रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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सोमवार, 28 जनवरी 2013

भिखारी ठाकुर के गाँव-परिवार का वर्तमान हाल : पुष्पराज

कुतुबपुर से लौटकर पुष्पराज 

आदरणीय भिखारी ठाकुर जी, पिछली बार 8 साल पहले कुतुबपुर में जो कुछ दिखा था, आज दृश्य काफी कुछ बदला-बदला दिख रहा है। नेता, ठेकेदार और कॉरपोरेट सेक्टर के पांव आपके गांव में जमने लगे हैं तो मानिए कि विकास हो रहा है। सोन, गंगा और सरयू नदी से घिरा टापू गांव कुतुबपुर अब भी मानचित्र से जुड़ेगा। कुतुबपुर तक पहुंचने के पहुंच पथ किस तरह निर्मित हों, कुतुबपुर तक पहुंचने के लिए रेलमार्ग किस तरह सुगम हो सकता है, यह सब आप तक पहुंचने वाले तय करेंगे। हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह पिछले साल किसी सभा में आपके बारे में आधे घंटे भोजपुरी में संवाद करते रहे। जाने माने रंगकर्मी पुंजप्रकाश बीते साल राष्ट्रीय नाटय़ विद्यालय के संगी-साथी रंगकर्मियों के साथ रात भर कुतुबपुर के अंधकार से युद्ध रचते रहे। कुतुबपुर का अंधकार आपको जानने वाले और आपका नाम लेकर गर्व महसूस करने वाले उस बड़े जनसमूह के हिस्से का अंधकार है, जो अंधकार को किसी भी सभ्य समाज का कलंक मानते हैं। रौशनी से सराबोर अंधकार से हमने संवाद करने की कोशिश की। आपको चाहने वालों को इतना जानकर अच्छा लगेगा कि आपके गांव में एक प्राथमिक विद्यालय है, जिसमें 500 बच्चे पढ़ते हैं। हाई स्कूल की शिक्षा के लिए गांव के बच्चे नाव से चिरांव या बबुरा बाजार के हाइस्कूल में पढ़ने जाते हैं। गांव में एक अतिरिक्त स्वास्थ्य उपकेन्द्र का भवन दिख रहा है। 2 साल पूर्व 50 लाख की लागत से निर्मित इस अस्पताल की छत चू रही है। 12 बेड के इस अस्पताल में डॉक्टर, नर्स नियुक्त हैं या नहीं, किसी ने कभी देखा नहीं। एक कंपाउडर जी हैं, जो कभी-कभी अस्पताल का ताला खोल देते हैं। यहां इलाज या दवा की सुविधा कभी उपलब्ध नहीं हुई। बीमारों के इलाज की बजाय अस्पताल को इलाज की दरकार हो तो आप क्या कहेंगे? आपके गांव के मुखिया जी कौन हैं ? 8-10 जन जो पास हैं, सब एक सुर से कह रहे हैं, शंकर के मेहरारु हैं। मुखिया पति को सब जान रहे हैं, जनाना मुखिया का नाम जानें या अनजाने रहें तो क्या फर्क पड़ता है। सोन नदी का बालू आपके इलाके के गरीब मेहनतकशों का पेट भर रहा है। बावजूद गरीबों का पलायन जारी है। मजदूर गठरी बांधकर रोज पूरब की तरफ भाग रहे हैं। स्त्रियां अभी भी सौहर के पीठ धरे रुदाली गा रही हैं -˜पिया गैलन परदेशिया गे सजनी। आपके पड़ोसी गांव के युवा कलाकार मंगलमूर्ति ने बड़े शान-शौकत से माटी की लुगदियों को मूरत रूप दिया है। मूरत तब सजीव हो जाती है, जब कलाकार मूरत के भीतर अपनी सूरत देखने लगता है। जिस माटी से आप बने थे, उसी माटी से बने मूर्तिकार ने आपकी मुखाकृति से मुस्कुराहट बिखेरकर हमें मुस्कुराने की अदा सिखलाई है। कला कभी मरती नहीं है  वह कई रूपों में अपना आकार बदलती रहती है। हम कला के मूलभूत सिद्धांत को अपनी पीढ़ी के साथ एकाकार होता देखकर आपकी अमरता से साक्षात्कार कर रहे हैं। जिस माटी घर में आपका जन्म हुआ था और जिस संकरे माटी घर में आपने जिन्दगी की अंतिम सांसे ली थी, वह माटी घर अब भी धरती पर साबूत खड़ा है। आपके पोते राजेन्द्र ठाकुर आपके परिवार की गरीबी और बदहाली का विलाप कर रहे हैं। मैंने आपका बहाना बताकर उन्हें रोने से मना किया है। आप अपनी गरीबी पर कभी नहीं रो पाये तो आपके वंशज गरीबी को अभिशाप क्यों मानें ? आपके परपोते रवि ठाकुर बीए में पढ़ रहे हैं। परपोती पूजा, इंटर में पढ़ रही है। एक घर में चार चूल्हे जल रहे हैं। आपके पोते दिनकर ठाकुर का पांव किस तरह कट गया। किस तरह उनका नाच छूट गया। दिनकर ठाकुर की असमय मौत से उनका छौरा सुशील टूअर हो गया है। सुशील ठाकुर हिन्दी से एमए कर रहे हैं पर पढ़ाई से ज्यादा नौकरी के लिए परेशान हैं। आपके घर में राजेन्द्र ठाकुर के साथ हिन्दी के महान साहित्यकार नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय की तस्वीरें देखकर मन मुदित हो गया। मैंने आपके परपोते सुशील से कहा है कि भिखारी ठाकुर का परपोता हिन्दी का शिक्षक बने तो हिन्दी जगत में आपके वंश का नाम तो चलेगा। एक बंधु ने कहा-आपको पद्मश्री क्यों नहीं मिला ? आपके घर-परिवार के लोगों को बहुत कुछ नहीं मालूम कि आपके हिस्से क्या मिला, क्या नहीं मिला। राजेन्द्र ठाकुर अपनी कविता को गाकर सुना रहे हैं- केहु कहत बा राय बहादुर, केहु कहत बा शेक्सपीयर, केहु कहत बा कवि भिखारी, घर कुतुबपुर दीपक, नैखी ऐसन पदवी जोग/मलिक जी, मलिक जी कहत बा लोग। आपको पद्मश्री नहीं मिलने के सवाल पर मनोज श्रीवास्तव ने किन्ही कवि के बोल सुनाये- पद्मश्री की लूट है, लूट सके जो लूट। अपनी तो सरकार से लिंक गयी है छूट। क्या पद्मश्री सम्मान के लिए आपका सरकार से लिंक जुड़ना जरूरी है। ब्रिटिश सरकार ने भला कहिये-राय बहादुर का सम्मान देकर आपका क्या उद्धार कर दिया कि पद्मश्री ना मिलने से आपकी चमक में क्या कमी आ गयी ? आपके इलाके के सांसद कभी बिहार के वजीरे आला होते थे। आपके नाम का ढोल बजाकर उन महोदय ने जनता को बहुत दिनों तक ढोल बजाकर इस्तेमाल किया। आपके गांव-जवार के लोगों को कुतुबपुर और गंगा के मुहाने पर लटके 12 गांवों के विस्थापन का भय बहुत अधिक आतंकित कर रहा है। एक आदमी अपनी मौत से कितना अधिक डरता है। यहां 50 हजार लोगों की जिन्दगी के सामूहिक जल समाधि का मामला कितना भयावह है। आप चाहें तो किसी सोमवार रोज कुतुबपुर को बचाने का नाटक लेकर˜जनता के दरबार में मुख्यमंत्री के समक्ष अणो मार्ग में तसरीफ रखें। संभव है एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री के लिए जनता के नाटय़ सम्राट का सामना करना अमर्यादित आन लगे। थोड़ा इंतजार कर लीजिये। कुतुबपुर का संदेशा सुनकर जनता के मुख्यमंत्री, भिखारी ठाकुर के दरबार में हाजिर होने आपके गांव प्रकट हो सकते हैं। मैं कुतुबपुर से उम्मीद लेकर लौटा हूं। जनता के मुख्यमंत्री जनता के हक में उम्मीद का आशीष मांगने जरूर आपके दर पर खड़े होंगे। देखते रहिए, कुतुबपुर को हर हाल में बचा लिया जायेगा। आपका माटी घर गरीबों के नाटय़ सम्राट के तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जायेगा। हे नाटय़ सम्राट, आप गरीब-मेहनतकशों की जिन्दगी के हृदय सम्राट हैं। वह शासक दुनिया का सबसे सफलतम सम्राट साबित होगा जो आपकी चरणों में अपना ताज अर्पित कर दे।

पुष्पराज – प्रसिद्द पुस्तक नांदीग्राम डायरी के लेखक प्रतिबद्द पत्रकार, यायावर लेखक एवं जनचेतना से जुड़े कवि. आलेख सहारा समय से साभार.


शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

भि‍खारी ठाकुर : हृषिकेश सुलभ


भि‍खारी ठाकुर बीसवीं शताब्‍दी के सांस्‍कृति‍क महानायकों में एक थे। उन्‍होंने अपनी कवि‍ताई और खेल तमाशा से बि‍हार और पूर्वी उत्‍तरप्रदेश की जनता तथा बंगाल और असम के हि‍न्‍दीभाषी प्रवासि‍यों की सांस्‍कृति‍क भूख को तृप्‍त कि‍या। वह हमारी लोक जिजीवि‍षा के नि‍श्‍छल प्रतीक हैं। कलात्‍मकता जि‍स सूक्ष्‍मता की मांग करती है उसका नि‍र्वाह करते हुए उन्‍होंने जो भी कहा दि‍खाया; वह सांच की आंच में तपा हुआ था। उन्‍होंने अपने गंवई संस्‍कार, ईश्‍वर की प्रीति‍, कुल‍, पेट का नरक‍, पुत्र की कामना‍, यश की लालसा आदि‍ कि‍सी बात पर परदा नहीं डाला। उनके रचे हुए का वाह्यजगत आकर्षक और सुगम है ताकि‍ हर कोई प्रवेश कर सके। किंतु प्रवेश के बाद नि‍कलना बहुत कठि‍न है। अंतर्जगत में धूल-धक्‍कड़ भरी आंधी है; और है – दहला देनेवाला आर्तनाद‍, टीसनेवाला करुण वि‍लाप‍, छील देनेवाला व्‍यंग्‍य तथा गहन संकटकाल में मर्म को सहलानेवाला नेह-छोह। उनकी नि‍श्‍छलता में शक्‍ति‍ और सतर्कता दोनों वि‍न्‍यस्‍त हैं। वह अपने को दीन-हीन कहते रहे पर अपने शब्‍दों और नाट्य की भंगि‍माओं से ज़ख़्मों को चीरते रहे। मानवीय प्रपंचों के बीच राह बनाते हुए आगे नि‍कल जाना और उन प्रपंचों की बखि‍या उधेड़ना उनकी अदा थी। तनी हुई रस्‍सी पर एक कुशल नट की तरह चलने की तरह था यह काम। उनके माथे पर थी लोक की भाव-संपदा की गठरी और ढोल-नगाड़ों की आवाज़ की जगह कानों में गूंजती थी धरती से उठती हा-हा ध्‍वनि‍यां। यह अद्भुत संतुलन था। इसी संतुलन से उन्‍होंने अपने लि‍ए रचनात्‍मक अनुशासन अर्जि‍त कि‍या और सामंती समाज की तमाम धारणाओं को पराजि‍त करते हुए संस्‍कृति‍ की दुनि‍या के महानायक बने।



भि‍खारी ठाकुर ने बि‍देसि‍या‍, भाई-वि‍रोध‍, बेटी-वि‍योग‍, वि‍धवा-वि‍लाप‍, कलयुग-प्रेम‍, राधेश्‍याम बहार‍, गंगा-स्‍नान‍, पुत्र-वध‍, गबरघि‍चोर‍, बि‍रहा-बहार‍, नकलभांड के नेटुआ‍, और ननद-भउजाई आदि‍ नाटकों की रचना की। भजन-कीर्तन और गीत-कवि‍ता आदि‍ की लगभग इतनी ही पुस्‍तकें प्रकाशि‍त हुईं। लोक प्रचलि‍त धुनों में रचे गये गीतों और मर्मस्‍पर्शी कथानक वाले नाटक बि‍देसि‍या ने भोजपुरीभाषी जनजीवन की चिंताओं को अभि‍व्‍यक्‍ति‍ दी। जीवि‍का की तलाश में दूरस्‍थ नगरों की ओर गये लोगों की गांव में छूट गयी स्‍त्रि‍यों की वि‍वि‍ध छवि‍यों को उन्‍होंने रंगछवि‍यों में रूपांतरि‍त कि‍या। अपनी लोकोपयोगिता के चलते बि‍देसि‍या भि‍खारी ठाकुर के समूचे सृजन का पर्याय बन गया। बेटी-वि‍योग में स्‍त्री-पीड़ा का एक और रूप सामने था। पशु की तरह कि‍सी भी खूंटे से बांध दिये जाने का दुख और वस्‍तु की तरह बेच कर धन-संग्रह के लालच की नि‍कृष्‍टता को उन्‍होंने अपने इस नाटक का कथ्‍य बनाया और ऐसी रंगभाषा रची जि‍सकी अर्थदीप्‍ति‍ से गह्वरों में छि‍पीं नृशंसताएं उजागर हो उठीं। यह अति‍शयोक्‍ति‍ नहीं है और जनश्रुति‍यों में दर्ज है कि‍ बेटी-वि‍योग के प्रदर्शन से भोजपुरीभाषी जीवन में भूचाल आ गया था। भि‍खारी ठाकुर को वि‍रोध का सामना करना पड़ा। पर यह वि‍रोध सांच की आंच के सामने टि‍क न सका। उनकी आवाज़ और अपेक्षाकृत टांसदार हो उठी। इतनी टांसदार कि‍ आज़ादी के बाद भी स्‍त्री-पीड़ा का नाद बन हिंदी कवि‍ता तक पहुंची। बेटी-वि‍योग का नाम उन दि‍नों ही गुम हो गया और जनता ने इसे नया नाम दि‍या – बेटी-बेचवा। गबरघि‍चोर नाटक में भि‍खारी ठाकुर वि‍स्‍मि‍त करते हैं। उनकी पृष्‍ठभूमि‍ ऐसी नहीं थी कि‍ उन्‍होंने खड़ि‍‍या का घेरा पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्‍त्री के अधि‍कार के बुनि‍यादी प्रश्‍न को वह जि‍स कौशल के साथ रचते हैं, वह लोकजीवन के गहरे यथार्थ में धंसे बि‍ना सम्‍भव नहीं।



भि‍खारी ठाकुर पर यह आरोप लगता रहा कि‍ वह स्‍वतंत्रता संग्राम के उथल-पुथल भरे समय में नि‍रपेक्ष होकर नाचते-गाते रहे। यह सवाल उठता रहा कि‍ क्‍या सचमुच भि‍खारी ठाकुर के नाच का आज़ादी से कोई रि‍श्‍ता था। उनके नाच का आज़ादी से बड़ा सघन रि‍श्‍ता था। अंग्रेज़ों से देश की मुक्‍ति‍ के कोलाहल के बीच उनका नाच आधी आबादी के मुक्‍ति‍-संघर्ष की ज़मीन रच रहा था। भि‍खारी ठाकुर की आवाज़ अधरति‍या की आवाज़ थी। अंधेरे में रोती-कलपती और छाती पर मुक्‍के मारकर वि‍लाप करती स्‍त्रि‍यों का आवाज़। यह आवाज़ आज भी भटक रही है। राष्‍ट्रगान से टकरा रही है। (आलोचना पत्रि‍का में पूर्व प्रकाशि‍त लेख का संपादि‍त अंश)

