रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

ताजगी और उठान के राजनीतिक नाटक की वापसी


राजेश चन्द्र 
नुक्कड़ नाटकों को मूलतः प्रतिरोध का नाटक माना जाता रहा है। सन् 1965-66 में  नई कविता, नई कहानी और नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत के साथ ही नुक्कड़ नाटकों का अस्तित्व भी स्वीकार किया जाता है। लोककलाओं  की नींव पर खड़ी इस नाट्य विधा ने भारतीय जनता के दुख, पीड़ा, उम्मीद और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी और अपने सामने आठवें दशक के जनवादी आंदोलन को गति देने के साथ-साथ श्रमिक वर्ग को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और अशिक्षित जनता तक साहित्य पहुंचाने का वृहत्तर लक्ष्य रखा था। रचनात्मक उठान और ताजगी से भरे इस नुक्कड़ नाट्यांदोलन का उत्कर्ष काल सन् 1974-75 से लेकर 1990-95 तक माना जा सकता है जिसके दौरान देश भर में कई महत्वपूर्ण नुक्कड़ नाट्य मंडलियों का उदय हुआ और उन्होंने नुक्कड़ नाटकों को साधारण जनता के बीच अपार लोकप्रियता दिखाई।
 समाज के वास्तविक अंतर्विरोधों पर उंगली रखने और दर्शकों की समझ में पैनापन लाने वाले इन नुक्कड़ नाटकों का स्वरूप मूलतः वाम-राजनीतिक था और उनमें दिशा तथा दृष्टि की स्पष्टता के साथ-साथ विचारों, प्रतीकों एवं भाषा के समस्त औजारों के बीच एक तरह की प्रत्यक्षता और पारदर्शिता थी। देश के अलग-अलग हिस्सों में जननाट्य मंच, इप्टा, निशांत, दिशा, युवा नीति, संकेत, संकल्प, संचेतना, अभियान,  दस्ता, जन-संस्कृति, थिएटर यूनियन, समुदाय, जागृति, आह्वान और प्रेरणा जैसी नाट्य मंडलियों ने नुक्कड़ों, मिलों, कल-कारखानों, गांवों-कस्बों और खलिहानों तक जिस नई रंगचर्या को लेकर दस्तक दी उससे एक सार्थक और राजनीतिक रंगांदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर आकार ग्रहण करने की संभावनाओं को काफी बल मिला था। 1989 में सफदर हाशमी की हत्या के बाद नुक्कड़ नाटक आंदोलन में थोड़ी गति अवश्य आई पर वह जारी नहीं रह सकी। देश में अनगिनत मंडलियों के होते हुए भी बदलते सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश  में  यह नाट्य-धारा भी बहुविभाजित हो गई और उसमें पस्त-हिम्मती, थकान एवं विखराव के लक्षण उभर आए। इस दौर  में  ही वाम विरोधी, जातिवादी-सांप्रदायिक शक्तियों, सरकार और एनजीओ की नुक्कड़ नाटकों के परिदृश्य  में  घुसपैठ बढ़ी और एक सुनियोजित तरीके से नुक्कड़ नाटक से प्रतिरोध का उसका पक्ष और उसकी विश्वसनीयता छीन ली गई। इस स्थिति को पूंजीवादी विकास के वर्चस्व की जीत और विचारधारा के अंत के प्रमाण के तौर पर भी प्रचारित करने की एक जोरदार मुहिम सामने आई।
 दरअसल संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक स्थितियों के भीतर अविश्वास, हताशा और अवसरवाद का जैसा वातावरण भूमंडलीकरण की प्रवृत्तियों ने पैदा किया उसका असर साहित्य और कला-क्षेत्र के रुझानों पर भी पड़ना ही था। परंतु संक्रमण के दौर में भी अवाम की समस्याएं नहीं बदल जातीं। जनता की मुक्ति और सामाजिक बदलाव के महान सपने और अधूरे लक्ष्य सुलगते रहते हैं और हस्तक्षेप की जरूरत बनी रहती है। उम्मीद की कमान अक्सर नौजवान पीढ़ी अपने हाथों में लेती है और नुक्कड़ नाटक के परिदृश्य  में  भी समय के एक नए करवट की आहट इधर सुनाई पड़ने लगी है। पिछले 31 जनवरी को मैत्रेयी कॉलेज, चाणक्यपुरी के परिसर में दिल्ली विश्वविद्यालय के चौदह महाविद्यालयों की नुक्कड़ नाट्य मंडलियों ने अपने कलात्मक, तीखे तेवरों वाले और समसामयिक ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित नाट्य प्रदर्शनों से एक बार फिर यह उम्मीद जगाई है कि प्रतिरोध के इस नाट्यकर्म की संभावनाओं के समाप्त होने की चर्चा अवास्तविक और बेमानी ही नहीं बल्कि एक किस्म का राजनीतिक दुष्प्रचार है और नुक्कड़ नाटक इस दुष्प्रचार को मुंहतोड़ जवाब देने में पूर्ण रूप से सक्षम है। 
