रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

36 ग्राम की स्त्री नौटंकी

अश्विनी कुमार पंकज का आलेख 




त्तर भारतीय समाज में सर्वाधिक लोकप्रिय नाट्य परंपरा ‘नौटंकी’ पर हुए अध्ययन साबित करते हैं कि कैसे एक लोक रंग-परंपरा पुरुषों (सामंती व्यवस्था) द्वारा अपहृत कर ली गयी। अध्ययन साबित करते हैं कि ‘नौटंकी’ के उत्स में एक स्त्री है, जो संभवत: अपने जमाने की सबसे प्रभावी, आकर्षक और हरदिल अजीज रानी थी। किसी फूल के समान सुंदर और वजन में उससे भी हल्की यह स्त्री अनेक रूपों में, कई नामों से बार-बार लोक कथाओं में आती है। जिसकी प्रभावशीलता और सुंदरता से साहित्य और समाज तो नहीं ही बचा, एक नवीन नाट्य-परंपरा का भी जन्म हुआ और लोक का अभिन्न अंग बन गयी। पर आगे चलकर इस नाट्य परंपरा से स्त्री को बहिष्‍कृत कर दिया गया। नौटंकी को सभ्य और सुसंस्कृत समाज ने हेय घोषित करते हुए उसके साथ ‘अछूत’ की तरह व्यवहार किया।

‘नौटंकी’ शब्द का उद्भव संभवत: ‘नौ टंका’ से हुआ है। ‘टंका’ पुराने समय में चांदी तौलने का माप था, जो लगभग 4 ग्राम होता है। भारत की लगभग सभी प्रादेशिक लोक कथाओं में ‘फूलकुमारी’, ‘फूलवंती’, ‘फूलरानी’ का चरित्र मौजूद है। माना जाता है कि ‘नौटंकी’ मुल्तान की राजकुमारी का नाम था। जिसका वजन मात्र ‘नौ टंका’ यानी 36 ग्राम था। इस तरह ‘नौटंकी’ का अर्थ हुआ ‘36 ग्राम की स्त्री’। अर्थात फूल के बराबर या उससे भी हल्की। रानी नौटंकी पंजाब के राजा भूप सिंह के छोटे भाई लाड फूल सिंह की प्रेमिका थी। 19वीं सदी के अंत में जब रानी नौटंकी के किस्सों-कहानियों को लिखित रूप में दर्ज किया गया, तो ‘रानी नौटंकी’ (शहजादी नौटंकी) नाम से कई नाटक खेले गये, जो बेहद लोकप्रिय हुए। रानी नौटंकी और फूल सिंह की प्रेमकथा पर पहला संगीतप्रधान नाटक ‘सांगीत रानी नौटंकी का’ 1882 में लेखक खुशीराम ने प्रकाशित किया। नायकों के नाम या उनके आधार पर किस्सों-कहानियों और शैलियों का जन्म, विकास और व्यापक लोक विस्तार कोई नयी बात नहीं है। उत्तर प्रदेश का ‘आल्हा’ और राजस्थान का ‘ढोला’ उत्तर भारतीय समाज में राजाओं अथवा अन्य पुरुष नायकों की वीरता और बलिदान को महिमामंडित करने की सांगीतिक परंपरा के दो प्रमुख उदाहरण हैं। इन दोनों वीर पुरुषों के मुकाबले ‘रानी नौटंकी’ एकमात्र स्त्री नायिका है, जो एक नवीन संगीत-नाट्य शैली के रूप में उनसे कहीं ज्यादा लोकप्रियता और सांस्कृतिक आधार हासिल करती है। पर इसी के साथ हमें यह याद रखना होगा कि जहां आल्हा और ढोला जैसे पुरुष नायक वीरता और बलिदान के प्रतीक बनते हैं, वहीं नौटंकी को सिर्फ ‘दिल की रानी’ बनाकर एक खास दायरे में सीमित कर दिया जाता है। अर्थात स्त्री का स्थान ‘जीवन के युद्ध का मैदान’ नहीं बल्कि उसका क्षेत्र ‘दिल’ है। और यही दृष्टि ‘नौटंकी’ को आल्हा और ढोला की तुलना में एक आदर्श, महान व अनुकरणीय लोक परंपरा की बजाय उसे एक कमतर लोक परंपरा सिद्ध कर देती है। इस तरह ‘नौटंकी’ भारतीय समाज और रंगमंच में स्त्री अनुपस्थिति के साथ-साथ उसके कमतर चरित्र-चित्रण के कारणों की ओर इशारा करती हुई लोक में व्याप्त एक ऐसी नाट्य परंपरा है, जो समाजशास्त्रीय विमर्श की मांग कर रही है।

