रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

शिक्षा का सर्कस ( नुक्कड़ नाटक )

अनिल ओझा 
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग करता नुक्कड़ नाटक. मूल नाटककार - अनिल ओझा. संशोधन - पुंज प्रकाश . इस नाटक को प्रस्तुत करने के लिए कोई भी नाट्यदल पूरी तरह से स्वतंत्र है. निवेदन बस इतना कि प्रस्तुति की सूचना punjprak@gmail.com पर ज़रूर दें.

कोरस गायन – ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब’ 
( इस कोरस के साथ एक पात्र बाहर निकलकर मग्न-लयात्मक तरीके से चलाना शुरू करता है. )
कोरस – किधर चले ?
पात्र – पढ़ाई करने.
कोरस – झूठ बोलते हो, जाकर सिनेमा देखोगे. लाफुअई करोगे.
पात्र – नहीं पढूंगा. समाज के लिए कुछ करूँगा.
कोरस – क्या करोगे ? कुछ करोगे ? हा हा हा हा
कुछ कुछ कुछ कुछ, सबकुछ कुछ कुछ
फास्ट डिविज़न, कुछ कुछ कुछ कुछ
घूस पैराबी, कुछ कुछ कुछ कुछ
डोनेशन, कुछ कुछ कुछ कुछ
एडमिशन, कुछ कुछ कुछ कुछ
परमोशन, कुछ कुछ कुछ कुछ
शादी ब्याह बच्चे कच्चे, कुछ कुछ कुछ कुछ
उनकी शादी उनके बच्चे, कुछ कुछ कुछ कुछ
( गाने के साथ एक आदमी का घर बन जाता है. आदमी कुछ काम कर रहा है. )
औरत – अजी सुनते हो.
आदमी – इतना ज़ोर से बोलोगी तो पूरा देश सुनेगा, मेरी क्या मज़ाल.
औरत – तुम बस इस देश की तरह ही केवल सुनते रहो, कुछ करो मत.कुछ पता भी है.
आदमी – क्या हुआ ? गैस का दाम फिर बढ़ गया क्या ?
औरत – तुम दिन रात अखबार में ही घुसे रहो. मुन्ना चार साल का हो गया.
आदमी – किसका मुन्ना ?
औरत – हमारा और किसका.
आदमी – हाँ, हो गया तो ?
औरत – तो क्या उसे किसी अच्छे स्कूल में नहीं डालना क्या !
आदमी – हाँ डालना है तो ?
औरत – तो पच्चीस हज़ार डोनेशन का इंतज़ाम करो . फौरन. नहीं तो....
आदमी – पच्चीस हज़ार ! बाप रे बाप.
( आदमी लगभग बेहोश जैसा होने लगता है. कोरस खूब धूम धड़ाके के साथ गाता है )
‘पढ़े लिखे न मिली नवाबी, कहीं क्लर्क कहीं चपरासी
सबसे बढ़ाकर आफत आई, नहीं नौकरी कहीं है भाई’.
जोकर – निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं. आपके पास माल है तो सरकारी नौकरियों और अच्छे प्राइवेट कालेजों की कोई कमी नहीं. क्लर्क से लेकर अफसर तक, सबका रेट फिक्स है. आप परीक्षा पास करिये, कीमत अदा करिये और नौकरी की गद्दी पर सवार होकर उपरी आमदनी का भरपूर मज़ा लीजिए. खैर, आईये ज़रा सपनो की बात करें. सपने हम सब देखतें हैं.
( एक प्रेमी जोड़ा आता है प्रेमिका प्रेमी को माना रही है .)
प्रेमिका – यार सलीम हद होती है किसी बात की. पिछले चार दिन से मना रही हूँ और तुम भाव खा रहे हो.(जोकरसे) तुम क्या देख रहे हो. यहाँ कोई नाटक चल रहा है क्या ?
जोकर  – जी यहाँ मेरा सर्कस चल रहा है आपलोग पता नहीं कहाँ से बीच में घुस आए. 
