रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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रविवार, 9 सितंबर 2012

बदल गया है नुक्कड़ नाटक : देवेंद्रराज अंकुर


पूर्व हो या पश्चिम - यों तो नाटक और रंगमंच की शुरुआत ही खुले में हुई अर्थात नुक्कड़ ही वह पहला स्थान था जो नाटकों के खेलने में इस्तेमाल हुआ। आदिम युग में सब लोग दिन भर शिकार करने के बाद शाम को अपने-अपने शिकार के साथ कही खुले में एक घेरा बनाकर बैठ जाते थे और उस घेरे के बीचो-बीच ही उनका भोजन पकता रहता, खान-पान होता और वही बाद में नाचना-गाना होता।

इस प्रकार शुरू से ही नुक्कड़ नाटकों से जुड़े तीन ज़रूरी तत्वों की उपस्थिति इस प्रक्रिया में भी शामिल थी - प्रदर्शन स्थल के रूप में एक घेरा, दर्शकों और अभिनेताओं का अंतरंग संबंध और सीधे-सीधे दर्शकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े कथानकों, घटनाओं और नाटकों का मंचन। इसी का विकसित रूप हमें तब भी देखने को मिलता है जब आज से लगभग ढ़ाई-तीन हज़ार वर्ष पहले यूनान में थेस्पिस नामक अभिनेता घोड़ागाड़ी या भैसागाड़ी में सामान लादकर, शहर-शहर घूमकर सड़कों पर, चौराहों पर अथवा बाज़ारों में अकेला ही नाटकों का मंचन किया करता था। 
स्वयं भारत में भी इसी समय के आस-पास अथवा इससे भी पूर्व से लव और कुश नाम के दो कथावाचकों के माध्यम से रामायण महाकाव्य को जगह-जगह जाकर, गाकर सुनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। ये लव-कुश राम के पुत्रों के रूप में तो प्रसिद्ध हैं ही, बाद में इन्हीं के समांतर नट या अभिनेता को भी हमारे यहां कुशीलव के नाम से ही जाना जाने लगा। संभवत: यही कारण है कि नाटकों के लगातार खुले में मंचित होते रहने के मद्देनज़र भरत ने भी अपने नाट्यशास्त्र में दशरूपक विवेचन के अंतर्गत 'वीथि' नामक रूपक का भी उल्लेख किया है। आज भी आंध्र प्रदेश में लोकनाट्य परंपरा की एक शैली का नाम की 'वीथि नाटकम' मिलता है और आधुनिक नुक्कड़ नाटक अथवा स्ट्रीट थिएटर को भी इसी नाम से जाना जाता है।
मध्यकाल में सही रूप में नुक्कड़ नाटकों से मिलती-जुलती नाट्य-शैली का जन्म और विकास यदि भारत के विभिन्न प्रांतों, क्षेत्रों और बोलियों-भाषाओं में लोक नाटकों के रूप में हुआ तो उसी के समांतर पश्चिम में भी चर्च अथवा धार्मिक नाटकों के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन आदि देशों में ऐसे नाटकों का प्रचलन शुरू हुआ जो बाइबिल की घटनाओं पर आधारित होते थे और मूलत: धर्म के प्रचार के लिए ही खेले जाते थे। ये नाटक भी खुले में, मैदानों, और चौराहों और बाज़ारों में ही मंचित किए जाते थे और दिन की रोशनी में ही, जबकि हमारे यहां नाटक लगभग अपने आरंभ काल से ही ज़्यादातर रात में ही खेले जाते थे। इसके लिए हमारे यहां की तत्कालीन जीवन-व्यवस्था तो ज़िम्मेदार थी ही, अर्थात दिन भर खेतों में काम करने के बाद, रात में ही उन्हें ऐसे मनोरंजन की ज़रूरत पड़ती थी जो उनकी थकान मिटा सके। 
इतना ही नहीं, रात के साथ ही इस तरह के प्रदर्शनों, मनोरंजनों का जुड़ना समाज में उपस्थित एक सुरक्षित जीवन-पद्धति की तरफ़ भी इंगित करता है जबकि पश्चिम में स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। वहां मध्यकाल में, दिन में नाटकों के मंचन की आवश्यकता का जन्म ही इसलिए हुआ था कि लोग शाम ढलने से पहले ही सुरक्षित अपने घरों को लौट सकें। मध्यकाल में आविर्भूत इन्हीं धार्मिक नाटकों ने आज के नुक्कड़ नाटकों से जुड़े एक और आवश्यक तत्व को जन्म दिया और वह है प्रचार के लिए नाटक विधा का प्रयोग।
