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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

पाकिस्तान में रंगमंच का विकास मुश्किल : अनवर जाफरी


रंगमंच से जुड़े पाकिस्तान के अनवर जाफरी द्वारा निर्देशित नाटक 'इंसा का इंतजार' को 14वें रंगमंच महोत्सव में दर्शकों ने खूब पसंद किया। उन्होंने जागरण संवाददाता से पाकिस्तान में रंगमंच की स्थितियों को लेकर शिप्रा सुमन से बातचीत की।
भारत रंग महोत्सव में अनवर जाफरी 
भारत में आकर कैसा महसूस कर रहे हैं?
मेरा हर नाटक मेरे दिल के बेहद करीब होता है। नाटक के निर्देशन में संजीदगी की जरूरत होती है। खासकर जब वह इंसानी मूल्यों पर आधारित हो। भारत में रंगमंच के लिए स्थितियां काफी बेहतर हैं। यहां के लोग नाटकों की अच्छी तरह समीक्षा करते हैं।
पाकिस्तान में रंगमंच के विकास के प्रति लोगों का कैसा रूझान है?
पाकिस्तान में प्रतिभा की तो कमी नहीं है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में कलाकारों की प्रतिभा विकसित नहीं हो पा रही है। एक्सपोजर की कमी व सरकार की ओर से अकादमिक सुविधाओं के अभाव ने रंगमंच को प्रभावित किया है। भारत में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे संस्थानों की मदद से कलाकारों को फायदा होता है। पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। हालांकि इधर कुछ वर्षो में युवाओं की पहल से वहां रंगमंच कुछ हद तक बेहतर हुआ है।
आधुनिक व पारंपरिक नाटकों में क्या फर्क महसूस करते हैं?
रंगमंच से जुड़ा हर कलाकार अपने किरदार को पूरी शिद्दत के साथ जीता है। आधुनिक व पारंपरिक दोनों नाटकों में इंसानी मूल्य व मानवीय संबंध प्रमुख होते हैं। उनके प्रस्तुतीकरण व शैली में थोड़ा ही फर्क होता है।
नाटक का सफल मंचन क्या उसकी भाषा पर निर्भर करता है?
नाटक के भाव व उसमें दिखाए जाने वाले किरदार को समझने के लिए दर्शकों को भाषा पर निर्भर नहीं होना पड़ता। कई बार मूक नाटकों को भी उम्मीद से अधिक वाहवाही मिलती है। दर्शक सिर्फ नाटक के मर्म को समझना चाहते हैं।
दिल्ली में क्या पसंद है?
दिल्ली में काफी कुछ देखने लायक है, लेकिन मुझे सबसे अधिक कुतुबमीनार पसंद है। वह भारतीय स्थापत्य की अद्भुत मिसाल है। मैं जब भी यहां आता हूं, कुतुबमीनार जरूर देखता हूं। दिल्ली की मिठाइयां मुझे बहुत पसंद हैं।
जागरण से साभार 

भारंगम जारी है...


भारत रंग महोत्सव के छठा, सातवां, आठवां तथा नोवें दिन का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहें हैं युवा रंगकर्मी व पत्रकार दिलीप गुप्ता 