प्रेमिका – अबे तो तू क्या कोई सुल्तान या नेता है कि हम तुझे आदाब करके अंदर आयें. देख नहीं रहें मेरा सलीम ज़रा इंस्ट्रूमेंटल मूड में चला गया है. सलीम ....
प्रेमी – अनारकली....मैं तुमसे खफा हूँ. अब मैं अब्बा हुज़ूर को क्या मुंह दिखाऊंगा.
प्रेमिका – सब मेरी गलती है सलीम. मैंने तुन्हें ढंग से परीक्षा में चोरी नहीं करने दिया. लानत है मुझपर.
जोकर  – अरे बाप रे. सलीम साहेब, आपको किस बात का डर, आपको कौन सी नौकरी करना है. राजा महाराजा भी कभी पढ़तें हैं क्या ?
प्रेमी – अरे ये तो हम भूल ही गए थे. चलो अनारकली फेल होने का जश्न मनाया जाय.
( दोनों जातें हैं. )
जोकर  – भाई सर्कस करना भी कम टेंशन का काम नहीं है. ( तभी ढेर सारे कागज़ के रंग-बिरंगे जहाज उड़ने लगतें हैं. ) कहा जाता है कि बोर्ड अच्छे नंबरों से पास कर लिया तो मानो जीवन का एक महत्वपूर्ण आयरन गेट पार कर लिया. हमें इसे पार करना ही होता है. कैसे भी , किसी भी तरह. By hook or crook तो आईये बोर्ड का सर्कस देखें.
( दो विद्यार्थी प्रवेश करतें हैं. )
पहला विद्यार्थी  – क्यों यार, कैसी गई परीक्षा ?
दूसरा विद्यार्थी – ठीक नहीं गई यार. पापा को इतना तो कहे कि सीरियस टाइम है, ज़रा जम के पढ़ लीजिए. सही सही चिट् भेजना होगा. पर मेहनत करने के बजाय दिन भर क्रिकेट देखने में लगे रहे. सब मामला गडबड हो गया. ये पापाजी लोग भी न कमाल होतें है, एक्जाम का इम्पोर्टेन्स ही नहीं समझते. और फेल हो जाए तो कहतें हैं बच्चा नालायक हैं. हद है यार ये दुनियां भी.
कोरस गायन –  ‘नंबर का खेल, खेल... खेल... खेल...
कोई पास कोई फेल, खेल... खेल... खेल...
रटते रहो लिखते रहो, दिमाग हुआ फेल, फेल, फेल, फेल.’
जोकर  – इसी खेल खेल में एक सवाल, शिक्षा का मतलब ज्ञान की प्राप्ति है या रट्टा मरके नंबरों का खेल. खैर, मार्केट खुला है खेल चालू है.
( मछलीबाज़ार जैसा माहौल में पास-फेल का खेल चलता है, कुछ विद्यार्थी किसी देहाती की तरह मुंह फड़के ये सब सुनतें-देखतें हैं. )
पहला दूकानदार  परीक्षा केन्द्र पर खुली चोरी और मनचाहे नंबरों की गारंटी. आप माल निकालिए बाकि काम हमपर छोड़ दीजिए. सौ प्रतिशत नक़ल की गारंटी. फ़ीस महज हज़ार रुपये प्रति पेपर. आईये आईये. ऑफर सीमित है.
दूसरा दूकानदार – नक़ल से सावधान, खानदानी इलाज अपनाइए. खाली चोरी करने से क्या होगा ? कॉपी जहाँ चेक किया जाता है डैरेक्ट वहीं पैरवी लगवाइए और मनचाहे नंबर पाइए. सौ प्रतिशत सफलता की गारंटी. फ़ीस नंबरों के हिसाब से. आईये खानदानी इलाज कराइए.
