रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

शनिवार, 5 नवंबर 2011

चरणदास चोर के पीछे बहुतेरी कहानियाँ!


नया थिएटर का विश्व प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर की रचना प्रकिया एवं अन्य पहलुओं पर स्वंय नाटक के निर्देशक हबीब तनवीर का यादगार आलेख. 


इस नाटक के पीछे एक नहीं बहुतेरी कहानियाँ हैं। चूंकि ''चरन दास चोर'' एक 'क्लासिक' का दर्जा हासिल कर चुका है, ये कहानियां भी एक इतिहास की हैसियत रखती हैं। इन कहानियों का सिलसिला 'चोर' कही हमारी प्राचीन परम्पराओं से मिलता है। शास्त्रों में हमारे यहां एक 'चोर-शास्त्र' भी है।
मुणीराम भद्र विरचित से संस्कृत नाटक 'प्रबुध्द रोहिणेय' का नायक एक चोर है और उसकी अजीबों-गरीब जिंदगी का चित्रण 'चोर-शास्त्र' पर ही आधारित है। शुद्रक के शाहकार 'मृच्छकटिक' में एक महत्वपूर्ण पात्र शर्विलक है जो चोर भी है, प्रेमी भी है और आर्यक गोपालक के राजनीतिक दल का लीडर भी है।
वह जब चारुदत्त के घर में चोरी के लिए सेंध लगाना चाहता है तो पहले विचार कर लेता है कि चांद जैसी गोल हो या कमल के फूल की तरह, या फिर एक मटके के आकार की सेंध बनाऊं। इसका भी सूत्र 'चोर-शास्त्र' से संबंधित है। शर्विलक की बनाई हुई सेंध देखकर चारुदत्त को अपने घर चोरी का ख्याल बाद में आता है, पहले वो चोर की कला देखकर दंग रह जाता है और उसकी चाबुकदस्ती की प्रशंसा करता है।
आर्यक और शर्विलक वो पात्र हैं जिनका जिक्र हजारीप्रसाद द्विवेदी के 'पूनर्नवा' में मिलता है। उन्होंने अपने उपन्यास में बताया है कि इन पात्रों का सिलसिला प्राचीन काल के साहित्य से मिलता है। 'मृच्छकटिक' का शर्विलक देश में क्रांति लाता है और राजा पालक के अत्याचार को खत्म करके उसकी जगह ग्वाले आर्यक को राजसिंहास पर स्थापित कर देता है।
चोर की राजस्थानी लोक-कथा पर नाटक तैयार करने का ख्याल मुझे सबसे पहले 1974 में आया। विजयदान देथा (जिन्हें मित्र बिठी कहते हैं) ने मुझे ये कहानी जबानी सुनाई थी। बस इस कहानी ने मेरे दिमाग में जड़ पकड़ ली। उस वक्त तक विजयदान ने अपनी जमा की हुई लोक कथाएं केवल राजस्थानी भाषा में छपवाई थीं। इनका हिन्दी अनुवाद 'उलझन' के नाम से बाद में छपा। जिला जोधपुर के गांव बोरुंदा में जहां कोमल कोठारी और विजयदान का 'रूपायन' संस्थान है, मैं एक महीने रहा। ये 1974 की गर्मियों का जमाना था। चोर की लोक-कथा पर जब मैंने बोरुंदा नाटय शिविर में नाटक तैयार करना शुरू किया तो पहले चार दिन के अंदर ही मेरी योजना फेल हो गई। इन चार दिनों में बोरुंदा में बहुत-सी घटनाएं घटीं। सांप निकले, मोनिका बीमार पड़ गई और सबसे बड़ी बात ये कि कहानी के प्रति मेरा उत्साह खत्म हो गया!
बोरुंदा वर्कशॉप! बोरुंदा वर्कशॉप!
वर्कशॉप कोई सी हो, कहीं भी हो, मैं अपनी मंडली के खास-खास कलाकारों को अपने साथ जरूर ले जाता हूं। कभी चार-पांच, कभी ज्यादा कलाकार, और कभी पूरी मंडली साथ गई। ये जरूरी नहीं कि वह इसमें शिरकत करें। ऐसे मौकों पर कभी महज देख-सुकर तजुर्बा हासिल करना ही उद्देश्य होता है। शिरकत भी करते हैं। जैसे हरियाणा की स्वॉग वर्कशॉप। जैसे उड़ीसा के प्रल्हाद नाटक वर्कशॉप में! यहां उद्देश्य ये था कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदे, यानी हमारे कलाकारों की अदाकारी से नये कलाकार सीख हासिल करें। अंत के प्रोडक्शन में 'नया थियेटर' के कलाकारों की कोई जगह नहीं होती। उस वक्त तक वो महज दर्शक की हैसियत में आ जाते हैं। मंच पर इलाकाई कलाकार ही उतरते हैं। लेकिन उसके बारे में विस्तार से लिखने का ये अवसर नहीं। आगे कभी।
बोरुंदा में भी चुने हुए चार-पांच कलाकार साथ थे। आमतौर पर खालिस घी में पके हुए ठेठ राजस्थानी खाने खा रहे थे, जिनकी उन्हें आदत नहीं थी। छत्तीसगढ़ी आदतन आमतौर से दोनों वक्त चावल खाते हैं, जो वहां मिलता नहीं था। सुबह हाजत-रफा (शौच आदि) करने हम सब बाहर खेतों में निकल जाते थे, जिसकी बहरहाल सब को आदत थी। एक दिन सुबह-सुबह जो निकले तो रास्ते में एक बहुत बड़ा सांप मिला। कुछ लोग लाठी लेकर निकले थे। सांप को लाठी से कुचलकर मार दिया गया। कोमल दा को जब मालू हुआ तो कहने लगे, मारा क्यों? ''यहां बहुत सांप निकलते हैं, लेकिन हम उन्हें मारते नहीं हैं।'' उन्होंने हमें सांपों के बहुत से किस्से सुनाए। कहा की सांप को अगर कोई मार दे तो उसका जोड़ा बदला लेने की फिराक में घूमता रहता है, और मौका पाने पर बदला जरूर लेता है। सुनते हैं मरे हुए सांप की आंख में मारने वाले की छाया जम कर रहे जाती है। बस उसी को देखकर उसका जोड़ा उस व्यक्ति को पहचान लेता है। इस सिलसिले में उन्होंने एक अजीबों-गरीब किस्सा सुनाया। एक आदमी ने एक नाग को मार दिया। नागिन उसे ढूंढती रही। वह आदमी डोल लेकर पाने लाने हर रोज कुएं पर जाता करता था। उन्होंने वह कुआं भी दिखाया और बताया कि बस नागिन यहां कुएं की मुंडेर पर जो पीपल का एक पौधा नजर आ रहा है, वहां दरार में छुप गई,और जब वह आदमी पानी लेने कुएं पर पहुंचा तो उसे डस लिया। आदमी ने वहां दम तोड़ दिया। कोमल दा ने बताया कि ब्राह्माण का जो अंतिम संस्कार होता है, वही नाग का होता है। तुम उस मरे हुए सांप को जला दो। उसी दिन हमारे कमरे में भी एक नाग निकल आया। लोग डर गए। भागकर उस मरे हुएं सांप को उठाया, उसकी चिता बनाई और बड़े एहतेमाम से उसे जला दिया।
उसी अर्से में मोनिका को बुखार आ गया, और पहले चार दिनों में दवा के बावजूद वह कम नहीं हुआ बल्कि कायम रहा। कोमल कोठारी उन्हें मोटर-गाड़ी में बिठाकर अपने घर जोधपुर ले गए, वहां डाक्टर का इलाज चलता रहा। कोमल दा के परिवार के लोग उनकी देखभाल करते रहे। इस तरह एक महीना बीत गया। कोमल दारोजाना उसकी कैफियत मुझे बताते रहे। मेरी वर्कशॉप खत्म भी हो गई, पर मोनिका का बुखार नहीं उतरा। बिलआखिर हम दिल्ली वापस आए तो मोनिका को मैंने विलिंगडन अस्पताल में दाखिल करा दिया। डाक्टर करौली जो दिल की बीमारी के इलाज के माहिर थे, उनकी देखाल करते रहे, उन्हें तपेदिक की दवाइयां देते रहे। आखिर चंद हफ्तों में वह स्वस्थ होकर घर गईं।