वास्तव में प्रचार ही वह मूल मंत्र है, जो नुक्कड़ नाटकों के वर्तमान स्वरूप, संरचना और इतिहास से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। आज जिस रूप में हम नुक्कड़ नाटकों को जानते है, उनका इतिहास भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान कौमी तरानों, प्रभात फेरियों और विरोध के जुलूसों के रूप में देखा जा सकता है। इसी का एक विधिवत रूप 'इप्टा' जैसी संस्था के जन्म के रूप में सामने आया, जब पूरे भारत में अलग-अलग कला माध्यमों के लोग एक साथ आकर मिले और क्रांतिकारी गीतों, नाटकों व नृत्यों के मंचनों और प्रदर्शनों से विदेशी शासन एवं सत्ता का विरोध आरंभ हुआ। इस प्रकार किसी भी गल़त व्यवस्था का विरोध और उसके समांतर एक आदर्श व्यवस्था क्या हो सकती है - यही वह संरचना है, जिस पर नुक्कड़ नाटक की धुरी टिकी हुई है। कभी वह किस्से-कहानियों का प्रचार था, कभी धर्म और कभी राजनैतिक विचारधारा। किसी भी युग और काल में इस तथ्य को रेखांकित कर सकते हैं। आज तो स्थिति यह हो गई है कि बड़ी-बड़ी व्यावसायिक-व्यापारिक कंपनियाँ अपने उत्पादनों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटकों का प्रयोग कर रही हैं, सरकारी तंत्र अपनी नीतियों-निर्देशों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक जैसे माध्यम का सहारा लेता है और राजनीतिक दल चुनाव के दिनों में अपने दल के प्रचार-प्रसार के लिए इस विधा की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे में नुक्कड़ नाटकों के बहुविध रूप और रंग दिखाई पड़ते है और ऐसे में इस विधा की वह सही पहचान कहीं खो-सी गई है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे क्रिकेट में एक दिवसीय फटाफट क्रिकेट ने पांच दिवसीय शास्त्रीय क्रिकेट को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है, वीडियो-दूरदर्शन जैसे तुरत-फुरत माध्यमों ने फ़िल्मों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है और रोज़ाना पैदा हो रहे खिचड़ी-संगीत ने शुद्ध शास्त्रीय और कर्णप्रिय संगीत की परंपरा को ही नष्ट कर दिया है।
आख़िर नुक्कड़ नाटक की वह अपनी असली पहचान क्या थी? यह एक ऐसा माध्यम है जो स्वयं लोगों के बीच पहुँचता है, उन्हीं की समस्याओं से रू-ब-रू होता है और उन्हीं की भाषा में संवाद करता है। उसकी भूमिका मुख्यत: विरोध की रहती है क्योंकि उसका उद्देश्य किसी भी तत्कालीन व्यवस्था में ग़लत हो रही बातों की तरफ़ जनमानस का ध्यान आकृष्ट करके उन्हें उसके प्रति जागृत करना है और यदि संभव हो तो उस ग़लत व्यवस्था से लड़ने के लिए तैयार करना है। दूसरे शब्दों में कहे तो नुक्कड़ नाटक की मूल प्रकृति एक उत्प्रेरक की है जो दर्शकों को किसी भी समस्या से साक्षात्कार कराकर यह भी अपेक्षा रखता है कि वे व्यवहार के स्तर पर भी कोई निर्णय लेंगे। एक दूसरे रूप में वह ब्रेख्त के उस महाकाव्यात्मक रंगमंच के 'अलगाव सिद्धांत' से भी मिलता-जुलता है, जहां दर्शक से अपेक्षा की जाति है कि वह कथा के बहाव के साथ न बह जाए वरन उससे दूरी बनाए रखकर उसे देखे और उस पर सोच-विचार कर अपने जीवन में क्रियान्वित करे। नुक्कड़ नाटक की इस मूल प्रकृति ने उसके स्वरूप और संरचना को भी काफ़ी हद तक सुनिश्चित कर दिया-खुले में, चौराहों और बाज़ारों में आती-जाती भीड़ को आकर्षित करना, बहुत कम समय में अपने संदेश को प्रसारित करना और वैयक्तिक चरित्र-चित्रण की बजाय अभिनेताओं की सामूहिक भागीदारी से कथ्य को आगे बढ़ाना। मंचीय तामझाम के मोह को छोड़ते हुए मात्र अभिनेताओं के माध्यम से अथवा अधिक से अधिक एक-आध मंच उपकरणों के प्रयोग से काम चलाना। इस प्रकार नुक्कड़ नाटक सचमुच में एक यायावर मंडली की अपेक्षा रखता है, जो तेजी से क़स्बों, शहरों और गांव-गांव जाकर छोटे-छोटे नाटकों से लोगों की ही अपनी समस्याओं के प्रति उन्हें जागरूक बना सके। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पूरी रचना प्रक्रिया में गीत, संगीत और कभी-कभी नृत्य का भी अपना विशेष योगदान रहता है। यदि ये तत्व अलग से नहीं भी होते तो भी संवादों को बार-बार दोहराने के क्रम से एक शैलीबद्धता अपने आप बनती चली जाती है। कहने का अभिप्राय यही है कि नुक्कड़ नाटक मूलत: एक वैयक्तिक विधा न होकर समूह को अपने साथ लेकर चलती है अर्थात वह अनिवार्य रूप से एक कोरस की अपेक्षा रखती है।
