रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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गुरुवार, 9 मई 2013

जेएनयू में 'मां' नाटक का मंचन


maa                                             भाषा कल्चरल विंग और स्पीका ढोल ने मिलकर गोर्की द्वारा रचित उपन्यास 'मां' का नाट्य मंचन किया। जब भारत में चारों ओर स्त्रियों को लेकर के लोगों के मन में एक अजीब-सी ऊहापोह देखने को मिल रही है तभी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र रमेंद्र चक्रवर्ती ने गोर्की के फेमस उपन्यास 'मां' को नाटक के रूप में पेश करने की हिम्मत जुटाई। उपन्यास में गोर्की का मजदूर एक ऐसा आदमी है जिसका सरोकार सिर्फ अपने देश से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से है। रमेंद्र चक्रवर्ती का यह नाटक ऐसी स्त्री चेतना को लेकर है जहां भारत देश गावों में बसता है। देशभर की स्त्रियों को एक साथ पिरोने का काम इस नाटक में किया गया है।
रूस में 'मां' नॉवेल पहली बार 1907 में प्रकाशित हुआ। 20वीं शताब्दी के साथ ही मजदूर ने इतिहास के रंगमंच पर मुख्य चरित्र के रूप में प्रवेश किया। एक ऐसे चरित्र के रूप में जो दृढ़संकल्प होकर हर मामले को अपने हाथों में ले रहा था और अपनी जरूरतों के मुताबिक घटनाओं को गढ़ रहा था। मैक्सिम गोर्की ने इसी मजदूर कि जीवनी लिखी और इसके प्रशंसा में गीत गए गए।
जब हमने रमेंद्र चक्रवर्ती से इस नाटक के मंचन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि कला जनता को एकजुट करने का एक साधन है। इसीलिए उन्होंने फेमस रूसी उपन्यास 'मां' को चुना। 'मां' एक मजदूर स्त्री निलोवना की कहानी है जो और अन्य मजदूर माताओं से अलग नहीं है। कारखानों में एक मजदूर मां अपनी ताकत से ज्यादा काम करती है, फिर घरों में पिसी जाती है।पीयक्कड़ उपद्रवियों द्वारा सताई जाती है। नाटक में कहानी उस वक्त मोड़ लेती है जब उसका बेटा पावेल बस्ती की नारकीय जिंदगी के तौर-तरीकों से अपने को अलग कर लेता है और क्रांतिकारी बन जाता है। मां उसके पक्ष में खड़ी होती है।उसके साथ-साथ आगे बढती है।
नाटक में निलोवना का रास्ता उस आम मजदूर का रास्ता है जो क्रांति में शामिल होने आता है। दर्शक निलोवना की दुनिया को उसकी आंखों से देखता है और घटनाओं का मूल्यांकन उसके मापदंडों के आधार पर करता है। 
इस उपन्यास का नाटकीय रूपांतरण रमेंद्र और राजकुमार ने किया। डायरेक्शन की कमान रमेंद्र चक्रवर्ती के हाथों में थी। नाटक का मंचन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में किया गया। म्यूजिक अंजना घोषाल का था जो नाटक में दर्शकों बांधे रखता हैं। गोथिक संगीत को अंजना घोषाल इस में नाटक प्रयोग किया है। मां के रूप में सोनी सिंह, एमी धनकर की ऐक्टिंग दिल को छूने लायक है। वहीं, वैभव भटनागर, आंद्रे, पंकज चौबे, शिशिर, त्रिशाला, अली, विवक्षा, पूजा, नितिन सिंह नेगी, सौरव और गौरव ने भी उम्दा ऐक्टिंग की है। इस नाटक का मंचन 8 मार्च को विमिंस डे पर भी किया गया था। 
नवभारतटाइम्स.कॉम से साभार.