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

भिखारी ठाकुर: भोजपुरी लोक का सिरमौर


ब्रजकुमार पाण्डेय का आलेख
भिखारी ठाकुर को मैं तब से जानता हूं – जब मेरी उम्र सात साल की थी। संभवतः 1944 का साल रहा होगा। मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर ओझवलिया नाम का एक गांव है। उस गांव में गृहस्थ जीवन में रहकर साधुवृत्ति वाले एक आचारी थे। उनसे गांव वालों का बांस की कोठी को लेकर झगड़ा था। आचारी पर बांस नहीं काटने की बंदिश थी। इस संकट में आचारी को एक चतुराई सुझी कि क्यों न भिखारी ठाकुर का नाच गांव में कराया जाये। नाच सुनकर लोगों की भीड़ उमड़ेगी। गांव और ज्वार के लोग नाच देखने में विभोर रहेंगे। ऐसे में आचारी का मकसद आसानी से पूरा हो जायेगा।
भिखारी ठाकुर उस दौरान कोलकाता में रहते थे। आचारी कोलकाता गये और भिखारी ठाकुर के नाम का अनुबन्ध कर आये। निश्चित तिथि पर भिखारी ठाकुर की मंडली ओझवलिया पहुंच गयी। हजारों की भीड़ नाच देखने उमड़ पड़ी। दस कोस पैदल चलकर लोग नाच देखने आये थे। लोगों का ध्यान जब नाच देखने में लगा था-आचारी ने बांस काटने की अपनी कार्रवाई शुरू करा दी। लोगों को बांस काटने की भनक जैसे ही लगी-मारपीट शुरू हो गयी। नाच बन्द हो गया। दूसरे दिन उस इलाके के लोगों को जब इस बात का अहसास हुआ कि यह भिखारी के प्रति इस इलाके की जनता का बहुत बड़ा अपमान है। अतः लोगों ने मेरे गांव में भिखारी का नाच कराने का निर्णय लिया और नाच हुआ भी। मैं बच्चा था इसलिए मुझे याद नहीं है कि नाच में क्या-क्या हुआ लेकिन मेरे इलाके में यह घटना किवदंती की तरह आज भी लोगों की जेहन में है। नाच की शुरूआत में भिखारी ठाकुर ने आचारी वाली घटना पर एक कविता लिखी थी जिसे उन्होंने गाकर सुनाया था। कविता की शुरू की पंक्तियां बहुत दिनों तक लोगों को याद थी जिसकी पहली पंक्ति थी-‘सबके ठगले भिखारी, भिखारी के ठगले आचारी।’
इस तरह भिखारी ठाकुर से मेरी पहली मुलाकात मेरे अपने गांव में हुई थी। भिखारी ठाकुर को मैंने दूसरी बार पटना के गांधी मैदान में महीनों पहले सरकारी प्रदर्शनों के दौरान देखा था और प्रदर्शनी के सांस्कृतिक मंच पर उनके गीत और कविताएं सुनी थी। वह 1958 का साल था और मैं बी.ए. का विद्यार्थी था। मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात 1965 में हुई। हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार नई कविता पर बहस कर रहे थे। अचानक किसी का ध्यान भिखारी ठाकुर पर पड़ा। वे श्रोताओं के बीच अंतिम पंक्ति में बैठे थे। लोगों ने आग्रह करके उनको मंच पर बुलाया और उनसे कविताएं पढ़वायी। केदारनाथ सिंह ने हाल ही में इस प्रसंग को ‘हिन्दुस्तान’ में लिखा है और उसका शीर्षक दिया है-नयी कविता के मंच पर भिखारी ठाकुर। उस मंच पर केदारनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह, चन्द्रभूषण तिवारी, बद्रीनाथ तिवारी, मधुकर सिंह आदि मौजूद थे।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को ‘अनगढ़ हीरा’ कहा था तो प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ कहा। डा॰ केदारनाथ सिंह लिखते हैं-‘भिखारी ठाकुर मौखिक परम्परा के भीतर से उभरकर आये थे, पर इनके नाटक और गीत हमें लिखित रूप में उपलब्ध हैं। कोरा मनोरंजन उनका उद्देश्य नहीं था। उनकी हर कृति किसी न किसी सामाजिक विकृति या कुरीति पर चोट करती है और ऐसा करते हुए उसका सबसे धारदार हथियार होता है-व्यंग्य।’ डा. उदयनारायण तिवारी लिखते हैं-‘भिखारी ठाकुर वास्तव में भोजपुरी के जनकवि हैं। इनकी कविता में भोजपुरी जनता अपने सुख-दुख एवं भलाई-बुराई को प्रतयक्ष रूप से देखती है।’ इस तरह बहुत सारे हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने भिखारी ठाकुर की प्रशंसा की है।
संजीव ने ‘सूत्रधार’ नाम से एक उपन्यास उनके जीवन को आधार बनाकर लिखा है। कुछ लोगों ने पी.एचडी., डि.लिट्. और डिजरटेशन इनके नाटकों, गीतों और भजनों पर लिखे हैं। इनमें से कुछ का प्रकाशन भी हुआ है। भिखारी ठाकुर की स्मृति को संजोने के लिए उनके गांव कुतुबपुर (सारण) में भिखारी ठाकुर आश्रम भी निर्मित है जहां नियमित उन पर कार्यक्रम और गोष्ठियां आयोजित होती रहती है।
भिखारी ठाकुर ने अपना जीवन चरित लिखा है। यह जीवन चरित भोजपुरी कविता में है। इन्होंने स्वयं लिखा है कि उनका जन्म 1887 ई. पौष मास शुक्ल पक्ष पंचमी सोमवार के 12 बजे दिन में हुआ था। उनका देहावसान 1971 ई. में हुआ था। उनकी कोई विधिवत शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई थी। उन्होंने अपने साधना से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था और स्वाध्याय से कुछ धार्मिक ग्रंथों का परायण किया था-जिसमें रामचरित मानस प्रमुख था। भिखारी ठाकुर एक अत्यंत पिछड़ी नाई जाति में जन्में थे। उनके घर में एक गाय थी और तीन-चार बछिया थी जिसे वे अपने सगे-साथियों के साथ बचपन में चराया करते थे। इन्हीं साथियों के साथ मिलकर वे रामलीला और दूसरे नाटकों के अभिनय की नकल करते थे। उनका कंठ सुमधुर था। उनकी सुरीली आवाज में जादू था। एक ओर वे परिवार के जीवन-यापन के सहयोग में पशुओं की देखभाल किया करते थे तो दूसरी ओर गृहस्थों और जजमानों के दाढ़ी-बाल बनाते थे।
कुछ लेखकों ने भिखारी ठाकुर पर बचपन में सवर्णों द्वारा शोषण-उत्पीड़न का सवाल बिना किसी जांच-पड़ताल के उठाया है और उनके द्वारा नाच मंडली स्थापित करने की वजह भी इसे ही बतला दिया है। लेकिन ऐसे लेखकों का इलजाम गलत है। अगड़ी जातियों द्वारा दलितों और पिछड़ी जातियों पर शोषण-उत्पीड़न उस काल में होता था लेकिन ये जातियां उस अवधि में प्रतिकार या प्रोटेस्ट की स्थिति में नहीं थी। इसलिए भिखारी ठाकुर ने किसी प्रतिकार में अपना पेशा छोड़ा था और नाच मंडली खड़ी की थी- ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।
भिखारी ठाकुर को बचपन से ही रामलीला, रासलीला, सत्संग, प्रवचन, भजन-कीर्तन आदि से बेहद लगाव था। परिणामतः काम से फुर्सत पाकर रात में वे ऐसे अनुष्ठानों में भाग लेते थे और उन पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा था। उनके बचपन के दिनों में बंगाल और बिहार में जितने प्रकार के नाच, नाटक, गीत-संगीत प्रचलित थे-उनको वे बड़ी तन्मयता से देखते थे और उन सबों का प्रयोग उन्होंने अपने द्वारा गठित बिदेशिया नाच में किया था। उनके द्वारा तैयार बिदेशिया नाच बाद में चलकर एक शैली बन गया जो पचास-साठ वर्षों तक बिहार, उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों और कोलकाता में रहनेवाली हिन्दी भाषी जनता विशेष रूप से भोजपुरी भाषी किसान-मजदूर जनता के लिए मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधन बना रहा।
मुस्लिम और अंग्रेजी शासनकाल में औरतों पर हो रहे अत्याचारों ने उन्हें घरों की चहारदीवारी में कैद कर दिया था। उनका कोई सार्वजनिक चेहरा नहीं रह गया था। उनकी पर्दादारी और अशिक्षा एक तरह से उनके लिए काल बन गयी थी। ऐसी स्थिति में नाटकों में स्त्री पात्रों का मिलना असंभव था। इसके साथ ही अभिजात वर्ग के लोगों में यह धारणा विकसित हुई थी कि नचनिया-बजनिया का का निम्न जातियों का है। सवर्ण इसमें भागीदारी करें-ऐसी बात वे सोच भी नहीं सकते थे। भिखारी ठाकुर के नाचों में स्त्री पात्रों की भूमिका कम उम्र के लड़के किया करते थे। उनकी नाच मंडली में अधिसंख्य सदस्य दलित और पिछड़ी जातियों से ही आते थे। भिखारी ठाकुर के नाटकों में पात्रों के नाम भी वही होते थे जो दलित और पिछड़ी जातियों में प्रचलित थे। उन्होंने अपने नाटकों में दलित, शोषित, अशिक्षित और उपेक्षित तबकों के साथ घटित होनेवाली घटनाओं का विशेष उल्लेख किया है। बाल-विवाह, अनमेल विवाह, धन के लिए बेटियों को बेचने का अपराध, सम्पत्ति के लोभ में संयुक्त परिवार का विघटन, बहुविवाह, चरित्रहीनता, अपराध, नशाखोरी, चोरी, जुआ खेलना आदि कुछ ऐसी प्रचलित कुप्रवृत्तियां ऐसे वर्गों में व्याप्त थीं, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन दुखमय हो जाता था। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों के माध्यम से इन कुरीतियों पर प्रहार करने का प्रयास किया। गांव-देहात के लोगों पर इन नाटकों का बड़ा प्रभाव पड़ा और लोगों ने इन कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में पहल भी की।
विगत शताब्दी का पचास वर्ष विशेषकर 1915 से 1965 का कालखण्ड उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले और बिहार के भोजपुरी भाषा-भाषी जिलों में आम लोगों के मनोरंजन के साधन, रामलीला, जात्रा, भांड, धोबी, नेटुआ, गोई आदि नाच होते थे। चैती फसल कटने और आषाढ़ में फसल लगने के बीच के समय में किसानी से जीवन-यापन करनेवाली जनता के मनोरंजन का एकमात्र साधन ये नाच होते थे जिसे लोग शादी-विवाह और उत्सव के अवसर पर मंगवाते थे। (इन क्षेत्रों में शादी-विवाह गर्मी के महीने में ही होते थे।) एक व्यक्ति के खर्च से हजारों लोगों का बिना अधेली खर्च किये मनोरंजन होता था। इन नाचों में गाये गीत गांव के चरवाहा, हलवाहा, बनिहारा सालों भर गुनगुनाता था और खेतों में किये गये श्रम से अपनी थकान मिटाता था। भिखारी ठाकुर के बिदेशिया नाच ने इस विधा में नया आयाम जोड़ा। भोजपुरी क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक सांस्कृतिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर इस क्षेत्र की जनता की भाषा में उन्होंने अपने नाटक और गीत लिखे और उनका स्वयं मंचन किया। जनता अपनी समस्याओं को अपनी भाषा में सुनकर ज्यादा प्रभावित होती थी। इस तरह भिखारी ठाकुर के नाटकों के प्रभाव अन्य नाटकों की तुलना में ज्यादा प्रभावी होते थे।
