रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

फिल्म On My Skin : क्रूरतम यथार्थवादी सच

एक सिनेमा नेताजी के वादे की तरह होता है या फिर नेता जी ही सिनेमाई चरित्र होते हैं। चुनाव के दौरान जब उनके वादे गूंजते हैं तो ऐसा लगता है कि बस यही है तारणहार गोडो, जिसका इंतज़ार सदियों से ज़माना कर रहा था, और जिसके सत्ता में आते ही इंसानी समाज के सारे कष्ट दूर हो जाने वाले हैं। हम सब उनको विजयी बनाने में व्यस्त हो जाते हैं लेकिन जैसे ही नेताजी जीत जाते हैं, मामला वही फिर ढाक के तीन पात वाला ही हो जाता है अर्थात पूर्णमुशिको भवः। हमें पहले तो यक़ीन ही नहीं होता कि हम एक बार फिर ठगे गए हैं, और जब तक हमें सत्य का अंदाज़ा होता है, तब तक हमारी हालत पहले से ज़्यादा पतली हो चुकी होती है और हम किसी और गोडो का इंतज़ार करने लगते हैं। वैसे बताना ज़रूरी नहीं है फिर भी बता देता हूं कि वेटिंग फॉर गोडो सैमुअल बैकेट द्वारा लिखा हुआ एक नाटक है, जिसे 20वीं शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण नाटक माना गया है हालांकि उस नाटक के संदर्भ में कई लोगों का विचार है कि समझ में ही नहीं आता है। वैसे समझ में तो बहुत कुछ नहीं आता है लेकिन फिर भी बातें तो हैं ही। फिर मामला समझदानी का भी है और यह भी कि क्या सच में समझ में नहीं आता है या हम समझना ही नहीं चाहते हैं! बहरहाल, हमारा नायक विजयी हो जाता है और हम पराजित। ऐसे चमत्कारी नायकों से पूरा विश्व इतिहास भरा पड़ा है और जब समाज ही ऐसे चमत्कारी नायकों से अछूता नहीं है तो हमारा सिनेमा भी ऐसे महानायकों से कैसे अछूता रह सकता है जो एक मुक्का मारके पहाड़ से पानी निकाल देता है, अपने एक फूंक से अनगिनत रंगा-बिल्ला का सफ़ाया कर देता है, एक लॉकेट पहन लेने से उसे गोली नहीं लगती और हाथ में सिक्कड़ बांधे रिश्ते में सबका बाप लगने लगता है। यह सिनेमा उस नुक्कड़ नाटक की तरह ज़्यादा है जिसके पास 30 मिनट के जादुई वक्त में दुनियां की हर समस्या का त्वरित समाधान होता है। हमारा नायक अकेले ही पूरी व्यवस्था से टकरा जाता है, बड़े-बड़े गिरोह से भिड़ जाता है, अनगिनत लोगों के हाथ पैर तोड़ता है, अनगिनत हत्या को गाज़र मूली की तरह काटते हुए दनादन अंजाम देता है, हीरोइन के खलनायक बाप को भी अंत में ठिकाने लगा देता है और बेचारी हीरोइन अपने बाप की मौत पर (कैसा भी था आख़िरकार था तो बाप ही) दो मिनट का मौन रखने के बजाए भागकर अपने बाप के हत्यारे अर्थात हीरो से चिपक जाती है। ऐसा लगता है जैसे हम किसी लोकतांत्रिक समाज में नहीं बल्कि आज भी वैसे बर्बर कबीलाई समाज में रह रहे हैं जिनके पास ना कोई नियम है और ना ही कोई क़ानून। हमारा नायक ख़ूब सारी हिंसा और पशुवत व्यवहार को अंजाम देकर महानायक बन जाता है और हम उसे अच्छाई पर बुराई की जीत मानते हुए ताली बजाते अपने-अपने घर को प्रस्थान करते हैं और उसी सड़ियल व्यवस्था में पुर्नवापसी करते हैं, जिससे मुंह मोड़कर सिनेमाहॉल में घुसे थे। इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि बशीर बद्र साहब लिखते हैं - 
तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे 
बच्चों सी बातें करते हो 

अब किसे कौन समझाए कि मुक्ति अकेले में अकेले की नहीं होती है, बल्कि मुक्ति एक सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है इसलिए कुरुसाव जैसा निर्देशक भी थे दुनिया में जो नायक को जन से जोड़ता हैं और फिर उनके सिनेमा में नायकत्व का काम जनता करती है, अकेले नायक नहीं। उनको इस बात का भरपूर एहसास था कि अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ता। वो बात अलग है कि हम उनका सम्मान करने के लिए कह देते हैं कि आपकी ही वजह से यह सब हुआ है, जबकि जो कुछ भी हुआ है उसमें बहुत कुछ और बहुत लोगों का परोक्ष या प्रत्यक्ष योगदान होता है। वैसे नायक की परिकल्पना ही गैरलोकतांत्रिक है क्योंकि किसी भी नायक का प्रतिनायक में बदल जाने का भी अपना एक समृद्ध इतिहास रहा है। ब्रेख़्त के नाटक गैलेलियो का एक संवाद याद आता है, जब उनका शिष्य आंद्रेय उससे कहता है - "अभागा है वो देश जहां नायक पैदा नहीं होते।" उसके इस बात के जवाब में कारागार में बंद गैलेलियो कहता है - "हां, सचमुच अभागा है वो देश जिसे नायकों की ज़रूरत पड़ती है।" ऊपरी तौर पर यह दोनों बातें एक जैसी लगती हैं लेकिन दरअसल यह दोनों बातें एक नहीं बल्कि एकदम अलग हैं। काश; हम इसके मर्म को समझ पाते लेकिन चमत्कार को नमस्कार करनेवाला प्रचंड आलसी और सामंती-पूंजीवादी विचार से नाक तक डूबा समाज यह सत्य आसानी से स्वीकार नहीं करता। उसे लगता है कि कोई गोडो का आना ही एकमात्र सत्य है; वो आएगा और उसका जीवन सफल बनाएगा, लेकिन गोडो आजतक न आया है और न आएगा, उसका न आना ही उसे ईश्वरीय बनाता है, आ गया तो चमत्कार समाप्त हो जाएगा। गोडो कहके जो आए उन्होंने दरअसल अपना-अपना एजेंडा ही सेट किया है। 

एक सिनेमा वह होता है जो चमत्कार के बजाए आपको जीवन के क्रूरतम सत्य से रूबरु कराता है ताकि यह समझ में आए कि जीवन में चमत्कारों की प्राथमिकता है लेकिन जीवन चमत्कारों से नहीं बल्कि कठोर यथार्थ के धरातल पर ही सजीव किया जाता है, ऐसी ही एक फिल्म है - On My Skin. यह एक इटालिन फिल्म है जिसे Alessio Cremonini ने निर्देशित किया है। कथा स्टेफानो सूची नामक एक मामूली से 31 वर्षीय इंसान की है, जो एक मामूली अपराध में गिरफ्तार किया जाता है और पुलिस की प्रिविण्टिव कस्टारडी में एक सप्ताह के भीतर ही उसकी मौत हो जाती है। यह एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है, जिसमें रिसर्च करने पर पता चलता है कि इटली जैसे छोटे से देश में उस साल (2009) में ऐसे कुल 172 मामले घटित होते हैं। वैसे यह मामला केवल इटली तक ही सीमित नहीं है बल्कि दुनिया का हर देश इस रोग से ग्रसित है। कोई इंसान किसी वजह से गिरफ्तार होता है, और अगर वो रसूखदार नहीं है तो फौरन उसे अपराधी मान लिया जाता है, फिर उसे टॉर्चर किया जाता है और फिर कुछ ही दिनों में उसकी मौत हो जाती है या उसे सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है जहां वो सालों साल सड़ता रहता है और सब इस बात पर लगभग मौन रहते हैं। ऐसे ही घटनाक्रम पर नोबल पुरस्कार से सम्मानित इतालवी अभिनेता, निर्देशक, नाटककार दारियो फो Accidental Death of an Anarchist नामक नाटक की रचना करते हैं, और उनकी यह रचना विश्व के अनगिनत भाषाओं में न केवल अनुदित होता है बल्कि बड़े ही सम्मान के साथ आज भी खेला और पढ़ा भी जाता है। उनका यह नाटक1969 में घटित Piazza Fontana bombing नामक घटना से प्रेरित था। वैसे वर्ष कोई भी हो पूरी दुनिया में इस प्रकार की घटनाएं बढ़ ही रही हैं, अब तो सीधे-सीधे हत्या का भी सीधा प्रसारण हो जाता है और हम सब ताली बजाकर उसका स्वागत भी करते हैं और ऐसा करते हुए हम यह मान लेते हैं कि त्वरित न्याय हो गया और यही सही प्रक्रिया है! ऐसा सोचते, बोलते या लिखते हुए हम यह भूल जाते हैं कि किसी भी देश ने बड़ी मेहनत और बड़ा त्याग व संघर्ष करके लोकतंत्र नामक व्यवस्था/व्यवस्था बनाई है, उसमें सज़ा देने का भी एक मानवीय प्रावधान की परिकल्पना की है, जिसका पालन करना अनिवार्य होता है किसी भी परिस्थिति में लेकिन जब हम सड़कों पर हुए कुकृत्य को इंसाफ का नाम देने लगते हैं तब हम न केवल अपने बड़े बुजुर्गों के त्याग, तपस्या, पढ़ाई-लिखाई और मेहनत का अपमान कर रहे होते हैं बल्कि हम एक ऐसे बर्बर समाज की ओर क़दम भी बढ़ा रहे होते हैं जिसको त्यागकर मानव समाज ने लोकतंत्र नामक व्यवस्था को स्वीकार किया था। जब हम किसी भी कारण से हिंसा, बलप्रयोग आदि को बढ़ावा देने वाले सिद्धांत को प्रचारित, प्रसारित या मान्यता दे रहे होते हैं तो हमें यह अच्छी तरह ज्ञात हुआ चाहिए कि दरअसल हम न केवल पूरे समाज को पीछे की ओर धकेल रहे हैं बल्कि अपने लिए भी पशुवत मौत का फंदा तैयार कर रहे होते हैं। हत्या का उत्सव माननेवाला कोई भी समाज, इंसान, विचार मानवता का सच्चा प्रतिनिधि हो ही नहीं सकता, बाक़ी उसे जितना भ्रम पालना है - पाल ले! हत्या, हिंसा और ज़बरदस्ती पर आधारित विचार कभी भी सत्य, सौंदर्य, कोमलता का उपासक हो ही नहीं सकता।

नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध On My Skin नामक यह फिल्म देखना एक जलते हुए अंगारे को हाथ में लेने के जैसा है, जो न केवल क्रूरतम सत्य से हमारा साक्षत्कार कराती है बल्कि सोचने पर विवश भी करती है कि इंसान से अपने जीवन स्तर को सही और सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन कुछ लोकतांत्रिक विधानों और व्यवस्थाओं का निर्माण किया है/था और उसे कुछ शक्तियां प्रदान की हैं, अगर उनका दुरूपयोग होने लगे तो वो कितना ज़्यादा अमानवीय और ख़तरनाक हो सकती है। फिल्म On My Skin का मुख्य पात्र बस एक मामूली से अपराध के लिए पुलिस द्वारा गिरफ़्तार होता है और उसे बड़ी बुरी तरह टॉर्चर किया जाता, और चंद ही दिनों में वो धीरे-धीरे मौत के आगोश में चला जाता है। उसका परिवार एक साधारण सा परिवार है, जो मुल्क के नियम-कानून का बाख़ूबी सम्मान करता है; उनके पास अपनी मजबूरी को प्रदर्शित करने, बेचैन होने और अपने जवान बेटे की लाश पर दहाड़ मारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। 

यह फिल्म क्रूरता के बारे में है लेकिन क्रूरता का कोई भी दृश्य इस फिल्म में नहीं है। आप यहां हिंसा और क्रूरता का जादुई एहसास नहीं करते बल्कि यहां आप उसके प्रभाव को बड़े ही गहरे कहीं ग्रहण करते हैं। अभिनेता Alessandro Borghi का अभिनय कोई हीरोपंथी नहीं रचता बल्कि एक गठीले तन को धीरे-धीरे लाश में बदलते हुए इस सफाई, स्थिरता और सात्विकता से प्रदर्शित करता है कि आपकी आत्मा चीत्कार कर उठती है। सच्चा अभिनय वो है जो अभिनय जैसा कुछ न लगे, यहां उसकी झलक साफ-साफ देखी जा सकती है। यह फिल्म उन चंद फिल्मों में से एक है जो शानदार और जीवंत चरित्र को बड़ी सरलता और कुशलतापूर्वक अभिनीति करने के लिए भी देखा जाना चाहिए। एक एथलीट जैसे शरीर वाले सामान्य से आदमी को धीरे-धीरे मौत के आगोश में जाते देखने का एक ऐसा अनुभव प्रदान करता है कि आप चीत्कार उठते हैं, शर्त बस इतनी है कि आपके भीतर का इंसान अभी हिंसा का पोषक न बना हो। यह फिल्म बढ़िया रिसर्च, बेहतरीन लेखन, सम्पादन और इत्मीनान से किया हुआ अर्थवान निर्देशन और सम्पादन के लिए भी देखा जाना चाहिए।

क्रूरता पर कला बनाते हुए भी शालीनता पूर्वक व्यवहार, यह एक संवेदनशील रचनाकार ही कर सकता है वरना तो ऐसी-ऐसी फिल्मों की कभी कोई कमी नहीं रही जो बलात्कार को भी ग्लैमराइज करके फिल्माते हैं और हिंसा को अतिहिंसा से समाप्त करने का भ्रम फैलाकर कर समाज में अंततः हिंसा को नायकत्व का चोला पहनाकर और उसी का ही बीजारोपण करके समाज को और ज़्यादा बीमार करने का काम करते हैं। लेकिन अब सवाल यह भी है कि जब पूरे कुएं में ही भांग घोल दी गई हो तो कौन किसको काहे कि तुम्हें होश नहीं है! यहां तो आलम अब यह है कि एक नसेड़ी दूसरे नसेड़ी को कह रहा है कि होश में रह, नहीं तो - - - -

कलाकारी में कल्पनाओं और स्वप्नलोक का अपना एक सम्मानित स्थान है लेकिन कला जब सपनों का सौदागर का रूप धारण करके जेब और दिमाग का लुटेरा बन जाए तो वो दरअसल समाज को दूषित करने का काम ज़्यादा करता है। कलाकारी के क्षेत्र में भी आज मौक़ापरस्ती की कोई कमी नहीं है। कला कोमलता, सौंदर्य, मानवता और इंसानियत का चितेर होता है ना कि आंख के बदले आंख के कुकृत्य का उपासक। वैसे भी आंख के बदले आंख की मनोवृत्ति एक दिन पूरे विश्व को अंधा बनाने का काम करेगी। इस विचार मुक्त होना आवश्यक है ताकि इंसान के भीतर इंसानियत का बीज पनापता रहे न कि बर्बरता का। 

पुंज प्रकाश

सोमवार, 3 अगस्त 2020

फिल्म शकुंलता देवी के मार्फ़त

"अपने सपने का पीछा करो, आगे बढ़ो, और पीछे मुड़कर न देखो." - शकुंतला देवी

प्रदर्शनकारी कलाओं में सबसे प्राथमिक स्थान नाटक का है, (अब नहीं भी हो तो भी ऐसा कहने का रिवाज है) जिस पर विमर्श करते हुए अमूमन दृश्य-श्रव्य काव्य की बात तो होती है, साथ ही मनोविनोद कहीं न कहीं से आ ही जाता है लेकिन जो एक शब्द हम बड़ी ही चालाकी से गोल कर जाते हैं वो है ज्ञानवर्धक। नाट्यशास्त्र में नाटक की उत्पत्ति के कारणों में यह चारों शब्द आते हैं - "हमें मनोविनोद का एक ऐसा माध्यम चाहिए जो देखने-सुनने योग्य और ज्ञानवर्धक हो। जब हम देखने, सुनने में ज्ञान को जानबूझकर, अज्ञानतापूर्वक या बड़ी ही चालाकी से हटा देते हैं, या वो हट जाता है तब वो केवल और केवल समय, ऊर्जा और धन की बेकार खपत होकर रह जाता है और जब हम सिद्धार्थ की तरह ज्ञान की तलाश में भटकते हैं तब कहीं न कहीं जाकर बुद्धि-विवेक का आगमन होता है और तब कहीं जाकर बुद्धत्व की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं। रंगमंच समाज बदलता हो या न बदलता हो लेकिन कहीं न कहीं वो हमें कहीं बहुत गहरे से बदल रहा होता है, अगर हम उसे सही रूप में ग्रहण करने को तैयार होते हैं तो; वरना यह भी सत्य है कि चिकने घड़े पर कुछ नहीं टिकता, और जहां छल-कपट हो वहां तो कला भी नहीं टिकती। हाँ, वहां काई जम सकती है, जमती ही है और जम ही रही है। वैसे जिस चीज़ का प्रयोग हम अच्छाई के लिए कर रहे हैं ठीक उसी चीज़ का प्रयोग दूषित करने के लिए भी हो ही सकता है बल्कि हो ही रहा है। 

अब आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि सिनेमा पर बात करते हुए यह रंगमंच पर बात क्यों हो रही है, तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि यह रिश्ता कुछ-कुछ जीव की उत्पत्ति के विज्ञान जैसा है। धीरे-धीरे एक लंबे समय अंतराल में जीव अपना रूप स्वरूप बदलते गए और इस प्रकार एक कोशिका से मानव तक की यात्रा सम्पन्न हुई। जो लोग आस्तिक हैं उनकी मान्यताओं में विज्ञान नहीं बल्कि चमत्कार है, उनके तर्क में आस्था भी मिल जाती है और फिर एक मस्त खिचड़ी तैयार होता है। ठीक उसी प्रकार प्रदर्शनकारी कला कबीलों से शुरू होकर आज सिनेमा तक पहुंची है और आज यह कहा जा सकता है कि सिनेमा आज के समय में सबसे लोकप्रिय कला माध्यम है, वो बात और है कि यह दृश्य, श्रव्य, मनोविनोद और ज्ञान का कितना ज़्यादा कलात्मक अभिरुचि जागृत करने में आज अपनेआप को सक्षम पाती है; क्योंकि इसका काम केवल मनोरंजन करके किसी भी प्रकार नाम, यश और धन कमाना नहीं बल्कि अपने रसिकों के कलात्मक स्तर को ऊंचा करना भी होता है, होना ही चाहिए; इस प्रकार कहें तो ह्यूमन कम्प्यूटर नाम से विश्वप्रसिद्ध शकुंतला देवी के जीवन प्रसंगों पर आधारित यह फिल्म बहुत सारे स्तर पर बिल्कुल खरी उतरती है। बाक़ी बातों को छोड़ भी दिया जाए तो भी आपको शकुंतला देवी नामक व्यक्तित्व के जीवन से जुड़े कुछ प्रसंगों से ही परिचय प्राप्त कराती है, जिनके बारे में आज भी बहुत कम लोगों को ही कुछ ज्ञात है। 