इसलिए नुक्कड़ नाटक एक बहुत ही सशक्त और जीवंत माध्यम है और यह अकारण नहीं कि भारत हो या यूरोप के कुछ पश्चिमी देश - उन्होंने अपनी राजनैतिक विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार के लिए इस विधा को हाथों-हाथ लिया। भारत में अपने वर्तमान रूप में नुक्कड़ नाटकों का इतिहास यदि पचास-साठ साल पुराना है तो पश्चिम में भी तीस साल पहले ही इस तरह की शैली में नाटक खेले जाने लगे। यों भारत में भारतेंदु के 'अंधेर नगरी' को भी इस शैली का पहला आधुनिक नुक्कड़ नाटक माना जा सकता है, जिसका पहला मंचन १८८१ में दशाश्वमेध घाट, बनारस में खुले में हुआ था। बहरहाल, आज़ादी के आंदोलन के दौरान नुक्कड़ नाटकों ने 'इप्टा' के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके बाद भी आज तक कमोबेश उसी रूप में नुक्कड़ नाटकों का मंचन और प्रचलन जारी है।
लेकिन इसके साथ ही नुक्कड़ नाटकों को कुछ सवालों का सामना भी करना पड़ रहा है और वह इस रूप में कि नुक्कड़ नाटक महज़ प्रचार का ही हथकंडा बनकर रह जाए या फिर उसका भी अपना कोई व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र हो सकता है? क्या कारण है कि कथ्य और शिल्प के स्तर पर सभी नुक्कड़ नाटकों का चेहरा एक-सा ही होता जा रहा है? क्या चौराहों, बाज़ारों में लोगों की भीड़ को एकत्रित करके ज़ोर-ज़ोर से एक ही बात को चीख-चिल्ला अथवा गाकर बताने का नाम ही नुक्कड़ नाटक है या कि उसके लिए भी अभिनेताओं की कोई विशेष प्रशिक्षण पद्धति हो सकती है? विरोध और रोज़मर्रा की समस्याओं से अलग भी गहरे व गूढ़ बातों में जाकर क्या नुक्कड़ नाटक उनकी जांच-पड़ताल नहीं कर सकता?
आज से सोलह साल पहले १९८३ में भारत भवन, भोपाल और केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में भोपाल में चार-पांच दिनों का एक नुक्कड़ नाटक महोत्सव हुआ था, जिसमें देश भर से बीस-पच्चीस नुक्कड़ नाट्य मंडलियों ने शिरकत की थी और उपर्युक्त समस्याओं पर भी विचार-विमर्श किया था। उसके बाद फिर कभी नुक्कड़ नाटकों पर ऐसा आयोजन और बहस हुई हो- मेरी जानकारी में नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उस महोत्सव में भी और उसके बाद के कुछ वर्षों में कुछ नाट्य मंडलियों ने निश्चित ही नुक्कड़ नाटकों के बने बनाए ढर्रे को छोड़कर अत्यंत कल्पनाशील मुहावरे में नुक्कड़ नाटकों की रचना और मंचन किए और उनका अपेक्षित असर भी पड़ा। क्या यह अपने आप में एक नाटकीय विडंबना नहीं है कि जहां आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर पर इस शताब्दी के अंतिम दशक में इतनी उथल-पुथल हो रही है, वहां नुक्कड़ नाटकों की वह प्रभावी भूमिका लगभग उदासीन-सी होती जा रही है। अब वह समस्याओं और विचारधारा का वाहक उतना नहीं रह गया है जितना कि बड़ी-बड़ी व्यापारिक कंपनियों के उत्पादनों के प्रचार का एक आकर्षक माध्यम। आज अधिकांश रंगकर्मी नुक्कड़ नाटकों के इसी विकल्प से जुड़े है और बाकायदा अपनी रोज़ी-रोटी पा रहे हैं।
