रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

शनिवार, 6 अगस्त 2016

लोग टिकट खरीदकर नाटक क्यों नहीं देखते! : एक बहस

बहस की श्रृंखला के रूप में मैंने सोशल मिडिया पर लिखा “मैं रंगमंच में वैसे निर्देशकों, नाट्यदलों और आयोजकों का कायल हूँ जो अपने नाटकों में बिना टिकट कटाए अपने करीबी से करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों और रंगकर्मियों तक को सभागार में घुसने नहीं देते। इसके बावजूद उनके नाटकों में दर्शकों की कोई कमी नहीं होती।
रंगमंच से पास या कार्ड सिस्टम खत्म होकर, टिकट सिस्टम लागू होना चाहिए साथ ही नाटकों का प्रोडक्शन रेट तय हो। फ़ोकट में एक दूसरे की वाह वाह और हाय हाय करने से दरिद्रता का ही साम्राज्य बना रहेगा और रंगकर्मी इस या उस ग्रांट/डोनेशन/चंदा के चक्कर में अपनी ऐसी-तैसी कराता रहेगा।
किसी भी कला को अगर स्वाबलंबी बनना है तो उसे हर क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा। तभी आप निडर होकर काम कर सकते हैं।
भाई, पास न मिलने पर मुंह फुलाना बंद करो। नाटक किसी का भी हो, यदि देखना है तो टिकट कटाओ।
खूब मेहनत से नाटक बनाओ। नाटक से कमाओ - नाटक में लगाओ, टिकटवाले दर्शक बनाओ और जो बचे उसे बांटकर खाओ।”
जो कुछ प्रतिक्रियाएं मिलीं वह निम्न हैं। - माडरेटर मंडली

उमेश आदित्य - बात आपकी है 100% सही श्रीमान, लेकिन छोटे शहरों में कैसे चले काम? चंदा जहाँ उठा लेते हैं नेताओं के गुर्गे सारे, दस बीस हज़ार जुटाने में भी फटती है प्यारे, नेताओं के पिछलग्गू उठाते, लाखों -लाख की राशि, सही काम करने वाले करते फाकाकसी, पर बात आपकी सचमुच अच्छी लगती है, रंगमंच के दिन ऐसे ही सुधरेंगे, जब लोग हमारे टिकट ले नाटक देखेंगे।

पुंज प्रकाश - छोटे शहरों और गाँव में लोग फ़िल्म के लिए पैसे निकालते हैं, dth के लिए पैसे निकालते हैं, मोबाईल में बैलेंस और नेट पैक के लिए भी अब पैसे निकाल रहे हैं तो नाटक के लिए क्यों नहीं निकालेगें। प्रयास तो किया जाय, मुश्किल है लेकिन असंभव तो बिलकुल भी नहीं।

दिनेश चौधरी - अब जरा इसके दूसरे पहलू को देखें। अपने पड़ोस में जिला मुख्यालय राजनांदगांव है। मुक्तिबोध का शहर। कई सालों से नाटकों से वंचित। यहाँ नाटक करने जाएँ तो टिकिट सेल नहीं होगी। आयोजक डूब जायेगा। डोंगरगढ़ में हो सकता है। तो इसका मतलब ये हुआ कि टिकिट वाले रंगमंच की जमीन शौकिया थिएटर को ही तैयार करनी है। फिर हमारा अनुभव जुदा है। जो हजार रूपये का चन्दा देते हैं वो नाटक देखने नहीं आते। 500 वाले आते हैं। इन सबकी संख्या 40-50 के आसपास है, जिनसे 50-60 हजार निकल आते हैं। इतने टिकिट बेच पाना असम्भव है। सनद रहे कि यह बात छोटे कस्बे के संदर्भ में कही जा रही है, तो यह मसला शहर से जुदा हो सकता है। हाँ, अगर हम टिकिट बेचकर रंगकर्म करते हैं तो हम दर्शक के प्रति जवाबदेह हो जाते है और नाटक की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। कम से कम शिल्प में। बाकी कंटेंट तो जाहिर है की अंततः कंज्यूमर ही तय करेगा!

पुंज प्रकाश - सर, किसी भी शहर, गाँव, क़स्बा में एक लम्बी प्रक्रिया से ही बदलाव संभव है। शौकिया रंगमंच यदि लाख - लाख रुपए चंदा कर सकता है तो किसी भी नाटक का टिकट भी आसानी से बेच सकता है। अपने यहाँ (खासकर हिंदी बेल्ट में) समस्या यह है सर कि हमने रंगमंच को फ्री में, चन्दा से, या अनुदान आदि से स्वचालित होने वाली चीज़ में परिवर्तित कर दिया है। दर्शक और उसके पॉकेट पर ज़्यादा काम हुआ ही नहीं है। शायद यही वजह है कि हम हमेशा ही अभावग्रस्त हैं। और यह काम किसी एक के चाहने से होगा भी नहीं बल्कि सबको साथ आना होगा। हाँ, यह रिश्ता माल और कन्ज्यूमर वाला नहीं होना चाहिए बल्कि कला और उसके प्रोत्साहन और प्रश्रय वाला बनाना होगा। सार्थक कला को प्रोत्साहित करने वाले लोग हैं सर और नहीं हैं या कम हैं तो उहें गढ़ने का काम भी चले।

पप्पू तरुण – ऐसे क़दम हर हाल सही है, आख़िर इस आर्थिक समाजिक ब्यवस्था में बीना अर्थ के न रंग आऐगा, न कर्म हो पाऐगा

अनिमेष जोशी - इसलिए मैंने नाटक देखना काफी कम कर दिया है। दो साल में बहुत करीब से देखा है। आपकी बात का मैं समर्थन करता हूँ।

राजेश चंद्र - सहमत। इसे अमल में लाया जाना निहायत ज़रूरी है।

राज शर्मा – कारण है नाटकों की गुणवत्ता और इन्टरटेनमेंट टेक्स।

रेखा सिंह – रंगमंच को हर तरह से समृद्ध और लोकप्रिय बनाने के लिए इस टिकट व्यवस्था को लागू करना ज़रुरी है।

डॉक्टर सत्यदेव - आपकी बातों से सहमत हूं,मगर फिर भी जुगारुलालों को तो पास चाहिए ही चाहिए।