मंगलवार, 6 मार्च 2012

सर्कस में जानवर बनकर जीवन यापन करना पड़ता है।


रवींद्र त्रिपाठी
गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी ‘समझौता’ एक प्रसिद्ध रूपक कथा है जो मनुष्य के अमानवीकरण की कथा कहती है। युवा रंगकर्मी प्रवीण कुमार गुंजन ने इसी के नाट्यरूप को निर्देशति किया है जो पिछले लंबे समय से रंगकर्म के क्षेत्र में काफी चर्चित है। जब भारत रंग महोत्सव हुआ था तब भी इसका मंचन हुआ था और आजकल दिल्ली में चल रहे महिंद्रा फेस्टिवल में भी पिछले दिनों इसे खेला गया। इसमें मानवेंद्र त्रिपाठी ने एकल अभिनय किया है और पूरी कथा एक चरित्र के माध्यम से दिखाई गई है। लेकिन सिर्फ कथा महत्वपूर्ण नहीं है। नाटक ताकत के उस खेल को सामने लाता है जिसमें मनुष्य सिर्फ सत्ता संपन्न लोगों के हाथो में सिर्फ कठपुतली बनकर रह जाता है। मुक्तिबोध प्रगतिशीलता और मार्क्‍सवाद के प्रति आस्था रखनेवाले लेखकों में थे लेकिन उनकी रचनाओं में अस्तित्वगत सवाल भी काफी उभर कर सामने आए हैं। ‘समझौता’ में भी इसे देखा जा सकता है। क्या मनुष्य जिसे समझौता कहता है वह उसकी नियित बन गई है, यह प्रश्न नाटक देखने के दौरान और उसके बाद भी उभरता है। मनुष्य जब विवश और लाचार होता है तो क्या होता है! क्या वह अपनी जिंदगी जी पाता है!

क्या इसे वह खुद चुनता है या दूसरों के चुनाव के मुताबिक जीता है! समझौता में एक आदमी इतना लाचार है कि उसे सर्कस में जानवर बनकर जीवन यापन करना पड़ता है। एक दिन उसे कहा जाता है कि उसके सामने एक शेर होगा जिससे उसे लड़ना है। जब उसके सामने शेर आता तो शुरू में उसकी हालात बहुत खराब हो जाती है। आखिर जानवर की खाल में एक आदमी सचमुच के शेर से कैसे लड़े लेकिन लड़ने के दौरान मालूम होता है कि सामने जो शेर दीख रहा है वह भी असली शेर नहीं बल्कि शेर की खाल में लिपटा आदमी है। अब दोनों को लड़ना है और दूसरे पर छपटना है। एकदू सरे को खत्म करने के लिए ललकारना है। लड़ना भी है और लड़ने का नाटक भी करना है। इस तरह इस रूपक के माध्यम से पता चलता है कि आदमी अपनी जिंदगी में क्या चुने और क्या छोड़े, इसके लिए भी वह स्वाधीन नहीं है। दूसरे, यानी सत्तासीन ताकतें इस बात का फैसला करती हैं कि उसे क्या करना है। प्रवीण कुमार गुंजन इस नाटक के जरिए व्यवस्था और मनुष्य के रिश्ते के तनाव को भी रेखांकित करते हैं डिजाइन के स्तर पर नाटक बहुत सरल है। सिर्फ यह दिखाया गया है कि एक स्टेज पर एक रिंग बना हुआ है और एक व्यक्ति बहुत देर तक एक ही मुद्रा में खड़ा है। नाटक शुरू होने के पहले ही एक माहौल बन जाता है। प्रस्तुति के दौरान सामूहिक गायन और हिंदी कविता की कुछ अन्य पंक्तियां भी आती हैं बेरोजगारी और गरीबी के अन्य प्रसंग भी प्रस्तुति के दौरान उभरते हैं। संगीत और रंगों के इस्तेमाल से नाटक कई स्तरों पर अर्थ का निर्माण करता है। कई तरह के लोकतत्वों का इस्तेमाल भी इसमें किया गया है। प्रवीण कुमार गुंजन ने कुछ साल पहले जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की डिप्लोमा प्रस्तुति के दौरान ‘अंधायुग’ किया था तब भी उन्होंने एक चर्चित नाट्यालेख को समकालीन अर्थ संदर्भ दिए थे। समझौता में भी कई समकालीन अर्थ संदर्भ हैं जो हमारे आसपास की घटनाओं को नए ढंग से आलोकित करते हैं। एकल अभिनय के खयाल से मानवेंद्र त्रिपाठी ने बहुत भावप्रवण काम किया है। उनके अभियन और पूरी प्रस्तुति में भी कई तरह की नाट्य युक्तियां हैं। महेंद्रा थिएटर फेस्टिवल एक ऐसा समारोह है जो रंग-प्रस्तुतियों के अलग अलग केटेगरी, अभिनय, निर्देशन, कोरियोग्राफी, प्रकाश योजना आदि के लिए पुरस्कार भी देता है। इस बार कौन से कलाकार और निर्देशक पुरस्कृत होते हैं, इसकी प्रतीक्षा है।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