१४वाँ भारत रंग महोत्सव (भारंगम) अपने दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है. गए कुछ सालों से भारंगम का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका  फ़ूड हबअपने पूरे रंग में आ गया है. एनएसडी परिसर में बना ये फ़ूड हब”   अपने नाम के मुताबिक सिर्फ जलपान की ही व्यवस्था नहीं कर रहा है, बल्कि कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों व दर्शकों के लिए उस चौपाल की भी व्यवस्था कर रहा है, जहाँ पर ‘कब के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आ के मिले’ की तर्ज पर  कई पुराने मित्र बैठकर अपनी यादें ताज़ा कर रहे हैं. ‘फ़ूड हब’ वैसे लोगों को भी बहुत सुकून दे रहा है, जो ‘आये थे हरी भजन को ओटन लगे कपास’ की तर्ज़ पर  ‘हाउसफुल’ के बोर्ड की वजह से नाटक देखने से बराबर वंचित हो रहे हैं. इसके  साथ ही यह उनके लिए भी एक मुफीद जगह है, जो नाटकों के स्तरहीन होने की वजह से सभागार से बाहर भाग आते हैं.लेकिन जो भी हो फ़ूड हब में रोज हो रहीं मंचेतर गतिविधियों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है इन गतिविधियों के तहत बाउल, ग़ज़ल, सूफी, और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हो रही हैं.
फिलहाल मंचीय गतिविधियों के तहत भारंगम में गुज़रे चार दिनों में कुल २८  प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं. लेकिन उनमे से कुछ ही प्रस्तुतियाँ सराहनीय कही जा सकती हैं. भारंगम के छठे दिन रविन्द्र नाथ टैगोर लिखित चांडालिका नाटक को निर्देशित किया था प्रख्यात रंग निर्देशिका उषा गांगुली ने. उषा गांगुली अपने नाटकों में  निर्देशन के साथ साथ अभिनय भी करती रही हैं. इस नाटक में भी उन्होंने यही किया. बौद्ध धर्म में प्रचलित  एक कहानी पर आधारित टैगोर का यह नाटक प्रकृति नाम की एक अछूत लड़की की कहानी है जो चांडालिका के रूप में समाज के हाशिए पर जीने को अभिशप्त है. एक दिन एक बौद्ध भिक्षु आनंद उसके घर से गुजरते हुए उसके हाथ से पानी पीता है. ‘सभी मनुष्य एक हैं’ यह  सन्देश देते हुए भिक्षु इस अछूत लड़की को एक मानव होने का एहसास कराता है. यह महसूस करके कि किसी ने पहली बार उसे बराबर का दर्ज़ा दिया है, प्रकृति आनंद से प्रेम करने लगती है. और अपनी जादूगरनी माँ से कहती है कि आनंद पर जादू करके उसे वापस बुलाए. नाटक इसी कथानक पर आगे बढ़ते हुए संघर्ष व  प्रेम के बहुस्तरीय स्वरूपों को खोलता है. नाटक का डिजाईन सीधा सरल होते हुए भी प्रभावी है. बेहतर संगीत भी इस नाटक का  एक मज़बूत पक्ष है. लेकिन बेहतर दृश्य संरचना एवं संगीत के बावजूद भी यह नाटक अपना असर छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाता, क्यूंकि रंगमच का सबसे सशक्त पक्ष अभिनय ही इस नाटक में सतही स्तर का था जो चरित्रों के अंतर्द्वंद को उभारने में नाकाफी रहा.
हेस्नम तोम्बा, एक ऐसे युवा निर्देशक हैं जिन्होंने गए वर्षों में अपने रंगकर्म से एक नयी उम्मीद जगाई है. मणिपुर के प्रसिद्ध रंग निर्देशक एच. कन्हाईलाल और अभिनेत्री सावित्री हेस्नम के पुत्र हेस्नम तोम्बा कन्हाईलाल की रंगमंचीय परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भी अपनी मौलिकता को लगातार मुखरित करते आये हैं. भारंगम के सातवें दिन हेस्नम तोम्बा निर्देशित व रविन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘क्षुधितो पाषाण’ पर आधारित नाटक हंग्री स्टोनसे यह बात और पुष्ट होती है. यह नाटक प्रस्तुतीकरण के दौरान कई मर्मस्पर्शी प्रश्न उठाता है. एक पर्शियन गुलाम लड़की को खरीद कर, उसकी मर्ज़ी के खिलाफ एक आदमी बादशाह को भेंट कर देता है. उसे रुलाई का दौरा इस तरह से पड़ता है जैसे वह कोई पागल औरत हो. उसका रुदन उसकी निजी असफलता का प्रतीक होते हुए भी वह सम्पूर्ण महिला जगत की पीड़ा की आवाज बन जाता है. कई स्तरों को उकेरता यह नाटक हेस्नम द्वारा प्रयुक्त सांकेतिक नाट्य रुढियों से एक अलग तरह का कलात्मक प्रभाव छोड़ता है. हेस्नाम, अभिनेताओं की आवाज़ और शरीर का बेहतर तालमेल व उसकी तारतम्यता का प्रयोग  बड़ी खूबसूरती के साथ इस नाटक में करते दिखे. निस्संदेह, हेस्नाम की यह प्रस्तुति भारंगम की सराहनीय प्रस्तुति कही जा सकती है.
भारंगम के आठवें दिन महा कवि भास के नाटक माध्यम व्यायोग को  एक अलग सन्दर्भ में  व्याख्यायित करती प्रस्तुति रही मशहूर रंग निर्देशक वामन केंद्रे निर्देशित  “प्रिया बावरी”.  
प्रिया बावरी” की कहानी बस इतनी भर ही है कि उपवास कर रही हिडिम्बा अपने पुत्र घटोत्कच को जंगल से एक मनुष्य लाने की आज्ञा देती है ताकि उसे खाकर अपना उपवास तोड़ सके. इसके लिए घटोत्कच यात्रा कर रहे एक ब्राह्मण परिवार को रोक लेता है, जिसका दूसरा बेटा मध्यम, अपने परिवार के लिए बलि चढ़ने को राज़ी हो जाता है. आगे कहानी में भीम भी वहाँ  पहुच जाता है और ब्राह्मण लड़के के स्थान पर स्वयं घटोत्कच के साथ जाने की बात करता है, मगर इस शर्त पर कि घटोत्कच उसे परास्त कर दे. घटोत्कच इस चुनौती को स्वीकार करता है और विजयी होता है. और भीम को लेकर अपनी माँ हिडिम्बा के पास जाता है, जहाँ हिडिम्बा अपने पति भीम को पहचान लेती है और कुछ कोशिशों के बाद घटोत्कच भी भीम को पिता मान लेता है. बाद में अपने पिता के आग्रह पर युद्ध में जाता है और मारा जाता है.
इस कथा सूत्र को  ही पकड़ कर वामन केंद्रे अपने नाटक में आर्य अनार्य और स्त्री पुरुष के बीच के भेद, तथा ‘संबंधों की राजनीति’ और ‘सत्ता की राजनीति’  जैसे सिद्धांतों के साथ प्रयोग करके नाटक को बिलकुल एक नए सन्दर्भ में मंचित करते हैं. वामन केंद्रे इस प्रस्तुति में संस्कृत नाट्य परम्पराओं की शैली का प्रयोग करते हुए कथ्य को एक आधुनिक सन्दर्भ देते हैं, इससे पहले ‘मध्यम व्यायोग’ को शायद ही  किसी ने इस दृष्टिकोण के साथ देखा हो.
भारंगम के नौवें दिन सामानांतर फिल्मों की प्रख्यात लेखिका निर्देशिका सई परांजपे अपना मराठी नाटक जसवंदी लेकर उपस्थित थीं. पैंतीस साल पहले लिखा गया यह नाटक इंसानों को बिल्लियों की नज़र से पेश करता है. एक अमीर उद्योगपति की पत्नी सोनिया के पास सबकुछ है पर उसके पति को उसे देने के लिए समय नहीं है. अपने इस एकाकीपन से उबरने के लिए सोनिया दो बिल्लों को अपने घर लाती है और उन्हें खूब प्यार से रखती है. ये बिल्ले इंसानों के बारे में  कोई खास अच्छी धारणा नहीं रखते और नौकरानी रंगाबाई और ड्राईवर  तानपरे, जो दोनों को खासतौर पर खतरनाक लगता है, के रूप में दो तिकडमी लोगों को इस घर में पाते हैं. समय बितता है और सोनिया की जिंदगी में उदयन नाम का एक युवा कलाकार आता है. उन दोनों के बीच एक प्रगाढ़ सम्बन्ध पनपने लगता है. दोनों बिल्ले चिंतित और असहाय से इस सम्बन्ध को देखते रह जाते है, जो तेज़ी से एक अनपेक्षित अंत की तरफ बढ़ता चला जाता है.
अफ़सोस की बात तो यह है कि  सई परांजपे जैसी सूझबूझ वाली निर्देशिका का लेखन और निर्देशन होने के बावजूद नाटक अपनी धीमी गति के कारण दर्शकों के लिए बोझिल होता चला जाता है. आश्चर्य की बात तो यह भी थी कि नाटक के साथ इतना बड़ा नाम जुडा होने के बावजूद सभागार में आधी से अधिक कुर्सियां खाली थीं और नाटक शुरू  होने के साथ ही यह खालीपन लगातार बढता गया.
नौवें दिन ही  प्रसिद्द रंग निर्देशक परवेज अख्तर के निर्देशन में एकल प्रस्तुति बाघिन मेरी साथिन का मंचन भी हुआ. दारियो फ़ो के ‘टेल ऑफ अ टाईगर’ पर आधारित इस एकल प्रस्तुति के अभिनेता थे जावेद अख्तर खान. पूरे नाटक में एक फौजी, बच्चों को  अपने जीवन की कहानी सुनाता है, जिसमे उसके युद्ध में घायल हो जाने के बाद एक बाघिन और उसके बच्चे के साथ उसकी मुलाकात होने और उनके बीच पनपे संवेदनाओं का वृत्तांत है. बिना किसी पार्श्व और लाईव संगीत के जावेद अख्तर अकेले कुछ ज़रूरी सामान के प्रयोग से पूरी कहानी बताते हैं और उसको अंत में एक राजनैतिक सन्दर्भ के साथ जोड़ देते है. धीमी शुरुआत की वजह से दर्शक नाटक के साथ देर से जुड़ते हैं और अभिनेता की  चुहलों के साथ आनदित होते है. बिना किसी ताम झाम के जावेद अख्तर खान दर्शकों को रिझाने की कोशिश करते है और उसमे सफल भी होते हुए दिखते है. संवाद बोलने के सिलसिले में शब्दों का लगातार कई बार एक दूसरे पर चढ़ना संवाद की स्पष्टता में बाधक बनता है. कुल मिलकर यह प्रस्तुति ठीक ठाक रही, लेकिन इससे और बेहतर की उम्मीद थी.

दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम में प्रकाशित .

भारत रंग महोत्सव में “समझौता”

भारत रंग महोत्सव के पांचवें दिन का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहें हैं युवा रंगकर्मी व पत्रकार दिलीप गुप्ता 