आख़िर ऐसा क्यों हुआ? यदि हम नुक्कड़ नाटकों के संदर्भ में इसका उत्तर खोजने की कोशिश करें तो निश्चित ही कुछ कारण दिए जा सकते हैं। मेरे विचार में नुक्कड़ नाटकों के प्रति बढ़ती उदासीनता का सबसे बड़ा कारण यही है कि शायद आरंभ से ही नुक्कड़ नाट्य विधा को एक बहुत ही सुविधाजनक रास्ता मान लिया गया था। सुविधाजनक इस अर्थ में कि कुछ लोग जुट गए, चौराहे पर पहुँच गए और कुछ भी उछल-कूद, शोर-शराबा करके आगे बढ़ गए। इसी से जुड़ा दूसरा पक्ष यह भी है कि जो लोग इस विधा से विचारधारा के तहत जुड़े थे, उनमें से अधिकांश में उस विचारधारा के प्रति स्वयं में ही कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। और सबसे बड़ा कारण यह भी रहा कि जिस विचारधारा की प्रतिबद्धता के संदर्भ में रंगकर्मियों ने व्यवस्था के विरोध में नुक्कड़ नाटक किए, बाद में उसी विचारधारा की व्यवस्था के स्थापित होने के बाद उनके सामने इस दुविधा ने जन्म लिया कि अब वे किसका विरोध करें? इस उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल और केरल का नाम लिया जा सकता है, जहां वामपंथी विचारधारा के सत्ता में आने के बाद विरोध के रंगमंच की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। यदि चाहें तो कह सकते हैं कि कुछ हद तक प्रचार तंत्र के रूप में संचार माध्यमों की बढ़ती लोकप्रियता ने भी नुक्कड़ नाटकों के चलन-प्रचलन को धक्का पहुँचाया है।
उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में यह जिज्ञासा सहज-स्वाभाविक है कि ऐसे में नुक्कड़ नाटकों का भविष्य क्या होगा? यों तो यह प्रश्न नाटक और रंगमंच जैसी विधा को संपूर्ण रूप से भी संबोधित किया जा सकता है क्यों कि रंगमंच स्वयं में ही एक क्षणभंगुर माध्यम है अर्थात वह दिन-प्रतिदिन पैदा होता है और उसी दिन उसकी मृत्यु भी हो जाती है। उस पर नुक्कड़ नाटक के साथ वह ख़तरा तो और भी गहरे रूप से जुड़ा हुआ है क्योंकि एक तो अपने कलेवर में वह बहुत छोटा होता है और दूसरे तात्कालिक समस्याओं पर आधारित होने के कारण उसका प्रभाव उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाता है। इसीलिए यह भी ज़रूरी है कि उसके अस्तित्व को कैसे बचाकर रखा जाए। इस दिशा में ठोस प्रयत्न किए जाने चाहिए। सबसे पहले इसकी शुरुआत स्वयं उन मंडलियों के सदस्यों की तरफ़ से होनी चाहिए, जो नुक्कड़ नाटकों को मंचित करते रहे हैं और अभी भी सक्रिय हैं। उन्हें एक तरह से अपना आत्मालोचन करना होगा कि वे नुक्कड़ नाटक जैसी विधा में क्यों काम कर रहे हैं? यदि कर रहे हैं तो कैसा काम कर रहे हैं? क्या उन्हें इसके लिए किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस नहीं होती? यदि हां, तो उसके लिए क्या किया जाना चाहिए? दूसरी पहल नाटककारों की तरफ़ से होनी चाहिए। देखा गया है कि नुक्कड़ नाटक को बहुत ही हल्की-फुलकी विधा मानकर रचनाकार बहुत जल्दी-जल्दी इस ओर प्रवृत्त नहीं होते। अत: कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि नए और सशक्त आलेख सामने आएँ, जिन्हें मंचित करने में रंगकर्मियों को भी रचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़े। तीसरा और अंतिम विकल्प यह भी हो सकता है कि राज्य और केंद्रिय स्तर पर नुक्कड़ नाटकों के मंचन की नियमित प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएं। आज भी यदा-कदा जब दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में आयोजित ऐसी नुक्कड़ नाट्य प्रतियोगिताओं में जाने का अवसर मिलता है तो प्राय: ऐसे आलेखों से सामना होता है जो सचमुच में आपको बाहर-भीतर से झिंझोड़कर रख देते हैं और सोचने पर विवश करते हैं। यदि ऐसे ताज़े आलेखों की शुरुआत आज के युवा छात्र लेखकों की तरफ़ से हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि हमारे अनुभवी रचनाकार और भी ज़्यादा जटिल, संश्लिष्ट और गहरे नाट्यलेखों का सृजन न करें।
यदि ऐसा संभव हो जाए तो नुक्कड़ नाटक का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा और उनके मंचन के उसी दौर की वापसी होगी, जिसे नुक्कड़ नाटकों का स्वर्ण युग कहा जाता है अर्थात पचास, साठ और सत्तर के तीन दशक वाला दौर।
यह आलेख १६ जनवरी २००६ का है. – माडरेटर मंडली.