अभिनेता प्रधान है बाघिन मेरी साथिन

मृत्युंजय प्रभाकर की समीक्षा

भारत रंग महोत्सव में नाटकों और उनकी परिकल्पना की चकाचौंध के बीच जिन नाटकों ने अपनी सादगी और अभिनय के कारण प्रभावित किया "बाघिन मेरी साथिन" उनमें से एक है। नटमंडप, पटना की इस प्रस्तुति ने अभिनेता पर अपनी केंद्रियता के कारण खासतौर पर अपना प्रभाव छोड़ा। यह एक एकल प्रस्तुति थी जिसमें अभिनेता के तौर पर उपस्थित थे हिंदी रंगजगत के महत्वपूर्ण अभिनेताओं में से एक माने जाने वाले जावेद अख्तर खां। जावेद ने अपने अभिनय से अभिनेता की ताकत का भरपूर प्रदर्शन किया है। वह सूत्रधार, सैनिक, बाघिन और छोटू बाघ की भाव-भंगिमाओं, आवाज और शारीरिक हरकतों को इस तरह से परोसते हैं कि वह नाट्यधर्मी होते हुए भी दर्शकों को लोकधर्मी होने का अहसास देती है। 

मूलतः "द स्टोरी ऑफ द टाइगर" नाम से नोबल पुरस्कार विजेता दारियो फो लिखित यह नाटक माओ की गुरिल्ला सेना के एक ऐसे सिपाही के बारे में है जो जख्मी हो जाने के कारण अपनी बटालियन द्वारा मरने के पीछे छोड़ दिया गया है। वह जान बचाने के लिए एक गुफा का सहारा लेता है जिसमें पहले से एक बाघिन और उसका बच्चा निवास करते हैं। अविश्वसनीय तौर पर उसकी बाघिन से दोस्ती हो जाती है। भागकर जब वह एक गांव में पहुंचता है तो बानिघ और उसका बच्चा उसका पीछा करते हुए वहां पर पहुंच जाते हैं। गांव पर जब दुश्मन सेना हमला करती है तब बाघ के कारण वह लड़ाई जीत जाते हैं लेकिन जीतने के बाद बाघ को वहां से हटा देने की बात की जाती है। दारियो फो बीसवीं शताब्दी के उन महानतम नाटककारों-निर्देशकों-अभिनेताओं में शुमार हैं जिन्होंने अपना खुद का एक रंगमंचीय व्याकरण गढ़ा है। इसमें यूरोप की प्राचीन रंगशैली कॉमेडिया-डेल-आर्टे की छाप है। वह अपनी बातें व्यंग्य की शैली में कहते हैं जिसमें गहरे लाक्षणिक भाव भरे होते हैं। 

नाटक का निर्देशन पटना के चर्चित रंगनिर्देशक परवेज अख्तर ने किया है। परवेज अख्तर ने इस नाटक के निर्देशन के दौरान नाटककार और नाटक की मूल रचना का भरपूर खयाल रखा है। वह इसे रंगमंचीय चकाचौंध में फंसाने के बजाय पूरी तरह अभिनेता केंद्रित रखते हैं। मंच सज्जा से लेकर प्रकाश योजना तक में वह अभिनेता के ऊपर कुछ भी थोपने से बचते हैं जोकि नाटककार की शैली के निकट है। 

नाटक के अंत में वह भारतीय राष्ट्रीय राजनेताओं और पार्टियों को लाक्षणिक ढंग से निशाना पर लेने से भी नहीं चूकते। यही राजनीतिक सूक्ष्मता उनके रंगमंच की ताकत रही है