भिखारी ठाकुर ने अपनी नाच मंडली को व्यवस्थित रूप देने के बाद अपना स्थायी निवास कोलकाता में बनाया था। इसका कारण था-भोजपुरी भाषा-भाषी जनता की एक बड़ी संख्या कोलकाता में रोजी-रोटी कमाती थी और भिखारी ठाकुर के नाचों से भरपूर मनोरंजन करती थी। वहां यह नाच सालों भर चलता रहता था। इसका एक कारण स्वयं भिखारी ठाकुर द्वारा लिखित बिदेशिया नाटक भी था। कोलकाता में रोजी-रोटी कमानेवाले परदेशियों में से किसी एक की कथा ही तो इस नाटक में लिखी गयी है।
भिखारी ठाकुर साल के दो महीने खासकर सावन-भादो के महीने में सारण जिला स्थित चन्दनपुर गांव में बाबूलाल की दलान पर नाटयाभिनय, गायन, वादन आदि का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया करते थे। इनकी मंडली के सदस्य विभिनन नाटकों में अभिनय, गायन, वादन, नृत्य आदि का प्रशिक्षण लेते थे। विभिन्न नाटकों के विभिन्न पात्रों के संवाद याद कराये जाते थे अभिनय करना सिखाया जाता था। गायकों और वादकों के बीच ताल-लय का सामंजस्य बैठाया जाता था और उसको नृत्य के साथ समायोजित किया जाता था। विभिन्न नाटकों में सूत्रधार की भूमिका में स्वयं भिखारी होते थे, प्रवचन करते थे और भजन आदि प्रस्तुत कर वातावरण का निर्माण करते थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न नाटकों में वे अभिनेता की भूमिका भी निभाते थे।
ऐसा कहा जाता है कि खुला मंच का प्रयोग सर्वप्रथम भिखारी ठाकुर ने ही किया था। भिखारी ठाकुर के नाटकों की एक विशेषता यह भी थी कि उनके पात्र सामयिक, प्रासंगिक एवं विनोदात्मक संवाद दर्शकों के साथ करते थे। नाटकों के सफल प्रदर्शन में दर्शकों की सार्थक एवं सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक होती है। इस कला में भिखारी ठाकुर को महारत हासिल थी। यही कारण था कि दसों हजार की भीड़ को बिना किसी थाना-पुलिस की सहायता के नियंत्रित करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती थी।
भिखारी ठाकुर ने अपने जीवन चरित में अपने वंशज, जन्म स्थान, जन्म तिथि तथा अपनी रचनाओं के बारे में सब कुछ लिखा है। इसमें उन्होंने अपनी रचनाओं की कुल संख्या 29 बतायी है। जबकि बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्पादित भिखारी ठाकुर रचनावली में 24 रचनाओं में 12 नाटक हैं-बिदेशिया, भाई-विरोध, बेटी-वियोग, विधवा-विलप, कलियुग प्रेम, राधे-श्याम बहार, गंगा स्नान, पुत्र वध, गबरघिचोर, बिरहा बहार, नकल भांड आ नेटुआ के, ननद-भौजाई। भजन-कीर्तन, गीत-कविता आदि किताबों के शीर्षक हैं- शिव विवाह, भजन-कीर्तन- राम, बूढ़शाला के बेयान, चैबर्णपदबी, नाई बहार, शंका-समाधान, विविध, भिखारी ठाकुर-परिचय आदि। भिखारी ठाकुर सामग्रियों के बार-बार देखने और उनका विवेकापूर्ण आकलन, समायोजन एवं वर्गीकरण करने के बाद उन्हें 24 जिल्दों ( 24 पुस्तकों) में सजाया गया है।
भिखारी ठाकुर द्वारा रचित बारह नाटकों में से दो नाटक ‘बिदेशिया’ और ‘गबरघिचोर’ आज भी खेले जा रहे हैं और भिखारी ठाकुर के जीवन काल की अपेक्षा आज उन्हें ज्यादा प्रसिद्धि मिल रही है। वे केवल बिहार में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश में उनका मंचन हो रहा है और लोगों द्वारा प्रशंसित हो रहे हैं। इन दोनों नाटकों की कथा वस्तु निम्न प्रकार है।
बिदेशिया:  इस नाटक का मुख्य पात्र एक युवा है- जो खेती-बारी करके जीवन-यापन करता है। खेती में साल भर काम नहीं करता है। काम के अभाव में बेरोजगार होकर भटकता फिरता है। बेरोजगारी की हालत में ही उसकी शादी एक खूबसूरत युवती से हो जाती है। पत्नी के रूप लावण्य से अभिभूत हो वह अपनी पत्नी को प्यारी सुन्दरी नाम देता है। दोनों के बीच अगाध प्रेम विकसित होता है। कुछ दिन मौज-मस्ती में बीतता है। युवा लम्बी बेकारी और बिगड़ती आर्थिक स्थिति से बेचैन कोलकाता जाने की सोचता है। प्यारी सुन्दरी को पति के कोलकता जाने का प्रस्ताव अच्छा नहीं लगता है। वह उसका घोर विरोध करती है। युवा बहाना बनाकर चुपचाप भागकर कोलकाता पहुंच जाता है। वह परदेशी ‘बिदेशी’ बन जाता है। वहां वह कड़ी मेहनत-मजदूरी कर अच्छी कमाई करने लगता है। इस बीच एक युवती उसके जीवन में आती है। और दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं। वैसी पत्नी के तत्कालीन समाज रखैल समझता है। युवा कमाता है और दोनों इस कमाई से मौज-मस्ती में संलिप्त हो जाते हैं।
गांव पर उसकी ब्याहता पत्नी पति द्वारा किसी प्रकार की सूचना नहीं देने से अतयंत दुखी रहने लगती है। दिन-रात रोती-कलपती रहती है। उसके सिर पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है। एक दिन अचानक एक अधेड़ बटोही जो कमाने के लिए कोलकाता जा रहा था। प्यारी सुन्दरी को उस बटोही के बारे में भनक मिली और वह अपने पति का हुलिया बटोही को बता देती है। बटोही प्यारी सुन्दरी को आश्वासन देता है कि उसका पति अवश्य लौटेगा। कोलकाता पहुंचने के बाद घूमने-फिरने के क्रम में उस बटोही की भेंट प्यारी सुन्दरी के पति से हो जाती है। वह उसकी पत्नी की दारूण दशा का वर्णन करता है। उसकी पत्नी के अखंड पातिव्रत्य की पुष्टि करता है। विदेशी को अपनी पत्नी की स्मृतियां लौट आती है। वह अपने घर लौटने की बात अपनी रखैल से कहता है। वह विदेशी के घर लौटने के प्रस्ताव का विरोध करती है और वहां रह रहे साहूकार और गुण्डों से उसका सामान छिनवा लेती है। लेकिन युवा उसी दुरावस्था में घर की ओर चल पड़ता है।
इसी बीच गांव का एक मनचला, जिसकी आयु विदेशी से कम थी, प्यारी सुन्दरी के पातिव्रत्य की परीक्षा लेने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देता है और बलात्कार करने की चेष्टा करता है। प्यारी सुन्दरी द्वारा दृढ़ता से प्रतिरोध करने और पड़ोसन के आ जाने से उसका सतीत्व बच जाता है। इसी समय अपनी दुरवस्था में विदेशी घर पहुंचता है। बहुत विश्वास दिलाने पर और अपने पति की आवाज पहचान कर प्यारी सुन्दरी दरवाजा खोलती है। एक ओर परदेशी पति को देखकर खुश होती है तो दूसरी ओर उसकी दशा देखकर दुखी होती है।
इसी बीच विदेशी की कलकतिया रखैल अपने दोनों बच्चों को लेकर पूरे गहने-कपड़े के साथ विदेशी की खोज में उसके गांव चल पड़ती है। कोलकाता के चोर-डकैत उसके गहने-कपड़े छीन लेते हैं और यह भी विदेशी की ही तरह विपन्नावस्था में बिना आगा-पीछे सोचे विदेशी के घर पहुंच जाती है। विदेशी उसको देखकर आश्चर्यचकित होता है, वह रखैल जब प्यारी सुन्दरी के साथ रहने का अनुनय-विनय करती है-तो सभी मिलजुल कर रहने लगते हैं।
गबरघिचोर: नाटक में मात्र पांच पात्र हैं-गलीज, गड़बड़ी, घिचोर, पंच और गलीज बहू (पत्नी)। गलीज नामक युवा बेकारी का मारा जवान पत्नी को घर पर छोड़कर कमाने के लिए शहर जाता है। कड़ी मेहनत करने के बावजूद उसकी आय नहीं बढ़ती है। वह दुव्र्यसन में फंस जाता है और घर-द्वार एवं पत्नी को भूल जाता है।
गलीज की पत्नी गांव में अकेले पड़ी पास-पड़ोस का काम, खेत-खलिहान में रोपनी, सोहनी, कटनी, पिटनी आदि करके दोनों जून की रोटी जुटाती रहती है और पति के घर आने की प्रतीक्षा करती रहती है।
गांवों में शहरी हवा के लगने के कारण गांव में भी नशाखोरी का चलन शुरू हो गया है, गांवों में परम्परागत संबंध टूटकर बिखरे रहे हैं, बहन, भाभी, चाची, मामी कहलाने वाले पवित्र रिश्ते की डोर में बंधी महिलाएं सामान्य नारी और भोग्या बन रही हैं। ऐसी ही विवश नारी है गलीज बहू जिसका पति पन्द्रह वर्षों से गांव नहीं आया है। उपेक्षित गलीज बहू का पांव फिसल जाता है और गांव के ही एक मनचले युवक के साथ उसका अवैध संबंध हो जाता है। इस युवक का नाम गड़बड़ी है। गड़बड़ी के गलीज बहू के साथ दैहिक संबंध की परिणपति होती है कि उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है जिसे लोग घिचोर नाम से पुकारने लगते हैं। गलत संबंध से पैदा होने के बावजूद गलीज बहू बड़े प्रेम से अपने पुत्र को पालती है। समाज की प्रताड़ना से डरती नहीं है। वह मातृत्व की गरिमा का पालन करती है।
इधर गबरघिचोर पन्द्रह साल का हो जाता है और मां के साथ सुख चैन की जिन्दगी जी रहा होता है। इसी बीच गांव से परदेश गया कोई व्यक्ति गलीज से मिलता है और उसकी पत्नी घिचोर और गड़बड़ी के संबंधों के बारे में बताता है।
गलीज गांव के व्यक्ति से अपनी पत्नी, नाजायज बेटे और गड़बड़ी के बारे में जानकारी पाकर विचलित नहीं होता है। वह सोचता है कि वह घिचोर को क्यों न शहर ले आये। वह भी कमायेगा और हमारी आमदनी बढ़ जायेगी।
गबरघिचोर को अपने साथ शहर ले जाने के उद्देश्य से गलीज गांव आता है और अपनी पत्नी से घिचोर को शहर ले जाने का प्रस्ताव रखता है। वह तैयार नहीं होती है। इसी बीच गड़बड़ी भी वहां पहुंच जाता है और गबरघिचोर को अपना बेटा घोषित कर देता है। मां अपने बेटे को अपना सहारा समझती है, गड़बड़ी अपने को उसका वास्तविक पिता मानता है और गलीज अपनी पत्नी से उत्पन्न उस बालक पर अपना परम्परागत हक मानता है। बात बहुत उलझ जाती है। इसे सुलझाने के लिए पंचायत का सहारा लिया जाता है।
पंच नियुक्त होता है। तीनों पक्षों ने अपनी-अपनी बातें रखी। पंच को बड़बड़ी और गलीज ने घूस देने की भी पेशकश की। और इस तरह पंच भी अपना निर्णय दे-दे कर पलटते रहे। जब पंच के निर्णय को मानने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ तो गबरघिचोर को ही तीन हिस्सों में काटकर तीनों के बीच बराबर बांट देने का भी अविवेकपूर्ण निर्णय हुआ, जैसे किसी वस्तु का बंटवारा हो। आदमी वस्तु बन गया।
जब तीन भाग में बांटकर देने की बात आयी तो गड़बड़ी और गलीज तो तैयार हो गये लेकिन मां तैयार नहीं हुई। मां ने दोनों में से किसी एक को गबरघिचोर को जिन्दा देने का प्रस्ताव रखा। अब गलीज और गड़बड़ी ने पंच को घिचोर को दो टुकड़ों में बांटने का प्रस्ताव रखा।
पंच में विवेक जागता है और वह दोनों को डांटता-फटकारता है और भर्सना करता है तथा उन दोनों की नीचता को समाज के सामने रखता है, और अंत में गबरघिचोर को उसकी मां को सौंप देता है।
आलेख बिहार खोज खबर से साभार.