वैसे किसी भी व्यक्ति पर एक कलाकृति, एक पुस्तक या कहीं कुछ पन्ने पढ़, देख, सुन भर लेने मात्र से यह भ्रम तो बिल्कुल ही नहीं पालना चाहिए कि हमको उनके बारे में ज्ञान प्राप्त हो गया है, क्योंकि जीवन बहुरूपिया होता है और हर इंसान बहुरूपा होता है और उनके बारे में जितना जानिए, उससे कहीं ज़्यादा जानने को हमेशा बचा रहता है। वैसे इस फिल्म को बॉयोपिक नाम से प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है, जो एक अंश तक सत्य भी है लेकिन याद रहे यह सत्य का एक अंश मात्र है, फिर सवाल यह भी बनता है कि सम्पूर्ण सत्य जैसा भी कुछ होता है क्या? ख़ासकर व्यक्ति और व्यक्तित्व के संदर्भ में, तो उसका जवाब शायद निदा फ़ाज़ली का यह शेर हो सकता है - 

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी 
जिसको भी देखना कई बार देखना 

यह देखना देखना होता है, परखना नहीं; देखने और परखने में फ़र्क है; अंग्रेज़ी में एक शब्द है - observation (निरीक्षण)। यह कला विधा से जुड़े किसी भी व्यक्ति और उसका अवलोकन करने वाले के लिए बहुत शानदार शब्द है, बिना इसे समझे, जाने और आत्मसात किए, कलाकारी और ख़ासकर अभिनय अमूमन असंभव ही है और जहां तक सवाल परखने का है तो उसे भी बशीर बद्र के एक शेर से समझने की कोशिश किया जा सकता है - 

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता

इसी ग़ज़ल में अगला शेर भी बड़े कमाल का है वो भी अर्ज़ कर देता हूं, क्योंकि आजकल वरिष्ठ-कनिष्ठ के बीच का द्वंद थोड़ा ज़्यादा ही देखने को मिल रहा है, शायद इसे समझ लिया जाए तो मामला थोड़ा आसान हो जाए; शेर कुछ यूं है - 

बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता 

कई बार जीवन का बड़े से बड़ा अर्थ शायरों की चंद पंक्तियों में बड़ी ही आसानी से दर्ज़ होता है, इन्हें पढ़ना, सुनना, समझना, गुनना और आत्मसात किसी महर्षि की साधना के फल से फलीभूत होने के जैसा हो सकता है; शायद इसीलिए कहते भी हैं कि जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि। यह बात और है कि आजकल बुद्धिमान व्यक्तियों को बेइज़्ज़त करने का दौर चल पड़ा है। वैसे भी जब मूढ़ता चरम पर हो, तब विद्वता को तो यह दिन देखना ही है। वैसे भी परीक्षा हरिश्चंद्र को ही देना होता है और ज़हर का प्याला सुकरात को ही पीना होता है। बहरहाल, बात सिनेमा पर वापस लाते हैं। उससे पहले ज़रा बात पढ़ाई-लिखाई की कर लेते हैं। गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर ने इसके संदर्भ में कहीं लिखा था - "शिशु को शिक्षा देने के लिए स्कूल नामक यंत्र का अविष्कार हुआ है। उसके द्वारा मानव-शिशुओं की शिक्षा बिल्कुल भी पूरी नहीं हो सकती। सच्ची शिक्षा के लिए वैसे आश्रम की आवश्यकता पड़ती है। जहां समग्रता में जीवन की पृष्ठभूमि मौजूद हो।" अब शकुन्तला देवी किसी स्कूल में नहीं जातीं, कोई फॉर्मल शिक्षा नहीं है उनके पास, लेकिन वो अपनी प्रतिभा और उसे लगातार परिष्कृत करने की बदौलत न केवल विश्वविख्यात होती हैं बल्कि Astrology for You, Book of Numbers, Figuring: The Joy of Numbers,In the Wonderland of Numbers, Mathability: Awaken the Math Genius in Your Child, More Puzzles to Puzzle You, Perfect Murder, Puzzles to Puzzle You, Super Memory: It Can Be Yours, The World of Homosexuals जैसी प्रसिद्ध पुस्तकों की रचयिता भी बनती हैं। अब ज़रा सोच कर देखिए कि शंकुतला देवी सन 1976 में होमोसेक्सुअल पर पुस्तक लिखतीं हैं, उसको जस्टिफाई करने की कोशिश करती हैं। जिस विषय पर हम आज भी सहजता से बात नहीं कर सकते उस पर एक स्त्री आज से कई दशक पहले ही बड़े खुलके ख़बर, साक्षत्कार और विश्लेषण प्रस्तुत करने की हिम्मत करती है। यह किसी साधारण मनुष्य के वश की बात ही नहीं है, वैसे भी उन्हें साधारण होने से लगभग नफरत सी ही थी। वो हाज़िर जवाब हैं, निडर है, अराजक हैं, लड़ाका हैं, ज़िद्दी हैं, जुनूनी हैं, ड्रामेबाज हैं आदि आदि आदि हैं, कुल मिलाकर बात इतनी कि वो वो नहीं हैं जिससे अमूमन भारतीय नारी का "चरित्रवान" चरित्र की छवि को प्रदर्शित किया जाता है बल्कि उन्हें इस नॉर्मल लाइफ़ से चिढ़ सी ही है, वो न "मैं तुलसी तेरे आंगन की" हैं और ना ही "बेबी डॉल मैं सोने दी" ही हैं। अब जरा विद्या बालन की बात भी लगे हाथ कर ही लेते हैं। विद्या भी फिल्म की दुनिया के स्टार हीरोइन से बेहद अलहदा हैं और उसकी बनी बनाई हॉट, सेक्सी, मॉडल्स आदि आदि के छवि की भी कोई परवाह नहीं करतीं, सो न ज़ीरो फिगर हैं और ना हीरो के कंधे के पीछे से झांकती बेचारी हीरोइन। यह स्मिता पाटिल, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, डिम्पल कपाड़िया, शबाना आज़मी सहित अनगिनत अभिनेत्रियों के संघर्ष और एक लंबी लड़ाई का ही परिणाम है कि आज कुछ अभिनेत्रियां हॉट, सेक्सी और गुड़िया वाली इमेज से अलग हटकर भी मार्केट में शान से टिकी हुई हैं और बेजोड़ काम कर रहीं हैं; बाक़ी व्यक्ति का अपना पसंद-नापसंद और संघर्षरत होने का जज़्बा तो मायने रखता है रहता है। वो एक प्रसिद्ध कथन है न कि हम जैसा सोचते हैं, हमारे भीतर वैसी ही क्षमताएं विकसित होती हैं और हम आख़िरकार वैसे बन जाते हैं और अगर हम वो नहीं बन पाते हैं तो कमी अधिकतर हमारे प्रयास और उसकी दिशा का ही होता है। शकुन्तला देवी ( (4 नवम्बर 1929 - 21 अप्रैल 2013) जो बनना चाहतीं थी, वही बनी और जो बनीं वही वो बनाना भी चाहती थीं, अब थोड़ा बहुत किंतु-परंतु तो चलता ही है। 

हॉलिवुड में जीवनीपरक या ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित सिनेमा बनाने और देखने का अपना एक समृद्ध इतिहास है, अपने यहां भी चलन है लेकिन बहुत ज़्यादा कमज़ोर। इसके पीछे बहुत सी बातें हैं, एक तो प्रमुख कारण यह भी है कि हम या तो पूजने ही लगते हैं या फिर दुत्कारने ही लगते हैं। हम किसी भी प्रसिद्ध इंसान को अवतार और उसे अनुछुआ बना देने की अद्भुत कला से पीड़ित लोग हैं और एक बार हमने जिसे मान लिया तो फिर किसी की मज़ाल ही नहीं है कि उसके बारे में वाह वाह के अलावा भी कोई और शब्द कह दे, तो ऐसे में कोई जीवनीपरक बेहतर काम हो ही नहीं सकता। जब तक हम किसी भी इंसान को श्वेत और श्याम में देखते रहते तब तक केवल झूठ ही रच सकते हैं जबकि इंसान धूसड होता है, मतलब श्वेत और श्याम का मिला जुला रूप, अब पलड़ा किसी तरफ ज़्यादा झुका होगा, यह बात और है। फिर यथार्थ को भी मिर्च मसाला डालके उसे इतना जादुई बना देते हैं कि समझना मुश्किल हो जाता है कि इसमें सत्य क्या है और कल्पना क्या है। वैसे हम सत्य से ज़्यादा कल्पनालोक में ही विचरण करने में ज़्यादा सहज महसूस करते हैं या फिर यथार्थवाद के नाम पर ऐसा नीरस संसार रच डालते हैं कि वो मूलतः देखने, सुनने और समझने लायक ही नहीं बचता। 

यह फिल्म थोड़ी अपवाद है, जो शकुन्तला देवी को उनकी बेटी की नज़र से देखता है और उस नज़र से वो एक जीनियस के साथ ही साथ एक ज़िद्दी, घमंडी, अक्खड़, अपने धून की पक्की, ड्रामेबाज़, निडर और डरी हुई और भी पता नहीं क्या-क्या सब एक साथ नज़र आती हैं; कहने का अर्थ कि इस फिल्म वो एक स्टियोटाइप छवि मात्र नहीं बल्कि एक पूरे का पूरा इंसान नज़र आती हैं, जिसमें अच्छाई-बुराई सब है। केंद्रीय भूमिका को विद्या बालन ने निभाया भी बड़े सौम्यता के साथ है। फिल्म के गठन में हास्य-व्यंग्य और जीवंतता को मिलाकर पटकथा लेखक, निर्देशक और संपादक ने इसे बोझिल होने से बड़े ही बेहतरीन ढंग से बचाया भी है। बाकी सारे कलाकारों ने अपनी भूमिका का समुचित निर्वाह भी किया है। हां, एक चीज़ है जिससे भारतीय सिनेमा को अब मुक्त हो जाने के बारे में सोचना चाहिए कि जिस फिल्म में संगीत (गानों) की कोई ख़ास भूमिका (ज़्यादातर में ठूंसा ही होता है) न हो, उसमें उसका पूर्णतः परित्याग कर देना चाहिए। इस फिल्म में भी गाने न होते तो शायद कुछ मिनट बर्बाद होने से बचाया जा सकता था और इसे एक पीरियड सिनेमा बनाने के लिए इसके कलात्मक पक्ष पर थोड़ी और मेहनत की जा सकती थी।
#पुंज_प्रकाश

शनिवार, 1 अगस्त 2020

रात अकेली है : रहस्य बरकरार रहता है

यह टाइटल पढ़ते ही किसी भी फिलिमची को फिल्म ज्वेल थीप का आशा भोसले का गया वो अद्भुत गीत याद आ जाएगा - "रात अकेली है बुझ गए दिए" हालांकि यहां इस बोल से इस फिल्म का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है लेकिन दूर का रिश्ता तो है ही, ख़ासकर जब आप उस गाने की इस पंक्ति को सुनते हैं - 
सवाल बनी हुई दबी दबी उलझन सीनों में 
जवाब देना था तो डूबे हो पसीनों में 
पूरी फिल्म उन्हीं सवालों, दबी-दबी उलझनों और डूबे हुए अनदेखे पसीनों की एक ऐसी कथा/व्यथा है जो मद्धम-मद्धम अपना जादू ठीक उसी प्रकार बिखेरती है जैसे कि रातरानी की कोई भीनीभीनी ख़ुशबू आपको कहीं धीरे से आकर मदहोश कर जाती है। यह प्रक्रिया उसी वक्त शुरू हो जाती है जब जांच कर रहा इंस्पेक्टर कहता है - "यहां हुई है एक हत्या और हम करेगें उसकी - जांच।" अगर आप एकाग्रचित्त होकर यह सिनेमा देख रहे हैं (देखना भी एक आर्ट है और इसे भी सीखना पड़ता है) तो यह आपके भीतर आपको आत्मसात करते हुए कहीं गहरे समाहित होती चली जाती है और अंत-अंत तक अपना रहस्य, रोमांच, उलझन बनाए रखती है और अगर आप सिनेमा के प्रेमी है तो आपको बार-बार कुछ क्लासिक फिल्मों की याद भी आएगी। कुछ याद आने में कोई बुराई भी नहीं है! वैसे ख़बर है कि यह वाली सन 2019 में आई अमेरिकन फिल्म Knives Out का जुड़वा भाई है। मैंने अभी तक Knives Out देखी नहीं है तो इस पर कोई बात करना सही नहीं होगा। वैसे न भी देखी है तब भी यह फिल्म आपको कम से कम निराश तो नहीं ही करती है बल्कि देसी ही लगेगी और आख़िरीदम तक सस्पेंस और थ्रिल बड़े ही अच्छे से बरक़रार भी रखती है। जैसे ही लगता है कि मामला सुलझ गया तभी कुछ ऐसा हो जाता है कि उलझन और बढ़ जाती है। यह सारा खेल ठीक वैसा ही है जैसे आप उलझे हुए धागों को सुलझाते हैं, सतर्कतापूर्वक और बड़ी ही सावधानी के साथ और जब सुलझ जाता है तब आप चैन की सांस लेते हैं कि चलो काम हो गया।

पहला दिन पहला शो का जुनून ही कुछ और होता है। मल्टीप्लेक्स ने सिनेमा देखने को वैसे तो एक कमाल के अनुभव में परिवर्तित कर दिया है लेकिन सिंगल स्क्रीन का भी अपना ही एक विसाले सनम था। एडवांस बुकिंग के लिए सुबह आठ बजे से ही लाइन में लग जाना, फिर 9 बजे 2 मिनट के लिए खिड़की का खुलना और 5 टिकट काटके हाउसफुल का बोर्ड लगा देना, फिर शो के समय टिकटों की कालाबाज़ारी और टिकट खिड़की पर पहलवानी करते हुए किसी प्रकार टिकट प्राप्त करना और फिर एक अतिकष्टदायक माहौल और सीट में बैठकर सिनेमा के जुनून का आनंद लेना और अपना नाम सिनेमची की लिस्ट में देखना, यह सब पागलपन था। फिर पहले दिन पहला शो का भी एक अपना नशा था। किसी भी प्रकार से टिकट लेना ही लेना है, चाहे ब्लैक में ही क्यों न लेना पड़े और प्रथम दिन प्रथम शो देखना ही देखना है, वरना फिल्म देखनी ही नहीं है। यह बात इसलिए सुना रहा हूं कि नेटफ्लिक्स पर आई "रात अकेली है" को लेकर भी मेरे मन में ऐसा ही भाव था, उसकी मूलतः दो वजह है - पहला नवाज दा और दूसरे ख़ालिद तैयबजी और तीसरा कि यह एक मर्डर मिस्ट्री फिल्म है। अब इन वजहों में से आप पहले, दूसरे स्थान और तीसरे स्थान पर किसी को भी रख लीजिए, कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। 

अब तीन बातों का ज़िक्र हुआ तो अमूमन ध्यान वहां टिका होगा कि यह ख़ालिद तैयबजी कौन हैं? इसका सही जवाब फ़िलहाल गूगल के पास भी नहीं है। आप उनका नाम टाइप करेगें तो कोई विकिपीडिया पेज नहीं आएगा, बस इतनी सी जानकारी आएगी एक जगह कि वो भारतीय अभिनेता हैं और दो तीन फिल्मों के नाम आ जाएगें - बस। फिर दो पुस्तकों का नाम आ जाएगा जिसे इन्होंने अनुवादित किए हैं, एक है बहुत ही मत्वपूर्ण  Zbigniew Cynkuti की पुस्तक Acting with Grotowski. वैसे ख़ालिद जंगल के मोर हैं। लेकिन हम सब तो इस बात में विश्वास करते हैं कि "जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?" लेकिन वहीं यह सत्य भूल जाते हैं कि मोर के असली नाच का मज़ा लेना है तो आपको जंगल में नाचते स्वछंद मोर का ही नाच देखना पड़ेगा, बेचारा पिंजड़े में बंद क्या मोर और क्या शेर! भारत में जो लोग भी अभिनय और रंगमंच नाम की विधा में थोड़ी भी गंभीरता से रुचि रखतें हैं वो यह बात भलीभांति जानते हैं है कि ख़ालिद का स्थान क्या है, यह हमारी बदक़िस्मती हैं कि हमें उन चरागों की कोई परवाह ही नहीं, जिन्हें हवाओं का कोई ख़ौफ़ ही नहीं। क्या फ़र्क पड़ता है यदि निदा फ़ाजली यह कहते हैं कि 

जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए 

बहरहाल, एक छोटी सी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में ख़ालिद को इस फिल्म में देखना किसी विरासत से दीदार होने के जैसा है। यहां ख़ालिद उस स्तानिस्लावस्की द्वारा कहे इस कथन को साक्षात प्रमाण दे रहे हैं कि कोई भी भूमिका छोटी या बड़ी नहीं होती बल्कि अभिनेता छोटा बड़ा होता है। वैसे यह भी संभव है कि उपरोक्त बातें मैं उनके सम्मान में अर्ज़ कर रहा होऊँ। लेकिन एक बात तो है कि अब हमें हमारी विरासतों की सच में कितनी चिंता है, वो हम सब बहुत ही अच्छे जानते हैं। 

फिल्म में ज्यातर अभिनेताओं की टोली है, स्टार होते तो फिल्म फिल्मी होती लेकिन फिल्म का फिल्म होना और फिल्मीपने से बचे रहना भी एक कला है और उतने पर भी उसका आकर्षण बरकरार रहे, यह फिल्म उस कला में पास होती है। वो दृश्य दर दृश्य बड़े इत्मीनान से कुछ ऐसे खुलती है जैसे कोई पौधा अपने प्राकृतिक और कलात्मक समय से बड़ा होता है। वैसे फिल्म कल ही देख ली थी, फिर कई बार कुछ दृश्य आगे-पीछे करके देखा-समझा फिर जैसे "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक" वैसे ही थोड़ा असर होने के लिए छोड़ दिया, उसके बाद जो महसूस हो रहा है वो दर्ज़ किया जा रहा है। साथ ही यह अर्ज़ भी कर रहा हूं कि सिनेमा पर मेरे लेखन को मेरी राय माना जाना चाहिए, मेरा विमर्श/व्याख्या माना जाना चाहिए, समीक्षा नहीं और मेरा लेखन ही अंतिम सत्य है ऐसा भ्रम किसी मूर्ख को ही हो सकता है। किसी भी कलात्मक कार्य (अगर वो सच में कलात्मक है तो) की समीक्षा करना बड़े ज्ञान का काम है, दुनियां में बहुत कम लोगों के पास ही यह हुनर है। आप और हम अमूमन समीक्षा के नाम पर जो पढ़ते हैं वो FIR जैसा कुछ होता है, समीक्षा नहीं। कहानी लिख देना, स्टार दे देना, फलां-फलां का काम गिनवा देना, इसे समीक्षा नहीं कहते बल्कि संभव है कि किसी कला की समीक्षा करते हुए कोई पता ही न चले कि कोई आपको ज्ञान की किन-किन गलियों की सैर करा दे और जब वापस लौटे तब तक आप वही व्यक्ति न रह जाएं, जो उस समीक्षा को पढ़ने से पहले थे। लेकिन ऐसी लिखाई हिंदी में एक तो बहुत कम है और अगर है भी तो उसकी परवाह करनेवाले बड़े कम हैं। 