अभय अवस्थी - सबसे बड़ी जो दिककत है, कि आजकल कोई भी नाटक कर सकता है, उसकी क्वालिटी 200 rs के टिकट की है या नहीं ये कोई डिसाइड नहीं करता।
उदाहरण के लिए : पहली बार जो नाटक देखने जा रहा है 200 रूपए का टिकट। पेट्रोल वगैरह और अपना कीमती वक्त देकर - - हम उसे दे क्या रहे हैं? अब पहली बार में मैंने 200 का टिकट खरीदकर देखा, नए लड़के थे जिन्हें हम एमोच्योर कहते हैं, वो सिखा रहे थे लेकिन मैंने तो 200 दिया ना। नाटक का स्तर ऐसा कि 10 मिनट बाद मुझे लगा कि इससे अच्छा तो किताब लेके पढ़ लेता। 50 रूपया बचता तो कुछ खाया भी जा सकता था।
अब चुकी मेरा पहला ही अनुभव ऐसा था तो यही अनुभव मैंने दस को बताया और दो टीन गलियां भी साथ में जोड़ दीं। विजय तेंदुलकर जी कहते हैं इस दुनिया का जितना नुकसान कुटिल लोगो ने नही किया उससे कहीं ज्यादा मूर्खों ने किया है। मार्केटिंग का नियम है is the product worth xyz selling price ?

पुंज प्रकाश - नाट्यकला और उस क्षेत्र में काम करनेवालों के बारे में थोड़ी जानकारी रखने से शायद ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।

अनिल शर्मा - आपकी बात सही है ,किसी भी कला को मारना हो ,,खत्म करना हो तो उसे राजकीय सहयोग से जोड दो ,धीरे धीरे खुद खत्म हो जायेगी ,और यही हो रहा है

अनघा देशपांडे – यह सही है। पर बहुत मुश्किल है। गोवा में तो इतनी आदत हो चुकी है लोगों को - - डर लगता है टिकट रखने को भी!

पुंज प्रकाश - कोशिश तो किया ही जाना चाहिए। ठीक है कम लोग आएंगें। कोई बात नहीं। बल्कि एक ही आदमी आए लेकिन टिकट लेकर। मैं ऐसे कई ग्रुप को जानता हूँ जिसके बारे में लोग यह जान गए हैं की इनका नाटक देखना है तो टिकट लेना ही पड़ेगा।

राज शर्मा – एक बात और – इंटरटेमेंट टेक्स के बजाय इनकम टेक्स लगना चाहिए, वो भी 5%। सारे खर्चे निकालने के बाद। इससे लागत के बाद producer की हिम्मत दुबारा शो करने की पड़ेगी। एक खास बात बताऊँ – कोई भी कलाकार किसी एक नाटक में अभिनय क्या कर लेता है अगली बार खुद निर्देशक बन जाता है।

अविनाश दास - मुंबई में पिया बहुरूपिया के सारे शो एक हफ्ते पहले से बुक माइ शो पर सोल्‍ड आउट (हाउसफुल) थे। जबकि चार दिन तक शो थे लगातार। शनिवार और रविवार को तो दो दो शो थे। मैं स्‍वानंद किरकिरे से कहा, तो उन्‍होंने गीतांजलि कुलकर्णी के जरिये दो टिकट किसी तरह काउंटर पर रखवा दिया। आमतौर पर लोग इस व्‍यवस्‍था को पास समझने की भूल कर बैठते। लेकिन टिकट रखवाया, जिसका मूल्‍य चुकाने के बाद ही वह मुझे मिलता। पांच सौ रुपये के टिकट थे और मैंने हज़ार रुपये देकर दोनों टिकट ख़रीदे, तभी नाटक देख पाया।

विवेक कुमार तिवारी – मुझे लगता है कि जो नाटक सामान्य तरीके से खेले जाते हैं, वो लोकप्रिय होते हैं। जहाँ एक्सपेरीमेंट की बात आती है, दर्शक उब जाते हैं। हमने अपने नाटकों के लिए कुछ खास किस्म के दर्शक तैयार किए हैं और उन्हीं के फीडबैक में चलते हैं लेकिन आम आदमी यदि रंगमंच को एक्सेप्ट करता है तो यह समस्या कुछ खास नहीं – टिकट बिकेंगे। बस ज़मीनी हकीकत को पहचानना पड़ेगा।

पुंज प्रकाश - प्रयोग नाटक की आत्मा है, वह होते रहना चाहिए। प्रयोग से ही कोई भी कला या समाज आगे बढ़ता है। हाँ, प्रयोग सफल-असफल दोनों प्रकार के होंगें। होने भी चाहिए। प्रयोग से ही नवीनता बनी रहती है। इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है।
यह सही है कि हम जो खाते रहे हैं उसी को खाने में सहजता महसूस करते हैं लेकिन अलग अलग प्रकार के बेहतरीन टेस्ट और भी हैं दुनियां में, उसे भी आजमाने में कोई बुराई नहीं।

विवेक कुमार तिवारी – मैंने दर्शकों के नज़रिए से कहा, आप मेरी बातों को समझें। देखिए, लोक नाटकों में बिदेसिया या हबीब साहेब के नाटकों पर बात करें तो आसानी से स्वीकार किया जाता है, वो सहजता से नाटक करते हैं।

पुंज प्रकाश - विवेक भाई, दर्शकों के पसंद में बहुत विविधता है। हम दावे से यह कह ही नहीं सकते कि ऐसे नाटक ही लोगों को पसंद आते हैं। और फिर हबीब साहेब के काम और बिदेसिया में बहुत प्रयोग है, वो प्रयोग सफल हो गए इसलिए हम उसका नाम लेते हैं। और फिर यह ज़रूरी नहीं कि हर रंगकर्मी लोकशैली का ही नाटक करे। नाटक की कई अन्य शैलियाँ भी हैं, उसपर भी काम होगा ही। नई शैली विकसिक करने का प्रयास और प्रयोग भी होगा ही।
दरअसल, हम किसी भी नए प्रयोग से घबराने वाले लोग हैं और उसे तबतक स्वीकार नहीं करते जबतक वो सफल नहीं हो जाता।

सुब्रो भट्टाचार्या - मुझे लगता है एक सेंसर कमीटी जैसी चीज़ भी होनी चाहिए जो ये तय करें की ये नाटक प्रस्तुति के लायक है या नहीं।अन्यथा कई बार पैसा देकर देखने वाला ही हमारा दुष्प्रचारक बन बैठेगा। स्तर के आधार पर टिकट लगाने में कोई बुराई नही है।

