रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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रविवार, 30 नवंबर 2014

शिवरात्रि और नाटक – संजय कुमार

बिहार के गांवों-कस्बों में उत्सवों के अवसर पर नाटकों को मंचित करने की अपनी एक अनूठी और रोचक परम्परा रही है। तमाम उतार चढाओं के बीच यह परम्परा आज भी कायम है। संजय कुमार का यह आलेख उसी नाट्य परम्परा की एक झलक पेश करती है। इस आलेख के केन्द्र में हैं फुलवरिया (भागलपुर) नामक गांव। मंडली पर यह आलेख संजय कुमार के फेसबुक वाल से साभार। लेखक से संपर्क करने के लिए यहाँ क्लिक करें। – माडरेटर मंडली   
शुरु में ही कुछ क्षमायाचनाएं1. ये नितांत निजी अनुभव हैं थोड़ा -बहुत अतीत को जीने का अनिर्वचनीय सुख, थोड़ा मनोरंजन -इनमें किन्हीं बौद्धिक अथवा दार्शनिक प्रमेयों की कोई जगह नहीं। 2. स्मृति क्षीण होने और समय के अंतराल के कारण संभव है नामों और कालक्रम में कुछ उलट पलट हो गयी हो। जो मित्र परिजन इन घटनाओं / प्रसंगों के गवाह रहे हैं उनसे क्षमा की अपेक्षा और सुधार का अनुरोध है। 3. वे जो इब्सन, ब्रेख्त, बर्नार्ड शॉ, मोहन राकेश, गिरीश कार्नाड, इब्राहिम अल्काजी आदि की ऊंची दुनिया के वासी हैं, उनसे इस हाट पुरैनी टाइप माल के लिए क्षमायाचना। 4. वे जो नुक्कड़ नाटकों आदि के जरिये क्रांति की जनवादी मशाल जला रहे हैं, उनसे भी इन प्रतिगामी संस्मरणों के लिए माफ़ी मांगता हूँ। 5. किस्त किंचित् लम्बी हो गयी है। उसकी भी माफी।
भाग 1 - हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित करीब सौ -सवा सौ साल पुराने शिवमंदिर- जिसे उनमें से एक शंभुनाथ पांडेय के नाम पर शंभुनाथ महादेव कहा जाता है - और भंग के प्रति समस्त ग्रामीणों का अखंड अनुराग देख कर , यह तो लगभग पक्का ही माना जा सकता है कि हमारे पूर्वपुरुष शैव रहे होंगे। यद्यपि आहार के मामले में मोटे तौर पर गाँव का आचरण वैष्णव ही रहा है। आज भी किसी भी पर्व त्योहार में अथवा भोज भात में मांसाहार सर्वथा वर्जित ही है। बलि देने की भी परंपरा कभी नहीं रही। याद पडता है कि पहले दशहरे में दुर्गाथान में पीपल वा बड के पेड़ पर कागज की कन्दीलें लटकाया करते थे जिसके बारे में किसी ने बताया था कि वह बलि के पशु का प्रतीक है। आज तो खैर मांसाहार सर्वव्यापी है और भंग बेचारी भी दारू के सामने पनाह मांगने लगी है। पर मांसाहार और भंग की कथाएँ फिर कभी।
आज शिव और शिवरात्रि और शिवरात्रि के अवसर पर होने वाले नाटक। तो शिव हमारे गांव के अधिपति देव हैं। ग्राम देवता का स्थान उनके ही एक प्रतिरूप भैंरो बाबा को प्राप्त है। गांव में काली का भी एक मंदिर है जो ब्राह्मणेत्तर जातियों की बस्ती के बीचोंबीच है और उन्हीं में ज्यादा लोकप्रिय भी है। भैरों बाबा का मंदिर - जो शिव मंदिर के आहाते में ही है -पहले मिट्टी के एक घर में था। मिट्टी का ही बना हुआ एक विशाल चबूतरा सा था जिसके मध्य में मिट्टी के ही महादेव (माधो नहीं) अर्थात लिंग। चबूतरे पर महिलाएं जल अर्पित करतीं सो वह स्थायी तौर पर गीला ही रहता, मानो ताजे कीचड़ से बना कोई सद्यजात पिंड हो।
भैरों या भैरव मंदिर के बगल में प्रागैतिहासिक काल की बनी दो चार खंडहरनुमा कोठरियां थीं, दूसरे कोने में एक कुआं और मंदिर के चारो और निसुआड की झाड़ियों की बाड़। आज बाड़ की जगह पक्की चहारदीवारी है, भैरव का छोटा सा मंदिर भी पक्के का है और कोठरियों की जगह समतल हो गयी है। कुंआ अलबत्ता जीवित है।70 के दशक में बना एक कोठरीनुमा हनुमान मंदिर भी है।
तो इसी प्रांगण में शिवरात्रि का मेला लगता था। शिवरात्रि तो हमारे लिए महापर्व था और रहेगा पर उस मेले को महामेला कहने में संकोच हो रहा है। कोई सौ पचास लोग जुटते होंगे - अधिकांश बच्चे। खाने पीने की चीजों /दुकानों के नाम पर लडुआ /लाई और पकौड़ी -फुलौरी के दो एक खोमचे, शीशे के चौकोर बक्से में रखी हवा मिठाई बेचते एक चश्मीश बूढ़े बाबा और गुड या चीनी के (रंगीन) लट्ठे बेचने वाले एकाध बंदे जो इन लट्ठों को बडे कौशल से मिनट भर में साइकल, हथपंखे या झंडे का रूप दे देते। खिलौनों की बात करें तो एक दो गुब्बारे और बांसुरी / तुतरू बेचने वाले, शायद लडकियों के लिए फीते, कंधी, शीशे आदि बेचने वाला एक बंदा।
मंदिर की हर साल रंगाई पुताई होती थी - आज भी होती है। उसके उत्तुंग धवल शिखर पर ध्वजा लेकर चढता हुआ कोई युवक और नीचे बज रही डुगडुगी नगाड़े और तुरही का समवेत पार्श्वसंगीत - एक रोमांचक अनुभव होता था।
शिव की पूजा संध्या काफी देर से, स्नान ध्यान और शाम की भंग छन जाने के बाद शुरू होती थी और देर रात तक चलती थी। इस बीच जनता को पूर्व फागुन की कडकडाती ठंड में इस निशापूजा की समाप्ति तक रोके रखने के लिए किसी न किसी प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन की परंपरा हर गांव में होती है। हमारे यहाँ सन 47-48 में शिवरात्रि के अवसर पर नाटक खेलने की परंपरा का सूत्रपात हुआ।
इसके पीछे मुख्य अभिप्रेरणा मेरे पिता की रही होगी। वे एक समर्पित सिनेमची थे। मूक फिल्मों के उस जमाने से रुपहले पर्दे के आशिक थे जबकि भले घर के बच्चों का सिनेमा देखना एक घोर अनैतिक कर्म माना जाता था। पर उनका सिनेमा प्रेम और उनसे जुड़े हमारे अनुभवों का प्रसंग अलग है और उसकी चर्चा अलग से। यहां तो इतना ही कि पृथ्वीराज कपूर - सोहराब मोदी अभिनीत सिकंदर 40 के दशक में उनकी पसंदीदा फिल्मों में एक थी और उस चित्र में दिखे पृथ्वीराज कपूर के मर्दाना सौंदर्य के वे दीवाने थे। बाद में जब पृथ्वीराज अपना पृथ्वी थियेटर लेकर भागलपुर आये तो उन्हें साक्षात देख कर यह दीवानगी और बढी - नाटक का नाम शायद पठान था। पृथ्वीराज संभवतः दंगापीडितों के लिए या किसी और सार्वजनिक कार्य के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे इसलिए शो खत्म होने के बाद मुंह को गमछे से ढंके एक दूसरा गमछा फैलाये, सर झुकाए निकास द्वार पर खडे रहते और लोग जी खोल कर दान देते।इस अदा से पृथ्वीराज जी की प्रभा कुछ और निखरी। पिताजी पारसी थियेटरों के भी उत्साही दर्शक थे और आगा हश्र कश्मीरी के बडे प्रशंसक।
पिताजी (जिन्हें हम सभी और प्रायः सारा गाँव ही बाबा कहता था) में नेतृत्व की क्षमता नैसर्गिक थी। अपने मित्रों /शिष्यों के साथ मिलकर नये राष्ट्र के निर्माण की प्रेरणाओं से अभिभूत होकर उन्होंने देश को आजादी मिलने के साथ ही, 1947 में, नवयुग संघ और नवयुग पुस्तकालय की स्थापना की थी। गांव के सारे युवक सुबह शाम नियम पूर्वक संघ में इकट्ठा होते। शुरु शुरू में तो शायद बाकायदा ड्रिल-विल भी होती थी, देशभक्ति के गाने गाए जाते।
बाबा को पढ़ने का शौक जुनून की हद तक था। देवकांता संतति और वेदप्रकाश कम्बोज से लेकर इलाचन्द्र जोशी और भगवतीचरण वर्मा तथा मनोहर कहानियाँ और इंद्रजाल कॉमिक्स से लेकर दिनमान और इलस्ट्रेटेड वीकली तक सभी कुछ पढते। उन्होंने अपने संग्रह का अधिकांश नवयुग पुस्तकालय को दे दिया था। इस संग्रह के एक छोटे हिस्से को ही स्तरीय साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है, अधिकतर जेबी जासूस, इब्ने सफी बी ए और भारत के शूरवीरों की गाथा जैसी सामग्री ही थी। एक अखबार और गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के अंक भी नियमित आते। इस पुस्तकालय ने गांव के युवाओं को साहित्य और कला के कोई सघन संस्कार दे दिये हों ऐसा तो प्रत्यक्षतः नहीं हुआ, पर लिखे शब्दों की खिड़की से बृहत्तर संसार को जानने का एक अवसर और उसके प्रति अभिरुचि का एक वातावरण अवश्य तैयार किया। मैने उस दौर को नौजवान पीढ़ी के कई सदस्यों - यथा रेबती भाई, अशोक भाई , सुबोल
भाई आदि को इस देन के प्रति बडा कृतज्ञ अनुराग रखते देखा है। पिताजी उर्फ बाबा को भी उस पीढ़ी के जीवन में अपने परोक्ष योगदान के लिए एक स्नेहपूर्ण गौरव था।यह पुस्तकालय करीब 40 वर्षों तक हमारे घर की बाहरी कोठरी में रहा। जब बाबा रिटायर होकर घर लौटे और हमें उस कोठरी की जरूरत हुई तो पुस्तकालय को स्कूल की एक कोठरी में ले जाया गया। वहां धीरे धीरे देखभाल के अभाव में सारी पुस्तकें दीमकों की भेंट चढ़ गयीं और पुस्तकालय स्मृतिशेष हो गया। हां, नवयुग संध किसी न किसी रूप में जीवित रहा। संघ द्वारा समय समय पर अनेक बर्तन भी खरीदे गये थे जो लोगों को शादी ब्याह में मुफ्त या फिर कुछ मामूली प्रतीकात्मक चंदे पर दिये जाते। शायद यह सिलसिला आज भी जारी है और आज भी शायद सामुहिक आयोजनो की पहचान नवयुग संघ से ही होती है।
अस्तु। इस क्षेपक के बाद फिर से नाटक पर लौटा जाये। तो पहला नाटक खेला गया सन 47 -48 के आस पास। अनुमान लगाना कठिन नहीं कि नाटक का नाम था 'सिकंदर'। बाबा ने निर्देशन भी किया और संभवतः अपने 6 फुट से निकलते कद के कारण और या फिर स्वयं निर्देशक होने के कारण, सिकंदर का अभिनय भी। पोरस बने थे उनके मित्र बलराम पांडेय जो हमारे चचेरे भाई भी थे और हमारे ममेरे बहनोई भी, और खुद भी काफी लहीम शहीम थे। यह नाटक निश्चय ही अपने निर्माण मूल्यों में काफी भव्य रहा होगा क्योंकि उसके लिए जुटाया गया साजोसामान अगले चार-एक दशक तक होने वाले नाटकों में काम आता रहा और तब भी हम उसका वैविध्य देख कर चमत्कृत हो जाते थे - तरह तरह की तलवारें, भाले, धनुष-बाण आदि शस्त्रास्त्र , रथों के ढांचे, यूनानी शैली के शिरस्त्राण और वस्त्राभूषण आदि।
इस नाटक से जुड़ी दो बातों का जिक्र बाबा करते थे। उन दिनों बाबा के रवीन्द्र नाथ टैगोर नुमा दाढ़ी थी। रिहर्सल के दौरान सभी, विशेषकर वे जिन्होंने सिकंदर फिल्म देख रखी थी, इस बार पर घनघोर आपत्ति / आश्चर्य कर रहे थे कि भला सिकंदर के दाढ़ी कैसे हो सकती है। पर नाटक के प्रणेता / निर्देशक के आगे किसी की चल नहीं रही थी। जब एन शिवरात्रि के दिन बाबा दाढ़ी सफाचट कराये दफ्तर से लौटे तो मंडली ने राहत की सांस ली। एकबारगी तो खुद मेरे भ्राता जयप्रकाश (दादामणी) उन्हें नहीं पहचान पाये।
दूसरी एक मजेदार घटना नाटक के क्लाइमैक्स में जब पोरस से युद्ध के पश्चात सिकंदर की सेना भारतवर्ष में आगे बढ़ने से इनकार कर देती है। जो कलाकार विद्रोही सेनानायक की भूमिका कर रहा था, एन वक्त पर अभिनय के जोश में किंवा भंग की तरंग में उसने ''हम आगे बढ़ेंगे" का नारा बलंद कर दिया। मंच पर भारी संभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी। पर इससे कबल कि दर्शक समुदाय ठीक ठीक कुछ समझ पाता, संभवतः सेल्यूकस की भुमिका कर रहे केशव भाई ने प्रत्युतपन्नमति का परिचय देते हुए उस कलाकार की गर्दन दबोची और "दूर हटाओ इस गुस्ताख को हमारी नजरों से " कहते हुए उसे नेपथ्य में ढकेल दिया। उस हतभाग्य को तो सहसा समझ ही नहीं आया कि उसकी राजभक्ति का ऐसा निरादर और तिरस्कार क्यों हो रहा है।
सिकंदर की सफलता के बाद नाटकों की परंपरा चल निकली। सीमित संसाधनों और पुरानी तकनीकों के बावजूद प्रस्तुतिकरण में नये नये प्रयोग किए जाते। कभी साडियों को मंच के फर्श पर बिछा, उनके हिलने से बहती नदी या हिलोरें लेते सागर का आभास दिया जाता। कभी गत्ते का एक विराट कमल बनाया जाता जो पटाखे की ध्वनि के साथ प्रस्फुटित होता तो अंदर कमला पर आसीन ब्रह्मा जी प्रकट होते (जिस नाटक विशेष की यहां चर्चा हो रही है उसमें ब्रह्मा का अभिनय शायद लड्डू भाई ने किया था)।एक दूसरे नाटक में जिसमें नायक - वाल्मीकि - की भूमिका शायद बाबा ने की थी , मंच पर बाजाब्ता दो बैलों की जोड़ी ले आयी गई थी। उस दौर के खेले गये नाटकों में कृष्णार्जुन युद्ध और जयद्रथ वध आदि की चर्चा मैने सुनी है।शायद एक सामाजिक नाटक भाई भाई भी खेला गया था - इसी नाम का पर एक अलग कथावस्तु वाला नाटक बाद में हमारे जमाने में भी खेला गया - उसकी चर्चा आगे। बाद के दौर में शायद टीपू सुल्तान और सुल्ताना डाकू का भी मंचन हुआ था।