बाक़ी इस फिल्म के बारे में ज़्यादा लिखना या कुछ और लिखना इसके स्वाद को ख़राब करना होगा। अगर आप सिनेमा को एक सार्थक कलात्मक माध्यम मानते हैं तो इसे देखें, सस्पेंस और थ्रिल पसंद करते हैं तो इसे देखें, सटल्ड अभिनय पसंद करते हैं तो इसे देखें, हर चीज़ स्वादानुसार पसंद करते हैं तो इसे देखें और सबसे ज़रूरी बात कि नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की प्रसिद्धि से ज़्यादा सिद्धि के रसिया हैं तो इसे देखें और साथ में कहानी में शराफ़त के पीछे का विद्रूप चेहरा का परत दर परत खुलना पसंद करते हैं तो ज़रूर ही देखें। वैसे एक चीज़ जो इस फिल्म में सबसे ज़्यादा नोटिस करनेवाली बात है वो यह कि अमूमन ज़्यादातर चरित्र यहां अंधों का हाथी वाले क़िरदार में है, जो अपने-अपने हिस्से का सच और अपने-अपने हिस्से का झूठ बोलता पाया जाता है और आख़िरीदम तक उसमें ही टिके रहने की पुरज़ोर कोशिश में भिड़ा भी देखा जा सकता है। जब बड़ी ही ज़िद्द के साथ सच को खोदकर बाहर निकाला जाता है, तब असली चेहरे सामने आते हैं और जब आते हैं तब सब चौंक पड़ते हैं। जो दिखता है वो ऊपरी परत है और जो होता है वो कुछ और ही है। यह दिखने और होने के बीच का सारा खेल है जो रहस्य और रोमांच पैदा करता है। वैसे मुझे कई बार थोड़ी-थोड़ी चाइनाटाउन भी याद आई, पता नहीं वो आनी चाहिए थी कि नहीं।

#रात_अकेली_है 
निर्देशक - Honey Trehan
अभिनेता - नवाज़ुद्दीन सिद्धकी, राधिका आप्टे, ख़ालिद तैयबजी, श्वेता त्रिपाठी, तिग्मांशु धूलिया, शिवानी रघुवंशी, निशांत दाहिया, इला अरुण, स्वानंद किरकिरे और आदित्य श्रीवास्तव।

सोमवार, 27 जुलाई 2020

Fault in Our Stars से दिल बेचारा तक

अमेरिकन उपन्यासकार है John Michael Green, इन्होंने सन 2012 में एक उपन्यास लिखी Fault in Our Stars नाम से। उपन्यास बड़ा पढ़ा और पसंद किया गया। उन्होंने शेक्सपीयर के नाटक जूलियस सीज़र के एक संवाद से प्रभावित होकर उपन्यास का नामकरण किया था, उस नाटक में कैसियास कहता है - 
The fault, dear Brutus, is not in our stars, 
But in ourselves, that we are underlings. 
सन 2014 में इसी नाम से फिल्म निर्देशक Josh Boone ने एक फिल्म बनाई थी जिसमें Shailene Woodley, Ansel Elgort, and Nat Wolff ने मुख्य भूमिकाओं का निर्वाह किया था, यह फिल्म भी काफी सफल हुई थी। अब इसी फिल्म को हिंदी में बनाया गया है और नाम रखा गया है - दिल बेचारा। इसे निर्देशित किया है रंगमंच से कास्टिंग डायरेक्टर बने और कास्टिंग डायरेक्टर से फिल्म निर्देशक बने मुकेश छबड़ा ने। दोनों जगहों पर फिल्म को फॉक्स स्टार स्टूडियो ने बनाया है लेकिन दोनों का अंतर उतना ही उभरकर सामने आता है जितना रिबॉक और रिबूक में है।

Fault in Our Stars फिल्म में एक ख़ास बात यह भी है कि आप इत्मीनान से चरित्र के भीतर-बाहर की दुनिया में प्रवेश करते हैं, वहां तर्क है, लॉजिक है, साइलेन्स है, ऊब है, गाने हैं लेकिन नाचने के लिए नहीं है, स्थिति, परिस्थिति, कथ्य और भावनाओं को अच्छे उभरने के लिए उचित वक्त दिया गया है, हर बात के पीछे गहरी दृष्टि है, एक-एक फ्रेम अर्थवान और कलात्मकता के पैमाने पर भी खरा उतरता है। एक ख़ास बात जो मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया वो यह कि उसमें एन फ्रैंक के घर को देखते हैं। जिन्हें फ्रैंक के बारे में नहीं पता उसके लिए बस इतनी सी जानकारी कि फ्रैंक वही यहूदी किशोरी है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के भय से छुपी रहती है और रोज़ डायरी लिखती है, युद्ध समाप्ति के उपरांत वो डायरी प्रकाशित होती है और यह पुस्तक आज भी दुनिया भर में पढ़ी जानेवाली पुस्तकों में शुमार है। फिल्म में इसे देखना एक शानदार उपलब्धि है।

बाक़ी जहां तक सवाल दिल बेचारा का है तो यह फिल्म सुशांत सिंह राजपूत के मौत की वजह से अब एक भावनात्मक मुद्दा बन गया है, वैसे यह भावनाएं भी आजकल बड़ी सलेक्टिव हो गई हैं और वो वहीं जागती हैं जहां हम उसे जगाना चाहते हैं या कोई बड़ी कुशलता से हमारी भावनाओं की डोर भी अपने हाथ में पकड़ उसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से जगाता-सुलाता है; बाक़ी किसी गरघे से लटके कारीगर और अपने खेत के पेड़ से लटके किसान की तस्वीर या आनन-फानन में लॉकडाउन में पता नहीं कितने किलोमीटर पैदल चले लोगों पर हम मौन धारण कर लेते हैं - अमूमन। वैसे भावनाओं का तर्क से कोई सम्बंध नहीं होता, इसलिए इसकी तार्किक समीक्षा करने का अर्थ है फालतू में लोगों की नाराज़गी का केंद्र बनना, क्योंकि उनकी भावना (?) जुड़ी हैं।

भावनात्मक स्तर पर एक कलाकार को श्रद्धांजलि के तौर पर दिल बेचारा देखा जा सकता है, देखना भी चाहिए और देखा भी जा रहा है लेकिन साफ तौर से कहें तो दिल बेचारा दरअसल बेसिरपैर का एक "एडप्टेशन बेचारा" होकर रह जाता है। उपन्यास तो मैंने अभी तक पढ़ा नहीं है लेकिन फिल्म की बात करें तो हॉलीवुड की फिल्म से बहुत कुछ सीधे-सीधे उठा लिया गया है कुछ हिंदी फिल्म का तड़का भी है लेकिन वो अंतरदृष्टि ग़ायब है जो उसे एक शानदार और यादगार फिल्म बना सकती थी, कुछ-कुछ राजेश खन्ना अभिनीति आनंद की तरह। वैसे जो कुछ भी किया गया है इसे रूपांतरण नहीं बल्कि नक़ल कहा जाता है। जब आप किसी भी चीज़ का रूपांतरण करते हैं तो आप पात्रों का नाम बदलते हैं, परिवेश बदलते हैं, स्थान बदलते हैं और साथ ही साथ आपको संस्कृति और एहसास भी बदलना होता है, उसके बाद आपको कलात्मकता के उच्चतम स्तर को भी ध्यान में रखना होता है, न कि केवल सफलता और असफलता को, उसके लिए बौद्धिकता, साफ दृष्टि और उस हिम्मत की दरकार होती है जो तीसरी क़सम बनाते हुए शैलेंद्र के भीतर थी। इसका साक्षात उदाहरण आप गुलज़ार की फिल्म परिचय और हॉलीवुड की फिल्म sound of music देखकर पा सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि भारत में इतना चिंतन करके कलाकारी करनेवाले बहुत ही कम लोग है और उसे देखने, पसंद करने वाले भी कम ही है, इसलिए सबकुछ ज़रूरत से ज़्यादा ग़ैरबौद्धिक कवायत होकर रह गया है। यहां हम केवल कलेक्शन (आर्थिक सफलता) को केंद्र में रखते हैं और सार्थकता को तेल लेने भेज देते हैं। बहुत सारे कथ्य ऐसे होते हैं जो बहुत रिसर्च की मांग करते हैं और थोड़ा केयर की मांग करते हैं और आपसे सफलता असफलता के बने-बनाए आदर्श से हटकर सोचने को भी कहते हैं और अगर आप ऐसा नहीं करते तो दरअसल आप उस कथ्य के साथ न्याय नहीं कर पाएगें। सबकुछ केवल मनोरंजन की दृष्टि से गढ़ा और देखा नहीं जाता, नहीं तो वेटिंग फॉर गोडो का कोई महत्व ही नहीं रह जाएगा!

इसमें कोई संदेह नहीं कि बतौर अभिनेता सुशांत में बहुत संभावना थी और समय-समय पर उसने इसे साबित भी किया है और आगे वो और प्रखर ही होते लेकिन यह एक पीड़ा का विषय है कि बहुत सारी संभवनाएं समय से पहले समाप्त कर दी जातीं है और उसका निष्कर्ष कुछ ख़ास नहीं निकलता है या निकलने दिया जाता है। अब उसके पीछे कारण चाहे जो भी हो, वो चाहे मीना कुमारी का केस हो, प्रवीण बॉबी का केस हो, दिव्या भारती का केस हो या फिर श्रीदेवी का केस हो, या कोई और केस हो, सब धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है और हम भी तत्काल में किसी को नायक-खलनायक या विदूषक बनाकर भूल जाते हैं और अगले शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं - ठहराव एक अवस्था है, जिसके आसपास फटकने तक से हम पता नहीं क्यों बचते ही रहते हैं। 

बात केवल उतनी ही नहीं होती जितने की चर्चा होती है बल्कि बात यह है कि यह दुनियां ऊपरी तौर पर जितना चमकदार लगे लेकिन अंदर से उतनी ही सड़ांध है, जहां हर दूसरे के पास पहले के लिए नफ़रत है, साजिश है, अंधेर है। इसमें हम सब शामिल हैं, हम सब भी कोई बहुत दूध के धुले नहीं हैं। हम इसी दुनियां के हिस्से हैं, हमारे ही भीतर यह दुनिया है और हमने ही इसे बनाया या बिगाड़ा है। गुरुदत्त और साहिर ने तो कब का कह दिया कि "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है", हमने कभी इत्मीनान से बैठकर सोचा कि यह किसी दुनिया की बात की जा रही है और क्यों, हमने आजतक इसे माना? बल्कि इसे विभिन्न-विभिन्न तर्कों-कुतर्कों से और और और विकृत ही करते जा रहे हैं - लगातार। बहरहाल, क्या है, क्यों है, कैसा है - हम सब जानते हैं और बहुत अच्छे से जानते हैं, अब इस जानने को कितना मानते हैं यह बात और है और अगर मानते हैं तो बदलाव का कोई सार्थक प्रयास करते भी हैं या कोई हांकता है और हम बस भीड़ बनाकर निकल पड़ते है और इसे ही त्याग और तपस्या मानते हैं या फिर खोखले पेड़ से लिपटकर सोचते हैं कि आंधियां अब हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं? चलिए अब जो है वो तो है ही लेकिन अगर बेहतरीन सिनेमा की बात है तो Fault in Our Stars के साथ जाना ही अच्छा है बाक़ी अगर भावना की बात है तो वो तो सुशांत के साथ रहनी ही चाहिए। 

जहां तक सवाल कलाकारी और राजनीति का है तो उसमें किसी का पंखा (फैन) होना, अच्छी बात नहीं है क्योंकि जब आप किसी के पंखे हो जाते हो तो आपके भीतर उसे सही से परखने का हुनर और अंतर्दृष्टि चला जाता है और आप पंखा बनाकर लटका दिए जाते हैं, जिसे करंट के झटके से बस गोलगोल घूमना होता है और हवा छोड़ना होता है और चलानेवाले कोई उसके नीचे बैठकर आनंद लेता है। मैं ख़ुद व्यक्तिगत रूप से एआर रहमान को पसंद करता हूं लेकिन इधर उनको सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही बॉम्बे, रोज़ा, ताल, हमसे है मुक़ाबला, स्लमडॉग आदि वाले रहमान हैं, इस फिल्म में भी मुझे उनसे निराशा ही हाथ लगी। वैसे यह भी सत्य है कि रहमान का संगीत धीरे-धीरे असर करता है, तो क्या पता आगे इसका असर हो जाए। अंत में हरिशंकर परसाई की एक पंक्ति याद आ रही है, वो कहते हैं - इस दुनिया में सबसे ज़्यादा ज़िंदगियां शुभचिन्तकों ने तबाह की हैं!
- पुंज प्रकाश

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

उनके लिए जिनका अभिनय विधा में गंभीर दिलचस्पी हो।

Netflix पर Jim & Andy: The Great Beyond नामक एक बड़ी ही अद्भुत डाक्यूमेंट्री है, जो जिम कैरी द्वारा अभिनीति फिल्म Man on the Moon के प्रोसेस के बारे में बात करता है। चरित्र की तैयारी की सच्ची और व्यवहारिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। जिस कि ज्ञातव्य है कि Man on the Moon सन 1999 में बनी एक जीवनीपरक हास्य ड्रामा फिल्म है जो अमरीकन कलाकार एंडी कॉफमैन के जीवन प्रसंगों और कलाकारी को आधार बनाती है। यहां एंडी की भूमिका जिम कैरी ने किया है और इस भूमिका के लिए उन्हें गोल्डन ग्लोब सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। Jim & Andy: The Great Beyond नामक यह डाक्यूमेंट्री उसी चरित्र की तैयारी और फिल्माकन की गाथा प्रस्तुत करता है। फिल्म की शूटिंग के दौरान ही यह डाक्युमेंट्री फिल्माया गया था लेकिन इसे 2017 में नेटफ्लिक्स ने रिलीज़ किया है। यहां जिम अपनी तैयारी की बात करते हैं, चरित्र को आत्मसात करने की प्रक्रिया पर बात करते हैं, अपने और अपने चरित्र में समानता और विषमता की बात करते हैं, लाखों बातें हैं - ख़ुद ही देख लीजिए क्योंकि यहां चाहे कितने भी वजनदार शब्द लिख दूं वो कमतर ही पड़ेगा।

अभिनय विधा को गंभीरता से लेने वाले हर विद्यार्थी (एक कलाकार वैसे ताउम्र एक विद्यार्थी ही होता है, वो जितना साधता है उससे कहीं ज़्यादा साधने को बाक़ी रहता है - हमेशा) को यह डक्यूमेंट्री और फिल्म देखनी चाहिए। अब आप फिल्म पहले देखिए या डाक्युमेंट्री पहले इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। यह कुल मिलाकर वहीं बात होगी कि कान आप सीधा पकड़ें या उल्टा, पकड़ाएगा तो कान ही। यह एक अभिनेता का चरित्र में बदल जाने की महागाथा भी है और कहीं न कहीं इस बात का पुख़्ता सबूत भी अभिनय "हम जहां खड़े हो गए लाइन वहीं से शुरू होती है" नामक चीज़ का नाम भी नहीं है बल्कि अभिनय एक परकाया प्रवेश की तकनीक है जिसे सीखना ही होता है। इसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत परिवेश सब आता है, अंदर बाहर सब। एक इंसान के अंदर-बाहर जितने भी अवयव हैं वो सबके सब सहायक हैं लेकिन उसे गढ़ने के लिए आख़िरकार एक तकनीक ही काम आती है। इस डिबेट में कुछ नहीं रखा कि अभिनय सिखाया नहीं जाता, सिखाया जाता हो या नहीं सिखाया जाता हो लेकिन सिखना पड़ता है। अब यह विधा आप कहां जाकर सिखते हैं या स्वयं साधना करते हैं, या आपको कोई वरदान मिलता है इस बात से कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ता है लेकिन सीखना तो पड़ता ही है वरना तो निगलो और उगलो ही चलता रहेगा। 

Man on the Moon यह फिल्म यूटूब पर फ्री में उपलब्ध है लेकिन Jim & Andy: The Great Beyond के लिए आपको नेटफ्लिक्स पर जाना होगा। वैसे जिम कैरी का काम हर अभिनेता को बार बार देखना ही चाहिए, वो अद्भुत हैं; भूमिका चाहे जैसी भी हो वो उस चरित्र के स्किन के अंदर समाहित होने की कला बाख़ूबी जानते हैं। यह जनाने को रोज़ साधना होता है वरना आपका हथियार कितना भी तेज़ हो अगर उसका इस्तेमाल बंद हुआ तो ज़ंग लगते तनिक भी देर नहीं लगती है।

तितली और गांव

बचपन में तितली पकड़ना भी एक खेल हुआ करता था। दिन-दिन भर भूखे-प्यासे तितलियों के पीछे भागना और भिन्न-भिन्न प्रकार की तितली पकड़ना एक शानदार करतब था। उस वक़्त इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि यह समझा जाए कि ऐसा करने से इन मासूमों को कष्ट होता है।

कभी इनकी पूंछ में घास खोंसकर उड़ाना, तो कभी इनके आधे पंख कुतर देना और फिर उड़ाना, बचपना और नासमझी ही तो था। इसे एक मासूम गुनाह भी कहा जा सकता है। आज लगता है कि इस तरह के खेल खेलने से हमें रोका जाना चाहिए था, लेकिन ख़ैर, जो बीत गई वो बात गई। 

अच्छी बात है कि ये गांव में आज भी प्रचूर मात्रा में हैं, कम से कम हमारे गांव में तो हैं हीं। जहां जाइए रंग-बिरंगे उड़ते मिल जाते हैं। अभी पढ़ने में व्यस्त था तो खिड़की के बाहर नज़र गई। बहुत सारे उन्मुक्त उड़ रहे थे। मैं इन दोनों को ही कैमरे में क़ैद कर पाया। 

इन तितलियों की तस्वीर निकालना बड़ा धैर्य का काम है। आपको लंबे समय तक एक स्थान पर कैमरा सेटअप करके इंतज़ार करना होता है और आते ही क्लिक करना होता है, ज़रा सी भी हलचल हुई नहीं कि ये फरार हो जाएगीं। फिर शाम का वक्त है तो लाइट्स भी बड़ी तेज़ी से बदलती है, उसके सेटअप का भी ध्यान रखना है। 