इस सिलसिले का अंत भी दिलचस्पी से खाली न हो, चुनांच: उस यहीं बयान कर देना मुनासिब है। हुआ ये कि कुछ बरस बाद मोनिका का किसी मामूली-सी बीमारी के सिलसिले में हम किसी और डाक्टर से इलाज करवा रहे थे। इलाज के सिलसिले में जब मरीज की मेडिकल हिस्ट्री बताई गई, और कहा गया कि कुछ साल पहले इन्हें तपेदिक हो गया था तो डाक्टर ने कहा तपेदिक हो ही नहीं सकता था, ये गलत इलाज हुआ। खैर वो जमाना भी बीत गया। फिर चंद बरसों के बाद इत्तेफाकन डाक्टर करौली मुझे मिले तो मैंने उन्हें बताया कि एक डाक्टर कह रहा था कि मोनिका को तपेदिक शायद न हुआ हो तो डाक्टर करौली कहने लगे, ''ये किसने कहा कि उन्हें तपेदिक था। तपेदिक उन्हें नहीं था। इलाज से वो अच्छी हो गई। बस, अब इससे क्या मतलब कि उन्हें क्या बीमारी थी। हम लोग कभी-कभी जब बीमारी का पता नहीं लगा पाते तो बजाये रिसर्च में समय बर्बाद करने के हर तरह की दवाएं देकर आजमाते रहते हैं। यही हुआ मोनिका के साथ भी। दूसरी तमाम दवाओं से उनकी तबीयत में फर्क नहीं आया। जब तपेदिक की गोलियां दीं, तो उनका स्वास्थ्य ठीक होने लगा। लेकिन इसका ये मतलब हीं कि उन्हें तपेदिक था। अब अच्छी है ना? बाकी फिक्र छोड़ों।''
बोरुंदा में इन तमाम घटनाओं के बावजूद मैं काम करता रहा। लेकिन 'नया थियेटर' के कलाकारों के इम्प्रोवाईजेशन से भी अगमराज 'खिलाड़ी' के कलाकारों में कोई फर्क आता नजर न आया। मैंने कुछ दिन उनके अपने खेल देखने में लगा दिए थे। उनके स्टॉक में से 'अमर सिंह राठौर' और 'राजा हरीशचंद्र' जैसे नाटक देखे। उनमें किसी में कोई जान नजर न आई। मैंने आगमराज से पूछा, इन नाटकों की कहानियां सभी लोग जानते हैं, इनमें कोई नवीनता का पहलू भी नहीं है फिर भी तुम इन नाटकों के लिए सारे हिंदुस्तान में फिरते हो, और लोग उन्हें देखते रहते हैं, आखिर क्यों? तुम्हारे नाटकों की सफलता का राज क्या है? अगमराज ने बताया, ''कहानी देखने कौन आया है? दर्शक तो हमारे गाने सुनने आते हैं। फरमाइश पर फरमाइश होती रहती है। हम उन फरमाइशों पर फिल्मी गाने सुनाते रहते हैं और रात बीत जाती है। आज तक किसी नाटक की कहानी अंत तक हम नहीं दिखा सके हैं।''
हरियाणा की स्वॉग वर्कशॉप में एक गांव के आदमी ने मुझसे एक बहुत पते की बात कही थी। उसने कहा था, ''साब। दर्शक तीन प्रकार के होते हैं : सुर-मस्त, ताल-मस्त और हाल-मस्त। सुर-मस्त वह जो गाना सुनने आते हैं, और गाने वाला चाहे बेताला हो, अगर सुरीला है तो वह जमे रहेंगे। ताल-मस्त वह जो ताल पर झूमते हैं, गाने वाला चाहे कितना ही बेसुरा हो, कनसुरा हो, लेकिन अगर ताल में है तो टलेंगे नहीं, सुनते रहेंगे। तीसरा हाल-मस्त। ऐसा आदमी नशे में झूमता हुआ आता है, और चाहता है कि रात भर कुछ-न-कुछ हंगामा होता रहे। उसे इससे मतलब नहीं कि गवैया बेसुरा है या बेताला है। उसे महफिल चाहिए जो जमी रहे। वह जब तक जमी है, वह भी जमा है। वह उखड़ी, तो वह भी उखड़ा।''
गोया अगमराज भी यही कह रहे थे। मैंने उनसे कहा हम चाहते हैं कि नाटक ऐसा हाना चाहिए जिसमें दर्शक लगातार इस सोच में पड़ा रहे कि अब क्या होगा। अब आगे क्या होगा? चुनाँच: हम तुम्हारे नाटक में परिवर्तन करने के बजाए एक नई कहानी पर नाटक खड़ा करना चाहेंगे। हमने बिठी की 'सच्चाई की बिसात' शीर्षक वाली कहानी के आधार पर नाटक की तैयारी शुरू की, मगर चार दिनों के अंदर-अंदर हमारी सब कोशिशें फेल हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि ''ख्याल'' एक म्युजिकल शैली है, संगीत-प्रधान है। एक प्रकार का ऑपरा है, जिसमें गानों का और नाच का महत्व संवाद की तुलना में कहीं ज्यादा है। जैसे मध्यप्रदेश का 'माच', हरियाणा का 'स्वांग', उड़ीसा का 'प्रह्लाद', उत्तरप्रदेश की 'नौटंकी' आदि। मैंने देखा कि इस पार्टी में एक-से-एक बढिया गाने वाले और नाचने वाले तो मौजूद थे, एक्टर कम थे, बल्कि सिरे से थे ही नहीं। सिवाय एक आदमी के। पखराज। पखराज एकमात्र एक्टर था और ऐसा कि जिसमें अभिनय की क्षमता कूट-कूटकर भरी थी। पखराज बेहतरीन कमेडियन भी था। बाकी कलाकार संवाद, गति और अभिनय में कमजोर थे। और मुझे जरूरत थी कि एक से ज्यादा अभिनेता की। चुनांच: मैंने उस कहानी पर नाटक बनाने का ख्याल छोड़कर एक दूसरी राजस्थानी कहानी उठा ली, ''ठाकुर रो रुसनो''। ये भी विजयदान ही ने सुनाई थी। इसमें एक अभिनेता से काम चल गया, क्योंकि सारी कहानी मूल रूप से एक व्यक्ति के गिर्द घूमती है। बाकी और भूमिकाएं अभिनय की दृष्टि से छोटी-छोटी थीं। गानों और नाच के जरिये पात्र कहानी को आगे बढाते थे। नाटक का नाम मैंने बदलकर ''ठाकुर प्रीतपाल सिंह'' रख दिया।
मैंने वही सबक बोरुंदा में दूसरी बार सीखा, जो एक साल पहले 1973 में रायपुर नाचा वर्कशॉप में पहली बार सीखा था जिसके नतीजे में ''गांव के नांव ससुरार मोर नांव दमाद'' जैसा नाटक निकलकर आया था। सबक ये था कि कभी किसी वर्कशॉप के लिए सारी बातें पहले से सोचकर मत जाओ। इलाके में पहुंचकर वहां के हालात देखो, कलाकारों को मंथन में डालो, और इन्हीं परिस्थितियों से जो प्रेरणा मिले और जो कहानी उत्पन्न होती नजर आए, बस उसके सहारे आगे बढ़ते चलो यही एक रास्ता है।
भिलाई वर्कशॉप!
राजस्थानी नाटय शिवर के 'ठाकुर प्रितिपाल सिंह' के बाद नवंबर-दिसंबर 1974 में, मैं भिलाई में बैठा बहुतेरी छत्तीसगढ़ी नाचा मंडलियों के साथ एक महीने तक काम करता रहा। हमेशा की तरह 'नया थियेटर' के कुछ कलाकार भी मेरे साथ थे। इस वर्कशॉप का उद्देश्य कुछ और था। अच्छी मंडलियों की तलाश, फिर उनके अच्छे खेलों को छांटकर मांझना और उन्हें मंच पर प्रस्तुत करना। चोर की कहानी, जिसका शीर्षक विजयदान ने अपनी हिंदी किताब 'उलझन' में ''सच्चाई की बिसात'' रख छोड़ा था, मुझे अंदर ही अंदर सताती रही थी। चुनांच: जब मेरा असली काम कोई तीन हफ्तों में पूरा होता नजर आया, तो मैंने आखिर के चार-पांच दिन इसी कहानी पर कुछ तजुर्बे कलाकारों की मदद से करने में लगा दिए। वर्कशॉप के पांचों नाटक पहले बालोद में प्रस्तुत करने के बाद जब दूसरी बार कोई अठारह हजार आदमियों के सामने खुले मंच पर भिलाई में वही नाटक खेले जाने लगे,और सुबह होने को आई तो मैंने दर्शकों से कहा कि ''हम एक नया नाटक तैयार करने जा रहे हैं। अभी ये दिमाग के कारखाने से पूरी तरह नहीं निकला है, और न एक्टरों की तैयारी अभी पूरी हुई है, फिर भी ये देखते हुए कि इस मंचन की आयोजक एक सतनामी संस्था है,और यहां सतनामी दर्शक हजारों की संख्या में जमा है, और हमारे नाटक का आधार 'सतनाम' धर्म है, अगर आप कहें तो हम इस अधपके नाटक को भी अभी प्रस्तुत कर दें।'' सबने एक-आवाज होकर कहा, ''हो। जरूर दिखाओ, हम मन ला कोई जल्दी नई है। अभी भोर कहां हुए हैं?''
