रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

एक खालीपन छोड़ गए राजेश सिन्हा : आसिफ अली

धरती आवा में राजेश 

राजेश सिन्हा पटना रंगमंच पर पिछले लगभग तीन दशक से लगातार सक्रिय अभिनेताओं में से एक थे. इस दौरान उन्होंने कई नाट्य दलों के साथ काम करते हुए कई यादगार भूमिकाओं को मंच तथा नुक्कड़ नाटकों में बखूबी निभाया. इप्टा के लोग प्यार से उन्हें राजेश कावासाकी कहते थे. गत दिनांक 24 अक्टूबर 2012 को बीमारी की वजह से उनके देहांत ने पटना के रंग जगत को स्तब्ध सा कर दिया. उन्हें याद कर रहें हैं पटना इप्टा जुड़े उनके साथी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व छात्र आसिफ अली.माडरेटर मंडली.

विश्वास नहीं हो रहा, बड़ा ही तकलीफ़देह समाचार है ये. वे पटना में हमसे थोड़े सीनियर रंगकर्मियों में से एक थे. इप्टा के साथ ही उन्होंने अपने रंग जीवन की शुरुआत की थी. फिर कुछ वजहों से इप्टा से अलग हो गए और पवन सिंह के साथ बादल सरकार लिखित अबू हसन नामक नाटक किया. अन्य लोगों और समूहों के साथ भी समय-समय पर उनका जुड़ाव रहा जिसमें थियेटर यूनिट, मंच आर्ट ग्रुप, निर्माण कला मंच आदि सहित श्रीराम सेंटर रंगमंडल आदि प्रमुख हैं. श्रीराम सेंटर रंगमंडल के साथ कारंत जी द्वारा निर्देशित बाबूजी उनके यादगार कार्यों में से एक है. तनवीर अख्तर निर्देशित कबीरा खड़ा बाज़ार में, सौदागर सहित कई अन्य नाटकों में भी उन्होंने सराहनीय काम किया. रंगमंच के प्रति उनका लगाव आज भी वैसा ही था.
बतौर एक इंसान राजेश की सबसे अच्छी बात थी उनका सीधापन, उनकी सहजता, चीज़ों को बिना किसी पेचीदगी के सहजता के साथ स्वीकार करने की उनकी लाजवाब कला. लोगों के साथ उनका जुड़ाव सहज ही हो जाता था. समूह में भी राजेश की निकटता अक्सर सहज लोगों के साथ हीं होती थी. असहजता कभी उनकी पसंदगी की लिस्ट में शामिल नहीं रही. यही सहजता उनकी तथा उनकी अभिनय शैली की सबसे बड़ी ताकत थी और एक स्टाईल भी. अपनी इसी सहजता की वजह से वो रंगकर्मियों के बीच पसंद किये जाते थे.
सौदागर में राजेश सिन्हा 
अभिनय के साथ ही साथ मंच परे ( जो कि पटना रंगमंच की एक समृद्ध परम्परा भी है ) में भी उनकी खास रूचि थी, खासकर मंच प्रबंधन ( stage management ) के गुण उनके अंदर गजब के थे. Trial & error method के सहज, सरल लर्निंग वाले अभिनेता का नाम था राजेश. अगर किसी की कोई सही बात दिल को छू जाए तो उसे ही अपना गुरु स्वीकार करके उसे आत्मसाथ करने की दिशा में कार्य आरम्भ कर देते थे.
साथ ही अपने साथ अपने मित्रों के परिवार के साथ भी उनका एक स्नेहिल रिश्ता था. हमारा काम और हमारा रिश्ता केवल नाटकों के पूर्वाभ्यास और प्रस्तुति तक ही सीमित नहीं था. मित्रों और सहयोगियों के सुख-दुःख के एक सच्चे साथी थे राजेश. एक ऐसा इंसान जिसकी पैठ मित्रों के घरों तक भी सहज थी. वे काफी हँसमुख, मिलनसार और जिंदादिल भी थे. इप्टा से अलग होने के बाद भी हमें कभी ऐसा नहीं लगने दिया कि हम अलग हो गए हैं. रंग-समूह और व्यक्ति ( मित्रता ) दोनों को पूरी शिद्दत के साथ अलग-अलग देखने और निभाने की क्षमता थी उनके अंदर. और क्या खूब निभाया उन्होंने. अमूमन ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलाता है.
इप्टा से वो जब अलग हुए तो हम सब दुखी हुए थे. सबको एक झटका सा झटका लगा था. इस अलगाव से हम सबकी सहजता, उत्साह को ज़बरदस्त चोट पहुंची थी. कई लोग तो कभी सहज नहीं हो पाए. एक guilt का एहसास हमेशा ही रहा. राजेश भी इस एहसास से अछूते नहीं रहे. जिन बातों को लेकर राजेश और कुछ अन्य साथियों ने इप्टा छोड़ी उसके conflict तो पहले से ही शुरू हो गया था.
उनके साथ काम करते हुए बड़ा ही दोस्ताना दोस्ताना लगता था. खासकर नए लोगों को कभी ऐसा नहीं लगता कि वो एक अनुभवी अभिनेता के साथ काम कर रहें हैं. अपने बाद वाली पीढ़ी के प्रति उनका व्यवहार बड़ा ही दोस्ताना था. मैं स्वयं उसका उदाहरण हूँ. मैं उनसे जूनियर था फिर भी राजेश मेरे अच्छे मित्रों में से एक थे और हमेशा रहे. उन्होंने कभी भी ये एहसास तक न होने दिया कि मैं जूनियर हूँ. इप्टा से अलग होने के बाद भी हमारी मित्रता वैसी ही रही.

सदाचार का तावीज़ में राजेश सिन्हा 
एक किस्सा याद आ रहा है उनसे जुड़ा. हमें लखीमपुर ( असम ) जाना था दूर देश की कथा का शो करने. ट्रेन के टिकटों को आरक्षित करने की ज़िम्मेवारी राजेश के ऊपर थी. हम सब पूरी तरह से निश्चिन्त थे. उन दिनों राजेश अपने पारिवारिक कारणों से काफी व्यस्त चल रहे थे. शायद इसी वजह से वो टिकटों के आरक्षण करने के लिए समय नहीं निकाल सके. खैर, हम स्टेशन पहुंचे गए तय समय पर, ट्रेन आई, चढने लगे तब पता चला कि आरक्षण तो हुआ ही नहीं है. ट्रेन में काफी भीड़ थी, पूरी टीम के साथ बिना आरक्षण के यात्रा करना संभव नहीं लग रहा था. जावेद साहेब ( अख्तर ) बहुत गुस्सा हुए. राजेश गर्दन नीचे किये चुपचाप खड़ा हो सुनते रहे. जावेद साहेब और तनवीर साहेब की बड़ी इज्ज़त करते थे राजेश. ट्रेन निकल गई. नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि लगा टूर कैंसल करना पड़ेगा. खैर, मैं और इश्तियाक बस स्टैंड गए. पूर्णियां की बस मिली, किसी तरह सबको उसमें बैठाया गया. फिर पूर्णियां से गुवाहाटी की बस ली फिर लखीमपुर की. हम तीस लोगों ने बहत्तर घंटे बस की यात्रा की. गजब का मज़ा आया. किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं. क्या स्पिरिट थी सबमें रंगमंच प्रति.
एक वक्त सबपे संगीत सीखने का भूत सवार हुआ था. सब रवि दा के पास जाने लगे, हम दोनों बस किसी तरह गा भर लेते थे. राजेश मुझसे थोड़ा अच्छा गाते थे. गाने के मामले में मैं बहुत बुरा हूँ.
पटना रंगमंच से श्रीराम सेंटर दिल्ली और वहाँ  से पुनः वापस पटना. मुंबई जाने की चाहत शायद उनके अंदर थी कहीं न कहीं, पर संसाधनों और शायद आत्मविश्वास की कमी के कारण मुंबई का रुख करने की हिम्मत नहीं कर पाए. वो दोस्तों के दोस्त थे. उनकी असमय मौत ने जो खालीपन छोड़ा है हम सबके भीतर उसका एहसास लंबे समय तक रहेगा. 

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

The curious case of A.K. Hangal : ZIYA US SALAM


AK Hangal
A.K. Hangal -- 1917-2012 - Communist, tailor, actor, purveyor of senescent charm
Like Benjamin Button, Avtar Krishan Hangal seemed for generations of cinemagoers to have been born old.
It didn’t matter whether it was in landmark films such as SholayNamak Haraam and Lagaan or somewhat offbeat ventures such as Shagird andShararat. Never mind whether he was called Rahim chacha, Masterji or Imam sahab. A.K. Hangal, whose roles often demanded a careworn fragility and a gentle but unwavering righteousness, was the very embodiment of senescent charm. He was cast in roles that demanded piety, playing characters that carried the burden of their virtuous poverty with a quiet and kindly dignity. That these roles mirrored the ups and downs of his own life made their portrayal all the more easy.
Perhaps it had something to do with his face that filmmakers were loath to offer him a villain’s part. Yes, of course he did break the mould sometimes, as inShaukeen, where he played, along with Ashok Kumar and Utpal Dutt, a lecherous old man. That he acted with conviction is reflected in the following anecdote. Hangal, well into his 90s then, had finished a leisurely dinner at a five-star hotel in Delhi and needed to be dropped off at a friend’s place. A girl in her 20s was assigned the task of driving him. She whispered in trepidation to her boss: “Sir, I have seen Shaukeen!” Finally, a man had to be commandeered to drive Hangal where he wanted to go.
If the girl was guilty of mixing reel with real, the film industry did no better. While everyone wanted to cast him in the role of a kindly old man, nobody spared a thought for the old man himself. Not even when he did Gurudev Bhalla’s Shararat, a film about old age home inmates, did it strike anyone that Hangal could be facing a crisis himself. It was only a couple of years ago, when his son Vijay announced there was no money for the treatment of Hangal, who suffered from multiple medical problems at the time, that the film world awakened from slumber. The industry rose like one, with Jaya Bachchan, who had acted with Hangal in BawarchiGuddi and Sholay, offering to pay for his treatment. So did others such as Mithun Chakraborty and Riyaz Gangjee, who incidentally, got Hangal to ‘walk’ the ramp on a wheel chair a little more than a year ago. Earlier this year, Hangal made a comeback of sorts, shooting for the serial Madhubala on Colors.
That was one of the rare times Hangal occupied the centre-stage. For the most part, he was on the sidelines. He did a number of films with Rajesh Khanna, a few significant ones with the Bachchans and many others. When this correspondent reminded him of his roles in a variety of films such as Tapasya,Avtaar and Sharaabi, he seemed dismissive. “Bahut role kiye hain. I have seen only 50 films of mine.” (He did 225 in all.) But he did remember Sholay. “I researched for the role, learnt Islamic hymns and tried to perfect the body language for the role of an imam,” he said.
It wasn’t an easy life for Hangal. He spent three years in jail in Karachi before coming to Bombay in 1949 with all of Rs. 20 in his pocket. Left-leaning, a member of the Communist Party, he spent many years working for the Indian People’s Theatre Association. Such were the vicissitudes of life that Hangal at one time had to take up a tailoring job to make ends meet. Like everything else, he excelled at it. Born in Sialkot in 1917, he was a late comer to the film industry. He signed Shagird when he was almost 50. But he had done plenty of theatre by then.
Films brought him stability and a degree of respect. It did not, however, translate into a comfortable house or a bank balance. His origins would haunt him now and then. Once he was dubbed anti-national by right-wing forces in Mumbai for attending Independence Day celebrations at the Pakistan Consul-General's office. He was boycotted by filmmakers and remained out of work for two years.
Although things returned to normal, the incident left him deeply hurt. He complained: “I had come to India leaving behind everything in Karachi yet was dubbed a Pakistani!”
A lifelong Marxist, he renewed his membership of the Communist Party of India earlier this year. “I clearly remember the day Bhagat Singh was arrested, and the day he was hanged. Pathans cried and everyone walked the streets chanting ‘Bhagat Singh, Bhagat Singh’,” he told Open magazine, speaking proudly of his earliest associations with the Left.
In his autobiography, Life and Times of A.K. Hangal, he lamented Bollywood’s tendency to ignore the “complex social fabric of society” and make stereotyped films. “[Honestly] speaking, even after working in about 200 films, and getting name and fame, I often feel I am a stranger in this world because of my ideological and political background, sensitiveness and social commitments.”
On Sunday, the realities of his age finally caught up with the old man of Hindi cinema.
A.K. Hangal, actor, died on August 26 aged 95. He was born in Sialkot, now in Pakistan, on February 1, 1917.
The Hindu से साभार .