१४ वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम) के पांचवें दिन, दिल्ली के एलटीजी सभागार के मंच पर अपनी महाकाव्यात्मक रचनात्मकता की वजह से हिंदी में किंवदती बन चुके  गजानन माधव मुक्तिबोध की रचना ‘समझौता’ पर आधारित नाटकसमझौता के साथ एक निर्देशक, एक अभिनेता और सात गायकों की एक टोली का समूह एक ऐसा समां बांधता है कि दर्शक सवा घंटे तक अपलक उसमे डूबने को विवश हो जाते हैं. जी हाँ, यहाँ बात हो रही है भारंगम के पांचवे दिन मंचित प्रस्तुतियों में शामिल प्रस्तुति समझौता की. प्रतिभावान युवा निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन के निर्देशन में मंचित इस एक पात्रीय नाटक को अपने सम्पूर्ण अभिनय से संवारा समर्थ युवा अभिनेता मानवेन्द्र त्रिपाठी ने.
भौतिक उपलब्धियों और सफलताओं को पाने की निरंतर खोज में जीवन मूल्यों और आदर्शों के साथ, हर पल समझौता करते जाना यानी कि विमुख होते जाना की थीम लाइन पर चलता हुआ यह नाटक हमारे सामने उन कड़वी सच्चाइयों का पर्दाफाश करता है, जहाँ चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा है. जेब में बी.ए. की डिग्री है”, नाटक का नायक इस डिग्री को लेकर इस ऑफिस से उस ऑफिस तक बेतहाशा दौड़ता रहता है लेकिन उसे हर जगह हताशा और निराशा के अलावा और कुछ हासिल नहीं होता है. हर तरफ से असहाय नायक आखिरकार सर्कस का जोकर बनने का निर्णय लेता है लेकिन वहाँ भी साजिशें उसका पीछा नहीं छोडती हैं और वह सर्कस में एक जानवर बनने को अभिशप्त हो जाता है. सर्कस के उस मैनेजर की तरह हम सभी एक अदृश्य मैनेजर के इशारों पर हर पल एक समझौता करने को अभिशप्त हैं.
भारंगम की इस प्रस्तुति को बेशक इस बार के भारंगम की अब तक की सबसे बेहतरीन प्रस्तुतियों में शामिल किया जा सकता है और इसका असर आगे आने वाले दिनों तक रहेगा यह भी पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है. फिल्म और रंगमंच के सम्बन्ध में यह बात हमेशा से कही जाती रही है कि फिल्म एक निर्देशक का माध्यम है और रंगमंच एक अभिनेता का. फिल्म की बात को यहीं छोड़ते हुए रंगमंच की बात करें तो यह स्थिति गुजरे कुछ सालों से बदल गयी है. रंगमंच के केंद्र में निर्देशक आ गया है और अभिनेता की भूमिका गौण हो गयी है. लेकिन समझौता की यह प्रस्तुति इस बात को सिरे से नकारती है. इस नाटक में मानवेंद्र अभिनय की एक ऐसी ऊँचाई अर्जित करते है जो न सिर्फ मंत्रमुग्ध करती है बल्कि दर्शकों के दिलों तक सीधे उतरती है और नाटक के बाद भी अपना असर काफी लंबे समय तक बरकरार रखती है. मानवेन्द्र इस प्रस्तुति में एक सम्पूर्ण अभिनेता होने का सबूत पेश करते हैं. भरपूर उर्जा से लबरेज मानवेन्द्र की देह जहाँ पूरी लय में दिखती है वहीँ सुर भी उतना ही सधा हुआ नज़र आता है, साथ ही भावों की अभिव्यक्ति भी बड़ी तन्मयता के साथ मुखरित होती है. मानवेन्द्र अपने अभिनय में आधुनिक जीवन शैली के हाव भाव, अभिनय की लोक शैली के तत्वों व शास्त्रीय पद्धति के तत्वों को मिलाकर अभिनय का ऐसा यौगिक रसायन रचते हैं जहाँ प्रस्तुति एक काव्यात्मक स्वरुप ग्रहण कर लेती है. उनकी अभिनय शैली की विविधता उनकी अन्वेषी प्रवृति की परिचायक है. आज जहाँ रंगमंच में आने वाले अभिनेता अभिनय के एक आयाम पर कार्य करते हुए अपने रंगकर्म की इतिश्री मान लेते हैं वहीँ मानवेन्द्र का यह बहुआयामी अभिनय नए अभिनेताओं के लिए एक राह भी दिखाता है. समझौता को  मानवेन्द्र के बेहतरीन और यादगार अभिनय के लिए निःसंदेह एक लंबे समय तक याद रखा जायेगा.    
भले ही रंगमंच एक अभिनेता का माध्यम है लेकिन एक निर्देशक की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है. संभावनाशील युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन आधुनिक रंग दृष्टि के साथ ज़मीनी ताकतों और रंगमच की वास्तविक शक्तियों पर दृढ़ता से विश्वास करते हैं. मुक्तिबोध की कहानी समझौता एक ऐसी कहानी है जिसमे कई अंतर्धारायें निहित हैं, ऐसे में एक पैनी और सूझबूझ वाली निर्देशकीय दृष्टि की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है. गुंजन यहाँ अपने उसी निर्देशकीय कौशल का इस्तेमाल करते हुए दीखते हैं. सेट के लिए गुंजन मंच पर एक बॉक्सिंग रिंग की तरह का रस्सियों से एक चौकोर घेरा बनाते हैं, जहाँ उसके चारों कोनों पर लैम्प पोस्ट का आभास देते चार पिलरनुमा स्तंभ हैं जिनके शीर्ष पर लाईट्स लगी हुई हैं. नाटक की थीम को मुखरित करता हुआ उनका सेट हो, ध्वनि-प्रभावों का इस्तेमाल हो या फिर मंच पर से गायक टोली का स्वर सब कुछ कहानी के अनुरूप और उसके प्रभाव की सघनता को बढाता हुआ है. इन सबमें गुंजन जिस निर्देशकीय कौशल का इस्तेमाल करते हैं वह उन्हें उस पंक्ति में खड़ा करता है जहाँ मानव कौल, सुनील शानबाग, मोहित तकलकर, और मनीष मित्र जैसे सम्भावनाशील व उर्जावान युवा निर्देशक एक बेहतर रंग सृजन को अंजाम दे रहे हैं. इस प्रस्तुति का एक और मज़बूत पक्ष था मशहूर रंग निर्देशक संजय उपाध्याय का संगीत.
भारंगम के पांचवें दिन की दूसरी चर्चित प्रस्तुति रही पेकिंग ओपेरा, इसे प्रस्तुत किया चीन के सेन्ट्रल एकेडमी ऑफ ड्रामा ने. अपने शिल्प और शैली के लिए विश्व भर में चर्चित यह ओपेरा संगीत, नृत्य, अभिनय और मार्शल आर्ट का अद्भूत संगम रही. ज्यांग यूज्यान निर्देशित पेकिंग ओपेरा को ६ भागों में बांटा गया है- परी द्वारा फूलों का बिखेरना, हरिताश्म के कंगन की प्रेमकथा, उत्सवी लालटेनों की सूची, जल विक्रय और फूल कीर्तन, बांस के उपवन में, सान्जिआंग युएहु नगर.
एक और प्रस्तुति में वरिष्ठ रंग निर्देशिका त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित नाटक बीच शहर” भारत में हुई सांप्रदायिक हिंसाओं के बाद  तनाव को रेखांकित करता है. इंटेंस कथ्य पर आधारित इस नाटक में कई स्तरों पर  बिखराव नाटक के असर को कम करते दिखा. हालाँकि अभिनेताओं की मेहनत ज़रूर दिखी.
 अन्य प्रस्तुतियों में इंग्लैण्ड का नाटक द गोल्डन ड्रैगन, रोलैंड शिम्मलफेनिंग लिखित इस नाटक का निर्देशन किया था रमिन ग्रे ने, रविन्द्र नाथ टैगोर लिखित नाटक और डॉ. शुभाशीष गंगोपाध्याय निर्देशित नाटक रक्त करबी”, एनएसडी डिप्लोमा प्रस्तुति के अंतर्गत तैयार प्रस्तुति फेरस” जिसका निर्देशन किया था विष्णुपद बर्वे ने, अनिरुद्ध डी. वंकर लिखित व निर्देशित घायल पाखरा और सत्यजीत रे की कहानी ‘पतोल बाबू फिल्म स्टार पर आधारित नाटक तारामंडल” जिसका निर्देशन किया था नील चौधरी ने रहीं.


दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम में प्रकाशित .

१४वां भारत रंग महोत्सव “एक्टर्स आर नॉट अलाउड”

भारत रंग महोत्सव के चौथे दिन का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहें हैं युवा रंगकर्मी व पत्रकार दिलीप गुप्ता 


प्रसिद्द नाटककार, कहानीकार व उपन्यासकार  मोहन राकेश ने कहा था कि जब कोई नाटककार अपना नाट्यालेख तैयार करता है तो वह सिर्फ एक आधारभूत ढांचा होता हैवह ढांचा मंच तक पहुँचने की अपनी पूरी निर्माण प्रक्रिया के बाद ही सम्पूर्ण अर्थ व स्वरुप ग्रहण करता है. इसी कारण एक ही नाटक अलग अलग नाट्य निर्देशकों के निर्देशन में नया स्वरुप गढता है. नाट्यालेख के अपने इसी ढांचागत स्वरुप के लचीलेपन के साथ कुछ नाटक समय की सीमाओं को लांघते हुए कालजयी का होने दर्जा पाते हैं, और अपनी प्रासंगिकता बार बार सिद्ध करते जाते हैं. धर्मवीर भारती का अंधा युग और मोहन राकेश का आधे अधूरे हिंदी के ऐसे ही विलक्षण नाटक हैं जिससे गुजरने की लालसा हर निर्देशक, अभिनेता को होती है.

अपने लेखन के ४२ साल बाद भी मोहन राकेश के नाटक आधे अधूरे का १४वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम) के चौथे दिन मंचन और उसे देखने के लिए उमड़ी भीड़ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. फिल्म और रंगमंच में एक साथ सक्रिय अभिनेत्री और निर्देशिका लिलेट दुबे के निर्देशन में इस नाटक का मंचन कमानी सभागार में हुआ. हमारे समाज, परिवार, व्यक्ति और उनके पारस्परिक संबंधों में आये और लगातार आ रहे बदलावों के  समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझने की कोशिश करता यह नाटक आज भी लोकप्रियता के उसी शिखर पर है जहाँ यह आज से पहले था. भारंगम में मंचित इस नाटक को देखने आये दर्शकों को पुनः वही  परेशानी झेलनी पड़ी जो रेड हॉट के समय झेलनी पड़ी थी. सभागार के अंदर प्रवेश बहुत देर से शुरू हुआ जिससे दर्शक नाटक के शुरुआती दृश्य देखने से वंचित रह गए.