विजयदान ने अपनी कहानी में चोर को कोई नाम नहीं दिया है। हम नाम सोचने में लगे थे पहले सोचा चोर मरने के बाद अमर हो जाता है, क्यों न उसका नाम ''अमरदास'' रखें। पंथियों ने कहा ''ये नाम नहीं हो सकता, अमरदास नाम के हमारे एक गुरु गुजरे हैं।'' हमने दूसरा नाम तजवीज किया। ये दूसरे गुरू का नाम निकला। आखिर हमने भिलाई के शोर के लिए ''चोर चोर'' नाम रख दिया, और आगे चलकर ''चरन दास'' रख लिया। नाचा पार्टियों में हमारे साथ वर्कशॉप में धमतरी के अछोटा गांव की नाचा पार्टी भी थी, उसके लीडर थे रामलाल निर्मलकर। अच्छे कॉमिक एक्टर थे। उनसे कहा, चोर की भूमिका में खड़े हो जाओ।
मैंने दर्शकों से कहा, ''हो सकता है कि बीच में उठकर मुझे किसी अभिनेता की जगह ठीक करना पड़े या संवाद में मदद करना पड़े तो आपलोग कृपया इस बात को नजरअंदाज कर दीजिएगा।'' बिल्कुल यही हुआ। मुझे न सिर्फ एकाध बार उठकर किसी सैनिक की मंच पर जगह ठीक करनी पड़ी क्योंकि आगे चलकर इसके कारण सीन में बाधा पड़ने का अंदेशा था बल्कि बीच-बीच में आर्केस्ट्रा के साथ बैठकर खुद गाने भी गाता रहा। गाने उस वक्त तक लिखे नहीं गए थे। मैंने पंथी गीतों की एक छोटी-सी पुस्तक अपने पास रख ली थी। साजिन्दे हमारे अपने हमारे साथ थे ही बस मैं गाता रहा, कोरस में गाने वाले कलाकार दुहराते रहे और इस तरह कोई पैंतालिस-पचास मिनट में नाटक समाप्त हुआ तो मैदान तारीफ और तालियों से देर तक गूंजता रहा।
मुझे दर्शकों की राय मिल गई थी। उन्होंने नाटक को अपनी कच्ची शैली और बाकी सब कमजोरियों के बावजूद पसंद कर लिया था। दर्शकों में सभी लोग पंथी थे और पंथियों का बुनियादी उसूल है : ''सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है।'' यही उसूल उनके रोजमर्रा के पारंपरिक गीत में भी है, और उसी गीत पर हमने नाटक खत्म किया था। बस ये सब देख-सुनकर उनकी भावुकता उबल पड़ी थी। इन भावुकता का एक कारण ये भी हो सकता है कि उन्हीं के पंथ का एक व्यक्ति नाटक का नायक था जिसे नाटकों में पहले कभी नहीं देखा गया था।
नाटक से पहले फिल्म
भिलाई वर्कशॉप से कुछ महीना पहले जब हम अपने नाटक ''गांव के नांव ससुरार मोर नांव दमाद'' के गांव-गांव शो करते फिर रहे थे तो उस वक्त श्याम बेनेगल अपने अमले के साथ, जिसमें गिरीश घानेकर कैमरा पर थे, 'नया थियेटर' पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने में लगे हुए थे। मैंने चोर की राजस्थानी कहानी के आधार पर नाटक तैयार करने की अपनी योजना उन्हें बताई। उसी वक्त उन्होंने फैसला कर लिया कि उस कहानी पर एक फीचर फिल्म बनायेंगे। ये घानेकर वही थे जिनके पिता के साथ मैं सन 1945-48 में 'फेमस पिक्चर्स' स्टूडियो में विज्ञापन की फिल्में बना चुका था। आगे चलकर गिरीश खुद अपने डायरेक्शन में फिल्में बनाने लगे थे। श्याम ने मुझसे स्क्रीन-प्ले लिखने के लिए कहा।फिल्म वह बना रहे थे बच्चों के लिए। चुनांच: उन्हें कहानी का अंत पसंद नहीं था। चोर के मरने पर वह फिल्म खत्म नहीं करना चाहते थे। उनका कहना था कि बच्चों के लिए कहानी का ये अंत उचित नहीं। उन्होंने कहा कि चोर के मरने के बाद परलोक पर एक सीन और लिखो ताकि इस दुखद अंत के बजाए चोर की कहानी आखिर तक प्रहसन बनी रहे।
बच्चों के साहित्य के विषय में मेरी कुछ और राय थी। मेरी राय में बहुतेरी भयानक कहानियां बच्चे मजे ले-लेकर सुनते और पढ़ते हैं, और उनसे कोई खराब असर कबूल नहीं करते। बहरहाल मैंने फिल्म के लिए परलोक का एक सीन भी लिख लिया, जिसमें मरने के बाद चरन दास चित्रगुप्त के सामने पहुंचता है और उसेक खाते से अपना नाम चुपके से फाड़ लेता है। जब चित्रगुप्त अपने खाते का पन्ना गायब देखकर चरन दास पर शक की नजर डालते हैं तो वह उस कागज को पान की तरह लपेटकर मुंह में रख लेता है। चित्रगुप्त उसे मुंह खोलकर दिखाने के लिए कहते हैं तो चरन दास कागज को निगल लेता है। लाचार चित्रगुप्त चरन दास का नाम अपने खाते में न पाकर कहते हैं, ''तुमको यमराज ने क्यों मारा? तुम्हारा नाम तो मेरे खाते में नहीं है।'' इतने में अपने भैंसे पर सवार स्वयं यमराज पहुंच जाते हैं, लेकिन जैसे ही वह अपने वाहन से उतरते हैं, चरन दास उनके भैंसे पर चढक़र चंपत हो जाता है। शाम के बादल आकाश पर मंडराते नजर आते हैं. कमेंटरी के शब्द जो सुनने में आते हैं वे ये हैं, ''बच्चो, वह जो बादल तुम देख रहे हो वह दरअसल चरन दास चोर है जो यमराज के भैंसे पर सवार भागा जा रहा है। उसके पीछे आसमानी पुलिस है जो अब तक उसका पीछा कर रही है।'' वह यहां फिल्म समाप्त होती है।
श्याम ने चोर के पार्ट के लिए लालूराम को चुना। मैं चौंका, क्योंकि मेरी नजर में मदन लाल इस भूमिका के लिए ज्यादा मुनासिब थे। बहरहाल फिल्म के डायरेक्टर श्याम थे। मेरे दोस्त थे, मेरे दिल में उनकी बहुत इज्जत थी और है। मैं जानता था कि सिनेमा मीडियम बेहतर जानते हैं। लालूराम की शक्ल कैमरा के लिए उन्हें ज्यादा मुनासिब लगी होगी। फिर ये बात भी है कि रंगमंच की बनिस्बत फिल्म में चेहरे का महत्व ज्यादा है। लालूराम काले थे गिट्ठे थे और तिरपर थे। बस श्याम को उनका ये असाधारण चेहरा चोर के लिए जंच गया होगा। आखिर वो उन डायरेक्टरों में तो हैं नहीं जो हीरो के लिए खूबसूरत चेहरे, चॉकलेट फेस की तलाश में फिरा करते हैं। फिर फिल्म और स्टेज की एक्टिंग में कुछ फर्क भी है। फिल्म की भाषा अलग है, उसके माध्यम का संबंध छाया से ज्यादा है और शब्द से कम। चुनांच: एक्टर न होते हुए भी आदमी फिल्म में सफलतापूर्वक काम कर सकता है, बस आदमी बेबाक हो और उसका चेहरा मोबाइल हो। इस मामले में स्टेज के लवाजमात कुछ ज्यादा है। बहरहाल लालूराम ईमानदार चोर और मदनलाल चोर के बेईमान दोस्त के लिए चुन लिए गए। श्याम को फिल्म के लिए हीरो के लिए एक साथी की जरूरत थी। यानी चोर की सच्चाई की आबोताब दोस्त के झूठ और दगा को देखते हुए कुछ और बढ़ जाए। स्टेज के लिए मुजे उसकी जरूरत पेश नहीं आई, जिसकी एक वजह यह भी थी कि स्टेज का मीडियम एक्टर को इजाजत देता है कि वो खुद अपना परिचय और अपने इरादों का परिचय सीधे दर्शकों से संबोधित होकर दे दे चुनांच: मैंने नाटक में से फिल्म के इस पात्र को काट दिया।
फिल्म में स्मिता पाटिल ने रानी का पार्ट अदा किया जो उस वक्त पूना फिल्म एकेडमी से निकली थीं। फिल्मों में ये उनकी सबसे पहली भूमिका थी। इसी तरह दासी का पार्ट भी एकेडमी ही की एक नौजवान लड़की ने अदा किया। फिदा बाई जो रानी की भूमिका के लिए नाटक में चुनी गई थी। उन्होंने फिल्म में छत्तीसगढ़ी नाचा पार्टी की एक नर्तकी और गायिका का पार्ट अदा किया। वैसे ही माला बाई, जो नाटक में दासी बनी थीं, फिल्म में नाचा पार्टी की गायिका बनीं।
फिल्म और नाटक दोनों में ठाकुर राम गुरु और बाबूदास बघेल हवलदार बने। 'नया थियेटर' के दीगर कलाकारों ने फिल्म में हिस्सा जरूर लिया लेकिन कुछ नए सीन जो फिल्म में थे और नाटक से निकाल दिए गए थे, उनमें छोटी-छोटी नई भूमिकाएं निभाईं। कैमरा पर गोविंद निहलानी थे जो पहले कैमरा मैन और आगे चलकर डायरेक्टर की हैसियत से मशहूर हुए।