इन्हीं में से किसी एक नाटक के एक मजेदार प्रसंग की चर्चा बाबा करते थे। बाबा के हमनाम और रिश्ते में हमारे एक चचेरे भाई थे नोरेन भाई - अर्थात नरेंद्र पाण्डेय जो खुद भी स्टेट बैंक में ही एक अधिकारी थे। नाटक में कोई भी छोटा मोटा रोल करने की उन्हें बडी हसरत थी। दो चार बरस तक लगातार प्रयास के बाद निर्देशक उर्फ बाबा ने उन्हें किसी नाटक में शिव का पाठ दिया। छोटा सा रोल, एकाध डायलॉग बोलने थे , वह भी एन आखिरी दृश्य में। समस्या यह थी कि बाबा खुद अभिनय भी कर रहे थे, निर्देशन भी, मेकअप भी और प्राम्पटिंग भी। नतीजतन अन्य पात्रों की तरह नोरेन भाई का मेकअप भी नाटक शुरु होने के पूर्व ही कर दिया गया। नंगा बदन, शरीर पर एक नकली बघछाल और भभूत के सिवा कुछ नहीं, सर पर जटाजूट और गले में प्लास्टिक का एक सर्प। उपर से माघ-फागुन की कनकनाती सर्दी।
हमारे गांव में हरेक पर्व-त्योहार में अबालवृद्ध भंग सेवन की परंपरा रही है। फिर भंगेडियों के इष्टदेव शिव की शादी का अवसर। मंच के सामने, मंच के उपर और मंच के पीछे विराजमान सभी नागरिक इस दिन अतिरिक्त उल्लास से भंग का सेवन करते थे। नोरेन भाई की अभिनय यात्रा का यह शुभारंभ था और स्वाभाविक रूप से वे किंचित नरभसाये हूए थे सो यथोचित मात्रा में भंग का सेवन तो उनका विशेष अधिकार था। पर फरवरी की कडकडाती ठंढ के आगे न कम्बल काम कर रहा था न भंग का कवच न चाय की अनगिनत प्यालियां।
खैर जैसे तैसे रात बीती और वह शुभ घड़ी आयी कि जिसका इंतजार था - नाटक का आखिरी सीन। नोरेन भाई मंचासीन हुए। पीछे गत्ते पर सफेदी पोत कर बनाया गया कैलाश पर्वत। बगल में पार्वती। शंकर समाधि में। वीरभद्र टाइप किसी गण को आकर कहना था कि दुर्वासा ऋषि पधारे हैं और शंकर को कहना था - उन्हें ससम्मान यहां लाओ।
पर अभिनय की उत्तेजना और घबराहट तथा भंग के उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होते गए नशे का ऐसा मिलाजुला असर हुआ कि शंकर बने नोरेन भाई को सचमुच की समाधि लग गई। गण ने तो अपना डायलॉग बोल दिया पर शंकर चुप। गण किंचित् घबराया पर फिर से उसने दुर्वासा के आने की अप्रिय घोषणा की। शंकर फिर भी मौन।
प्राम्पटर (बाबा) ने दबे स्वर में प्राम्पट किया :: शंकर (अर्थात शंकर बोलेंगे) :: उन्हें ससम्मान यहां लाओ। शंकर पर कोई असर नहीं पड़ा। अबतक दर्शकों में सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। बाबा ने एक बार थोडे़ तीखे स्वर में फिर प्राम्पट किया। शंकर यथावत् मौन। दर्शकों में अब हंसी के फुहारे छूटने लगे थे और बाबा के धैर्य का बांध टूट चला था। वे क्रोध में जोर से बोले, इतनी जोर से कि आखिरी पंक्ति में बैठे दर्शकों तक भी साफ आवाज गयी :: शंकर ! इस तीखे स्वराघात से अकस्मात् नोरेन भाई की तंद्रा टूटी और घबरा कर खडे हो वे चिल्लाने लगे :: शंकर ! शंकर ! शंकर ! शंकर ! शंकर ! लोग लोटपोट हुए और नाटक का वहीँ पटाक्षेप हो गया।
भाग 2 - हमारे यहाँ नाटकों के साथ खेलना शब्द का प्रयोग करते हैं। सचमुच ही यह आयोजन मनोरंजन के किसी गंभीर प्रयास की बजाय ज्यादातर एक खेल ही होता था जिसमे सारे गाँव की एक उल्लासपूर्ण सहभागिता होती थी।दरअसल आयोजन मात्र का थ्रिल ही मूल प्रेरणाशक्ति थी। समाजसुधार या फिर मनोरंजन तक के अभिप्रेत भी गौण ही थे। लगभग समस्त दर्शक समुदाय - महिलाओं को छोड़कर - किसी न किसी रूप में नाटक के आयोजन से जुडा रहता , सभी को रिहर्सल देख देख कर कथावस्तु तो क्या, कथोपकथन - डायलाग - भी पहले से ही ज्ञात रहता। हमारे धर की महिलाओं की स्थिति थोड़ी भिन्न थी।क्योंकि लगभग महीने भर चलने वाले रिहर्सल हमारे दरवाजे पर ही होते तो उन्हें भी इन्हें देखने का पूरा पूरा मौका मिलता। मेरी बहनें - दीदीमणी, फूलदीदी और टूलू, मेरी भगनियां स्वीटी और पिंकी तथा मेरी पत्नी भवानी इसकी गवाह रही हैं। भवानी के लिए , एक तो कस्बाई और दूसरे बंगाली परिवेश से आने के कारण यह पूरा का पूरा गंवई , घनघोर दकियानूसी / सामंती माहौल ही एक अजूबा सा था।
पारंपरिक नाटकों में प्रस्तुतिकरण की आत्मा मंचसज्जा में होती है। हमारे यहाँ तो संसाधनों की कमी की वजह से मंच का निर्माण ही अपने आप में चुनौती होती। अलग अलग घरों से अलग अलग रूपाकारों की चौकियों को जुटाना , उनके नीचे ईंटें वगैरह लगा कर एक मंच का एक समतल फर्श बनाना, उन्हें मजबूती से बांधना ताकि अनचाहे ही मंच पर भूकम्प का दृश्य न समुपस्थित हो जाए। चारो ओर बांसों की एक जटिल सी श्रृंखला खडी करना जिनपर अलग अलग परदे - ड्राप सीन (मुख्य परदा) , यवनिका आदि - बांधे जाते। चुंकि भारी परदों को पुल्लियों के सहारे उठाना गिराना एक तकनीकी मामला था, इस कार्रवाई में अनुभवी लोगों की आवश्यकता होती थी - सीताराम भाई, नरेश मामा , रेवती भाई , कैलाश भाई जैसे पुरोधा इस अवसर पर मजदूरों और स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते। इन उद्यमों में दो चार मजदूरों के अलावा प्रायः स्वयंसेवक ही होते थे। मैंने जिन मजदूरों को इस उद्यम में देखा है, उनमें डीगो का नाम मुझे विशेष तौर पर याद है, पर उनकी उपकथा कभी और।
परदे मंचसज्जा के सबसे महत्वपूर्ण कारक होते थे। इनमें मुख्य होता था ड्राप सीन जो नाटक की कथावस्तु के लिए एक प्रवाहसूत्र का काम करता था और इस कारण उसे - यवनिका के बाद - सबसे आगे लगाया जाता ताकि जरूरत के हिसाब से पीछे के पर्दे गिरा कर दृश्य परिवर्तन किया जा सके। उसपर प्रायः नगर के एक राजमार्ग का दृश्य होता। बाकी पर्दों में से एक में एक महल का दृश्य जो राजा के प्रासाद से लेकर लाट साहब की बैठक तक हर तरह के इनडोर दृश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। एक होता था जंगल 'सीन' जिसमें झरने, अस्ताचल-गामी सूरज, नौका आदि का चित्रण होता था। यह पुष्पवाटिका टाइप प्रेमप्रसंगों और युद्धों -दोनों की पृष्ठभूमि के लिए मुफीद होता था।चित्रों का स्तर लगभग घटिया ही होता और उनमें पर्सपेक्टिव / परिप्रेक्ष्य का सर्वथा अभाव होता जो भारतीय चित्रणशैली का - चाहे मुगल मिनियेचर हों कि राजपूत वा कांगड़ा शैली - एक स्थायी दोष रहा है, गो बाज विद्वान उसे महिमामंडित भी करते रहे हैं। परदे / कॉस्ट्यूम आदि के पुराने हो जाने पर अगल बगल की नाटक मंडलियों से उधार लेने का भी रिवाज था।
अगली चुनौती होती थी अभिनेताओं का चयन। चुंकि नाटकों की शैली मूलतः पारसी थिएटरों वाली थी और कथावस्तु लगभग सौ फीसदी पौराणिक अथवा ऐतिहासिक, जोर अतिनाटकीय शारीरिक भंगिमा और जोरदार डायलॉगबाजी पर था न कि बारीक मुखमुद्राओं पर। मंच पर स्पेस को कवर करना अनिवार्य होता था अतः यदि मंच पर कम - दो या तीन - पात्र हों , तो उन्हें कहा जाता कि वे आपस में स्थान बदलते रहें ताकि गति का एहसास भी होता रहे और मंच भी भरा भरा लगे। बहुत जमाने तक माइक्रोफोन भी नहीं थे, तो जिस पात्र को भी बोलना था उससे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह संवाद भरसक मंच के बिल्कुल सामने आकर और दर्शकों से मुखातिब होकर बोले, भले ही जिसे संबोधित किया जा रहा हो वह पात्र परदे के पास हो क्यों न खड़ा हो
नायक की भूमिका के लिए उपरोक्त नाटकीय शैली और तीखे नाक नक्श को वरीयता दी जाती। मैंने बाबा की सेवानिवृति के बाद ही गांव में दो चार साल बिताए थे। पर बाबा के बेतिया तबादले के बाद भी कई वर्षों तक नाटक की परंपरा जारी रही थी और एकाध बार गांव में शिवरात्रि गांव में बितायी और उसमें दो चार नाटक देखे। उन नाटकों में, जहाँ तक मेरी स्मृति है, मैंने सीताराम भाई या फिर बुद्धो भाई के पुत्र-परिजनों को ही नायकों की भूमिका में देखा था। दोनों ही परिवारों के पुरुष (और स्त्रियां भी) सौंदर्य के धनी थे।एकाधिक में जवाहर भाई उर्फ मुखिया जी , एकाध में गुलगुल भाई और लड्डू भाई। अन्य पात्रों के रूप में उत्साही स्वयंसेवकों को तरजीह दी जाती थी।
पर सबसे कठिन था स्त्री पात्रों का चयन। एकदम छोटी बच्चियों को छोड दें तो लडकियों का मंच पर जाना पूरी तरह निषिद्ध था। इस निषेध के कारण स्त्री पात्रों का अभिनय भी लड़कों को ही करना था। इसमें प्राथमिकता उन सुकोमल किशोरों को दी जाती जिनकी अभी मसें नहीं भींगी हों। जो जाबांज इस चुनौती को स्वीकार करते भी उनकी दूसरे लड़के खास कर वे जिन्हें कोई भी भूमिका नहीं मिली होती, बडी फजीहत करते। इस कठिनाई के कारण लगभग सौ फीसदी नाटक पौराणिक या ऐतिहासिक होते थे जिनमें स्त्री पात्रों की भूमिका प्रायः गौण ही होती थी (जहाँ तक मुझे याद है , हरेक नाटक के लेखक शायद एक ही थे -श्री चतुर्भुज, बी ए) इन विपरीत परिस्थितियों में भी कुछ कलाकार ऐसे थे जो स्त्रियों का अभिनय अत्यंत रुचि और गौरव से करते। इनमें प्रमुख थे गुलगुल भाई और कारू भाई। गुलगुल भाई को मैंने ' कुणाल' वा 'कुणाल की आंखें' नामक नाटक में तिष्यरक्षिता की भूमिका को बडे कौशल से निभाते देखा था। जहां तक कारू भाई की बात है तो मैंने जीवन में जिस एकमात्र नाटक में - अफसोस कि उसी नाटक का नाम याद नहीं रहा - राणा उदय सिंह के बचपन का - अभिनय किया था, उसमें कारू भाई ने मेरे प्राणों की रक्षा करने वाली पन्ना धाय की भूमिका निभाई थी।उन्हें मैने कई बार उसी हिकारत के साथ नयी पीढ़ी के नौजवानों की अभिनय क्षमता का जिक्र करते सुना है जैसा कि सुनते हैं जानी राजकुमार कभी राजेश खन्ना के लिए करते थे।
उनके द्वारा की गयी इस प्राणरक्षा (मंच पर ही सही) के ऋण के अलावे कारू भाई की होली गाने में सिद्धी के कारण भी मैं उनका मुरीद रहा हूँ। कारू भाई, सुधीर भाई और विमल बाबू - इन तीनों गुरुजनों ने गाहे बगाहे धूम्रपान के धत्कर्म में भी मेरा साथ दिया है, सो आभार।
इन नाटकों में संगीत नृत्य के पक्ष किंचित् कमजोर ही थे। एकाध मंगलाचरण / वृन्दगान जैसी प्रस्तुतियां होती थीं जिनमें प्रायः बच्चे बच्चियाँ ही भाग लेते। पौराणिक ऐतिहासिक कथाओं में बीच बीच में संगीत नृत्य की गुंजाइश हो सकती थी पर उन अवसरों का उपयोग कम ही किया जाता। छोटी बच्चियों तक का नृत्य प्रदर्शन गांव के कट्टर संस्कारों को गवारा न था। जो लड़के स्त्रियों का अभिनय करते उनके द्वारा नृत्य की कल्पना भी हास्यास्पद थी। किसी पेशेवर नर्तकी /रंडी को बुलाना भी धनधोर अपवाद का बायस था (अगल बगल के कुछ गांवों विशेषकर राजपूत या पिछड़ी बस्तियों में - दृश्यों / अंकों के बीच के अंतराल में मनोरंजन का यह प्रमुख उपादान था। बल्कि कहीं कहीं तो नाटक गौण हो जाते और नृत्य प्रधान)। पर हमारे यहां एक तो ब्राह्मणवादी संस्कारों का आग्रह। दूसरे नाटक से लोगों का जुडाव संभवतः कुछ ज्यादा भावनात्मक था और उसे ही गौण होते देखना उन्हें मंजूर न था। तीसरे रंडी के नाच में शायद पैसे भी बहुत लगते थे। एक और कारण शायद यह हो कि दर्शकों में एक खासी बड़ी संख्या महिलाओं की होती थी और उनकी उपस्थिति में फूहड़ता से परहेज ही उचित था।
एकाध बार लौंडा नाच जरूर कराये गये थे पर ये प्रयोग भी कुछ खास सफल / लोकप्रिय नहीं हुए। फिलर के रूप में कभी कभी प्रहसन से काम लिया जाता था। एक बार मैंने गुलगुल भाई सुधीर भाई की हिट जोड़ी को दो बेवकूफ़ हवलदारों का शानदार अभिनय करते देखा था, ऐसा याद पडता है। पर वह नाटक की मूल कथावस्तु का हिस्सा था या फिलर, यह ठीक ठीक याद नही।
फिलरों की एक अलग ही समस्या थी। दरअसल नाटक के साथ साथ शिवरात्रि की पूजा भी साथ साथ चलती थी और हर घंटे बाद उसमें एक आरती जैसा कुछ उपक्रम होता था। शंख -घडियालों की आवाज से रजाइयों के नीचे दुबके सो रहे दर्शक भी जाग जाते और यह खतरा होता कि कहीं वे घर की ओर न दुबक जायें। जैसा कि उपर बताया, दूसरे गांवों में इन अंतरालों को ऐसे नृत्यों के सहारे पाट लिया जाता था जिन्हें आज की भाषा में आइटम नंबर कहते हैं। हमारे यहाँ ले दे कर प्रहसनों का ही सहारा था।
जहां तक संगीत की बात है तो हमारे गांव को बेसुरों का गांव कहना शायद अन्याय नहीं होगा। गांव में एकमात्र - सुबोल भाई या उनके परिवार - को छोड़कर किसी में मैंने तो सुर की कुछ खास समझ नहीं पायी। हां, ऊंचे सुरों में लम्बी हाँकने की बात हो तो फिर को बड छोट कहत अपराधू। तो वृन्दगान / मंगलाचरण को संगीतबद्ध करना सुबोल भाई का - जो बांसुरी, तबला और हारमोनियम के बजाने में सिद्धहस्त और नामचीन थे - विशेषाधिकार था। हर कलाकार की तरह वे किंचित् क्रोधी और तुनुकमिजाज थे और बेसुरों की खूब खबर लेते। महाराणा उदय सिंह वाले नाटक में मैं भी मंगलाचरण का भी एक हिस्सा था और बारम्बार गलत सुर लगाने के कारण - निर्देशक का पुत्र होने के कदाचित विशिष्ट स्थान के बावजूद - सुबोल भाई की डांट खायी थी।