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

निष्ठावान रंगकर्मियों को पहल करनी होगी। - देवेन्द्र राज अंकुर



रंगमंच को जीवित रखने के लिए अक्सर पैसे की कमी का रोना रोया जाता है, लेकिन मेरा मानना है कि आर्थिक साधन पर्याप्त हैं। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय रंगकर्म के नाम पर अलग-अलग मद में खूब पैसा बांट रहा है। निर्माण, भवन, उपकरण के लिए अनुदान की व्यवस्था है। प्रोडक्शन ग्रांट व्यक्ति या संस्था के नाम पर लिया जा सकता है। 

इसके अलावा सैलरी ग्रांट, फैलोशिप, स्कॉलरशिप आदि भी दिए जाते हैं। इतना सब होने के बाद भी रंगकर्म में पर्याप्त प्रगति नहीं हो रही है, क्योंकि पैसे का गलत उपयोग हो रहा है। अनेक मक्कार लोग सरकारी मदद लेकर भी काम नहीं कर रहे हैं। रंगमंच को दोबारा जनप्रिय बनाने निष्ठावान रंगकर्मियों को पहल करनी होगी।

असल में ज्यादातर लोग शौकिया रंगमंच करते रहे हैं। हिंदी ही नहीं, बंगाली या मराठी रंगमंच में भी यही स्थिति है। वहां भी अधिकतर नौकरीपेशा लोग रंगकर्म से जुड़े हैं, लेकिन वहां नाटक देखने की सुदृढ़ परंपरा है, इसीलिए रंगमंच वहां अब भी चल रहे हैं। पहले की तुलना में आज अगर आम आदमी रंगमंच से दूर हो रहा है, तो उसके कुछ कारण भी हैं। दरअसल, आज का रंगमंच डिजाइनर, निर्देशक का माध्यम बनकर रह गया है, अभिनेता के लिए जगह नहीं बची है। 

अभिनेता के पास कैरेक्टर (चरित्र) के रूप में आने का, व्यक्त करने का मौका पहले की तरह, अब नहीं रहा है। टेक्नोलॉजी के बीच कैरेक्टर का असर कम हो गया है, संप्रेषण में अंतर आ गया है। तकनीक की चकाचौंध में कैरेक्टर दिखाई ही नहीं देता है, वह अनेक आवरण में ढंकता जा रहा है। रंगमंच तो जीवंत माध्यम है और यदि हमें इसे जिंदा रखना है, तो उसमें दूसरी चीजों को लादने से बचना होगा। 

वर्तमान में भ्रष्टाचार, महंगाई, सांप्रदायिकता, राजनीतिक छल-फरेब का जोर है, तो इन मसलों पर आधारित नाटक भी इन दिनों ज्यादा खेले जा रहे हैं। आज हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार सबसे ज्वलंत मुद्दा है। 

बुधवार, 2 नवंबर 2011

एनएसडी रोजी-रोटी की गारंटी नहीं दे सकता :देवेन्द्र राज अंकुर


देवेन्द्र राज अंकुर 

आपने कहानी के रंगमंच को क्यों अपनाया? क्या इसके पीछे नाटकों की कमी बड़ी वजह रही? 


बिल्कुल नहीं। नाटकों की कमी न पहले थी न आज है। मैं साहित्य का छात्र था और साथ ही नाटक भी किया करता था। 1972 में एनएसडी से बाहर आने पर मैंने सोचा कि क्या कहानियों को बिना रूपांतरित किए मंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है? 1975 में मैंने रंगमंडल के साथ निर्मल वर्मा की तीन कहानियों का मंचन 'तीन एकांत' नाम से किया, जो बेहद सफल रहा। आज मैं हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगू, कुमायूंनी जैसी भाषाओं में देश-विदेश में 450 से ज्यादा कहानियों का मंचन कर चुका हूं। मुझे खुशी है कि एक जमाने में कहानी के रंगमंच के धुर विरोधी रहेकारंत जी और राजेंद्र नाथ जैसे रंगकर्मिओं ने भी इसे अपनाया  

इन दिनों एनएसडी में दाखिले के लिए आवेदन करने वालों की संख्या लगातार घटती जा रही है। इसका कारण क्या है? 

ऐसा कई बार पहले भी हो चुका है। 1984-85 में जब दूरदर्शन आया था तब भी आवेदकों की संख्या घटी थी। वैसे भी एनएसडी के लिए आवदेकों की संख्या कभी भी 1000 से ज्यादा नहीं रही है। दूसरी बात यह है कि पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में अभिनय का पाठ्यक्रम दोबारा शुरू हो गया है। ऐसे में जिन्हें फिल्मों में ही जाना है वो सीधे पुणे चले जाते हैं। 

रंगकर्मियों के फिल्मों में पलायन को आप किस रूप में देखते हैं? 