फिल्म का नाटक पर दबाव
गर्ज फिल्म पहले बन गई और नाटक बाद में तैयार हुआ। अब जो मैं देखता हूं तो फिल्म के नाटक पर जो गजब ढाया था, वो मुझसे संभाले नहीं संभल रहा था। मैं 95 साउथ एवेन्यु के अपने एम पी वाले फ्लैट के ड्राइंगरूम में रिहर्सल कर रहा था। ये बात अप्रैल 1975 की है, और मई में कमानी हाल में 'चरन दास चोर' का शो तय पा चुका था। एक महीने के अंदर मुझे नाटक में से वो सारी चीजें हटा देना था जो कथानक और विषय की रवानी और हमआहंगी की राहों में बुरी तरह बाधा डाल रही थीं। मुश्किल ये थी कि फिल्म से नाटक के लिए कुछ चीजें बेहद नायाब मिल गई थीं, मसलन वो दृश्य जिसमें मंत्री उद्धाटन करता है। इसके इलावा दूसरे बेहद खूबसूरत सीन फिल्म में थे जिनसे छुटकारा पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। और उनसे छुटकारा पाना मुश्किल भी था। मिसाल के तौर पर अदालत वाला सीन, जिसमें चरन दास चोरी के जुर्म में अदालत के कटहरे में खड़ा है। सीन बेहद दिलचस्प लिखा गया था और तमाशा ये कि जज का पार्ट मैं खुद कर रहा था, और मुजे इस पार्ट में बहुत मजा आ रहा था, और सिर्फ मुझको नहीं दूसरे कलाकारों को और उन लोगों को भी जो सिर्फ रिहर्सल देखने आया करते थे। मैं कपड़ा काटने की दर्जा की बहुत बड़ी कैंची से अपने नाखुन काटते हुए बेवकूफी के सवाल करता था। फिल्म में पढ़ने का चश्मा नाक पर टिका होता था, आंखें चश्मे के ऊपर उठाकर मुजरिम को देखता था, और जब बोलता था तो कुछ हकलाकर बोलता था। इस सीन को रखने के लालच से ऊपर उभरने में मुझे देर लगी। अलबत्ता चोर का साथी फौरन काट दिया गया जौहरी की दुकान की चोरी का सीन भी दिलचस्प था मगर कट गया। एक गधा भी था जो फिल्म में असी था, चरन दास उस पर सवार होकर निकलता था। नाटक के रिहर्सलों में, मैंने दो एक्टरों को मिलाकर एक गधा बनाया, बाद में उसे भी रद्द कर दिया। ये सब हुआ लेकिन एक सीन से पीछा छुड़ाना तकरीबन नामुमकिन हो गया था। वो था परलोक की चोरी का सीन। उसके रिहर्सल में ठाकुर राम चित्रगुप्त का पार्ट करते थे, और इस मजे से करते थे कि हंसी से लोगों के पेट में बल पड़ जाते थे। फिर चोर की भूमिका में उनके जोड़ीदार मदनलाल थे. वैसे भी ये दोनों जब-जब मंच पर एक साथ उतरते चाहे नाटक कोई सा भी हो, लोगबाग एक पल भी हंसी बिना नहीं रह सकते थे। बस ये दृश्य हमारे दिलो-दिमागमें बस गए। एक दिन मैंने राजीव सेठी और इंद्र राजदान, दोनों को रिहर्सल देखने के लिए बुलाया। दोनों थियेटर के आदमी थे और अच्छे भी। राजीव हमें सेट डिजाइन देने वाले थे, और इंद्र अपनी वर्कशॉप 'नाटिका' में पेपरमेशी से गहने और दीगर सामग्री बनवा रहेथे। नाटक लगभग तैयार था। मैंने उन्हें पूरा नाटक दिखाया, और आखिरी सीन दो अलग-अलग अंत लिए हुए दिखाए।
कमानी (नई दिल्ली) में पहला शो
सबकी राय हुई कि चित्रगुप्त के सीन को न काटा जाए फिर भी कमानी के पहले शो में मैंने नाटक बिना परलोक के सीन को दिखाने का फैसला कर लिया। मैंने कहा, ''एकदिन इस तरह शो करके देख लेते हैं, अगर नहीं जमा तो दूसरे दिन उस सीन को वापस ले आएंगे।'' मोनिका कहती रह गई कि ''तुम बस यही करते रहो। वही होगा जो पहले बात फैल जाएगी, फिर तुम इसे बदलते रहोंगे, बस। इसके बाद कोई देखने न आएगा। एकाध बार हो चुका है। लोग देखेंगे और बाहर जाकर यही कहेंगे कि नाटक बोरिंग है।'' बात फैल जाएगी, फिर तुम इसे बदलते रहोगे, बस। इसके बाद कोई देखने न आएगा।
किस्सा कोताह, नाटक हुआ, मैं अपने फैसले पर अटल रहा। लोग देखते रहे, हंसते रहे, फिर चरन दास के मारे जाने का एकदम सन्नाटा छा गया। लोग खामोशी से धीरे-धीरे उठने लगे, जाते-जाते उन्होंने देखा कि नाटक मौत पर खत्म नहीं हुआ, चल ही रहा है। एक गाना, उसके बाद आखिरी गाना। पहले में लोगों की लंबी कतार फूल लिए धीरे-धीरे बढ़ी। जिस जगह चोर की मौत हुई थी वहां सफेद पंथी झंडा स्थापित कर दिया गया था, उस पर नारियल चढ़ाया गया, फूल फेंके गए, इसके बाद आखिरी गाना, ''एक चोर ने रंग जमाया'' कोरस ने गाया, और गाने के अंत में हॉल देर तक तालियों से गूंजता रहा। लोग हॉल में खड़े थे, बहुत से दरवाजों तक पहुंच गए थे, जहां-जहां थे वहीं खड़े-खड़े बस देर तक तालियां बजाते रहे। नाटक कामयाब हुआ। राजीव दौड़ा हुआ आया और लिपटकर बोला, ''यू आर ए जीनियस, इट इज वंडरफुल''
बस वह शो आज तक नहीं भूलता। साफ जाहिर था कि लोग मौत के अंजाम की बिल्कुल उम्मीद नहीं कर रहे थे, बस इस सीन को देखकर देर तक सकते के आलम में आ गए। गनीमत है आखिरी सीन को बदलने की नौबत नहीं आई। राजीव, इंद्र, मोनिका सब इस अंत पर राजी हो गए।
नए नाटक के बारे में समय से पहले ये सोच लेना कि वह सफल होगा या नहीं, असंभव है। परख की अंतिम कसौटी दर्शक ही होता है। निर्देशक अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर चुकने के बाद प्रस्तुती को उस अंतिम कसौटी पर छोड़ देने पर मजबूर है। कोई सत्तर आर्टिस्ट कमानी के शो में मैंने उतार दिए थे। जिला दुर्ग के ग्राम धनौरा के देवदास बंजारे की पंथी पार्टी के बारह सदस्यों के अलावा बारह सदस्यों की महिला पंथी पार्टी भी थी। लिट्रल बेले ट्रुप के रानू बर्धन और हेमंत दास गुप्ता के साथियों ने, संगीत की रचना भी की थी। आर्केस्ट्रा में रानू बर्धन खुद सितार पर थे और हेमंतदास गुप्ता, जिन्हें हम उषा दा कहते थे, विचित्र वीणा पर। उनके अलावा एल बी टी के दिनेश सरोद पर और ज्ञान शर्मा, जो बाद में आकाशवाणी में आ गए थे, चेलो पर थे। दो आर्टिस्ट वॉयलिन बजा रहे थे। म्युजिक में बहार आ गई थी। गर्ज हमने दर्शकों पर धौंस जमाने में कोई कसर न उठा रखी थी।
राजीव सेठी, सब जानते हैं कि अच्छे डिजाइनर हैं लेकिन ये बाद शायद कम लोग जानते हैं कि वो एक अच्छे एक्टर भी हैं। अपने कॉलेज के जमाने में उन्होंने ऑस्कर वाइल्ड की कॉमेटी 'लेडी विंडरमेयर्स फैन' में बहुत अच्छा और वाइल्ड ही के खास स्टाइल में पार्ट किया था जो मैंने बरसों पहले लेडी इर्विन कॉलेज के लिए अंग्रेजी में पेश किया था।
पहला सेट जो राजीव ने डिजाइन किया था, उसमें भी थोड़ी बहुत ताम-झाम थी। चबूतरा वही था, छ: फिट बाई बारह फिट, ऊंचाई नौ इंच, लेकिन वह पेड़, जो बाद की तमाम प्रस्तुति में और आज तक चबूतरे के पीछे, बीच से जरा हटकर स्थापित किया जाता है, उसके बजाए कमाने के शो में चबूतरे के ऊपर पीछे की तरफ लकड़ी का एक 'कुंदा' लगाया गया था, जिस पर परदे लटके थे। परदों पर तस्वीरें पन्च कर दी गई थीं, यह दिखाने के लिए कि ये मंदिर, चौपाल, मालगुजार का गोदाम, सरकारी खजाना या रानी की ख्वाबगाह है। परदे रस्सियों पर थे, रस्सियां चर्खियों पर, और जब कोरस के लोग सामने एक कोने में खड़े गा रहे होते थे और बाकी मंच पर अंधेरा होता था तो राजीव खुद परदे उठाने-गिराने में लग जाते थे।