आयोजन की चुनौतियों का जिक्र करते समय मैं सबसे बड़ी चुनौती - आर्थिक संसाधनों को तो भूल ही गया। नाटक के आयोजन का निर्णय होते ही सबसे पहले बजट बनाया जाता। फिर अलग अलग परिवारों के लिए बाहैसियत चंदे की राशि निर्धारित की जाती। कभी कभी ऐसे नौकरीपेशाओं के लिए जो स्वयं नाटक के आयोजकों में या उत्साही स्वयंसेवकों में होते- उनके लिए चंदे की राशि अलग से निर्धारित होती यद्यपि इस दोहरी व्यवस्था का बाज दफा उनके परिजनों द्वारा विरोध किया जाता।
जो भी हो , चंदे की राशि को निर्धारित कर देना कुछ कुछ दहेजनिरोधी कानून बना देने जैसा था। असल चुनौती थी उस कानून पर अमल अर्थात चंदे की वसूली। स्वयंसेवकों के घरों से चंदा वसूली में कोई खास परेशानी नहीं होती, अपवादस्वरूप हल्की फुल्की आनाकानी के अलावा। अनेक और ग्रामीण भी उत्साहपूर्वक यथोचित सहयोग करते। ऐसे नौकरीपेशा जो अगल बगल के नगरों - देवघर, दुमका आदि में - पदस्थापित थे , वे भी यथायोग्य सहयोग करते थे।
पर कई ऐसे भी थे जो चंदे से बचने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते। इनमें बहुतायत ऐसे ग्रामीणों की थी जो न सिर्फ भागलपुर जा बसे थे बल्कि धीरे धीरे जडों से और गांव के समाज से कट से गये थे।चंदा देने वाले संभावित नागरिकों की सूची बनाते वक्त भागलपुर जा बसे सभी प्रवासियों की लिस्ट अलग से तैयार की जाती और दो एक जांबाजों को बाकायदा मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवा कर और थोड़ा बहुत जेबखर्च देकर हर इतवार इस अभियान में प्रवृत्त किया जाता। लेकिन निस्संदेह इस सारे सिलसिले में सबसे कठिन मोर्चा सुरेन बाबू का था जो गांव के सबसे धनाढ्य व्यक्ति थे, गांव के दामाद भी और इलाके भर के कंजूसों के सिरमौर। पर उनकी कथा फिर कभी।
किस्सा-कोताह यह कि चंदे का काम बड़ी थेथरई का था और है - चाहे चंदा शिवरात्रि का हो, दुर्गा पूजा का या किसी और प्रयोजन से। और आखीर में यह भी तय था कि बजट घाटे का ही निकलेगा। तो प्रमुख आयोजकों में से दो चार को इस घाटे की भरपाई की एक अलिखित गारंटी भी देनी पड़ती। अपने जमाने में मैंने भी अपने मित्रों -- उदय और छोटू के साथ मिलकर यह जिम्मेदारी उठायी है जो पहले बाबा और उनके मित्रगण उठाते होंगे और आज नयी पीढ़ी के नौजवान उठा रहे हैं, गो आजकल नाटकों का सिलसिला बंद हो गया है और आज दूसरे प्रकार के - भव्यतर आयोजन होते हैं।
भाग 3 - उपर जिस नाटक में मैंने अपने अभिनय का जिक्र किया है उसमें मेरे फुफेरे भाई धनंजय मिश्र उर्फ लोली भाई ने नायक राणा उदय सिंह की और मुखिया जवाहर भाई ने उनके सेनापति और खलनायक बनवारी सिंह की भूमिकाएं की थीं। जवाहर भाई ने न ठीक से रिहर्सल किये थे न डायलॉग याद करने में कोई दिलचस्पी दिखाई थी। नतीजतन एक सीन के संवाद दूसरे में बोल देते और मौके बेमौके महाराणा की जय हो का उद्घोष कर देते।
इस नाटक के अतिरिक्त दो नाटकों की मिलीजुली स्मृतियाँ जीवित हैं - सिराजुद्दौला और मीर कासिम। इन नाटकों का निर्देशन अरविन्द भाई कर रहे थे जिन्होंने बाबा के तबादले के बाद यह जिम्मेदारी संभाली थी। वे घनघोर नाटकीय शैली के हामी थे और अपने गौरवर्ण , ऊंचे ललाट और अत्यंत तीखे नाक नक्श के कारण लगता था कि सीधे महाभारत के फडफडाते पन्नों से निकले हों। वे और शायद उनका परिवार भी अपनी सामान्य बातचीत में अंगिका की जगह खड़ीबोली का प्रयोग करते था जिसका लोग पीठ पीछे यदा कदा मजाक भी उडाते।
मीरकासिम नाटक में हरेन भाई ने मीरजाफर का अभिनय किया था। कारागार का दृश्य था और बत्तियों पर काले कागज को चिपका कर सलाखें बनायीं गयीं थीं। पश्चाताप में डूबे हुए मीरजाफर को स्वगत भाषण करना था। पर दूसरे कलाकारों की तरह हरेन भाई ने भी डायलॉग वायलाग याद करने की कुछ खास जहमत नहीं उठाई थी। अलबत्ता यह सबक जरूर याद किया था कि हर संवाद ठीक मंच के आगे तक जाकर बोलना है। परिणाम यह हुआ कि हरेन भाई मंच के पीछे तक जाते, परदे से बिल्कुल कान सटा कर प्राम्पटर से डायलॉग सुनते और फिर मंच के आगे आकर बोलते 'मीरजाफर'। फिर लौट कर परदे के पास जा कान लगाते , प्राम्पटर की आवाज ठीक से नहीं सुन पाते तो पूछते ' आंय ?'। फिर सामने आकर बोलते ' बंदी मीरजाफर !'। फिर पीछे जाते। जनता में मच रहे शोर शराबे और उसकी सीटियों का उनपर कोई असर नहीं हो रहा था। वे एक महान अभिनेता और सच्चे स्थितप्रज्ञ थे।
शायद इसी या किसी और नाटक में रम्भो भाई ने या तो किसी पुलिसवाले, किसी फौजी अथवा अपराधी की - याने किसी हथियारबंद शख्स की भुमिका की थी - जो उनके अपने निजी, कैंडेदार चरित्र के अनुरूप ही थी। तो उन्हें किसी दुश्मन को गोली मारनी थी। रिहर्सल में वे गोली चलाने का अभिनय करते वक्त ज्यादा जीवंतता लाने के खयाल से बोलते 'ठांय'। दो चार दिनों के बाद निर्देशक ने उन्हें समझाया कि इस ध्वन्यात्मक अतिरेक की जरूरत नहीं क्योंकि मंच पर उनके हाथ में एक खिलौने वाली ही सही पर आवाज करने वाली पिस्तौल होगी और ठांय की ध्वनि उससे ही निकले तो बेहतर। अगले दिन रोकते रोकते फिर उनके मुंह से निकल ही गया - ठांय। लोग हँसे, वे झेंपे। पर अगले दिन वही ढाक के तीन पात। यह सिलसिला पूरे रिहर्सल के दौरान मुतवातर जारी रहा और अंततोगत्वा मंच पर भी कमर से पिस्तौल निकालने के पहले ही उनके मुंह से बरबस निकल पडा - ठांय ! दुश्मन भी आज्ञाकारी था। वह भी बिना गोली खाये ही ठांय सुनते ही धराशायी हो गया।
भाग 4 - बाबा की सेवानिवृति के बाद सन् 83 के आखीर में हम गांव आये। सन् 85 के अक्तूबर में बैंक की सेवा में आने तक कोई दो साल गांव में बीते। प्रोबेशन के आखिरी छः महीने भी - भागलपुर सिटी में पासिंग के समय भी - गांव में रहा और सन् 88 से 90 तक बांका में पदस्थापना के दौरान भी धर से ही आता जाता था। इन 4-5 सालों के प्रवास में ही गांव से मेरे तन्तु जुडे और समृद्ध हुए। और इसी दौरान नाटकों से जुडने का एक संक्षिप्त ही सही पर प्रत्यक्ष मौका मिला।
बाबा के आते ही यह निर्णय किया गया कि नाटकों का सिलसिला जो दसेक साल से ठप पड गया था - उसे पुनर्जीवित किया जाय। तो उस 3-4 साल के वक्फे में हमने चार या पांच नाटक खेले होंगे - भगतसिंह, भाई भाई , क्षत्रपती शिवाजी और एक या दो और। इन नाटकों के आयोजन में - चंदा उगाहने से लेकर चौकियां ढोने तक - मेंने अपने समकालीन मित्रों - उदय और छोटू उर्फ गंगाधर के साथ गांव के अन्य मित्रों /युवाओं का एक तरह का नेतृत्व करते हुए - सक्रिय भूमिका निभाई थी। हमारी इस तिकड़ी के मार्गदर्शक थे लड्डू भाई। वे अपने जमाने में बडे तेवर वाले युवा थे। कुशाग्र बुद्धि , ताश के उस्ताद खिलाड़ी, क्रिकेट की अच्छी जानकारी और उसके प्रति गहरी अभिरुचि रखने वाले। राजनीति में भी उनकी पैठ उतनी ही गहरी थी और वे गांव के स्तर की राजनीति के भी एक माहिर अध्येता और वक्त पडने पर उसके शातिर खिलाड़ी भी थे। इन कारणों से विशेष कर ताश में सिद्धी और क्रिकेट में रुचि के कारण वे बाबा के अत्यंत प्रियपात्र थे।
पर मैंने आयोजन के भौतिक पक्षों के इतर भी मंच और कला निर्देशन के अलावे पटकथा लेखन की जिम्मेदारियां भी ओढ लीं।पहली दफा हमने नाटक चुना श्री चतुर्भुज बी ए का शहीद भगतसिंह। निर्देशक (बाबा) - की अनुमति से मैने पूरी की पूरी पटकथा का पुनर्लेखन कर दिया और सारे संवाद भी फिर से लिख डाले। शायद इससे कथावस्तु को एक ज्यादा आधुनिक और आकर्षक कलेवर मिला गया। यद्यपि यह भी संभव है कि मेरे प्रयास पर जाने अनजाने मनोज कुमार की फिल्म शहीद का प्रभाव रहा हो। जो भी हो, नाटक काफी सफल रहा और एक लम्बे अर्से तक सभी प्रतिभागियों पर इसका एक सुखद सुरूर सा छाया रहा। अभिनेताओं की मुझे ठीक ठीक याद नहीं - शायद लड्डू भाई ने भगतसिंह की भूमिका की थी और उदय नें सांडर्स की। मित्र मुरलीधर ने एक मसखरे सिपाही की भूमिका में बड़ी वाहवाही लूटी थी , इतना भर याद है। यह भी स्मृति है कि भगतसिंह और साथी क्रान्तिकारियों की फांसी का दृश्य आदमकद पुतलों के सहारे दर्शाया गया था और काफी जीवंत बन पड़ा था।
इस आयोजन में अपनी लगभग केंद्रीय भूमिका के कारण, और शायद पहला अवसर होने के कारण भी, ग्रीनरूम के थ्रिल की यादें आज भी ताजा हैं। जैसा कि भारतवर्ष के हरेक आयोजन में होता ही है, एक बेमतलब सी आपाधापी, हल्ला- गुल्ला और शोर शराबा। अगले सीन की तैयारी में परेशान कला निर्देशक। नाटक देखने में एकाग्र तल्लीनता के कारण बार बार पर्दा गिराने भूल जाने वाला जवान। एन वक्त पर या तो जेनरेटर का स्टार्ट होने से इन्कार कर देना या जेनरेटर वाले का गांजे के चक्कर में कहीं गायब हो जाना, आचानक माइक्रोफोन के स्वर का लोप हो जाना। अपने मेकअप और कॉस्ट्यूम में सजे धजे, अजीब से दिखते, खोये खोये से अभिनेता जिनमें से एकाध एन वक्त पर , सीन से ठीक पहले मूतने निकल जाते। लगभग हर सीन की सफलता के बाद दर्शकों का एक हिस्सा - विशेषकर बुजुर्गवार- अभिनेताओं को बधाई देने अंदर आता। कुछ ऐसे भी आते जो पूरे आयोजन से किसी प्रत्यक्ष जुडाव के नहीं होने के कारण थोडे उखड़े /उपेक्षित सा महसूस कर रहे होते और ग्रीनरूम में आकर इस आइडेंटिटी क्राइसिस से उबरने का प्रयास करते - जैसे कि बालमुकुंद उर्फ बालो दा, जो हर बार ग्रीनरूम से निकलकर दर्शकों पर एक ऐसी अभिमान भरी विहंगम दृष्टि डालते जैसा कि सुनते हैं दिल्ली के लोगबाग अपने बेटे के जन्मदिन की पार्टी में किसी केंद्रीय मंत्री को बुलाने के बाद अपने पड़ोसियों पर डालते हैं। ग्रीनरूम में इस आवाजाही को रोकने अथवा नियंत्रित करने के प्रयास प्रायः असफल ही होते। इस ट्रैफिक का एक कारण ग्रीनरूम में चाय और भंग की सरकारी व्यवस्था का होना भी हो सकता है।ग्रीनरूम से थोडा हट के वरिष्ठ स्वयंसेवकों के लिए - कभी कभी चिलम का भी इंतजाम होता।
अगले साल या फिर उसी साल शिवरात्रि के अगले रोज - ठीक ठीक फिर याद नहीं - हमने नाटक खेला - भाई भाई। इस दफा मैने जोखिम उठाया, एक गैर पौराणिक/ ऐतिहासिक कथावस्तु चुनी यद्यपि उसे पूरी तरह सामाजिक के परंपरागत ढांचे में भी नहीं रखा जा सकता क्योंकि सामान्य सामाजिक नाटकों की तरह वह सुधारवादी संदेशों / प्रेरणाओं से ओतप्रोत भी नहीं था। मैंने पटकथा को किसी पुस्तक या कहानी पर आधारित नहीं किया - इरादा किया कि एक नया प्रयोग किया जाये। एक ऐसी कथा लिखी जो कि पहले हिस्से में दहेज आदि जैसे कुछ चलताऊ सामाजिक सरोकारों के इर्द गिर्द थोडे हल्के फुल्के मनोरंजक अंदाज में चली। दूसरे हिस्से में मैंने थोड़ा और जोखिम लिया और कहानी में एक कोर्ट रूम ड्रामा डाला जिसमें एक पात्र हत्या का आरोपी है और शायद उसका भाई कोर्ट में जिरह कर के उसे बरी कराता है। इस थ्रिलरनुमा जिरह में मुख्य नुक्ता शायद हत्या के वक्त बंद हो गयी एक घड़ी थी। डायलॉग के बारे में तो शायद दावा किया जा सकता है कि वे बिल्कुल ओरिजिनल थे पर कहानी के ताने बाने पर रामकुमार की एक एकांकी जो किसी पाठ्य पुस्तक में पढी थी, बी आर चोपड़ा की वक्त और कभी बचपन में पढी अर्ल स्टेनली गार्डनर की किसी किताब की छाया स्पष्ट थीं। अंततः पटकथा बडी प्रवाहमय और मनोरंजक बन पड़ी हालांकि दो कमियां फिर भी थीं। एक तो स्त्री पात्रों का अभिनय अभी भी लडकों के ही जिम्मे था। दूसरे कहानी का जो अपराध विषयक हिस्सा था, उसकी कुछ बारीकियाँ हो सकता है दर्शकों के एक वर्ग को ठीक से पल्ले न पडीं हों।
अभिनेताओं के नाम ठीक से कुछ याद नहीं। लड्डू भाई , उदय कुमार, मुरलीधर, बिन्नो, अजीत भाई, नवरतन, गौतम इत्यादि के पाठ करने की कुछ स्मृति है। इतना याद है कि उस भाई की केंद्रीय भूमिका में - जो अदालत में जिरह कर के अपने भाई को बचाता है - बबलू उर्फ शान्तनु था। मैंने संवादों में किन्चित आधुनिक और मुहावरेदार भाषाशैली का प्रयास किया था और नायक के लिए उसकी सही समझ और तदनुरूप संवाद अदायगी की क्षमता अनिवार्य थी। बबलू इस कसौटी पर खरा उतरता था।