इनसे केवल गांव में ही मुलाक़ात संभव है, शहर तो इन्होंने कब का छोड़ दिया है। लाल वाली बड़ी सतर्क थी, उसने अपना क्लोज शॉर्ट लेने ही नहीं दिया, पीली वाली को लगता है फोटो खिंचवाने का शौक़ था, वो आराम से आकर बैठी रही कि खींच लो, जितना भी खींचना है। तस्वीरें बहुत्ते क्लिक कीं लेकिन आपके लिए फ़िलहाल यह दो ही, शायद इस संकट काल में इन तितलियों को ऐसे उन्मुक्त विचरण करते और केवल अपने ऊपर ही विश्वास और भरोसा करते हुए देखना, आपको भी पसंद आए। शायद थोड़ा अच्छा-अच्छा सा महसूस हो, ख़ासकर उनको जो बड़े-बड़े शहर में लगातार क़ैद रहने को अभिशप्त हैं। कई बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने आजतक उड़ती हुई जीवंत तितली देखी ही नहीं है, देखी है तो केवल पुस्तकों में, तस्वीरों में। 

वैसे अच्छा है कि तितलियों का कोई दल नहीं है और ना ही कोई नेता, इसलिए देश भी नहीं है। नहीं तो क्या पता सब के सब एक ही रंग में रंग दी जातीं या एक ही तरह से सोचती और अपने से अलग सोचनेवालों को देशद्रोही कहतीं। इनका भी अलग-अलग देश हो जाता और भाषा, बोली, रंग, वाद आदि के नाम पर ये भी एक दूसरे को काट खाने को तैयार हो जातीं जबकि प्रकृति का मज़ा ही यही है कि उसमें भिन्नताएं हों, और सब सहअस्तित्व की भावना के साथ आज़ादी से विचरण करें।

NSD के निदेशक पद के लिए आवेदन आया है पुनः - - -

इन दिनों सबसे ज़्यादा दुर्गति शिक्षण संस्थानों की हुई है। दुर्गति की वैसे यह प्रक्रिया कई दशक पहले ही शुरू हो चुकी थी लेकिन फल अब साफ-साफ दिखने लगा है। अच्छे से अच्छा (भारतीय अनुपात में) शिक्षण संस्थान को तबाह करने में कोई कोताही नहीं बरती गई है। नेता, मीडिया, जनता सबने जम के बर्बादी में न केवल साथ दिया है बल्कि सक्रिय भूमिका का निर्वाह भी किया है। सत्ता ने हर स्थान पर शिकंजा कसा है तो वहीं सत्ता की खुलके चापलूसी करनेवाले लोग भी बढ़े हैं। उन्हें लगता है कि वो चापलूसी करके कुछ शानदार कर डालेगें लेकिन होता यह है कि वो अपनी कुर्सी बचाने और थोड़ा धन कमाने और थोड़ा अपने शुभचिंतकों में बांटने के सिवा, थोड़ा प्रोजेक्ट हथियाने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते हैं, कई लोगों की तो चापलूसी भी फेल हो जाती है, क्योंकि वहां भी हद दर्ज़े का कम्पटीशन है; एक से एक चापलूस जीभ में लार टपकाते साम, दाम, दंड और भेद को प्रयोग करते हुए कहीं भी प्रचूर मात्रा में बरामद किए जा सकते हैं। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने जब से अपने आप को ग्रांट बांटो, महोत्सव कराओ और अपनों को रोज़गार दो नामक एजेंसी के रूप में परिवर्तित किया है, तब से यह अपने मूल उद्देश्य नाट्य-प्रशिक्षण से भटक गया है। अब वहां जो कुछ भी होता है या हो रहा है वो खुलेआम ज़ाहिर है, सबको पता है बाक़ी न जानने का ढोंग हम जितना चाहे कर लें। बहरहाल, जो कुछ भी हुआ वो अब इतिहास है, उससे सीख लिया जा सकता है, अगर कोई लेना चाहे तो। फ़िलहाल बात यह है कि रानावि के निदेशक के लिए आवेदन आमंत्रित किया गया है। अद्भुत बात है कि पिछले कई वर्ष से यह स्कूल अस्थाई अध्यक्ष और निदेशक के ज़िम्मे है। बाक़ी इन्होंने या इनसे पहले वालों/वाली ने जो कुछ किया वो भी जग ज़ाहिर है, एक पंक्ति में बात यह कि रानावि की प्रतिष्ठा में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं ही हुआ बल्कि ग्राफ़ नीचे ही गया है साल दर साल।

वैसे अमूमन देखा यह गया है कि नाम पहले से ही तय करके यहां विज्ञापन निकाला जाता है और एक जादुई प्रक्रिया के तहत साक्षात्कार लेकर बाक़ी सबको अयोग्य करार देकर तय किए नाम को योग्य बना दिया जाता है। वो कितने योग्य थे वो आप उनके काम की व्याख्या करके तय कर लीजिए, निष्पक्ष रूप से। यह भर्ती अभियान बहुत पुराना है। पिछले कई साल से रानावि के निदेशक के पद को लेकर घोर लॉबिंग हुई है, राजनीति हुई है, पहुंच और पैरवी का भरपूर इस्तेमाल हुआ है, माहौल तक बनाया गया है जैसे कि कोई चुनाव हो, बस लाठी-गोली चलना बाक़ी है। इस विज्ञापन के आते ही फिर से सबकुछ शुरू हो चुका है। कइयों की बांछें खिल गए और सामने मालपुआ दिखने भी लगा है, यह बात और है कि खाएगा कोई एक और बाक़ी सब उसके बाद "क्रांतिकारी" हो जाएगें। उसके बाद साजिशों का दौर चलेगा।

लोग तरह-तरह से सक्रिय हो चुके हैं और किसी भी तरह से बस उस कुर्सी पर विराजमान होना चाहते हैं। अपनी पहुंच, पैरवी भी खंगालने लगे हैं। ऐसा नहीं कि यह सब आज शुरू हुआ है बल्कि यह रोग तो पुराना है और सबसे ज़्यादा प्रचलित और लोकप्रिय भी। रानावि की अधिकतर बहलियां व्यक्तिगत पसंद-नापंसद हैं। अब यह लिखित रूप में होता नहीं है इसलिए इसका कोई सबूत होता नहीं है। 

इन सबको दरकिनार किए जाने की ज़रूरत है और तलाश करके किसी ऐसे को (वो आवेदन करे ना न करे) उस पद पर बैठाने की ज़रूरत है जिसके भीतर रंगमंच को लेकर कोई शानदार और जनपक्षीय विजन हो। जो कला को एक उत्सव से ज़्यादा सामाजिक ज़िम्मेदारी समझता हो। जो यह समझता हो कि यह विद्यालय आम जनता के टेक्स के पैसे से संचालित होता है इसलिए इसके प्रशिक्षण का तरीक़ा भी जन सरोकार, जन कल्याण से जुड़ा होगा, हवा-हवाई नहीं कि कुछ नाटक करो, कुछ बड़े-बड़े नाम जानो और उड़ान थामो। जो यह कहने का माद्दा रखता हो कि हमारा काम प्रशिक्षण का है, बाक़ी चीज़ें हम नहीं करेगें, सरकार उसके लिए अपना कोई अलग विभाग बना ले। उसकी तलाश हो जिसका बॉयोडाटा से ज़्यादा नियत साफ़ हो, व्यक्तिगत और सामाजिक ईमानदारी कूट-कूटकर भरी हो, जिसकी रीढ़ की हड्डी तनी हो और तनी रहे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बस नाम बदलेगा, ना प्रकृति बदलेगी, न काम और न प्रवृत्ति। 

वैसे कुछ नहीं बदलेगा इसकी गारेंटी आप मेरे से ले सकते हैं, हां कुछ उन्नीस से बीस होगा और कुछ बीस से उन्नीस। सत्ता बदलते ही कैम्पस में भांति-भांति के कुछ नए चर्मरोग दिखने लगते हैं, बाक़ी ज़्यादा कुछ होता है नहीं। आधे-अधूरे का प्रसिद्ध संवाद है ना - "फिर एक बार, फिर से वही शुरुआत" बाक़ी सबकुछ आधे-अधूरे वाला ही हाल है। राग वही गाया जाएगा, पद भी नहीं बदलेगा, बस गानेवाले चेहरे बदल जाएगें। वो एक फिल्मी गाना है ना - आईना वही रहता है, चेहरे बदल जाते हैं। दरअसल हुआ यह है कि इस विद्यालय के आसपास ऐसा चक्रव्यूह निर्मित हो गया है कि इसे बिना ध्वस्त किए जो कोई भी आएगा "राग-दरबारी" ही गाएगा।

कोरोना में रंग-प्रशिक्षण संस्थान का क्या है प्लान?

व्यावसायिक या सरकार के सहयोग से विभिन्न नाट्य विद्यालय, महाविद्यालय या निजी (?) संस्थान अलग-अलग अवधि का शिक्षण-प्रशिक्षण कोर्स चलते हैं और जैसा भी संभव है बेहतर से बेहतर प्रशिक्षण देने का प्रयत्न करते हैं। कोई स्कॉलरशिप देते हैं तो कोई फीस लेते हैं, कुछ बिना किसी ख़ास लेन-देन के भी चलते हैं। फ़िलहाल कोरोना काल चल रहा है तो एक साल वाले स्कूल में आधे साल क्लास हुआ, फिर कोरोना संकट आया और उन्हें अपने-अपने घर भेज दिया - अब? उनका क्या होगा, सुनने में आ रहा है कि उन्हें पासआउट मान लिया गया! आश्चर्य है, ऐसी डिग्री उनके किस काम आएगी जहां कोर्स ही कम्प्लीट न हुआ? 

वो स्कूल अब नए एडमिशन की तैयारी में हैं, उनके पास क्या कोई प्लान है कि अगर यह कोरोना संकट दूर नहीं हुआ वो अपने विद्यार्थियों को आगे कैसे पढाएगें। घर बैठाकर डिग्री बांट देने से क्या होगा? ऑनलाइन थियेटर क्या कोई भी पढ़ाई पूर्णरूपेण कम्प्लीट हो ही नहीं सकती यह बात एकदम सही है, है कोई गाइडलाइन या प्लान ऑफ एक्शन सरकार या स्कूल प्रशासन की तरफ़ से। अगर नहीं है तो किस बिना पर यह नया एडमिशन ओपन किया जा रहा है और पुराने को पासआउट समझ लेने का भ्रम बनाया जा रहा है?

अगर इस विषम परिस्थिति में कोई प्लान ऑफ एक्शन है तो उसे साफ-साफ लोगों तक पहुंचाना चाहिए, किसी भी माध्यम से। आज के समय में सब सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, वहीं इस सूचना को डाल दें और अगर कोई तगड़ा प्लान नहीं है तो छात्रों का एडमिशन लेने और अपने पुराने छात्रों का कोर्स कम्प्लीट किए बिना पासआउट करने का कोई अर्थ ही नहीं है, बल्कि यह समय, ऊर्जा और धन (सरकारी या निजी) की बर्बादी के साथ ही साथ भविष्य से खिलवाड़ ही होगा। इससे तो बेहतर यह होगा कि इन स्कूलों पर ख़र्च होनेवाले बजट को स्थिति सामान्य होने तक उन कलाकारों के हित में इस्तेमाल किया जाए, जो बेहद आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रहे हैं। वैसे ज़्यादातर कलाकार तंगहाल ही हैं। 

वर्तमान दौर में हाथ धोते रहना अच्छा है लेकिन इस चक्कर में बहुत सी बातों से हाथ धो लेना, अच्छा तो नहीं ही माना जाएगा। बाक़ी आपकी अपनी इच्छा, अपना विश्वास।

सेपियन्स : मानव-जाति का संक्षिप्त इतिहास

कुछ पुस्तकें ऐसी होतीं हैं जो अपने तर्क से इंसान की देश, धर्म, समाज, विचार, राजनीति, समाज, सामाजिकता, आदि आदि की अब तक बनी समझ या नासमझी को झकझोर कर रख देतीं हैं बशर्ते सोचने-समझने की शक्ति ग़ुलाम, लाचार और मजबूर न हुई हो, यह एक ऐसी ही महत्वपूर्ण पुस्तक है। हालांकि इतिहास का ही विद्यार्थी हूं लेकिन फिर भी यह पुस्तक वैसी नहीं है कि जिसे एक झटके में पढ़कर समाप्त कर दिया जाए बल्कि यह पढ़ पढ़के समझने और समझ समझ के पढ़ने वाली पुस्तक है। यह इतिहास का मोटापा लिए वैसा ग्रंथ भी नहीं है जिसमें राजा-रानी की कहानी हो, कुछ दिन महीने साल हों, और कुछ कृत्य-कुकृत्य को रट लिया जाए और किसी परीक्षा में जैसा खाया वैसा निगल दिया जाए और काम बन जाए बल्कि यह इंसान की उत्पत्ति से लेकर अब तक की एक ऐसी महागाथा है जो विभिन्न काल में उसकी उपलब्धियां और उसकी व्यर्थता का पर्दाफाश करती है। इसीलिए इसे पढ़ने में कई महीने ख़र्च हुए और इसे और भी कई बार पढ़ना होगा। कुल मिलाकर बात यह कि इसे पढ़ लेने के बाद आप वही नहीं रहते जो हैं और अगर किसी भी प्रकार का कोई बदलाव नहीं होता तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता।

बाक़ी पुस्तक के किसी भी अंश को किसी भी प्रकार से पुनः प्रकाशित करने की अनुमति नहीं है इसलिए केवल इतना ही कहूंगा कि इसे पढ़ा और सही अर्थों में समझा जाना चाहिए; हालांकि पढ़ने लिखने में विश्वास करनेवाले कितने लोग हैं यह भी जग ज़ाहिर है; फिर भी। मदन सोनी का हिंदी अनुवाद शानदार है और बाक़ी इसके लेखक युवाल नोआ हरारी के बारे में क्या कहना, वो फिलवक्त धरती पर सच्चे रूप में सबसे ज्ञानी इंसानों में से एक हैं। वो कहते हैं - "हमारे विश्वास चाहे जो भी हों, लेकिन मैं हम सभी को हमारी दुनिया के बुनियादी आख्यानों पर सवाल उठाने के लिए, अतीत की घटनाओं को वर्तमान के सरोकार से जोड़कर देखने के लिए और विवादास्पद मुद्दों से ना डरने के लिए प्रोत्साहित करता हूं।" इसलिए दुनियाभर के एक से एक परमज्ञानी स्वयंसिद्ध नेताओं, टीवी डीबेट, सोशल मीडिया के गुरिल्लावारों से वक़्त बचाकर ऐसी पुस्तकों में समय बीतने का उपक्रम ही समय का सही सद्योपयोग है। 

यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि फ़िलहाल यह पुस्तक दुनियां का बेस्टसेलर किताब है और विश्वभर में कई भाषाओं में अनुवादित होकर ख़ूब पढ़ी जा रहीं हैं। यह किताब कई रूप में यानी लिखित, वाचिक (ऑडियोबुक) के रूप में उपलब्ध है, यूट्यूब पर तो हिंदी अंग्रेज़ी में फ्री ऑडियोबुक के रूप में भी उपस्थित है, देख-सुन-पढ़ लीजिए, अगर थोड़ा मन करे तो। यह एक बेहद ज़रूरी पुस्तक है - और अगर देख-सुन-पढ़ लिए हैं तो दूसरों को पढ़ाइए और न पढ़े हैं तो अवश्य ही पढ़िए। इसकी एक प्रति हमेशा घर में रखिए क्योंकि इसे पढ़-समझकर पीढियां तर जाएगीं। 

आज यह पुस्तक पढ़कर समाप्त हुआ अब इन्हीं के द्वारा लिखित दो और पुस्तक होमो डेयस और 21 वीं सदी के लिए 21 सबक की बारी है। मंगाया है, आ जाए तो पढ़ाई शुरू हो तबतक सार्त्र और दोस्त्रोवस्की अंकल है सिराहने साथ देने के लिए और बाक़ी जब घर में तथाकथित परम विश्वास की कृपादृष्टि पर रहकर "गो कोरोना गो" गाना है और भक्ति रस का स्वादवलोकन कारण ही नियति है तो कुछ सार्थक काम ही हो जाए, बाक़ी तो जो है वो तो है ही, लेकिन परम सत्य यह है कि असली ज्ञान ही आख़िरकार काम आएगा बाक़ी अज्ञानता और झूठ का चमकदार भ्रम चाहे कोई कितना ही बड़े से बड़ा फैला ले कोई, एक न एक दिन उस गुब्बारे की हवा निकल ही जानी है।

सोमवार, 13 जुलाई 2020

उनके लिए जिनका अभिनय विधा में गंभीर दिलचस्पी हो : पुंज प्रकाश

Netflix पर Jim & Andy: The Great Beyond नामक एक बड़ी ही अद्भुत डाक्यूमेंट्री है, जो जिम कैरी द्वारा अभिनीति फिल्म Man on the Moon के प्रोसेस के बारे में बात करता है। चरित्र की तैयारी की सच्ची और व्यवहारिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। जिस कि ज्ञातव्य है कि Man on the Moon सन 1999 में बनी एक जीवनीपरक हास्य ड्रामा फिल्म है जो अमरीकन कलाकार एंडी कॉफमैन के जीवन प्रसंगों और कलाकारी को आधार बनाती है। यहां एंडी की भूमिका जिम कैरी ने किया है और इस भूमिका के लिए उन्हें गोल्डन ग्लोब सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। Jim & Andy: The Great Beyond नामक यह डाक्यूमेंट्री उसी चरित्र की तैयारी और फिल्माकन की गाथा प्रस्तुत करता है। फिल्म की शूटिंग के दौरान ही यह डाक्युमेंट्री फिल्माया गया था लेकिन इसे 2017 में नेटफ्लिक्स ने रिलीज़ किया है। यहां जिम अपनी तैयारी की बात करते हैं, चरित्र को आत्मसात करने की प्रक्रिया पर बात करते हैं, अपने और अपने चरित्र में समानता और विषमता की बात करते हैं, लाखों बातें हैं - ख़ुद ही देख लीजिए क्योंकि यहां चाहे कितने भी वजनदार शब्द लिख दूं वो कमतर ही पड़ेगा।