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

दर्शकों को भा गया यह समझौता


मानवेन्द्र त्रिपाठी प्रस्तुति के दौरान 

मृत्युंजय प्रभाकर की समीक्षा 

१४वें भारत रंग महोत्सव में बड़े पैमाने पर युवा रंग निर्देशकों को मौका दिया गया है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही पूर्व छात्र प्रवीण कुमार गुंजन उनमें से एक हैं। पिछले तीन वर्षों से लगातार उनकी प्रस्तुतियां भारत रंग महोत्सव में आती रही हैं। "अंधा युग" जैसी स्मरणीय प्रस्तुति से भारत रंग महोत्सव में अपनी शुरुआत करने वाले प्रवीण कुमार गुंजन इस बार अपनी प्रस्तुति "समझौता" के साथ हाजिर हुए। मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित सुमन कुमार द्वारा नाट्यांतरित उनकी यह प्रस्तुति नई नहीं है। वर्षों पहले वह इसे कई अभिनेताओं के साथ प्रस्तुत कर चुके हैं। इसी नाटक को कुछ साल पहले युवा संस्कृति महोत्सव में पहला स्थान भी मिल चुका है। लेकिन इस बार यह प्रस्तुति इस रूप में भिन्न है कि उन्होंने इसे एकल प्रस्तुति में बदल दिया है और छात्र-अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी के साथ तैयार किया है।

इस एकल प्रस्तुति में सबसे खास बात जो दिखती है, वह है इसकी प्रस्तुति शैली। एक रिंगनुमा विशेष स्टेज के घेरे में एक अभिनेता खड़ा है और अपनी अदाकारी से वह दर्शकों का दिल जीतता है। उसके अभिनय शैली में कोई भी रटा-रटाया फॉर्मूला नहीं है। वह सभी स्थापित अभिनय की रुढ़ियों को तोड़ता हुआ अपने गायन, शारीरिक गतियों, स्वर व शरीर आलोड़न, संवाद, सूत्रधारीय व्यक्तव्यों सहित कई तरह से दर्शकों से अपना संवाद स्थापित करता है। नाटक के आरंभ में यह युक्तियों भले ही लादी हुईं लगती हैं लेकिन नाटक का अंत आते-आते यही युक्तियां दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं और दर्शक नाटक के अंत में खड़े होकर मिनटों तक ताली बजाने को विविश होते हैं। एक प्रस्तुति की सफलता की इससे बड़ी निशानी और क्या हो सकती है? 

निश्चित तौर पर प्रवीण कुमार गुंजन की यह प्रस्तुति एक यादगार प्रस्तुति है और इसे यादगार बनाने में सबसे बड़ी भूमिका इसके अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी की है। अपने अभिनय से वह दर्शकों का मन पूरी तरह मोहने का काम करते हैं। जिस प्रकार की शारीरिक और शाब्दिक दक्षता वह अपनी इस प्रस्तुति में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है। वहीं नाटक को बनाने में कोरस की भी बड़ी भूमिका है जो अभिनेता को न सिर्फ अभिनेता की अनुगुंज को ओज प्रदान करता है बल्कि उसे वांछित विराम का मौका देता है। हालांकि प्रस्तुति में कुछ चीजें ऐसी जरूर हैं जिनसे बचा जा सकता था, जैसे नाटक के बीच में डाले गए फिल्मी गीत, कुछ चुनिंदा रंगयुक्तियों के संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है, पानी, रंग और दूसरी रंगयुक्तियां न सिर्फ बासी बल्कि आयातीत प्रतीत होती हैं। नाटक के पहले हिस्से में भी सुधार की गुंजाइश है।


रविवार, 6 नवंबर 2011

देश के कच्चे-पके चिट्ठे की पोल .....



राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं साऊथ ज़ोन कल्चरल सेंटर के तत्वावधान में ८ अक्टूबर से लेके ५ नवम्बर तक आयोजित रंग कार्यशाला में प्रवीण गुंजन के निर्देशन एवं कुमारदास टी एन के मल्टीमिडिया, वस्त्र एवं ध्वनि परिकल्पना के मार्फ़त हिंदुस्तान के कुछ जरूरी मुद्दों से रु-ब-रु होती रायगढ़ इप्टा की नवीनतम प्रस्तुति है  ओह ओह ये है इंडिया. बाकलम निर्देशक - प्रस्तुति  का मूल उद्देश्य आजादी के बाद से लेके आजतक की भारतीये विसंगातिओं के बीच आम आदमी के दुःख दर्द का चित्रण करना था .नाटक की पहली प्रस्तुति पर अर्पित श्रीवास्तव की प्रतिक्रिया
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आज रायगढ़ इप्टा ने प्रवीण गुंजन के निर्देशन और कुमारदास टी एन के कला निर्देशन में ’ओह ओह इंडिया’ की प्रस्तुति देखने का सौभाग्य मिला. नाटक की पहली प्रस्तुति और वो भी अपने कथ्य और कहन के अंदाज़ में नयी ऊर्जा से भरपूर. साम्प्रदायिकता,भ्रष्टाचार, भूख, आत्महत्या, शोषण और स्त्रियों की दुर्दशा को अपने तमाम साजो-सामान से उच्चारित करता ये नाटक देश की अर्थव्यवस्था के बढ़ाते ग्राफ, महाशक्ति बनाने की दिशा में बढे कदम और विकास के प्रतिमान को ध्वस्त करता कई सवाल खडा करता है. जिसके जवाब हमें ढूँढने नहीं बल्कि देने हैं. ज़रुरत है खतरनाक चुप्पी को तोड़ने की. सदियों से लीक पे चली आ रही स्थापनाओं को विस्थापित करने की. सच है जब दर्द की इंतहा होती है ज़िन्दगी तमाम नकाब को बेनकाब करने पे उतारू ह़ो जाती है उसी बेनकाबी के उत्सव में ये नाटक अपना प्रभाव छोड़ने में सफल हुआ है