भारंगम के चौथे दिन की एक अन्य उल्लेखनीय प्रस्तुति थी पोंडिचेरी विश्वविद्यालय के नाटक विभाग की प्रस्तुति एक्टर्स आर नॉट अलाउड जिसके लेखक और निर्देशक थे डॉ. वी.अरुमुघम. तमिल भाषा में खेला गया यह नाटक प्रतीकात्मक रूप से उन सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों से जुडी हुई  चिंताओं को उजागर करता है जो उन क्षेत्रो के आम अनुभव हैं, जहाँ अलोकतांत्रिक गतिविधियां रोजमर्रा की बात होती है, अराजक कानून व्यस्था अपने चरम पर है, सेना और सुरक्षा बालों का प्रमुख लक्ष्य आम आदमी पर अत्याचार है. इस तरह से आम आदमी का जीवन अपना मूल्य खोता जा रहा है.आज के दमन और विद्रोह के वातावरण में यह नाटक और प्रासंगिक हो जाता है जहाँ पर सफ़दर हाशमी जैसे रंगकर्मी की दिनदहाड़े सरेआम गोलियों से भूनकर ह्त्या कर दी जाती है, गुजरात जैसे नरसंहार होते हैं, मणिपुर में आम लोगो पर निर्मम अत्याचार होते हैं, किसान सामूहिक आत्महत्या करने पर विवश होते हैं, नंदीग्राम में लोगों की आवाज़ को दबाया जाता है. इस घोर संकट के समय में दमनकारी नीतियों पर चल रही सत्ताओं का कुचक्र जारी है. सत्ता के विविध संरचनाओं में पिसते आम आदमी के जीवन की इन्हीं विवशताओं को सामने लाने की कोशिश करता है यह नाटक. एक घेरे के अंदर खेले गए नाटक में दर्शक सीधे तौर पर एक सक्रिय अवयव भूमिका में होता है.

चौथे दिन की अन्य प्रस्तुतियों में इन्कोसजाना” भी एक प्रयोगात्मक प्रस्तुति रही. केपटाउन विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के फेलोशिप छात्रों के परस्पर सहयोग से तैयार की गई यह  प्रस्तुति एक लोक कथा पर आधारित है जिसका सम्बन्ध प्राचीन काल  के क्झोसा प्रदेश से है जो अपनी जिद्दी रजा के कारण अभिशप्त है. जब इस राजा का शासन खत्म होता है, देश के लोग नए उत्तराधिकारी को नकार कर उस अभिशाप को खत्म करने का निर्णय लेते हैं और एक उपयुक्त रजा के चुनाव का प्रयास करते हैं जो उनपर शासन कर सके जैसा उनके पूर्वज चाहते थे.
यह प्रस्तुति अपने उर्जा से भरपूर होने का परिचय देती लेकिन बाकी अन्य स्तरों पर यह थोडा निराश भी करती है.

इस चौथे दिन की  अन्य प्रस्तुतियाँ थीं देवाशीष सेनगुप्ता लिखित और निर्देशित बांग्ला नाटक कोथाय पाबो तारे, चंद्रशेखर कम्बार के ‘जो कुमारस्वामी’ पर आधारित प्रसिद्ध नाटक तोता बोला जिसका निर्देशन एनएसडी से इसी साल पासआउट सजल मंडल ने किया था. यह प्रस्तुति एनएसडी डिप्लोमा प्रस्तुति के तहत पहले भी मंचित हो चुकी है. बांग्लादेश की प्रस्तुति  चांडालिका” भी इस महोत्सव के चौथे दिन मंचित हुई, रविन्द्र नाथ टैगोर की इस रचना का निर्देशन किया बिभास विष्णु चौधरी ने.

दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम में प्रकाशित .

14 वाँ ‘भारत रंग महोत्सव’ जर्नी टू डाकघर

भारत रंग महोत्सव के तीसरे दिन का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहें हैं युवा रंगकर्मी व पत्रकार दिलीप गुप्ता 

प्रयोग, प्रतीक, शास्त्रीयता, आधुनिकता और लोक-कला के किसी कोलाज की तरह रहा १४वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम) का तीसरा दिन. जहाँ भरपूर संभावनाओं से लवरेज युवा रंग निर्देशक मनीषा मित्र अपनी प्रस्तुति  जर्नी टू डाकघर के साथ मंच पर एक नयी रंग भाषा का सृजन करते दिखे, वहीँ चर्चित फिल्म और टेलिविज़न अभिनेता, निर्देशक व पटकथाकार सौरभ शुक्ला अमरीकी नाटककार नील साइमन के लास्ट ऑफ द रेड हॉट लवर्स के रूपांतरण रेड हॉट के लिए पहले से ही चर्चा के केंद्र में थे.

इन प्रस्तुतियों के अलावा, प्रसिद्द रंग निर्देशक के. एन. पणिक्कर निर्देशित खुद और खुदा और कश्मीर की लोक नाट्य परंपरा भांड-पाथेर की शैली में शेक्सपियर के प्रसिद्द नाटक किंग लियर पर आधारित, वरिष्ठ निर्देशक एम. के. रैना निर्देशित नाटक बादशाह पाथेर”  की भी नाट्यप्रेमियों के बीच चर्चा रही. इन सबके अलावा अपने आप में एक अनूठी और निराली प्रस्तुति रही बस्तर बैंड जिसे भारंगम के तीसरे दिन का विशेष आकर्षण कहा जा सकता है.

श्रीलंका के असंगत नाटक पयानिहाल और कालिदास कृत ऋतुसंहार के डॉ. सरोज भारद्वाज द्वारा किये गए अनुवाद पर आधारित नाटक मिराज जो कि एन.एस.डी. डिप्लोमा प्रस्तुति के तहत मंचित हो चुका है और जिसका निर्देशन एन.एस.डी. से इसी साल पासआउट छात्र लोईटोम्बम पारिन्गान्बा ने किया था, तीसरे दिन की अन्य प्रस्तुतियों में शामिल रहीं.

रविन्द्र नाथ टैगोर के नाटक डाकघर व अन्य ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित नाटक जर्नी टू डाकघर”  टैगोर के रचना कर्म और उनके नाटक डाकघर की काव्यात्मक निर्माण प्रक्रिया को एक साथ रूपायित करता है. इसमें मनीष मित्र ने जिस तरह बांग्ला लोक तत्वों का प्रयोग आधुनिक नाट्य रुढियों के साथ किया यह प्रभावोत्पादक है. मनीष मित्र अपनी माटी को बखूबी जानते, पहचानते और समझते हैं, इस बात का प्रमाण उनकी यह प्रस्तुति जर्नी टू डाकघर है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान पोलैंड के चिकित्सक और शिक्षक जानुष कोर्जेक अपनी देखरेख में पल रहे अनाथ बच्चों के लिए द पोस्ट ऑफिस नाटक का चुनाव करते हैं. मृत्यु के समय और तरीके का फैसला और उसपर अधिकार होने की पड़ताल ही कोर्जेक के लिए वह वजह बनती है, जिसके कारण ये इस नाटक के मंचन का फैसला करते हैं.  इसी कथासूत्र को पकड़कर जर्नी टू डाकघर टैगोर के नाटक डाकघर और इस नाटक की निर्माण प्रक्रिया दोनों को अपना विषय बनाता है. इसके साथ ही जर्नी टू डाकघर”  नाटक डाकघर के मंचन के इतिहास और इसके माध्यम से उस तत्कालीन समय में पड़ने वाले प्रभावों को भी साझा करता है. मनीष मित्र मंच पर डाकघर की इस व्यापक यात्रा को बड़ी संजीदगी और तन्मयता के साथ पूरा करते हैं. आलेख पर मज़बूत पकड़, अभिनेताओं का सधा हुआ अभिनय, सेट डिजाईन, प्रकाश योजना और दिल तक उतर जाने वाला संगीत इन सबका जीवंत उदाहरण हैजर्नी टू डाकघर”.