ऐसा नहीं है कि ‘नौटंकी’ अर्थात भारतीय स्त्री के साथ ऐसा बरताव सिर्फ गेय, संगीत, नाट्य और लोक परंपराओं में ही हुआ है। हिंदी भाषा और साहित्य की नयी विधा कहानी के विकास के प्रारंभिक और एक हद तक इक्कीसवीं सदी का विपुल कथा साहित्य भी इसका अपवाद नहीं है। कथा साहित्य के शिरोमणि और प्रगतिशील कथाकार प्रेमचंद के शुरुआती लेखन को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। उनका सुप्रसिद्ध कथा संग्रह ‘सोजे वतन’, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था, में एक कहानी है ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’। दिलचस्प किस्सागोई के अंदाज में लिखी गयी इस कथा की नायिका बेजोड़ सुंदरता की मल्लिका है। लोग उसके दीवाने हैं और उसे पाने के लिए बेकरार। नायिका की शर्त है कि वह उसकी ही ‘लौंडी’ अर्थात पत्नी बनेगी, जो उसे दुनिया का सबसे अनमोल रतन लाकर देगा। अनेक नौजवान उसकी इस शर्त को पूरी करने में वीरता की सारी हदें पार करते हुए उसके प्रेम में अपना बलिदान दे देते हैं। आखिरकार एक साहसी नौजवान उसकी शर्त पूरी करने में कामयाब हो जाता है और बेपनाह हुस्न की वह राजकुमारी उसके कदमों में बिछ जाती है। प्रेमचंद बताते हैं कि दुनिया का सबसे अनमोल रतन किसी वीर ‘राजपूत’ की छाती से टपका हुआ खून का वह आखिरी कतरा है, जो देश की रक्षा के लिए न्यौछावर होता है।
यहां तक कि शब्दकोशों में भी यह लैंगिक, जातीय, सांप्रदायिक और धार्मिक भेदभाव स्पष्‍टत: दिखाई पड़ता है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक भारतीय शब्दकोशों में ‘नौटंकी’ शब्द की अनुपस्थिति इसी तथ्य की पुष्टि करती है। न तो थॉम्पसन की ‘डिक्‍शनरी इन हिंदी एंड इंगलिश’ (1862) में और न ही प्लाट्स की ‘डिक्‍शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिंदी एंड इंगलिश (1884) में यह शब्द शामिल है। यही नहीं, उस समय के सबसे लोकप्रिय शब्दकोश ‘प्रैक्टिकल हिंदी-इंगलिश डिक्‍शनरी’ में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। वहीं ‘मीनाक्षी हिंदी-अंगरेजी कोश’ इसे ‘फोक-डांस’, ‘विलेज-ड्रामा’ कहकर नजर फेर लेता है। असंख्य शब्दों से लबालब, भारी-भरकम और दस खंडों में प्रकाशित ‘हिंदी शब्द सागर’ (1968) में भी ‘नौटंकी’ का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। ऑक्सफोर्ड डिक्‍शनरी के लेटेस्ट व ऑनलाइन संस्करण में भी ‘ख्याल’ तो है, पर नौटंकी नहीं। ‘नौटंकी’ शब्द पहली बार किसी भारतीय शब्दकोश में 1951 में मुद्रित और ध्वनित होती है। रामचंद्र वर्मा के ‘प्रामाणिक हिंदी कोश’ (द्वितीय संस्करण, 1951) में नौटंकी इस अर्थ के साथ दिखाई पड़ती है, ‘ब्रज क्षेत्र का एक लोकप्रिय नाट्य जिसमें चैबोला गायन और नगाड़ा के साथ अभिनय किया जाता है’। इसके बाद मानक हिंदी कोश (1964) के पांचवें संस्करण में सबसे विस्तृत प्रविष्‍टि दृष्टिगत होती है : ‘लोक नाटक की एक शैली जो आम लोगों के बीच प्रदर्शित की जाती है, आम तौर पर जिसका कथानक रोमांटिक या वीरतापरक होता है, और जिसका संवाद पद्यमय प्रश्नोत्तर के रूप में होता है। इसकी खासियत संगीत और चैबोला है, जिसे नगाड़ा या दुक्कार के साथ एक विशेष तरीके से गाया जाता है।’ ऐसे में सवाल उठता है कि एक ऐसी स्त्री जो महज 36 ग्राम वजन वाली थी और जो एक नाट्यशैली बन कर उत्तर भारत के ‘लोक’ में वर्षों छायी रही, उसे शब्दकोश में जगह देने से समाज और विद्वतजन आखिर क्यों कतराते रहे? हम जानते हैं कि शब्दकोश महज शब्दों का भंडारण नहीं है। न ही महज शब्द के अर्थों का एकआयामी प्रस्तुतीकरण। ‘शब्दकोश’ अपने समय की भाषिक-साहित्यिक एवं सांस्कृतिक ही नहीं वरन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अर्थों का भी खुलासा करती है। इस दृष्टि से भारतीय शब्दकोशों का स्त्रीपाठ अभी तक नहीं हुआ है और समाजशास्त्रीय अध्ययन की ‘अहल्या’ प्रतीक्षा शेष है। और हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि यह काम किसी ‘राम’ के द्वारा नहीं बल्कि समता-न्याय आधारित इंसानी दृष्टि और वैज्ञानिक सोच रखने वाला कोई समाजविज्ञानी ही कर पाएगा।