बाद में मैंने देखा कि हमें जगह की पहचान दर्शाने की आवश्यकता नहीं है। मैंने उसी एक चबूतरे का प्रयोग अलग-अलग दृश्यों में अलग-अलग ढंग से किया है। कभी सीन चबूतरे पर, कभी चबूतरा छोड़कर मंच के बाकी हिस्से पर सीमित, और कभी दोनों जगहों का इस्तेमाल। गोया इस तरह संतुलन बदल-बदलकर और फिर सन्वाद के शब्दों और अभिनेताओं की मुद्रा, सामग्री और एक्शन की मदद से दर्शक पहचान लेते हैं कि जगह कौन सी है। चुनांच: चंद एक शो के बाद सेट पहले यूं बदला कि चबूतरे के पीछे बीच से जरा हटकर जहां आजकल केवल एक पेड़ होता है, वहां दो बांस जरा तिरछे जाविये (कोण) पर खड़े कर दिए जाते और ऊपर उन बांसों के बीच पेड़ की एक शाख लगा दी जाती।
आगे चलकर ये एहतेमाम भी खत्म हुआ, महज पेड़ रह गया। फिर उस पेड़ में कुछ और सादगी आ गई। लकड़ी का एक चौखटा खांचा बनाकर, उसके अंदर एक मोटे और अंदर से खोखले बांस का कोई तीन फिट लंबा टुकड़ा जो हम साथ लेकर चलते, ठोंक दिया जाता, और उस बांस के अंदर किसी पेड़ से काटी हुई कोई चार-पांच फिट ऊंची पत्तों भरी डाले लगा दी जाती, बस। कमानी के चार शो के तुरंत बाद त्रिवेणी के खुले मंच पर बारह शो एक साथ हुए। हर रोज हॉल भरा रहा। और उसके फौरन बाद बारह शो हरियाणा के शहरों में कराए गए। बस गोया नाटक चल पड़ा। महिला पंथी पार्टी त्रिवेणी तक साथ रही, उसके बाद वापस भेज दी गई। संगीत वालों का पूरा अमला हरियाणा भी गया और उसके बाद भी बहुत दिनों तक साथ-साथ चलता रहा। फिर वो भी कम होते-होते तबला, पेटी, क्लेरिनेट, मंजीरा, ढोलक में सीमित होकर रह गया। और इस तरह नाटक को हल्का-फुल्का बनाकर हम सारे हिंदुस्तान की गर्दिश करते रहे।
कलकत्ता चोर को ले उड़ा
इस गर्दिश में कलकत्ता केंद्र बन गया था। कलकत्ता हम इस नाटक को हर साल, और कभी-कभी एक ही साल में दो तीन बार ले जाते रहे। सबसे पहले कलकत्ता के प्रसिध्द लेखक और समीक्षक अशोक सेन ने बुलाया, बड़ी शीन से उसका एक मैदान में मंचन करवाया जिसमें शंभू मित्रा भी आए। उस वक्त मदनलाल चोर की भूमिका में नहीं थे, उनकी जगह गोविंद निर्मलकर आ गए थे। बरसों बाद जब शंभू मित्रा ने सुना कि इसी पार्टी में दीपक तिवारी आ गए हैं तो पहले तो उन्होंने कहा गोविंद की बात किसी दूसरे अभिनेता में नहीं आ सकती, और जब आगे चलकर दीपक को देखा तो कहने लगे, ये भी बहुत अच्छा है, इसका अंदाज जुदागाना है। किसी ने कहा, ''शंभू दा। आपने मदनलाल को नहीं देखा, वर्ना शायद आप किसी को भी खातिर में न लाते।'' बाद में अशोक मित्रा ने चार नाटकों का आयोजन किया, जो रविन्द्र सदन में प्रस्तुत किए गए। उनमें 'मिट्टी की गाड़ी', 'लाल शोहरत राय', 'गांव के नांव ससुरार मोर नांव दमाद' के साथ 'चरन दास चोर' भी शामिल था। इस दफा सत्यजीत राय तशरीफ लाए, और उन्होंने चारों नाटक बड़े शौक से देखे।
अशोक मित्रा के बाद सुब्रोतो पाल ने भी खुले मैदान में हजारों के मजमे में 'चरन दास चोर' करवाया। बस अब तक सारे शहर में नाटक मशहूर हो चुका था। लोगों का तांता बंधा रहता था। नंदीकार ने अपने सालाना उत्सव के लिए फाइन आर्ट्स एकेडमी थिएयर में एक बार क्या बुलाया कि बरसों बुलाते रहे वो इस नाटक में ऐसे उलझे कि हर साल एक नया नाटक बुलवाते मगर उसके साथ हमेशा ''चरन दास चोर'' की फरमाईश जरूर करते। ये बात बिल्कुल वही थी जो पारसी थिएटर के जमाने में अमानत की 'इंद्रसभा' के साथ हुआ करती थी। वो शहर-शहर घूमकर अपनी रिपर्टरी के ड्रामे दिखाती रहती थीं, 'मुहब्बत का फूल', 'सीता बनवास', 'बिल्वा मंगल', 'यहूदी की लड़की' आदि और जब ये नाटक किसी-किसी जगह चलते दिखाई न देते और कल्लांच हो जाने का भय आ घेरता तो अपनी झोली से वही जादुई सामान यानी अमानत की 'इंद्रसभा' निकालकर पेश कर देते। हॉल फिर भरना शुरू हो जाता। इसीलिए हर पारसी थिएटर कंपनी कोई और ड्रामा रखे न रखे, अमानत की 'इंद्रसभा' जरूर अपनी रिपर्टरी में शामिल कर लेता था। बिल्कुल यही हाल 'चरन दास चोर' का था। नंदीकार को यकीन था कि 'नया थियेटर' के दूसरे ड्रामों में टिकट बिकें न बिकें, 'चरन दास चोर' में जरूर हाल भर जाएगा और होता भी यही था।
बॉक्स ऑफिस दस बजे खुलता था, दर्शक टिकट खरीदने के लिए चार-पांच बजे सुबह से काउंटर पर जम जाते थे। एक बार जब नंदीकार के तत्वावधान में रवींद्र सदन में 'चरन दास चोर' आयोजित था, सुबह सबेरे से मूसलाधार पानी बरस रहा था, फिर भी टिकट खरीदने लोगों की भीड़ तड़के से इकट्ठा हो गई, और थोड़ी देर में सब टिकट बिक-बिका गए। बारिश देर तक उसी जोरो-शोर से होती रही, नंदीकार वालों ने देखा कि एक बहुत बड़ा मजमा थिएटर के बरामदे में टिकट से निराश होकर पानी रुकने का इंतेजार कर रहा है और उसमें भारी संख्या में विद्यार्थी भी हैं, तो उन्होंने सबको दिलासा देने की खातिर मुफ्त कॉफी बांट दी। 'चरन दास चोर' न सही, मुफ्त कॉफी सही।
सुब्रोतो पाल ने मुझसे कहा, ''हबीब तुम्हारे नाटक से आयोजकों को तो फायदा हो रहा है लेकिन तुम्हारा थिएटर वो पैसा नहीं कमा रहा है, जो चाहिए। तुम ऐसा क्यों नहीं करते, एक बार अपनी तरफ से कलकत्ता में शो करो और दो-चार नहीं, कम से कम बीस शो करो। युनिवर्सिटी थिएटर में करो। बुकिंग मैं कर दूंगा। पब्लिसिटी हम करवा देंगे, टिकट भी छपवा देंगे, बॉक्स आफिस और थिएटर हाल में इंतेजाम के लिए हम अपने वालंटियर तैनात कर देंगे, बस तुम हां कहो। हम सोचकर मुनासिब टाइम तय कर देंगे, तुम आओ और बस सिर्फ शो लेकर आओ, ठहरने की व्यवस्था और बाकी सब काम हम पर छोड़ो। मुझे यकीन है तुम 'नया थियेटर' के लिए बहुत पैसे कमाओगे।''
हम गए और बीस शो हमने किए। 'यूनिवर्सिटी थिएटर' कलकत्ता के उत्तर में है। कलकत्ता के बहुत से पुराने पेशावर थिएटर उन्नीसवीं सदी से वहीं स्थापित रहे हैं। उन्हीं में से एक मशहूर थिएटर 'स्टार थिएटर' है, जहां उस वक्त तक उसी पुराने ढंग के नाटक होते भी रहे थे। ये 'स्टार थिएटर' के जल जाने से पहले की बात है। ऐसी जगह पर दर्शकों की वैसे भी कमी नहीं थी। चुनांच: हमारे शो में अक्सर हॉल बिल्कुल भर जाता था और कभी अगर पूरा हाल नहीं तो तीन चौथाई लोगों से भरा होता था। जब बीस दिन खत्म होने पर आए, तो आखिर के चार-पांच दिन थिएटर छकाछक भर जाता और बहुत से लोगों को वापस जाना पड़ता। यहां तक कि आखिरी शो में भी बहुत से दर्शक निराश वापस गए।
थिएटर के मामले में कलकत्ता एक अजीब शहर है। मुंबई और दिल्ली की तरह यहां थिएटर जाने वालों का कोई विशेष वर्ग नहीं। सभी लोग, लगभग सारा कलकत्ता, शायद सिवा बड़े-बड़े महाजनों और व्यापारी तबके के लोगों के हर व्यक्ति थिएटर जाता है अगर नाटक अच्छा हुआ तो महीनों, बरसों चलता रहता है। पहले बंगला भाषा में ये हाल था और अब हर थिएटर के लिए दर्शक मौजूद हैं, जिनमें प्रोफेसरों, छात्र-छात्राओं, पत्रकारों लेखकों, आर्टिस्टों के अलावा आम आदमी हर वर्ग का शामिल है। क्या रिक्शा चलाने वाले क्या तरकारी-भाजी बेचने वाला, बस ये खबर पहुंच जाए की थिएटर अच्छा है, हर व्यक्ति किसी न किसी तरह पहुंच जाने के लिए आमादा रहता है। चाहे शंभू मित्रा का 'चार अध्याय' हो चाहे सांवली मित्रा का 'द्रौपदी' चाहे 'चरन दास चोर' बस अच्छा हो, और अगर अच्छा न हुआ तो ये भी सच है कि फिर कोई नहीं पूछता।
