरी 2014

16 वें भारत रंग महोत्सव का नौवां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख रंगविमर्श ब्लॉग से साभार. अमितेश से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

नाटक में कथ्य की प्रासंगिकता और गंभीरता होने के बावजूद कथ्य की प्रस्तुति के बरताव पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है ताकि कथ्य की गंभीरता दर्शकों तक संप्रेषित हो. बेहतर बरताव का अभाव गंभीर प्रयास को भी अनुल्लेखनीय कर देता है. रानावि में चल रहे सोलहवें भारंगम मेंह्म मुख्ताराकी प्रस्तुति के साथ ऐसा ही हुआ. स्त्री संघर्ष की कथा को बयान करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये कि संघर्ष केवल बाहरी नहीं होता वह भीतरी भी होता है और फिर यह बाहरी संघर्ष है किससे है? क्या वह संघर्ष के वृहत्तर आयामों से जुड़ रहा है? और फिर ऐसी लड़ाई जिसने व्यापक पैमाने पर वैश्विक संघर्ष की प्रेरणा दी हो उस संघर्ष को न्यूनीकृत करके सीमित अर्थ में बदल देना उचित नहीं है. साथ ही उस प्रश्नों को भी उठाया जाना चाहिये था जो स्त्री संघर्ष के वैश्विकता से जुड़े हैं. रंगमंच पर इसका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये क्योंकि यह एक ही समय में स्थानीय होते हुए भी वैश्विक होता है. इसलिये अच्छी रंगमंचीय मंशा भी कमजोर पड़ जाती है. उषा गांगुली निर्देशित रंगकर्मी की प्रस्तुतिहम मुख्ताराके साथ कुछ ऐसा ही हुआ. प्रस्तुति पाकिस्तान की प्रख्यात महिला मुख्तारन माई की कहानी पर अधारित है. जिसने अपने दमन के विरोध किया और अपने सम्मान की लड़ाई लड़ी और अंततः पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पराजित कर दिया लेकिन तब तक वह अपना सम्मान, लड़ने का हौसला और  वैश्विक पैमाने पर नारी संघर्ष की प्रेरणा जीत चुकी थी. यह प्रस्तुति उसके संघर्ष की कथा कहती है लेकिन इसे एक समुदाय के विरुद्ध लड़ाई में बदल देती है. यह प्रस्तुति यह जानने का प्रयास भी नहीं करती कि वह अपने समुदाय और अपने भीतर से कैसे लड़ रही है. अपने समुदाय के भीतर उसकी स्वीकार्यता, न्यायालय के चक्कर लड़ाने मे झेली गई प्रताड़ना और इतने अमानवीय अत्याचार से उभरने का उसका आंतरिक द्वंद्व प्रस्तुति में नहीं उभरता. साथ ही स्त्री को अपने अस्तित्व के लिये अपने आस पास के पुरूषों  या पितृसत्ता से कैसी लड़ाई लड़नी पड़ रही है इसको भी रेखांकित नहीं किया गया है.यह मुख्तार माई और एक बर्बर कबीले के संघर्ष में बदल जाता है और अंत में कुछ संवादों के जरिये इस नाटक को सामयिक घटनाओं से जोड़ा दिया गया. प्रस्तुति  परिकल्पना प्रभावी थी , शुरूआत में चेहरे को ढंके हुए महिलाओं की गति और इसी तरह बीच बीच में अभिनेताओं का गति संयोजन, कोरस, पात्र और दृश्य परिकल्पना की इकाई बनने की बीच की आवाजाही का अच्छा संयोजन किया गया था. नाटक की शुरूआत ने इसके प्रति संभावना जगाई लेकिन अंत तक जाते इसने अपनी संभावनाओं को ध्वस्त कर दियानाटक के कथ्य का तनाव इकाईयों में परिकल्पित दृश्यों के कारण बीच बीच में टूटता रहा और एक समग्र प्रभाव निर्मित नहीं कर पया. अच्छी मंशा, अच्छा कथ्य, अच्छी परिक्ल्पना, अच्छा संगीत और प्रासंगिक होने के बावजूद प्रस्तुति को बेहतर होने से जिन चीजों ने रोक फ़िया वो थी अभिनय और कथ्य की गहराई का अभाव. मुख्तार नाई की व्यथा और उसके संघर्ष कि कठोरता उसकी भूमिका को अभिनिति करने वाली अभिनेता के चेहरे पर दिखी ही नही. निर्देशक उषा गांगुली अपनी ही परिकल्पना में बाहरी तत्व की तरह दिख रही थी यद्यपि वह सूत्रधार के महत्वपूर्ण किरदार मे थी लेकिन अभिनय में उनकी शिथिलता और थकान प्रस्तुति के दौरान दिखती रहीसंभवतः अभिनय के लिये कथ्य के उपयुक्त मार्गदर्शन  नहीं था. नाटक आपेरा शैली से प्रभावित था अंत को लंबा कर दिया गया जो यह बता रहा था कि अब मुख्ताराएं हारने के लिये नहीं लड़ने के लिये तैयार हो रही है. मंच पर अंधेरे में अभिनेताओं ने अपने हाथ में टार्च लेकर अपने चेहरे पर रोशनी डाली थी जो उनके चेहरे की दृढ़ता को दिखा रहा था लेकिन इस अंत को लंबा कर दिया गया जिसने इस प्रभाव को कम कर दिया. यह प्रस्तुति भी उन प्रस्तुतियों में से एक थी जिस पर सोलह दिसंबर की घटना का प्रभाव था , नाटक के अंत में इससे जुड़ा एक संवाद भी बोला गया. नाटकों का तातकालिक कारणॊं से प्रभावित होना उचित है लेकिन केवल इसी के कारण अन्य तत्वों की उपेक्षा अनुचित है