ध्यान देने की बात है कि नौटंकी में महिलाओं का प्रवेश पहली बार 1931-32 में होता है, जब गुलाबबाई रंगमंच पर आती हैं। लगभग इसी के आसपास नौटंकी के कथानकों में भी स्त्री चरित्र दिखाई पड़ते हैं। अन्यथा इसके पहले राजा, साधु-संत और डकैत जैसे पुरुष चरित्र ही नौटंकी के मुख्य विषय होते थे। स्त्री चरित्र आते भी थे तो सती, पतिव्रता अथवा देवी रूपों में। लेकिन ऐसी स्त्रियां नाटक के केंद्रीय नहीं बल्कि सहयोगी चरित्र होती थीं। नायक तो पुरुष ही हुआ करते थे। 1910 से 1940 के बीच नौटंकी में वीरांगना महिलाएं अपने नायकत्व के साथ केंद्रीय भूमिका में दिखाई पड़ती हैं। इस दौर में वीरांगनाओं के चरित्र पर आधारित नाटकों का जबरदस्त आकर्षण था। इस आकर्षण को प्रिंट और मनोरंजन मीडिया के राष्‍ट्रवादी संदेशों पर ब्रिटिश शासन द्वारा लगाये गये व्यापक प्रतिबंध के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है। राष्‍ट्रवादी विचारों के प्रचार-प्रसार को रोकने के लिए अंगरेजों ने ‘रजिस्ट्रेशन एक्ट ऑफ 1867’, ‘द ड्रामेटिक परफॉरमेंस एक्ट ऑफ 1876’, ‘द वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट ऑफ 1878’ और ‘द प्रेस एक्ट ऑफ 1910’ जैसे काले कानून बनाये थे, जो औपचारिक तौर पर मुद्रित साहित्य (नाट्यालेख, उपन्यास, कविता आदि) को तो प्रतिबंधित करते ही थे, साथ ही साथ सार्वजनिक पारफॉरमेंसेज को भी जिन्हें राजद्रोह योग्य माना जाता था। इस बीच, उन्नीसवीं सदी के दौरान राष्‍ट्रवादी भावना का विस्तार तेजी से हुआ और इस उभार में विकसित हुए राजनीतिक प्रतीकों में महिला नायकों और ‘देवी’ (धार्मिक अवतारों) ने महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया। बंगाल में बंकिमचंद्र चटर्जी जैसे उपन्यासकारों ने ‘भारत माता’ और भारतीय राष्‍ट्रवाद के भविष्‍य के उद्धारक के रूप में ‘देवी’ को स्थापित कर दिया। इसके बाद लीजेंडरी स्त्री वीरांगना झांसी की रानी औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध की प्रतीक बन गयीं, जिसने अंगरेजों के खिलाफ 1857 के विद्रोह में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी थी। घोड़े की पीठ पर सवार रानी की छवि इतना शक्तिशाली है कि लेख, कविता, नाटक और रानी के जीवन पर वृंदावन लाल वर्मा लिखित हिंदी उपन्यास के प्रकाशन पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रतिबंध के कारण पॉपुलर कल्चर में रानी लक्ष्मीबाई जैसे चरित्र उपनिवेश विरोधी भावना के स्वर बनकर उभरे और स्थापित हो गये। लेकिन स्त्री अस्तित्व अथवा स्त्री मुक्ति के परिप्रेक्ष्य में यह उसी परंपरागत पुरुष राजनीति के वर्चस्व की अभिव्यक्ति थी, जिसे आज के आधुनिक भारतीय रंगमंच पर भी पूर्ववत देखा जा सकता है। ‘नौटंकी’ भारतीय स्त्रियों की वह दबी हुई चीख है, जिसे मर्दवादी सत्ता के नगाड़े की शोर में आज तक अनुसना किया गया है।
(अश्विनी कुमार पंकज। वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव। रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक। इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य। वे रंगमंच पर केंद्रित रंगवार्ता नाम की एक पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं। इन दिनों आलोचना की एक पुस्‍तक आदिवासी सौंदर्यशास्‍त्र लिख रहे हैं। उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह लेख एक दम सिरे से उखड़ा हुआ और उलझाउ है. बौद्धिक मेहनत बस इतनी है कि नौटंकी शब्द किस शब्दकोष में कैसे है..बाद बाकी निष्कर्ष की जल्दीबाजी में लिखा गया लेख है. एक मात्र उदाहर्न यहां पेश है बाकी मौका मिला तो विस्तार से..लेखक की राय है कि महिला केन्द्रित नौटंकी के कथान्क १९३१ के आसपास आते हैं. इसके अगले ही कुछ पंक्तियों में लेखक कहता है कि "1910 से 1940 के बीच नौटंकी में वीरांगना महिलाएं अपने नायकत्व के साथ केंद्रीय भूमिका में दिखाई पड़ती हैं।" यानी लेखक के अनुसार १९१० से १९३० तक भी महिला केन्द्रित नौटंकी मिलने चाहिये. किस तथ्य को सही माना जाये.

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