अभिनय विधा को गंभीरता से लेने वाले हर विद्यार्थी (एक कलाकार वैसे ताउम्र एक विद्यार्थी ही होता है, वो जितना साधता है उससे कहीं ज़्यादा साधने को बाक़ी रहता है - हमेशा) को यह डक्यूमेंट्री और फिल्म देखनी चाहिए। अब आप फिल्म पहले देखिए या डाक्युमेंट्री पहले इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। यह कुल मिलाकर वहीं बात होगी कि कान आप सीधा पकड़ें या उल्टा, पकड़ाएगा तो कान ही। यह एक अभिनेता का चरित्र में बदल जाने की महागाथा भी है और कहीं न कहीं इस बात का पुख़्ता सबूत भी अभिनय "हम जहां खड़े हो गए लाइन वहीं से शुरू होती है" नामक चीज़ का नाम भी नहीं है बल्कि अभिनय एक परकाया प्रवेश की तकनीक है जिसे सीखना ही होता है। इसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत परिवेश सब आता है, अंदर बाहर सब। एक इंसान के अंदर-बाहर जितने भी अवयव हैं वो सबके सब सहायक हैं लेकिन उसे गढ़ने के लिए आख़िरकार एक तकनीक ही काम आती है। इस डिबेट में कुछ नहीं रखा कि अभिनय सिखाया नहीं जाता, सिखाया जाता हो या नहीं सिखाया जाता हो लेकिन सिखना पड़ता है। अब यह विधा आप कहां जाकर सिखते हैं या स्वयं साधना करते हैं, या आपको कोई वरदान मिलता है इस बात से कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ता है लेकिन सीखना तो पड़ता ही है वरना तो निगलो और उगलो ही चलता रहेगा। 

Man on the Moon यह फिल्म यूटूब पर फ्री में उपलब्ध है लेकिन Jim & Andy: The Great Beyond के लिए आपको नेटफ्लिक्स पर जाना होगा। वैसे जिम कैरी का काम हर अभिनेता को बार बार देखना ही चाहिए, वो अद्भुत हैं; भूमिका चाहे जैसी भी हो वो उस चरित्र के स्किन के अंदर समाहित होने की कला बाख़ूबी जानते हैं। यह जनाने को रोज़ साधना होता है वरना आपका हथियार कितना भी तेज़ हो अगर उसका इस्तेमाल बंद हुआ तो ज़ंग लगते तनिक भी देर नहीं लगती है।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि के बहाने : पुंज प्रकाश

आज बिहार के अप्रितम नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, संगठनकर्ता, गायक, नर्तक, गीतकार, संगीतकार भिखारी ठाकुर (18 दिसम्बर 1887 – 10 जुलाई 1971) की पुन्यतिथि है। आज ही दिन उनका देहावसान हुआ था। किसी भी रचनाकार को सबसे पहले किस कसौटी पर परखना चाहिए इस सन्दर्भ में नोवेल पुरस्कर से सम्मानित विश्वप्रसिद्द नाटककार दारियो फो का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कथा है कि A theatre, a literature, an artistic expression that does not speak for its own time has no relevance। मतलब कि वह रंगकर्म, वह साहित्य, वह कलात्मक अभिव्यक्ति जो अपने समय के बारे में बात नहीं करता, उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। अब इसी से हम भिखारी ठाकुर की परख करें तो वो न केवल अपने समय की बात बार-बार और लगातार कर रहे थे बल्कि वो एक कई बार अपने समय से आगे की भी बात करते साफ़-साफ़ देखे जा सकते हैं। वैसे तो अभी तक भिखारी ठाकुर के काम का सम्पूर्ण और वृहद मूल्यांकन होना बाक़ी है लेकीन अगर सही तौर पर गौर से देखें तो तमाम किन्तु परंतु के बावजूद भिखारी ठाकुर आधुनिक बिहारी रंगमंच के पुरोध व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आते हैं। जब भी बिहारी रंगमंच पर कभी गहन और गंभीर चिंतन-मनन या लेखन होगा तब भिखारी ठाकुर निश्चित ही मील का पत्थर ही साबित होंगे। जैसे हिंदी रंगमंच भारतेंदु से पहले और बाद के काल में विभक्त है वैसे ही बिहारी रंगमंच भिखारी ठाकुर से पहले और बाद में विभक्त होगा। ज़रा गहन जानकारी के साथ चिंतन किया जाए तो समझ में आता है कि आधुनिक बिहारी रंगमंच के जनक भिखारी ठाकुर हैं भले ही उनके पास किसी विद्यालय की डिग्री नहीं थी लेकिन उनके काम का दायरा बड़ा व्यापक है। लेकिन अभी तक हमने उन्हें और उनके काम को बड़े ग़ौर अध्ययन ही नहीं किया है, बस उनके कुछ नाटकों तक ही अपने आप को सीमित रखा है और उतने में ही सोचते हैं कि काम हो गया। उनके कार्य का दायरा विशाल है और उसमें अनेकों आयाम हैं। वो एक तरफ़ जहां पारंपरिक हैं तो वहीं दूसरी तरफ प्रयोगवादी भी। एक तरफ जहां धर्म और मर्यादा की बात करते हैं वहां दूसरी तरफ सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार किए भीना नहीं रहते। यह उनके तमाम रचनाओं के अध्ययन करने से साफ़-साफ़ नज़र आता है। कुछ बड़े ही छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण पॉइंट्स हैं, कभी इत्मीनान से ग़ौर कीजिएगा। 

भिखारी अपनी बोली/भाषा में रंगकर्म करते हैं। वो अपने नाटकों में अमूमन समाज में व्याप्त वर्तमान के ज्वलंत मुद्दे उठाते हैं और तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए उसके प्रदर्शन करते रहते हैं। वो लोक कला को आत्मसात करते हैं, खासकर संगीत और नृत्य। वो शौक़िया नहीं बल्कि व्यवसायिक और पेशेवर रंगकर्म की नीव रखते हैं, और उसे संचालित भी करते हैं क़ायदे से। वो एक व्यावसायिक और पेशेवर रंगमंडल की स्थापना करते हैं और काम के एवज में कलाकारों को पारिश्रमिक भी देते हैं वो भी तब जब कोई ग्रांट नहीं था। वो किसी एक जगह नहीं बल्कि घूम घूमकर नाटकों का प्रदर्शन करते हैं और अपने नाटकों की ऐसी परिकल्पना करते हैं जो कम से कम संसाधनों में कहीं भी खेल जा सकता है और उसके प्रभाव पर भी कोई बहुत अंतर न पड़े। इसलिए उनके नाटकों को कभी दर्शकों की कमी नहीं हुई बाक़ी जो लोग नाच-नौटंकी को ग़लत पेशा मानते थे वो उनकी अपनी मान्यता है, वैसे लोग आज भी समाज में विद्दमान हैं। वो कलाकारों की तलाश में यहां वहां भटकते थे और बढ़िया कलाकार मील जाने के बाद उसे उप्रशिक्षित भी करने की चेष्टा करते थे। अब प्रशिक्षण पर उनकी कितनी पकड़ और समझ थी यह बात और है। वो लोक युक्तियों, धुनों, भाषा, बोली का इस्तेमाल करके सीधे देखनेवाले से अपने को कनेक्ट करते हैं लेकिन वो बड़ी ही कुशलतापूर्वक इनके अर्थ भी बदलते हैं। वो लोकल होते हुए ग्लोबल रहते हैं, कई नाटक उसके साक्षात उदाहरण हैं। वो लोक में व्याप्त अपसंस्कृति और ग़लत परम्परा से भी टकराते हैं और उसे चुनौती भी देते हैं लेकिन यह भी सत्य है कि कई बार इसके शिकार भी हो जाते थे। वो एक कुशल प्रशासक, कलाकार के साथ ही साथ कुशल प्रशिक्षक और चिंतक भी हैं। वो लोकप्रिय थे लेकिन लोकप्रिय के प्रभाव में आकर आधुनिक और थोड़ी कड़वी बात बात कहने से भी नहीं डरते। वे लोक का आदर करते हैं लेकिन साथ ही लोक कुरीतियों और परंपराओं से टकराने का साहस भी करते हैं। ऐसा करते हुए वो समाज के उपेक्षितों के दुःख दर्द के सारथी भी बन जाते हैं। वे व्यावसायिक भी है लेकिन साथ ही साथ लोककला के चितेरे भी। उनसे हम बड़ी आसानी से सीख सकते हैं कि आधुनिकता का एक पैर परम्परा में होता है तभी वो देखनेवाले के दिलों तक राज करता है। भिखारी ठाकुर अपनी बोली/भाषा में आधुनिक महागाथा रचने और जन जन तक पहुंचने की ताकत का भी नाम है। वे घुमंतू रंगमंच के धूमकेतु हैं और बताते हैं कि रंगमंच जनता तक बड़ी आसानी से और व्यावसायिक व पेशेवर रूप से कैसे पहुंच सकता है। वे न फ्री में कभी कुछ किया और ना ही किसी से कराया क्योंकि उन्हें पता था कि कलाकार के पास पेट भी होता है। जहां भी गए पहले बयाना लिया फिर नाटक करने की फ़ीस। किसी के भरोसे भी नहीं रहे, इन सरकार, न लोग। हाँ, जो सहयोग किया उसको नकारा भी नहीं। उनकी की लोकप्रियता उनसे पूछिए जिन्होंने उन्हें नाटक करते देखा है, हम उनके पैर की धूल भी हो जाएं जो जन्म सुफल समझिए। इसलिए किसी को भी यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि भिखारी ठाकुर उनकी वजह से हैं बल्कि हो सकता है कि बात एकदम उलट हो कि वो भिखारी ठाकुर की वजह से हों। वैसे भी पुरानी पीढ़ी नहीं पीढ़ी की वजह से नहीं होती, हां यह संभव है कि बाद वाली पीढ़ी कुछ शानदार काम करके पहलेवाली पीढ़ी का नाम थोड़ा और रौशन कर दे लेकिन यह पीढ़ियों का स्वतः आदान-प्रादान हैं बाक़ी सब बातें हवा हैं। भिखारी के नायक आम और मेहनतकश जन हैं। वे कभी-राजा रानी की कहानी नहीं सुनाते बल्कि अपने समय के मेहनतकश मनुष्य की गाथा कह रहे होते हैं। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि आपके रचनाओं में किसकी बात होती है और उसका दृष्टिकोण क्या होता है। वैसे भी आधुनिकता और प्रगतिशीलता एक वैचारिक मामला है, तकनीकी नहीं।

भिखारी आज होते तो निश्चित ही इस महामारी से जूझ रहे ग़रीब मजबूर लोगों के लिए गीत, संगीत और नाटक रच रहे होते, उनकी पीड़ा को स्वर दे रहे होते, न कि इतिहास और सत्ता का गुणगान, अपनी उपलब्धियों की व्यक्तिगत व्याख्यान और आत्ममुग्धा का प्रवचन में मग्न हो गए होते। वो आज के इंसान के दुःख दर्द के चितेरे होते और कहते "जगवा भरम में भुलाइल बा ए लोगे," या कुछ अउर। वो अगर किसी प्लेटफॉर्म पर लाइव भी आ रहे होते तो लोक पीड़ा के प्रवक्ता बनाकर। बहुत बातें निकलेगीं अगर ग़ौर किया जाए तो, वरना जो है वो तो है ही। वैसे भिखारी ठाकुर किसी एक खांचा में कभी फिट नहीं बैठते। आप जैसे ही आप उनको पारंपरिक कहते हैं तो उनका प्रयोग सामने आकर खड़ा हो जाता है। प्रगतिशील कहते हैं तो नियतिवाद सामने आ जाता है। स्त्रीवादी कहते हैं तो उनका पुरुषवाद सामने आकर मुंह चिढ़ाने लगता है। शालीन कहते हैं अशालीनता हाथ पकड़कर आपको रोक लेती है। कहने का अर्थ यह कि उनके पास सबकुछ है, वो एकदम पारस न कभी थे ना उन्होंने कभी यह होने का दावा ही पेश किया है। इसलिए उनके बारे में चिंतन करते समय दिमाग को ज़रा सजग और खुला रखने की आवश्यकता है। यहां परम्परा है, प्रयोग है, समकालीन सवालों से लड़ने का माद्दा है, मनोरंजन का रसरंग है, धर्म है, निति है, मनुवाद का विरोध भी है। मतलब वो एक ऐसे वृक्ष हैं जिनकी कई जड़ें हैं और सब जीवित हैं। यहां शुद्धवादी नज़रिया नहीं बल्कि खुला और व्यापक दृष्टी ही काम आनेवाला है और हां अब हमें उनके प्रति आदर से कहे गए किसी भी वैसी उपमा का परित्याग कर देना चाहिए जो उनिवेशिक नज़रिया पेश करती है। उनकी तुलना ना शेक्सपियर से उचित है और न ब्रेख़्त से बल्कि वो जो भी हैं और जैसे भी हैं भिखारी ठाकुर भिखारी ठाकुर ही हैं, बाक़ी कुछ नहीं।
बरजल रहलन बाप महतारी, नाच में तू मत जा भिखारी 
चुपे भागके नाच में जाई, बात बनाके दाम कमाई 

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

जगदीप : जिन्हें केवल सुरमा भोपाली नहीं होना था : पुंज प्रकाश

एक अभिनेता के साथ इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है कि उसे एक ख़ास चरित्र में क़ैद कर दिया जाए और बार-बार उसी को दुहराने के लिए उसे अभिशप्त किया जाए। कई अभिनेता भी इस क्रिया का मज़ा लेते हैं क्योंकि इन्हें इसके लिए अलग से कोई ख़ास तैयारी करनी नहीं पड़ती है लेकिन जो असली अभिनेता है उसे असली मज़ा अलग-अलग चरित्र को अलग-अलग तरीक़े से करने में ही आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन सिनेमा एक बाज़ार का नाम भी है, जहां अभिनेताओं की छवि गढ़ी जाती हैं, जिसका भार ताउम्र उस अभिनेता को ढोना ही पड़ता है। इस साजिश में लेखक, निर्देशक, निर्माता ही नहीं बल्कि हम दर्शक भी शामिल हैं। ना लेखक अमूमन किसी अभिनेता के लिए अलग सा चरित्र लिखता है, न निर्देशक उसे कुछ अलग करने को कहता है, निर्माता को तो ज़्यादातर बॉक्स ऑफिस की कमाई से ही मतलब होता है और रहा सवाल हम दर्शकों का तो हममें से भी ज़्यादातर लोग वही वही बार बार देखना चाहते हैं जो अभिनेता पहले से करता रहा है या जो उसकी छवि बना दी गई है। अभिनेता उससे कुछ अलग अगर कोशिश भी करता है तो हम उसे नकारने में तनिक भी देर नहीं करते। इतिहास में ऐसे ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि अभिनेता ने तंग आकर आख़िरकार अपनी छवि से अलग कुछ गढ़ने की चेष्टा की तो हमने उसे घोर असफलता का सामना करना पड़ा और फिर हमने उस अभिनेता के सामने अपनी बनी बनाई खोल में समाहित हो जाने के अलावा अन्य कोई विकल्प छोड़ा ही नहीं। हम चरित्र नहीं बल्कि अभिनेता के दीवाने हैं। इसलिए हमारे यहां आजतक लगभग लकीर के फ़क़ीर वाला सिनेमा का ही प्रचलन है। वैसे समय समय पर कुछ साहसी लोगों ने इस प्रचलन को बदलने की कोशिश की है और अच्छी बात यह है कि थोड़ा बहुत कुछ बदलाव आया भी है। 

हमने जब दिलीप कुमार (ट्रेजडी किंग), अमिताभ बच्चन (एंग्री यंग मैन) तक को नहीं छोड़ा तो बाकी किस खेत की मूली हैं। अभिनेता जगदीप भी ताउम्र सुरमा भोपाली ही बने रहे और कभी बेचैन होकर कुछ अलग किया तो हमने उसे नकार दिया और फिर वो मजबूर हो गए कि वही राग गाएं जो हम सुनना चाहते हैं। 

जब ऐसा कुछ होता है तो वहां अभिनय विधा की मौत सबसे पहले हो जाती है क्योंकि अभिनय उस विधा का नाम नहीं है जो बार बार और लगातार एक ही जैसा किया जाए बल्कि अभिनय वह है जो अलग अलग चरित्र को अलग-अलग रूप नें प्रस्तुत किया जाए। अब तर्क देनेवाले यह भी कह सकते हैं कि चार्ली चैप्लिन अपने तमाम फिल्मों में एक ही जैसा रूप रंग धारण करते हैं और लगभग एक ही जैसा उनका व्यवहार भी है तो इसका क्या मतलब हुआ कि वो एक शानदार अभिनेता नहीं हैं। निश्चित ही वो एक शानदार ही नहीं बल्कि अद्भुत और अतुलनीय अभिनेता हैं लेकिन यहां ग़ौर करनेवाली एक अलग बात यह है कि चार्ली की फिल्मों का लेखन ही उनके चरित्र को ध्यान में रखकर किया जाता था और फिर उसे ही अलग-अलग परिस्थितियों में डालकर परखा जाता है जिसमें वो हमेशा खरे उतरते थे लेकिन यहां मामला दूसरा है; और फिर चार्ली का चरित्र किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि एक ख़ास वर्ग का प्रतिनिधि करता है, एक ऐसे वर्ग का जिसके पास खोने के लिए कुछ ख़ास है नहीं जबकि पाने के लिए पूरी दुनियां है। लेकिन यहां चरित्र अलग-अलग होते थे लेकिन अभिनेता उसे एक ही तरह से करने के लिए बाध्य होता है। यह कोई अच्छी बात नहीं है। क्या पता जगदीप अगर अलग-अलग चरित्र को अलग-अलग प्रस्तुत करते तो आज हम उन्हें किसी और तरीके से याद कर रहे होते ना कि केवल सुरमा भोपाली के नाम से। वैसे भी मौत अभिनेता की हुई है उनका अभिनीति चरित्र हमेशा ज़िंदा था, है और रहेगा। 

जगदीप साहब को हम इस रूप में भी याद कर सकते हैं कि वो एक ऐसे अभिनेता थे जिनको एक बार के बाद हम सबने उन्हें भी एक ख़ास लोकप्रिय छवि में क़ैद करके अभिनय करने ही नहीं दिया। यह एक कलाकार के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय है, जिसमें कहीं न कहीं हम सब शामिल हैं। खाना चाहे कितना भी स्वादिष्ट और पौष्टिक क्यों न हो किसी भी इंसान को अगर वही खाना बार-बार खाने को दिया जाए तो वो अंततः उससे बोर ही हो जाएगा और यहां तो मामला कलाकारी का है, जिसमें नवाचारी और सृजनात्मकता ना हो तो उसका व्यर्थ हो जाना उसकी नियति है।

जगदीप अपनी मां से जुड़ा एक क़िस्सा सुनाया करते थे - एक बार बॉम्बे में बहुत तेज तूफान आया था। सब खंभे गिर गए थे। हमें अंधेरी से जाना था। उस तूफान में हम चले जा रहे थे। एक टीन का पतरा आकर गिरा और मेरी मां के पैर में चोट लगी। बहुत खून निकल रहा था। ये देख मैं रोने लगा तो मेरी मां तुरंत अपनी साड़ी फाड़ी और उसे बांध दिया। तूफान चल रहा था। तो मैंने कहा कि यहीं रुक जाते हैं, ऐसे में कहां जाएंगे। तो उन्होंने एक शेर पढ़ा था. उन्होंने कहा था- 
वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो 
वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाए
पूरी जिंदगी मुझे ये ही शेर समझ में आता रहा कि वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाए। तो अपने एक-एक कदम को एक मंजिल समझ लेना चाहिए। छलांग नहीं लगानी चाहिए, गिर जाओगे। 