प्रभात सौरव – नाटक का ग्रेड तय करने के लिए कमिटी हो, पर उस कमिटी में कौन हों? पटना रंगमंच में सहमति की तरह हर तरह की स्थिति है।

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

नाट्यालोचना और नाट्यालोचक : एक बहस

समय-समय पर फेसबुक पर कुछ सार्थक बहसें भी होती रहतीं हैं। ऐसी ही एक बहस रंगकर्मीं, नाट्य-समीक्षक और समकालीन रंगमंच नामक पत्रिका के सम्पादक राजेश चन्द्र के फेसबुक वाल पर चल रही है। इस बहस में अबतक राजेश चंद्र के अलावे मृत्युंजय शर्मा (पटना), पुंज प्रकाश (पटना), परवेज अख्तर (पटना), राजेश राजा (पटना), नीलेश दीपक (दिल्ली), प्रवीण कुमार गुंजन (बेगुसराय), दीपक कुमार सिन्हा (बेगुसराय), धर्मेश मेहता (पटना), राज देव (पटना), विजय कुमार (बेगुसराय), व्यास चंद्र शेखर, अमितेश कुमार (दिल्ली), अभिषेक पंडित (आजमगढ़), विवेक कुमार(पटना), मुन्ना कुमार पांडे (दिल्ली), अनिल पतंग (बेगुसराय) अदि रंगकर्मियों, नाट्य चिंतकों व समीक्षकों ने भागेदारी की है। इस बहस से प्रभावित होकर कुछ स्टेटस अलग से भी डाले गए। इस पुरी बहस को एक साथ लाने का उद्देश्य केवल इतना है कि क्यों न इस परिचर्चा को शालीनतापूर्वक और तर्कों के सहारे आगे बढ़ाया जाय ? - मॉडरेटर मंडली 

बहस की शुरुआत करते हुए राजेश चंद्र लिखते हैं - "समीक्षक कोई विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति नहीं है। रंगमंच में वह भी उतनी ही अहमियत रखता है, जितना कि एक नाटककार, निर्देशक, अभिनेता, दर्शक या कि कोई और भागीदार। समीक्षक ही क्या, इनमें से कोई भी अपने दायित्व और दायरे का अतिक्रमण करता है, तो वह रंगमंच को क्षति पहुंचाने लगता है। इस प्रवृत्ति के दुष्परिणामों को हम आज साफ तौर पर देख रहे हैं।
रंगमंच के साथ एक विडम्बना यह है कि यहां अधिकांश कथित समीक्षक रंगमंच की पृष्ठभूमि से नहीं आये हैं। उनमें से कुछ हिन्दी के प्राध्यापक रहे हैं, तो कुछ पत्रकार, कवि, और शोधार्थी। उनका रंगमंच से उतना ही सरोकार है, जितने से उनका हित सधता हो। ये सभी अमूमन अपने--अपने क्षेत्रों में नाकामी झेल कर यहां आ गये हैं। रंगमंच उनके लिये तफरीह की, मौज-मज़े की और हर संभव कमाई की जगह है। ऐसे समीक्षक रंगमंच का हित करेंगे, यह सोच दीनता ही प्रदर्शित करती है। उनका एजेण्डा रंगमंच में बंटवारा पैदा करना, ग़लत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देना, कोई जुमला या फतवा उछाल कर केन्द्र में आसीन रहने के अलावा कुछ और क्यों होगा। वे वही तो करते आये हैं। रंगमंच में यदि आज ऐसे समीक्षक (?) मठाधीश बन गये हैं तो इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? 
मैं बीस वर्षों तक सक्रिय रंगकर्म करने के बाद समीक्षा के क्षेत्र में आया। इस निर्णय के पीछे कई व्यावहारिक अनुभव थे। मैंने हमेशा यह महसूस किया था कि रंग-समीक्षा के क्षेत्र में जब तक रंगकर्मी स्वयं नहीं उतरेंगे, तब तक यहां ऐसे लोगों का प्रभुत्व कायम रहेगा, जो रंगकर्म का हित साधने के बजाय अपने गर्हित और अदृश्य उद्देश्यों की पूर्ति में लगे रहते हैं। हमने विगत कुछ दशकों में एक ऐसी रंग-समीक्षा का उदय देखा है, जो नितांत रूप से मूल्यविहीन, मूढ़तापूर्ण, शैतानियों से भरी, बिकाऊ और ग़लीज़ है। आज रंग-समीक्षा के नाम पर जो कुछ हमारे सामने आता है, उसका बहुलांश या तो भक्ति भाव से लिखा गया है, या उपहारों और व्यक्तिगत फ़ायदों की मात्रा के आधार पर। रंगमंच में हमारे विभिन्न सरकारी संस्थान, देश भर में सक्रिय कई निर्देशक और रंग-महोत्सवों के आयोजनकर्ता ऐसे ढोंगी समीक्षकों को पालते-पोसते रहते हैं। वे उन्हें नाटकों की चयन समितियों में शामिल करते हैं, अनुदानों एवं पुरस्कारों की निर्णायक समितियों के लिये नामित करते हैं ताकि उनके माध्यम से मनमर्जियों और बेईमानियों का कारोबार फलता-फूलता रहे। अनुदान लेकर नाटक और महोत्सव करने वाले निर्देशक इन समीक्षकों को हवाई जहाज़ का टिकट, फाइव स्टार सुविधाएं और अय्याशी के सभी सामान मुहैय्या करवाते हैं, यह बात अब छिपी हुई नहीं है। कौन-से ऐसे समीक्षक हैं, जो महीने भर ऐसी रंगारंग रंग-यात्राओं पर निकलते रहते हैं, सोशल मीडिया के समय में यह जानना भी कठिन नहीं है।
प्रश्न उठता है कि रंग-समीक्षा के इस अधःपतन का ज़िम्मेदार कौन है? समीक्षा के क्षेत्र में आ रही इस गिरावट पर कोई बात कब होगी और यह बात 'कौन' करेंगे? मुझे उस दिन की और उन लोगों की प्रतीक्षा है।"