मैत्रेयी  कॉलेज  परिसर  में  दिन भर के इस नुक्कड़ नाट्य समारोह  में  दिल्ली विश्वविद्यालय की चौदह नुक्कड़ नाट्य मंडलियों ने अपने प्रदर्शनों में कथ्य की नवीनता, कलात्मक संप्रेषण, समूहन, दृश्य रचना, अभिनय और प्रभावशीलता का बेहतरीन नमूना पेश किया और यह विश्वास जगाया कि नाटक के इस रूप के भविष्य को लेकर चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। दास्ताने जन्नत (मैत्रेयी  कॉलेज ), मैं हूं वजह (मोतीलाल कॉलेज ), लालसा (हंसराज  कॉलेज ), भूखा अन्नदाता (डीसीएसी), अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (आईपी  कॉलेज ), सबक (दयाल सिंह  कॉलेज ), धर्म (खालसा  कॉलेज ), सरकारी अंगड़ाई, सबकी शामत आई (नॉन कॉलेजिएट, मैत्रेयी  कॉलेज ), भागो रे भाई, पुलिस आई (किरोड़ीमल  कॉलेज ), सड़क पर घर (शहीद भगत सिंह  कॉलेज ), तेरी जिंदगी सिर्फ तेरी नहीं (जीसस मैरी  कॉलेज ), भूख (रामानुजन कॉलेज ), आज़ादी (आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज ) और आरटीई डिजास्टर (श्रीराम  कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स) आदि इन नुक्कड़ प्रस्तुतियों में आज के दौर के लगभग सभी प्रमुख मुद्दों को तीखे ढंग से उभारा गया जैसे कि आर्मड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट की आड़ में मानवाधिकारों को कुचलने की साजिश, भ्रष्टाचार और उसकी संस्कृति, अनियंत्रित महत्वाकांक्षा, नवउदारवाद के शिकंजे में फंसे किसानों की बदहाली और उनमें व्याप्त आत्महत्या की प्रवृत्ति, क्षेत्रीयतावाद, सरकारी महकमों  में  फैली कर्तव्यहीनता और संवेदनहीनता, धर्म और सांप्रदायिकता के घालमेल से उपजी हिंसा, पुलिस तंत्र का तालिबानीकरण, शहरीकरण और उसके आर्थिक, सामाजिक परिणाम, मां-बाप की महत्वाकांक्षाओं और अन्यायपूर्ण शिक्षा प्रणाली के दबाव  में  विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवत्ति, आजादी के सपनों का टूटना और शिक्षा के अधिकार का मखौल उड़ाता नया कानून आदि।
 असीम ऊर्जा से भरी नई पीढ़ी के कलाकारों ने विचार और कला के बेहतर समन्वय द्वारा नुक्कड़ नाटक की विधा को जिस अनूठे समर्पण और ताजगी के साथ प्रस्तुत किया वह भविष्य के प्रति आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त है। इन नौजवानों के अंदर समाज  में  एक बदलाव लाने की गहरी बेचैनी और अपने माध्यम के प्रति एक रागात्मक लगाव है। इस लगाव और बेचैनी  में  रचनात्मकता के एक नए उत्कर्ष की संभावना दिखती है।

राजेश चन्द्र  - कविरंगकर्मीअनुवादक एवं पत्रकार. विगत दो दशकों से रंगान्दोलनों,कवितासम्पादन और पत्रकारिता में सक्रिय। हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँआलेख और समीक्षाएँ प्रकाशित। उनसे rajchandr@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.यह आलेख शनिवार चार फरवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित .

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