16 वें भारत रंग महोत्सव का आठवां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख उनके ब्लॉग रंगविमर्श से साभार. अमितेश कुमार से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

भारंगम में जिन पारंपरिक शैलियों का प्रदर्शन किया जा रहा है वे अपने आकर्षण में दर्शकों को बांध रही है, उन्हें आनंदित कर रही है और रंगकर्मियों की भी इन शैलियों की प्रासंगिकता का अनुभव हो रहा है. पुरूलिया छऊ का प्रदर्शन खुले रंगमंच पर ऐसा ही रहा. मंच पर नर्तकों की उर्जा और उनकी लयबद्धता, पृष्ठभूमि में चल रहा संगीत, गायन और संवाद सबको रस में डूबो रहा था. गौरतलब है कि पुरूलिया छऊ  नृत्य की एक शैली है यह नृत्य और संगीत की कला है जिसका नाटकीय विन्यास होता है. मुखौटे और वेश-भूषा इस शैली की पहचान है. पात्र और चरित्र के अनुसार अलग मुखौटों की रूढ़ी है जिनसे पात्रों की पहचान होती है. नर्तक अपनी देह, मुखौटे को अभिव्यक्त करने के लिये गरदन का इस्तेमाल करते हैं. मंच पर कलाबाजी लेना और युद्धकला का प्रदर्शन भी कथावाचन के दौरान होता है. प्रदर्शन में एक ही वादक ढोल भी बजाता है और संवाद भी बोलता है. अलग अलग पात्रों के संवाद बोलता हुआ एक ही आदमी अपनी भंगिमा लगातार बदल कर विविध पात्रों की अभिव्यक्ति करता है.  प्रस्तुति में रक्तबीज और दुर्गा की कहानी चल रही है जिसमें ब्रह्मा, रक्तबीज को वरदान देते हैं कि उसके रक्त की एक बिंदू से उसका रूप निकलेगा और वह किसी पुरूष के हाथ नहीं मरेगा. रक्तबीज स्वर्ग पर हमला कर विजय प्राप्त कर लेता है, उसे हराने के लिये त्रिदेव दुर्गा की सृष्टि करते हैं. दानवों के पराक्रम और देवों की भीरूता को प्रस्तुति में उभारा गया और देवों कि मुर्खता पर कथा के दौरान टिप्पणी भी की गई, देवों की लाचारी से हास्य भी उभरता है. विशेष तौर पर जब कृष्ण पूछते हैं कि आखिर ऐसा वरदान किसने और क्यों दिया? तब ब्रह्मा छुपते नजर आये. प्रस्तुति की दृश्य सरंचना भव्य थी, विभिन्न रंगों  के मुखौटे , परिधान और नर्तकों की उर्जा ने उत्सव का वातावरण रच दिया था.