जब अभिनेताओं को अलअलग माध्यमों में काम करने का मौका मिले तो वे क्यों न करें। एनएसडी के रंगकर्मियों का फिल्मों में जाना शुरू से हो रहा है। 1961 में पहले बैच के छात्र मधु नायक दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपर स्टार रहे हैं। ओम पुरी, सई परांजपे, नसीरुद्दीन शाह, दीपा शाही, राज बब्बर से लेकर स्वानंद किरकिरे तक लंबी सूची है। चूंकि हिंदी क्षेत्र में फिल्में नहीं बनतीं इसलिए लगता है कि पलायन हो रहा है। दक्षिण भारत में रंगकर्मी एक साथ फिल्म और थियेटर दोनों में सक्रिय हैं। हिंदी में भी नसीरुद्दीन शाह और स्वानंद किरकिरे जैसे कलाकार दोनों माध्यमों में काम कर रहे हैं। 

रंगमंच अपने पैरों पर क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है? आखिर क्यों यह सरकारी मदद या निजी स्पॉन्सरशिप का मोहताज है? 

रंगमंच जैसी विधा कभी भी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती। यह बेहद अर्थ साध्य और सामूहिक कला है। नाटक और रंगमंच का पूरा इतिहास उठाकर देख लीजिए। यह भारत ही नहीं पश्चिम में भी बिना सरकारी या निजी सहायता के कभी आगे नहीं बढ़ पाया है। नाटक घर में तो बैठकर किया नहीं जा सकता। इसमें ऑडिटोरियम से लेकर कॉस्ट्यूम तक बहुत खर्च होता है। फिर नाटक को एक समय में एक ही जगह दिखाया जा सकता है। फिल्म तो एक बार बनने के बाद एक साथ लाखों जगह दिखाई जा सकती है। लेकिन नाटक में यह सुविधा नहीं होती। इसलिए नाटक का खर्च टिकट की बिक्री से नहीं निकाला जा सकता। 

एनएसडी में प्रशिक्षण के बाद रंगकर्मी अपने क्षेत्र की ओर क्यों नहीं लौट रहे हैं ? 

अगर छोटे शहरों के रंगकर्मी वापस अपने शहरों में नहीं लौटना चाहते तो इसमें एनएसडी क्या कर सकता है? हम हर तरह के रंगमंच की जानकारी देते हैं पर वापस लौटना तो कलाकार पर निर्भर करता है। एनएसडी रंगकमिर्यों की रोजी-रोटी की गारंटी नहीं ले सकता। वैसे यह समस्या हिंदी क्षेत्र में ही ज्यादा है। रतन थियम, जयश्री, प्रसन्ना वगैरह तो अपने क्षेत्रों में ही थियेटर कर रहे हैं। हिंदी वाले ही दिल्ली नहीं छोड़ना चाहते। 

हिंदी क्षेत्र में बंगाल, महाराष्ट्र या दक्षिण भारत की तरह रंग दर्शक क्यों नहीं विकसित हो पाए या यूं कहें कि हिंदी रंगमंच की अपनी परंपरा क्यों नहीं विकसित हो पाई?

इसके कई ऐतिहासिक कारण हैं। हिंदी क्षेत्र राजनैतिक रूप से हमेशा अस्थिर रहा है। विदेशी आक्रमणकारी उत्तर भारत की ओर से ही आए। महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और बंगाल अपेक्षाकृत काफी शांत रहे। ऐसे में वहां रंगमंच और दूसरी कलाओं के विकसित होने का ज्यादा मौका मिला। वहीं हिंदी क्षेत्र में दौड़ते-भागते गाने बजाने वाली कला ही विकसित हो पाई। यही वजह है कि सांस्कृतिक रूप से उस तरह विकसित ही नहीं हो पाया। 

इंटरनेट, ब्लॉग और सोशल नेटवकिंर्ग के इस दौर में थियेटर के अस्तित्व पर क्या खतरा नहीं है?
 