सोमवार, 27 अगस्त 2012

मौजूदा स्थिति से दुखी थे एके हंगल : सुलभा आर्य

अभिनेता व स्वतंत्रता सेनानी ए.के.हंगल साहेब को श्रधांजलि देने कोई भी 'बड़ा स्टार' नहीं पहुंचा. सबने फेसबुक, ट्यूटर पर ही काम निपटाया. इसे क्या माना जाय ? क्या मुंबई के नकली हीरो जीवन के असली हीरो से चिढते हैं ? - माडरेटर मंडली. 

मैं हंगल साहब के साथ पिछले 50 वर्षों से जुड़ी रही हूं. मेरा उनसे मिलना इप्टा के कारण से ही हुआ था. इसके बाद थिएटर करने के साथ-साथ हम फिल्मों की वजह से भी मिलते रहते थे. वे मुझसे वरिष्ठ थे, लेकिन मैं जब भी उनसे मिलती और बातें होतीं, तो ऐसा लगता था कि वे अपने छोटों से भी सीखने की कोशिश करते थे. मैंने उनके साथ कई प्ले किये हैं, जिनमें शतरंज के मोहरे, पेपरवेट जैसे प्ले काफी लोकप्रिय रहे थे. 
यह नाटकों के प्रति उनका कमिटमेंट ही था कि वे कई बार अपनी फिल्मों की शूटिंग इस तरीके से मैनेज करते थे कि उन्हें अपने नाटक के साथ कोई समझौता न करना प.डे. वे जब तक सक्रिय रहे, नाटकों को बढ़ावा दिया.

हंगल साहब की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे इप्टा का महत्व समझते थे. वे मानते थे कि इप्टा का मतलब इंडियन पीपुल थिएटर है, तो वह लोगों तक पहुंचना चाहिए. उनका मानना था कि सांस्कृतिक चेतना तभी आ सकती है, जब हम रंगमंच को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनायें. वे मानते थे कि सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा है रंगमंच. वे स्ट्रीट प्ले को हमेशा प्राथमिकता देते थे. कहते थे कि इसके माध्यम से अधिक लोगों तक बात पहुंचेगी. जब वे बीमार रहने लगे थे तब इप्टा के लोगों को घर पर बुला कर सारे अपडेट्स लेते रहते थे.

मैंने उनके साथ काम करते हुए महसूस किया है कि वे अपने काम को बहुत गंभीरता से लेते थे. कई बार तो वे पूरी रात रिहर्सल करते रह जाते थे. काम के पहले मतलब रिहर्सल के पहले वे मजाक करते थे. लेकिन काम के दौरान उन्हें हंसी मजाक, यानी काम को हल्के में लेना पसंद नहीं था. वे कहते थे कि उनकी कभी इच्छा नहीं रही थी कि वे फिल्मों में काम करें. थियेटर में अभिनय करने से वे खुद को समृद्ध महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि वे समाज में कुछ योगदान कर रहे हैं.

हंगल साहब सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों से हमेशा अपडेट रहते थे. यही वजह थी कि अगर कोई गलती कर दे, तो वह फौरन टोक देते थे. उनकी एक खासियत यह भी थी कि अपने संवाद के साथ-साथ वे नाटक के सेट, अपने मेकअप, किरदारों के परिधान को लेकर भी सतर्क रहते थे. उनमें कमाल का स्टेमिना था. बुजुर्ग होने के बावजूद वे ताजगी के साथ काम किया करते थे. शायद इसकी वजह यह रही होगी कि वे स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहे थे.

हंगल साहब का मानना था कि भले ही कितने भी बदलाव हो जायें, हम कितना भी बदल जायें, लेकिन हमें अपने इतिहास को साथ लेकर चलना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काबुली गेट पर हुई घटना का वे अकसर जिक्र करते थे, क्योंकि उन्होंने वहां का पूरा नजारा अपनी आंखों से देखा था. उनके मन में हमेशा देश के लिए प्रेम था. लेकिन देश की वर्तमान की स्थिति को देख कर वे थो.डे दुखी थे. वे कहा करते थे कि सामाजिक रूप से लोग इन दिनों भावनाहीन हो गये हैं. हमें अपनी संस्कृति को बचाने के लिए नाटकों का मंचन ब.डे स्तर पर करते रहना होगा. उनका मानना था कि हमारे देश में वैसे नाटकों का मंचन होना चाहिए जिसमें संस्कृति, विकास, आम लोगों की समस्या, वर्तमान राजनीतिक परिवेश दिखे. उन्होंने इप्टा के माध्यम से पूरे देश में कई स्थानों पर सांस्कृतिक चेतना फैलायी. फिल्मों से अधिक वे इप्टा के लिए सक्रिय रहे. उन्होंने कैफी आजिमी और बलराज साहिनी जैसे कलाकारों के साथ काम किया था. यही वजह थी कि वैचारिक रूप से भी वे बेहद समृद्ध थे. हाल में जब भी उनसे मेरी मुलाकात होती थी तो वे अत्रा आंदोलन पर चर्चा करते रहते थे. हम इप्टा के सदस्य सदैव उनके योगदान को याद रखेंगे.
सुलभा आर्य : अभिनेत्री हैं और वर्तमान में इप्टा मुंबई की अध्यक्ष हैं. प्रस्तुति : अनुप्रिया अनंत. आलेख आज के प्रभात खबर, के राँची संस्करण से साभार.

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

चैप्लिन के भीतर एक बच्चा रोता है ! - विमलेन्दु द्विवेदी


चार्ली चैपलिन के जन्मदिन (जन्मदिन 16 अप्रैल ) पर विमलेन्दु द्विवेदी का आलेख | विमलेन्दु जी से आप  यहाँ संपर्क कर सकतें हैं |