बर्तोल्त ब्रेख्त के नाटक ‘एक्सेप्शन एंड द रूल’ के नाट्यातंरण ‘सौदागर’ (रूपांतरकार- श्रीकांत किशोर) का मंचन रंग विदूषक, भोपाल द्वारा बंशी कौल के निर्देशन में हुआ. प्रस्तुति  विदूषकों शैली में थी जो उनकी परिचित शैली है. प्रस्तुति कुछ ढिलेपन के साथ शुरू होती है, अभिनेताओं के सर्कस जैसे करतब और अतिशय हास्य नाटक को प्रहसन में तब्दील कर ही रहे थे लेकिन अंतिम हिस्से में जज बने अभिनेता ने स्थिति संभाल ली और नाटक संतोषजनक रहा. यह ब्रेख्त के उन नाटकों में है जो वर्ग चेतना के साथ लिखा गया और वर्ग टकराव को उभारा गया है. यह दिखाया गया है  शोषक वर्ग विभिन्न पेशों में बंटे होने के बावजूद अपने वर्ग हित को बचाने के लिये एकजुट हो जाते हैं.  ये नियम कानून को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर शोषितों के विरुद्ध खड़ा होते हैं. शोषितों के न्याय पाने की आकांक्षा को ये नष्ट कर देते हैं. ब्रेख्त इसमें सामाजिक कार्यव्यापार की  स्वाभाविकता को प्रश्न चिह्न लगाकर उसके तल में चल रहे घृणित कार्यव्यापार का उद्घाटन करता है. नाटक की प्रस्तुति करने की युक्ति को महाकाव्यात्मक विधान में है, मंच पर ही आर्केस्ट्रा और कोरस का दल बैठा हुआ है जो नाटक की स्थितियों पर टिप्पणी करता है और सूत्रधार की भूमिका निभाता है. पात्रों में तीन तिलंगे रोचक किरदार है जो सत्य का उद्घाटन करते हैं जिन पर शोषक वर्ग ने पर्दा डाअला हुआ है.  नाटक एक सौदागर के बारे में है जो खान की तलाश में जा रहा है. खान की इस तलाश को खदानों की लूट की सामयिकता से जोड़ा गया है. खान तक पहले पहूंचने के क्रम में वह अपने गाईड और कूली से डरा रहता है. उनकी एकता को तोड़ने के लिये पहले गाइड को निकालता है और बाद में कुली पर अमनावीय अत्याचार करता है. वह उस लाचार कुली से भी भयभीत है. शोषक वर्ग दरअसल अपने लिये एक अदृश्य खतरा रचते हैं. जिससे  अपने को बचाने के लिये वह शोषकों की हत्या को वाज़िब ठहरा देते हैं. ऐसे ही डर में सौदागर कुली की हत्या कर देता है. लेकिन इस अपराध में उसे सजा नहीं हो मिलती. जज तथ्यों और सबूतों को सौदागर के पक्ष में तोड़ मरोड़ कर न्याय की हत्या कर देता है.  ब्रेख्त के नाटक का यह परिचित अंत है जहां पर सुखांत पर नाटक खत्म करने की बजाए एक असंतोष पर नाटक छोड़ते हैं. लेकिन प्रस्तुति इस असंतोष को उभरने नहीं देती. यह प्रस्तुति इस बात पर जोर देती है कि ब्रेख्त के नाटकों की राजनीतिक चेतना को दबाकर की गई प्रस्तुति प्रभावी नहीं होगी.

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

16 वें भारत रंग महोत्सव का सातवां दिन

अमितेश कुमार का यह आलेख उनके ब्लॉग रंगविमर्श से साभार. अमितेश कुमार से amitesh0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