एक बार हमारे साथ यही हुआ। हम चार नाटक लेकर गए थे। जगह वही रवींद्र सदन। उनमें, बस एक नाटक में किसी बात की शायद कमी रह गई थी। लेकिन सारे शो दर्शकों से भरे रहे इस कमजोर शो में भी यही हाल रहा। उम्मीद जो बन गई थी कि सब नाटक अच्छे तो होंगे ही। बस फर्क इतना था कि बजाए तालियों के शोर के जो हर रोज हम सुनते रहे, इस एक शो में दर्शक आखिर तक देखते रहे, उसके बाद उठे और उसी तरह खामोशी से चले गए। हम समझ गए कि नाटक पसंद नहीं आया। मैंने कलाकारों से पूछा कि शो आप लोगों को कैसा लगा? सबने एक आवाज में कहा, बुरा। मैंने कहा मुझे भी शो कुछ ठीक नहीं लगा। हम लोग बहुत देर तक सर जोड़कर सोचते रहे कि प्रोडक्शन में आखिर क्या खराबी थी। बात समझ में नहीं आई। बजाहिर सब पार्ट ठीक ही कर रहे थे, कुछ ज्यादा अच्छा, कुछ कम, लेकिन ये तो हर नाटक में होता है।सोचा कि शायद सेट बहुत भारी हो गया था. बहुत-सी और कमजोरियां तलाश करते रहे, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए। बस एक बात पर सब सहमत थे कि कुछ न कुछ कमी ऐसी थ जिससे शो बिगड़-सा गया था। इस नाटक को दोबारा कलकत्ता ने फिर नहीं और अगर बुलाता भी तो शायद देखने कोई नहीं आता।
वह नाटक था 'साजापुर की शांति बाई'। ब्रेश्ट के 'गुड वोमन ऑफ सेंट्जुआन' का मेरा रूपांतर। इस नाटक के बहुत कामयाब शो कुछ अर्से पहले हम दिल्ली में कर चुके थे। कुछ बरस बाद जब मैं पंडित रविशंकर युनिवर्सिटी, रायपुर में विजिटिंग प्रोफेसर था, तो रायपुर के कुछ एक्ट्रों को 'नया थियेटर' के कलाकारों को साथ मिलाकर यह नाटक बड़ी मेहनत से दोबारा तैयार किया गया, एक नया सेट भी बनवाया था और उसे कलकत्ता लेकर आया था। फिदाबाई जो शांति का रोल पहले से करती चली आई थीं, इस बार भी नाटक की नायिका वही थी, और उन्होंने अभिनय भी बजाहिर उसी तरह दिल लगाकर और बहुत अच्छी तरह किया था। इसके बावजूद नाटक कलकत्ता में फेल हो गया। फिदाबाई खुद अपने रोल से असंतुष्ट थीं। कह रहीं थीं, ''कौन जाने का होगे रहस, मजा नई आइस।''
अशोक सेन ने कहा, ''असल में ये नाटक नदींकार कर चुका है,और इसमें नायिका का पार्ट रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता की पहली पत्नी जिनका इन्तेकाल हो गया था, वो कर चुकी है।''
फिदाबाई को विश्व स्तर की एक महान अभिनेत्री मानता हूं। जितनी भूमिकाएं उन्होंने 'नया थियेटर' के नाटकों में निभाई हैं, उनमें खासतौर से मुझे दो बेहद पसंद हैं। मेरी राय में ''बहादुर कलारिन'' और ''साजापुर की शांति बाई'' में उनकी कला चोटी पर पहुंच गई थी। ये और बात है कि कलकत्तावालों के लिए फिदा बाई का छत्तीसगढ़ी संवाद, जो दीगर हर नाटक में उन्हें पसंद आया था, वो उस नाटक के बंग्ला संवाद की तुलना में इतना न जंचा हो। बहरहाल मैं इतना मानता हूं कि इस प्रस्तुत में वो फिजा कायम न हो सकी जो उससे पहले इसी नाटक की पहली प्रस्तुति में कायम हो गई थी। चुनांच: कोई बात थी जिसकी वजह से उस नाटक का स्वागत कलकत्ता के दर्शकों ने नहीं किया। अब फिजा में क्या कमी थी और क्यों थीं, वो बात आज तक समझ में नहीं आई। शायद मेहनत जरूरत से ज्यादा कर ली हो। मेहनत वैसे हर नाटक की तैयारी के लिए ज़रूरी है,लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि महज मेहनत से कला उत्पन्न नहीं होती। इसके लि कुछ खूने-जिगर की भी जरूरत होती। शायद खून जलाने में इस बार कुछ कमी रह गई हो। बस जो बात एक बार फिर समझ में आई, वो यह थी कि एक छत्तीसगढ़ का ग्रामीण क्षेत्र और दूसरा कलकत्ता। उन दोनों जगह के थिएटर देखने वाले विश्व-स्तर के अच्छे दर्शकों में आसानी से गिने जा सकते हैं। इसका मुझे हमेशा यकीन रहा, और इस घटना के बाद ये यकीन कुछ और गहरा हो गया।
यूरोप की पहली यात्रा
एक वह कमानी का पहला शो एक एडबंरा का यादगार शो। नाटक लेकर हम लोग पहली बार विदेश अगस्त 1982 में गए थे। एडबंरा अंतर्राष्ट्रीय नाटय उत्सव के सिलसिले में और फिर फ्रिंज फेस्टीवल में फिरंज फेस्टीवल में नये-नये तजुर्बाती, कलात्मक नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं और उन्हें इनामात दिए जाते हैं। फ्रिंज फेस्टीवल में कोई बावन नाटक थे। जापान, अमेरिका और यूरोप के मुल्कों के। हिंदुस्तान से केवल हमारा नाटक था। जिस दिन हमने अपना शो पेश किया, उसी दिन हमें खबर मिली कि 'चरन दास चोर' को, जिसका नाम अंग्रेजी में 'चरन द थीफ' रख दिया गया था, फ्रिंज फर्स्ट अवार्ड मिला।
अपने शो के बाद हम लोग किसी और मुल्क के नाटक का रात का शो देख रहे थे। शो खत्म होने पर बाहर निकले तो जेन दौड़ी हुई आई और मुझसे लिपट गई। जेन क्वीन और एरिका बोल्टन उन दो लड़कियों ने हमारी पब्लिसिटी का जिम्मा लिया था। जेन कहने लगी, 'चरन द थीफ' को फ्रिंज फेस्टीवल का प्रथम पुरस्कार कल तुम मशहूर आदमी हो जाओगे हबीब उन्हें खुशी खास तौर से इस बात की थी कि एडबंरा का स्काट्समैन अखबार का एडीटोरियल बोर्ड जो हर साल फिरंज अवार्ड दिया करता है, उसने एडबंरा फेस्टीवल के इतिहास में पहली बार इस अवार्ड का एलान समय से पहले कर देने का फैसला किया था। आमतौर से वह फेस्टीवल खत्म हो जाने के बाद अपने फैसले सुनाते रहे थे। दूसरे दिन सुबह खबर अखबारों में छप गई और चारों तरफ फैल गई। स्काट्समैन के एडीटोरियल बोर्ड का एक सदस्य मुझे पूछने लगा, ये कैसे हुआ? हाल में मुश्किल से बस दस बारह हिंदुस्तानी होंगे, बाकी अंग्रेजों और दीगर गोरों से हाल भरा हुआ था। हम हिंदी नहीं समझते, छत्तीसगढ़ी तो दूर रही। फिर ये नाटक हमें इतना पसंद क्यों आ गया? मैंने कहा, ''मैं लाइटिंग बूथ में बैठा इन्टरवल तक शो देखता रहा। इसके बाद अपना पार्ट करने गया। मैंने देखा कि नाटक के छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार कुछ इस तरह अभिनय कर रहे थे जैसे अपने गांव के चौपाल में हों, और दिल में सोच रहे हों कि हम इंसानों की बोली बोल रहे हैं। देखने वाले भी इंसान हैं, हमारी भाषा जरूर समझ रहें होंगे। बस इस आत्मविश्वास, इस खुले-डुले अंदाज, इस बेबाकी ही का शायद ये नतीजा है कि नाटक का जादू सर पर चढ़कर बोला। ये भी हो सकता है कि चंद हिंदुस्तानी दर्शक जो मुस्तकिल हंसते रहे, उनका असर दूसरे दर्शकों पर भी पड़ा और वो भी हंसते रहे। और अगर ये सब नहीं है, तो मुझे नहीं मालूम और क्या बात है।''
आलोचकों ने जब नाटक की समीक्षाएं लिखीं तो आमतौर से कहा कि पीटर ब्रुक के लेख ने नाटक के प्रति दर्शकों के दिल में बड़ी-बड़ी उम्मीदें पहले से ही पैदा कर द थीं। चुनांच: हमें ये अंदेशा था कि तारीफों के इस तोमार के बाद नाटक कसौटी पर शायद पूरा न उतर सके, लेकिन नाटक उम्मीद से भी ज्यादा रोचक निकला। बस ये सब था, और सारे कलाकारों की तारीफें ही तारीफें थीं। लंदन के अखबार में गोविंद की आंखों की तारीफ थी जिन्हें कहा गया था। रवि के कॉमिक अंदाज की प्रशंसा थी। गोविंद निर्मलकर और रविलाल सांगडे हवलदार की भूमिकाओं में थे। पूनम के बच्चे तक की तारीफें थीं। पूनम सोनवानी कोरस में थीं। उनका डेढ़ साल का बच्चा आर्केस्ट्रा में छोड़ दिया जाता था, वह वहां से जरा न हिलता। जब भी म्युजिक शुरू होता, वहीं बैठे-बैठे ताल पर झूमता रहता था। पूनम की मां राधा बहुत अच्छा नाचती है, खुद पूनम बेहतरीन डांसर है, उस बच्चे ने मां की कोख में लय ताल सीखी होगी। ताल से जरा नहीं चूकता था। एक अखबार के फ्रंट पेज पर उसकी एक बड़ी तस्वीर छपी। समीक्षक ने लिखा कि बच्चा ऐसी खामोसी से बैठा था कि बड़ी देर तक हम देख ही नहीं पाये, और जब देखा तो हैरान रह गए। इंग्लिस्तान और यूरोप के दीगर ममालिक में एक उम्र तक बच्चों को स्टेज पर लाना कानूनन मना है। बस गोया उस समीक्षा की हैरत का कारण एक ये भी रहा होगा।