चार्ली चैपलिन 
अपनी किशोर वय में ,चार्ली चैप्लिन की फिल्में ढूढ़-ढूढ़ कर देखना हम कुछ दोस्तों का जुनून हुआ करता था.उस समय VCR पर फिल्में देखी जाती थीं. हम तीन-चार दोस्त मिल कर पैसे इकट्ठे करते. किराये पर VCR और कैसेट्स ले आते थे.शहर में उपलब्ध चैप्लिन की शायद ही ऐसी कोई फिल्म रही होगी जिसे हमने न देखा हो. चूँकि उनकी फिल्में कम अवधि की होती थीं तो पेट ही नही भरता था, तो एक ही फिल्म को कई कई बार देखते थे. यही मेरा अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा से प्रथम और एकमात्र परिचय था.
उस उम्र में चैप्लिन की फिल्में देखना विशुद्ध मनोरंजन के लिए होता था. उनकी सिनेमा कला पर सोचने की समझ नहीं थी मुझमें. अधिकांश फिल्मों की स्मृति भी अब धुँधली हो गयी है. लेकिन अनजाने ही मन के किसी हिस्से में कुछ जमता गया था, जो गाहे बगाहे कौंध जाता है . फिल्मों पर पढ़ना और लिखना मुझे हमेशा से प्रिय था. चैप्लिन पर कहीं भी कुछ पढ़ने को मिल जाता तो लपक कर पढ़ता था.यह धारणा भी मन में मज़बूत होती गयी कि चैप्लिन एक महान फिल्मकार थे. उन्होने फिल्म कला के सबसे चुनौतीपूर्ण विषय को चुना था. हास्य पर फिल्म बनाना और अन्त तक उसका सफल निर्वाह कर ले जाना फिल्म कला का सबसे कठिन काम है. और यह काम तब लगभग असंभव सा हो जाता है जब फिल्मकार सचेत भाव से उसमें अपने सामाजिक और मानवीय सरोकार भी दिखाना चाहता हो. पर असंभव से खेलना ही चार्ली चैप्लिन की फितरत थी. अपनी ज़िद और अपनें ही कायदों में काम करने वाला एक अद्वितीय फिल्मकार ! हिटलर तक को चुनौती दे डालने वाला एक मर्द फिल्मकार !!
25, दिसंबर 1977 को जिनेवा में 88 वर्ष की अवस्था में चैप्लिन ने जब देह त्यागी तब तक उन पर बुढ़ापा बहुत हावी हो चुका था.काफी समय से चैप्लिन काम करना बंद कर चुके थे.चैप्लिन के उत्कर्ष के दिनों में अमेरिका जाने वाला या अमेरिका से बाहर भी , दुनिया का हर बड़ा आदमी उनसे मिलता था. एच.जी.वेल्स,विन्सटन चर्चिल,महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू,चाऊ-एन-लाई,सर्गेई आइजेंस्ताइन, पिकासो, सार्त्र,ब्रेख्त जैसे लोगों ने बड़े उत्साह के उनसे मुलाकात की. जापान यात्रा के दौरान, जापान के आतंकवादियों ने उनकी हत्या की योजना बनाई. वे सोचते थे कि चैप्लिन की हत्या करके अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की पहल कर सकेंगे. दरअसल उन्हें बहुत बाद में पता चल पाया कि चैप्लिन अमेरिका के नहीं बल्कि ब्रिटेन के नागरिक हैं. वे किसी एक देश की नागरिकता धारण किए रहने और उसे जतलाने की मनोवृत्ति को भी नकार चुके थे. जबकि अमेरिकी नागरिकता लेने के लिए अमेरिका में राज्य और प्रेस की ओर से उन पर भारी दबाव पड़ा था. चैप्लिन राष्ट्रीयता की भवना को कोई बड़ी नियामत नहीं मानते थे, फिर भी वे ब्रिटेन के ही नागरिक बने रहे.
16 अप्रैल 1889 को ईस्ट लेन, वालवर्थ, लंदन में जन्में चैप्लिन लगभग 50 वर्षों तक अमेरिका में ही रहे. ऊना उनकी चौथी पत्नी थीं ,जो मृत्यु के समय उनके साथ थीं. वह चैप्लिन के दस बच्चों मे से आठ की माँ थीं. नाचने गाने और अभिनय की उनकी यात्रा पांच वर्ष की आयु में बड़े नाटकीय ढंग से शुरू हुई थी. उनकी माँ मंचों पर गाती थीं . एक बार प्रदर्शन के दौरान उनकी माँ की आवाज़ फट गयी, और श्रोता शोर मचाने लगे. तब पांच वर्ष के बालक चैप्लिन ने मंच सम्भाला और अपने प्रदर्शन से दर्शकों को मुग्ध कर दिया. उस रात के बाद उनकी माँ की आवाज़ कभी ठीक नहीं हुई.अपनी आवाज़ खोने के कुछ साल बाद वे विक्षिप्त हो गयीं. पति से तलाक चैप्लिन के जन्म के समय ही हो चुका था. इस तरह चैप्लिन ने रंगमंच की शुरुआत अपने परिवार के गुजारे की गरज़ से की. अपनी जीवनी में भी वो स्वीकार करते हैं--" कला एक ऐसा शब्द है, जिसने तब मेरे मस्तिष्क या मेरे शब्दज्ञान की परिधि में कभी प्रवेश नहीं किया. रंगमंच का मतलब था गुजारे का साधन, और कुछ नहीं...."
लेकिन चैप्लिन महान अभिनेता हुए.उनकी अभिनय शैली की नकल करना लगभग असंभव बना रहा. राजकपूर ने जब चैप्लिन की नकल करने की कोशिश की तो उन्होंने अपने कद को बहुत छोटा कर लिया था. चैप्लिन ने हास्य की प्रचलित पद्धति में मौलिक परिवर्तन किए थे.उन्होने असंगत उछल-कूद और भाव-भंगिमा बनाकर हंसाने की पद्धति को खारिज कर दिया. उनका मानना था कि हास्य, सामान्य व्यववहार में ही सूक्ष्म परिवर्तन कर के पैदा किया जा सकता है. कॉमेडी विवेकसम्मत व्यवहार को थोड़ा सा हेरफेर से हास्यजनक बना देता है. महत्वपूर्ण को अंशतः महत्वहीन बना देता है, तर्क को तर्कहीनता का आभास देता है. हास्य अस्तित्वबोध और संतुलन चेतना को धार देता है.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मृत्यु, विनाश और घोर निराशा से घिरे विश्व को यह महामानव अपनी संवेदना, दुख का सार, हँसी, मासूमियत, उल्लास और अपराजेय आस्थाएँ दे रहा था. प्रतिरोध कई बार अमूर्तन में भी व्यक्त होता है, खासतौर पर कला-माध्यमों का प्रतिरोध. विश्वयुद्ध के दौरान कुछ कला समीक्षकों ने पिकासो पर निर्लिप्त रहने का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि पिकासो ने युद्ध के विरुद्ध केवल एक कृति ' गुएर्निका ' ही बनायी है. जबकि फासी आधिपत्य में रहते हुए पिकासो ने इस कृति के पहले सर्कस के अभिनेताओं, नटो, राजनीति और युद्ध से अनासक्त दिखते सामान्य जन के चित्र बनाये हैं.और युद्धके बाद मरे हुए सांड़ों के सिर बनाये हैं. इस तरह के तमाम चित्र भी युद्ध विरोधी और युद्ध से प्रभावित गहरे अमूर्तन के ही चित्र हैं.
चैप्लिन की रचनाओं में भी ऐसा ही अमूर्तन है. हिटलर पर चैप्लिन ने ' द ग्रेट डिक्टेटर ' फिल्म बनाई. चैप्लिन ने हिटलर पर सबसे पहले यह आरोप लगाया था कि  उसने मेरी मूँछ (जिसे हमारे यहाँ तितली मूँछ कहते हैं ) चुरा ली है. सर्गेई आइजेंस्ताइन ने लिखा है कि यह आरोप लगाकर एक महामानव ने हिटलर जैसे दुनिया के सबसे बड़े मनुष्य विरोधी को हास्यास्पद बना दिया.चैप्लिन के सरोकार बहुत बड़े थे.पराजित और पराधीन देशों के दुख दर्द पर उनकी नज़र थी.
कलासंबन्धी अपनी अवधारणाओं में चैप्लिन एकदम मौलिक थे. वे कहते थे कि मेरा शिल्प, अभ्यास और चिन्तन का परिणाम है किसी के अनुकरण का नहीं.वे इस तर्क से सहमत होते नहीं दिखते कि कला में समय के साथ कदम मिलाते हुए चलना आवश्यक है.सवाक् फिल्मों का युग शुरू हो जाने के बाद भी कई वर्षों तक चैप्लिन मूक फिल्में ही बनाते रहे.हो सकता है कि इसके पीछे उनका कोई डर रहा हो. यह भी संभव है कि वह ध्वनि को अपनी सम्प्रेषणीयता में बाधा समझते रहे हों.चैप्लिन एक शुद्धतावादी कलाकार थे.
चैप्लिन की मूक फिल्मों पर किसी कला-परंपरा का नहीं, उनके अभावग्रस्त अतीत, सामाजिक विषमता और उनके प्रतियोगिता के लिए तत्पर और जुझारू व्यक्तित्व की गहरी छाप है.असहनीय परिस्थितियां उनकी कृतियों में खिल्ली उड़ाने लायक बन कर आयी हैं. संघर्ष आकर्षक और उससे संबंधित अनुभूतियां छन कर स्फूर्तिदायी और उदात्त हो गयी हैं.उनके विराट हास्य में करुणा की एक सरस्वती निरन्तर बहती रहती है.चैप्लिन जीवन के विद्रूप में हास्य की सृष्टि करते हैं, लेकिन कहीं भी हास्य को विद्रूप नहीं होने देते.
चैप्लिन एक सम्पूर्ण मानव और फिल्मकार थे.एक मनुष्य के तौर पर कोई आडम्बर उन्होने नहीं किया. कला उनके जीवन में रोजी-रोटीके सवाल के जवाब के रूप में आयी तो उसे उन्होने उसे वैसे ही स्वीकार किया.और जब कला को उनकी ज़रूरत पड़ी तो खुद को पूरा सौंप दिया.एक अभिनेता, लेखक ,निर्देशक के उनके तीनों रूपों में यह तय कर पाना आज भी मुश्किल है कि वह किस रूप में ज़्यादा बड़े हैं. चैप्लिन इस दुनिया के पिछवाड़े पर पड़ी हुई एक लात हैं.

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

एनएसडी के वो पहले छात्रों में से एक थे |


रविराज पटेल का आलेख 


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली की स्थापना सन 1959 ई. में संस्कृति मंत्रालय ,भारत सरकार के स्वायत्त संस्थान संगीत नाटक अकादमी द्वारा की गई .इसी वर्ष पटना के चर्चित युवा रंगकर्मी एवं डाक-तार विभाग के कर्मचारी प्यारे मोहन सहाय पटियाला (पंजाब) से लौटते वक्त दिल्ली में कुछ पुराने मित्रों से मिलने ठहर गये. प्यारे मोहन हैमर थ्रो एवं वेट लिफ्टिंग के राज्यस्तरीय खिलाड़ी भी थे. वे इसी खेल को विभाग की ओर से पटियाला खेलने गये थे. इनके मित्रों में शिवसागर मिश्र ,केशव पाण्डेय ,भालचंद्र ओझा आदि उन दिनों ऑल इण्डिया रेडिओ (आकाशवाणी) ,दिल्ली में कार्यरत थे. शिवसागर मिश्र ने उन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना की विस्तृत जानकारी दी. प्रवेश प्रक्रिया अंतिम चरण में था. प्यारे मोहन तुरंत कुछ मित्रों के साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जा कर प्रवेश हेतु आवेदन भर दिया, अगले ही दिन साक्षात्कार हुआ और चयन भी हो गया . पटना आये, नाट्य अध्ययन के लिये विभाग से छुट्टियाँ ली और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ,दिल्ली पहुँच गये. लम्बी अवधि के लिये पहली बार घर से दूर गये थे ,इसलिए मन में घबराहट भी थी लेकिन लक्ष्य सामने था. वहाँ तीन वर्षों में नाटक के हर विद्या की शिक्षा ग्रहण किया ,अतिरिक्त एक वर्ष का निर्देशन में भी विशेषज्ञता हासिल किया,इसके लिये उन्हें एक साल तक छात्रवृति भी मिला. इसी दरम्यान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में किये गये नाटकों में सर्वश्रेठ अभिनय के लिये उन्हें 'किर्लोस्कर अवार्ड' से सम्मानित किया गया.