भारंगम में कश्मीर के तीन नाटकों की उपस्थिति है. दो भांड पाथेर की और एक आधुनिक नाटक. भांड पाथेर कश्मीर की पारंपरिक कला है. कश्मीर की राजनीतिक स्थिति की वजह इन कलाओं की सततता पर भी  संकट आ गया है. पिछले कुछ वर्षों से इस कला में फिर से जान फूंकने का काम कुछ रंगकर्मी कर रहे हैं. और आधुनिक रंग युक्तियों से भी इसका मेल कराया जा रहा है. एम.के.रैना का नाम इसमें प्रमुख है जो आजकल अपने रंगकर्म का अधिकांश समय पाथेर के कलाकारों के साथ बिताते हैं. कुछ वर्ष पहले उन्होंने इन्हीं कलाकारों के साथ शेक्सपीयर के नाटक ‘किंग लीअर’ की प्रस्तुति की थी इस बार वे पारंपरिक नाटक ‘गोसाईं पाथेर’ के साथ हैं. प्रस्तुति ईश्वर के अस्तित्व के स्वीकार के प्रश्नों से जुड़ा है. ईश्वर को कुछ लोग हठयोग के जरिये पाना चाहते हैं कुछ भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच से रास्ता निकालते हैं.  प्रस्तुति में हम देखते हैं कि साधना के कठीन मार्ग का अनुसरण कुछ साधु कर रहे हैं जिनकी खिल्ली एक परिवार और उसके सदस्य उड़ाते हैं जिनके यहां ये मेहमान है. इनकी आवभगत यह इस  लिये कर रहे हैं कि इन्हें विश्वास है कि साधु इन्हें कुछ दे कर जायेंगे. इस परिवार में एक पिता और तीन बच्चे है इनकी स्थिति दयनीय है. बच्चे चाहते हैं कि पिता मर जाए और उन्हें संपति मिले जिस पर कब्जा जमा कर पिता बैठा है.  , अंततः बच्चे पिता को मरने के लिये मजबूर कर देते हैं. इसका मौका मिलता है एक अपरिचित युवक के आने से  गांव की एक लड़की को दोबारा  देखने के लिये रुका है. लड़की उस पर आशक्त है लेकिन युवक अपने साथ ले जाने के लिये उसे कुछ शर्त रखता है. राख मलने, कपड़े और गहने त्यागने का यह शर्त आद्ध्यात्मिक रूपक में बदल जाता है.  अपरिचित अचानक गायब हो जाता है और  उसे वापस बुलाने के लिये  अपरिचित   पिता मरने को तैयार हो जाता है. नाटक के साधारण से लगने वाले कथानक में ईश्वर, मोक्ष, भक्ति, प्रेम जैसे दार्शनिक समस्याओं पर बहस होने लगती है और इसी समय में इसके पात्र नितांत सांसारिकता में भी उलझे हुए हैं. अपने हास्य जनित अभिनय से सभी पात्र एक दूसरे की टांग खीचते रहते हैं और इसका चरमोत्कर्ष तब है जब पिता की मृत्यु के बाद बेटे  उसकी बुराइयों को गा गा कर रोते हैं.  ऐसा  हास्य बोध भारतीय समजा में और इसकी पारंपरिक कलाओं में ही मिलता है.  
भांड पाथेर की पारंपरिक शैली में निर्देशक ने आधुनिक रंगमंचि की युक्तियों को जोड़ा है. प्रवेश, प्रस्थान, मुवमेंटके  साथ कर्टेन काल को आधुनिक रंगमंच के हिसाब से ढाला गया है.  प्रकाश व्यवस्था के कथ्य के किसी विशेष पाठ को उभारने में सहयोग करती है. लेकिन प्रोसेनियम का रंगमंच इस प्रस्तुति के अनुकूल नहीं लगता इसका उपयुक्त मंचन खुले में हि होना चाहिये. कई अवसरों पर लगा कि अभिनेताओं की गति बाधित हो रही है. नाटक के कथानक और गति को भी नियंत्रित किया गया क्योंकि ऐसे नाट्य रूपो में अभिनेता सामयिक मुद्दों को जोड़कर उन पर टिप्पणी करते हुए नाटक का विस्तार करते रहते हैं. इस प्रस्तुति में भी पात्र सामयिक मुद्दों पर टिप्पणी करते हैं.  मंच की व्यवस्था में  पीछे संगीत मंडली बैठी है और अगले हिस्से में कार्य व्यापार हो रहा है. भांडों की प्रख्यात स्फूर्ति और हाजिरजवाबी का अनुमान इस प्रस्तुति से लग जाता है.  अभिनेताओं से मालूम हुआ कि इस कला को पर्याप्त सरंक्षण नहीं मिल रहा है और कलाकार बहुत ही विपिन्न स्थिति में रह रहे हैं. कश्मीर की स्थिति के बीच इन कलाओं की स्थिति पर भी विचार करना चाहिये.