जगदीप ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत 1951 में बी आर चोपड़ा की फिल्म 'अफसाना' से की थी. इस फिल्म में जगदीप ने बतौर बाल कलाकार काम किया था। अबतक लगभग चार सौ फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता जगदीप का असली नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी था। उनका जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ था। साल 1975 में आई मशहूर फिल्म शोले में सूरमा भोपाली के किरदार में वो ऐसे क़ैद हुए कि वही उनकी पहचान बन गई और ऐसा लगता है जैसे वो भी इसे ही भुनाना चाहते थे तभी तो 1988 में उन्होंने एक फिल्म निर्देशित किया और उसका नाम रखा - सुरमा भोपाली लेकिन ख़ुद जगदीप के अलावा धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और रेखा के होने के बाबजूद फिल्म फ्लॉप हो गई। कल रात उनका निधन मुंबई स्थित निवास पर हो गया। वो 81 साल के थे। उनको बहुत बहुत नमन।

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

रणवीर सिंह : जन्मदिन की बहुत्ते बधाई।

"महान सोच वाले व्यक्ति विचार के बारे में बात करते हैं, साधारण सोच वाले घटनाओं के बारे में, कमतर सोच के लोग व्यक्ति के बारे में बात करते हैं।" - एलेनॉर रूज़वेल्ड का यह विश्वप्रसिद्ध कथन है। मुझे यह कथन व्यक्तिगत रूप से बहुत पसंद है और जितना संभव हो सकता है इसका पालन करने की चेष्टा भी करता हूं। अमूमन मैं किन्हीं के बारे में कोई व्यक्तिगत टिप्पणी कम से कम फेसबुक पर तो नहीं ही करता हूं। बाक़ी इंसान हूं तो इंसानी दोष से पूरी तरह मुक्त होना संभव भी नहीं है लेकिन मूल मामला सोच का ही है। वैसे भी व्यक्ति की नहीं बल्कि प्रवृत्ति की बात करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो व्यक्ति बदल जाएगा लेकिन प्रवृत्ति जस की तस रहती है और अमूमन समाज में वही प्रवृत्ति चलती रहती है। यह ठीक वैसी बात ही है जैसे सत्ता बदलती है लेकिन आम इंसान की हालत अमूमन वैसी की वैसी ही रहती है। बस कुछ नहले दहले हो जाते हैं और कुछ दहले नहले बाक़ी जस का तस। 

इतनी भूमिका इसलिए बना रहा हूँ क्योंकि आज भारतीय रंगमंच के एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के बारे में पोस्ट करने जा रहा हूं। वो पता नहीं कितने ही दशक से रंगमंच से जुड़े हैं और जब भी इनसे बात होती है तो वो हमेशा सही सलाह ही देते हैं, चाहे वो जीवन मूल्यों की बात हो, राजनीति की बात हो या फिर समाज की बात हो या रंगमंच की। भारतीय रंगमंच से जुडा जब कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ कहीं नहीं मिलता तो इनको फोन लगाया जाता है, या तो वो इनके पास होता है या फिर ये बता देते हैं कि फलां चीज़ कहां मिल सकती है।

रंगमंच को लेकर इनका साफ मानना है कि जब तक रंगमंच आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा नहीं होता तब तक इस पर बड़ी-बड़ी बातें केवल बातें ही होकर रह जाएगीं। रंगमंच को अपने आर्थिक संसाधन ख़ुद से पैदा करना चाहिए और इसके लिए जितने भी प्रयास हो, रंगकर्मिंयों द्वारा किए ही जाने चाहिए। ग्रांट और शौक़िया रंगमंच से रंगकर्म का बहुत ज़्यादा कुछ भला नहीं होने वाला। वैसे भी जो पेशा अपने (कुछ अपवादों को छोड़कर) कर्मठ से कर्मठ उम्मीदवारों को भरण-पोषण तक कर पाने तक की स्थिति में न हो, उससे किसी का भला क्या होगा? 

रंगमंच को एक व्यावसायिक और पेशेवर कला होना ही चाहिए और ऐसा करते हुए उसे अपने कलात्मकता का भी भरपूर ध्यान रखना चाहिए अर्थात ऐसा होते हुए उसे अपनी ज़िम्मेदारी और कलात्मकता से कोई समझौता करने की ख़ास ज़रूरत नहीं है। टिकट वाले दर्शक के साथ ही साथ निर्माताओं और मैनेजर्स की एक पूरी फ़ौज खड़ी करने की आवश्यकता है। यह काम वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, तकनीति रूप से प्रशिक्षित कोई पेशेवर नाट्यदल ही कर सकता है और ऐसा प्रयत्न आज हर जगह होने की ज़रूरत है। वैसे भी बिना तकनीकी रूप से दक्ष, जन सरोकार के विचारों से लैश और पेशेवर नज़रिए के यह काम होना असंभव ही है। 

मैं यहां बात रणवीर सिंह (Ranbir Sinh) जी की कर रहा हूं, जिनका आज जन्मदिन है और जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपना ज़्यादातर वक़्त पढ़ने-लिखने में बिताते हैं। कई दशक के लंबे रंगयात्रा में इन्होंने अनगिनत नाटक खेले, देखे, मंचित किए, अनगिनत आयोजनों के भागीदार रहे, कई नाटक लिखे और कई नाटकों के अनुवाद/रूपांतरण किए, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख लिखे और जब भी ज़रूरत होती है सबको ख़ूब सारा स्नेह, उचित और बहुमूल्य और व्यवहारिक सलाह ही देते हैं। वर्तमान में आप भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और आज आपका 92वां जन्मदिन हैं और आज भी अपने जीवन का ज़्यादातर वक़्त रचनात्मक काम में ही व्यतीत करते हैं।

पता नहीं नौजवान पीढ़ी आज इनके नाम और काम से परिचित भी है या नहीं, नहीं है तो होना ही चाहिए; यह एक पीढ़ी की ज़िम्मेदारी भी बनती है। ऐसे लोग भारतीय रंगमंच के जीवित घरोहरों में से एक हैं। आइए, इनकी दीर्घायु की कामना करते हुए इनके जन्मदिन की बधाई प्रेषित किया जाए। बधाई स्वीकार कीजिए सर, आप स्वस्थ्य रहें, कुशल, मंगल और रचनात्मक रहें। 
पुंज प्रकाश

शनिवार, 6 अगस्त 2016

लोग टिकट खरीदकर नाटक क्यों नहीं देखते! : एक बहस

बहस की श्रृंखला के रूप में मैंने सोशल मिडिया पर लिखा “मैं रंगमंच में वैसे निर्देशकों, नाट्यदलों और आयोजकों का कायल हूँ जो अपने नाटकों में बिना टिकट कटाए अपने करीबी से करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों और रंगकर्मियों तक को सभागार में घुसने नहीं देते। इसके बावजूद उनके नाटकों में दर्शकों की कोई कमी नहीं होती।
रंगमंच से पास या कार्ड सिस्टम खत्म होकर, टिकट सिस्टम लागू होना चाहिए साथ ही नाटकों का प्रोडक्शन रेट तय हो। फ़ोकट में एक दूसरे की वाह वाह और हाय हाय करने से दरिद्रता का ही साम्राज्य बना रहेगा और रंगकर्मी इस या उस ग्रांट/डोनेशन/चंदा के चक्कर में अपनी ऐसी-तैसी कराता रहेगा।
किसी भी कला को अगर स्वाबलंबी बनना है तो उसे हर क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा। तभी आप निडर होकर काम कर सकते हैं।
भाई, पास न मिलने पर मुंह फुलाना बंद करो। नाटक किसी का भी हो, यदि देखना है तो टिकट कटाओ।
खूब मेहनत से नाटक बनाओ। नाटक से कमाओ - नाटक में लगाओ, टिकटवाले दर्शक बनाओ और जो बचे उसे बांटकर खाओ।”
जो कुछ प्रतिक्रियाएं मिलीं वह निम्न हैं। - माडरेटर मंडली

उमेश आदित्य - बात आपकी है 100% सही श्रीमान, लेकिन छोटे शहरों में कैसे चले काम? चंदा जहाँ उठा लेते हैं नेताओं के गुर्गे सारे, दस बीस हज़ार जुटाने में भी फटती है प्यारे, नेताओं के पिछलग्गू उठाते, लाखों -लाख की राशि, सही काम करने वाले करते फाकाकसी, पर बात आपकी सचमुच अच्छी लगती है, रंगमंच के दिन ऐसे ही सुधरेंगे, जब लोग हमारे टिकट ले नाटक देखेंगे।

पुंज प्रकाश - छोटे शहरों और गाँव में लोग फ़िल्म के लिए पैसे निकालते हैं, dth के लिए पैसे निकालते हैं, मोबाईल में बैलेंस और नेट पैक के लिए भी अब पैसे निकाल रहे हैं तो नाटक के लिए क्यों नहीं निकालेगें। प्रयास तो किया जाय, मुश्किल है लेकिन असंभव तो बिलकुल भी नहीं।

दिनेश चौधरी - अब जरा इसके दूसरे पहलू को देखें। अपने पड़ोस में जिला मुख्यालय राजनांदगांव है। मुक्तिबोध का शहर। कई सालों से नाटकों से वंचित। यहाँ नाटक करने जाएँ तो टिकिट सेल नहीं होगी। आयोजक डूब जायेगा। डोंगरगढ़ में हो सकता है। तो इसका मतलब ये हुआ कि टिकिट वाले रंगमंच की जमीन शौकिया थिएटर को ही तैयार करनी है। फिर हमारा अनुभव जुदा है। जो हजार रूपये का चन्दा देते हैं वो नाटक देखने नहीं आते। 500 वाले आते हैं। इन सबकी संख्या 40-50 के आसपास है, जिनसे 50-60 हजार निकल आते हैं। इतने टिकिट बेच पाना असम्भव है। सनद रहे कि यह बात छोटे कस्बे के संदर्भ में कही जा रही है, तो यह मसला शहर से जुदा हो सकता है। हाँ, अगर हम टिकिट बेचकर रंगकर्म करते हैं तो हम दर्शक के प्रति जवाबदेह हो जाते है और नाटक की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। कम से कम शिल्प में। बाकी कंटेंट तो जाहिर है की अंततः कंज्यूमर ही तय करेगा!

पुंज प्रकाश - सर, किसी भी शहर, गाँव, क़स्बा में एक लम्बी प्रक्रिया से ही बदलाव संभव है। शौकिया रंगमंच यदि लाख - लाख रुपए चंदा कर सकता है तो किसी भी नाटक का टिकट भी आसानी से बेच सकता है। अपने यहाँ (खासकर हिंदी बेल्ट में) समस्या यह है सर कि हमने रंगमंच को फ्री में, चन्दा से, या अनुदान आदि से स्वचालित होने वाली चीज़ में परिवर्तित कर दिया है। दर्शक और उसके पॉकेट पर ज़्यादा काम हुआ ही नहीं है। शायद यही वजह है कि हम हमेशा ही अभावग्रस्त हैं। और यह काम किसी एक के चाहने से होगा भी नहीं बल्कि सबको साथ आना होगा। हाँ, यह रिश्ता माल और कन्ज्यूमर वाला नहीं होना चाहिए बल्कि कला और उसके प्रोत्साहन और प्रश्रय वाला बनाना होगा। सार्थक कला को प्रोत्साहित करने वाले लोग हैं सर और नहीं हैं या कम हैं तो उहें गढ़ने का काम भी चले।

पप्पू तरुण – ऐसे क़दम हर हाल सही है, आख़िर इस आर्थिक समाजिक ब्यवस्था में बीना अर्थ के न रंग आऐगा, न कर्म हो पाऐगा

अनिमेष जोशी - इसलिए मैंने नाटक देखना काफी कम कर दिया है। दो साल में बहुत करीब से देखा है। आपकी बात का मैं समर्थन करता हूँ।

राजेश चंद्र - सहमत। इसे अमल में लाया जाना निहायत ज़रूरी है।

राज शर्मा – कारण है नाटकों की गुणवत्ता और इन्टरटेनमेंट टेक्स।

रेखा सिंह – रंगमंच को हर तरह से समृद्ध और लोकप्रिय बनाने के लिए इस टिकट व्यवस्था को लागू करना ज़रुरी है।

डॉक्टर सत्यदेव - आपकी बातों से सहमत हूं,मगर फिर भी जुगारुलालों को तो पास चाहिए ही चाहिए।

अभय अवस्थी - सबसे बड़ी जो दिककत है, कि आजकल कोई भी नाटक कर सकता है, उसकी क्वालिटी 200 rs के टिकट की है या नहीं ये कोई डिसाइड नहीं करता।
उदाहरण के लिए : पहली बार जो नाटक देखने जा रहा है 200 रूपए का टिकट। पेट्रोल वगैरह और अपना कीमती वक्त देकर - - हम उसे दे क्या रहे हैं? अब पहली बार में मैंने 200 का टिकट खरीदकर देखा, नए लड़के थे जिन्हें हम एमोच्योर कहते हैं, वो सिखा रहे थे लेकिन मैंने तो 200 दिया ना। नाटक का स्तर ऐसा कि 10 मिनट बाद मुझे लगा कि इससे अच्छा तो किताब लेके पढ़ लेता। 50 रूपया बचता तो कुछ खाया भी जा सकता था।
अब चुकी मेरा पहला ही अनुभव ऐसा था तो यही अनुभव मैंने दस को बताया और दो टीन गलियां भी साथ में जोड़ दीं। विजय तेंदुलकर जी कहते हैं इस दुनिया का जितना नुकसान कुटिल लोगो ने नही किया उससे कहीं ज्यादा मूर्खों ने किया है। मार्केटिंग का नियम है is the product worth xyz selling price ?

पुंज प्रकाश - नाट्यकला और उस क्षेत्र में काम करनेवालों के बारे में थोड़ी जानकारी रखने से शायद ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।

अनिल शर्मा - आपकी बात सही है ,किसी भी कला को मारना हो ,,खत्म करना हो तो उसे राजकीय सहयोग से जोड दो ,धीरे धीरे खुद खत्म हो जायेगी ,और यही हो रहा है

अनघा देशपांडे – यह सही है। पर बहुत मुश्किल है। गोवा में तो इतनी आदत हो चुकी है लोगों को - - डर लगता है टिकट रखने को भी!

पुंज प्रकाश - कोशिश तो किया ही जाना चाहिए। ठीक है कम लोग आएंगें। कोई बात नहीं। बल्कि एक ही आदमी आए लेकिन टिकट लेकर। मैं ऐसे कई ग्रुप को जानता हूँ जिसके बारे में लोग यह जान गए हैं की इनका नाटक देखना है तो टिकट लेना ही पड़ेगा।

राज शर्मा – एक बात और – इंटरटेमेंट टेक्स के बजाय इनकम टेक्स लगना चाहिए, वो भी 5%। सारे खर्चे निकालने के बाद। इससे लागत के बाद producer की हिम्मत दुबारा शो करने की पड़ेगी। एक खास बात बताऊँ – कोई भी कलाकार किसी एक नाटक में अभिनय क्या कर लेता है अगली बार खुद निर्देशक बन जाता है।

अविनाश दास - मुंबई में पिया बहुरूपिया के सारे शो एक हफ्ते पहले से बुक माइ शो पर सोल्‍ड आउट (हाउसफुल) थे। जबकि चार दिन तक शो थे लगातार। शनिवार और रविवार को तो दो दो शो थे। मैं स्‍वानंद किरकिरे से कहा, तो उन्‍होंने गीतांजलि कुलकर्णी के जरिये दो टिकट किसी तरह काउंटर पर रखवा दिया। आमतौर पर लोग इस व्‍यवस्‍था को पास समझने की भूल कर बैठते। लेकिन टिकट रखवाया, जिसका मूल्‍य चुकाने के बाद ही वह मुझे मिलता। पांच सौ रुपये के टिकट थे और मैंने हज़ार रुपये देकर दोनों टिकट ख़रीदे, तभी नाटक देख पाया।

विवेक कुमार तिवारी – मुझे लगता है कि जो नाटक सामान्य तरीके से खेले जाते हैं, वो लोकप्रिय होते हैं। जहाँ एक्सपेरीमेंट की बात आती है, दर्शक उब जाते हैं। हमने अपने नाटकों के लिए कुछ खास किस्म के दर्शक तैयार किए हैं और उन्हीं के फीडबैक में चलते हैं लेकिन आम आदमी यदि रंगमंच को एक्सेप्ट करता है तो यह समस्या कुछ खास नहीं – टिकट बिकेंगे। बस ज़मीनी हकीकत को पहचानना पड़ेगा।

पुंज प्रकाश - प्रयोग नाटक की आत्मा है, वह होते रहना चाहिए। प्रयोग से ही कोई भी कला या समाज आगे बढ़ता है। हाँ, प्रयोग सफल-असफल दोनों प्रकार के होंगें। होने भी चाहिए। प्रयोग से ही नवीनता बनी रहती है। इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है।
यह सही है कि हम जो खाते रहे हैं उसी को खाने में सहजता महसूस करते हैं लेकिन अलग अलग प्रकार के बेहतरीन टेस्ट और भी हैं दुनियां में, उसे भी आजमाने में कोई बुराई नहीं।

विवेक कुमार तिवारी – मैंने दर्शकों के नज़रिए से कहा, आप मेरी बातों को समझें। देखिए, लोक नाटकों में बिदेसिया या हबीब साहेब के नाटकों पर बात करें तो आसानी से स्वीकार किया जाता है, वो सहजता से नाटक करते हैं।

पुंज प्रकाश - विवेक भाई, दर्शकों के पसंद में बहुत विविधता है। हम दावे से यह कह ही नहीं सकते कि ऐसे नाटक ही लोगों को पसंद आते हैं। और फिर हबीब साहेब के काम और बिदेसिया में बहुत प्रयोग है, वो प्रयोग सफल हो गए इसलिए हम उसका नाम लेते हैं। और फिर यह ज़रूरी नहीं कि हर रंगकर्मी लोकशैली का ही नाटक करे। नाटक की कई अन्य शैलियाँ भी हैं, उसपर भी काम होगा ही। नई शैली विकसिक करने का प्रयास और प्रयोग भी होगा ही।
दरअसल, हम किसी भी नए प्रयोग से घबराने वाले लोग हैं और उसे तबतक स्वीकार नहीं करते जबतक वो सफल नहीं हो जाता।