अपनी शास्त्रीय पद्धति और व्याकरण के लिए सुविख्यात निर्देशक के.एन. पणिक्कर ने टैगोर की रचनाओं को आधार बनाकर खुद और खुदाएकल नाट्य प्रस्तुति को निर्देशित किया है जिसके अभिनेता हैं गिरीश सोपानम. व्यक्ति और सृष्टि, मानुषिक और दैवीय, मानव और ईश्वर, लघु और दीर्घ के बीच अनिवार्य सम्बन्ध पर विचार करती इस प्रस्तुति में के.एन.पणिक्कर ने उसी शास्त्रीय पद्धति का इस्तेमाल किया है, जिसके के लिए वे जाने जाते हैं. लेकिन हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और संस्कृत भाषाओँ में तैयार यह एकल प्रस्तुति दर्शकों को बांधने के लिए संघर्ष करती हुई नज़र आयी.

आम दर्शकों के बीच कल्लू मामा के नाम से मशहूर सौरभ शुक्ला अभिनीत और निर्देशित नाटक रेड हॉट गए दिनों हुए अपने मंचन से ही चर्चा में था. यही कारण है कि यह नाटक टिकट विक्री के पहले ही दिन हॉउसफूल से सुशोभित हो गया था. हालाँकि यह बात अलग है कि सभागार में  कुछ सीटें खाली थीं.

नील साइमन के लास्ट ऑफ द रेड हॉट लवर्स का रूपांतरण रेड हॉट एकाकीपन और सामाजिक स्वीकृति की खोज करते हुए  आधुनिक जीवन की छद्म वेशी परतों को मनोरंजक अंदाज़ में कुरेदता है. आज के समय में हम भीड़ में भागती लाशें हैं जहाँ कदम दर कदम एकाकीपन, ऊब और खंडन का अंदरूनी और बाहरी सतह पर एक साथ नज़र आ रहे हैं. एक साथ स्वीकृति और खंडन की विपरीत परिस्थितियों में जीने को अभिशप्त हो गए समाज की पड़ताल करता हुआ यह नाटक आगे बढ़ता है, और हमें खुद की विवशता पर हँसने का मौका देता है. सौरभ शुक्ला ने नाटक की हर एक चीज़ पर बड़ी शिद्दत के साथ कार्य किया है. नाटक में कुछ भी थोपा हुआ नहीं लगता है. सारी चीज़ें घटती हुई लगती हैं या कहें कि यह आलेख के साथ सटीक तालमेल के संग पैदा हुई हैं. सौरभ शुक्ला मंच पर बेहद ही जीवंत और उर्जा से भरपूर लगे वहीँ बाकी अभिनेत्रियों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया.

ठेठ देसी  और अपनी माटी की खुशबू व  लोक परंपरा का बेजोड रूप है बस्तर बैंड”. भारंगम के तीसरे दिन बस्तर बैंड की प्रस्तुति विशेष आकर्षण थी. कला प्रेमियों में इसको लेकर विशेष उत्सुकता थी. बस्तर बैंड बस्तर के आदिवासी लोक समूह का एक अद्भुत समूह है. पॉप और जैज जैसे बैंड की  चकाचौंध में ये बैंड आउट ऑफ फैशन करार दिया जा सकता है लेकिन  इसकी ताकत को नकारना कही से भी संभव नहीं हैं. लगभग लुप्त हो चुके वाद्य यंत्रो व मौखिक ध्वनियों के विशाल समूह की मनोहारी सिम्फनी अपने विशुद्ध गंवईपन के साथ एक ऐसा संसार रचती है जिसमे एक अरसिक भी  अपने आप को उसमे डूबने से रोक नहीं सकता. लेकिन  आशंका हो रही है कि कहीं बाज़ार की गिद्ध दृष्टि ऐसे कला रूपों पर न पड़ जाये जो अभी तक अपने आप को इस तरह की कुटिल कोशिशों से बचाए हुए है.

दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम में प्रकाशित .

भारत रंग महोत्सव’ : दृश्य खुल रहे हैं

१४वें भारत रंग महोत्सव के दूसरे दिन का लेखाजोखा प्रस्तुत कर रहें हैं युवा रंगकर्मी एवं पत्रकार दिलीप गुप्ता 

१४वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम) का नांदी पाठ संपन्न हो चुका है और दृश्य खुल गए हैं, यानी महोत्सव के लिए चुने गए दस नाट्य प्रदर्शन स्थलों पर देश विदेश के नाटकों के मंचन शुरू हो गए हैं. भारंगम के दूसरे दिन से ही नाट्यप्रेमियों की चाल और उत्सुकता के भाव में तेज़ी स्पष्ट नज़र आ रही है. और ये तेज़ी आने वाले दिनों में बढ़ेगी ही, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. भारंगम के दूसरे दिन कुल ६ नाटकों का मंचन हुआ, जिसमें प्रयोगधर्मी युवा रंग निर्देशक मोहित ताकलकर नोबल पुरस्कार विजेता जोसे सरामागो के उपन्यास द एलिफेन्ट्स जर्नी” पर आधारित नाटक गजब कहानी” के साथ उपस्थित थे. वहीँ इसके अलावा पोलिश नाटक ग्रोटोवस्की- एन अटेम्प टू रीट्रीट के साथ निर्देशक तोमास रोडोविज़ व फरीद बज्मी मार्शल आर्ट, ग्रामीण और लोक कलाओं, नृत्य तथा संगीत से भरपूर अपने नाटक नैन नचैया के साथ  आकर्षण का केंद्र बने हुए थे. दूसरी अन्य प्रस्तुतियों में संगीता शर्मा निर्देशित गति मूलक प्रस्तुति विसर्जन” और चंद्रादासन निर्देशित मलयालम नाटक लंका लक्ष्मी  थीं.

सबसे पहले बात करते हैं मोहित तकलकर के नाटक गजब कहानी की. नोबल पुरस्कार विजेता पुर्तगाली लेखक जोसे द सूसा सरामागो के उपन्यास द एलिफेन्ट्स जर्नी पर आधारित नाटक गजब कहानी का प्रस्तुति आलेख तैयार किया है प्रदीप वैद्य ने. ये नाटक एक हाथी के भारत से लिस्बन और लिस्बन से वियेना तक की यात्रा को कहानी का आधार बनाते हुए, वर्ग संघर्ष और धर्मान्धता की पड़ताल बड़ी संजीदगी के साथ करता है.

कथावाचन शैली में मंचित इस नाटक की  कहानी मात्र इतनी भर है कि एक हाथी अपने महावत के साथ गोवा से एक लंबी समुद्र यात्रा तय करके लिस्बन पहुँचता है और फिर वहाँ से उसको वहाँ के राजा द्वारा आस्ट्रिया के आर्क ड्यूक को भेंट स्वरुप वियेना भेजा जाता है. इस यात्रा को हाथी अपने महावत के साथ पैदल, इटली तक जहाज़ से फिर ऐलेप्स की पर्वत शृंखला को पार करता हुआ वियेना पहुँचता है. इस यात्रा के दौरान हम कई सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों से रूबरू होते हैं, जो देखें तो प्रत्यक्ष रूप से हाथी सोलोमन और महावत शुभ्रो से जुड़े हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि ये सवाल उस सम्प्रेषण की दुनिया से निकलकर  हमारे सामने खड़े हो जाते है. समय काल और परिवेश के साथ भारत में ‘गणेश’ के नाम से जाना जाने वाला हाथी ‘सोलोमन’ और फिर ‘सुलेमान’ के नाम से नामित होता है और महावत शुभ्रो ‘शुभ्रो’ से ‘फ्रिट्ज’ तक की यात्रा करता है. इस प्रकरण में आई तमाम घटनाएं नए नए अर्थों के साथ नए आयाम  खोलती है, चाहे वो नाम के पीछे होने वाली झड़प हो या अपने धर्म को सर्वोत्कृष्ट साबित करने को आतुर धार्मिक तनाव तक पहुँचने वाली कोशिशें हो, या फिर बार बार हाथी और महावत के नाम को बदलने के नाम पर वर्ग का तुष्टिकरण हो, या फिर हाथी के मरने के कुछ ही दिनों बाद धीरे धीरे उसे विस्मृत करने का प्रसंग  हो.

रंगमंच की अन्तर्निहित शक्तियों पर दृढ़ता से विश्वास करने वाले मोहित तकलकर अपनी इस  मंचीय प्रस्तुति में दृश्य संयोजन के लिए  सेट, लाइट और मंच सामग्रियों का बड़ा ही सांकेतिक और बिम्बात्मक प्रयोग करते हैं, जो कथ्य को पर्याप्त  मजबूती प्रदान करता है. मोहित प्रस्तुति के दौरान ही नहीं बल्कि प्रस्तुति के अंतिम दृश्य  में भी प्रभाव छोड़ते है. नाटक के अंत में खाली मंच पर एक ऐसा शुन्य सृजित करते हैं जो नाटक के बाद भी काफी लंबे समय तक कायम रहता है. मोहित अपनी रचनात्मक भूख से नयी संभावनाओं को खोलते जा रहे है. आने वाले समय में उनसे उम्मीद बढती ही जायेगी.