भिखारी ठाकुर नाच क़ी परम्परा के आधुनिक अनुसंधानकर्ता हैं |


परवेज़ अख्तर 

परवेज़ अख्तर 

प्राक-संस्कृत रंगमंच के अवसान के बाद, उत्तर बिहार में प्रचलित लोक नाट्य-शैली 'नाच' (कीर्तनिया/बिदापद नाच) की परम्परा के समकालीन रचनाकार थे भिखारी ठाकुर | वैष्णव भक्ति-आन्दोलन के दौरान न सिर्फ विपुल साहित्य रचे गए, बल्कि नृत्य-संगीत प्रधान 'नाच' अथवा 'नाट्य' का भी विकास हुआ ! 12वीं-13वीं शताब्दी में, संस्कृत रंगमंच का प्रभाव काफी कम हो गया और उसी दौर में मिथिला क्षेत्र में ज्योतिरेश्वर, उमापति उपाधयाय जैसे कई संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने कृष्ण-आधारित सांगीतक की रचना की | इसी से प्रभावित होकर, असम में 'अंकिया भाओना' और बंगाल में 'जात्रा' जैसी शैलियों का विकास हुआ, यह तथ्य है | इन नाट्य-रूपों में कृष्ण या वैष्णव कथाओं को प्रमुखता दी गयी | इनमें पुरुष कलाकार ही, स्त्री पात्र की भूमिका करते थे |

बाद में; बिहार में कीर्तनिया/बिदापद नाच, एक दूसरेरूप में 'नाच' के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसके आधुनिक रचनाकार भिखारी ठाकुर थे | इसलिए उस नाट्य-परम्परा को, यदि समकालीन संवेदना के साथ रंगकर्मी आगे बढ़ाते हैं, तो यह स्वागतयोग्य है |

असम के शंकर देव ने ब्रज-भूमि की यात्रा के क्रम में मिथिला क्षेत्र के नाट्य-रूप 'कीर्तनिया' से प्रभावित होकर ही, 'पारिजात हरण' या 'रुक्मिणी हरण' जैसे नाटक लिखे और वहां 'अंकिया-भाओना' शैली का विकास हुआ | 'जात्रा' पर उसके प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता है | 

वह दौर (बारहवीं-तेरहवीं सदी) सांगीतक का दौर था और बिहार, असम, बंगाल, मध्य-देश सहित, सुदूर कर्णाटक में प्राक-संस्कृत सांगीतक क़ी रचना होरही थी | 'नाचा' भी उसी दौर में विकसित हुआ | कालांतर में, उत्तर बिहार में 'कीर्तनिया' और बाद में 'बिदापत नाच' की परंपरा को 'नाच' कहा गया और भिखारी ठाकुर नाच क़ी परम्परा के आधुनिक अनुसंधानकर्ता हैं | इस प्रकार भिखारी ठाकुर ज्योतिरेश्वर ठाकुर, उमा पति उपाध्याय क़ी परम्परा के रचनाकार थे |

परवेज़ अख्तर : पटना , बिहार के चर्चित रंग निर्देशक हैं , उनसे parvez29akhtar@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक का नाम भिखारी ठाकुर है.


पुष्पराज 

राउर मालिक आ भगवान से बाँचब तब राउर महफ़िल में नाचब-भिखारी ठाकुर

भिखारी जी को खाद्य -पदार्थ की तरह इस्तेमाल करनेवाले खावकों के प्रति गुस्सा जायज है लेकिन फिलवक्त गुस्से को रचना में बदलने की जरुरत है . आप और हम एक ऐसे गरीब मुल्क में जन्मे -पले बढे, जहाँ की गरीबी चेतना ने अपने समाज के सांस्कृतिक -राजनितिक नायकों ,प्रतीकों का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया है .

देखिये चिली जैसा छोटा सा राष्ट्र अपने प्रतीक नेरुदा का दूसरी ,तीसरी बार अलग -अलग कोण से मूल्यांकन कर रहा है .हमने तो अब तक कबीर का भी ठीक से मूल्यांकन नहीं किया है .

अपने आदरणीय भिखारी ठाकुर को क्या साहित्य -संस्कृति के छड़ीदारो ने उनके जीते जी उन्हें वह सम्मान दिया ,जिसके वे अधिकारी थे . हाल में नामचीन कवि केदारनाथ सिंह को पहली बार मैंने भोजपुरी में भाषण देते हुए सुना . दरअसल वे भिखारी ठाकुर के बारे में बोल रहे थे .आधे घंटे तक उनने जो भिखारी संवाद किया ,वह संवाद अभी कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है . उनने कबीर और भिखारी को सामने रखकर बुझाने की कोशिश की .जैसे एक कबीर हैं ,दूसरे लोक कबीर ,उसी तरह एक भिखारी ठाकुर हैं तो दूसरे लोक भिखारी ठाकुर .

इन भिखारी ठाकुर को हमारे मुल्क ने जीते जी अगर "भिखरिया" से अलग होकर नहीं देखा तो क्या इन चार दशक में हमारे मुल्क के खासकर हिंदी –पट्टी में ऐसा कौन से सामाजिक -राजनितिक आंदोलन हुए कि चेतना के स्तर पर अचानक बदलाव आ जाये . चावल जितना पुराना होता है ,उतना ज्यादा उपयोगी हो जाता है .इसीलिए पुराना चावल पथ्य के कम आता है .

अपने" भिखारी" भारतीय संस्कृति के "पथ्य " हो चुके हें .ये जितने पुराने होंगे ,इनकी चमक उतनी बढती जाएगी .आदरणीय भिखारी ठाकुर पर १८ दिसम्बर को बंगाल के तमाम बांग्ला अखबारों में विशेष खबर छपी थी .कोलकाता से प्रकाशित कुछ हिंदी दैनिको ने भिखारी जी पर केन्द्रित पूरा पन्ना प्रकाशित किया .पटना से प्रकाशित दैनिको में सिर्फ प्रभात खबर ने भिखारी जी पर एक पन्ना प्रकाशित किया .बंगाल के अपने दोस्त मुख में शक्कर जैसा चबाते हुए जब कहते हें कि हजाम भिखारी को लोक भिखारी बंगाल ने बनाया तो सुनकर कान मीठे हो जाते हें .पहला गिरमिटिया के लेखक गिरिराज किशोर ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि मोहनदास को महात्मा बिहार ने बनाया तो उनके कहे को अपने मुख से कहो तो ....? 

हम सीखने के दौर में हैं. बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक का नाम भिखारी ठाकुर है .

जन प्रतिरोध और जन विद्रोह की लोकसंस्कृति के भारतीय नायक का नाम भिखारी ठाकुर है . जो भिखारी की लीक पर खड़े और खरे हें उन सब का जिंदाबाद .

पुष्पराज - एक घुमक्कड सामाजिक कार्यकर्त्ता. पेंगुइन बुक इंडिया से प्रकाशित नंदीग्राम डायरी के लेखक. उनसे pushpraj06@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .

भिखारी ठाकुर का मोडिफाई रूप


अजित गांगुली 

भिखारी ठाकुर रचित नाटकों को ओरिजनल फोर्मेट में देखने का अवसर आपको मिला है की नहीं? मैंने देखा है. पंडित लोग कहतें हैं की फोक प्ले जब शहरी पढ़े लिखे लोग के हाथ में आता है तो उसमें विकृतियाँ पैदा होती है.

भिखारी ठाकुर पढ़े लिखे नहीं थे. वो स्वभाव से कवि थे. वो बोलते थे तो कोई लिखता था. मेरे इस बात की पुष्टि भिखारी ठाकुर जी के नाती ( बेटी का बेटा ) राम दास राही जी करेंगे.हम तक जो उनकी पुस्तकें आतीं हैं वो किसी शहरी द्वारा पुनार्लिखित है. 