पीटर ब्रुक के लेख ने इंग्लिस्तान के बहुत से लोगों पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। पीटर अपनी महाभारत की तैयारी के सिलसिले में जब सारे हिंदुस्तान के सफर पर निकले थे तो उन्होंने हमारे नाटकों के भी कुछ रिहर्सल देखे थे जिनमें 'लाला शोहरत राय' जो मोलियर की कामेडी पर आधारित है, 'चरन दास चोर' आदि शामिल थे। हमसे 'नया थियेटर' के लोक कलाकारों के बारे में बातें कीं, और जब कुछ दिनों के लिए अपने वतन इंग्लिस्तान वापस गए तो लंदन टाइम्स के मशहूर आलोचक इर्विंग वार्डल ने उनसे फोन पर उनके हिंदुस्तान के सफर से मुतल्लिक इंटरव्यु के लिए वक्त तलब किया। पीटर ब्रुक गो अंग्रेज हैं पर मुद्दत से उन्होंने फांस को अपना वतन बना लिया है, वहीं रहते हैं, वहीं ड्रामे तैयार करते हैं और उन्हें सारी दुनिया में दिखाते हैं। उस दिन वो पैरिस जाने वाले थे। उन्होंने माजरत (क्षमा-याचना) की, कह दिया- ''इंटरव्यु के लिए मेरे पास वक्त नहीं है, आज ही मुझे पैरिस निकलना है वार्डल ने कहा, 'इंटरव्यु टेलीफोन ही पर लेने दीजिए।'' वो राजी हो गए। वह इंटरव्यु टाइम्स में आधे सफ्हे पर छपा। जिसमें उनके केरल, तमिलनाडु, बंगाल, दिल्ली वगैरह के सफर का जिक्र था। थिएटर के मुशाहिदे शामिल थे। दिल्ली थिएटर के सिलसिले में सारी बातें 'नया थिएटर' पर केंद्रित थी। कोई दो लंबे पैराग्राफ उसी पर थे और मोलियर के ड्रामे के अलावा 'चरन दास चोर' का भी जिक्र था। बस उन लेखों के कारण हमें जो पब्लिसिटी मिल गई थी, उसी के आधार पर हम बुलाये गए थे। फेस्टीवल ऑफ इंडिया में शिरकत की बुनियाद गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के फैसले पर होती है। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने एन एस डी के एक नाटक को भेजने का फैसला कर लिया था जिसका निर्देशन इब्राहिम अलकाजी ने किया था।
एडंबरा में जो नाटक भेजे जाते थे आमतौर से उनका प्रदर्शन लंदन के किसी थिएटर में भी किया जाता है और जिस नाटक को पुरस्कार मिलता है, उसे इंग्लिस्तान, आयरलैंड वगैरह के मुख्तलिफ शहरों में भी भेजा जाता है। उस जमाने में लंदन के थिएटर रीवर-साइड स्टूडियोज में एडंबरा फ्रिंज का पुरस्कृत नाटक दिखाया जाने वाला था।
एडंबरा के बाद लंदन
रीवर साइड के आर्टिस्टिक डायरेक्टर डेविड गोथार्ड थे। ब्रूक का इंटरव्यू पढ़े के बाद डैविड इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि हिंदुस्तान से 'नया थिएटर' को ही बुलाया जाए। कुछ महीने पहले केनिथ रिया का भी एक मजमून (लेख) एक थिएटर मैंगजीन में छपा जिसमें उन्होंने हमारे नाटकों का प्रशंसा के साथ जिक्र किया था। उसका असर भी लंदन थिएटर की दुनिया पर पड़ा था। क्रेनिथ रिया लंदन के थिएटर स्कूल में शिक्षक हैं, खुद नाटक लिखते भी हैं, और अपने नाटकों का निर्देशन भी करते हैं, और आमतौर से थिएटर के बारे में समीक्षा भी लिखते रहते हैं। वह एक साल पहले, महीने दो महीने के लिए हिंदुस्तान आए हुए थे और सारे मुल्क का सफर किया था। चंद हफ्ते दिल्ली में भी गुजारे थे। दिल्ली के जमाने में वह हम से कई दिनों तक मिलते रहे, हमारे नाटकों के रिहर्सल देखते रहे, और मुझसे बातें करते रहे। इस मुशाहिदे (पर्यवेक्षण) और सफर के इस तजुर्बे के बारे में लंदन वापस पहुंचकर उन्होंने अपना ये लेख लिखा जिसमें और नाटकों के अलावा 'चरन दास चोर' का भी बयान छपा था।
डेविड गोथार्ड पर इन दोनों के लेखों का असर पड़ा था, और उन तस्वीरों का भी जो उन्होंने हमसे मंगाई थी। चुनांच: डेविड ने हिंदुस्तान के सरकारी फैसले को न मानते हुए 'चरन दास चोर' ही की मांग की, और 'नया थियेटर' को निमंत्रण भेज दिया। सरकारी इंट्री के मुताबिक एन एस डी का नाटक फेस्टीवल ऑफ इंडिया के लिए आया। जिसका एडबंरा ड्रामा फेस्टीवल से कोई संबंध न था। चुनांच: उसे लंदन कामनवेल्थ थिएटर में जगह दी गई। वह चलाया गया, फिर उखड़ गया। पांच एक सौ के खुले थिएटर में हर रोज तीस-चालीस दर्शक जाते थे, चुनांच: उस शो के बारे में लंदन के अखबारों ने कुछ लिखा भी नहीं।
मैं ये बात पहली बार क्यों लिख रहा होऊंगा? उसकी एक वजह तो ये है कि जिसे थिएटर कहते हैं और जिसमें नकल का पहलू होता है उसका मैं कभी कायल नहीं रहा। इंग्लैंड से सीखी हुई चीज इग्लैंड में, क्यों? अलकाजी ने भी इंग्लिस्तान से थिएटर की तालीम हासिल की, मैंने भी। उनकी जबान यों भी अंग्रेजी ही थी, हिंदी सीखी हुई थी जिस पर उन्हें इतनी महारत नहीं थी जितनी की अंग्रेजी पर। उनके नाटकों में उसी तालीम की झलक हमेशा नजर आती रही और मैं मुद्दतों पहले यकीन की हद तक इस नतीजे पर पहुंच गया था कि थिएटर में अगर किसी और कल्चर की नकल की झलक है, तो वह असली थिएटर नहीं है। थिएटर को अपने मुल्क, अपने समाज की जिंदगी, अपने मुल्क की शैली में कुछ इस तरह पेश करना चाहिए कि बाहर के लोग देखकर यह कह सकें कि ये भी एक थिएटर हैं, थिएटर के सारे लवाजमात तत्व उसमें मौजूद हैं, हमें उसमें वही मजा आता है जो थिएटर में आना चाहिए लेकिन अगर हम ऐसा थिएटर खुद करना चाहें तो नहीं कर सकेंगे। यानी थिएटर में इलाकाइयत (आंचलिकता) का दामन न छोड़ते हुए विश्व स्तर पर पहुंचना कामयाब थिएटर की कुंजी है। आज ऐसे थिएटर हमारे मुल्क में कम सही मगर है जरूर।
इस बात को पहली कभी न कहने की वजह यह है कि अपने ही हमपेशा, हम-मशरब लोगों के बारे में ऐसी सच्ची बातें कहने में झिझक महसूस होती है, इसलिए कि आमतौर से हमारे कुछ आर्टिस्ट किसी भी प्रकार की आलोचना बर्दाश्त नहीं करते, फिर उससे गलतफहमियां पैदा होने की भी संभावना पैदा होती है। अब इस उम्र में आकर ये बात कहना मुझे इसलिए मुनासिब मालूम होता है कि इस लेख से नौजवानों को वह सीख मिले जो मैं देना चाहता हूं, जिस पर मुझे गहरा यकीन है, बस बहरहाल जब हमें पुरस्कार मिल गया तो वही सरकार जिसने पहले हमारा विरोध किया था, तारीफें करने लगी। प्रधानमंत्री ने मुबारकबाद का तार भेजा। इंडियन हाई कमिश्नर ने सारे कलाकारों को एम्बेसी में हाई टी पर बुलाया, तरह-तरह के पकवान खिलाए और अनपढ़ ग्रामीण कलाकारों की तारीफों के पुल बांध दिए। मेरा कलेजा खुशी और गौरव से फूल गया कि जिन देहातियों की आमतौर से अपने मुल्क में कोई कदर नहीं होती, आज उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने कमाल का सिक्का बैठा दिया।