सामयिक पोलिश रंगमंच पर केंद्रित भारंगम में तीन पोलिश नाटकों का चयन किया गया है, जिसमे महोत्सव के दूसरे दिन पोलैंड के कोरिया थिएटर एसोसिएशन का नाटक ग्रोटोवस्की- एन अटेम्प टू रीट्रीट” का मंचन किया गया. इस नाटक का निर्देशन तोमास रोडोविज़ ने किया था. ग्रोटोवस्की के सिद्धांतों एवं कार्यपद्धति पर आधारित इस नाटक को छह  अभिनेताओं के समूह ने प्रस्तुत किया. ग्रोटोवस्की की कार्य शैली को जिस सहजता के साथ मंच पर उकेरा गया है वह लाजवाब था.

भोपाल की मशहूर नाट्य संस्था रंग विदूषक इस बार भी अपने चिर परिचित अंदाज़ में फरीद बज्मी निर्देशित नाटक नैन नचैया के साथ उपस्थित थी. एक्रोबैटिक्स, मार्शल आर्ट्स, ग्रामीण और लोक कलाओं, नृत्य तथा संगीत से पिरोया ये नाटक तिरुमलनाथ एयुलनाथ के संस्कृत प्रहसन कुहुना भैक्शव पर आधारित था. इसका नाट्य आलेख सतीश दवे ने तैयार किया है. कहानी का वही पुराना ढांचा, वही मनोरंजक तत्त्व, कॉमिक पंचेज का बार बार दुहराव इस प्रस्तुति को शिथिल बनाने के प्रमुख कारण हैं. इस प्रस्तुति को एक अच्छी प्रस्तुति बनाया जा सकता था  यदि  इसमें प्रयुक्त लोक तत्वों को और  अभिनेताओं के क्रिया व्यापारों के दुहरावों  को  अतिरेक में बहने से बचा लिया जाता. लोक में अन्तर्निहित कला सूत्रों को एक नयी रंग भाषा देने के बजाय हम क्यूँ उसके दोहराव भर से अपने को संतुष्ट कर ले रहे हैं, यह सचमुच एक बड़ी और गहरी चिंता का विषय है/होना चाहिए.

भारंगम की अन्य प्रस्तुतियों में संगीता शर्मा भी टैगोर के नाटक विसर्जन में अपने को दोहराते हुए ही दिखी. हालाँकि बाकी की दो अन्य प्रस्तुतियों को सराहनीय कहा जा सकता है. जिसमे श्री सी. एन. श्रीकंठन नायर द्वारा रचित रामायण नाटकत्रय का दूसरा नाटक लंकलक्ष्मी का मंचन, जिसका निर्देशन चंद्रदासन ने किया था  और एनएसडी से इसी साल पास आउट छात्रा सहाना पी. निर्देशित नाटक जन्नत महल जिसको एनएसडी डिप्लोमा प्रस्तुति के अंतर्गत मंचित किया जा चुका है. फकीर मोहम्मद कतपुडी की लघु कहानी पर आधारित इस नाटक का नाट्य आलेख आसिफ अली का था.     

दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम में प्रकाशित .

When all the world's a stage…MK Raina

M.K. Raina talks to Diwan Singh Bajeli about adapting Shakespeare to the traditional Kashmiri Bhand Pather...
MK Raina
“Shakspeare's “King Lear” is being staged in Bhand Pather version for the first time in the history of theatre by traditional performers who live in a remote part of Kashmir,” says eminent theatre artist and activist M.K. Raina, whose “King Lear” as “Badshah Pather” will be featured at the ongoing 14th Bharat Rang Mahotsav this coming Saturday.

What motivated him to do a world classic with folk artists who have hardly any exposure to modern stage and what challenges he has faced while producing a play in a place which is witnessing social, political and economic turmoil? “Actually, I have been working with these traditional artists, who have formed Kashmir Bhagat Theatre at Akingaam village in the district of Anantnag, since the 1980s. I have been in touch with them regularly. Thirty-five families, including children, have formed a small module to express themselves and keep their rich folk tradition alive,” says Raina. “Some of the folk forms of the region are sinking into oblivion.”

An artistic director of the Delhi-based theatre group Prayog, Raina has been associated with leading theatre directors and actors besides working in rural areas, especially his homeland Kashmir. His repertoire thus has a unique combination of highly sophisticated artistry and earthy vitality of folk forms. “Badshah Pather” is a part of his ambitious rural project. The production has evolved in the most challenging and violence prone situations.

“My first challenge was how to explain to my traditional artists, as most of them are illiterate, one of the greatest literary and theatrical works of the world. The translation into Kashmiri by a professor was too literary and literal and beyond their comprehension. So in the process a new script was evolved through group discussions. A new language was created — the language of the local people rooted in their soil. The performers discovered in the tragedy of King Lear their own tragedy. They internalised the evolved text and the depth of the king's tragedy. The format of Bhand Pather and the text became an intrinsic part of the artistic whole with elements like folk music suffused in Sufism and Chabuk — whip, a folk prop to evoke humour as well as pathos — become important theatrical expressive means.”

In the original, King Lear divides his kingdom among his daughters and in the Kashmiri version he divides it among his sons. Is this not a distortion of the original? “No, in our tradition the land is divided among the sons who are socially, morally and legally duty-bound to look after their parents. The king in the Kashmiri version is close to our people and their ethos. What moves the performers and the audience is his tragic fate after partitioning his kingdom. It is not only the tragedy of the king but also of the people of Kashmir who are suffering untold miseries as the result of the Partition.”
Referring to the show's premiere at village Akingaam, he says excitedly, “We have no auditorium there, let alone equipment like lighting. The play was staged on the slope of a hill during daytime. About 5000 people coming from neighbouring villages witnessed it.” The play was staged at other villages also on public demand. “We have faced threats from separatists who were dead against any theatrical presentation. I wanted to avoid confrontation and violence, but our host villagers and team members were determined that the show must go on come what may. We did perform at several villages without any violent disturbances. Of course, there were security arrangements.”

Is it possible to pursue theatre in a situation under threat by forces of violence? “Yes, theatre workers are active in Jammu and Kashmir risking their lives. The very fact that two plays from Kashmir are being featured at BRM is a testimony of the daring and passion with which theatre is being pursued in that state. I believe through theatre, which is a community art, we can democratise the polity by debating critical and controversial issues, indicting forces that oppress people.”

RECAP A graduate from the National School of Drama, Raina has been working professionally for over three decades. Apart from theatre, he has produced television serials and acted in films. Some of his outstanding productions are “Kabira Khada Bazaar Mein”, “Three Sisters”, “Mother”, “Evam Indrajit” and “Banbhatt Ki Atmkatha”. He is the recipient of several awards, including from Sanskriti, the Sahitya Kala Parishad Award and the Sangeet Natak Akademi.

SNEAK PEEK Now, Raina is planning to revive his productions of Bhisham Sahni's “Kabira Khada Bazaar Mein”, “Muaze” and “Madhvi” to stage during the birth centenary of Bhisham Sahni
.
BEYOND A SHOWCASE Raina has been associated with the National School of Drama's Bharat Rang Mahotsav in different capacities since its inception. Now that BRM has entered its 14th year, Raina comments, “Initially it was the rallying point for theatre workers from different parts of the country. Gradually it is acquiring the syndrome of a routine type of festival. It has lost excitement. The participating groups are not given time to interact with one another and to exchange views regarding theatre activities in their respective areas. The plays from foreign countries hardly have any artistic standard. The participants are not benefited economically, either.” He adds, “The selection process is not democratic. The entire theatre community should be involved in the selection of plays through a mechanism that could reach even remote areas. We do not get contributions from areas which were once theatrically rich. It is the duty of the festival organisers to suggest ways to make them theatrically alive again.”