देखिए, जितनी भी मशीन आ जाए, तकनीक आ जाए रंगमंच अपनी जीवंतता की वजह से जीवित रहेगा। तकनीक की उम्र बहुत छोटी होती है। पेजर कब मोबाइल में बदल गया और डेस्कटॉप कंप्यूटर लैपटॉप से होते हुए मोबाइल में समा गया, पता ही नहीं चला। लेकिन रंगमंच हजारों साल से तमाम हमलों के बावजूद जिंदा है और आगे भी रहेगा। इसकी वजह है रंगमंच की सामूहिकता और सामाजिकता।

प्रस्तुति : शुभाष चन्द्र मोर्या


मंगलवार, 1 नवंबर 2011

साहित्य और रंगमंच


देवेन्द्र राज अंकुर

"साहित्य ने ही नाटक और रंगमंच को जन्म दिया था। बहुत दिनों तक नाटककार को ही कवि की संज्ञा से जाना जाता था। यह तो कोई बहुत दूर की बात नहीं है कि साहित्यकार बहुत सी विधाओं में एक साथ रचना-कर्म करते रहते थे। मसलन केवल हिन्दी साहित्य को ही लें तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल, भीष्म साहनी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, अमृतराय, विष्णु प्रभाकर, रमेश बक्षी और गिरिराज किशोर, लेकिन धीरे-धीरे ऐसा क्यों होने लगा कि हिन्दी के लेखक और साहित्यकार नाटक और रंगमंच की दुनिया से कटते चले गए और बहुत से जाने-पहचाने लेखकों ने नाटक लिखना लगभग छोड़ ही दिया। इस उदासी-अलगाव और दूरी के क्या कोई कारण ढूंढ़े जा सकते हैं


सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य तो यही है कि पिछले पचास वर्षों में साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ अथवा और कोई भी बड़ा पुरस्कार किसी हिन्दी नाटक और नाटककार को नहीं दिया गया है। हां, अपवाद के रूप में सुरेन्द्र वर्मा और गिरिराज किशोर का नाम ज़रूर लिया जा सकता है, लेकिन उन्हें भी नाटक के लिए नहीं, अपने उपन्यासों सुरेन्द्र वर्मा को 'मुझे चांद चाहिए' के लिए तथा गिरिराज किशोर को 'ढाई घर' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। हिन्दी के नाटक और नाटककार यदि पुरस्कृत हुए भी तो संगीत नाटक अकादमी द्वारा, न कि साहित्य अकादमी द्वारा। चाहे वह मोहन राकेश हों, धर्मवीर भारती हों, लक्ष्मीनारायण लाल हों, उपेन्द्रनाथ अश्क हों या फिर दयाप्रकाश सिन्हा हों, क्या इसका अर्थ यह लिया जाए कि हिन्दी में सचमुच कोई ऐसा श्रेष्ठ और सशक्त नाट्य-लेखक अभी भी सामने नहीं आया है, जिसे किसी साहित्यिक पुरस्कार के योग्य माना जा सके ? क्या इसका यह अर्थ लगाया जाए कि नाटक-लेखन को साहित्य का हिस्सा ही नहीं माना जाता और उसे रंगमंच तक ही सीमित कर दिया गया है ? क्या इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि हिन्दी में अच्छे नाटकों के न होने अथवा लिखे जाने की जो बात बार-बार की जाती है, वह अच्छे रचनाकारों के नाट्य-लेखन से जुड़े न होने की सच्चाई में निहित है ? ज़ाहिर है कि ये सारे सवाल जितने अलग-अलग दीखते हैं उतने ही शायद एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। यदि हम कम-से-कम पिछले 150 सालों के इतिहास की छान-बीन करें तो निश्चय ही हमारे हाथ में कुछ ऐसे सूत्र आएंगे जिनके माध्यम से हमें अपने सवालों के जवाब हासिल करने होंगे। 

इस दिशा में सबसे पहली शुरूआत भारतेन्दु से ही की जाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतेन्दु ने नाटकों के अलावा कविता, संस्मरण, यात्रा-विवरण और निबंध भी खूब जमकर लिखे। एक संपादक के रूप में बहुत सी साहित्यिक पत्रिकाओं की शुरूआत की और बहुत सी मंडलियां बनाई, जिनमें साहित्यिक गोष्ठियां हुआ करती थीं। इतना ही नहीं, भारतेन्दु स्वयं भी यायावर प्रकृति के थे और लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण करते रहते थे। इन सारी चीजों के पीछे लगातार एक ही भावना काम कर रही थी कि कैसे हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जाए। साहित्य को समाज के अलग-अलग वर्गों से जोड़ा जाए और सबसे ज्यादा नाटक विधा के माध्यम से ये सारे काम कैसे किए जाएं। उन्होंने बहुत जल्दी पहचान लिया था कि नाटक जैसी विधा के माध्यम से ये सारे काम बहुत आ सानी से संपन्न किए जा सकते हैं, क्योंकि नाटक अपने मंचित रूप में सीधे-सीधे समाज से जुड़ता है। अतः यह स्वाभाविक ही था कि उन्होंने मात्र रचनाकार के रूप में ही नहीं, वरन्‌ अभिनेता, व्यवस्थापक और निर्देशक के रूप में भी नाटक और रंगमंच के साथ अपना रिश्ता जोड़ा। इसीलिए यह संभव हुआ, क्योंकि बेशक भारतेन्दु ने बहुत सी विधाओं में रचना-कर्म किया, लेकिन उनकी सही पहचान एक नाटककार के रूप में ही हुई। 