अपने बचपन में मैं पटना के जिस मोहल्ले में रहता था वहाँ दुर्गा पूजा के अवसर पर हर साल भिखारी ठाकुर का नाच आता था. किसी शरीफ घर के लोगों को उसे देखने की इज़ाज़त नहीं थी.  Because of its format and language.

पटना के गाँधी मैदान के पास , जहाँ आज शहीद भगत सिंह पार्क है, वहाँ जाड़े के समय दोपहर में भिखारी ठाकुर का नाच होता था. हम स्कूल से लौटते समय छुप – छुपके देखते थे. तब उसे लौंडा नाच कहा जाता था. शहरी पढ़े लिखे लोगों को लौंडा नाच बोलने में तकलीफ हुई तो उसे बिदेसिया नाच नाम दे दिया.

अभी तीन – चार साल पहले 18 दिसंबर को , उनके जनम दिन पर आरा ( बिहार ) में बस स्टैंड के पास एक बड़ा समारोह था. मुझे भी उसमें शिरकत करने का अवसर मिला. उस समारोह में भिखारी ठाकुर के गांव से एक नाट्य दल आया था. जो भिखारी ठाकुर के ही लिखे प्रसिद्ध नाटक बेटी बेचवा का मंचन कर रहा था.

हम और आप अभी पटना या किसी दूसरी जगह भिखारी ठाकुर के नाटक जो देखतें है वो modified रूप है.

मैं अभी एक प्रस्ताव रखता हूँ संस्कृति विभाग को भिखारी ठाकुर फैलोशिप देना चहिये देश के युवा कलाकारों को. ताकि वो भिखारी ठाकुर के ऊपर रिसर्च करें. मुझे लगता है भिखारी ठाकुर के बारे में हमें अभी बहुत कुछ और जानना बाकि है.

अजित गांगुलीपटना रंगमंच पर लंबे समय से कार्यरत श्री गांगुली बिहार आर्ट थियेटर से जुड़े बिहार के प्रसिद्ध नाट्य निर्देशकों हैं. उनसे  ajit.gangoly@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .

रविवार, 18 दिसंबर 2011

भिखारी को आलोचकों ने नहीं जन ने लोकप्रिय बनाया

बिदेसिया लोक महाकाव्य के प्रणेता की 125वीं जयंती की शुरुआत पर  अश्विनी कुमार पंकज का आलेख

भारत की हिंदी पट्टी में सांस्कृतिक रूप से कलाओं को सम्मान नहीं है. सांस्कृतिक रूप से ‘विपन्न’ दृष्टि वाले इस समाज में विभिन्न कलाएं और कलाकार विद्रोही होकर ही अपने लिए स्पेस बनाते रहे हैं. इनमें 18 दिसम्बर 1887 को जन्मे भिखारी ठाकुर एक ऐसे सार्वकालिक विद्रोही कलाकार हैं जिन्होंने एक नई रंगशैली को लोकप्रिय बनाते हुए कला और कलाकार दोनों की गरिमा स्थापित की. अपने समय में अनेक नाटकों से समाज की वर्जनाओं को तोड़ते हुए उन्होंने समूची हिंदी पट्टी में व्याप्त सामंती संस्कारों पर प्रहार किया और कला के सामाजिक सरोकारों को सोद्देश्य रंगकर्म से रेखांकित किया. 10 जुलाई 1971 को उनका देहांत हुआ. यदि मान लिया जाए कि वे 1960 तक सक्रिय रहे होंगे तो आज 50 साल बाद भी हिंदी पट्टी में कलाओं के प्रति समाज के रवैये में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है. कलाकर्म अब भी जीविका के लिहाज से एक ‘अनुत्पादक’ काम माना जाता है. टीवी चैनलों पर होने वाले रीयलिटी कार्यक्रमों की वजह से नाच-गानों में भागीदारी जरूर बढ़ी है. फिर भी दिखावे के ग्लैमरस शोज के बाहर गीत-संगीत और नाट्य अध्ययन संस्थानों व समूहों में सन्नाटा ही पसरा हुआ है.

कलाएं अपने आंतरिक चरित्र में मूलतः बाजार की अपेक्षा समाजोन्मुखी होती हैं. कमर्शियल कंसर्ट, थिएटर, टीवी और सिनेमा उन्हीं कला उत्पादों को प्रोत्साहित करते हैं जो बिकने लायक होती हैं. बिकने लायक कौन है इसे बाजार तय करता है. वह बाजार को नियंत्रित करनेवाली शक्तियों के हितों के अनुरूप मनोरंजन का फार्मूला गढ़ता है और उन कलाकारों को प्रमोट करता है जो उसके फार्मूले के तहत कलाकर्म करने लगते हैं. इस संदर्भ में भिखारी ठाकुर एक ऐसी मिसाल हैं जिन्होंने न सिर्फ बाजार के फार्मूले का प्रतिकार किया बल्कि इस अवधारणा को फिर से प्रतिष्ठित भी किया कि कला और कलाकार की स्वायत्तता सर्वोपरि है जो जन मूल्य आधारित होती है. पर हम बाजार के आक्रमण से घिरे होने के बावजूद भिखारी को सिर्फ एक महान गंवई लोक कलाकार के रूप में याद करते हैं. जन संस्कृति आधारित कलात्मक मूल्यों और विचारों के लिए नहीं, जिसके कारण वे जीते जी एक रंगशैली बन जाते हैं. हिंदी क्षेत्र में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि लेखक-कलाकार के मरने के बाद ही उसका मूल्यांकन होता है. उसे लोकप्रियता मिलती है और उसके न होने की कमी अखरती है. दरअसल इस मिथ को बहुत चालाकी से उन अकर्मण्य कलाकारों, लेखकों और आलोचकों ने गढ़ डाला है जो सृजनात्मक रूप से जन सक्रिय नहीं होते हैं. वे लोकप्रियता को नकारते हैं क्योंकि लोक को साथ लिए बिना, उसके साथ हुए बिना उन्हें सारी सुविधाएं व लाभ चाहिए. भिखारी जैसे अनेक लोग हैं जो जीते जी ही बगैर सत्ता सहयोग के पॉपुलर हुए. आज भी ऐसे कई नाम हैं जो मीडिया में प्रमुखता से नहीं छपते पर पॉपुलर है.

दरअसल भारतीय रंगदृष्टि सामंती और बाहरी मूल्यों से ग्रसित है. इस दृष्टि में स्त्री, दलित, पिछड़े, आदिवासी आदि वंचित समूहों का स्थान नेपथ्य और सिर्फ परफारमेंस के लिए है. किसी भी परफारमेंस के निर्देशकीय क्षेत्र में जहां कि कथ्य, विचार और सौंदर्यदृष्टि पर विचार होता है, वहां ‘जन’ प्रवेश वर्जित है. भिखारी ठाकुर अपने रंगकर्म और निर्देशकीय भूमिका से खुद भी उस प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और लोगों के लिए भी उसे सुगम बनाते हैं. अपढ़ भिखारी द्विज सामंती विचारों को कलात्मक चुनौती देते हैं, नयी सौंदर्य दृष्टि गढ़ते हैं और इस मिथ को ध्वस्त करते हैं कि कलाकर्म के लिए ‘विद्वान’ होना जरूरी है. उनका जीवन और रंगकर्म बताता है कि विद्वान होने से कहीं ज्यादा जरूरी है जन संस्कृति का शिक्षार्थी होना, उनके सुख-दुख, संत्रास और आनंद में सहभागी बनना. इसलिए भिखारी जब कहते हैं ‘बरजत रहलन बाप मतारी ...’ तो इसका अर्थ महज अभिभावकीय चिंता नहीं है. ‘बाप मतारी’ से ही समाज बनता है और समाज के शासकों की संस्कृति ही, यदि वे सचेत नहीं हैं, तो उनकी संस्कृति होती है. आज भी ‘बाप मतारी’ ही सबसे ज्यादा कलाकर्म की अवमानना करते हैं और बचपन से ही घर-परिवार में कला विरूद्ध माहौल बनाये रखते हैं. भिखारी इस सामंती विचार के खिलाफ चल रहे जन सांस्कृतिक युद्ध में सबसे बड़े योद्धा हैं. वे सिर्फ युद्ध के सिद्धांतकार भर नहीं हैं बल्कि उसके कमांडर भी हैं.