प्यारे मोहन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रथम बैच के प्रथम बिहारी छात्र थे. इनका अध्ययन सत्र सन 1959 ई. से सन 62 ई. तक रहा . ज्ञातव्य हो की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सन 1975 ई. में संगीत नाटक आकादमी से मुक्त हो कर स्वतंत्र विद्यालय के अस्तित्व में आया .सन 2005 ई. में इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान की गई थी, परन्तु सन 2011 ई. में संस्थान के अनुरोध पर इसे रद्द कर दिया गया.
प्यारे मोहन सन 1963 ई. में वहाँ से पढाई समाप्त कर वापस पटना आ गये. पारिवारिक परिस्थिति को देखते हुये,डाक-तार विभाग में फिर से नौकरी शुरू कर दी ,लेकिन अपने कला का विस्तार भी करते रहे. रंगमंच ,आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के साथ खुद को गति देते रहे . तब तक भोजपुरी- मैथली क्षेत्रीय फिल्मों का भी दौर शुरू हो चूका था. प्यारे मोहन की पहली फीचर फिल्म "कब होइहें गवनवां हमार" थी . इसी बीच प्रथम मैथली फिल्म 'ममता गावे गीत' में वे नायक बने जिसमे नायिका अजरा थी. यह फिल्म सन 1963-64 ई. में ही बनी, लेकिन तीन चार दिनों की शूटिंग सन 1980-81 ई. में पुरी कर प्रदर्शित हुई .इसी कारण पहली मैथली फिल्म हो के भी पहली का दर्जा प्राप्त नहीं कर पाई.
प्यारे मोहन बिहार के सशक्त अभिनेता के रूप में मशहूर हो चुके थे. प्रकाश झा की दूसरी फिल्म "दामुल" (1985) से इन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली. प्यारे मोहन सहाय देश के कई दिग्गज सिने निर्देशकों के साथ काम किया जैसे -मृणाल सेन ,रमेश सिप्पी ,श्याम बेनेगल ,महेश भट्ट,प्रकाश झा ,कुंदन शाह ,अनिल शर्मा, गिरीश रंजन,तरुण मजुमदार, लेख टंडन,पी.एल.संतोषी, राजेश सेठी ,दीपक सरीन ,अजय कश्यप ,शुभंकर घोष ,पप्पू वर्मा,दिनकर चौधरी, ब्रज भूषण आदि .
 प्यारे मोहन सहाय अभिनीत छोटे बड़े नाटकों में ( सन 1946 ई. से सन 2009 ई. तक ) पारसी शैली की "यहूदी की लड़की" (लेखक आगा हश्र /निर्देशक भगवान सिन्हा) ,"अंगूर की बेटी" (लेखक हरे कृष्ण प्रेमी/ निर्देशक भगवान सिन्हा), "चन्द्रगुप्त" (लेखक डी.एल. रॉय / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "मेवाड़ पतन" (लेखक डी .एल. रॉय / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ) बंगला का हिन्दी अनुवाद, "राजमुकुट" (लेखक गोविन्द पन्त / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) बंगला का हिन्दी अनुवाद, "कोणार्क" (लेखक जगदीश चन्द्र माथुर / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ) ,"ध्रुवस्वामिनी" (लेखक जयशंकर प्रसाद / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "मणी गोस्वामी" (लेखक कृपा नाथ मिश्र / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "मेघनाथ" (लेखक चतुर्भुज / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "इन्द्रधनुष" (लेखक कृपा नाथ मिश्र / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय), "सिराजुदौल्ला" (लेखक चतुर्भुज / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) ," पाप और प्रकाश" (लेखक जैनेन्द्र / निर्देशक शांता गाँधी) अंग्रेजी नाटक 'पावर ऑफ़ डार्कनेस' का हिन्दी अनुवाद ,"बर्फ की मीनार" ( लेखक ज्ञानदेव अग्निहोत्री / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) , "शुतुरमुर्ग" (लेखक ज्ञान देव अग्निहोत्री / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "षोडशी" (लेखक शरतचंद्र / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ), "नीलकंठ निराला" (लेखक रामेश्वर सिंह कश्यप / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) ," बाकी इतिहास" (लेखक बदल सरकार / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) बंगला का हिन्दी अनुवाद , " मैं मंत्री बनूँगा" (लेखक सुनील चक्रवर्ती / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय) बंगला का हिन्दी अनुवाद , "इंस्पेक्टर विवेक" (लेखक प्रशांत पाण्डेय / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय), " माई डियर सिटिजन" (लेखक एम. के. सिन्हा / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय ) अंग्रेजी मूल , "कारण" (लेखक श्याम नंदन सहाय 'सेवक' / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय), "समाधान" (रामेश्वर सिंह कश्यप / निर्देशक प्यारे मोहन सहाय)
वहीँ एकांकी नाटकों में प्यारे मोहन अभिनीत " भगवत अजुकियम" (नेमी चन्द्र जैन), " चलो इसी जगह,जहाँ कोई ना हो" (पी. एल. देशपाण्डेय), स्वर्ण श्री (राम कुमार वर्मा) ,"खण्डहर" (जगदीश चन्द्र माथुर) ,"सूर्योदय" (कमला कान्त वर्मा ) , "कमरा नंबर पाँच" ( इम्तेयाज अली ताज) , "राम रहीम" (किशोर साहू) , "रीढ़ की हड्डी" (जगदीश चन्द्र माथुर) ,एवं बतौर निर्देशक "चार पार्टनर" (डॉ. जीतेन्द्र सहाय ) आदि रहा. उपरोक्त नाटकों में कई ऐसे नाटक हैं जिसका मंचन दिल्ली , मुंबई ,इलाहबाद , लखनऊ ,गया ,पटना सहित बिहार के कई प्रमुख शहरों में हुआ है. कई नाट्य प्रतियोगिताओं में वे निर्णायक भी रहे . प्यारे मोहन जी की निम्नलिखित हिन्दी ,भोजपुरी एवं मैथली फीचर फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकायें रही है , हिन्दी फिल्मों में ,शहर से गाँव ( पी.एल.संतोषी),एक अधूरी कहानी (मृणाल सेन ) ,राहगीर (तरुण मजुमदार ),कल हमारा है (गिरीश रंजन ), दामुल (प्रकाश झा ) राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत फिल्म , भ्रष्टाचार (रमेश सिप्पी ), जीने दो (राजेश सेठी ) ,रणभूमि (दीपक सरीन ) ,तहलका (अनिल शर्मा ), पुलिस वाला गुंडा (पप्पू वर्मा ), माँ (अजय कश्यप ), बेटा हो तो ऐसा (सी पी दीक्षित ), ऐ छोकरी ( शुभंकर घोष ) पुरष्कृत , बाल गोविन्द भगत (ब्रज भूषण ), मुनादी (ब्रज भूषण ),अपना भी कोई होता ( गिरीश रंजन ), मृत्युदंड (प्रकाश झा ), आकांक्षा (दिनकर चौधरी ), मिल गई मंजिल मेरी ( लेख टंडन ).
पहली मैथली फिल्म "ममता गावे गीत " (परमानन्द चौधरी )
भोजपुरी फिल्मों में - कब होइहें गवनवा हमार (पी. एल.संतोषी ), बिहारी बाबु ( दिलीप बोस ) ,सैयां से भइल मिलनवा (पी.एल संतोषी ), बलमा नादान (अकबर बालम ), टूटे ना पिरितिया के डोर ( अकबर बालम ),गंगा तुलसी (राम सिंह ), बासुरिया बजे गंगा तीरे (राकेश पाण्डेय ), गंगा आबाद रखिह सजनवा के ( राजीव रंजन ), सच भाईले सजनवा हमार (पी.एल.संतोषी), बटोहिया (राकेश पाण्डेय ).
 प्रमुख हिन्दी धारावाहिकों में - पहला पाठ , मुंगेरी लाल के हसीं सपने ,मैला आँचल ,हमराही ,मेरा कहा मान लीजिये ,मुंगेरी का भाई नवरंगी ,रजाई ,अभी तो मैं जवान हूँ ,प्रेम पहेली ,फर्ज ,संकल्प एवं अर्जुन पंडित रहा है.
प्यारे मोहन सहाय का जन्म 13 मई सन 1929 ई. को मुज्ज़फरपुर जिले के नूरछपरा नामक गाँव में हुआ था लेकिन लालन पालन पटना में हुआ, क्यूँ की पिता पटना में ही डाक-तार विभाग में नौकरी करते थे .अपना मकान शहर स्थित पोस्टल पार्क में तब से आज तक है. पिता यदुनंदन सहाय थे तथा माता बनारसी देवी थीं. स्कूली शिक्षा मिलर हाई स्कुल से एवं उच्च शिक्षा बी. एन. कॉलेज ,पटना विश्वविद्यालय, पटना से प्राप्त किया था . बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्यारे मोहन सहाय का निधन 01 फरवरी सन 2010 ई. पटना में हो गया. वे कई नाट्य संस्थाओं से जुड़े रहे तथा स्वंय भी "पाटलिपुत्र कला मंदिर" एवं "लोकमंच" जैसे रंग संस्थाओं का निर्माण किया था . वे अपने जीवन के अंतिम समय तक उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र ,इलाहबाद का शासी निकाय का सदस्य रहे. उनके निधन के पश्चात् राजधानी स्थित भारतीय नृत्य कला मंदिर का नवनामकरण 'प्यारे मोहन सहाय नाट्य कला मंदिर' का प्रस्ताव कला ,संस्कृति एवं युवा विभाग ,बिहार सरकार के पास लंबित है.

रविराज पटेल, बिहार  के जिला लखीसराय के चानन क्षेत्राधीन पचाम नामक गाँव में जन्म. संगीत भास्कर की उपाधि प्राचीन कला केन्द्र ,चंडीगढ़ से प्राप्त। जीविका हेतु निजी व्यवसाय एवं एस .ए .ई. महाविद्यालय ,जमुई में एक प्राध्यापक के तौर पर संबद्ध,साथ ही स्वरूचि कारण राष्ट्रीय एवं स्थानीय पत्र -पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन । सामाजिक- राजनैतिक-सांस्कृतिक एवं साहित्य में खासी अभिरुचि । अक्षर दर्पण नामक ब्लॉग का संपादन. उनसे 9470402200 पर संपर्क किया जा सकता है.  यह लेख 'मैग्निफिसेंट न्यूज़ 'के फरवरी -2012 अंक में प्रकाशित है .

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

कहाँ मिलेगा अलखजी जैसा गुरु

अलखनंदन 
अलखनंदन जी के निधन से रंग जगत शोकाकुल है. उन्हें श्रधान्जली स्वरुप पंकज शुक्ला जी का यह नोट्स. उन्होने इस फेसबुक पर डाला था. हम मंडली के साथियों के लिए आभार सहित यहाँ प्रस्तुत कर रहें हैं. अगर आप भी कुछ लिखना चाहें तो मंडली पर आपका हार्दिक स्वागत है. आप अपने आलेख punjprak@gmail.com पर भेज सकतें हैं. हमें खुशी होगी आपके लिखे को दूसरे कलाप्रेमियों तक पहुंचाके.