'ओह ओह ये है इंडिया' नाटक के नाम से ही प्रतिध्वनित ह़ो रही है देश के कच्चे-पके चिट्ठे की पोल .....



ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस तरह की समस्याओं पे कोई प्रस्तुति नहीं हुई पर इस प्रस्तुति की ख़ास बात ये है कि इसमें नवाचार यानी मल्टीमीडिया ध्वनि+दृश्य तकनीक के साथ-साथ जीवन की सम-विषम धडकनों को सहेजती, काल की, अतीत की स्मृतियों को उभारती मानवीय संवेदनाओं से भरी कविताओं का समन्वय है. मुक्तिबोध, अदम गोंडवी, कैफी आज़मी और प्रज्ञा रावत की कविताओं का सार्थक प्रयोग नाटक के कथ्य सम्प्रेषण में प्रभावकारी रहा. कई तरह के प्रतीकों [यथा हाथ में बंधी पट्टी, लालटेन, फैशन परेड बोतल और पिंजरे का] का सहज समावेश है जो हमें आज के समय में सोचने के लिए मजबूर करता है जबकि हम परोसी हुई वैचारिक दुनिया में जी रहें हैं वहाँ ये नाटक हमें कई अंधेरी गुफाओं में यूं सैर कराता है जैसे हम नाटक में नहीं बल्कि अपने वर्तमान को जी रहें हैं कभी किसानों की आत्महत्या के रूप में, कभी साम्प्रदायिक दंगो के रूप में, कभी जातिवादी संकीर्णताओ के बीच तो कभी इन सबके साथ स्त्रियों को दमित कर अपनी क्रूरता के बीच. सच! सुस्त विचार प्रक्रिया को झकझोरने का एक विश्वास भरा आह्वान रहा निर्देशक का. आज जब ये बहस गाहे-बगाहे नाटक करने वालों के बीच होती रहती है कि नाटक के लिए नाटककार कुछ नहीं कर रहे, नयी स्क्रिप्ट के न होने का रोना रोकर अपने कर्तव्य को निर्देशक और नाट्यकर्मी पूरा करते हैं वैसे समय में आपसी बहस को रंग दिशा देने का सराहनीय प्रयास रहा रायगढ़ के नाट्यकर्मियों और निर्देशक का. एक और ख़ास बात ये रही कि कहीं भी नाटक दर्शकों की विचार-भूमि में घुसपैठ किये बगैर कि समस्याओं से कैसे निपटना है मात्र सवाल खड़े करता है वो भी नए ज़माने की लय में डोट डोट डोट कह के. ये इस सदी का भयावह सच है कि आने वाले समय में हम किसी बात, किसी काम या किसी विचार पे डोट यानी पूर्णविराम नहीं लगायेंगे बल्कि डोट डोट डोट लिख अपनी वैचारिक और संस्कृतिक अपंगता की दिशा को रौशन कराते चले जायेंगे. बड़ी सूक्ष्मता से हर समस्या के प्रश्न के समय ये शब्द डोट, डोट, डोट इस्तेमाल किये गए हैं किसी विष बूझे तीर की तरह.