अमितेश कुमार - "आपकी बहुत सी चिंता वाज़िब है लेकिन हिंदी के प्राध्यापकों ने समीक्षा का नुकसान किया है इससे असहमति है। और वे ना किसी व्रुहतर हित साधन के लिए आये। उन्होंने समीक्षा को आलोचना को समृद्ध ही किया। जयदेव तनेजा, सत्येंद्र तनेजा, महेश आनंद, जावेद अख्तर खान, इत्यादि जैसो से रंगमंच को या समीक्षा को क्या नुकसान हुआ है? हिंदी में अगर रंगमंच पर कुछ सार्थक लेखन उपलब्धि में इनका अमूल्य योगदान है जिसकी रंग जगत ने उपेक्षा ही की है।"

मृत्युंजय शर्मा - जिनके काम को बिना देखे, पूर्वाग्रह से ग्रसित रहकर लगातार आप खारीज करते रहेंगे वो अंततः आपकी उपेक्षा हीं करेगा। आज तो नाट्य-प्रस्तुतियों की भी ब्रांडिंग हो गई है। फलाना करेगा तो जाना है, फलना क्या करेगा? ये घर बैठे सोंचने की चीज नहीं होती। खारीज करने का भी एक तरीका होता है, आप सीरे से खारीज करेंगे तो ये तो होना हीं है। रही बात नुकसान की तो इससे नुकसान ये हुआ है कि आज स्तरीय प्रस्तुति में गिरावट आई है। इसके लिए ऐसी सोंच भी जिम्मेदार है। 
नाट्यदल को अपने नाटकों की प्रस्तुति के दिन ही एक समीक्षक भी नियुक्त करना चाहिये, जो की ईमानदारी से दूसरे कलाकरों की तरह अपना कार्य करे। आज तो न नाटक का पाठ किया जाता है और न हीं नाटक के मंचन के पश्चात कोई परिचर्चा। 
नाटक एक प्रोजेक्ट, छपास सुख और पता नहीं क्या होकर रह गया है। हमें आत्मविवेचन करने की जरुरत है। 

पुंज प्रकाश - रंगमंच वर्तमान में घटित होनेवाला कलामाध्यम है, इसलिए नाट्यालोचना की प्रवृति भी ज़रा अलग होती है। साहित्य, फिल्म, चित्रकला, मूर्तिकला ऐसी विधाएं हैं जो अपने पाठकों, दर्शकों, रसिकों के लिए सदा उपलब्ध रहतीं हैं। कोई भी इन्हें पढ़, देखकर इसकी समीक्षा से इतर अपने विचार बना सकता है, किन्तु किसी भी नाट्य प्रस्तुति के प्रदर्शन को चिरकाल तक जारी रखना संभव नहीं और यदि हुआ भी तो उसका स्वरुप जैसे का तैसा बनाये रखना असंभव और अप्राकृतिक है। एक ही दल द्वारा किया गया एक से दूसरा प्रदर्शन कम से कम संवेदना के स्तर पर एक दूसरे से अलग होता ही है। नाट्यरचना अपने आप में एक पूर्ण साहित्यिक विधा हो सकती है पर नाटकों की रचना दर्शकों के समक्ष प्रदर्शन के लिए ही होता है। नाट्यसाहित्य, प्रदर्शन का रुप ग्रहण करके ही अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है। 
अगर हम आज से पहले मंचित हुए नाटकों के बारे में जानकारी पाना चाहतें हैं तो सुनी सुनाई बातों के साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उस नाटक की समीक्षा और समाचार माध्यम हो सकतें हैं। नाटकों को रिकार्ड करने की तकनीक अभी भी सामान्य उपयोग में नहीं है। वैसे भी किसी नाट्य प्रस्तुति की रिकार्डिंग देखकर उसके बारे में कोई राय बनना उचित नहीं है। देश के अधिकतर नाट्यदल मुफलिसी में ही चल रहे हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि नाटकों की खबरनवीसी, आलोचना, समीक्षा आदि एक अति गंभीर तथा एतिहासिक महत्व का काम हो जाता है। 
किसी ज़माने में हिंदी के अखबारों में कला और संस्कृति का पन्ना प्रकाशित होता था। जिनमें रंगमंच पर समीक्षात्मक व सूचनात्मक आलेखों का प्रकाशन होता था। फिर उदारीकरण, निजीकरण और बाज़ारवाद का ऐसा दौर चला कि अखबारों ने अपना स्वरूप बदल लिया और कला और संस्कृति के लिए स्थान लगातार सिकुड़ता चला गया। तर्क था कि अखबार के सामान्य पाठकों को नाट्यालोचना से क्या सरोकार ! जहाँ तक सवाल रंगमंच पर आधारित पत्रिकाओं का है तो कुल मिलाकर केवल एक-दो ही पत्रिका है जो नियमित निकाल रही है पर वहाँ भी वातावरण ‘लौबिंग’ से परे नहीं है।            
नाट्यालोचना रंगमंच की दुनियां में भी ठीक उसी तरह उपेक्षित है जैसे समाज में रंगमंच। रंगकर्मियों में आत्ममुग्धता का पारा इतना गर्म है कि नाट्यालोचना के प्रति सम्मान का भाव नहीं है। समीक्षक ने अगर तारीफ़ नहीं लिखी तो रंगकर्मी ये कहते हैं कि नाट्यालोचक को रंगमंच की समझ ही नहीं है। फिर समीक्षक को देख लेने की धमकी से लेकर व्यक्तिगत दुश्मनी ठान लेने तथा मौका मिलाने पर शाब्दिक-शारीरिक हिंसा का प्रयोग करने से भी कोई परहेज़ नहीं करते। 
वहीं, वो लोग भी आलोचक/समीक्षक कहलाने से बाज़ नहीं आते जिन्हें नाटक की सैधांतिक, व्यावहारिक समझ उतनी नहीं होती कि वे नाटकों की समीक्षा करें। इनके लिए किसी नाटक पर लिखना बस चंद पैसा, छपास सुख या नाम कमाने का एक ज़रिया है। केवल अपने फायदे और मस्ती के लिए किसी प्रस्तुति को महान बनाने तक से बाज़ नहीं आते ! कुछ ऐसे भी हैं जो हर चीज़ को दलित, आदिवासी, साम्यवाद, समाजवाद, कलावाद के बने बनाये संकीर्ण और पारंपरिक खांचे से रंगमंच की परख करके अपनी दुकान चला रहें हैं। कुछ समीक्षकों के पास एक बना-बनाया चलताऊ खाका होता है, जिसमें पहले नाटक की कहानी होगी फिर कुछ प्रभावित और अप्रभावित करनेवाले कलाकारों के नाम होगें और अंत में कुल मिलाकर प्रस्तुति प्रभावित/अप्रभावित करती है का भरत-वाक्य होगा, बस समीक्षा खत्म। ब्लॉग और वेब के युग में इन दिनों हिंदी रंगमंच के रंगपटल पर कुछ ऐसे नाट्यचिन्तक भी ‘अंकुरित’ हुए हैं जो हैं मूलतः रंगकर्मी या नाटककार हैं पर रंगइतिहास और रंगमंच पर अपनी बहुमूल्य राय लिखने का शौक रखतें हैं और साल व दशक की महान प्रस्तुतियों में अपने समूह या अपने द्वारा लिखित नाटकों के नाम गिनवाना कभी नहीं भूलते। कुछ नाट्य-समीक्षकों ने तो अपना एक मठ बना रखा है जहाँ से ये किसी भी रंगकर्मी व रंगमंच से जुड़े विषयों पर अपनी प्रतिक्रियायों की आकाशवाणी करते रहतें हैं। जो रंगकर्मीं इन्हें सम्मानित करे उसे ही ये सम्मान के काविल मानतें हैं।
हिंदुस्तान के कुछ बड़े नाट्य संस्थान और निर्देशक नाट्यालोचक पालने का काम भी करतें है। कोई पत्रिका का संपादन करता है तो कोई अन्य बहुतेरे काम। बदले में ये पत्र-पत्रिकाओं में उस संस्थान और निर्देशक के नाट्य-प्रस्तुतियों में महानता ढूंढने का काम करतें हैं। इस प्रकार नाट्यालोचक की दाल-रोटी तबतक चलती रहती है जबतक कोई दूसरा नाट्यालोचक आके स्थान न हड़प ले। फिर पहला उसी संस्थान के प्रस्तुतियों में बुराई ही बुराई खोजने लगता है। इसी परम्परा के तहत एनएसडी के वर्तमान अभूतपूर्व निदेशक से नाराज़ कुछ नाट्यालोचकों ने अपने पसंद के उम्मीदवार को निदेशक बनाने के लिए “लॉबिंग” शुरू भी कर दिया है। 
रंगकला में दुनियां की सारी कलाएं समाहित हैं अतः इसे प्रस्तुत करना और इसकी समीक्षा करना दोनों ही गंभीर काम है जिसमें इंसानी मजबुरियों और आत्ममुग्धता का कोई स्थान नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि कला और संस्कृति समाज का दर्पण होता है। आज समाज की जो स्थिति है उससे कोई कला अछूता कैसे रह सकता है ? कण-कण में व्याप्त भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के इस युग में तमाम सरकारी और गैरसरकारी अनुदानों के बावजूद रंगमंच की सामाजिक सरोकरता में कमी आई है। समाज के ज्वलन्त सवालों से सीधा साक्षात्कार करने के बजाय आज रंगमंच जिस ओर मुड़ा है वहाँ चंद पलों के सुख की मृगतृष्णा के आगे अंधी खाई के अलावा कुछ नहीं है। आकाओं को खुश करने और रंगमहोत्सवों के लिए हो रहे प्रयोग के नाम पर परिवेश से कट जाना एक खतरनाक संकेत है। इस मृगतृष्णा की चपेट में आज रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक सब हैं। वहीं ऐसे जुनूनी रंगकर्मी, नाटककार, आलोचक कम ही सही पर हैं ज़रूर जो सामाजिक सरोकार से जुड़े रंगमंच में सार्थकता देखतें हैं। जिस देश की आधी से ज़्यादा आवादी रोज़ाना दुःख, दर्द झेलने को अभिशप्त हो वहाँ सामाजिक सरोकरता के प्रति हीन भावना रखकर केवल माल बनाना सार्थक कलाकर्म नहीं है। 