अलखजी नहीं रहे...यह खबर एक बेहतर इंसान के जाने की सूचना ही नहीं है बल्कि संभावनाशील कलाकारों के लिए सफलता का एक द्वार बंद होने जाने की अनचाही घटना है। अलखजी के रूप में एक और 'गुरु" का चले जाना है जो सीखने के लिए शिष्य को पूरी स्वतंत्रता देता था। जो पल भर में शिष्य की पूरी क्षमताओं का आकलन कर लेता था और फिर उसे अभिव्यक्ति के आकाश पर सबसे ऊँचा उड़ने की आजादी दे देता था। 

अलखजी के व्यक्तित्व के अनगिनत पहलू हैं जिन पर बात की जानी चाहिए लेकिन उनका 'गुरु" पद ही इतना विराट है कि उसका 'खो जाना" समाज के लिए प्राणतत्व का मिट जाना है। वे सही मायनों में उस गुरु की तरह से थे जो बाहर से कठोर और भीतर से नर्म दिल होता है। खरी-खरी कहने वाला 'दबंग" गुरु। शिष्यों से पूछिए, वे बताएँगे कि अलखजी का गुरुरूप कितना विराट था-'दादा, तब तक अभ्यास करवाते थे जब तक कि अभिनय से संतुष्ट नहीं हो जाते... वे फटकारते थे और तब तक मेहनत करते जब तक कि मनचाहा काम पा न लेते... तारीफ भले कम मिले लेकिन अलखजी की डाँट जरूर मिल जाती थी...।" 

इसी रूप ने 'नट बुंदेले" खड़ा किया। संगीतकार ओमप्रकाश चौरसिया, इरफान सौरभ जैसे वरिष्ठ सर्जकों से लेकर उनके पुत्र अंशपायन और हेमंत देवलेकर जैसे नवागत कलाकारों ने अलखजी में कोई एक बात समान पाई तो वो थी शिष्यों को खुलापन देने वाला रूप। पं. चौरसिया ने अलखजी के साथ तब काम किया था जब अलखजी भोपाल आए थे यानि 1983-86 के दौरान। इसी दौरान इरफान सौरभ भी जुड़े जो कारंतजी के बाद 'महानिर्वाण" का चर्चित पात्र 'भाऊराव" के लिए अलखजी की पहली पसंद बन गए थे। दोनों बताते हैं कि अलखजी ने कभी हमारे काम में दखल नहीं दिया। वे इतनी आजादी देते थे कि आप कम से समझौता नहीं कर पाते और यादगार सृजन हो जाता। नए कलाकारों ने उनके संग पिछले नवंबर में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को मंचित किया था। वे अलखजी की शिक्षा कभी भूल नहीं पाएँगे।  नए और पुराने की साझेदारी के हिमायती अलखजी ने भोपाल में तीन दशकों की यात्रा में कई पड़ाव रचे हैं। शिष्यों के रूप में खड़े किए गए उनके 'माइलस्टोन" उनकी इस यात्रा की गवाही देते रहेंगे। 'नट बुंदेले" के जरिए रंग जगत में लोक संस्कृति को स्पंदन करने वाला 'कबीरा" अपने 'महानिर्वाण" के बाद बहुत याद आएगा...।
वकौल अलखजी - रंगमंच की पहली शर्त है - नयापन, निरंतर प्रयोगशीलता और परम्परा बोध. जिस वर्तमान रंगमंच को परम्परा बोध नहीं वह नश्वर तथा खोखला प्रयास है.और जिस परम्परा को वर्तमान की अनियमिततायों से दो चार होना नहीं पता है, वह रूढ़िवादी है.

रविवार, 22 जनवरी 2012

"People keep writing nice things about me, and no one reacts.” Satyadev Dubey


Satyadev Dube 
Till his last days he remained passionate about theatre. Rishi Majumder remembers a true theatrewala, Pandit Satyadev Dubey
For my first interview of Pandit Satyadev Dubey, in May 2006, I had a word count of 500. “So you want to chop off my arms and legs and squeeze me into a box,” he said, with an acerbic grin. That's what I did then. It's what I will do now.
A quote from the interview was used, out of context, for a sensational headline: “I want to do a play about sex.” I expected Dubey to be annoyed, but he seemed delighted. “Now I want you to write an article whose headline says: This man has gone mad,” he said to me, very seriously, at Prithvi Café, Juhu, Mumbai.
Prithvi Theatre, which the café belongs to, has staged all of Dubey's plays and practically been his second home. Born in 1936 in Bilaspur, Madhya Pradesh, Dubey came to Bombay to be a cricketer.Dubey joined Ebrahim Alkazi's theatre unit, staging his first play in 1962, and went on to head it. Over almost half a century of devotion to theatre, and well over a hundred plays, he directed some of the country's most brilliant and groundbreaking productions. Productions like Girish Karnad's “Yayati” and “Hayavadana”, Badal Sircar's “Evam Indrajit” and “Pagla Ghoda”, Chandrasekhar Kambar's “Aur Tota Bola”, Mohan Rakesh's “Aadhe Adhure”, and Vijay Tendulkar's “Khamosh! Adalat Jaari Hai”. He was singlehandedly responsible for taking many plays, written in regional languages, to a pan-Indian audience. Playwright Mahesh Elkunchwar had said that without Dubey he would be “a theatreperson known to Maharashtra only”.
Effective manager
In a way, he was Indian theatre's most effective human resource manager. Had Dubey not spotted the potential in Dharamvir Bharati's radio play, “Andha Yug”, and sent it across to Alkazi at the National School of Drama, it would never have been staged. He connected isolated experimental theatre groups from across the country, sometimes through his workshops — most of which were conducted free of charge.
I tried to enrol at one of his workshops once. I was given a Hindi monologue to memorise which began with “ Aaj Desh Ka Har Naujavaan Actor Banna Chahta Hai …” (Today every youngster in this country wants to become an actor), written by Dubey himself. I didn't end up memorising it — a great regret.
His workshops churned out some of our most prominent theatrewallahs : Amrish Puri, Amol Palekar, Sunila Pradhan and Chetan Datar, to name a few. And Jaimini Pathak, whose theatre troupe I joined. There were moments, while working with Jaimini, when I was reminded of all I'd heard about Dubey's acting methods. There was the exercise of holding a pencil between your teeth while mouthing dialogues to improve diction, something Dubey had first done when he was 18 to correct his lisp. Speech was paramount. The farthest member of the audience should be able to hear you clearly. This was something that must have served Jaimini well when he was performing a one-man play before hundreds of villagers in rural Gujarat. Emphasising certain words in a sentence may communicate one meaning, while emphasising others may communicate another. This made the actor as much of an auteur as the playwright or the director.
But I really regret not having trained under Dubey because I want to be a part of the stories around him. Like the one about him making women in his workshops who came from conservative families scream the filthiest abuses out loud — so they would lose their inhibitions.
Or the one about when he stood for the Lok Sabha elections as an independent, because you can't “just stand and watch”, even though he probably knew he'd lose his deposit (Dubey used to be an RSS man but he denounced the Sangh after Godhra). His students drafted a manifesto which expressly said to people “don't vote for him”, as a gimmick.
Worth of trophies
Or this story. His students were helping him clean out his house when they found in the rubble a Sangeet Natak Akademi Award, a Filmfare Award and a National Film Award (Dubey wrote most of Shyam Benegal's films, and directed “Shantata Adaalat Chalu Aahe”). The story goes that Dubey then ordered them to try and sell the trophies at the nearest scrap dealer's.
When I interviewed Dubey again, it was for an article without a word count. I was accompanying playwright Ramu Ramanathan who was the editor of a theatre journal whose full issue this interview was to take up. We sat across Dubey in his drawing room, at his home in Mumbai's Kalanagar, that was bare except for a floor mat and a script he was working on. I didn't know whether that scrap dealer eventually bought those trophies, but they would have looked very out of place there. The interview comprised provocative questions posed to Dubey by his contemporaries, also theatre legends, like playwrights Mahesh Elkunchwar, Satish Alekar, and Vijay Tendulkar.
The interview has been lost. All that remains of it are a few fragments I found on my email. Here's a particularly provocative question from Tendulkar, crucial because it touches on something that was integral to Dubey's theatre and his life:
Tendulkar: “Instead of distorting the existing why don't you create instead? You do sometimes create but it is distorted. Way out?”
Dubey: “Keep distorting honestly.”
On being prodded further: “Distortion perhaps is written into my psyche… That is my way of looking at things… (it's) necessary. The reason why so many of Tendulkar's plays have failed is because they were not distorted. He was such a fine writer, that it becomes the playwright's theatre. But Tendulkar's plays are better read… Besides, I react. I don't distort. I remove distortion to give things a sense of proportion. The point is that as soon as you're perceiving, you're distorting reality.”
Evoking reaction
When I asked Dubey why he wanted me to write an article on him headlined “This man has gone mad”, he replied: “Because people will read it. They will react to it. They will want to see theatre. People keep writing nice things about me, and no one reacts.”
Tendulkar passed away a few years after this interview.
I last met Pandit Satyadev Dubey soon after Tendulkar's demise, as I was walking out of Prithvi Theatre with theatre critic Pragya Tiwari. He was very unwell then, but didn't let it show. He kept directing plays, though they didn't seem to win him even a fraction of the acclaim he had seen. He spent most of his time at the café, dressed in a pair of jeans and tee shirt, talking about religion, politics, cinema or about how inflation was pumping up the price of a box of matches — as belligerently as he did before.
He asked us to join him for a drink at Holiday Inn nearby and we refused. We got into a conversation about the ‘golden era' of Indian theatre, when Indian experimental theatre was being born. “I used to tell them I'll be the greatest theatre person around, and they didn't believe me,” he said. “Now look. They're all dead.”
"People keep writing nice things about me, and no one reacts.”
आलेख द हिंदू से साभार 

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

पूरबी के बेताज बादशाह : महेंदर मिसिर

महेन्द्र मिसिर 
कुमार नरेन्द्र सिंह

उस दिन महेन्दर मिसिर अपने एक दोस्त के साथ कलकत्ता (कोलकाता) की मशहूर तवायफ सोना बाई के कोठे पर पहुंचे थे मुजरा सुनने। दोस्त ने बताया था कि एक बार जो सोनाबाई का गाना सुन लेगा उसे जीवन भर किसी दूसरे का गाना अच्छा नहीं लगेगा। दोस्त के मुंह से सोनाबाई के गायन की शोहरत सुनने के बाद महेन्दर मिसिर के लिए रुक पाना कहां संभव था। लड़कपन में लगा संगीत का चस्का अब कलावंत बनकर जवान हो चुका था। महेन्दर मिसिर का दोस्त सोनाबाई से परिचित था। जब सोनाबाई ने पूछा कि साथ में यह व्यक्ति कौन है तो उसने बताया कि वह मेरे दोस्त हैं और आपकी शोहरत सुनकर आपकी महफिल में आए हैं। बातों-बातों में दोस्त ने यह भी बताया कि महेन्दर मिसिर स्वयं भी सुर के रसिया हैं और गाते-बजाते भी हैं। फिर क्या था – साजिंदे आ गए और लग गई गीतों की महफिल। सोनाबाई ने अपने साजिंदों को संकेत दिया….वे हरकत में आ गए और सोनाबाई के कंठ से स्वर लहरी फूट उठी। गाने के बोल थे – 