BHAND PATHER Bhand is a term for traditional entertainers in many parts of the subcontinent. Bhand Pather is a traditional theatre form performed primarily in the Kashmir Valley. A blend of song, dance and drama, its storyline is often humorous and satirical.
(Source: Internet)
“Badshah Pather” is a Bhand Pather adaptation of “King Lear” in Kashmiri, evolved by M.K. Raina working with traditional artists.
Duration: 2 Hrs
Date: January 21,
Venue: Meghdoot 1, Rabindra Bhawan, Copernicus Marg, New Delhi,
Time: 5:30 p.m.
http://www.thehindu.com से साभार 

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

पिछली बार की गलतियों को दुहराता १४वाँ भारत रंग महोत्सव शुरू



दिलीप गुप्ता का आलेख

किंग ऑफ डार्क चेम्बर का एक दृश्य
विजे के सौजन्य से 
हर आदमी अपनी पिछली गलतियों से कुछ सीखता है और उसे दोबारा न दोहराने की  कोशिश करता है लेकिन, भारत ही नहीं वरन एशिया महाद्वीप में अपना शीर्ष स्थान रखने वाली नाट्य संस्था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बार बार अपनी गलतियों को दोहरा कर गर्वित महसूस करती है. ८ जनवरी को दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) द्वारा आयोजित १४वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम)  का उद्घाटन समारोह देख कर उपरोक्त  पंक्ति लिखने को विवश होना पड़ रहा है. एनएसडी ने पछले साल की भांति इस साल भी इतने बड़े समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम के लिए करीब ६०० लोगों की क्षमता वाले कमानी सभागार को ही चुना, और क्षमता से लगभग दुगनी संख्या में आमंत्रण पत्र बांटकर सभागार के अंदर नाटक और सभागार के बाहर एक नाटक की स्थिति पैदा की. यही स्थिति पिछले साल के भारंगम में भी देखने को मिली थी. फिर भी एनएसडी ने उससे कोई सबक न लेते हुए दोबारा उसी जगह को चुना जबकि इसके लिए किसी और जगह का भी चुनाव किया जा सकता था.


५.३० बजे से तय कार्यक्रम में सभागार ५ बजे ही हाउस फूल हो जाता है और सैकड़ों की तादाद में दर्शकों, रंगकर्मियों, छात्रों व मिडियाकर्मियों को उस अव्यवस्था का शिकार होने और झेलने के लिए छोड़ दिया जाता है. धीरे धीरे बाहर खड़े लोगों के सब्र का बाँध टूटने लगता है और उनका विरोध हंगामें की शक्ल अख्तियार कर लेता  है. सभागार के अंदर मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, चर्चित अभिनेत्री शर्मीला टैगोर, रानावि की अध्यक्षा अमाल अल्लाना व एनएसडी की निर्देशिका अनुराधा कपूर के भाषण चल रहे थे और सभागार के बाहर दर्शकों का हुजूम “साड्डा हक इत्थे रख”, भारत माता की जय,  “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं देखना है जोर कितना इनके दरवाज़े में है” जैसे कई गीतों और बोलों से अपने विरोध को स्वर देने में लगा हुआ था. डेढ़ घंटे से इंतज़ार में खड़े दर्शकों के मन में यही लालसा थी कि एक नयी रंग भाषा का सृजन करने वाले विख्यात रंग निर्देशक रतन थियम का नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” को किसी तरह देख लें, लेकिन जैसे जैसे नाटक शुरू होने का समय निकट आ रहा था वैसे वैसे दर्शकों में विरोध और मायूसी का भाव साथ साथ आ रहा था. आखिरकार कीर्ति जैन के इस आश्वासन पर हंगामा थमा कि नाटक का एक और शो ९ बजे से रखा गया है और इस तरह, बाहर खड़े दर्शकों को एक चमत्कृत करने वाला रंगमंच देखने का सपना साकार हुआ.


गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर लिखित व रतन थियम निर्देशित नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” का ये मंचन वाकई अद्भुत था, अपने जादुई रंग शिल्प एवं भाषा के लिए विश्व ख्याति प्राप्त रंग निर्देशक रतन थियम के इस नाटक का एक एक दृश्य कविता की  तरह था. रंगमंचीय सीमाओं की वर्जनाओं को तोडने वाले रतन थियम की खासियत है कि वो टेक्स्ट को आत्मसात कर लेते हैं और आधुनिक भारतीय रंग भाषा को एक नया आयाम देते हैं, चाहे इब्सन लिखित उनका “व्हेन वी डेड अवेकन” हो या “हे नुंगशिबी पृथ्वी” हो या “नाइन हिल्स वन वैली” हो या अन्य नाटक सबमें एक नया रंग आस्वादन मिलता है.

टैगोर लिखित इस प्रतिकात्मक नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” में भी रतन थियम एक नयी रंग भाषा का सृजन करते हैं. बहुत पहले एक सेमीनार में भारतीय रंगमंच की चुनौतियों पर बोलते हुए रतन थियम ने मनोरंजन के अन्य साधन सिनेमा और टेलिविज़न के सामानांतर रंगमच की  शक्तियों को उजागर करते हुए कहा था, कि रंगमच को कभी भी सिनेमा और टेलेविज़न की नक़ल न करके उसकी अपनी शक्तियों पर दृढ़ता से विश्वास  करना होगा और रंगमंच पर चमत्कार पैदा करना होगा. और चमत्कार हमें सचमुच इनके नाटकों में दीखता है. नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” में रतन थियम एक बार और उस चमत्कार को रचते हैं, और ऐसे रचते हैं कि मणिपुरी भाषा होने के बावजूद दृश्यों पर से नज़र नहीं हटती और दर्शक अपलक उसमे बहता हुआ एक नयी रंग अनुभूति से सराबोर हो जाता है. टैगोर के दर्शन एवं व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालता ये नाटक मंच पर एक नए महाकाव्य को घटित करता है.

इस १४वें भारत रंग महोत्सव के पहले दिन मंचित होने वाला एक अन्य नाटक था “पापा लादेन”. जिबरिश में खेले गए इस नाटक को निर्देशित किया था एनएसडी से इसी साल पास आउट छात्र सुमन मल्लिपेद्दी ने. एक मध्य वर्गीय परिवार की खुशियों को  चुटीले अंदाज़ में समेटने कि कोशिश करता ये नाटक रानावि के डिप्लोमा प्रस्तुति के अंतर्गत मंचित किया जा चुका है.

दिलीप गुप्ता संपर्क : 9873075824 एवं dilipgupta12@gmail.com. आलेख जन सन्देश टाइम से साभार

सोमवार, 9 जनवरी 2012

14 वें भारत रंग महोत्सव के आगाज़ पर क्या कहता है मिडिया .

हंगामेदार रहा रंग महोत्सव का उद्घाटन
मृत्युंजय प्रभाकर, नई दुनियां. 


नई दिल्ली। रविवार की शाम राजधानी के कमानी सभागर में भारत रंग महोत्सव का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया। उद्घाटन समारोह के बाद विख्यात रंग निर्देशक रतन थियम के निर्देशन में रवींद्रनाथ टैगोर लिखित नाटक "किंग ऑफ द डार्क चैंबर" का मंचन किया गया। नाटक मणिपुर की रंगसंस्था "कोरस थियेटर ग्रुप" के कलाकरों द्वारा प्रस्तुत किया गया। 

भारत रंग महोत्सव का उद्घाटन समारोह उम्मीद के मुताबिक ही हंगामेदार रहा। यह हंगामा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की अव्यवस्था की वजह से उपजी थी। आयोजन के समय अव्यवस्था का आलम यह था नाटक के निर्देशक रतन थियम तक बहुत मुश्किल से सभागार में प्रवेश कर सके। प्रसिद्ध रंग समीक्षक और नाट्य विशेषज्ञ कविता नागपाल भी घंटों तक द्वार पर खड़ी रहीं। मीडियाकर्मियों को भी अंदर प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी गई। उनके साथ ही बड़ी संख्या में रंगप्रेमी बाहर की धक्के खाते रहे। अंदर न जा पाने की खीज में दर्शकों ने हंगामा भी किया। 

एशिया के सबसे बड़े इस रंग महोत्सव को लेकर हमेशा से दर्शकों के मन में उत्सुकता रहती है। इस कारण दर्शक भारी संख्या में आते हैं। आम दर्शकों के लिए इस आयोजन में टिकटों और आमंत्रण पत्रों का टोटा लगा रहता है। सभागार की ज्यादातर सीटें रिजर्व रखी जाती हैं और और सीमित संख्या में ही आम दर्शकों को टिकट दिया जाता है। यही कारण है कि कुछ टिकट कटते ही हाउसफुल का बोर्ड लगा दिया जाता है। रानावि की इस अव्यवस्था पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं लेकिन आयोजक कान पर तेल डाले बैठे हैं।