परवेज अख्तर - राजेश चन्द्र की कई स्थापनाओं से हमारी असहमति हो सकती है। लेकिन उनकी चिन्ता वाजिब जान पड़ती है। बावजूद इसके, यह कहना भी नाट्य-समीक्षा के संकट और उसकी चुनौतियों को कदाचित सरलीकृत करना होगा कि प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल, साहित्य की अन्य विधाओं से आए समीक्षकों ने रंगमंच और नाट्यालोचना का अहित किया या उसका इस्तेमाल अपने हित में किया; या फिर रंगमंच में 'गुटबाज़ी' को प्रश्रय दिया। अगर ऐसा है, तो यह आक्षेप रंगमंच की सभी विधा - अभिनय, निर्देशन, लेखन और अभिकल्पना के क्षेत्र में सक्रिय अनेक रंगकर्मियों पर भी लागू होगा। यह कदापि न्यायपूर्ण और तार्किक नहीं होगा। 
नेमिचंद जैन, ध्यानेश्वर नाडकर्णी, शमीक बंद्योपाध्याय, धरणी घोष, जयदेव तनेजा, सत्येन्द्र तनेजा, महेश आनन्द, कविता नागपाल, जावेद अख्तर खाँ, अविनाश चन्द्र मिश्र, हृषीकेश सुलभ, गिरीश रस्तोगी, रवि रंजन सिन्हा जैसे इस कोटि में आनेवाले अनेक समीक्षक, सिद्धांतकार और नाट्य-चिन्तकों की लम्बी शृंखला है। इन समीक्षकों को भारतीय रंगमंच और हिन्दी नाट्यालोचना के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इनमें कई वरिष्ठ समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी नाट्यालोचना की भाषा और उसके नए मुहावरे गढ़े हैं। (वैसे दोयम दर्जे के व्यक्ति किस क्षेत्र में नहीं हैं)। 
हिन्दी रंगमंच में समालोचना की समस्या और चुनौतियों पर विमर्श और चर्चा की आवश्यकता से कौन इंकार कर सकता है ? खुले दिल से इस पर बात होनी ही चाहिए।

मुन्ना कुमार पांडे - प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल....नाट्यलोचन और रंग समीक्षा का अहित किया । यह एकांगी बयान है। दिल्ली में सत्येंद्र तनेजा, जयदेव तनेजा और महेश आनंद यह तीन नाम अपने आस पास देखता हूँ तो यह लाइन नितांत व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से ग्रस्त लगने लगती है। ये सभी न केवल सफल शिक्षक रहे हैं बल्कि रंग समीक्षा में नामवर भी। गिरीश रस्तोगी, जावेद अख्तर खां आदि के नाम आपने गिना ही दिए हैं। दरअसल यह समीक्षा में छेका छेकी वाला मसला है। रंगकर्मी रंगकर्म यदि समीक्षक के लिए करता है तब तो उसका रंगकर्म भी संदेहास्पद है। सार्थक, निष्पक्ष और समर्थ समीक्षा (किसी भी विधा में) हलवाहे के हाथ की छड़ी है जो अदृश्य रहकर बैलों को अपनी लीक पर रखती है। (उदाहरण में बैल को अन्यथा न लिया जाये) बाद बाकि आपकी बात से सहमति।

प्रवीण कुमार गुंजन - जावेद अख्तर साहेब अभिनेता हैं कि रंग-समीक्षक?