माया के नगरिया में लागल बा बजरिया
ए सुहागिन सुन हो।

चीजवा बिकेला अनमोल
ए सुहागिन सुन हो।

महेन्दर मिसिर भाव-विभोर होकर सुनते रहे। गाना समाप्त होने के बाद जब सोनाबाई ने उनसे पूछा कि गाना कैसा लगा तो महेन्दर मिसिर ने कहा – आपका आलाप लाजवाब है और आवाज जादुई…आवाज में ऐसी कशिश मैंने कहीं औऱ नहीं देखी है लेकिन स्वर के उतार-चढ़ाव और भावों की अदायगी में वह रवानगी नहीं थी, जो इस गाने में होनी चाहिए थी। महेन्दर मिसिर की यह बात सुनते ही जैसे सोनाबाई के तन-बदन में आग लग गई। उसने हिकारत की नजर से महेन्दर मिसिर को देखा और व्यंग्य वाण छोड़ते हुए कहा – मिसिर जी, गलती निकालना तो आसान होता है…जरा आप ही गा कर बताइए न कि गाने में चुक कहां हुई। पहले तो मेहन्दर मिसिर ने ना-नुकुर की लेकिन जब सोनाबाई ने यह कह दिया कि अपने तो गाने आता नहीं और चले हैं सोनाबाई के सुर में दाग दिखाने, तो महेन्दर मिसिर ने सोनाबाई के साजिंदों को बजाने का इशारा किया और स्वयं तानपुरा लेकर बैठ गए। सुर संधान कर जब उन्होंने गाना शुरू किया तो सोनाबाई को ऐसा लगा जैसे महेन्दर मिसिर नहीं बल्कि स्वयं गंधर्वराज चित्ररथ गा रहे हों। वह सुध-बुध बिसरा कर गीत सुनने लगी…ऐसे जैसे किसी ने उस पर सम्मोहन मंत्र डाल दिया हो। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई इतना अच्छा गा सकता है। जब गाना खत्म हुआ तो सोनाबाई ने महेन्दर मिसिर के पांव पकड़ लिए और अपनी गलती के लिए बार-बार माफी मांगने लगी। मिसिर जी ने उसे माफ कर दिया और बातों-बातों में यह भी बता दिया कि जो गीत वह गा रही थी, वह उन्हीं का लिखा हुआ है। सोनाबाई ने कहा कि वह उनकी शिष्या बना लें तो उसका जीवन सार्थक हो जाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि महेन्दर मिसिर ने उसकी यह इच्छा की। वह महीनों सोनाबाई के साथ रहे और अपनी रागिनी से उसके अंतर का क्लेश दूर करते रहे।

महेन्दर मिसिर अद्भुत प्रतिभा के धनी तो थे ही, उनका व्यक्तित्व भी बहुआयामी था। पहलवानी की बदौलत गठा हुआ कसरती वदन, सिल्क का कुर्ता, परमसुख धोती, गले में सोने का चमचमाता हार और मुंह में पान गी गिलौरी – जो देखता, देखता ही रह जाता। कद-काठी और सुदर्शन रूप ऐसा कि हजारों की भीड़ में दूर से ही नजर आ जाते थे। जैसी सुंदर काया, उतनी ही सुरीली आवाज और ऊपर से मर्दानी ठसक गजब की। गीत-संगीत के रसिया और मर्मज्ञ महेन्दर मिसिर आशु कवि थे। सरस्वती के वरद पुत्र महेन्दर मिसिर के कंठ से जब गीत के बोल फूटते थे तो कहते हैं कि सड़क जाम हो जाती थी। उनकी खास विशेषता यह थी कि वह सिर्फ अपने लिखे गीत ही गाते थे। उनके गीतों की मिठास आज भी ज्यों की त्यों है। उनके गीत सुनकर कौन न भाव-विभोर हो जाए। स्वर का उस्ताद तो वह थे ही, वादन कला में भी वह उतने ही प्रवीण थे। कहते हैं कि शायद ही कोई ऐसा वाद्य हो, जिसमें वह सिद्धहस्त नहीं थे। हारमोनियम हो या तबला, सितार हो या सारंगी, उनकी उंगलियों के करतब देखकर लोग दंग रह जाते थे। ढोलक, झाल, मजीरा के तो वह बेमिसाल फनकार थे ही, कभी-कभी बांसुरी की मधुर तान के साथ गोपी प्रसंग के गीतों पर जब आलाप लेते थे तो लगता था जैसे फिजां में विरह रस घुल रहा हो।

छपरा से 12 किलोमीटर दूर काहीं मिश्रवलिया गांव में 16 मार्च,1887 को पैदा हुए महेन्दर मिसिर मां-बाप के अतिशय दुलार के कारण बचपन से ही बिगड़ैल और मनशोख थे। पढ़ने-लिखने में उनका मन बिलकुल नहीं लगता था। लड़कपन से ही उनकी मन गीत-गवनई, नाच-नौटंकी में रमने लगा था। उनके पिता शिवशंकर मिश्र छपरा के एक छोटे-मोटे जागीरदार थे और वहीं के एक बड़े जमींदार हलवंत सहाय से उनकी खूब पटती थी। सरकारी कामकाज के चलते सहाय जी के यहां उनका आना-जाना लगा रहता था। कभी-कभी वह महेन्दर मिसिर भी अपने पिता के साथ वहां आते-जाते थे। सहाय जी को गीत-गवनई से बड़ा अनुराग था। उनके दरबार में कलावंतों की बड़ी इज्जत थी। इसी आने-जाने के दौरान हलवंत सहाय की पारखी नजरों ने मिसिर जी के अंदर के कलाकार को पहचान लिया और अपने दरबार में उन्हें आश्रय दे दिया। हलवंत सहाय का साथ पाकर महेन्दर मिसिर की गायकी परवान चढ़ने लगी….उनके गीतों के बोल जन-जन तक पहुंचने लगे।

हलवंत सहाय विधुर थे और संतान विहीन भी। उनकी पत्नी असमय ही उन्हें छोड़कर स्वर्ग सिधार गई थीं। एकाकी जीवन जी रहे सहाय जी का अधिकांश समय नृत्य-गीत क महफिल सजाने में ही कटता था। रईसी ठाठ-बाट के सात नाच-गान का आयोजन उनके दरबार की खासियत थी। दरबार का आश्रय पाकर महेन्दर मिसिर की गायकी फूलने-फलने लगी और उसकी सुगंध चहुंदिशी पसरने लगी। कलाकार और कला मर्मज्ञ साथ हों दोस्ती क्योंकर न होती। अब सहाय जी का घर ही मिसिर जी का घर था और सहाय जी थे उनके परम सखा। सहाय जी उस समय की सबसे मशहुर तवायफ मुजफ्फरपुर की ढेलाबाई के प्रेम में गिरफ्तार थे। वह किसी भी कीमत पर ढेलाबाई को पाना चाहते थे। उन्होंने यह बात अपने परम सखा महेन्दर मिसिर को बताई। थोड़े दिन के बाद पता चला कि ढेलाबाई का अपहरण हो गया। बताया जाता है कि ढेलाबाई के अपहरण में महेन्दर मिसिर का भी हाथा था। अपने दोस्त का मान रखने के लिए ही मिसिर जी ने ढेलाबाई का अपहरण करवाया और उसे हलवंत सहाय के हुजूर में डाल दिया। ढेलाबाई को पा कर हलवंत सहाय ने सबकुछ पा लिया। हलवंत सहाय ने ढेलाबाई को अपने दिल के साथ-साथ अपनी जायदाद की मालकिन भी बना डाला। सहाय जी ने अपनी सारी जायदाद ढेलाबाई के नाम कर दी। ढेलाबाई ने भी धीरे-धीरे नाचना,गाना छोड़ दिया क्योंकि यह हलवंत सहाय की प्रतिष्ठा के खिलाफ था।

समय ने एक बार फिर करवट ली। हलवंत सहाय अचानक गायब हो गए। कोई नहीं जान सका कि वह कहीं चले गए या उनकी मृत्यु हो गई। बहरहाल, सहाय जी के नहीं रहने पर अब ढेलाबाई की देखभाल की जिम्मेदारी महेन्दर मिसिर के सिर पर आ गई। सहाय जी गायब होने के बाद उनके पट्टीदारों ने ढेलाबाई की कोठी पर धावा बोल दिया। इसी अवसर पर महेन्दर मिसिर का रौद्र रूप सामने आया। वह अपनी टोली के सदस्यों के साथ स्वयं लाठी लेकर ढेलाबाई के विरोधियों पर पिल पड़े और उन्हें मार भगाया। अब महेन्दर मिसिर ढेलाबाई के रक्षक बन चुके थे। इन सब कारणों से ढेलाबाई के मन में भी महेन्दर मिसिर के लिए प्रीत फूटने लगी। हलवंत सहाय के सानिध्य में ढेलाबाई ने नाचना-गाना बिसार दिया था…पैरों के घुंघरू खोलकर रख दिए थे। लेकिन एक दिन ढेलाबाई ने फिर से घुंघरू बांध लिए। हुआ यह कि एक रात महेन्दर मिसिर ढेलाबाई की कोठी में बने शिव मंदिर में स्वर साधना कर रहे थे। उनके गीत के बोल चांदनी रात में मोती की तरह बिखर रहे थे। उन्हीं मोतियों को अपने आंचल में बटोरकर ढेलाबाई ने अपने पांवों में फिर से घुंघरू बांध लिए औ नाचने लगी। संगीत और नृत्य का यह सहगमन काफी देर तक चलता रहा और तब तक चलता रहा, जब तक ढेलाबाई थककर चूर नहीं हो गई। उस रात के बाद महेन्दर मिसिर औऱ ढेलाबाई की जिंदगी ही बदल गई। समय के रथ पर सवार दोनों की जिंदगी बीतने लगी। परंतु यह तो बाद की बात है। इससे पहले और कुछ भी हुआ था।

कलकत्ता में रहते हुए महेन्दर मिसिर का संपर्क वहां के कतिपय क्रांतिकारियों से हुआ और उनके मन में स्वतंत्रता की आग जलने लगी। छपरा में ही रहते हुए एक दिन उनकी मुलाकात मुक्तानंद जी से हूई जो एक क्रांतिकारी संगठन के सदस्य थे। वह कलकत्ता से महेन्दर मिसिर के लिए एक संदेश लेकर आए थे जिसमें कहा गया था कि वह बनारस जाकर अभयानंद जी से मुलाकात करें। महेन्दर मिसिर बनारस पहुंच गए। वह गए तो थे सिर्फ अभयानंद जी से भेंट करने लेकिन एक बार वहां पहुंचे तो तीन महीने वहीं रह गए। वहां रहते हुए उनके गीतों की जबर्दस्त धूम मची, कचौड़ी गली के कोठे गुलजार हो उठे। रसिक जन महेन्दर मिसिर के गीतों के दीवाने हो उठे। इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात केसरबाई और विद्याधरीबाई जैसी मशहूर नर्तिकयों से हुई। केसरबाई ने तो मिसिर जी से बाकायदा पूर्वी ठाठ का संगीत सीखा। मिसिर जी का साथ पाकर केसरबाई शोहरत की बुलंदी पर पहुंच गईं और वनजूही की खुशबू की तरह उनकी मदमाती आवाज फिजां में घुलने लगी। महेन्दर मिसिर के जीवन में यहां एक और मोड़ भी आया…अब वह कबीरदास और रैदास से प्रभावित होकर निर्गुण के भाव में गोते लगाने लगे। उस समय के उनके रचे गीत रहस्य और अध्यात्म के भाव से भरे हैं। उपरोक्त गीत …माया के नगरिया में…..उसी निर्गुण की उपासना करता प्रतीत होता है।