यह नाटक बहुतों को आज पचीस साल बीत जाने के बाद भी, मनोहर भाई जी के कारण याद है। वे गांव / संघ के सबसे उत्साही और कर्मठ कार्यकर्ताओं में से थे। उन सभी उपक्रमों में जहाँ शरीर के बल की आवश्यकता होती लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक हरावल दस्ते में जगह देते। भोज-भात का मामला होता तो वे अतिरिक्त उत्साह में रहते। उनके बलिष्ठ शरीर और बौद्धिक क्षमताओं में छत्तीस का आंकड़ा था, इसलिए जब भी कुछ बोलते तो कुछ उल्टा या उस्सठ ही बोल जाते। निश्छल हृदय के थे इस में कोई शंका नहीं पर वे हमारे गांव / इलाके की उस परंपरा के ध्वजवाहकों में से एक थे जिसमें अपने भदेसपन को परचम की तरह लहराते चलना एक शान की बात मानी जाती है।
अपने बांगडूपन के बावजूद मेरे स्नेहभाजन रहे हैं। प्रसंगवश हाल में ही उनके पुत्र ने - लड्डू भाई और गुलगुल भाई के पुत्रों के साथ - बैंकों में पी ओ बन कर गांव का गौरव बढाया है।
तो मैंने थोड़ा हास्य उतपन्न करने के खयाल से नाटक में एक प्रसंग डाला था कि दहेजलोभी पिता - जिनकी भूमिका अपने मनोहर भाईजी कर रहे थे -अपने पुत्र के साथ लड़की देखने आये हैं। बस में आये हैं और भीड़भाड़ में दुर्भाग्यवश उनके कुर्ते की एक आस्तीन फट कर अलग हो गयी है।
लड़की के पिता औपचारिक तौर पर पूछते हैं - आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई ? इस पर मनोहर भाईजी को अपने कुर्ते की फटी हुई आस्तीन दिखाते हुए जवाब देना था -- नहीं कुछ खास नहीं। बस मेरे कुर्ते की एक बांह जरा बस में ही रह गयी। वैसे तो मनोहर भाईजी पठन पाठन के प्रति अपनी घनघोर अरुचि के लिये विख्यात थे और लगभग सभी विषयों से बराबर का बैर रखते थे (पता नहीं सच या झूठ पर एक बार अंग्रेजी की परीक्षा में कुंजी से नकल टीपते वक्त see summary page 43 लिखने के कारण किसी खुंखार गुरूजी के द्वारा उनकी हंगामाखेज पिटाई का किस्सा भी आम था)।
लेकिन हो सकता हिंदी व्याकरण के प्रति उनकी अरुचि अपेक्षाकृत सघन किस्म की हो। यह भी संभव है उन्हें पुनरुक्ति अलंकार से कुछ खास बैर हो। जो भी हो, एक ही वाक्य में 'बस' शब्द के दो बार प्रयोग के कारण मनोहर भाईजी की बस बिल्कुल ही पटरी से उतर गयी। रिहर्सल के दौरान वे कभी कहते -- बस जरा बस। कभी - जरा कुर्ते की बस में बांह। कभी - बस जरा कुर्ते की बस में बांह। हालात ये हो गये कि मनोहर भाईजी के खडे होते ही हँसी की फुहारें छूटने लगती और लोग समवेत स्वर में नारे लगाने लगते - बस जरा बस। नतीजा जो होना था वही हुआ अर्थात नाटक के दिन भी मनोहर भाई जी की बस - बस जरा बस के आगे नहीं बढ़ पायी।
भाग 5 - नाटकों के आयोजन का भौतिक पक्ष तो श्रमसाध्य होता ही था। शायद इसी के मद्देनजर किसी ने शायद जोगी दा ने - एक पेशेवर कलाकार का नाम सुझाया जो खुद पूरे साजोसामान और अपने ट्रुप के साथ पेशेवराना तौर पर नाटकों की प्रस्तुति भी करते थे और जहाँ लोग खुद अभिनय आदि कर रहे हों, वहां मंचसज्जा आदि के कलात्मक पक्ष संभालते थे। कलाकार का नाम था छेदीलाल चमरखानी। इस अनगढ नाम और जोगी दा द्वारा की गयी उनकी प्रशस्ति ने हमें उत्सुक कर दिया था। तो अपने किसी मित्र के साथ मैं उनके दर्शनों को उनके कस्बे पुनसिया गया। दर्शन से मन छोटा हो गया। यथा नाम तथा रूप।मैली धोती, टूटही चप्पलें, खुंटही दाढी और मुंह में बीड़ी। खैर बातचीत हुई। वे अगले दिन गाँव आये, पटकथा देखी और फुलवरिया-बैजानी जैसे ख्यातनाम गांव में अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर और हमारे द्वारा किये जा रहे समादर से अभिभूत होकर एक लगभग प्रतीकात्मक दक्षिणा की एवज में सहयोग के लिए तैयार हो गए।
एन शिवरात्रि के दिन दो ट्रकों में लदे अपने लाव लश्कर के साथ चमरखानी जी का पदार्पण हुआ। वे अपने साथ न सिर्फ बांस बल्लम , परदे-कनात, तीर तलवार, मुकुट मोरछल, कपडे-लत्ते बल्कि अपने दल के लिए खाना बनाने के बर्तन भांडे भी लेकर आये थे। उनकी फौज ने फटाफट देखते ही देखते एक विराट मंच तैयार कर दिया जिसकी भव्यता देखते ही बनती थी। उसके बाद उन्होंने जब पात्रों का मेकअप किया जो ऐसा शानदार था कि अभिनेता आईनों में देख कर खुद को नहीं पहचान पा रहे थे। नाटक था छत्रपति शिवाजी। लेखक एक बार फिर श्री चतुर्भुज बी ए और पटकथा मेरी। शायद छोटू उर्फ गंगाधर ने शिवाजी और उदय ने अफजल खान या औरंगजेब की भूमिका की थी - अलबत्ता ठीक ठीक याद नहीं।
चमरखानी जी ने रंगों और रोशनी का ऐसा इंद्रधनुषी संसार रच दिया कि लोग दांतों तले उंगली दबा बैठे। नाटक के क्लाइमैक्स में शिवाजी द्वारा दुर्गा की पूजा का दृश्य था। पहली बार मंच पर अभिनय का मौका एक लडकी को मिला - गुलगुल भाई की बेटी डिम्पल को। उसे करना कुछ नहीं था। बस आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाए खडा रहना था। चमरखानी जी ने उसकी ऐसी ज्योतिर्मयी रूपसज्जा की थी कि लोगों की आंखें चौंधिया गयीं।
इस नाटक से ऐसी धूम मची कि यह फैसला किया कि अगले ही दिन एक और नाटक खेल लिया जाय। चतुर्भुज का ही कोई नाटक चुना गया। पटकथा संवादों में किसी संशोधन का सवाल ही नहीं पैदा होता था, बिना किसी रिहर्सल के सीधे चमरखानी जी की प्राम्पटिंग के सहारे यह नाटक खेला गया। उन्होंने इस नाटक में निर्देशक, कला संयोजक, मेकअप मैन, प्राम्पटर याने पीर बावर्ची भिश्ती खर के सारे कर्तव्य निभाये थे। एक दिन की तैयारी पर खेला गया यह नाटक भी मूलतः अपनी भव्य साज सज्जा के कारण काफी सफल रहा। यद्यपि कहीं न कहीं कलात्मक वैभव के कारण कथ्य के गौण हो जाने से मानो नाटक की आत्मा जाती रही और उसमें वही खोखलापन नजर आया जो अक्सर संजय लीला भंसाली की फिल्मों में नजर आता है। अस्तु। दो दॅ नाटकों की जोरदार सफलता की खुशी में एक सहभोज का आयोजन हुआ जिसमें स्वभाविक ही था कि मुख्य अतिथि होने का सम्मान छेदीलाल चमरखानी जी को मिला। एक विचित्र संयोग रहा कि यह हमारे यहाँ खेला गया आखिरी नाटक सिद्ध हुआ। यह सन् 90 की बात रही होगी। सन् 91 में मेरा तबादला देवघर हो गया और गांव छूट गया। पता नहीं किस संयोग से इसके साथ ही यह लम्बी परंपरा आचानक लगभग बिलावजह खत्म हो गयी।
ऐसे ही मनोरंजक और परिहासपूर्ण प्रसंगों से भरी हुई थी हमारे गांव के नाटकों की अनगढ़ दुनियां जहां कथ्य से ज्यादा भाव और प्रस्तुति से ज्यादा सहभाग अहम था। शायद यह सभी गांवों के नाटकों की साझी कहानी हो। मुझे दूसरे गांवों के नाटक देखने का ज्यादा मौका तो नहीं मिला। एक बार जरूर अपने ननिहाल धुआबै में - जिसकी स्मृतियों का बयान अलग से करूंगा - अपने मित्र और मौसेरे भाई विवेकानंद मिश्र के साथ एक नाटक देखने का अवसर मिला था। किस त्योहार पर वहां ये आयोजन होते थे, भूल गया हूँ। यह याद है कि चुंकि वहाँ ब्राह्मणों की आबादी और वर्चस्व -दोनों हमारे गांव के मुकाबले कमतर थे , तो अन्य जातियों - कुर्मी, यादव और अमात - के युवकों की भागीदारी भी नाटकों में बराबर की थी जिसकी कमी हमारे यहाँ खटकती थी।पर निर्देशन का भार शायद स्थायी रूप से मेरे मामा स्व सीताराम पांडेय ही संभालते थे। मामा और उनके भतीजे और हमारे ममेरे भाई श्री गंगाधर पांडेय - जो उमर में उनसे कुछ बडे ही थे - दोनो गांव से बी ए करने वाले पहले विद्यार्थी थे - तो पूरे प्रांतर में उनका समादर था। मामा की विचक्षण प्रतिभा किंतु किंचित दुखद जीवन की कथा भी अलग से।
तो रामकथा पर आधारित इस नाटक की जो खासियत याद रह गयी है वो यह कि हर अभिनेता घड़ी पहनने के प्रति बडा सजग था। जिसके पास अपनी घड़ी नहीं भी उसने किसी मित्र परिजन से उधार लेकर पहनी थी। फलतः राम दरबार के दृश्य में प्रभु राम और लक्ष्मण के साथ साथ माता सीता और भक्त हनुमान तक घडियों से सुशोभित थे।
एक और मजेदार प्रसंग का जिक्र रह गया। सीता स्वयंवर का दृश्य था। सिंहासन पर महाराज जनक विराजमान। वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि यथास्थान। मुंह लटकाए हुए रावणादि राजागण जो अपना सारा बल-कौशल लगा कर भी शिवधनुष का जो है सो कि कुछ नहीं उखाड़ सके। मैथिली सीता वरमाला लेकर तैयार। नेपथ्य में लक्ष्मण से वाकयुद्ध की तैयारी में चिलम फूंकते परशुराम।
जनक और विश्वामित्र आदि की डायलॉगबाजी के बाद श्रीराम उठे, संकल्प भरे कदमों से वेदी तक गये, शिव की स्तुति में एक कवित्त बोलने के पश्चात धनुष को प्रणाम किया। आगे सीन यह था कि उन्हें एक नाटकीय अदा से धनुष को उठाना था, एक मारक डायलॉग बोलकर उसकी प्रत्यंचा खींचते हुए उसे भंग करना था। धनुषभंग को आसान बनाने के लिए उसे पहले ही दो टुकड़ों में काट कर फिर बीच में टेप या रस्सी के सहारे जोड़ दिया गया था। पर शायद उस जोड में ही कोई तकनीकी खराबी रह गई या फिर रावण द्वारा जबरदस्त जोर आजमाइश के जीवंत अभिनय के क्रम में वह जोड जवाब दे गया। नतीजतन जैसे ही श्रीराम ने धनुष उठाया वह दो टूक होकर बिना प्रत्यंचा खींचे ही उनके हाथ में मरे हुए मुर्गे की तरह लटक गया। धनुष के इस अप्रत्याशित शीलभंग से रंग में भंग हो गया। इसके साथ ही प्रभु राम की मर्यादा भी भंग हो गई और उन्होंने वहीँ मंच पर ही राजा जनक के विरूद्ध , जो बेचारे नाटक के कला निर्देशक भी थे - षड़यंत्र और गबन आदि के आरोप लगा दिए, यह भी खयाल नहीं किया कि वे उनके होने वाले ससुर हैं।
बाबा भी अपने ननिहाल कहलगांव या भागलपुर के किसी नाटक के एक प्रसंग की चर्चा करते थे। महाभारत के द्रौपदी चीरहरण का दृश्य था। जो सुरेश सिंह नामक बालक द्रौपदी बना था उसे गिन कर दस साडियां पहनायी गयी थीं। दुशासन बने जवान को ताकीद कर दी गयी थी कि उसे नौ साडियां खींचनी हैं और दसवीं में जब द्रौपदी जोरदार संघर्ष करेगी तो परास्त होकर गिर जाना है। पर हुआ यह कि गांधारी बना हुआ कलाकार अपनी साड़ी कहीं भूल आया , निर्देशक से बताने की हिम्मत नहीं हुई, कोई दूसरा मिला नहीं तो उसने चिरौरी करके द्रौपदी से उस की आनाकानी के बावजूद एक साड़ी उधार ले ली। कुछ देर बाद पर्दा उठा। निर्देशक खुद धृतराष्ट्र बने मंच पर विराजमान थे और दुशासन जुए में निमग्न था सो द्रौपदी का राज , राज ही रह गया। अंततः धर्मराज अपना राजपाट और अपने भाईयों को हारने के बाद अपनी भार्या को भी द्यूत में हार ही गये और वह क्षण आ गया कि जिसने दुशासन को भारतीय इतिहास का एक अमर खलनायक बना दिया है। दुशासन की भूमिका कर रहा युवक एक खाते पीते सामंती परिवार का , उछलती मांसपेशियों और छलकते जोश वाला गबरू जवान था। उपर से अभिनय का उत्साह और , जैसा कि पाठक अब तक जान ही गये होंगे, भंग का गाढा नशा। उसने द्रौपदी को खींच कर मंच पर लाते वक्त बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया कि वह उसे साडियों की संख्या के बारे में कुछ बताना चाह रहा/रही है और भैया दुर्योधन की ललकार पर बाकायदा चीरहरण का कार्यक्रम शुरू कर दिया। धबरायी हुई द्रौपदी उंचे स्वर में तो अपने सखा कृष्ण को गुहार लगा रही थी और दबे स्वर में दुष्ट दुशासन को यह बताने का प्रयास कि साडियों की पूर्व निर्धारित संख्या में कमी आ गई है। पर फिलवक्त दुशासन उस लोक में पहुंच गया था कि जहां खुद को खुद की खबर नहीं आती। सातवीं साड़ी तक पहुंचते पहुंचते यकायक गांधारी को भी अपने उधार की याद आ गयी। उसकी भूल के कारण उसके ही पुत्र के हाथों वह जघन्य अपराध होने जा रहा है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत की मूलकथा में एन वक्त पर रोक लिया था और जो अनगिनत हिंदी फिल्मों में हीरो ठीक समय पर पहुंच कर रोकते रहे हैं, यह जान कर गांधारी का हृदय हाहाकार कर उठा। शायद इसके परिणामस्वरूप उन्हें निर्देशक महोदय से जो प्रताड़ना मिलने वाली थी इस भय ने भी उन्हें आंदोलित किया हो। जो भी हो, जब वे आचानक बोलने लगीं - ऐसा मत करो पुत्र दुशासन, ऐसा मत करो - तो जनता और निर्देशक, दोनों उलझन में पड गये।इस बीच मामला नवीं साडी तक जा पहुंचा था और दर्शक सांस रोक कर अपनी लाज बचाने के लिए मर्मांतक संघर्ष कर रही द्रौपदी के जीवंत अभिनय को देख रहे थे। पापी दुशासन ने भी ऐसे संघर्ष की अपेक्षा नहीं की थी - वह पटकथा के हिसाब से एक और साड़ी खींचने के लिए प्रतिबद्ध था। तो उसने बल में थोडासा छल मिलाया। हाथ की साड़ी को एक जुम्बिश भर ढील दी - जैसे भ-काटा के पहले पतंग को देते हैं -और फिर झटके से जो खींचा तो पांचाली (उर्फ सुरेश सिंह) जनता के सामने अपने धारीदार अंडरवियर के पूरे ऐश्वर्य में खड़ी हो गई।
इती श्री नाटक कथा !!