अनिल पतंग - लेखक, अभिनेता और रंग समीक्षक तीनों।

मुन्ना कुमार पांडे - मूलतः अभिनेता, पेशे से शिक्षक, नाटककार और समीक्षक भी। लेकिन इससे क्या बात की अहमियत ख़त्म हो जाती है ।

परवेज अख्तर - आपने तो मेरी बात का एकदम उल्टा ही अर्थ लगा लिया। मैंने राजेश चन्द्र की जिस स्थापना का विरोध किया है, उसको आपने उसी अर्थ में लिया, जो राजेश कहना चाहते हैं। अपनी उपर्युक्त टिप्पणी में, मैंने तो स्पष्टतः यह कहा है कि इस तरह की बात कहना, नाट्य-समीक्षा की स्थिति का सरलीकरण है और यह उचित अथवा तर्कपूर्ण नहीं है।
टिप्पणी के उस भाग को, जिसका आपने उल्लेख किया है, पुनः आपके सुलभ सन्दर्भ हेतु यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :
" बावजूद इसके, यह कहना भी नाट्य-समीक्षा के संकट और उसकी चुनौतियों को कदाचित सरलीकृत करना होगा कि प्राध्यापक और अपने क्षेत्र में असफल, साहित्य की अन्य विधाओं से आए समीक्षकों ने रंगमंच और नाट्यालोचना का अहित किया या उसका इस्तेमाल अपने हित में किया; या फिर रंगमंच में 'गुटबाज़ी' को प्रश्रय दिया। अगर ऐसा है, तो यह आक्षेप रंगमंच की सभी विधा - अभिनय, निर्देशन, लेखन और अभिकल्पना के क्षेत्र में सक्रिय अनेक रंगकर्मियों पर भी लागू होगा। यह कदापि न्यायपूर्ण और तार्किक नहीं होगा। "
" नेमिचंद जैन, ध्यानेश्वर नाडकर्णी, शमीक बंद्योपाध्याय, धरणी घोष, जयदेव तनेजा, सत्येन्द्र तनेजा, महेश आनन्द, कविता नागपाल, जावेद अख्तर खाँ, अविनाश चन्द्र मिश्र, हृषीकेश सुलभ, गिरीश रस्तोगी, रवि रंजन सिन्हा जैसे इस कोटि में आनेवाले अनेक समीक्षक, सिद्धांतकार और नाट्य-चिन्तकों की लम्बी शृंखला है। इन समीक्षकों को भारतीय रंगमंच और हिन्दी नाट्यालोचना के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इनमें कई वरिष्ठ समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी नाट्यालोचना की भाषा और उसके नए मुहावरे गढ़े हैं . . . "
आप जानते हैं कि आदरणीय नेमिचन्द जैन, सत्येन्द्र तनेजा, जयदेव तनेजा, महेश आनन्द, गिरीश रस्तोगी सहित हिन्दी के लगभग सभी महत्वपूर्ण नाट्य-समीक्षकों / चिन्तकों के साथ हमारा जीवन्त सम्वाद रहा है और हम इन सभी के मौलिक योगदान का उच्च-मूल्यांकन करते हैं।
राजेश चन्द्र की स्थापना से मेरी असहमति है। आप मेरी पूरी टिप्पणी को एक बार पुनः देख लें, तो निश्चित ही आप मेरे मंतव्य को उसके उचित सन्दर्भ में लेंगे। 

राजेश राजा - भाई, पटना रंगमंच के दो समीक्षकों का नाम जानने का इच्छुक हुँ, जो पटना रंगमंच मे हो रही प्रस्तुतियो को लगातार देखने जाते रहें हों और जो किसी झण्डे या वाद से ताल्लूक ना रखते हों, मै एसे दो नामो का चरण स्पर्श कर उन्हे व्यक्तिगत तौर पर अपनी नाट्य प्रस्तुति देखने का आमंत्रण दे कर आउँगा ,कृप्या मेरी मदद करें । 

पुंज प्रकाश - पटना में नाट्य समीक्षकों की कोई कमी नहीं हैं मित्र राजेश राजा। वहां तो ऐसे ऐसे धुरंधर समीक्षक है जो प्रस्तुति का रिहर्सल शुरू होंते ही समीक्षा कर देते हैं - अड़े उ, कौची करेगा, हम जनते ही सब"। और live समीक्षा भी होती है। प्रस्तुति अंदर चल रही होती है और बाहर गेट पर समीक्षा भी साथ साथ। नाम तुमको भी पता है सबका। बस कसैली और पान का पत्ता लेकर चरण छूने की तैयारी शुरू करो। 

नीलेश दीपक - मु़झे लगता है राजेश जी चिन्ता अपने पुराने पीढ़ीयों के समीक्षकों से नहीं है। उपर वर्णित नाम तो अकाट्य है। लेकिन इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज जो अखबारी समीक्षकों की दुर्दशा है, वह सच में चिन्तनीय है। इससे रंगमंच को ही नुकसान हो रहा है। रंग संस्थान और रंगकर्मी जिस प्रकार सिर्फ अखबारी समीक्षकों की दरबारी पर जिस तरह उतारु हैं वह अशोभनीय ही जान पड़ता है। सिर्फ इसीलिए कि उनके नाटक की समीक्षा किसी अखबार या पत्रिका छप जाये और ग्रान्ट की फाइल में एक कागज़ पुख्ता हो जाए। 

प्रवीण कुमार गुंजन - भाई निगेटिव सोच को छोड़ो । नाटक करो । समीक्षकों के लिए नाटक थोड़े करते है । नाटक देखो नाटक सोचो । 