तीसरा दूकानदार – बोर्ड आफिस से सीधा संपर्क साधिए. प्राइवेट में मत फसिये, सरकारी अपनाइये. फूल गारंटी के साथ पैसा लगाइए, नंबर पाइए साथ में एक चैनिज़ मोबाईल गिफ्ट में ले जाइये. आइये, आईये. सीधा सरकारी टांका भिड़ाईये.
चौथा दूकानदार – कोचिंग, कोचिंग, कोचिंग. कुछ हमसे पढ़िए कुछ हमपर खर्च करिये, बाकि सब हम देख लेगें. सौ प्रतिशत सफलता की गारंटी. कोचिंग, कोचिंग, कोचिंग.
सभी – आईये, आईये. एक सुनहरे भविष्य के लिए हमारे पास आईये और सफलता की गारंटी पाइए. आईये, आईये, ऑफर सीमित है.
औरत – अजी सुनते हो, मुन्ना पास हो गया.
( जश्न मनाया जाता है. डीजे बजाया जाता है. डांस फांस किया जाता है. )
जोकर   बोर्ड पास कर लिए तो आईये कॉलेज का चक्कर भी लगाया जाय. पेश है कॉलेज का सर्कस.
( चौधरी स्वर्गीय फेकन सिंह कला, विज्ञान तथा क्रीडा महाविद्यालय का बोर्ड लगाया जाता है. नीचे नोट में लिखा है – यहाँ सिलाई, कढ़ाई और बुनाई भी सिखाया जाता है. )
छात्र – सर, मैं यहाँ एडमिशन लेने आया हूँ.
कर्मचारी – लीजिए.
छात्र – पर यहाँ तो कोई बिल्डिंग दिखाई नहीं देती. यहाँ पढ़ाई कहाँ होती है ?
कर्मचारी – हा हा हा हा कमाल बात करतें हैं आप. यहाँ पढ़ाई नहीं होती.
छात्र – क्या ?
कर्मचारी – हाँ, यहाँ सिर्फ डिग्री दी जाती है. परीक्षा में पास – फेल होने का कोई झंझट ही नहीं. ऊपर से नीचे तक सब हम मैनेज कर लेतें हैं. बाकि आपकी किस्मत.
छात्र – बगैर पढ़ाई के ही...?
कर्मचारी – तो चंद हज़ार रुपये में आपको पढ़ाई भी चाहिए और डिग्री भी. पुराना ज़माना गया. ये नई आर्थिकनीति, नई शिक्षानीति, उदारीकरण, निजीकरण का ज़माना है. अब उल्लू जैसा मुंह क्या देख रहें हैं. राजीव जी ने कहा था न कि पढ़ाई को डिग्री से अलग करो, हमने डिग्री को पढ़ाई से अलग कर दिया. तो क्या विचार है आपका. लिख लें आपका नाम अपने शानदार विद्यार्थियों की लिस्ट में ?
छात्र – जी नहीं मुझे पढ़ाना है, ज्ञान अर्जित करना है.
कर्मचारी – ज्ञान अर्जित करना है तो समाधी लगाइए. भागो यहाँ से. हमारा और देश का समय मत बर्बाद करो. ( बुदबुदाता है ) इस देश में बेवकूफों की कोई कमी नहीं एक ढूंढो हज़ार मिलेंगें.
( दृश्य बदलता है. स्वर्गीय डा. यमराज प्रसाद राजकीय महाविद्यालय का बोर्ड लगता है. बोर्ड पर “वेटनरी के लिए लंच टाइम या रविवार को मिलें” भी लिखा है. एक काउंटर पर एक कर्मचारी बैठा ऊँघ रहा है. )
कर्मचारी  ओए, क्या चाहिए ?
छात्र – जी एडमिशन फार्म. यहीं मिलाता है न ?
कर्मचारी – कौन सा फार्मूला ?
छात्र – फार्मूला नहीं एमिशन फार्म.
कर्मचारी – ओ उधार, बगल की पान की दुकान में जाके ले लो.
छात्र – वहाँ ! पर काउंटर तो ये है.