सुब्रो भट्टाचार्या - मुझे लगता है एक सेंसर कमीटी जैसी चीज़ भी होनी चाहिए जो ये तय करें की ये नाटक प्रस्तुति के लायक है या नहीं।अन्यथा कई बार पैसा देकर देखने वाला ही हमारा दुष्प्रचारक बन बैठेगा। स्तर के आधार पर टिकट लगाने में कोई बुराई नही है।

प्रभात सौरव – नाटक का ग्रेड तय करने के लिए कमिटी हो, पर उस कमिटी में कौन हों? पटना रंगमंच में सहमति की तरह हर तरह की स्थिति है।

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

नाट्यालोचना और नाट्यालोचक : एक बहस

समय-समय पर फेसबुक पर कुछ सार्थक बहसें भी होती रहतीं हैं। ऐसी ही एक बहस रंगकर्मीं, नाट्य-समीक्षक और समकालीन रंगमंच नामक पत्रिका के सम्पादक राजेश चन्द्र के फेसबुक वाल पर चल रही है। इस बहस में अबतक राजेश चंद्र के अलावे मृत्युंजय शर्मा (पटना), पुंज प्रकाश (पटना), परवेज अख्तर (पटना), राजेश राजा (पटना), नीलेश दीपक (दिल्ली), प्रवीण कुमार गुंजन (बेगुसराय), दीपक कुमार सिन्हा (बेगुसराय), धर्मेश मेहता (पटना), राज देव (पटना), विजय कुमार (बेगुसराय), व्यास चंद्र शेखर, अमितेश कुमार (दिल्ली), अभिषेक पंडित (आजमगढ़), विवेक कुमार(पटना), मुन्ना कुमार पांडे (दिल्ली), अनिल पतंग (बेगुसराय) अदि रंगकर्मियों, नाट्य चिंतकों व समीक्षकों ने भागेदारी की है। इस बहस से प्रभावित होकर कुछ स्टेटस अलग से भी डाले गए। इस पुरी बहस को एक साथ लाने का उद्देश्य केवल इतना है कि क्यों न इस परिचर्चा को शालीनतापूर्वक और तर्कों के सहारे आगे बढ़ाया जाय ? - मॉडरेटर मंडली 

बहस की शुरुआत करते हुए राजेश चंद्र लिखते हैं - "समीक्षक कोई विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति नहीं है। रंगमंच में वह भी उतनी ही अहमियत रखता है, जितना कि एक नाटककार, निर्देशक, अभिनेता, दर्शक या कि कोई और भागीदार। समीक्षक ही क्या, इनमें से कोई भी अपने दायित्व और दायरे का अतिक्रमण करता है, तो वह रंगमंच को क्षति पहुंचाने लगता है। इस प्रवृत्ति के दुष्परिणामों को हम आज साफ तौर पर देख रहे हैं।
रंगमंच के साथ एक विडम्बना यह है कि यहां अधिकांश कथित समीक्षक रंगमंच की पृष्ठभूमि से नहीं आये हैं। उनमें से कुछ हिन्दी के प्राध्यापक रहे हैं, तो कुछ पत्रकार, कवि, और शोधार्थी। उनका रंगमंच से उतना ही सरोकार है, जितने से उनका हित सधता हो। ये सभी अमूमन अपने--अपने क्षेत्रों में नाकामी झेल कर यहां आ गये हैं। रंगमंच उनके लिये तफरीह की, मौज-मज़े की और हर संभव कमाई की जगह है। ऐसे समीक्षक रंगमंच का हित करेंगे, यह सोच दीनता ही प्रदर्शित करती है। उनका एजेण्डा रंगमंच में बंटवारा पैदा करना, ग़लत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देना, कोई जुमला या फतवा उछाल कर केन्द्र में आसीन रहने के अलावा कुछ और क्यों होगा। वे वही तो करते आये हैं। रंगमंच में यदि आज ऐसे समीक्षक (?) मठाधीश बन गये हैं तो इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? 
मैं बीस वर्षों तक सक्रिय रंगकर्म करने के बाद समीक्षा के क्षेत्र में आया। इस निर्णय के पीछे कई व्यावहारिक अनुभव थे। मैंने हमेशा यह महसूस किया था कि रंग-समीक्षा के क्षेत्र में जब तक रंगकर्मी स्वयं नहीं उतरेंगे, तब तक यहां ऐसे लोगों का प्रभुत्व कायम रहेगा, जो रंगकर्म का हित साधने के बजाय अपने गर्हित और अदृश्य उद्देश्यों की पूर्ति में लगे रहते हैं। हमने विगत कुछ दशकों में एक ऐसी रंग-समीक्षा का उदय देखा है, जो नितांत रूप से मूल्यविहीन, मूढ़तापूर्ण, शैतानियों से भरी, बिकाऊ और ग़लीज़ है। आज रंग-समीक्षा के नाम पर जो कुछ हमारे सामने आता है, उसका बहुलांश या तो भक्ति भाव से लिखा गया है, या उपहारों और व्यक्तिगत फ़ायदों की मात्रा के आधार पर। रंगमंच में हमारे विभिन्न सरकारी संस्थान, देश भर में सक्रिय कई निर्देशक और रंग-महोत्सवों के आयोजनकर्ता ऐसे ढोंगी समीक्षकों को पालते-पोसते रहते हैं। वे उन्हें नाटकों की चयन समितियों में शामिल करते हैं, अनुदानों एवं पुरस्कारों की निर्णायक समितियों के लिये नामित करते हैं ताकि उनके माध्यम से मनमर्जियों और बेईमानियों का कारोबार फलता-फूलता रहे। अनुदान लेकर नाटक और महोत्सव करने वाले निर्देशक इन समीक्षकों को हवाई जहाज़ का टिकट, फाइव स्टार सुविधाएं और अय्याशी के सभी सामान मुहैय्या करवाते हैं, यह बात अब छिपी हुई नहीं है। कौन-से ऐसे समीक्षक हैं, जो महीने भर ऐसी रंगारंग रंग-यात्राओं पर निकलते रहते हैं, सोशल मीडिया के समय में यह जानना भी कठिन नहीं है।
प्रश्न उठता है कि रंग-समीक्षा के इस अधःपतन का ज़िम्मेदार कौन है? समीक्षा के क्षेत्र में आ रही इस गिरावट पर कोई बात कब होगी और यह बात 'कौन' करेंगे? मुझे उस दिन की और उन लोगों की प्रतीक्षा है।"

अमितेश कुमार - "आपकी बहुत सी चिंता वाज़िब है लेकिन हिंदी के प्राध्यापकों ने समीक्षा का नुकसान किया है इससे असहमति है। और वे ना किसी व्रुहतर हित साधन के लिए आये। उन्होंने समीक्षा को आलोचना को समृद्ध ही किया। जयदेव तनेजा, सत्येंद्र तनेजा, महेश आनंद, जावेद अख्तर खान, इत्यादि जैसो से रंगमंच को या समीक्षा को क्या नुकसान हुआ है? हिंदी में अगर रंगमंच पर कुछ सार्थक लेखन उपलब्धि में इनका अमूल्य योगदान है जिसकी रंग जगत ने उपेक्षा ही की है।"

मृत्युंजय शर्मा - जिनके काम को बिना देखे, पूर्वाग्रह से ग्रसित रहकर लगातार आप खारीज करते रहेंगे वो अंततः आपकी उपेक्षा हीं करेगा। आज तो नाट्य-प्रस्तुतियों की भी ब्रांडिंग हो गई है। फलाना करेगा तो जाना है, फलना क्या करेगा? ये घर बैठे सोंचने की चीज नहीं होती। खारीज करने का भी एक तरीका होता है, आप सीरे से खारीज करेंगे तो ये तो होना हीं है। रही बात नुकसान की तो इससे नुकसान ये हुआ है कि आज स्तरीय प्रस्तुति में गिरावट आई है। इसके लिए ऐसी सोंच भी जिम्मेदार है। 
नाट्यदल को अपने नाटकों की प्रस्तुति के दिन ही एक समीक्षक भी नियुक्त करना चाहिये, जो की ईमानदारी से दूसरे कलाकरों की तरह अपना कार्य करे। आज तो न नाटक का पाठ किया जाता है और न हीं नाटक के मंचन के पश्चात कोई परिचर्चा। 
नाटक एक प्रोजेक्ट, छपास सुख और पता नहीं क्या होकर रह गया है। हमें आत्मविवेचन करने की जरुरत है। 

पुंज प्रकाश - रंगमंच वर्तमान में घटित होनेवाला कलामाध्यम है, इसलिए नाट्यालोचना की प्रवृति भी ज़रा अलग होती है। साहित्य, फिल्म, चित्रकला, मूर्तिकला ऐसी विधाएं हैं जो अपने पाठकों, दर्शकों, रसिकों के लिए सदा उपलब्ध रहतीं हैं। कोई भी इन्हें पढ़, देखकर इसकी समीक्षा से इतर अपने विचार बना सकता है, किन्तु किसी भी नाट्य प्रस्तुति के प्रदर्शन को चिरकाल तक जारी रखना संभव नहीं और यदि हुआ भी तो उसका स्वरुप जैसे का तैसा बनाये रखना असंभव और अप्राकृतिक है। एक ही दल द्वारा किया गया एक से दूसरा प्रदर्शन कम से कम संवेदना के स्तर पर एक दूसरे से अलग होता ही है। नाट्यरचना अपने आप में एक पूर्ण साहित्यिक विधा हो सकती है पर नाटकों की रचना दर्शकों के समक्ष प्रदर्शन के लिए ही होता है। नाट्यसाहित्य, प्रदर्शन का रुप ग्रहण करके ही अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है। 
अगर हम आज से पहले मंचित हुए नाटकों के बारे में जानकारी पाना चाहतें हैं तो सुनी सुनाई बातों के साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उस नाटक की समीक्षा और समाचार माध्यम हो सकतें हैं। नाटकों को रिकार्ड करने की तकनीक अभी भी सामान्य उपयोग में नहीं है। वैसे भी किसी नाट्य प्रस्तुति की रिकार्डिंग देखकर उसके बारे में कोई राय बनना उचित नहीं है। देश के अधिकतर नाट्यदल मुफलिसी में ही चल रहे हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि नाटकों की खबरनवीसी, आलोचना, समीक्षा आदि एक अति गंभीर तथा एतिहासिक महत्व का काम हो जाता है। 
किसी ज़माने में हिंदी के अखबारों में कला और संस्कृति का पन्ना प्रकाशित होता था। जिनमें रंगमंच पर समीक्षात्मक व सूचनात्मक आलेखों का प्रकाशन होता था। फिर उदारीकरण, निजीकरण और बाज़ारवाद का ऐसा दौर चला कि अखबारों ने अपना स्वरूप बदल लिया और कला और संस्कृति के लिए स्थान लगातार सिकुड़ता चला गया। तर्क था कि अखबार के सामान्य पाठकों को नाट्यालोचना से क्या सरोकार ! जहाँ तक सवाल रंगमंच पर आधारित पत्रिकाओं का है तो कुल मिलाकर केवल एक-दो ही पत्रिका है जो नियमित निकाल रही है पर वहाँ भी वातावरण ‘लौबिंग’ से परे नहीं है।            
नाट्यालोचना रंगमंच की दुनियां में भी ठीक उसी तरह उपेक्षित है जैसे समाज में रंगमंच। रंगकर्मियों में आत्ममुग्धता का पारा इतना गर्म है कि नाट्यालोचना के प्रति सम्मान का भाव नहीं है। समीक्षक ने अगर तारीफ़ नहीं लिखी तो रंगकर्मी ये कहते हैं कि नाट्यालोचक को रंगमंच की समझ ही नहीं है। फिर समीक्षक को देख लेने की धमकी से लेकर व्यक्तिगत दुश्मनी ठान लेने तथा मौका मिलाने पर शाब्दिक-शारीरिक हिंसा का प्रयोग करने से भी कोई परहेज़ नहीं करते। 
वहीं, वो लोग भी आलोचक/समीक्षक कहलाने से बाज़ नहीं आते जिन्हें नाटक की सैधांतिक, व्यावहारिक समझ उतनी नहीं होती कि वे नाटकों की समीक्षा करें। इनके लिए किसी नाटक पर लिखना बस चंद पैसा, छपास सुख या नाम कमाने का एक ज़रिया है। केवल अपने फायदे और मस्ती के लिए किसी प्रस्तुति को महान बनाने तक से बाज़ नहीं आते ! कुछ ऐसे भी हैं जो हर चीज़ को दलित, आदिवासी, साम्यवाद, समाजवाद, कलावाद के बने बनाये संकीर्ण और पारंपरिक खांचे से रंगमंच की परख करके अपनी दुकान चला रहें हैं। कुछ समीक्षकों के पास एक बना-बनाया चलताऊ खाका होता है, जिसमें पहले नाटक की कहानी होगी फिर कुछ प्रभावित और अप्रभावित करनेवाले कलाकारों के नाम होगें और अंत में कुल मिलाकर प्रस्तुति प्रभावित/अप्रभावित करती है का भरत-वाक्य होगा, बस समीक्षा खत्म। ब्लॉग और वेब के युग में इन दिनों हिंदी रंगमंच के रंगपटल पर कुछ ऐसे नाट्यचिन्तक भी ‘अंकुरित’ हुए हैं जो हैं मूलतः रंगकर्मी या नाटककार हैं पर रंगइतिहास और रंगमंच पर अपनी बहुमूल्य राय लिखने का शौक रखतें हैं और साल व दशक की महान प्रस्तुतियों में अपने समूह या अपने द्वारा लिखित नाटकों के नाम गिनवाना कभी नहीं भूलते। कुछ नाट्य-समीक्षकों ने तो अपना एक मठ बना रखा है जहाँ से ये किसी भी रंगकर्मी व रंगमंच से जुड़े विषयों पर अपनी प्रतिक्रियायों की आकाशवाणी करते रहतें हैं। जो रंगकर्मीं इन्हें सम्मानित करे उसे ही ये सम्मान के काविल मानतें हैं।
हिंदुस्तान के कुछ बड़े नाट्य संस्थान और निर्देशक नाट्यालोचक पालने का काम भी करतें है। कोई पत्रिका का संपादन करता है तो कोई अन्य बहुतेरे काम। बदले में ये पत्र-पत्रिकाओं में उस संस्थान और निर्देशक के नाट्य-प्रस्तुतियों में महानता ढूंढने का काम करतें हैं। इस प्रकार नाट्यालोचक की दाल-रोटी तबतक चलती रहती है जबतक कोई दूसरा नाट्यालोचक आके स्थान न हड़प ले। फिर पहला उसी संस्थान के प्रस्तुतियों में बुराई ही बुराई खोजने लगता है। इसी परम्परा के तहत एनएसडी के वर्तमान अभूतपूर्व निदेशक से नाराज़ कुछ नाट्यालोचकों ने अपने पसंद के उम्मीदवार को निदेशक बनाने के लिए “लॉबिंग” शुरू भी कर दिया है। 
रंगकला में दुनियां की सारी कलाएं समाहित हैं अतः इसे प्रस्तुत करना और इसकी समीक्षा करना दोनों ही गंभीर काम है जिसमें इंसानी मजबुरियों और आत्ममुग्धता का कोई स्थान नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि कला और संस्कृति समाज का दर्पण होता है। आज समाज की जो स्थिति है उससे कोई कला अछूता कैसे रह सकता है ? कण-कण में व्याप्त भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के इस युग में तमाम सरकारी और गैरसरकारी अनुदानों के बावजूद रंगमंच की सामाजिक सरोकरता में कमी आई है। समाज के ज्वलन्त सवालों से सीधा साक्षात्कार करने के बजाय आज रंगमंच जिस ओर मुड़ा है वहाँ चंद पलों के सुख की मृगतृष्णा के आगे अंधी खाई के अलावा कुछ नहीं है। आकाओं को खुश करने और रंगमहोत्सवों के लिए हो रहे प्रयोग के नाम पर परिवेश से कट जाना एक खतरनाक संकेत है। इस मृगतृष्णा की चपेट में आज रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक सब हैं। वहीं ऐसे जुनूनी रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक कम ही सही पर हैं ज़रूर जो सामाजिक सरोकार से जुड़े रंगमंच में सार्थकता देखतें हैं। जिस देश की आधी से ज़्यादा आवादी रोज़ाना दुःख, दर्द झेलने को अभिशप्त हो वहाँ सामाजिक सरोकरता के प्रति हीन भावना रखकर केवल माल बनाना सार्थक कलाकर्म नहीं है। 

परवेज अख्तर - राजेश चन्द्र की कई स्थापनाओं से हमारी असहमति हो सकती है। लेकिन उनकी चिन्ता वाजिब जान पड़ती है। बावजूद इसके, यह कहना भी नाट्य-समीक्षा के संकट और उसकी चुनौतियों को कदाचित सरलीकृत करना होगा कि प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल, साहित्य की अन्य विधाओं से आए समीक्षकों ने रंगमंच और नाट्यालोचना का अहित किया या उसका इस्तेमाल अपने हित में किया; या फिर रंगमंच में 'गुटबाज़ी' को प्रश्रय दिया। अगर ऐसा है, तो यह आक्षेप रंगमंच की सभी विधा - अभिनय, निर्देशन, लेखन और अभिकल्पना के क्षेत्र में सक्रिय अनेक रंगकर्मियों पर भी लागू होगा। यह कदापि न्यायपूर्ण और तार्किक नहीं होगा। 
नेमिचंद जैन, ध्यानेश्वर नाडकर्णी, शमीक बंद्योपाध्याय, धरणी घोष, जयदेव तनेजा, सत्येन्द्र तनेजा, महेश आनन्द, कविता नागपाल, जावेद अख्तर खाँ, अविनाश चन्द्र मिश्र, हृषीकेश सुलभ, गिरीश रस्तोगी, रवि रंजन सिन्हा जैसे इस कोटि में आनेवाले अनेक समीक्षक, सिद्धांतकार और नाट्य-चिन्तकों की लम्बी शृंखला है। इन समीक्षकों को भारतीय रंगमंच और हिन्दी नाट्यालोचना के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इनमें कई वरिष्ठ समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी नाट्यालोचना की भाषा और उसके नए मुहावरे गढ़े हैं। (वैसे दोयम दर्जे के व्यक्ति किस क्षेत्र में नहीं हैं)। 
हिन्दी रंगमंच में समालोचना की समस्या और चुनौतियों पर विमर्श और चर्चा की आवश्यकता से कौन इंकार कर सकता है ? खुले दिल से इस पर बात होनी ही चाहिए।

मुन्ना कुमार पांडे - प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल....नाट्यलोचन और रंग समीक्षा का अहित किया । यह एकांगी बयान है। दिल्ली में सत्येंद्र तनेजा, जयदेव तनेजा और महेश आनंद यह तीन नाम अपने आस पास देखता हूँ तो यह लाइन नितांत व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से ग्रस्त लगने लगती है। ये सभी न केवल सफल शिक्षक रहे हैं बल्कि रंग समीक्षा में नामवर भी। गिरीश रस्तोगी, जावेद अख्तर खां आदि के नाम आपने गिना ही दिए हैं। दरअसल यह समीक्षा में छेका छेकी वाला मसला है। रंगकर्मी रंगकर्म यदि समीक्षक के लिए करता है तब तो उसका रंगकर्म भी संदेहास्पद है। सार्थक, निष्पक्ष और समर्थ समीक्षा (किसी भी विधा में) हलवाहे के हाथ की छड़ी है जो अदृश्य रहकर बैलों को अपनी लीक पर रखती है। (उदाहरण में बैल को अन्यथा न लिया जाये) बाद बाकि आपकी बात से सहमति।

प्रवीण कुमार गुंजन - जावेद अख्तर साहेब अभिनेता हैं कि रंग-समीक्षक?