यूं तो महेन्दर मिसिर के जीवन में कई मोड़ आए लेकिन बनारस में रहते हुए उनके जीवन में अब एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनकी जिंदगी की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। यहीं पर उनका आंग्रेज विरोध परवान चढ़ता है और वह देश में अंग्रेजी हुकूमत खासकर उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देने के लिए उद्यत हो उठे। अभयानंद के सहयोग से उन्हें नोट(रुपया) छापने की एक मशीन मिल गई। मशीन लेकर मिसिर जी छपरा आ गए और योजनाबद्ध तरीके से नोट छापने और उसे बाजार में चलाने का काम करने लगे। इसमें कोई शक नहीं कि महेन्दर मिसिर ने जाली नोटों से अपने लिए सुख-सुविधा जुटाए और तवायफों पर भी खूब पैसे लुटाए नोट छापने के धंधे के पीछे वास्तविक उद्देश्य था आजादी की लड़ाई लड़ने वालों तथा उनके परिजनों को आर्थिक सहायता पहुंचाना और मिसिर जी ने इस उद्देश्य से कभी समझौता नहीं किया। बांगाल समेत देश के अन्य हिस्सों में काम करने वाले क्रांतिकारियों की खूब मदद की। कोई भी दीन-दुखी उनके दरवाजे से खाली हाथ वापस नहीं लौटता था। परेशानहाल लोगों की मदद के लिए उनकी झोली हमेशा खुली रहती थी।

महेन्दर मिसिर की शाहखर्ची के किस्से अब मशहूर होने लगे थे। हुक्मरानों को पहली बार संदेह तब हुआ, जब 1905 में सोनपुर के मेले में ज्यादा तवायफों के तंबू मिसिर जी की तरफ से लगवाए गए थे। इस मामले में मिसिर जी ने देश के बड़े-बड़े जमींदारों को भी पीछे छोड़ दिया था। बस क्या था….पुलिस उनके पीछे लग गई। जांच करने और सबूत इकट्ठा करने की जिम्मेदारी सीआईडी इंस्पेक्टर सुरेंद्रनाथ घोष और जटाधारी प्रसाद को मिली। सुरेंद्रनाथ घोष किसी तरह मिसिर जी का नौकर बनने में कामयाब हो गया और गोपीचंद के रूप में साईस बनकर उनके घोड़े की देखभाल करने लगा। मालूम हो कि मिसिर जी अपने जमाने के माने हुए घुड़सवार थे। कहते हैं, उस समय पूरा छपरा जिला में उके जैसा दूसरा घुड़सवार नहीं था। जब वह घुड़सवारी पर निकलते थे तो उन्हें देखने के लिए राहों में लोगों की भीड़ लग जाती थी। बहरहाल, धीरे-धीरे गोपीचंद उनके नोट छापने का राज जान गया। उसी के इशारे पर उनके यहां पुलिस का छापा पड़ा। 16 अप्रैल, 1924 को उनके चारों भाइयों समेत महेन्दर मिसिर को गिरफ्तार कर लिया गया। पटना उच्च न्यायालय में लगातार तीन महीने तक मामले की सुनवाई चलती रही। मिसिर जी के वकील थे …क्रांतिकारी हेमचंद्र मिश्र औऱ प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास लेकिन कुछ काम न आया और मिसिर जी मुकदमा हार गए औऱ उन्हें 10 की सजा मुकर्रर की गई। उन्हें बक्सर केंद्रीय जेल में बंद कर दिया गया लेकिन अच्छा व्यवहार औऱ लोकप्रियता के चलते तीन साल में ही उनकी रिहाई हो गई। कहते हैं, जब वे जेल में बंद थे तो देश भर की 5000 तवायफों ने वायसराय को ब्लैंक चेक के साथ एक पत्र भेजा था जिसमें गुजारिश की गई थी कि सरकार उस पर कोई भी रकम लिख सकती है, हम तवायफें अदा करेंगी, लेकिन महेन्दर मिसिर को आजाद कर दिया जाए। यह घटना इस बात की सबूत है कि तवायफों के मन में उनके लिए कितनी इज्जत थी। बक्सर जेल में रहते हुए ही उन्होंने सात खंडों में अपूर्व रामायण की रचना कर डाली थी। जेल प्रवास के दौरान हुई इस घटना की अनुगूंज आज भी जनश्रुतियों में सुनी जा सकती है। एक जनश्रुति के अनुसार बक्सर जेल की निशब्द रातो में जब वह अपना यह विरह गीत की तान लेते थे तो जेलर की पत्नी उसे सुनकर भाव-विह्वल होकर उनके गीत का रसस्वादन करने जेल में पहुंच जाती थी…..आखिर गीत भी तो ऐसा ही है ………. 

आधी-आधी रतिया के कुहुके कोइलिया
राम बैरनिया भइले ना।
मोरा अंखिया के निंदिया….
राम बैरनियां भइले ना।
कुहुकि-कुहुकि के कुहके कोइलिया
राम अगिनिया धधके ना।
मोरा छतिया के बीचवा
राम अगिनिया धधके ना।

महेन्द्र मिसिर को जेल से छुड़ाने के लिए ढेलाबाई ने अपना सबकुछ दांव पर लगा डाला और उन्हें बचाकर घर ले आई। महेन्दर मिसिर ने अपने जीवन का अंतिम क्षण ढेलाबाई की कोठी में स्थित शिव मंदिर में ही गुजारा और वहीं अंतिम सांसें लीं। उस समय उनकी उम्र 62 साल की थी और वह मनहूस दिन था … 26 अक्टूबर, 1946।

आजादी की लड़ाई के इतिहास में महेन्दर मिसिर को भले ही वह जगह न मिली हो, जिसके वह हकदार हैं लेकिन उनके गीतों ने उनकी शख्सियत को हमेशा ऊंचा उठाए रखा। अंग्रेजों के प्रति अपने विद्वेष को व्यक्त करते हुए वह गीत रचते हैं ……

हमरा निको ना लागे गोरन के करनी
रुपया ले गइले, पइसा ले गइले
अउरी ले गइले सब गिन्नी।
बदला में देके गइले ढल्ली के दुअन्नी
हमरा नीको ना लागे गोरन के करनी।

राग-रागिनी उनकी जिंदगी थी…वह उसे जीते थे…और आज वही उनकी थाती है, जो जन-जन के मन कंठ में सुरक्षित है। पुरुबी राग उनकी स्वर लहरी में हिलोरें लेता है। उनके गीतों में जहां पहाड़ी नदी के वेग की तरल तीव्रता है, वहीं झिर..झिर बहती शीतल मंद बयार का सुखद स्पर्श भी है। भाषा की सहजता औऱ भाव की गहराई उनके गीतों की असली पहचान हैं। बोल और भाव की मिश्री में पगे उनके गीत किसी का भी अंतर्मन को छूने, सहलाने की स्वाभाविक काबिलियत रखते हैं। विरही नायिका की विकलता और उसकी सास की निष्ठुरता का क्या ही मर्मस्पर्शी बयान इन पंक्तियों में मिलता है ………..

सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउकिया,
ए ननदिया मोरी है सुसुकत पनिया के जाए।
गंगा रे जमुनवां के चिकनी डगरिया
ए ननदिया मोरी हे पउंवां धरत बिछलाय।
गावत महेन्दर मिसिर इहो रे पुरुबिया
ए ननदिया मोरी हे पिया बिना रहलो ना जाए।

लोक कंठ के गवैया महेन्दर मिसिर के गीतों में श्रृंगार और अध्यात्म दोनों ही प्रधानता से मिलते हैं और कमाल की बात यह है कि वह दोनों में ही पारंगत हैं। इतना जरूर है कि उनके गीतों में श्रृंगार और विरह की अभिव्यक्ति ज्यादा मुखर है। विरह विदग्ध नायिका के चित्रण में उनका यह गीत कितना भावमय हो उठता है…एक बानगी देखिए……

अंगुरी में डंसले बिया नगिनियां हे
ननदी दियरा जरा द।
दियरा जरा द अपना भइया के जगा द
पोरे-पोरे उठेला दरदिया हे
ननदी दियरा जरा द।

लोक धुन में पगे उनके गीत जब अपनी अर्थ छटा बिखेरते हैं तो सुनने वाला सुनते ही रह जाता है। गोपी विरह के प्रसंग में मिसिर जी के शब्द विन्यास से गीत के बोल कितने भावप्रवण हो उठे हैं, इसका एक उदाहरण देखिए….

सुतल सेजरिया सखी देखली सपनवां
निर्मोही कान्हा बंसिया बजावेला हो लाल।
कहत महेन्दर श्याम भइले निरमोहिया से
नेहिया लगा के दागा कइले हो लाल।

विरह की आंच में तपे महेन्दर मिसिर के गीत श्रोता के हृदय को ऐसे बेधते हैं कि मन बेकल हो उठता है।

संगीत साधक और पुरबी के पुरोधा महेन्दर मिसिर का रचना संसार व्यापक है, जिसमें भाषा की लचक औऱ रवानी तथा राग-रंजित रागिनी का अपूर्व संगम देखने को मिलता है। उन्होंने सैकड़ों गीत और दर्जन भर से ज्यादा पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनके तीन नाटक भी शामिल हैं। अन्य पुस्तकों में महेन्दर मंजरी, महेन्दर विनोद, महेन्दर मयंक, भीष्म प्रतिज्ञा, कृष्ण गीतावली, महेन्दर प्रभाकर, महेन्दर रत्नावली, महेन्दर चंद्रिका और महेन्दर कवितावली प्रसिद्ध है। उनके चुनिंदा गीतों का संग्रह कविवर महेन्दर मिसिर का गीत संसार शीर्षक से डॉ. सुरेश कुमार मिश्र के संपादन में अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद, लखनऊ से सन् 2002 में प्रकाशित हुआ लेकिन वह पूर्ण नहीं है। उनके सैकड़ों गीत आज भी संग्रह की प्रतिक्षा में हैं। महेन्दर मिसिर को लेकर कई पुस्तकें भी लिखी गई हैं, जिनमें पांडे कपिल की फुलसूंघी, रामानाथ पांडे की महेन्दर मिसिर और रविन्द्र भारती की कंपनी उस्ताद उल्लेखनीय है। उनके गीत लोक जीवन के दस्तावेज हैं, लोक साहित्य के अनमोल धरोहर हैं।

आलेख - समरथ , सितम्बर - अक्टूबर २०११ अंक से साभार.