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

नाट्याभिनय – शंभू मित्र

बंगला पुस्तक “प्रसंगः नाट्य” में प्रकाशित ख्याति प्राप्त रंगकर्मी शंभू मित्र द्वारा मूलतः बंगला में लिखित इस महत्वपूर्ण अभिनय चिंतन का हिंदी अनुवाद प्रसिद्द रंग-चिन्तक नेमीचन्द्र जैन ने किया था। जो वर्ष 1976 में “नटरंग” के 25वें अंक में प्रकाशित हुआ था। शंभू दा ने रंगाभिनाय से जुडी जिन सवालों को उठाया है उसकी प्रासंगिकता हर काल में है और रहेगी। - माडरेटर मंडली 
आजकल हमारे यहाँ काफी नाटक होने लगें हैं। वर्ष में किसी न किसी समय बड़े समारोह में यात्रा के उत्सव भी होतें हैं। सरकारी समारोह में फ़िल्में खींची जातीं हैं, दिखाई जातीं हैं। इनके अलावा मूकाभिनय, नृत्य-नाट्य, कठपुतली का तमाशा आदि होतें हैं, पानी में भी पोशाक पहनकर तैरते-तैरते नाटक किये जातें हैं। इस तरह की हलचलों से हम अवश्य हीं अनुमान कर सकतें हैं कि देश की नाट्यकला के लिए एक शुभ मुहूर्त आ पहुंचा है, बल्कि कह सकतें हैं कि देश की धमनियों में नाट्य-प्रेम का ज्वर बह चला है।
इस ज्वर में रंगमंच के कुछ लोग, जिन्होंने नाट्य संस्कृति के लिए आत्मनियोग किया था, जिन्होंने देश में एक सार्थक नाटक की नीव रखने के लिए तन-मन-धन से परिश्रम किया था- वे सब लोग आज जैसे कुछ भौंचके से हैं। उन्हें लगता है कि “नव नाट्य आंदोलन”, “प्रगतिशील नाटक”, “आधुनिक रंगमंच”, “सार्थक रंगमंच” – इन सब शब्दों में जैसे कोई अर्थ ही नहीं रहा। मनमाने आचरण से जिस प्रकार ये सब अवधारणाएँ गडमड हो गई है, उसी तरह इनके पीछे का चिंतन भी गडमडा गया है।
वैसे तो यह विषय इतना गरम है कि उसे न छूना ही ठीक होता। मगर रंगकर्मी की हैसियत से मुझे एक बात का कौतुहल होता है कि इस विवाद की जड की चीज़, यानि नाट्य वस्तु क्या है? रंगमंच के परिपेक्ष में विचार करके देखा जाय कि वह कहाँ निहित है। हम देखतें हैं कि यात्रा, नाटक, सिनेमा से शुरू करके मूकाभिनय, गीति-नाट्य, नृत्य-नाटक आदि सभी इसके घेरे में आतें हैं। पर इन सबके बीच सामान्य तत्व क्या हैं?
एक बात तो यह दिखाई देती है कि इन सबमें कलाकार किसी न किसी चरित्र के अनुरूप वेशभूषा पहनकर अंग-भंगिमाओं द्वारा तरह-तरह के भावाभिव्यक्ति करते हैं। तो क्या यह मान लिया जाय कि अपने अलावा कोई दूसरा व्यक्ति होने की कोशिश में ही नाट्य-वस्तु निहित है?
मगर इससे एक और सवाल उठता है। हमारे देश में अभिनय के ऊपर कथावाचन का असर रहा है। इसके अलावा कथावाचन से संवादबहुल वर्णन में काफी नाटकीयता भी है। इसी तरह चारण-गायन में भी गीति-नाट्य की तरह संवादों को गीतों के रूप में रखा जाता है। या वर्णनात्मक नृत्य, जिसमें कलाकार किसी विशेष चरित्र का रूप धारण किये बिना ही नाट्यशास्त्र में वर्णित मुद्राओं द्वारा किसी एक घटना का वर्णन करता है। उसमें क्या नाटक के लक्षण मौजूद नहीं हैं? इस प्रकार यह अवश्य ही कहा जा सकता है कि कथावाचक तरह-तरह की भंगिमाओं द्वारा अनेक घटनाओं का वर्णन करता है, अनेक चरित्रों के संवाद अकेले बोलकर एक तरह का अभिनय ही करता है, इसलिए यह भी नाट्यकला में ही आता है। ठीक। तो फिर उपन्यासकार को ही क्यों छोड़ दिया जाय? कोई यह कह सकता है कि उपन्यासकार तो कथावाचक की तरह बोलकर या गाकर वर्णन नहीं करता, माध्यम केवल लिखित शब्द ही है। मगर नाटककार का लिखा हुआ नाटक भी तो केवल लिखित शब्द ही होता है, क्या वह भी नाट्यकला से बाहर है? सोफोक्लिज़, शेक्सपियर, रविन्द्रनाथ सब बाहर?
यानी कोई और ठीक परिभाषा फिर से बनाना उचित होगा। हम कह सकतें हैं कि अगर मनुष्य अथवा मनुष्य द्वारा बनाई गई पुतली या तस्वीर, लिखित या बोले गए शब्दों द्वारा (जिसमें संगीत भी आ जाता है), या अंग-भंगिमा द्वारा (जिसमें नृत्य भी आ जाता है), एक या एक से अधिक चरित्रों की अभिव्यक्ति करे तो उसे नाट्यकला कहा जा सकता है।
पर अभी एक बात रह गई। कोई अगर पूछे कि नाटक में रेलगाड़ी या बाढ़ का दृश्य दिखाया जाय तो क्या वो सब काम भी नाट्यकला में शामिल नहीं? मगर इसमें तो न कोई शब्द है, न संवाद है, न कोई अंग-भंगिमा है। फिर भी इसमें कोई ऐसी अच्छी लगनेवाली चीज़ ज़रूर होती है, जिससे दर्शक खुश होकर तालियाँ बजता है और पैसा वसूल हो गया समझकर खुश होता है। क्या यह भी नाट्यकला है? या फिल्म में यही चीज़ दिखाई जाय तो क्या यह प्रशंसा के योग्य है? इसी के साथ-साथ यह सवाल भी उठा सकतें हैं कि किसी नाटकीय क्षण में पार्श्व संगीत का कोई छोटा सा टुकड़ा या किसी गीत की कड़ी किसी गहरी भावना की सृष्टि करे, तो क्या उन्हें भी नाट्यकला में शामिल करना चाहिए? यानी आम तौर पर हम सभी जानतें हैं कि संगीत एक अलग कला है, मगर प्रदर्शन में संगीत के उस टुकड़े का क्या स्थान है?
इतने तरह के तर्क-वितर्क से भ्रम पैदा होना अनिवार्य है। इसलिए फिर एक बार, नए सिरे से, नाट्यकला की परिभाषा बनानी चाहिए। जैसे नववधू जब तरह-तरह के गहनों और लाल साड़ी में सारा शरीर ढंककर अपने पति के पास जाती है, तो पति उन गहनों या वस्त्रों को दुलहिन समझाने की भूल नहीं करता। वे सब चीज़ें तो दुलहिन की सजावट मात्र है। नववधू की सजावट अवश्य होती है, इस सब सजावट के बिना भी वह नववधू ही रहती है। प्रकाश, मंच-सज्जा, पार्श्व-संगीत, दृश्य-पट – ये सब नाटक में हों, या विशेष परिस्थितिओं में नहीं भी हों, उससे कुछ नहीं आता-जाता। ठीक उसी तरह जैसे गंघर्व विवाह में दुलहिन के विशेष वस्त्र भी नहीं होते, सोने के गहने भी नहीं होते, पर उससे शकुंतला का विवाह झूठा नहीं हो गया।
मगर फिर भी यह प्रश्न रह ही गया कि नाट्य-वस्तु कहाँ है, और कहाँ से उसकी सजावट की शुरुआत होती है। प्रकाश, मंच-सज्जा, दृश्य-पट आदि को छोड़ते-छोड़ते तो फिर अभिनेताओं को भी छोड़ा जा सकता है। जैसे, यह भी तो कहा जा सकता है कि हम बहुत दिनों से शेक्सपियर के नाटक पढ़कर मुग्ध होते रहें हैं। यानी नाट्यकला इन नाटकों के लिखने पर पूरी हो गई। बाद में उन्हें मंच पर प्रस्तुत किया गया या नहीं, यह हम में से बहुतों के लिए अप्रासंगिक ही है, क्योंकि मंच का प्रस्तुतिकरण तो शेक्सपियर की अपूर्व कलाकीर्ति की सजावट मात्र है। यह बात तो बहुतों को कहते सुना है कि अलग-अलग लोग जब अलग-अलग चरित्र सजकर मंच पर उसकी भावनाओं का अभिनय करतें हैं, तो नाटक को समझने और अनुभव करने मन आसानी होती है और केवल यही मंच-प्रस्तुतिकरण की विशेष उपयोगिता है। मगर बच्चों की किताब में बात को बाल-सुलभ बनाने के लिए पन्ने-पन्ने पर बहुत सी तस्वीरें होतीं हैं। नाट्य-प्रदर्शन क्या उसी तरह का, बच्चों को समझाने के लिए किया जाने वाला प्रयत्न भर है। क्या यह केवल इसलिए किया जाता है कि जिनमें साहित्य को पढ़कर रसोपलब्धि की क्षमता नहीं है वे प्रदर्शन द्वारा उसे उपलब्ध कर सकें? तो फिर इसे कला कहते ही क्यों हैं?
तो फिर नाटक की मूल सत्ता कहाँ है? अगर कहें कि सिर्फ नाटक में ही है तो लगेगा कि वह साहित्य में है, यानी उसकी अलग कोई सत्ता नहीं है। अगर कहें कि सिर्फ नाटक में ही है, तो लगेगा कि वह साहित्य में है, यानि उसकी अलग कोई सत्ता नहीं है। और कहें कि नाटक नहीं अभिनय में ही नाट्य का प्राण है, तो वो भी अवास्तविक जान पड़ता है। मगर इसी बुनियादी प्रश्न के बारे में हमारे मन में स्पष्टता न होने के कारण ही हमारी नाट्य-समालोचना इतनी कमज़ोर है। नाट्य-समीक्षा करते समय आलोचना होती है मुख्यतः नाटक की, नाटक की कहानी की। बस अंत में इतना जोड़ दिया जाता है कि ‘अभिनय उपयुक्त ही था’। मगर किसके उपयुक्त? कहानी के? अभिनय के माध्यम से कहानी ही तो अभिव्यक्त होती है। इसलिए क्या दो फ़ीट ऊँची दीवार के ऊपर दो फ़ीट कि छत उपयुक्त होगी? पर क्या कोई पता लगता है कि सहारा देकर छत को कितना ऊपर उठाया गया है।     

------ क्रमशः 

शुक्रवार, 15 जून 2012

उदय की बेला में हिंदी रंगमंच और नाटक : जगदीश चन्द्र माथुर

यह महत्वपूर्ण निबंध जगदीश चन्द्र माथुर ने सन 1950 ई. में पटना कालेज साहित्य परिषद् के लिए लिखा था। आज़ादी या सत्ता परिवर्तन/हस्तांतरण के बाद का यह काल भारतीय इतिहास में पुनर्निर्माण का काल के रूप में विख्यात है। अपने इस निबंध में माथुर जी ने जिन आशंकाओं से आगाह करना चाह था आज वो हमारे सम्मुख मुंह खोले बड़ी शान से खड़ी हैं। माथुर जी की आशंकाओं पर अगर वक्त रहते ध्यान दिया गया होता तो आज हमारे मुल्क की कला, संस्कृति और रंगमंच की शायद ये दुर्दशा ना हुई होती  - माडरेटर मंडली .