सामाजिक चेतना के अग्रदूत भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन समाज की शोषित-पीड़ित, दीन-हीन जनता की दबी चीखों को अपनी नाट्य मंडली के द्वारा नया स्वर दिया। अपने गीतों तथा नाटकों से मनोरंजन के साथ-साथ जन सरोकारों को मुखर अभिव्यक्ति दी। समाज की कुरीतियों, रूढ़ियों, विसंगतियों एवं शोषणकारी तत्वों का लोकमंच से पर्दाफाश किया। सामाजिक बुराईयों पर निर्मम सांघातिक प्रहार किये। लोकरंजक जनहित उनका एकमात्र उद्देश्य था। दहेजप्रथा, बालविवाह एवं बेटी बेचने जैसी सामाजिक कुरीतियों व सामंती मूल्यों के खिलाफ एक जबरदस्त मुहिम छेड़ा। कलयुग प्रेम, भाई विरोध, बेटी बेचवा, विधवा विलाप, गंगा स्नान, पुत्र वध तथा बिदेसिया आदि बहुचर्चित नाटकों के माध्यम से संकुचित रूढ़िग्रस्त और अंधविश्वासी मूल्यों की कलात्मक आलोचना करते हुए ‘बिदेसिया’ लोक महाकाव्य रचा। उन्हें शेक्सपीयर, भारतेंदु और जयशंकर प्रसाद जैसा मानते हुए उपाधियों से विभूषित किया गया. परंतु वे शेक्सपीयर और जयशंकर प्रसाद से बहुत आगे जाते हैं. वे भारतेंदु जैसे भी हैं लेकिन उनसे भी बीस ही पड़ते हैं. बेशक इन तीनों की तरह उनके नाटक किसी क्लासिक भाषा में रचित नहीं हैं पर वे उसी जबान में लिखते हैं और रंगकर्म करते हैं जिसे जनता बोलती है. इसलिए ही वे इन तीनों से ज्यादा लोकप्रियता हासिल करते हैं. शेक्सपीयर, प्रसाद और भारतेंदु को हम उनकी रचनाओं से ज्यादा उनके आलोचकों की वजह से जानते हैं जिन्होंने उन सबको स्थापित करने के लिए सैंकड़ों पुस्तकें और हजारों लेख लिखा. भिखारी किसी आलोचक की वजह से प्रकाश में नहीं आए. आलोचकों ने तो आज भी उनकी ओर से मुंह फेर रखा है. कवि के रूप में भी भिखारी तुलसी, मीरा और कबीर त्रयी की भोजपुरी त्रिवेणी हैं। जनभाषा और जनजीवन के संगम।

यह हिंदी प्रदेश का दुर्भाग्य है कि आज वह साहस भरी बिदेसिया लोकमंचीय परंपरा लगभग दम तोड़ चुकी है। कुछ रंगकर्मियों ने जरूर उनकी शैली को अपने एकाध नाटकों में शामिल कर ख्याति पाई, पर उन्होंने भी बिदेसिया रंगशैली को एक ‘तत्व’ से ज्यादा महत्व नहीं दिया. प्रशिक्षित रंगकर्मियों की नजर भी इस लोकधर्मी परंपरा पर नहीं जाती क्योंकि नाट्य अध्ययन-प्रशिक्षण संस्थानों में भिखारी ठाकुर पाठ्यक्रम से बाहर हैं. सुदृढ़ बुनियाद के बावजूद मौजूदा हालात में रंगमंच जहां आधुनिक, आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से विकसित हो चुका है, वहीं हमारे रंगकर्मियों का ध्यान इस मरती हुई लोकमंचीय परंपरा की तरफ से उदासीन है। नाट्य संस्थानों से निकले रंगकर्मी मैकबेथ जरूर करते हैं पर भिखारी उनके लिए त्याज्य हैं. भिखारी अब भी सचेत कर रहे हैं कि हम अपनी लोकभाषा तथा लोकशैलियों से कट कर रंगमंच के स्वतंत्र आत्मनिर्भर अस्तित्व का विकास नहीं कर सकते हैं। यदि हिंदी रंगकर्म को बाजार की शर्तो को नकारते हुए आजीविका व पेशेवर आर्थिक आत्मर्भिरता की ओर बढ़ना है तो भिाखरी बनने का सहस करना होगा. हिंदी समाज को भी अपने नजरिये में बदलाव लाने के लिए, अपनी सांस्कृतिक अभिरूचियों के परिष्कार के लिए बिदेसिया के समाजी की टेर सुननी होगी. ‘बाप मतारी’ के बरजने का प्रतिकार ही रंगकर्म व समाज की सौंदर्यदृष्टि को जन संस्कृतिमूलक बना सकता है.

अश्विनी कुमार पंकज पिछले तीन दशकों से रंगकर्म, कविता-कहानी, आलोचना, पत्रकारिता एवं डाक्यूमेंट्री से गहरी यारी/अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों -प्रिंट, ऑडियो, विजुअल, ग्राफिक्स, परफॉरमेंस और वेब के साथ जम कर साझेदारी/आदिवासी जीवन, समाज, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पर्यावरण पर थियेटर, फिल्म और साहित्यिक माध्यमों में विशेष कार्य. फिलहाल झारखण्ड के आदिवासी भाषाओं तथा उनके इतिहास पर सक्रिय/ लोकप्रिय मासिक नागपुरी पत्रिका ‘जोहार सहिया’ और पाक्षिक बहुभाषी अखबार ‘जोहार दिसुम खबर’ तथा रंगमच की पत्रिका रंगवार्ता का संपादन-प्रकाशन. उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

ग्रामीण भारत का महानायक भिखारी


♦ निराला

18 दिसंबर 2011 से भिखारी ठाकुर के 125वीं जयंती वर्ष की शुरुआत हो रही है। पोस्टरों में, पंफलेटों में, हाथों-हाथ बांटे जा रहे नेवता पत्रों में और अखबारों में कई आयोजन-प्रयोजन, उत्सव-महोत्सव की सूचनाएं एक-दूजे से दनादन टकरा रही हैं। एक-दूजे को ठेलकर हाशिये पर कर देने की कोशिश के साथ। हाल के वर्षों में भटकते भदेस भोजपुरी जमात के लिए सबसे मजबूत अवलंबन की तरह साबित होते दिख रहे हैं भिखारी। स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय के बाद अब अंतरराष्‍ट्रीय बाजार को तेजी से भिखारी में संभावनाएं दिखने लगी हैं। उनके नाम पर आनेवाले दिनों में आयोजनों की संख्या और बढ़ेगी, इसके संकेत मिल रहे हैं। यह अच्छा है – नहीं अच्छा है जैसे पारंपरिक बहस में पड़ने का इरादा छोड़ मेरे जैसे लोग इससे आनंदित हैं। बहुत सुकून मिल रहा है। वरना आज से 25 साल पहले 1987 में भिखारी ठाकुर का जन्म शताब्दी वर्ष भी पड़ा था और गुमनामी में ही गुजर भी गया था। जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर देश नहीं अपने बिहार में भी भिखारी के नाम पर किसी बड़े आयोजन की जानकारी नहीं मिलती। न सरकारी स्तर पर, न संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर से। रांची में अश्विनी कुमार पंकज जैसे तब के जुनूनी युवा रंगकर्मी ने जरूर जन्मशताब्दी वर्ष का आयोजन अपने स्तर से बड़े फलक पर किया था। बिदेसिया पत्रिका निकालकर, सम्मेलन आदि आयोजित कर।