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

रंगमंच का द्रोण व दुर्वासा

बिलासपुर में जन्मे पंडित सत्यदेव दुबे का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने विगत पचास वर्षो में लगभग 100 नाटकों का निर्देशन किया। दर्जन भर फिल्म पटकथाएं लिखीं और दो दर्जन विदेशी नाटकों का अनुवाद किया। उन्होंने दिल्ली मे अल्काजी के मार्गदर्शन में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में रंगमंच विधा का अध्ययन किया और पूरे देश में एनएसडी का अर्थ नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा रहा, परंतु अपने अथक प्रयास से उन्होंने मुंबई में इतने रंगकर्मी तैयार किए कि पृथ्वी थिएटर की संचालक संजना कपूर कहती थीं नेशनल स्कूल ऑफ दुबे’।


सत्यदेव दुबे ने नाटक को आडंबर और शान-शौकत से आजाद करके सरल व स्वाभाविक बनाया तथा युवा रंगमंच प्रेमियों को सिखाया कि मंचन के लिए अधिक धन नहीं, वरन हृदय में माध्यम के लिए प्रेम चाहिए। सत्यदेव दुबे को मंचन के लिए केवल दो चीजों की आवश्यकता होती थी, मंच और नाटक। इसी मार्ग को खोजने के कारण दुबेजी ने मध्यम वर्ग को अपने सीमित साधनों के बावजूद नाटकों में सक्रिय किया।


सत्यदेव दुबे रंगमंच के संसार में अपनी आक्रोश की मुद्रा के लिए जाने जाते थे, क्योंकि वे सड़क और बस्ती में बोली जाने वाली रंगीन भाषा का इस्तेमाल करते थे और उनके मुंह से गालियां गजल की तरह लगती थीं। उनकी कार्यशैली अजीब-सी थी। वे कलाकारों को केवल रिहर्सल के समय ही निर्देश नहीं देते थे, वरन् उनके रोजमर्रा के जीवन में भूमिका को धकेल देते थे। चित्रा पालेकर मध्यम वर्ग की अनुभवहीन कलाकार थीं और दुबेजी ने ययाति में उन्हें राजकुमारी की भूमिका के लिए तैयार किया। एक दिन कॉलेज के गेट पर सत्यदेव दुबे चित्रा का इंतजार कर रहे थे।


दुबेजी ने चित्रा को बाध्य किया कि वह राजकुमारी की तरह सिर उठाकर पूरी अकड़ के साथ चलें। रास्ते भर दुबेजी साथ रहे और उन्हें समझाते रहे कि भूमिका को कैसे अंतस में उतारें। सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की पहली आठ फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे तथा पुरस्कृत भी हुए, परंतु बाद में अकारण ही काम करने से इनकार कर दिया। दरअसल सत्यदेव दुबे निहायत ही मूडी व्यक्ति थे और उन्होंने अपनी जीवन शैली, विचार प्रक्रिया और भाषा में कभी आडंबर और खोखलापन नहीं आने दिया। उनके अनेक शागिर्द उनकी असंयत भाषा और कठोर अनुशासन से नाराज हो जाते थे, परंतु बाद में महसूस करते थे कि उनके गुरु ने उनको कैसे लाभ पहुंचाया। 


अपनी शिष्याओं और युवा तकनीशियन के साथ वे प्राय: रोमांटिक छेड़छाड़ करते थे, क्योंकि वे उन्हें अपनी केंचुल से बाहर निकालना चाहते थे। कलाकार को उसकी समाज द्वारा लादी हुई हिचक से मुक्त करते थे। इसीलिए उनके कई शिष्यों ने जीवन के सांड को सींग से पकड़कर जीना सीखा था। सत्यदेव दुबे के लिए पूरा विश्व ही रंगमंच था और जीवन के प्रत्येक क्षण में वे नाटक देखते और महसूस करते थे। अपने नाम के अनुरूप हमेशा सत्य बोलते थे, परंतु देव की तरह नहीं, मानव की तरह।


पृथ्वी थिएटर के भीतर कोई नाटक मंचित होने वाला है और पृथ्वी कैफे में सत्यदेव दुबे बैठे हैं तो कई दर्शक उनको सुनते रहते और नाटक देखना भूल जाते थे। वे अकेले ही विभिन्न पात्रों के संवाद बोलकर वन मैन शो रोज ही प्रस्तुत करते थे। कुछ वर्ष पूर्व मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि शीघ्र ही वे एक फिल्म बनाने वाले हैं और मुझे उसका वितरण प्रदर्शन करना है। उन दिनों वे पटकथा पर काम कर रहे थे - नाम था राम नाम सत्य।


सत्यदेव दुबे ने सितंबर में बीमार पड़ने के पहले अपने शिष्यों और मित्रों से कहा कि उनकी मृत्यु के पश्चात रोना-धोना नहीं है, इस पटाक्षेप से नाटक (जीवन) खत्म नहीं होता। उनकी मृत्यु के बाद उनके इस आदेश का पालन कोई नहीं कर सका, क्योंकि सबको आशा थी कि नाटकों का यह दुर्वासा क्रोधवश मृत्युशैया से उठकर सबको डांटने लगेगा। पहली बार उन्होंने निराश किया।


आलेख दैनिक भास्कर से साभार .

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

रंगमंच को आकार देकर विदा हुए सत्यदेव दुबे


प्रख्यात रंगकर्मी सत्यदेव दुबे ने लम्बी बीमारी के बाद रविवार (25 दिसम्बर ) की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 75 वर्ष के थे।

सत्यदेव की दिली ख्वाहिश एक अच्छा क्रिकेटर बनने की थी, लेकिन वह नाटककार बन गए। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 1936 में जन्मे दुबे क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सपना दिल में संजोए मुंबई आ गए थे। लेकिन भारतीय रंगमंच के पितामह इब्राहीम अल्काजी के संपर्क में आने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई। बिलासपुर के छितानी मितानी दुबे परिवार का नाम प्रमुख दानदाता परिवारों में आज भी लिया जाता है। पंडित छितानी प्रसाद दुबे के 6 पुत्र थे। सबसे बड़े पुत्र गया प्रसाद दुबे के दो पुत्र हुए बड़ा पुत्र कोटेश्वर दुबे और छोटे पुत्र का नाम सत्यदेव दुबे था। सत्यदेव की प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर में हुई उसके बाद वे सागर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए किया। वे गोल्ड मेडिलिस्ट छात्र रहे। वहां से लौटकर श्री दुबे कुछ समय तक एसबीआर कालेज में प्राध्यापक भी रहे।

सत्यदेव दुबे विगत 50 वर्षों से मुंबई में रंगमंच के विभिन्न विधाओं से जुड़े रहे। उनकी पहचान रंगमंच को भारतीय स्वरूप देने में रही। उन्होंने भारतीय रंगमंच में उपनिवेशवादी तत्व को बाहर निकालने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस बात को लेकर वे विवादास्पद भी रहे और दृढ़ भी। उन्होंने धर्मवीर भारती द्वारा लिखित नाटक अंधायुग का 1962 में मंचन किया। हिन्दी और मराठी साहित्यकारों के नाटको को उन्होंने देश में स्थापित किया। गौरतलब है कि आजादी के बाद भारत में अंग्रेजी रंगमंच का बोलबाला था। श्री दुबे अंग्रेजीयन से निकलकर हिन्दुस्तानी शैली में नाटको का मंचन प्रारंभ किया।

स्व. सत्यदेव दुबे में नाटक के प्रति समर्पण, रचनात्मकता और जबा  देखते बनता था। उन्होंने गिरीश कर्नाड के पहले नाटक ययाति और हयवदन, बादल सरकार के एवं इंद्रजीत और पगला घोड़ा, मोहन राकेश के आधे अधूरे और विजय तेंदुलकर के खामोश अदालत जारी है जैसे नाटकों का मंचन कर भारतीय रंगमंच को जीवंत कर दिया, लेकिन उन्हें प्रसिद्धि दिलाने वाला 'अंधा युग' था।

उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया और कुछ लघु और फीचर फिल्में भी बनाईं। दुबे ने उनकी कई फिल्मों कें संवाद और पटकथा भी लिखी। इनमें अंकुर (197।), निशांत (1975), भूमिका (1977), जुनून (1978), कलयुग (1980), आक्रोश (1980), विजेता (1982) और मंडी (1983) शामिल हैं। वे मुंबई में रंगमंच के गुरू के नाम से प्रख्यात थे। उन्होंने कई कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण दिया। उनके निधन पर  बॉलीवुड को  गहरा अघात लगा। 

अभिनेत्री शबाना आजमी ने टि्वटर पर कहा कि महान रंगकर्मी सत्यदेव दुबे का करीब एक घंटे पहले निधन हो गया। यह कलाकारों के लिए बड़ा भयावह साल है। वह रंगमंच की महान हस्ती थे। अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि हिंदी रंगमंच की महान हस्ती सत्यदेव दुबे नहीं रहे। वह रंगमंच के प्रति अटूट निष्ठावान थे। फिल्मकार महेश भट्ट ने कहा कि रंगमंच की दुनिया की विभूति सत्यदेव दुबे का निधन हो गया। पुराने दिनों की याद ताजा हो गई है। अलविदा दुबेजी। निर्देशक केन घोष ने कहा कि सत्यदेव दुबे के निधन की खबर सुनकर दुख हुआ। उन्होंने इश्क विश्व के सभी कालाकारों के लिए अभिनय कार्यशाला आयोजित की थी। निर्माता विवेक वासवानी ने कहा कि मनोरंजनकर्ताओं के लिए खुशी मनाने का साल नहीं है यह। हम सभी को नुकसान पहुंचा है। अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी का कहना है कि बॉलीवुड में आने के लिए श्री दुबे ने ही उन्हें प्रेरित किया था। केन घोष ने कहा कि सत्यदेव दुबे के निधन के बारे में सुना दुख की बात है । वह सभी नए कलाकारों के साथ इश्क विश्क की एक अभिनय कार्यशाला का आयोजन किया। मधुर भंडारकर ने उन्हें एक शानदार रंगमंच अभिनेता और असाधारण पटकथा लेखक, निर्देशक  बताया। उन्होंने कहा कि श्री दुबे निधन उद्योग के लिए एक बड़ा नुकसान है।



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