कर्मचारी – काउंटर है तो क्या हुआ. हमने कोई ठेका थोड़े न लिया है. जाइये समय की कीमत समझिए.
छात्र – मतलब समझे नहीं....
( दो दलाल आतें हैं. )
दोनों – मतलब हम बतातें हैं.
पहला – हिंदी में बताएं, अंग्रेज़ी में बताएं,
दूसरा – या किसी लोकल भाषा में समझाएं.
छात्र – तत्काल हिंदी ही ठीक रहेगा.
पहला – बात साफ़ है.
दूसरा – काउंटर से ब्लैक तो कर नहीं सकते.
पहला – कुछ लें देन की भी बात करनी पड़ती है.
दूसरा – कुछ चन्दा चढ़ावा भी देना होता है.
पहला – परसेंटेज कम है ? कोई बात नहीं. एडमिशन हो जायेगा.
दूसरा – कोई सर्टिफिकेट कम है ? कोई बात नहीं. एडमिशन हो जायेगा.
पहला – कहावत मशहूर है ..
दोनों – दर्वे से सर्वे, चहबे से करबे. हा हा हा हा.....
कोरस गायन - हा हा हा , हा हा हा......
हंसते रहो हा हा हा.....
उसपे हँसो, हमपे हँसो
खुद पे हँसो हा हा हा..... 
हा हा हा , हा हा हा.....
औरत   अजी सुनते हो कॉलेज में मुन्ना का एडमिशन हो गया.
जोकर  – हमने अपनी पढ़ाई शुरू की. हर बात हमारे दिमाग में ठूंस ठूसकर भरा जा रहा है. ये ज्ञान का आक्रमण था किसी घाव से मवाद निकलने जैसा. पेश है इतिहास का सर्कस.
( क्लासरूम, शिक्षक इतिहास पढ़ा रहें हैं. )
इतिहास का शिक्षक  ( आराम से गला साफ़ करता है. ) हाँ तो हमलोग कहाँ थे ?
छात्र – सर पानीपत में.
शिक्षक – हाँ, पानीपत की पहली लड़ाई. बाप रे बाप. ससुरा, क्या दृश्य था. बिलकुल हालीवुड की फिल्म ट्रॉय की तरह. भाई, जब अफगानिस्तान के राजा बाबर ने हिंदुस्तान के राजा इब्राहिम लोदीया पर किया अटैक. तब भया घमाशान पानीपत के मैदान में. घनधोर युद्ध हुआ.
छात्र – घनघोर सर.
शिक्षक – हाँ, एकदम खतरनाक युद्ध हुआ, खतरनाक. दिन के बारह – साढ़े बारह तक तो ससुरा इब्राहिम लोदिया लड़ाई जीत ही रहा था. पर हिंदुस्तान का भाग्य ही खराब था. मामला एकदम 20 – 20 क्रिकेट जैसा चल रहा था कि...( एक छात्र हंस देता है.) ये तुम हंस क्यों रहे हो जी ? क्या सोच रहे हो हम गलत पढ़ा रहें हैं ? बेटा हिंदुस्तान के इतिहास का एक एक पन्ना घोंटके पी गएँ है, एकदम पान के पिक की तरह.
छात्र – सर वो ....
शिक्षक – ज़बान चलता है. बकने से विद्या नहीं आती. ज्ञान के लिए त्याग करना पड़ता है. गुरु देवो भावः इसका मतलब समझते हो कि समझाएं.
छात्र – गलती हो गई सर.
शिक्षक – ज़्यादा बकर बकर मत करो नहीं तो फ़ौरन क्लास से निकाल देंगें.... हाँ जी कहाँ थे हम.
सारे छात्र – हिन्दुस्तान का भाग्य खराब है सर.
शिक्षक – हाँ, हिन्दुस्तान का भाग्य ही खराब है. ऐसे ऐसे विद्यार्थी होगें तो क्या भाग्य होगा देश का.
छात्र – सर समाजशात्र नहीं इतिहास. पानीपत.