दीपक कुमार सिन्हा – राजेश भाई, मेरे लिखे नाटक को कई बड़े – बड़े रंगसमिक्षकों ने पढ़ा, फोन या मैसेज कर बधाई भी दी, लेकिन आजतक किसी भी पत्रिका में समीक्षा तो दूर रिपोर्टिंग तक नहीं आई; जबकि एक नाटक का विमोचन दोनों बार भारत के बड़े साहित्यकारों रवि भूषण व केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे और नाट्य निर्देशक अंकुर जी ने किय; क्योंकि मैं उन्हें खुश नहीं कर पाया।

राजेश चंद्र - प्रश्न करने वालों को ही ख़ारिज़ कर देने से प्रश्न ख़ारिज़ नहीं हो जाते। वे आपको कठघरे में खड़े रखते हैं, जब तक ईमानदारी के साथ आत्मावलोकन न किया जाय। 

धर्मेश मेहता - मैं भी बिहार रंगमंच के ऐसे कोई समीक्षक को नहीं जानता हूँ जो हर नाट्य गतिविधियों में शामिल हो रहे हों ! 

राज देव - बिहार रंगमंच में नाट्य-समीक्षक, नाट्य समालोचक, फलाना-ढिकाना विशेषण अपने-आप लगाये जा रहे हैं कागज पर या हवा में या किसी वातानूकुलित कमरों में ... बस पटना-दिल्ली-पटना कर-कर-के, जबकि बिहार में हीं 38 जिला है। सब लॉबी का खेल है। ज्यादातर का बिहार के रंगमंच से कोई व्यावहारिक सरोकार नहीं है, यही कड़वा सच है। उनका एप्रोच कलाकारों को लेकर न तो लोकतांत्रिक है और न हीं विकेन्द्रित। रंगमंच में अराजकता के सूत्रधार यही लोग हैं। किसी के व्यक्तिगत, सीमित और संकुचित सरोकार के दायरे में बिहार रंगमंच थोड़े ना आता है। हबीब तनवीर, सफदर हाशमी और उत्पल दत्त का नाम लेना बहुत आसान है, बनना बहुत मुश्किल, असंभव ...! 

विजय कुमार - रंगमंच में समीक्षा करने करवाने की वर्तमान स्थिति है उसे देखते हुए राजेश जी से सहमति है। नाट्य महोत्सव के कई ऐसे आयोजक हैं जो समीक्षक के लिए भी बजट बनाते हैं। मैं दिल्ली के एक ऐसे समीक्षक को व्यक्तिगत तौर पर देखा जो नाटक देखे बिना भी निर्देशक के बारे में कसीदा गढ़ दिया। वह अक्सर बिहार में होने वाले नाट्य महोत्सव में अतिथि के रूप में अवतरित होते रहते हैं। विशेष सुविधा को वह अपना अधिकार समझते हैं। 

व्यास चंद्र शेखर - अक्सर समीक्षा नाटक के प्रदर्शन के पूर्व ही तैयार हो चुकी होती है। फोटोकॉपी सहित। डिजीटल कैमरों की मदद से फोटो भी तुरंत तैयार हो जाते हैं ओर उनका वितरण भी तत्कालिक है। 
समीक्षा के लिये नाटक में जोड़े जा रहे जबरन प्रयोग और तामझाम के प्रभावों से मुक्ति पाने , प्रस्तुति में शुद्ध नाटक की पहचान करने, उसे नाट्य  अनुशासन पर परखने, नये प्रयोगों में संभावनाओं की पहचान करने और मूल स्क्रिप्ट के साथ हुए न्याय, निर्देशक द्वारा ली गयी छूट, सेट डिज़ाइन, रंग भूषा, पात्रों का चुनाव, प्रकाश व्यवस्था आदि पर विचार करने और समीक्षा को नाट्यानपढ़ लोगों द्वारा काट छांट से बचाने शब्द सीमा में बांधते हुए लिखने में समय लगता है।
रात में 10 बजे ख़त्म हो रहे नाटकों की समीक्षा 11:30 रात तक कम्पोज होकर अर्धरात्रि के बाद छपने लगती है। सभी विचारकों ने जो यहाँ व्यक्त किया है उससे होकर कुछ सार्थक बदलाव आना चाहिए।

विजय कुमार - निश्चित रूप से व्यास सर समीक्षा के लिए समय भी मिलनी चाहिए। रिपोर्टिंग अलग चीज़ है, समीक्षा अलग। 

व्यास चंद्र शेखर - आप ने बहुत सही कहा। दर्द तो यही है कि अधिकांश समीक्षाएं रिपोर्टिंग के स्तर से आगे नहीं जातीं। कुछ समीक्षा का भ्रम देने रिपोर्टिंग और समीक्षा के बीच "आधा तीतर, आधा बटेर" होती हैं। हां! अच्छी समीक्षाएं तो नाटक न देख पाये दर्शकों को नाट्यानुभव का पर्याप्त अनुमान देतीं हैं। ऐसे समीक्षक प्रणम्य हैं। इस पोस्ट पर आई त्वरित प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत हैं कि नाटक से विचार के स्तर पर जुड़े लोग व्यथित हैं। 

पुंज प्रकाश - बात पत्र-पत्रिकाओं के स्तरीयता पर भी होनी चाहिए। हिंदी में अनगिनत पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं लेकिन कुछ अपवादों (कथादेश, जनसत्ता आदि) को छोड़ दिया जाय तो बाकियों में समीक्षा और समीक्षकों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। मुझे याद है पहले शुक्रवार को पटना के विभिन्न अखबारों में कला संस्कृति नामक पन्ना निकलता था जिसमें नाटकों की समीक्षा प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। 

विजय कुमार - पुंज जी हमलोगों ने एक बार कोशिश की कि फिर से वह पेज आना शुरू हो। बेगूसराय के साथियों ने मांग भी की थी। 

पुंज प्रकाश - पटना में भी हमलोगों ने कोशिश की थी। संपादक से भी मिले। संपादक महोदय ने जो जवाब दिया वह कमाल था कि अब यह सब पढता कौन है : 

विजय कुमार - एक बार एकजुट होकर सार्थक पहल करना चाहिए। 

अमितेश कुमार - सही बात यही है, कि कोई नहीं पढता। रंगकर्मी ही नहीं पढता औरो की बात जाने दीजिये ... वैसे पढ़ते तो लोग सम्पादकीय भी नहीं है ... तो क्या नहीं छापते 

पुंज प्रकाश - अमितेश भाई, बाकी जगह का पता नहीं लेकिन बिहार में लोग समीक्षा भी पढता है और संपादकीय भी। बाकी गाय-भैंस मरने और फ़िल्मी गप्प की ख़बरें के मुकाबले कम पढ़ते होगें, यह बात मानी जा सकती है। जो लोग पढ़ता है वह भी छपे और जो पढ़ना चाहिए, वह भी। 

अमितेश कुमार - मैं अपनी तरफ से बता सकता हूँ, आज तक मैंने बिना नाटक देखे समीक्षा की ही नहीं ... वैसे मुझे जो समीक्षक माने उनका एहसान है ... और कम ही समय में एहसास हो गया की समीक्षा करके अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं है। इसलिए अब निजी मशवरे देने में अधिक यकीन रखता हूँ। और ऐसे लोगो के बारे में लिखता हूँ जो पूछने ना आये कि भाई ये काहे लिखा!! 