रंगमहोत्सव के रंग में भंग : दर्शक ज्यादा, सीटें कम 


(दैनिक भास्कर, 9 जनवरी 2012, दिल्ली) 



सभागार की क्षमता से ज्यादा बांटे आमंत्रण पत्र, मीडियाकर्मियों को भी प्रवेश के लिए करनी पड़ी मशक्कत 


14वें भारत रंगमहोत्सव के उद्घाटन अवसर पर एक तरफ जहां रानावि की चेयरमैन इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा करती दिखीं, वहीं रंगमंच प्रेमियों को नाटक देखने के लिए भारी अफरातफरी और हंगामे का सामना करना पड़ा। रविवार को दिल्ली के प्रसिद्ध कमानी ऑडिटोरियम में इस रंगमहोत्सव का उद्घाटन किया जाना था। लेकिन इस कार्यक्रम में प्रवेश के लिए दर्शकों और प्रबंधकों के बीच भारी हंगामा हुआ, वहीं रंगमहोत्सव के आयोजकों और कमानी ऑडिटोरियम के प्रबंधकों के बीच भी जमकर कहासुनी हुई। आलम यह था कि मीडियाकर्मियों को भी प्रवेश के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। कॉपरनिकस मार्ग पर लगातार माहौल को बिगड़ता देख बीचबचाव के लिए स्थानीय पुलिस को बुलाना पड़ा। 

दरअसल देश के इस सबसे बड़े रंगमहोत्सव के उद्घाटन के लिए यहां सांस्कृतिक मंत्री कुमारी शैलजा, जवाहर सरकार और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर को आना था और रानावि के प्रोडक्शन में तैयार नाट्योत्सव के पहले नाटक का मंचन होना था। ऐसे में यहां भारी संख्या में दर्शक पहुंचे। लेकिन निर्धारित समय से करीब आधे घंटे पहले ही लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे शाम से ही सभागार के बाहर दर्शकों की भीड़ हो गई और प्रवेश न मिल पाने की वजह से यहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया। हंगामे के बीच कमानी ऑडिटोरियम के प्रबंधक और रानावि के प्रबंधकों में भी बहस शुरू हो गई और दोनों एक-दूसरे पर इस अव्यवस्था का आरोप लगाते रहे। जब रानावि के एके बरुआ से इस विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसके लिए कमानी ऑडिटोरियम के नए प्रबंधक की अनुभवहीनता को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि सभागार में स्थान होने के बावजूद दर्शकों को प्रवेश से रोका गया और इस वजह से स्थिति हाथ से बाहर हो गई। वहीं कमानी के प्रबंधक का कहना था कि सभागार में दर्शकों की क्षमता से तीन गुना ज्यादा आमंत्रण पत्र बांटे गए। इस वजह से प्रवेश को लेकर इतनी अव्यवस्था फैली। रानावि और कमानी ऑडिटोरियम अधिकारियों की आपसी कहासुनी में दर्शक देर रात तक प्रवेश के इंतजार में खड़े रहे। 

नई दिल्ली. देश का सबसे बड़ा नाटक उत्सव 14वां भारत रंगमहोत्सव रविवार को कमानी ऑडिटोरियम में एक नाटक के साथ शुरू हुआ। महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर मौजूद केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा ने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सफलता का श्रेय यहां के बहुप्रतिभाशाली व्यक्तित्वों को जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार नाटकों के मंचन के लिए अधिक दर्शकों की क्षमता वाले थिएटर और रंगमंच से जुड़ी अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए पूरी मदद करेगी। सरकार की पूरी कोशिश होगी कि अगले साल तक थिएटर प्रेमियों को यह सुविधा मुहैया कराई जा सके। रानावि की चेयरपर्सन अमल अलाना ने कहा कि इस साल भारत रंग महोत्सव के दौरान विभिन्न भाषाओं और थीम वाले नाटकों का आनंद लगभग साठ हजार से अधिक दर्शक ले सकेंगे। रानावि की निदेशक अनुराधा कपूर ने बताया कि नाट्य उत्सव के दौरान इस बार सांथाली, तुलू के साथ एक अन्य भाषा के नाटकों का पहली बार मंचन किया जाएगा। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने कहा कि थिएटर में अभिनय करना फिल्मों में काम करने से ज्यादा मुश्किल है। इसके बाद रतन थियम निर्देशित व रविंद्रनाथ टैगोर की रचना पर आधारित नाटक किंग ऑफ द डार्क चैम्बर का मंचन किया गया। 



एशियाई रंगमंच के महाकुंभ में डूबी अंतरराष्ट्रीय ख्याति


दैनिक जागरण 

सभागार के बाहर खड़े नाट्यकर्मी व दर्शक
नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : वृहदता व उत्कृष्टता के कारण एशियाई रंगमंच के महाकुंभ के तौर पर मशहूर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के वार्षिक उत्सव भारत रंग महोत्सव का उद्घाटन समारोह अव्यवस्था की भेंट चढ़ गया। आलम यह रहा कि आम दर्शकों के साथ ही साथ बड़ी संख्या में विदेशी नाट्य प्रेमी, डेलिगेट्स, मीडियाकर्मी व कलाकार समारोह में प्रवेश से वंचित रह गए।
समारोह में प्रवेश का वैध पास होने के बावजूद रोके गए दर्शकों ने जमकर हंगामा भी किया और नारे लगाए। दर्शकों की सुरक्षा गार्डो व पुलिस कर्मियों से तीखी बहस भी हुई, लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद एनएसडी के किसी प्रतिनिधि ने इसकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। सर्द रात में करीब एक घंटे तक सभागार के बाहर प्रवेश करने के बाद लोग आयोजकों को लानत-मलानत भेजते हुए अपने-अपने घरों को लौट गए।
एनएसडी के 14वें वार्षिक नाट्य महोत्सव भारत रंग महोत्सव का रविवार को उद्घाटन होना था। उद्घाटन केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा व मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर को करना था। उद्घाटन स्थल के रूप में कमानी सभागार का चयन किया गया था। लेकिन जब बड़ी संख्या में आमंत्रित विदेशी डेलिगेट्स, रंगमंच प्रेमी, कलाकार व मीडियाकर्मी तयशुदा समय पर उद्घाटन स्थल पर पहुंचे तो उन्हें प्रवेश देने से रोक दिया गया। मीडिया कर्मियों व अन्य आमंत्रित लोगों द्वारा सुरक्षाकर्मियों से गेट खोलने अथवा आयोजकों के प्रतिनिधियों को बुलाने का आग्रह करने के बावजूद समस्या के समाधान के लिए वहां कोई नहीं पहुंचा। इस पर नाराज दर्शकों ने जमकर हूटिंग की और नारे लगाए। एनएसडी के कलाकारों ने गेट के बाहर ही ढपली बजाकर कटाक्षपूर्ण गीत गाने शुरू कर दिये। कुछ लोगों की पुलिस व सुरक्षाकर्मियों से झड़प भी हुई और लोगों द्वारा गेट फांद कर प्रवेश करने की भी कोशिश की गई।
दैनिक जागरण से बातचीत में नाटक देखने जापानी दल के साथ आई मोमीको ने बताया कि वैध प्रवेश पास होने के बावजूद उन्हें व उनके दल को प्रवेश करने नहीं दिया गया। मोमीको ने बताया कि उसने भारंगम के बारे में काफी कुछ सुन रखा था, लेकिन यहां की अव्यवस्था से उन्हें काफी निराशा हुई है। स्विट्जरलैंड के बोरिस ने भी अव्यवस्था पर निराशा जताते हुए कहा कि यदि प्रवेश नहीं देना था तो उन्हें निमंत्रण देकर बुलाया ही क्यों गया? मणिपुर के भूपेंद्र ने बताया कि उन्हें अंदर न जाने देने का कोई कारण तक नहीं बताया जा रहा है। गार्ड कहते हैं कि अंदर जगह नहीं है। यदि जगह नहीं थी तो उन्हें निमंत्रण देकर बुलाया ही क्यों गया। इस बाबत अपना पक्ष रखने को एनएसडी की ओर से कोई उपलब्ध नहीं हो सका।


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