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी



सम के अंदर उदालगुड़ी जिले का टेंगला कस्बा कभी उल्फा के आतंकियों की वजह से जाना जाता था। अब इस बात को लंबा समय गुजर चुका है, इस बीच उदालगुड़ी बदला और टेंगला की पहचान भी बदली। टेंगला को एक नयी पहचान देने में थिएटर एक्टिविस्ट पबीत्र राभा का बहुत बड़ा योगदान है। आज एनएसडी के नये-पुराने शिक्षक टेंगला को असम में एनएसडी का एक्सटेंशन ही मानते हैं। इन दिनों पबीत्र टेंगला में नाटे कद के लोगों के साथ मिलकर खास तरह का थिएटर कर रहे हैं। जिसे असम में खूब सराहा जा रहा है।
पबीत्र राभा जब एनएसडी में आये थे, उस वक्त वहां रामगोपाल बजाज निदेशक हुआ करते थे और जब दिल्ली एनएसडी वह छोड़ रहे थे, उस वक्त देवेंद्र राज अंकुर निदेशक बन कर आ चुके थे। पबीत्र अपने साथियों की तरह अपना कॅरियर फिल्म में बनाने की जगह, कुछ अलग करना चाह रहे थे। वह एनएसडी में अपनी एमए की पढ़ाई और बैंक की नौकरी दोनों को बीच में छोड़कर आये थे। शादी हुई तो घर छोड़ दिया। मकसद सिर्फ धारावाहिक और फिल्मों में काम पाना भर नहीं था। चूंकि एनएसडी से आते वक्त तय करके ही आये थे कि यहां सबसे अलग कुछ करना है। इसी उधेड़बुन के साथ जिंदगी भी चल रही थी और नाटक-फिल्मों में काम भी। कई भाषाओं में पबीत्र ने दर्जनों नाटक निर्देशित किये। इसी बीच ‘दपॉन द मिरर’ नाम से एक थिएटर ग्रुप भी शुरू किया। टोक्यो में फिजिकल थिएटर फेस्टिवल से लेकर ‘मुखबिर’ और ‘टेंगो चार्ली’ जैसी हिंदी फिल्मों के अंदर अभिनय में भी हाथ आजमाया।
हाल में जब पबीत्र से गुवाहाटी से एक सौ किलोमीटर दूर उदालगुड़ी जिले के टेंगला मे मुलाकात हुई, तो उस वक्त वह अपने नाटक ‘व्हाट टू से’ के रिहर्सल में व्यस्त थे। व्यस्तता के बीच चेहरे पर प्रसन्नता थी कि उन्हें जो चाहिए था, उसके वे करीब हैं। यह नाटक उन्हीं नाटे कद के लोगों का दर्द बयान करता है, जो इस नाटक के मुख्य आकर्षण हैं। कहानी संक्षेप में दो दोस्तों की है। नाटक की शुरुआत उनके मिलने से होती है। एक दोस्त का दर्द उसका नाटापन है और दूसरे का दर्द उसकी ऊंचाईं। उसका भारी भरकम शरीर। इन दोनों लोगों के दर्द को नाटक में खुबसूरती के साथ संवादों में पिरोया गया है।
वैसे नाटे कद के लोगों की तलाश और उनको थिएटर के साथ जोड़ना बिल्कुल आसान नहीं था। नाटे कद के ये कलाकार अलग-अलग पृष्ठभूमि से हैं और अलग-अलग कामों से जुड़े हैं। इसलिए चुनौती सिर्फ थिएटर से जोड़ने तक ही सीमित नहीं थी, उससे कहीं बड़ी थी। इन सभी कलाकारों को नाटक की प्रस्तुति के लिए तैयार करना।
बकौल पबीत्र – ‘अपने थिएटर के लिए अभी मैं पच्चीस कलाकार जुटा पाया हूं। यह सभी कद में छोटे हैं, लेकिन हुनर में जबर्दस्त। इन्हें एक साथ लाने में पूरे ढाई साल लग गये।’
इन ढाई सालों में इन कलाकारों की तलाश हुई, उसके बाद उन्हें तराशा और निखारा गया। बात यहीं तक नहीं थी, जब तक यह कलाकार राभा के पास रहे, उन्हें एक निश्चित राशि राभा ने उपलब्ध करायी। चूंकि राभा का मानना था कि थिएटर के साथ जुड़ने की वजह से गरीब पृष्ठभूमि से आये कलाकारों के परिवार के जीवन पर किसी प्रकार का प्रभाव न पड़े। एक खास बात यह भी थी कि यदि वे कलाकार अपने परिवार की जरूरतों की चिंता से मुक्त नहीं होते, तो अपना श्रेष्ठ वे थिएटर को कैसे दे पाते? कई बार राभा अपने आयोजनों के लिए प्रायोजक नहीं मिलने पर अपनी जेब से पैसे लगाकर आयोजन कर चुके हैं। एक अच्छी बात यह है कि अब गांव के लोग उनकी प्रतिबद्धता देखकर छोटी-छोटी मदद लेकर सामने आने लगे हैं। मसलन जब थिएटर के लिए पंद्रह-बीस दिनों का कैंप लगता है तो कलाकारों के लिए कोई पचास किलो चावल लेकर आता है और कोई दाल। कई युवक कार्यकर्ता के नाते काम करने के लिए राभा के साथ खड़े होते हैं।
