रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

भिखारी ठाकुर का मोडिफाई रूप


अजित गांगुली 

भिखारी ठाकुर रचित नाटकों को ओरिजनल फोर्मेट में देखने का अवसर आपको मिला है की नहीं? मैंने देखा है. पंडित लोग कहतें हैं की फोक प्ले जब शहरी पढ़े लिखे लोग के हाथ में आता है तो उसमें विकृतियाँ पैदा होती है.

भिखारी ठाकुर पढ़े लिखे नहीं थे. वो स्वभाव से कवि थे. वो बोलते थे तो कोई लिखता था. मेरे इस बात की पुष्टि भिखारी ठाकुर जी के नाती ( बेटी का बेटा ) राम दास राही जी करेंगे.हम तक जो उनकी पुस्तकें आतीं हैं वो किसी शहरी द्वारा पुनार्लिखित है. 

अपने बचपन में मैं पटना के जिस मोहल्ले में रहता था वहाँ दुर्गा पूजा के अवसर पर हर साल भिखारी ठाकुर का नाच आता था. किसी शरीफ घर के लोगों को उसे देखने की इज़ाज़त नहीं थी.  Because of its format and language.

पटना के गाँधी मैदान के पास , जहाँ आज शहीद भगत सिंह पार्क है, वहाँ जाड़े के समय दोपहर में भिखारी ठाकुर का नाच होता था. हम स्कूल से लौटते समय छुप – छुपके देखते थे. तब उसे लौंडा नाच कहा जाता था. शहरी पढ़े लिखे लोगों को लौंडा नाच बोलने में तकलीफ हुई तो उसे बिदेसिया नाच नाम दे दिया.

अभी तीन – चार साल पहले 18 दिसंबर को , उनके जनम दिन पर आरा ( बिहार ) में बस स्टैंड के पास एक बड़ा समारोह था. मुझे भी उसमें शिरकत करने का अवसर मिला. उस समारोह में भिखारी ठाकुर के गांव से एक नाट्य दल आया था. जो भिखारी ठाकुर के ही लिखे प्रसिद्ध नाटक बेटी बेचवा का मंचन कर रहा था.

हम और आप अभी पटना या किसी दूसरी जगह भिखारी ठाकुर के नाटक जो देखतें है वो modified रूप है.

मैं अभी एक प्रस्ताव रखता हूँ संस्कृति विभाग को भिखारी ठाकुर फैलोशिप देना चहिये देश के युवा कलाकारों को. ताकि वो भिखारी ठाकुर के ऊपर रिसर्च करें. मुझे लगता है भिखारी ठाकुर के बारे में हमें अभी बहुत कुछ और जानना बाकि है.

अजित गांगुलीपटना रंगमंच पर लंबे समय से कार्यरत श्री गांगुली बिहार आर्ट थियेटर से जुड़े बिहार के प्रसिद्ध नाट्य निर्देशकों हैं. उनसे  ajit.gangoly@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .

1 टिप्पणी:

  1. प्राक-संस्कृत रंगमंच के अवसान के बाद, उत्तर बिहार में प्रचलित लोक नाट्य-शैली 'नाच' (कीर्तनिया/बिदापद नाच) की परम्परा के समकालीन रचनाकार थे भिखारी ठाकुर | वैष्णव भक्ति-आन्दोलन के दौरान न सिर्फ विपुल साहित्य रचे गए, बल्कि नृत्य-संगीत प्रधान 'नाच' अथवा 'नाट्य' का भी विकास हुआ ! 12वीं-13वीं शताब्दी में, संस्कृत रंगमंच का प्रभाव काफी कम होगया और उसी दौर में मिथिला क्षेत्र में ज्योतिरेश्वर, उमापति उपाध्याय जैसे कई संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने कृष्ण-आधारित सांगीतक की रचना की | इसी से प्रभावित होकर, असम में 'अंकिया भाओना' और बंगाल में 'जात्रा' जैसी शैलियों का विकास हुआ, यह तथ्य है | इन नाट्य-रूपों में कृष्ण या वैष्णव कथाओं को प्रमुखता दी गयी | इनमें पुरुष कलाकार ही, स्त्री पात्र की भूमिका करते थे |
    बाद में; बिहार में कीर्तनिया/बिदापद नाच, एक दूसरेरूप में 'नाच' के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसके आधुनिक रचनाकार भिखारी ठाकुर थे | इसलिए उस नाट्य-परम्परा को, यदि समकालीन संवेदना के साथ रंगकर्मी आगे बढ़ाते हैं, तो यह स्वागतयोग्य है |

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