भारतीय रंगमंच और नाटक के पारस्परिक सम्बन्ध और विकास की चर्चा करते हुए मैंने पहले भी यह मत प्रकट किया था कि सिनेमा के प्रचंड वैभव के बावजूद हमारे रंगमंच का पुनरुथान अवश्यम्भावी है, क्योंकि सिनेमा मनोरंजन की चाहत को पूरा करता है, परन्तु संस्कारों के भार से दबी और भूली-सी अभिनयात्मक आदिम प्रवृति को पूरा-पूरा मौका नहीं देता है और न दर्शकों को अभिनेताओं के मायावी लोक में अपनी हस्ती खो देने का निमंत्रण देता है। सिनेमा का पर्दे पर चलती-फिरती और जादूगरी से बोलनेवाली मुर्तियों से प्रदर्शन के समय रागात्मक सम्बन्ध स्थापित होना उतना ही दूभर है, जितना किसी स्वप्न-सुंदरी से नाता जुडना।
किन्तु कौन सा वह रंगमंच होगा और कैसी वह नाट्यशैली, जो आधुनिक मनोरंजन के अपूर्व साधनों से लोहा लिए बिना फिर से हमारे समाज में उपयुक्त स्थान पा सकें।
यदि हिंदी में राष्ट्रीय रंगमंच के उदय से तात्पर्य है अभिनय के नियम, रंगशाला की बनावट, प्रदर्शन की विधि, इन सभी के लिए एक सर्वस्वीकृत परम्परा और शैली की अवतारणा होना, तो ऐसे रंगमंच का अस्त भी शीघ्र ही होगा। राष्ट्रीय रंगमंच की धारणा के पीछे राजनितिक ऐक्य के लक्ष का आग्रह है। गुलामी के बादलों में से उगते हुए समाज की प्रत्येक चेष्टा में राजनितिक विचारों का प्रभाव हो, यह स्वाभाविक ही है। दुनियां में जहाँ कहीं राष्ट्र निर्माण की ओर मानव-समाज झुका वहीं निर्माण के प्रत्येक क्षेत्र पर राजनितिक विचारधारा ने आसान जा फैलाया। एक भाषा, एक राष्ट्र, एक शिक्षा-प्रणाली और एक संस्कृति का नारा विभिन्न देशों और विभिन्न युगों में उठाया जा चुका है और आज भारत में भी इसकी गूंज है; किन्तु और क्षेत्रों में इसका जो भी फल हो, सांस्कृतिक विकास के लिए यह सौदा प्रायः महंगा ही बैठता है। अठारहवीं सदी के अंत में जर्मनी, जो उस समय तक विश्रृंखल रियासतों का समूह मात्र थी, अपने आधुनिक राष्ट्रीय एकता के आदर्श की ओर तीब्र गति से अग्रसर हो रही थी। तभी एक जर्मन संस्कृति के नाम पर जर्मन राष्ट्रीय रंगमंच के निर्माण में तत्कालीन जर्मन नेताओं ने उग्र कट्टरता के साथ हाथ लगाया। परिणामतः रंगमंच की एकांगी उन्नति तो हुई, किन्तु साथ ही जर्मन का पुरातन दरबारी रंगमंच, जिसकी समृद्दि में विभिन्न वर्गों के पारस्परिक संबंधों की छटा प्रफुटित हुई थी, मटियामेट हो गई। उससे भी अधिक हानी हुई घुमती-फिरती नाटक-मंडलीयों के ह्रास के कारण। इन घुमंतू अभिनेताओं के माध्यम से जर्मनी की साधारण जनता बोलती थी। उसके स्थान पर राष्ट्रीय एकता से अभिप्रेरित, एक विशिष्ट शैली के रंगमंच की स्थापना हुई और वही शैली जर्मन के विभिन्न नगरों में प्रचलित होती गई।
मुझे आशंका है की कहीं वैसी ही भूल हम लोग भी अपनी आज़ादी के उषा:काल में न कर बैठे। स्वाधीन भारत को राजनीतिक एकता की ज़रूरत है किन्तु भारतीय संस्कृति के लिए विविधता अपेक्षणीय है। जो एक के लिए अमृत है दूसरे के लिए विष। जिन बादलों को बरसकर धरती को अन्न देना है, वे एक रंग के हों, इसी में कल्याण है, पर जो सूर्य की किरणों से ज्योतित हो हमारी सौंदर्याभिलाशिणी आत्मा को तृप्त करें, ऐसे बादलों को तो सतरंगी ही होना है।
अतः राजनीतिक दृष्टिकोण से राष्ट्रीय रंगमंच की रूप-रेखा निश्चित नहीं की जा सकती, नहीं की जानी चाहिये। यह कहा जा सकता है कि अठारहवीं सदी के जर्मन में रंगमंच की विविध जीवित परम्पराएं थीं, किन्तु हमारे यहाँ तो साफ मैदान है, जैसी चाहें इमारत तैयार कर लें, कुछ नष्ट करने का डर नहीं। किन्तु यह भूल है। इसी भूल के कारण भारतीय समाज और साहित्य की वर्तमान शुष्क बलुकाराशि के नीचे जो अन्तः सलिला धारा बहती रही है, उसमें डूबकी लगाये बगैर ही पिछले पच्चीस-तीस बरसों के हिंदी-नाटककार, प्रतिभा और प्रयास के होते हुए भी, जीवंत नाट्य-साहित्य तैयार नहीं कर सके। एक शौकीनी (एमेचार) रंगमंच की स्थापना अवश्य हुई, सो भी प्रसादोतर काल में। यह रंगमंच गतिशील है, स्वास्थ्य है और समाज के एक वर्ग-विशेष की अनिवार्य मांग की पूर्ति करता है। इसलिए इसका भविष्य उज्जवल है। एमेचर रंगमंच पाश्चात्य साहित्य के संसर्ग से उद्भूत नाटकीय प्रेरणा की अभिव्यक्ति है और इसके द्वारा एक नई परम्परा की प्रतिष्ठा हुई है, जिसे हमें कायम रखना है।
किन्तु जैसा कि हमने ऊपर कहा है, हमें विस्मृत परम्पराओं की धाराओं की तोह भी लेनी है और उनके लिए मार्ग प्रशस्त करने में ही हमारा सांस्कृतिक नवनिर्माण सफल हो सकेगा। एक अन्तः सलिला धारा थी संस्कृत नाट्य-साहित्य में परिलक्षित रंगमंच की, ऐसा रंगमंच जो अपने उत्कर्ष-काल में एक अनुपम सामंजस्यपूर्ण संस्कृति का परिचायक था, जिसके विभिन्न अंगों के संतुलन में नागरिक जीवन की सर्वान्गीकता सन्निहित थी और जिसके प्रतिबंधों में शताब्दियों के अनुभव से अर्जित ज्ञान का निमंत्रण। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस परम्परा को उबारा सदियों के बाद। उनकी प्रतिभा की प्रचंड किरणों ने विस्मृति के अभेद्द कारा को खंडित किया और वसंत के लुभावने समीरण के स्पर्श से हिंदी रंगमंच जाग उठा।
भारतेंदु द्वारा प्रतिष्ठित धारा का आगमन हिंदी-साहित्य के आधुनिक इतिहास में एक महान दुर्घटना थी। क्यों ऐसा हुआ, इसकी भी अपनी कहानी है, जिसकी ओर हिंदी साहित्यकार का ध्यान आना चाहिए। यहाँ संकेत के तौर पर इतना कहना काफी होगा कि विचारक्षेत्र में उत्तर-प्रदेश के आर्यसमाजी सुधारवादी सिद्धांत, सामाजिक क्षेत्र में हिंदी भाषी प्रान्तों के उच्चवर्गीय नेताओं की संस्कृति शून्यता, राजनितिक क्षेत्र में स्वतंत्रता-युद्ध के परिणामस्वरूप आदर्शवादी निग्रह ( Puritanism ) की भावना और भाषा के क्षेत्र में द्विवेदी जी के नेतृत्व में शुद्धता और इति-वृतात्मक अभिव्यंजना का आंदोलन, सभी किसी ना किसी रूप अथवा परिस्थिति में भारतेंदु की रस-प्रवाहिन निर्झरणी के लिए मरुस्थलतुल्य प्राणान्तक सिद्ध हुए। इस तरह हिंदी रंगमंच के उत्थान का प्रथम प्रयास, जिसका प्राचीन संस्कृत रंगमंच से लगाव था, अधूरा ही राह गया। बाद में जो नया दौर चला, उसकी प्रेरणा कहीं और से ही आई, और प्रसाद जी के नाटक तो एक कल्पनाजन्य रंगमंच को आधार मानकर प्रणीत हुआ।
क्या अब पुनः उस अधूरे यज्ञ की परिणति हो सकती है ? क्या उसकी आवश्यकता भी है इस युद्धोतर जनवादी युग में ? मैं कहूँगा, हाँ। संस्कृत नाटक की परंपरा नूतन हिंदी रंगमंच के बहुमुखी विकास की एक प्रधान शैली के बीच विधमान है।
यदि पाश्चात्य यथार्थवादी रंगमंच से प्रभावित हो हमारे स्कूल, कालेजों और क्लबों द्वारा एमेचर रंगमंच की अभिवृद्धि होगी, तो प्राचीन संस्कृत पद्धति का आधार ले और बैले इत्यादि के साधनों से संपन्न हो एक नागरिक (Urban) और व्यावसायिक (Professional) रंगमंच भी हमारे नगरों में प्रस्तुत हो सकता है। ऐसे रंगमंच के लिए संस्कृत रंगमंच की कमनीयता, इसका सुरम्य वातावरण वांछनीय है; रंगशाला की सजावट, उसके विभिन्न अंगों का वितरण, संगीत और नृत्य का प्रचुर प्रयोग, इन सभी विषयों में संस्कृत रंगमंच की विशिष्ट धरोहर है। सिनेमा और चिताकर्षण नृत्य-प्रदर्शन के इस युग में कोई भी व्यावसायिक और नागरिक रंगमंच जीवन को यथातथ्य प्रतिविम्बित करनेवाले दृश्यों के सहारे नहीं पनप सकता; किन्तु हृदयग्राही और नयनाभिराम होने के लिए हिंदी रंगमंच को पारसी थियेटर के कृत्रिम साधनों का सहारा नहीं लेना है और न आधुनिक पाश्चात्य नाट्यकलाओं की प्रतीकवादी पृष्ठभूमि का दामन पकडना है। हम संस्कृत रंगमंच की ललित रंगपीठ, सरस स्वाभाविकता और शास्त्रोगत मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं से भरे-पुरे अभिनय को सहज ही अपना सकतें हैं। अभी तक श्री पृथ्वी राज कपूर द्वारा प्रस्तुत किये गए नाटकों को देखने का मुझे अवसर नहीं मिला है, लेकिन यदि मुंबई में ये संस्कृत नृत्यशालाओं, वस्त्राभूषणों और अभिनय कला की कुल विशेषताओं को अपने थिएटर में, प्रयोग रूप में ही सही, चालू करें, तो मेरा विश्वास है कि वे रुचिपरिमार्जन के साथ-साथ आभिजात्यवर्ग के नागरिकों का यथेष्ट मनोरंजन भी कर सकेंगें। ऐसा रंगमंच व्यावसायिक दृष्टि से असफल नहीं हो सकता ; क्योंकि उसमें ‘ओपेरा’ के गति-प्रधान वातावरण और रमणीयता और सिनेमा की तीव्र गतिशीलता और नाटकीयता का अलम्य सम्मिश्रण होगा। मुख्यतः यह रंगमंच नगरों और उत्सवों तक ही सीमित रह सकेगा।
राष्ट्रीय रंगमंच का तीसरा और शायद सब से महत्वपूर्ण अंग होंगी देहाती नाट्य मंडलियां। पिछले दिनों लोगों का ध्यान जनता के विचारों और व्यक्तित्व को प्रभावित करनवाले इस अचूक साधन की ओर गया है और कम्युनिस्ट पार्टी ने तो अपने पीपुल्स थियेटर द्वारा आरम्भ के दिनों में निस्संदेह कला का यथेष्ट कल्याण किया है ; किन्तु कम्युनिस्ट कलाकारों को सिद्धांत की वेदी पर बेदर्दी के साथ सौंदर्य का बलिदान करना पडता है और इसलिए निकट भविष्य में तो पीपुल्स थियेटर राष्ट्रीय रंगमंच को शायद ही समृद्द कर सके। दूसरे, यद्दपि पूर्वी बंगाल, तेलांगना और पश्चिमी मालावार के कुछ हिस्से मं कम्युनिस्ट मंडलियों को देहाती अभिनेताओं और गायकों इत्यादि का सहयोग अंशतः मिल सका, तथापि हिंदी भाषी प्रदेशों में ये मंडलियां प्रायः पढ़े-लिखे मध्यर्गीय उग्र विचारवान प्रतिभाशाली और उत्साही नवयुवाओं की बानगी बनकर ही रह गईं। ये मध्यवर्गीय नवयुवक, जिन्होंने शहरों में रहकर, पाश्चात्य विद्वानों की पुस्तकों के आधार पर अपनी विचार शैली निर्धारित की थी, अपने प्रगतिशील सिद्धांतों की खातिर ऐसा जान पडता था, देहाती पोषक पहन लेते थे। उन्होने पढ़ा कि रूस में जनता का नाटक पार्टी की प्रेरणा से खूब पनपा। इसलिए यहाँ भी, उन्होंने देहाती नाम, देहाती समस्याओं और देहाती पोशाक का सहारा ले, मिली जुली देहाती भाषा में बड़े शहरों में और कहीं-कहीं गांव में भी अपने सिद्धांत का प्रचार शुरू कर दिया। थोड़े दिन तो यह चीज़ खूब चमकी ; किन्तु आकाश की जिस धारा ने धरती के नीचे प्रवाहित होनेवाले सोतों से नाता जोड़ा, वह तो ऊपर-ऊपर ही होकर ढाल जाती है। कम्युनिस्ट रंगमंच ने वस्तुतः बिहार, उतरप्रदेश और मध्यप्रदेश में, देहातों में प्रचलित और लोकप्रिय अभिनय-प्रणालियों से सम्बन्ध स्थापित नहीं किया और न इन देहातों में जौहर दिखलानेवाले अशिक्षित या अर्धशिक्षित अभिनेताओं और गायकों को अपनाया। उन्होंने उन प्रणालियों अथवा पद्दतियों का अंशतः अनुकरण तो किया, लेकिन चालू प्रणालियों से सीधा सम्बन्ध नहीं जोड़ा। शायद उसमें उन्हें ह्रासोन्मुख (Decadent) संस्कृति के चिन्ह दीखे।
वस्तुतः हमें रंगमंच के इस विशाल क्षेत्र को उर्वरक बनाने के लिए उस लोक रूचि की मांग को समझाना होगा, जिसके सहारे अब भी इतनी नौटंकी पार्टियां और मंडलियां जीती रही है। छः-सात वर्ष हुए बिहार के साधारण से ग्राम में दौरा करते समय मुझे उस गांव की ही एक मंडली द्वारा प्रस्तुत किया गया नाटक देखने का अवसर मिला। ठठ-के-ठठ स्त्री पुरुष जमा थे। स्टेज के नाम पर एक चौकी। एक ढोलकवाला था। अभिनेता कुल चार या पांच। दर्शक तीन तरफ। न कोई पर्दा न कोई विशेष सजावट। नाटक का नाम था ‘जालिम सिंह’ जो उत्तरी बिहार में खासा प्रसिद्ध है। अभिनय में कोई विशेष कला नहीं थी। कहानी अच्छी होते हुए भी, उसमें कई अश्लील अंश थे। लेकिन मुझे ऐसा लगा, जैसे उस नाटक के खेलनेवालों और चारों ओर उमड़नेवाली जनता में एक संशयहीन आत्मीयता हो, जिसका मैं एक अंग नहीं बन सका। उसके बाद बिहार और पूर्वी उतर प्रदेश के भोजपुरी इलाके के लोकप्रिय कलाकार भिखारी ठाकुर के विषय में बहुत कुछ सुनकर और उनके ‘बिदेसिया’ के नाम पर जुट पड़नेवाली जनता की मनोवृति का अध्ययन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि देहाती रंगमंच उन आदिम अभिनयात्मक इच्छाओं की अभिव्यंजना है, जिसके बल पर ही सिनेमा के तीव्र प्रचार के बावजूद रंगमंच अपना अस्तित्व कायम रख सकता है।