अनिल पतंग - लेखक, अभिनेता और रंग समीक्षक तीनों।

मुन्ना कुमार पांडे - मूलतः अभिनेता, पेशे से शिक्षक, नाटककार और समीक्षक भी। लेकिन इससे क्या बात की अहमियत ख़त्म हो जाती है ।

परवेज अख्तर - आपने तो मेरी बात का एकदम उल्टा ही अर्थ लगा लिया। मैंने राजेश चन्द्र की जिस स्थापना का विरोध किया है, उसको आपने उसी अर्थ में लिया, जो राजेश कहना चाहते हैं। अपनी उपर्युक्त टिप्पणी में, मैंने तो स्पष्टतः यह कहा है कि इस तरह की बात कहना, नाट्य-समीक्षा की स्थिति का सरलीकरण है और यह उचित अथवा तर्कपूर्ण नहीं है।
टिप्पणी के उस भाग को, जिसका आपने उल्लेख किया है, पुनः आपके सुलभ सन्दर्भ हेतु यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :
" बावजूद इसके, यह कहना भी नाट्य-समीक्षा के संकट और उसकी चुनौतियों को कदाचित सरलीकृत करना होगा कि प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल, साहित्य की अन्य विधाओं से आए समीक्षकों ने रंगमंच और नाट्यालोचना का अहित किया या उसका इस्तेमाल अपने हित में किया; या फिर रंगमंच में 'गुटबाज़ी' को प्रश्रय दिया। अगर ऐसा है, तो यह आक्षेप रंगमंच की सभी विधा - अभिनय, निर्देशन, लेखन और अभिकल्पना के क्षेत्र में सक्रिय अनेक रंगकर्मियों पर भी लागू होगा। यह कदापि न्यायपूर्ण और तार्किक नहीं होगा। "
" नेमिचंद जैन, ध्यानेश्वर नाडकर्णी, शमीक बंद्योपाध्याय, धरणी घोष, जयदेव तनेजा, सत्येन्द्र तनेजा, महेश आनन्द, कविता नागपाल, जावेद अख्तर खाँ, अविनाश चन्द्र मिश्र, हृषीकेश सुलभ, गिरीश रस्तोगी, रवि रंजन सिन्हा जैसे इस कोटि में आनेवाले अनेक समीक्षक, सिद्धांतकार और नाट्य-चिन्तकों की लम्बी शृंखला है। इन समीक्षकों को भारतीय रंगमंच और हिन्दी नाट्यालोचना के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इनमें कई वरिष्ठ समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी नाट्यालोचना की भाषा और उसके नए मुहावरे गढ़े हैं . . . "
आप जानते हैं कि आदरणीय नेमिचन्द जैन, सत्येन्द्र तनेजा, जयदेव तनेजा, महेश आनन्द, गिरीश रस्तोगी सहित हिन्दी के लगभग सभी महत्वपूर्ण नाट्य-समीक्षकों / चिन्तकों के साथ हमारा जीवन्त सम्वाद रहा है और हम इन सभी के मौलिक योगदान का उच्च-मूल्यांकन करते हैं।
राजेश चन्द्र की स्थापना से मेरी असहमति है। आप मेरी पूरी टिप्पणी को एक बार पुनः देख लें, तो निश्चित ही आप मेरे मंतव्य को उसके उचित सन्दर्भ में लेंगे। 

राजेश राजा - भाई, पटना रंगमंच के दो समीक्षकों का नाम जानने का इच्छुक हुँ, जो पटना रंगमंच मे हो रही प्रस्तुतियो को लगातार देखने जाते रहें हों और जो किसी झण्डे या वाद से ताल्लूक ना रखते हों, मै एसे दो नामो का चरण स्पर्श कर उन्हे व्यक्तिगत तौर पर अपनी नाट्य प्रस्तुति देखने का आमंत्रण दे कर आउँगा ,कृप्या मेरी मदद करें । 

पुंज प्रकाश - पटना में नाट्य समीक्षकों की कोई कमी नहीं हैं मित्र राजेश राजा। वहां तो ऐसे ऐसे धुरंधर समीक्षक है जो प्रस्तुति का रिहर्सल शुरू होंते ही समीक्षा कर देते हैं - अड़े उ, कौची करेगा, हम जनते ही सब"। और live समीक्षा भी होती है। प्रस्तुति अंदर चल रही होती है और बाहर गेट पर समीक्षा भी साथ साथ। नाम तुमको भी पता है सबका। बस कसैली और पान का पत्ता लेकर चरण छूने की तैयारी शुरू करो। 

नीलेश दीपक - मु़झे लगता है राजेश जी चिन्ता अपने पुराने पीढ़ीयों के समीक्षकों से नहीं है। उपर वर्णित नाम तो अकाट्य है। लेकिन इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज जो अखबारी समीक्षकों की दुर्दशा है, वह सच में चिन्तनीय है। इससे रंगमंच को ही नुकसान हो रहा है। रंग संस्थान और रंगकर्मी जिस प्रकार सिर्फ अखबारी समीक्षकों की दरबारी पर जिस तरह उतारु हैं वह अशोभनीय ही जान पड़ता है। सिर्फ इसीलिए कि उनके नाटक की समीक्षा किसी अखबार या पत्रिका छप जाये और ग्रान्ट की फाइल में एक कागज़ पुख्ता हो जाए। 

प्रवीण कुमार गुंजन - भाई निगेटिव सोच को छोड़ो । नाटक करो । समीक्षकों के लिए नाटक थोड़े करते है । नाटक देखो नाटक सोचो । 

दीपक कुमार सिन्हा – राजेश भाई, मेरे लिखे नाटक को कई बड़े – बड़े रंगसमिक्षकों ने पढ़ा, फोन या मैसेज कर बधाई भी दी, लेकिन आजतक किसी भी पत्रिका में समीक्षा तो दूर रिपोर्टिंग तक नहीं आई; जबकि एक नाटक का विमोचन दोनों बार भारत के बड़े साहित्यकारों रवि भूषण व केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे और नाट्य निर्देशक अंकुर जी ने किय; क्योंकि मैं उन्हें खुश नहीं कर पाया।

राजेश चंद्र - प्रश्न करने वालों को ही ख़ारिज़ कर देने से प्रश्न ख़ारिज़ नहीं हो जाते। वे आपको कठघरे में खड़े रखते हैं, जब तक ईमानदारी के साथ आत्मावलोकन न किया जाय। 

धर्मेश मेहता - मैं भी बिहार रंगमंच के ऐसे कोई समीक्षक को नहीं जानता हूँ जो हर नाट्य गतिविधियों में शामिल हो रहे हों ! 

राज देव - बिहार रंगमंच में नाट्य-समीक्षक, नाट्य समालोचक, फलाना-ढिकाना विशेषण अपने-आप लगाये जा रहे हैं कागज पर या हवा में या किसी वातानूकुलित कमरों में ... बस पटना-दिल्ली-पटना कर-कर-के, जबकि बिहार में हीं 38 जिला है। सब लॉबी का खेल है। ज्यादातर का बिहार के रंगमंच से कोई व्यावहारिक सरोकार नहीं है, यही कड़वा सच है। उनका एप्रोच कलाकारों को लेकर न तो लोकतांत्रिक है और न हीं विकेन्द्रित। रंगमंच में अराजकता के सूत्रधार यही लोग हैं। किसी के व्यक्तिगत, सीमित और संकुचित सरोकार के दायरे में बिहार रंगमंच थोड़े ना आता है। हबीब तनवीर, सफदर हाशमी और उत्पल दत्त का नाम लेना बहुत आसान है, बनना बहुत मुश्किल, असंभव ...! 

विजय कुमार - रंगमंच में समीक्षा करने करवाने की वर्तमान स्थिति है उसे देखते हुए राजेश जी से सहमति है। नाट्य महोत्सव के कई ऐसे आयोजक हैं जो समीक्षक के लिए भी बजट बनाते हैं। मैं दिल्ली के एक ऐसे समीक्षक को व्यक्तिगत तौर पर देखा जो नाटक देखे बिना भी निर्देशक के बारे में कसीदा गढ़ दिया। वह अक्सर बिहार में होने वाले नाट्य महोत्सव में अतिथि के रूप में अवतरित होते रहते हैं। विशेष सुविधा को वह अपना अधिकार समझते हैं। 

व्यास चंद्र शेखर - अक्सर समीक्षा नाटक के प्रदर्शन के पूर्व ही तैयार हो चुकी होती है। फोटोकॉपी सहित। डिजीटल कैमरों की मदद से फोटो भी तुरंत तैयार हो जाते हैं ओर उनका वितरण भी तत्कालिक है। 
समीक्षा के लिये नाटक में जोड़े जा रहे जबरन प्रयोग और तामझाम के प्रभावों से मुक्ति पाने , प्रस्तुति में शुद्ध नाटक की पहचान करने, उसे नाट्य  अनुशासन पर परखने, नये प्रयोगों में संभावनाओं की पहचान करने और मूल स्क्रिप्ट के साथ हुए न्याय, निर्देशक द्वारा ली गयी छूट, सेट डिज़ाइन, रंग भूषा, पात्रों का चुनाव, प्रकाश व्यवस्था आदि पर विचार करने और समीक्षा को नाट्यानपढ़ लोगों द्वारा काट छांट से बचाने शब्द सीमा में बांधते हुए लिखने में समय लगता है।
रात में 10 बजे ख़त्म हो रहे नाटकों की समीक्षा 11:30 रात तक कम्पोज होकर अर्धरात्रि के बाद छपने लगती है। सभी विचारकों ने जो यहाँ व्यक्त किया है उससे होकर कुछ सार्थक बदलाव आना चाहिए।

विजय कुमार - निश्चित रूप से व्यास सर समीक्षा के लिए समय भी मिलनी चाहिए। रिपोर्टिंग अलग चीज़ है, समीक्षा अलग। 

व्यास चंद्र शेखर - आप ने बहुत सही कहा। दर्द तो यही है कि अधिकांश समीक्षाएं रिपोर्टिंग के स्तर से आगे नहीं जातीं। कुछ समीक्षा का भ्रम देने रिपोर्टिंग और समीक्षा के बीच "आधा तीतर, आधा बटेर" होती हैं। हां! अच्छी समीक्षाएं तो नाटक न देख पाये दर्शकों को नाट्यानुभव का पर्याप्त अनुमान देतीं हैं। ऐसे समीक्षक प्रणम्य हैं। इस पोस्ट पर आई त्वरित प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत हैं कि नाटक से विचार के स्तर पर जुड़े लोग व्यथित हैं। 

पुंज प्रकाश - बात पत्र-पत्रिकाओं के स्तरीयता पर भी होनी चाहिए। हिंदी में अनगिनत पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं लेकिन कुछ अपवादों (कथादेश, जनसत्ता आदि) को छोड़ दिया जाय तो बाकियों में समीक्षा और समीक्षकों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। मुझे याद है पहले शुक्रवार को पटना के विभिन्न अखबारों में कला संस्कृति नामक पन्ना निकलता था जिसमें नाटकों की समीक्षा प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। 

विजय कुमार - पुंज जी हमलोगों ने एक बार कोशिश की कि फिर से वह पेज आना शुरू हो। बेगूसराय के साथियों ने मांग भी की थी। 

पुंज प्रकाश - पटना में भी हमलोगों ने कोशिश की थी। संपादक से भी मिले। संपादक महोदय ने जो जवाब दिया वह कमाल था कि अब यह सब पढता कौन है : 

विजय कुमार - एक बार एकजुट होकर सार्थक पहल करना चाहिए। 

अमितेश कुमार - सही बात यही है, कि कोई नहीं पढता। रंगकर्मी ही नहीं पढता औरो की बात जाने दीजिये ... वैसे पढ़ते तो लोग सम्पादकीय भी नहीं है ... तो क्या नहीं छापते 

पुंज प्रकाश - अमितेश भाई, बाकी जगह का पता नहीं लेकिन बिहार में लोग समीक्षा भी पढता है और संपादकीय भी। बाकी गाय-भैंस मरने और फ़िल्मी गप्प की ख़बरें के मुकाबले कम पढ़ते होगें, यह बात मानी जा सकती है। जो लोग पढ़ता है वह भी छपे और जो पढ़ना चाहिए, वह भी। 

अमितेश कुमार - मैं अपनी तरफ से बता सकता हूँ, आज तक मैंने बिना नाटक देखे समीक्षा की ही नहीं ... वैसे मुझे जो समीक्षक माने उनका एहसान है ... और कम ही समय में एहसास हो गया की समीक्षा करके अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं है। इसलिए अब निजी मशवरे देने में अधिक यकीन रखता हूँ। और ऐसे लोगो के बारे में लिखता हूँ जो पूछने ना आये कि भाई ये काहे लिखा!! 

पुंज प्रकाश - लाभ-हानि देखिएगा तब हो चुकी समीक्षा। 

अमितेश कुमार - भाई साहब अगर दिमाग बचाने की कवायद को आप नफा नुकसान का गणित मानेंगे तो देखना ही पड़ेगा। दिमाग बचेगा और शरीर भी तो बहुत समीछा होगा। 

पुंज प्रकाश - अरे तो कोई यदि पूछता है कि आपने यह क्यों लिखा तो जवाब दीजिए। उसे आपके लिखे से सहमत-असहमत होने का हक तो है ही। इतना लोड तो लेना ही होगा आज के समय में। 

अमितेश कुमार - ना, उससे उलझने का समय नहीं क्योंकि उसका कोई लाभ नहीं। निजी मश्विरा उसका रास्ता है। अब हम तभी समीक्षा लिखते हैं जब बतौर दर्शक कुछ मिले। 

पुंज प्रकाश - सही जा रहे हैं  

अमितेश कुमार - और भारंगम के दरम्यान समीक्षा इसलिए करते हैं कि लगता है ड्यूटी है। कम से कम पचास आदमी मेरे भरोसे है। ऐसा एहसास फिर साल भर नहीं होता 

पुंज प्रकाश - मेरी सलाह है कि अपने इस (निजी मश्विरा) फैसले पर पुनर्विचार कीजिए। मैं आपके इस स्टेटमेंट से भी सहमत नहीं हूँ कि "जो सबसे खराब रंगकर्म करते हैं वो सबसे अधिक समीक्षा खोजते हैं।" बाकी आपकी कलम, आपका फैसला। 

अमितेश कुमार - कोई हम परन नही किये हैं।।।जब भी कोई नाटक बतौर दर्शक मुझे उत्साहित करेगा मैं करूँगा समीक्षा और जाहिर है पूरी ईमानदारी के साथ। और ये जो स्टेटमेंट है ये अनुभव है ... मेरे कहने भर का यथार्थ नहीं है 

पुंज प्रकाश - अब विकृतियों को छोड़िए जी, वह तो हर जगह, हर विधा में है। 

अमितेश कुमार - सही बात है ... लेकिन अपने भीतर के दर्शक का बचा रहना अधिक जरुरी है ...बतौर समीक्षक नाटक देखना एक फाल्स इगो में भी रखता है ... सहृदय बनने की तरफ जाना अधिक जरुरी है 

पुंज प्रकाश - अब हम का बोलें, जो अच्छा लगे कीजिए। बस यही बाकी रह गया है, बोलने को। 

अमितेश कुमार - आपसे क्या छुपा है!! 

प्रवीण कुमार गुंजन - रंगमंच तो बेहतर हो , रंग समीक्षक से रंग आंदोलन की चिंता हो । 

अभिषेक पंडित – नाटक की ही तरह समीक्षा भी एक विधा है, कौन कर रहा है यह विषय नहीं है बल्कि कैसा कर रहा है, यह महत्वपूर्ण है। 

पुंज प्रकाश - सही बात 

दीपक सिन्हा - कुछ रंगसमिक्षक ऐसे हैं जिनकी रोजी- रोटी ,दाल भात और कलम बेहिसाब। एनएसडी से ही चलती है ,कुछ तो लाइन में लगे हुए हैं कि कब एन अस डी उसकी सूध ले/,अच्छा बडका लोग केतनो घटिया काम करेगा ,लाखों रुपया भारत सरकार का उडा कर नाटक करेगा,महोत्सव मे छक कर दारु पिएगा लेकिन ये पोषक समीक्छक एक बार नहीं लिखेगा।

विवेक कुमार - सही कहा आपने दीपक जी। सही मायने में तो 'रंग- समीक्षक' है कौन? और हैं भी तो उन्होंने ऐसी कौन सी योग्यता या अनुभव का धारण किया है कि उनकी समीक्षा को गंभीरता से लिया जाए?रंगमंच के क्षेत्र में उनका स्वयं का अनुभव क्या रहा है?सिवाय 'लॉबीबाजी' और कागज काला करने के,उनके पास ऐसा कौन सा प्रमाणपत्र है कि हम उन्हें 'रंग समीक्षक ' के रूप में स्वीकार कर लें? हम तो नाहक ही उन्हें तवज्जो दे देते हैं।आप जिनकी चर्चा कर रहे हैं, वे दरअसल किसी खास लॉबी के ही लोग हैं, वे पेशेवर समीक्षक हैं ही नहीं , समीक्षा लिखते हैं चूँकि उन्हें किसी को उपकृत करना होता है या किसी की दोस्ती निभानी होती है, या फिर टाइमपास के लिए अपने रंगमंचीय ज्ञान का प्रदर्शन करना होता है। इन्हें बस 'इग्नोर' ही करें तो बेहतर होगा। आधिकारिक रूप से रंग समीक्षक वही माना जाना चाहिए जिनकी सक्रियता रंगमंच की किसी भी एक विधा जैसे लेखन,निर्देशन,अभिनय,संगीत,अथवा अन्य तकनीकी विभाग में पूर्णकालिक(फुलटाइम) रूप में हो।पार्टटाइम या तफरीह के तौर पर रंग समीक्षा करने वाले को तवज्जो न दिया जाए।ऐसे समीक्षकों ने ही  रंगमंच को दर्शकों से दूर किया है।सिनेमा ने तो बहुत पहले ही 'पार्टटाइम क्रिटिक्स' को अस्वीकार कर दिया है।