एडबंरा अंतर्राष्ट्रीय नाटयोत्सव से प्रथम फ्रिंज पुरस्कार की पब्लिसिटी लिए हम लंदन रिवरसाइड स्टूडियोज पहुंचे। पहले ही शो में लंदन के सारे बड़े अखबारों के आलोचक मौजूद थे। डेविड ने कहा ''उन पब्लिसिटी वाली लड़कियों ने कमाल कर दिया हबीब। आज उन्हीं की वजह से तुम्हारा शो देखने सारे क्रिटिक जमा हैं।'' शो के बाद जेन मेरे पास दौड़ी आई और कहा ''हबीब फौरन चलो मेरे साथ, माइकल वेलिंग्टन लंदन आब्जर्वर के आलोचक, दफ्तर में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।'' मैंने कहा ''जरा लिबास बदल लूं। कहने लगी - ऐसे ही चले आओ, उन्होंने आज ही समीक्षा लिखना है। माइकल वेलिंग्टन थिएटर के दफ्तर में मेरा इंतजार कर रहे थे। मेकअप उतारे बगैर राजपुरोहित के लिबास में, खड़ाऊं हाथ में लिए, नंगे पांव उनके साथ हो लिया। रास्ते में जेन बताती रही कि लंदन में आज बड़े-बड़े नाटकों के प्रीमियर हुए हैं। कोई उम्मीद नहीं थी कि कोई भी बड़ा आलोचक आज हमारा नाटक देखने आएगा। सब यही कहते रहे दो एक दिन बाद हम जरूर आ जाएंगे, अभी नहीं। बड़ी मुश्किल से हमने राजी किया। मुझे खुशी है कि दूसरे सारे प्रेमियर छोड़कर लंदन के सारे बड़े समीक्षक आज शो देखने आए हैं। कल सुबह लंदन के सब प्रमुक अखबार 'चरन द थीफ' के रिव्यु से भर जाएंगे। यही हुआ। वरर्विंग वार्डल ने टाइम्स में, माइकल वेलिंग्टन ने आब्जर्वर में नाटक को उछाल दिया। रिवरसाइड स्टूडियोज में दो हफ्ते के प्रदर्शनों में हर रोज थिएटर छकाछक भरा रहता। इक्का-दुक्का हिंदुस्तानी दोस्त बी बी सी के, कभी कभार आ जाते वर्ना आमतौर से सब दर्शक अंग्रेज। मैं शुरू में दो-तीन मिनट बोलता, चोर के पांच प्रण बता देता कि इन्हीं पर नाटक आधारित है। मुश्किल से तीन शो हुए होंगे कि एक दिन डेविड गोथार्ड ने मुझे कहा ''हबीब। लोक नाटक समझ रहे हैं। छपे प्रोग्राम में गानों का भी और सीन-ब-सीन कथासार का भी अंग्रेजी अनुवाद उनके हाथों में हैं। चाहे उसे मध्यांतर में पढ़ें, चाहे घर जाकर इत्मेनान से देखें। बहरहाल तुम्हारा कुछ बोलना अनावश्यक है। बस आज से सीधे नाटक दिखाओ।''
विजयदान को 'चोर' नापसंद था
1987 में बस्तर और राजस्थान के कलाकारों को सोवियत यूनियन ले जाने से पहले दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में तीन दिनों का रिहर्सल तय हुआ था।
लांगा और मंघानयार ग्रुप के साथ कोमल कोठारी और विजयदान देथा दिल्ली तक आए थे, और लॉन पर मेरे साथ बैठे रिहर्सल देख रहे थे। मैंने बहतु पहले से सुन रखा था कि बिज्जी को मेरा 'चरन दास चोर' का प्रोडक्शन पसंद नहीं है। इसके अलावा उन्हें एक और शिकायत थी कि कभी उन्हें नाटक के शो में कोई रॉयल्टी नहीं मिली। मैंने मौका गनीमत जानकर चुपचाप दस हजार का एक चेक विजयदान के नाम लिखकर उनकी तरफ बढ़ा दिया, ये कहते हुए कि 'चरन दास चोर' के शो मुद्दत से बराबर चल रहे हैं, आज तक मुझे तौफीक नहीं हुई कि मैं कुछ रॉयल्टी आपकी खिदमत में पेश करता, बस आज ये हकीर (मामूली) रकम पेश करने का मौका मिला है जो वैसे कम है लेकिन आप इसे कबूल कर लें तो मुझे बहुत खुशी होगी। ''बिज्जी ने चेक लिए बगैर खामोशी से अपनी नजर कोमल की तरफ घुमा दी। कोमल दा बोले - भई, मुहब्बत से दे रहे हैं, ले लो।'' और बिज्जीने चेक उसी खामोशी से स्वीकार कर लिया। फिर मैं बोला कि ''सुना है आपको मेरी प्रस्तुति पसंद नहीं।'' विजयदान बड़े लेखक होने के अलावा इंसान की हैसियत से मुझे बहुत पसंद थे- सच्चे, ईमानदार, बेहद शरीफ और वजादार आदमी हैं। मेरे दिल में उनके लिए हमेशा इज्जत का जज्बा रहा है। वो बोले : ''तुमने कहानी का अंत खराब कर दिया। कहानी में, मैं ये बताना चाहता हूं कि रानी बुराई और अत्याचार की प्रतीक है। वह झूठ बोलकर मरवा देने के बाद गुरु से शादी की योजना पेश करती है, और गुरु स्वीकार करता है और उसके साथ शादी कर लेता है यानी बुराई, अत्याचार, झूठ, कपट और भ्रष्टाचार खत्म नहीं होता बल्कि जारी रहता है जिससे जूझने और जिसे खत्म करने की आवश्यकता बाकी रहती है। तुमने चोर की मृत्यु पर नाटक खत्म करके एक रोमांच पैदा कर दिया। यही नहीं, तमने चोर को पूजा के योग्य एक आइकन बनाकर दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट कर दिया। मुझे इस बात पर आपत्ति है।'' जैसा कि मैंने पहले कहा मेरे दिल में विजयदान देथा की बहुत इज्जत है। चुनांच: मैं ज्यादा बहस न करते हुए सिर्फ ये कहकर टाल गया कि ''आप अपनी दृष्टि के अनुसार बिल्कुल ठीक कह रहे हैं लेकिन नाटक के अंत के लिए मुझे कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा। मुझे चोर के उसी अंत में नाटकीयता नजर आई, और जब दर्शकों ने उसे कबूल कर लिया तो दूसरे सब रास्ते मेरे लिए बंद हो गए।''
विजयदान दरअसल अपने हिसाब से बिल्कुल ठीक कह रहे थे, लेकिन मेरी मज़बूरी अपनी जगह थी। मैंने उनसे ये नहीं कहा कि मुझे रानी के किरदार में अत्याचार का पहलू कम और राजनैतिक पहलू ज्यादा नजर आता है। एक जवान औरत और वह भी एक रानी, एक मामूली चोर से मुहब्बत का इजहार करे, और वह इंकार कर दे, भला एक औरत के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है? वह चाहती तो उसी एक बात पर कत्ल का हुक्म दे सकती थी, लेकिन उसने अपनी ये हतक बर्दाश्त कर ली, और उसके पैरों पर लोटते हुए एक आखिरी विनती की कि जो बातें उसकी ख्वाबगाह (शयनकक्ष) में हुई हैं, चरन दास बाहर जाकर उसके बारे में किसी से कुछ न कहे। उस पर चरन दास ये कहता है कि उसने सच बोलने का प्रण किया है तो रानी आपे से बाहर हो जाती है। ऐसी बदनामी राज सिंहासन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ऐसे आदमी का मुंह बंद कर देना जरूरी है। उसे कत्ल करवा देने के अलावा रानी के पास दूसरा कोई चारा न था। चुनांच: उसने यही किया।
एक दोस्त ने मुझसे ये भी कहा कि चोर के मरने के बाद नाटक को खत्म हो जाना चाहिए। उसके बाद कहानी लटक जाती है। मैंने कहा कि नाटक की इस्तलाह (शब्दावली) में एक चीज भी है. मौत का धक्का दे देने के बाद जरूरी है कि इस अंत का पूरा महत्व लोगों तक पहुंचाया जाए, यही काम करता है। शेक्सपीयर के नाटकों में चाहे मैकबेथ हो चाहे हेमलेट, चाहे ओथेलो, चाहे लीयर, नायक के मर जाने के बाद खासा लंबा जरूर रहता है यही हाल यूनान के शास्त्रीय नाटकों का है। मेरे नजदीक नाटक का विषय यही था कि सच्चाई का दामन पकड़े रहना जान जोखिम में डालना है। अगर यही हश्र सुकरात का हुआ, ईसा मसीह का हुआ, महात्मा गांधी का हुआ, और फिर एक मामूली चोर का भी यही अंजाम हुआ तो उसका दर्जा किसी महापुरुष से कम नहीं है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. I am Anil Kumar from IPTA Saharsa.. I got this link on facebook.. Very nice written Punj bhai.. A tribute to Habib Tanveer...

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  2. पढ़कर आनंद आ गया
    बार बार देखे गए इस शो की यादें मन में घूम गईं

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  3. विजयदान देथा 'बिज्‍जी' कहे जाते हैं और चोर वाली उनकी कहानी का शीर्षक शायद 'फितरती चोर' है.

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