देहाती रंगमंच की बुनियाद में अभिनेता और दर्शक के बीच वही तदात्मीयता (Mutual understanding) है, जिसका ज़िक्र मैं ऊपर कर आया हूँ। यह तभी संभव हो सकता है, जब नाटक-मंडली के अभिनेता और प्रबंधक देहाती जनता की रूचि, इच्छा और मांग का अध्ययन करें। उसकी तथाकथित अश्लीलता या बेरोक रसानुभूति से नाक-भौं न सिकोडें और उच्च स्तर से आविभूर्त होनेवाले उपदेशकों की भांति, नीति अथवा उद्धार की झड़ी न लगाएं और न आर्थिक शोषण का जड़ोंउन्मूलन करने के लिए जनता को भावोद्वेलित करने की आशा करें। यह तो प्रधानतः मनोरंजन का क्षेत्र है। इसे परिमार्जित करने का एक ही मार्ग है, यानि जो मनोरंजन भौंडा है उसे सुन्दर, कलापूर्ण और स्वस्थ बनाया जाये। उदाहरणतः इन नाटकों में रंगमंच की सजावट में ग्रामीण कला को अवसर दिया जाये। चटाइयों पर गेरू से सुन्दर डिज़ाइन बनाकर मंच के उपपीठ पर लटकाएं जाएँ। गांव की स्त्रियां अल्पना अंकित करें। भद्दे शहरी पर्दों के स्थान पर बैक-ग्राउंड में जंगली पत्तियों और फूलों की लड़ियाँ टांगी जय। गाने बजने की बहुलता रहे। हारमोनियम के स्थान पर सारंगी, और तबले के स्थान पर ढोलक हो। चूँकि पर्दे की गुंजाईश तो वहाँ होती नहीं है, इसलिए दृश्य परिवर्तन और नाटक में धारा-प्रवाह को जारी रखने के लिए एक सूत्रधार रहे। वह अच्छा गायक और हाज़िर जबाब होना चहिये। संस्कृत नाटकों में तो सूत्रधार प्रस्तावना के बाद गायक हो जाता था। लेकिन आधुनिक देहाती रंगमंच में उसकी बराबर ज़रूरत पड़ेगी और उसका काम लगभग वही होगा, जो यूनानी नाटकों में कोरस द्वारा संपन्न होता था, यानि नाटक और दर्शकों के बीच सूत्र कायम रखना। स्थान-स्थान पर नाटक के कथानक के प्रति उत्सुकता जागृत रखने के लिए, वह टिपण्णी देगा, अभिनेताओं को कपड़े बदलने का समय देने के लिए, दर्शकों का मनोरंजन करेगा और नाटक के भावुक स्थानों पर भावावेग के अनुकूल गीत सुनाकर उसी प्रकार नाटकीय संवेदना का संवर्धन करेगा, जैसे आधुनिक सिनेमा और रेडियो-रूपक में पार्श्व संगीत।
अभिनेता, जहाँ तक हो सके, देहात में से ही लिए जायं, यद्दपि सूत्रधार का आधुनिक संस्कृति और ज्ञानराशि से परिचित होना आवश्यक है। मैंने ग्रामीण जनता के सभी वर्गों में कुशल अभिनेता की दक्षता रखने वाले व्यक्तिओं को पाया है। थोड़ी ट्रेनिंग से उनकी योग्यता निखर जायेगी, इसमे कोई संदेह नहीं। देहाती नृत्य और सम्मिलित संगीत, उस रंगमंच के महत्वपूर्ण अंग रहेंगें। हर प्रदेश के अपने-अपने जन नृत्य हैं, जिनका बड़े-बड़े नगरों की आत्याधुनिक रंगशालाओं में नए फैशन के युवक-युवतियों द्वारा शौकीनी प्रदर्शन पिछले दिनों खूब किया गया है। लेकिन ठेठ देहात में, जहाँ की यह चीज़ है, नैसर्गिक वातावरण में, देहाती युवक-युवतियों को ही अपने रंगमंच पर प्रदर्शन करने के लिए कहाँ तक उत्साहित और संगठित किया जा रहा है, इसमें मुझे बहुत कुछ संदेह है।
देहाती रंगमंच का संगठित रूप क्या है और उनकी अन्य क्या विशेषताएँ होनी चाहिये, इस विषय पर सविस्तार भविष्य में लिखूंगा। क्योंकि इस क्षेत्र में कुछ क्रियात्मक अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद ही मुझे विचार प्रकट करने का पूर्ण अधिकार हो सकता है। पिछले छः वर्षों से वार्षिक वैशाली महोत्सव के अवसर पर मैं इस ढंग के देहाती रंगमंच की कल्पना को कार्यरूप में परिणत करने की चेष्टा करता रहा हूँ। कुछ सफलता भी मिली है, क्योंकि वैशाली तो एक गांव ही है, रेलवे स्टेशन से २३ मील दूर और चाहने पर भी वहाँ नगर के साधन उपलब्ध नहीं हो सकते। ग्रामीण अभिनेता, ग्रामीण दर्शक, ग्रामीण उपादान सभी मिल जातें हैं। निर्देशन हम लोगों का होता है और विशेषतः सजावट का निर्देशन उपेन्द्र महारथी का। फिर भी कार्यक्रम में कॉलेज के नवयुवकों द्वारा प्रस्तुत नाटक शामिल करने ही पडतें हैं।
इस वर्ष से बिहार में सरकार की ओर से सांस्कृतिक चेतना सम्बन्धी योजना में हमलोगों ने देहाती रंगमंच के विकास के उद्द्येश से मोद-मंडलियों की स्थापना की है। योजना सरकारी है और इसलिए उसकी गति गजगामिनी की-सी है। स्वरुप भी वैसा हो तो शिकायत की गुंजाईश न रहेगी किन्तु सांस्कृतिक क्षेत्र में निश्चित रूप से यह पहला सरकारी कदम है और फूंक-फूंक कर उठाया जा रहा है। लोगों को भी यकीन नहीं होता कि इसके पीछे कोई और तो चाल नहीं है। यदि यह तजुर्बा अंशतः भी सफल हुआ तो मैं एक या दो वर्ष बाद इसकी पूरी कथा हिंदी पाठकों के सामने रखूँगा।
ऊपर के विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आज दिन हिंदी भाषा-भाषी प्रदेशों में राष्ट्रीय रंगमंच का क्रमिक निर्माण तीन पहलुओं में हो रहा है। मेरे विचार से इन्हीं तीन शैलियों में भावी हिंदी रंगमंच की रूप-रेखा सन्निहित है, यानि १. यथार्थवादी, एमेचर ( शौकीनी ) रंगमंच, २. प्राचीन नाट्य परम्परा से प्रेरित किन्तु आधुनिक व्यावसायिक साधनों से संपन्न नागरिक ( Urban ) रंगमंच और ३. परिमार्जित और संशोधित रूप में देहाती रंगमंच। यदि हमारे उदिमान नाटककार और उत्साही निर्देशक और अभिनेता इन प्रवृतियों को नज़र में रखते हुए अपनी कार्य प्रणाली निर्धारित करें, तो बहुत- सी बेकार मेहनत बच जाये और हिंदी राष्ट्रीय रंगमंच और नाट्य साहित्य की वास्तविक उन्नति हो।
क्रमशः
इससे पहले कि इन प्रवृतियों के अनुकूल नाट्य-साहित्य की आवश्यकताओं की ओर मैं इशारा करूँ, यह ज़रुरी है कि हमारे रंगमंच के पुनर्निर्माण काल की दो प्रबल शक्तिओं यानि सिनेमा और रेडियो का जो प्रभाव इन तीन धाराओं पर पड़ रहा है, या पड़ सकता है, उसका भी कुछ अंदाज़ा लगा लिया जय। सिनेमा को मैं रंगमंच का घटक मानाने को तैयार नहीं। मेरे विचार मैं तो सिनेमा ने रंगमंच के पुनरुत्थान का लिए अनुकूल वातावरण पैदा किया है। सदियों से भारतवर्ष की जनता नाट्य और अभिनयकला की ओर से उदासीन हो चली थी। लोक रूचि पर काई जम गई थी और उच्च सांस्कृतिक क्षेत्र में अभिनय और नृत्य- प्रदर्शन का कोई स्थान ही नहीं रह गया था। सिनेमा ने उस काई को काटकर फेंक दिया और देखते ही देखते अभिनय और कलात्मक प्रदर्शन हमारे सामाजिक जीवन का एक प्रधान अंग बन गए।
यह सच है कि सिनेमा की लोकप्रियता ने पारसी थियेटर को नष्ट कर दिया, लेकिन उसके विनाश का कारण सिनेमा के आधुनिक मशीन युग के साधन ही नहीं थे, बल्कि अभिनय कला का एक नवीन दृष्टिकोण भी। सिनेमा ने जब यह दिखाया कि यथार्थ जीवन में जैसी बातचीत, जैसा व्यवहार, जैसी भाव-भंगिमा होती है, वैसी ही नाटकों में भी प्रदर्शित की जा  सकती है, तो पारसी थियेटर के जोशीले भाषण, फड़कती हुई शेरों और तमक कर बोलने की परिपाटी अपना सारा आकर्षण खो बैठे। “चन्द्रकान्ता सन्तति” के तिलिस्म को जैसे प्रेमचंद के यथार्थवादी उपन्यासों ने ढाह दिया, ऐसे ही सिनेमा ने पारसी थियेटर के शीशमहल को खंडहर बना दिया। नतीजा यह हुआ कि जब इब्सन, शा, गाल्वार्दी इत्यादि से प्रेरित होकर उत्तर भारत के कुछ नगरों में एमेचर रंगमंच का आविर्भाव हुआ, ती सिनेमा के उदाहरण ने उसके यथार्थ के लिए दर्शक को तैयार कर दिया। एकांकी की उन्नति में सिनेमा का कितना ज़बरदस्त हाथ रहा है, इस पर शायद एकांकी-लेखकों ने भी विचार नहीं किया। भारतवर्ष में बोलते सिनेमा के प्रचार से पूर्व यदि यथार्थवादी, विशेषतः सामाजिक नाटक लिखे जाते, तो उनको रंगमंच पर उतरना शायद असंभव हो जाता। रंगमंच पर दैनिक जीवन का यथातथ्य प्रदर्शन हो, इसकी कल्पना भी दर्शक समाज नहीं कर सकता था। लोकरुचि में इतनी बड़ी क्रांति करके सिनेमा ने स्वाभाविक अभिनय की कला को रंगमंच पर ला बैठाया। तो क्या यथार्थवादी एमेचर रंगमंच को ही सिनेमा कुछ दे सका है ? यदि हिंदी राष्ट्रीय रंगमंच के उत्थान में सिनेमा की केवल इतनी हीं उपयोगिता रहती, तो उसका कोई स्थाई मूल्य नहीं होता, क्योंकि कोई भी यथार्थवादी रंगमंच, कम से कम भारतवर्ष में, जीवन के यथातथ्य चित्रण में सिनेमा से बाजी नहीं ले सकता। लेकिन मैं ऊपर कह आया हूँ कि हिंदी रंगमंच की तीन धाराओं में से एक यानि नागरिक, व्यवसायिक रंगमंच यथार्थवादी नहीं होगी। उसकी विशेषताएँ होगी काव्य-सुलभ रसानुभूति से परिपूर्ण वातावरण, मर्मस्पर्शी और सहज स्वाभाविकता एवं शाश्त्रोक्त मुद्राओं से संपन्न अभिनय और नृत्य, संगीत और नयनाभिराम दृश्यों से अलंकृत प्रदर्शन ( Spectacle )। ये विशेषताएँ नागरिक रंगमंच को ना सिर्फ संस्कृत रंगमंच से मिलेंगीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की उस नवीन शैली से भी, जिनके उदाहरण के तौर पर विद्यापति, वसंतसेना, नर्तकी, रामराज्य, पुकार और अनेक पौराणिक फिल्मों का नाम लिया जा सकता है। प्रकाश और अंधकार का समुचित व्यवहार संवेदन के संवर्धन में कैसे किया जा सकता है , भावोद्रेक जताने के लिए क्योंकर संवाद में गति लाई जा सकती है, गीत और नृत्य कैसे स्थलों में प्रभावोत्पादक हो सकतें हैं, इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर सिनेमा की इस नई शैली ने प्रचुर प्रयोग किये हैं, नागरिक रंगमंच जिससे यथेष्ट लाभ उठायेगा।
अतः यदि भारतीय सिनेमा को भावी हिंदी राष्ट्रीय रंगमंच की प्रयोगशाला कहा जाय, तो कोई भी अतियुक्ति नहीं होगी। रेडियो की छाप भी उस पर निश्चय हीं रह जायेगी। हिंदी साहित्य का इतिहास मुक्त कंठ से ये यह स्वीकार करेगा कि आल इंडिया रेडियो ने हिंदी में नाट्य रचना को फिर से सार्थकता प्रदान की। उसने ना सिर्फ नए रुपककारों को प्रकाश में ला बैठाया, बल्कि पुरानी कृतियों के लिए भी एक नवीन क्षेत्र प्रस्तुत कर दिया। उसने एक नई मांग पेश की, जिसके जबाब में हिंदी लेखक को अपनी कलम साहित्य के इस विस्तृत क्षेत्र में चलानी पड़ रही है। इसके अतिरिक्त रेडियो-रूपक की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जिन्हें रंगमंच के लिए नूतन उपकरण माना जा सकता है। पार्श्व संगीत की टेकनिक को रेडियो ने खूब निखर दिया है। अभिनय काला में स्वर-संधान की महत्ता रेडियो ने ही पहले पहल स्थापित की है और भाव-भंगिमा के अभाव में स्वर में चित्रोपमता को क्षमता ला देना यह अभिनय-कला को   रेडियो की एक स्थाई देन है। भावी रंगमंच इन नए उपकरणों को निश्चय ही अपनावेगा।
उत्तरी भारतवर्ष में नाट्य साहित्य का लोप आप-ही-आप नहीं हुआ था। मुसलमानी राज्य में धार्मिक कट्टरता ने मूर्ति-कला और रंगमंच दोनों पर प्रहार किया। राज्य का प्रश्रय मिला नहीं और जनता भयाक्रांत हो मनोरंजन से विमुख हो गई। यों लगभग एक हज़ार वर्ष तक उत्तरी भारत में तो नाटक कोरे अध्ययन की सामग्री बनकर रह गई।
अब यदि एक हज़ार वर्ष बाद हम रंगमंच और रूपक साहित्य को पुनर्जीवित करना चाहतें हैं, तो यह क्रिया भी आप-ही-आप नहीं होगी। कविता भावुक ह्रदय से अनायास ही बह निकलनेवाली निर्झरणी हो सकती है, यद्दपि उसकी तह में भी सामाजिक प्रेरणाओं का दबाव होता है, किन्तु नाट्य साहित्य का रंगमंच की मांग से सीधा सम्बन्ध है और रंगमंच स्वतः ही नहीं बनता। राष्ट्र और समाज, संस्कृति क्षेत्र के नेता और शासन, सभी को परम्परा, परिस्थिति और उपकरणों को ध्यान में रखते हुए नए नए रंगमंच की रूपरेखा निश्चित करनी है, और जहाँ तक संभव हो, उस निश्चित योजना के अनुसार साधन एकत्रित कर रंगमंच के आंदोलन को चलाना है। ऐसे आन्दोलन के आग्रह से लेखक-समाज बच नहीं सकेगा, और कुछ ही समय में एक समृद्ध नाट्य-साहित्य की नीव पड़ जायेगी।
पिछले पृष्ठों में रंगमंच की जो त्रिमुखी योजना मैंने उपस्थित की है, वाह एक संकेत है इसी मार्ग की ओर। मैं यह कहने की धृष्टता नहीं करूँगा कि हिंदी हिंदी भाषी समाज इस संकेत को आँख मूंदकर मान ले, यद्यपि मेरा अनुभाव है कि रंगमंच के जिस त्रिमुखी विकास की मैं कल्पना कर रहा हूँ, वही दिन-प्रतिदिन स्पष्ट होती हुई सांस्कृतिक प्रवृतियों का चरमोत्कर्ष हो सकता है।
यदि यह न भी हो, तो भी मेरा यह तो पक्का विश्वास है कि जनता, शासन और सांस्कृतिक संस्थाओं को कुछ इसी तरह का बहुमुखी आंदोलन खड़ा करना होगा। हमारा राष्ट्रीय रंगमंच एकमुखी नहीं हो सकता और न होना ही चाहिए।
इसलिए हमारा नाट्य-साहित्य भी कई विभिन्न शैलियों का संग्रह होगा, एक ही परिपाटी का उत्थान मात्र नहीं।  
लेकिन मुझे लगता है, मानो हम आधुनिक हिंदी के नाटककार बरबस ही एक ही शैली की तलाश में भटक रहें हों। जो नए प्रयोग हो रहें हैं, उनके पीछे रंगमंच की सामर्थ्य नहीं। इसलिए हमें रंगमंच की पद्धतियाँ भी निर्धारित करनी है और उसके साथ ही साथ नाट्य-साहित्य की शैलियाँ भी। दोनों कार्य सामानांतर रेखाओं की तरह चलें। यह सोचना कि पहले रंगमंच तैयार हो जाये तब नाटक लिखें जाएँ, या नाटकों की रचना कराकर रंगमंच को तदनुसार तैयार कर लें, भारी प्रवंचना होगी।
लेकिन मैं लेखक समाज को हुक्म नहीं देना चाहता कि ऐसा लिखो और ऐसा नहीं। कलाकार को जबरदस्ती आदेश देने कि क्षमता भला किसमें है ?