शिक्षक – हाँ, हिन्दुस्तान का भाग्य ही खराब था. पड़ने लगा मूसलाधार बारिश. इधर इब्राहिम लोदिया के हथिया का मतिये खराब हो गया. मारना था बबरवा के सेना को तो मारने लगा अपने सेनावां को. ससुरा, इब्राहिम लोदिया का हो गया टायं टायं फिश . बस मामला खतम.
छात्र – हो गया सर.
शिक्षक – हो नहीं गया तो क्या रात भर का कथा सुनना है. हाँ एक बात और, ऐसे अगर लिख मारोगे परीक्षा में तो सौ में से एक सौ एक नंबर आएगा. हाँ पर एक बात का ध्यान रखना ई जो बीच बीच में ससुरा बोले हैं न उ मत लिखना. बस आज का क्लास खतम.
जोकर  – अर्थशास्त्र का सर्कस.
शिक्षक – भारत में गरीबी का कारण अशिक्षा एवं बेकारी...
छात्र – सर, एक सवाल है. हमें लगता है कि हमारे गाँव में अशिक्षा और बेरोज़गारी गरीबी के कारण है गरीबी का कारण नहीं.
शिक्षक – तो आपको लगता है कि हम गलत पढ़ा रहें हैं! हमारी कोर्स की किताबों में सब गलत लिखा है ? ज़रूरत से ज़्यादा दिमाग मत लगाइये. चुपचाप कोर्स में जो लिखा है वो पढ़िए, इधर उधार की लाल-पिली किताब मत पढ़ा कीजिये. नहीं तो फेल हो जाईयेगा तो हमको दोष मत दीजियेगा.
छात्र – पर सर पढ़ाई का मतलब कुछ भी रटना भी नहीं होता.
शिक्षक – तो आप बताएंगें कि पढ़ाई का मतलब क्या होता है. ख्याल रखिये यह विद्या का मंदिर है ज्ञान का नहीं.
जोकर  – हिंदुस्तान है तो हिंदी साहित्य का भी सर्कस देखतें हैं.
शिक्षक – आज हम आप सबको महाकवि तुलसीदास के बारे में बताएंगें. तुलसीदास भारतवर्ष के बहुत भारी कवि हुए. वो इतना भारी कवि हुए, इतना भारी कवि हुए कि पूरी दुनियां में उनसे भारी कवि न कोई हुआ और न होगा.
विद्यार्थी  may I come in sir ?
शिक्षक – हिंदी की क्लास में अंग्रेज़ी में अंदर आते हो बेटा. हिंदी की क्लास में अंग्रेज़ी नहीं चलेगा, समझे.
विद्यार्थी – क्या मैं अंदर प्रविष्ट कर सकता हूँ श्रीमान ?
शिक्षक – वाह, हमें ही हिंदी पढ़ा रहे हो बेटा.Come in and shit down under the bench.
कोरस गायन – बेचो फारसी पढ़ लो तेल
पलट गया किस्मत का खेल
पढ़े लिखे सो होवे फेल.
( नारे, पर्चे, पम्फलेट बैनर इत्यादि आजीब सा घालमेल और शोर )
पढ़ाई के लिए लाइब्रेरी – फुस्स.
प्रयोग के लिए प्रयोगशाला – फुस्स.
सांस्कृतिक कार्यक्रम – ( कोई नई फिल्म का गाना )
क्लासरूम में पंखे – घर्र... घर्र... घर्र...
खेल का मैदान हा हा हा हा.....
ये नहीं, वो नहीं तो क्या है यहाँ ?
‘चोरी चाकरी भ्रष्टाचार
साम्प्रदायिकता, जातिवाद
हासिल कर लो गुण ये चार
भवसागर से होलो पार’
पहली आवाज़ – पर शिक्षा का क्या होगा ?
दूसरी आवाज़ – वो भाड़ में जायेगी.