इन सभी बातों के साथ साथ यह एक सच्चाई है कि पबीत्र के थिएटर को उसके खास तरह के कलाकार ही सबसे अलग बनाते हैं। इनकी लंबाई कम है लेकिन पबीत्र की मेहनत की वजह से थिएटर के साथ जुड़े किसी भी कलाकार को आप किसी पेशेवर कलाकार से कम करके नहीं आंक सकते। जब राभा ने पहली बार अपने नाटक का मंचन ‘टेंगला’ में किया, उन्हें खुद इस बात का अंदाजा नहीं था कि लगभग पांच हजार लोग उस छोटे से कस्बे में उनके नाटक को देखने आएंगे जबकि उस दिन भारत और पाकिस्तान का मैच था। आयोजन से पहले वे लोग थोड़ा घबराये हुए थे कि दर्शक नहीं आये तो पहला आयोजन ही फीका हो जाएगा। वैसे आयोजन सफल भी क्यों न हो, यह तो पबीत्र की मेहनत का फल था। पबीत्र ने एक-एक कलाकार पर महीनों मेहनत की है। यहां एनएसडी से ली गयी शिक्षा उसके बहुत काम आयी।
जब इन कलाकारों ने गुवाहाटी में ‘व्हाट टू से’ का मंचन किया, पूरे असम में इनके नाटक की खूब चर्चा हुई। यह नाटक उन्हीं लोगों की कहानी कहता है, जो लोग इस थिएटर के साथ जुड़े हैं। छोटे कद के लोगों की कहानी। उनका दर्द। किस तरह समाज में हर तरफ उन्हें दुत्कारा जाता है। वह कहीं भी जाएं, उपहास के पात्र होते हैं। उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की विशेष सहायता भी नहीं मिलती। चूंकि वे विकलांग की श्रेणी में नहीं आते। लेकिन उन्हें अपनी कम लंबाई की वजह से जीवन में जिन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, वह विकलांगता से कम नहीं है। परिवार से लेकर समाज तक में वे लोग समय-असमय उपहास का कारण बनते हैं। उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की विशेष सहायता नहीं मिलती। चूंकि वे विकलांग की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन उन्हें छोटी लंबाई का होने के कारण किन-किन तरह की कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है, यह दपॉन द मिरर की टीम से मिलकर ही जान पाया। एक कलाकार ने बातचीत में बताया कि किस प्रकार उसे और उसी के कद के तीन और साथियों को एक सर्कस के मालिक ने बंधुआ मजदूर बना लिया था। एक दिन उन चारों लोगों ने भागने की योजना बनायी। चारों सर्कस की जीप पर सवार हुए और एक ने स्टेयरिंग संभाली और एक ने ब्रेक और गियर। इस तरह मुश्किल से अपनी जान बचाकर ये लोग भागे। जब सर्कस के मालिक को खबर लगी तो उसने इनके पीछे अपने लोग लगा दिये। इस परिस्थिति में सर्कस से भागे इन चार लोगों ने जीप बीच सड़क पर छोड़कर, एक ट्रक वाले से लिफ्ट ली और अपनी जान बचायी।
वास्तव में छोटे कद के लोगों की तकलीफ को कभी हमारे समाज में गंभीरता से नहीं समझा गया है। आइए प्रार्थना करें कि छोटे कद के लोगों की तकलीफ को समाज के बीच पहुंचाने में यह थिएटर समूह सफल हो।
ashish kumar anshu
(आशीष कुमार अंशु। जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक। सोपान नाम की एक पत्रिका के लिए पूरे देश में घूम-घूम कर रिपोर्टिंग करते हैं। मीडिया के छात्रों के साथ मिल कर मीडिया स्‍कैन नाम का अखबार निकालते हैं। उनसे ashishkumaranshu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
मोहल्ला live से साभार