हमारा राष्ट्र, निर्माण की पहली सीढियों पर है। ऐसे क्षण में लेखक-समाज द्वारा समय और शक्ति का अपव्यय दो तरह आजकल हो रहा है – १. नई पीढ़ी के उदीयमान साहित्यकार मुक्तक काव्य की झड़ी लगाए जा रहें हैं, मानो उन्होने छायावादी परम्पराओं को रीतिकालीन सवैयों की परिपाटी की भांति सांचे ढलने वाली मशीन बना देने का व्रत लिया हो। नाटक का क्षेत्र है वीरान, लेकिन उधर कौन नज़र डाले ? २. जो नाटककार हैं, वे प्रायः शून्य में सेज लगाकर किसी काल्पनिक रंगमंच की प्रिया से मिलन की तैयारियां कर रहें हैं। कुछ लोग हैं कि कोरे संवादों के चमत्कार को नाट्यगति ( Action ) का स्थान देकर संतुष्ट हो जातें हैं, कुछ के हरेक पात्र में एक ही व्यक्तित्व यानि लेखक का निजी व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता है, कुछ का कथानक इतना सपाट होता है कि प्रथम दृश्य में ही अंतिम दृश्य की झलक मिल जाती है और कुछ के पत्र भाषणों का तांता बंध्तें हैं, तो रुकने का नाम ही नहीं लेते।
प्रतिभा और समय के इस अपव्यय को रोकने के लिए लेखक-समाज को सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रयोग करना होगा। यह सामूहिक इच्छाशक्ति साहित्यकारों की संस्थाओं द्वारा स्वीकृत और शासन द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त योजनाओं के रूप में प्रकट की जा सकती है। इन योजनाओं में श्रेष्ठ नाटकों पर पुरस्कार, नाटकों के अभिनीत करने का प्रबंध, उदीयमान नाटककारों को आर्थिक सहायता, इन सबका विधान तो होगा ही, पर इनके साथ ही साथ नाटक –लेखन की कला के नियमों का संकलन और नाटककारों के लिए शिक्षा-केन्द्रों का आयोजन भी होगा।
मेरे भावुक साहित्यकार मित्र चौंके नहीं। मैं कला को बंधनविवस और साहित्यिक नेताओ से आक्रांत दासी का रूप देने कि तदवीर नहीं कर रहा हूँ। लेकिन कोई मुझे बतावे कि कौन सी उत्कृष्ट कला नियमबद्ध नहीं और किस कला के साधकों को अध्ययन और अव्यवसाय के बिना कोरी भवप्रवणता के आधार पर सफलता मिली है ? काव्य-प्रणयन में हाथ लगाने के पूर्व कवि छंद-शास्त्र, अलंकार और पूर्ववर्ती कवियों का थोडा-बहुत अध्ययन करता है। समस्त प्राचीन नाट्य-साहित्य इसका साक्षी है ; किन्तु हिंदी में नाटककारों के पथ-प्रदर्शन के लिए कोई उपयुक्त रीतिग्रंथ ही नहीं है। प्राचीन संस्कृत नाट्यशास्त्र का अध्ययन करने का हमलोग कष्ट नहीं उठाते और यह भी ठीक है कि वर्तमान परिस्थिति में, उसी परंपरा के रंगमंच के अभाव में प्राचीन संस्कृत नाट्यशास्त्र को बिना कतर-व्योंत किये हम ज्यों-का-त्यों अपना भी नहीं सकते। अधिकतर लेखक आधुनिक पाश्चात्य नाटककारों इब्सन, गल्सवार्दी, शा इत्यादि से प्रभावित होकर ही कलम उठातें हैं। लेकिन इन पाश्चात्य नाटककारों के पीछे अविच्छिन्न नाट्य-साहित्य की परंपरा है, जिसका उद्गम है प्राचीन यूनानी नाटक। साथ ही उन्हें प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक शास्त्रकारों और साहित्य-नियामकों की धरोहर उपलब्ध है। पाश्चात्य नाटककार प्रायः थ्री यूनिटीज़, ट्रेजडी के द्वंदात्मक आधार, चारित्रिक उत्थान, कथानक में चरम विन्दु का समावेश आदि सिद्धांतों से परिचित होतें हैं। अरस्तु, बेनजान्सन, गेटे, ब्रेडले और कतिपय आधुनिक समालोचकों से नाट्यकला के विषय में जो सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं, वे उदियमान पाश्चात्य नाटककार के लिए एक मानसिक पृष्ठभूमि का काम देतें हैं। यदि मैं कहूँ कि कुछ ऐसी ही मानसिक पृष्ठभूमि की हमारे यहाँ भी आवश्यकता है, तो इसे सृजनात्मक प्रवृति पर शास्त्रीय बंधन लगाने की चेष्टा न समझा जाय।
जैसे हमारे रंगमंच को बहुमुखी होना है, एक शैली में ही सीमित नहीं रहना है, वैसे ही हमारा नाट्य-साहित्य भिन्न-भिन्न सामाजिक आवश्यकताओं और चेतनाओं का परिचायक होगा, उसकी भी शैली बहुमुखी होगी। तदनुसार ही वह मानसिक पृष्ठभूमि, वह नियमों और विधियों का संकेत जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, विविध प्रकार के सिधान्तों का प्रतिविम्ब होगी। जो इन सिधान्तों, नियमों और विधियों का संकलन और संपादन करे, उन्हें अपनी दृष्टि रंगमंच की भावी रूप-रेखा पर रखनी है।
उदाहरणतः नागरिक रंगमंच के लिए नाटकों में काव्यात्मक शैली द्वारा रसपरिपाक – यह परंपरा संस्कृत नाटकों से ली जा सकती है। वस्तुतः प्राचीन नाटक दृश्यकाव्य था, यानि दर्शकों के लिए वह कविता का अभिनय द्वारा निरूपण था, जीवन का दर्पणतुल्य प्रदर्शन नहीं। आज के व्यावसायिक रंगमंच पर भी ऐसे ही नाटक शायद अधिक सफल हो सकें। उस शैली को आधुनिक प्रतीकवादी नाटककार मेटरलिंक, जेम्स्बेरी, लेडी ग्रेगरी इत्यादि के वातावरण-प्रधान नाटकों से बहुत कुछ मिल सकता है। देहाती रंगमंच के लिए जो नाटक लिखे जायं, उनमें भी प्राचीन संस्कृत और यूनानी नाटकों से कुछ पद्धतियाँ समाविष्ट कि जा सकती है, यथा-सूत्रधार और विश्कम्भक को यूनानी कोरस की पद्धति में ढालकर एक नवीन प्रकार के रंग्नायक कि श्रृष्टि कि जा सकती है, जो यवनिका और पर्दों के बिना ही नाटक की पृष्ठभूमि और भिन्न अंकों का एक दूसरे से सम्बन्ध स्थापित का सके, साथ ही उस सूत्रधार के कथनों में भी नाटक की काव्य शैली और गीतों का समावेश हो। यथार्थवादी रंगमंच का नाट्य-साहित्य मुख्यतः समस्यामूलक और आधुनिक विचारधारा और संघर्षपूर्ण व्यक्तित्व का परिचायक होगा। किन्तु साथ ही सिनेमा की प्रभाववादी शैली और रेडियो-रूपक की संकेत्वादिता दोनों ही का यथार्थवादी नाट्य-साहित्य पर स्थाई प्रभाव पड़ेगा।
इस प्रकार उदीयमान रंगमंच की विभिन्न शाखाओं की मांगों को दृष्टिकोण में रखते हुए नाट्य-लेखन-कला के कुछ बुनियादी नियमों का संकलन और प्रतिपादन लेखकों के लिए उपादेय सिद्ध होगा। यह न समझा जय कि मैं नाट्य साहित्य के पूर्व रुढियों की स्थापना कराना चाहता हूँ। इन नियमों की आवश्यकता संकेत के तौर पर है और ज्यों-ज्यों नाट्य-साहित्य की समृधि और विकास होते जायेंगें त्यों-त्यों इन सिधान्तों में भी परिवर्तन और उनका परिमार्जन होता चलेगा। नियमों को मैं मात्र प्रयोजन के रूप में देखता हूँ, अचल मान्यताओं के रूप में नहीं। प्रतिभा को जब नियमों के प्रकाश द्वारा प्रगति की राह मिल जायेगी, तब वह अपने में अन्तर्निहित ज्योति को उकसाकर अपने-आप ही मार्ग-निर्देशन कर लेगी। लेकिन अभी तो अंधे की भांति टटोलना पड़ रहा है। साहित्य के इस महत्वपूर्ण अंग की रूप-रेखा, जिसमें कविता की भांति केवल भावोदेक ही सृजन का कारण नहीं हो सकता, हिंदी में स्थापित नहीं हो पाई है। संस्कृत नाटक की परम्परा लुप्त हो गईं। इसलिए यदि ऐसे निर्देशन का विधान नहीं किया जायेगा, तो यही नहीं होगा कि इने-गिने नाटककार अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग लेकर बैठ जायेंगें , बल्कि नवयुवक साहित्यकार इस अनजाने-से पथ पर अग्रसर भी न होंगें। इसलिए मैं तो यहाँ तक कहने के लिए तैयार हूँ कि इस उपेक्षित अंग को संपन्न बनाने के लिए हमारी प्रमुख साहित्यिक संस्थाओं और विश्वविधालयों को नाट्य-कला के शिक्षाकेन्द्र चलने चाहिए। अमेरिका में तो कुछ विश्वविधालयों में पाकशास्त्र की भी डिग्री होती है, नाट्यकला का स्थान तो इससे कहीं ऊँचा है, और भारतीय शास्त्रों में चौंसठ कलाओं की प्रमुख श्रेणी में इसकी गिनती है। यदि कोई विश्वविधालय नाट्यकला में बी. ए. ( कला स्नातक ) की डिग्री की व्यवस्था करे, तो इससे बढ़कर उपाधि कला के क्षेत्र में क्या हो सकेगी ?
ऊपर लिखे विचारों में रंगमंच और नाट्यकला की ही सीमित आवश्यकताओं का आग्रह देख पड़ेगा और शायद कुछ पाठक मुझे याद दिलाना चाहें कि रंगमंच और नाटक, समाज की प्रगति और प्रवृत्ति पर निर्भर रहते हैं। मैं इस पहलू से अवगत हूँ और एक नूतन योजना की ओर संकेत करने का साहस भी मुझे इसीलिए हुआ है कि भारतीय समाज, विशेषतः हिंदी भाषी समाज, सदियों बाद पुनः सामूहिक मनोविनोद को सुसंस्कृत और गंभीर कला के रूप में ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत है। सामूहिक मनोरंजन का सबसे कलापूर्ण, सुरुचिसम्पन्न और स्थायी रूप है रंगमंच। हमारा समाज अपने भिन्न भिन्न स्टारों में मनोरंजन को इस सुव्यवस्थित रूप में देखना चाहता है। राजनैतिक स्वताब्त्रता और सामाजिक चेतना दोनों ने हमें अपनी सांस्कृतिक इच्छाओं से अवगत करा दिया है। ये इच्छाएं एक उन्मुक्त व्यक्तित्व का उठान हैं, वे किसी कुंठित व्यक्तित्व की अपने से बचने की चेष्टाएं नहीं। साथ ही अपनी परम्पराओं और उपेक्षित सांस्कृतिक साधनों के प्रति सचेष्ट जागरूकता भी स्पष्ट होती जा रही है। भरत-नाट्यम, मणिपुरी नृत्य, संथाली नृत्य, नौटंकी, सिनेमाओं में प्राचीन ऐतिहासिक और पौराणिक कथानक, देहाती तर्जों के गीत, सभी को जन रूचि के क्षेत्र में महत्वपूर्न्महत्वपूर्ण स्थान मिल रहा है, और ये सभी रंगमंच के सुव्यवस्थित माध्यम कि राह देख रहे हैं।
इसीलिए हम रंगमंच के चाहे जो वर्गीकरण करें और नाट्य साहित्य के मार्ग निर्धारित करने के लिए चाहे जिन नियमों का प्रतिपादन करें, इन वर्गों और नियमों को सामाजिक परिस्थितियों और जनता की रूचि का अनुमोदन करना ही होगा। मेरी दृष्टि में निकट भविष्य का हिंदी रंगमंच और नाते साहित्य प्रायः तीन प्रमुख शैलियों में अवतरित होगा और हो रहा है। लेकिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ एवं प्रेरणाएं परिवर्तनशील हैं, और सृजनशक्ति का मूलश्रोत चिरंतन से प्रवाहशील है। कौन योजनाकार इस अबाध प्रगति को नियमों की चहारदीवारी में बाँध सकता है।