तीसरी आवाज़ – चुप्प, गुप्त बात ओपन में बोलने वाले लोग आतंकवादी होतें हैं. शिक्षा विश्व बैंक के सहयोग से चलेगी.
एलान – सुनो, सुनो, सुनो. विश्वबैंक का एलानियाँ सन्देश सुनो. तीसरी दुनियां के देशों में शिक्षा बहुत सस्ती है. इसे मंहंगा करना होगा ताकि शिक्षा का सुधार हो सक, इसका विकास हो सके.
एलान २ – इसलिए कालेजों में फीसें बढ़ाने का एलान किया जाता है. ये फीसें तबतक बधाई जाति रहेंगीं.
( नेतागन प्रवेश करतें हैं )
नेतागण – जबतक शिक्षा का पूरा – पूरा विकास नहीं हो जाता.
पहला नेता – इसके लिए तमाम एफलियेटेड कॉलेज बंद करने की ज़रूरत है.
दूसरा नेता – खर्चों में कटौती करना ज़रुरी है.
छात्र – सर शिक्षा की स्थिति बहुत खराब है, आप कुछ करते क्यों नहीं.
पहला नेता – किसने कहा कि स्थिति खराब है. ये सब विरोधियों की साजिश है.
दूसरा नेता – विरोधियों का नाम मत लो. हालत तो खराब है ही. तुमने शिक्षा के विकास का कोई कार्यक्रम लिया ?
पहला नेता – तुम लेने दोगो तब न लेंगें.
छात्र – सर हमारी शिक्षा का क्या होगा.
पहला नेता – वो बाद में देखेंगें यार पहले इससे निपटने दो. आज फैसला हो ही जाए. आज़ादी के बाद से दिमाग खराब किये है.
( दोनों लड़ते हुए चले जातें हैं. एक तीसरा नेता जो बहुत देर से छात्रों को छुप-छुपकर देख रहा था. छात्रों के समीप आता है.)
तीसरा नेता – इन सबसे कुछ नहीं होगा. आम आदमी का राज लाना पड़ेगा. हमको जीता के संसद में भेजिए. सब ठीक हो जायेगा.
छात्र – आप किस पार्टी से हैं सर ?
नेता – हम आम खाओ पार्टी से हैं.
छात्र – आपका एजेंडा क्या है ?
नेता – खुलासा करना. हम सबकी पोल खोल देंगें.
छात्र – तो जाईये खुलासा करिये. हमारा समय बर्बाद मत करिये.
(नेता बडबडाता हुआ चला जाता है कि यही समस्या है इस देश की. कोई कुछ बदलना चाहता है तो लोग साथ ही नहीं देते. तो भोगो हमको क्या. सब एकदम जड़ सा हो जाता है.)
जोकर  – हमें नहीं पता कि इस सर्कस को कैसे खत्म करे. शिक्षा इंसान का मौलिक अधिकार है ये बात हमारा संविधान भी कहता है. अपने मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना हर इंसान का नैतिक कर्तव्य है. नई शिक्षा नीति, शैक्षणिक अराजकता के नाम पर क्या-क्या हो रहा है सब जानतें हैं. कहीं न कहीं कोई साजिश ज़रूर चल रही है, जिसमे हर वो व्यक्ति शामिल है जिसपर हमारे भविष्य को सवांरने-सजाने की ज़िम्मेदारी है. फिर हम क्या करें ? किसी ने क्या खूब कहा है –
समूह – यूं अंधेरों से न चुपचाप गुज़र जाओ, अपने हाथों को उठाओ, चिल्लाओ ...चिल्लाओ....चिल्लाओ.
औरत – अजी सुनते हो. मुन्ना ने परीक्षा में फेल हो जाने के डर से फांसी लगा लिया.
( शोर बढ़ता है. प्रदर्शन स्थल के ठीक बीचोबीच मुन्ना की लाश पड़ी है. जिसे उठाकर सब चुपचाप चले जातें हैं. इस प्रकार शिक्षा का सरकार तत्काल समाप्त होता है. )

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