बहरहाल, शताब्दी वर्ष की धुंध से निकल कर अब चमचमाते सवा सौवें साल की यात्रा पर पहुंच चुके हैं भिखारी। भिखारी ने खुद लिखा था कि मरने के 50 बरिस बाद उनका चहुंओर नाम होगा और सौ बरिस बाद वे महानायक सरीखे हो जाएंगे। मौलिकता की तलाश में भटकते और बेताब इस देस-काल ने भिखारी के कहे अनुसार उतना इंतजार नहीं किया। मृत्यु के चौथे दशक में ही खूब नाम हो गया है भिखारी का। बाजार और सरोकार के बीच भिखारी का आकलन कई आयामों से बहुत पहले ही किया जा चुका है। अनगढ़ हीरा, लोकनाट्य सम्राट, भोजपुरी के शेक्सपीयर, रायबहादुर आदि-आदि कई उपनाम, उपाधियां जीते-जी भिखारी के नाम रहीं। लेकिन बंद गलियों में ही घूमकर खुद पर अगराने-इतरानेवाले एक बड़े जमात की नजर में भिखारी आज भी नचनिया, लवंडा, नटकिया की परिधि में सिमटे हुए हैं। यह वही जमात है, जो रोजगार के लिए पलायन कर देश-दुनिया के कोने-कोने में फैलने की प्रक्रिया पर तो अपने को सबसे ज्यादा प्रगतिशील कहता है लेकिन अपने अहाते में लौटते ही मध्ययुगीन होने को बेताब-सा रहता है। यह जमात भिखारी के व्यक्तित्व, कृतित्व का सारा तानाबाना भदेस भोजपुरी से जोड़कर उसी परिधि में समेट देने की कोशिश करता है। बहुतेरे को अटपटा लगता है यह नजरिया, मेरे जैसे छोटी समझ वाले इसी नजरिये में सुकून की तलाश कर रहे हैं।
जहां से भिखारी की ताकत को कमतर कर आंका जाता है, भिखारी वहीं सबसे ज्यादा मजबूत होते हुए दिखते हैं। बस, एक सवाल के साथ कि जिंदगी भर भोजपुरी-भोजपुरी रटते रहने वाले और भोजपुरीभाषी होने पर गर्व करनेवाले भिखारी अपने जमाने में, अपने जमात के साथ, एक बड़े जमात के बीच जो कर रहे थे, वह क्या सिर्फ भदेस भोजपुरी इलाके भर में सिमटने या समेट देने भर का मामला बनता है!
मान लेते हैं कि भिखारी कोई समाजसुधारक लोकनाटककार वगैरह नहीं थे। प्रोफेशनल नटकिया और नाच में पारंगत लौंडा भर ही थे, जो मंडली के लिए भोजन-पानी के रूप में माला उठाने की सामर्थ्‍य रखनेवाले के कहे पर ही समूह के साथ गंतव्य तक कूच करते थे। वह नाटक करते थे। उनके नाटकों में मरदाना ही मेहरारू बनकर पाठ करता था। चौपाई, बहरत, दोहा, सवइया को साधता था। भिखारी की मंडली नौटंकी ही किया करती थी, सो दैहिक भाषा का तारतम्य बिठाने के लिए नाचना भी खूब पड़ता था। वह अभिनय का अभिन्न हिस्सा होता था, बहुतेरे ने उसे लौंडा नाच कहा। ठीक है कि वह लौंडा नाच ही था, तो उस लौंडा नाच का असर कहां-कहां और किस-किस रूप में पड़ रहा था, यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
महिला गवइयों व तवायफों का जमाना था, तो उनका सुनना-गुनना कोठे-कोठियों के बाद राजदरबारों व जमींदारों के अहाते तक ही ज्यादातर सीमित रहा। फिर बाईजी युग का अवतरण हुआ। बाईजी माने भदेस भाषा में रंडी। बाई जी भी बड़े लोगों के यहां ही शादी-ब्याह व अन्य आयोजनों में जातीं। जिनके पास पैसा हो, वही शामियाने में, महफिल में बाईजी को नचवा पाता। मुंह में रुपइया लेकर बाईजी के होठों से खिंचवाकर ईनाम देने का खेल खेलता। गोलियों से शमियाना छेद-छेद होता। इस मजावादी मनोरंजन का रोमांच कुछ ही लोगों की पहुंच में होता। शामियाने या महफिल के अंदर और इर्द-गिर्द पहुंचने की इजाजत सबको नहीं होती थी। एक बड़ा तबका उस रोमांच से वंचित रहता। इच्छाओं-आकांक्षाओं का दमन कर। उसकी इच्छा भी होती थी कि वह भी बाईजी को पास से देखे, रुपइया लुटाये, मुंह में रुपइया फंसाकर उसे उसके मुंह में दे, हाथ-गाल छू ले। लेकिन ऐसी आकांक्षा और इच्छा रखनेवाले तबके की नियति थी कि वह मन में ही ऐसे ख्वाब पाले। दूर से ही यह सब देख-सुनकर सब्र करे। खुद की आकांक्षा के साथ घुटता रहे। भिखारी जैसे लोगों ने लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर नाच वाली मनोरंजन की लोकप्रिय विधा पर खास वर्ग के प्रभुत्व को तोड़ दिया। मरद से मेहरारू का रूप धरे लौंडा को नचाना सबके बस में हो गया। लौंडा सबके यहां पहुंचने लगा। चैता से लेकर बियाह-शादी तक में। बाईजी की तरह ही मरद से मेहरारू बने लौंडा पर रुपइया लुटाने लगा एक तबका। खुलकर सिटी भी बजाने लगा, करीब से देखने, हाथों-गालों को छू लेने की हसरत पूरी करने लगा।
लौंडा नाच ने बाईजी के नाच को जितनी चुनौती नहीं दी, उससे ज्यादा चुनौती उन्हें दी, जो मनोरंजन की इस विधा पर तवायफों के बाद बाईजी रूपी संस्करण पर भी बपौती रूप से अपना ही अधिकार जमाये बैठे थे। भिखारी को कोई लौंडा भी कहता है, तो इसी वजह से सुकून मिलता है कि उस पारंगत लौंडा ने अपने नाच के बहाने एक बड़े साम्राज्य का खात्मा किया। वर्षों की जकड़न को तोड़ा।
भिखारी नटकिया थे, ठेठ गंवई नौटंकीबाज। भदेस भोजपुरी में रचते-बकते थे। बिना पैसा लिये कहीं नहीं जाते थे। सट्टा बुक होने पर ही हिलते-डोलते थे। मंगनी में समाजसेवा करते फिरते हो, ऐसी चर्चा बहुत कम या न के बराबर ही आती है। तब भिखारी के बारे में यह धारणा बहुतेरे में है, तो यह भी ठीक है। लौंडा कहे जाने की तरह सुकून देनेवाली धारणा है यह भी। अब यहां पर भी थोड़ी देर ठहर कर भिखारी को समझने का वक्त है।
भिखारी अपने जमाने के बिल्कुल प्रोफेशनल कलाकार थे। उनके खाते में दर्जन भर से अधिक नाटक थे। बिदेसिया, भाई विरोध, बेटी वियोग, विधवा विलाप, कलियुग प्रेम, राधेश्याम बहार, गंगा स्नान, पुत्र बध, गबरघिचोर, बिरहा बहार, नकल भांड़ आ नेटुआ के, ननद भउजाई आदि। असम से लेकर बनारस तक, धनबाद से लेकर छपरा-आरा तक जाते थे तो वे किसी नाटक-नौटंकी का शो कर सकते थे लेकिन क्यों लोग बिदेसिया, बेटीबेचवा और गबरघिचोर की जिद करते थे। पैसा देकर मनोरंजन के लिए हल्के फुल्के विषय को छोड़ बेटीबेचवा और गबरघिचोर के पीछे क्यों दिवानी थी गंवई जनता। क्या भिखारी के जमाने में जनता उकतायी हुई थी, परंपराओं को तोड़ने की अकुलाहट थी समाज में या भिखारी नब्ज ऐसे दबाते थे कि बेचैन हो जाता था लोगों का मन। बिदेसिया रंडी, घरवाली और मरद के बीच के रिश्ते के ताना-बाना के साथ पलायन की पीड़ा है। पति के जाने के बाद स्‍त्री मन की पीड़ा को भिखारी ने संजोया है इसमें। बेटी वियोग अथवा बेटी बेचवा में सामाजिक प्रचलन के खिलाफ संवेदनात्मक व भावुक अपील है। रुला देनेवाले बहरत-दोहा और चैपाइयों की भरमार है इसमें। संवेदना, अपनी ही परंपरा पर चोट करने के लिए लोग भिखारी को क्योंकर पैसा देकर बुलाते थे, उसी की फरमाइश क्यों करते थे! भिखारी के बारे में यहीं सोचने की जरूरत है। और इन सबसे इतर गबरघिचोर की बात करें तो वह अपने आप में इस कदर का मजबूत कथानक वाला प्लॉट है, जिससे संभ्रांत तबका आज अत्याधुनिक होने के बावजूद हिल जाये। गबरघिचोर में एक बच्चे का बाप तय करने के बहाने स्त्री की यौन आकांक्षा की स्वतंत्रता पर मुहर लगवाते हैं भिखारी और तब का गंवई मन इसे ही बार-बार दिखाने की मांग कर रहा था। कुछ तो वजह रही होगी। भिखारी के रास्ते समाज का नजरिया साफ दिखता है कि वह बदलाव की आकांक्षा हमेशा रखता था, बनी बनायी रूढ़ परंपराओं को तोड़ने के लिए बेचैन था। आज राजनीति और समाजसेवी इस दिशा में दो कदम आगे चलते हैं तो समूची वाहवाही को अपने खाते में करने को बेताब रहते हैं। भिखारी प्रोफेशनलिज्म को बरकरार रखते हुए तभी यह कर रहे थे, वह भी भोजपुरी पट्टी के उस बंद समाज की गलियों में, जहां आज भी सामंती व्यवस्था कू्ररतम रूप दिखा देती है।
यहां चाहें तो भिखारी से ज्यादा श्रेय समाज को दे सकते हैं, जिसने सामंती जकड़न में जकड़ी रंडी नाच के मुकाबले लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर अपने लिए रास्ता ढूंढ लिया। एक प्रोफेशनल कलाकार से बार-बार बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटीबेचवा आदि दिखाने की मांग कर उसे समाजसुधारक नटकिया बना दिया। समाज ही रहा होगा, जिसने भिखारी में नायकत्व के तत्व ढूंढकर, सांस्कृतिक राजनीति को चुनावी राजनीति से आगे निकल जाने दिया। समाज भिखारी को सामने रख कला के जरिये बदलाव की मुहिम में शामिल हो गया। लौंडा नाच से मनोरंजन के साम्राज्य पर वर्चस्व बनाये सामंती हेकड़ी को तोड़ते हुए अवाम शायद सांस्कृतिक और आर्थिक मुक्ति भी चाहता था, इसीलिए बिदेसिया की मांग सबसे ज्यादा थी और वह गंवई भारत का लोकप्रिय महाकाव्य बन गया।
भिखारी बिदेसिया की शुरुआत में ही दर्शकों से सवाल करते थे – बिदेसी के? प्यारी सुंदरी के? रखेलिन के? ‘कोलावेरी’ गाने की वर्चुअल दुनिया से बाहर की रीयल दुनिया में समाज आज भी उनके सवाल का जवाब देने के लिए क्यों तैयार नहीं है? एक ‘लौंडा’ के सारे तीखे सवाल सांस्कृतिक जड़ता और सामंती ठसक पर लगातार प्रहार कर रहे हैं और हमारी नजर ‘नाच’ तक सिमटी हुई है। भिखारी और उनका बिदेसिया भोजपुरी का ही नहीं वरन भारतीय समाज का लोक महाकाव्य है। लौंडा रचित इस महाकाव्य को आधी सदी पहले अपने समाज ने जो अर्थ दिया था, क्या हम उसे आज के संदर्भ विस्तार देने की दृष्टि विकसित कर सकते हैं?
कहने को समाज आज ज्यादा विकसित हो गया है, लेकिन नायकत्व की तलाश में भटक रहा है। हर रोज घर में बैठ टीवी के सामने नये नायक की तलाश करता है, पत्र-पत्रिकाओं में सर्वेक्षण के जरिये आनेवाली श्रेष्‍ठ सेक्सी सुंदरियों में नायकत्व की तलाश करता है। विकसित और आधुनिक समाज का सौंदर्यबोध और कला की परख की क्षमता वहीं टिक गयी है। असली कलाकर्म, संस्कृतिकर्म को हाशिये पर डाल राजनीति से ही समूचे बदलाव की कामना घर में बैठे-बैठे कर भंवरजाल में फंसता जा रहा है समाज। भिखारी के 125वें जयंती वर्ष में थोड़ी देर रुक कर सोचने की जरूरत है…!
nirala
(निराला। युवा और प्रखर पत्रकार। प्रभात खबर से लंबे समय के जुड़ाव के बाद फिलहाल तहलका के झारखंड-बिहार संवाददाता। उनसे niralabidesia@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
आलेख प्रभात खबर के रांची संस्करण से साभार.