पुंज प्रकाश - लाभ-हानि देखिएगा तब हो चुकी समीक्षा। 

अमितेश कुमार - भाई साहब अगर दिमाग बचाने की कवायद को आप नफा नुकसान का गणित मानेंगे तो देखना ही पड़ेगा। दिमाग बचेगा और शरीर भी तो बहुत समीछा होगा। 

पुंज प्रकाश - अरे तो कोई यदि पूछता है कि आपने यह क्यों लिखा तो जवाब दीजिए। उसे आपके लिखे से सहमत-असहमत होने का हक तो है ही। इतना लोड तो लेना ही होगा आज के समय में। 

अमितेश कुमार - ना, उससे उलझने का समय नहीं क्योंकि उसका कोई लाभ नहीं। निजी मश्विरा उसका रास्ता है। अब हम तभी समीक्षा लिखते हैं जब बतौर दर्शक कुछ मिले। 

पुंज प्रकाश - सही जा रहे हैं  

अमितेश कुमार - और भारंगम के दरम्यान समीक्षा इसलिए करते हैं कि लगता है ड्यूटी है। कम से कम पचास आदमी मेरे भरोसे है। ऐसा एहसास फिर साल भर नहीं होता 

पुंज प्रकाश - मेरी सलाह है कि अपने इस (निजी मश्विरा) फैसले पर पुनर्विचार कीजिए। मैं आपके इस स्टेटमेंट से भी सहमत नहीं हूँ कि "जो सबसे खराब रंगकर्म करते हैं वो सबसे अधिक समीक्षा खोजते हैं।" बाकी आपकी कलम, आपका फैसला। 

अमितेश कुमार - कोई हम परन नही किये हैं।।।जब भी कोई नाटक बतौर दर्शक मुझे उत्साहित करेगा मैं करूँगा समीक्षा और जाहिर है पूरी ईमानदारी के साथ। और ये जो स्टेटमेंट है ये अनुभव है ... मेरे कहने भर का यथार्थ नहीं है 

पुंज प्रकाश - अब विकृतियों को छोड़िए जी, वह तो हर जगह, हर विधा में है। 

अमितेश कुमार - सही बात है ... लेकिन अपने भीतर के दर्शक का बचा रहना अधिक जरुरी है ...बतौर समीक्षक नाटक देखना एक फाल्स इगो में भी रखता है ... सहृदय बनने की तरफ जाना अधिक जरुरी है 

पुंज प्रकाश - अब हम का बोलें, जो अच्छा लगे कीजिए। बस यही बाकी रह गया है, बोलने को। 

अमितेश कुमार - आपसे क्या छुपा है!! 

प्रवीण कुमार गुंजन - रंगमंच तो बेहतर हो , रंग समीक्षक से रंग आंदोलन की चिंता हो । 

अभिषेक पंडित – नाटक की ही तरह समीक्षा भी एक विधा है, कौन कर रहा है यह विषय नहीं है बल्कि कैसा कर रहा है, यह महत्वपूर्ण है। 

पुंज प्रकाश - सही बात 

दीपक सिन्हा - कुछ रंगसमिक्षक ऐसे हैं जिनकी रोजी- रोटी ,दाल भात और कलम बेहिसाब। एनएसडी से ही चलती है ,कुछ तो लाइन में लगे हुए हैं कि कब एन अस डी उसकी सूध ले/,अच्छा बडका लोग केतनो घटिया काम करेगा ,लाखों रुपया भारत सरकार का उडा कर नाटक करेगा,महोत्सव मे छक कर दारु पिएगा लेकिन ये पोषक समीक्छक एक बार नहीं लिखेगा।

विवेक कुमार - सही कहा आपने दीपक जी। सही मायने में तो 'रंग- समीक्षक' है कौन? और हैं भी तो उन्होंने ऐसी कौन सी योग्यता या अनुभव का धारण किया है कि उनकी समीक्षा को गंभीरता से लिया जाए?रंगमंच के क्षेत्र में उनका स्वयं का अनुभव क्या रहा है?सिवाय 'लॉबीबाजी' और कागज काला करने के,उनके पास ऐसा कौन सा प्रमाणपत्र है कि हम उन्हें 'रंग समीक्षक ' के रूप में स्वीकार कर लें? हम तो नाहक ही उन्हें तवज्जो दे देते हैं।आप जिनकी चर्चा कर रहे हैं, वे दरअसल किसी खास लॉबी के ही लोग हैं, वे पेशेवर समीक्षक हैं ही नहीं , समीक्षा लिखते हैं चूँकि उन्हें किसी को उपकृत करना होता है या किसी की दोस्ती निभानी होती है, या फिर टाइमपास के लिए अपने रंगमंचीय ज्ञान का प्रदर्शन करना होता है। इन्हें बस 'इग्नोर' ही करें तो बेहतर होगा। आधिकारिक रूप से रंग समीक्षक वही माना जाना चाहिए जिनकी सक्रियता रंगमंच की किसी भी एक विधा जैसे लेखन,निर्देशन,अभिनय,संगीत,अथवा अन्य तकनीकी विभाग में पूर्णकालिक(फुलटाइम) रूप में हो।पार्टटाइम या तफरीह के तौर पर रंग समीक्षा करने वाले को तवज्जो न दिया जाए।ऐसे समीक्षकों ने ही  रंगमंच को दर्शकों से दूर किया है।सिनेमा ने तो बहुत पहले ही 'पार्टटाइम क्रिटिक्स' को अस्वीकार कर दिया है।