यह बात काफ़ी हद तक जयशंकर प्रसाद के बारे में भी कही जा सकती है। वह भी कहानीकार हैं, उपन्यासकार हैं, बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनकी नाटककार के रूप में अलग से कोई पहचान नहीं है। देखा जाए तो कवि और नाटककार, उनके ये दोनों पक्ष एक-दूसरे के समानान्तर हैं। एक ओर यदि छायावादी युग के सबसे बड़े कवि के रूप में जयशंकर प्रसाद को जाना जाता है तो दूसरी ओर भारतीय रंगमंच के उतने ही बड़े नाटककार के रूप में भी। यदि कविता में 'लहर', 'आंसू' और 'कामायनी' जैसी बड़ी काव्य-कृतियां साहित्य में हमेशा अपना निश्चित स्थान बनाए रखेंगी तो उसी तरह से रंगमंच में 'चन्द्रगुप्त', 'स्कन्दगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' भी हमेशा चर्चा के केन्द्र में रहेंगे। इतना ही नहीं, बेशक़ प्रसाद के नाटक उनके अपने समय में बहुत ज्यादा मंचित न हुए हों, बेशक़ वह स्वयं एक व्यावहारिक रंगकर्मी के रूप में रंगमंच से न जुड़े रहे हों, लेकिन फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जितनी चर्चा, जितना विवाद और जितना प्रचार-प्रसार पिछले 70-75 वर्षों में जयशंकर प्रसाद के नाटकों का हुआ है, उतना शायद ही किसी और नाटककार के नाटकों का हुआ हो। इसके एक-दो कारण और दिए जा सकते हैं- एक तो यही कि उन नाटकों की अनभिनेयता को लेकर विद्वानों, अध्येताओं और रंगकर्मियों के बीच कितनी ही दुविधा क्यों न हो, पाठ्य-पुस्तकों के रूप में प्रसाद का लगभग हर नाटक देश के सभी बी.ए.,एम.ए. के हिन्दी-पाठ्यक्रमों में शुरू से लगा हुआ है। इसीलिए इन नाटकों के लगातार प्रकाशित होने वाले संस्करणों से इस बात की पुष्टि हो जाती है। दूसरी ओर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परिप्रेक्ष्य में प्रसाद जिस तरह से अपने नाटकों के कथानक सुदूर, लेकिन गौरवमय अतीत में से ढूंढ़कर लाए, उसने जनमानस पर बहुत गहरा असर डाला और साहित्य, समाज तथा रंगमंच को एक-दूसरे के बहुत नज़दीक ला दिया। शायद ही कोई ऐसा विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय हो, जहां प्रसाद का 'ध्रुवस्वामिनी' न खेला गया हो।



प्रसाद के अपने नाटक और रंगमंच संबंधी विचारों ने भी साहित्य और रंगमंच दोनों क्षेत्रों में अच्छा-खासा विवाद पैदा कर दिया था। जब उन्होंने अपनी इस स्थापना को सामने रखा कि "नाटक के लिए रंगमंच होना चाहिए, न कि रंगमंच के लिए नाटक"। इसी के साथ उनका एक और विचार भी बहुत महत्वपूर्ण है, जिसकी तरफ प्रायः कम ध्यान दिया गया है, उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में लिखा है कि- "यदि हिन्दी भाषा का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है तो वह नाटक जैसे माध्यम से ही संभव हो सकता है। क्योंकि जब तक कोई भाषा ज्यादा-से-ज्यादा व्यवहार में नहीं आती अर्थात बोली नहीं जाती तब तक उसका प्रचार-प्रसार संभव नहीं है और नाटक जैसी विधा यह सुविधा स्वयं ही प्रदान करती है।" उन्होंने इस संदर्भ में पारसी नाटकों की लोकप्रियता का भी यही कारण दिया। इतिहास भी साक्षी है कि जब तक एक हजार ई. के आसपास तक संस्कृत भाषा बोलचाल का माध्यम रही तब तक वह समाज की मुख्य भाषा रही, लेकिन उसके बाद व्यवहार से कटते जाने के कारण वह मात्र पढ़ने-पढ़ाने तक सीमित होकर रह गई और उसका समाज से गहरा रिश्ता नहीं रह गया। 


लेकिन प्रसाद ही वो पहले नाटककार भी हैं, जिन्होंने नाटक को लेकर पाठ्य-नाटक और मंचित नाटक जैसे विभाजन को पैदा होने और बढ़ाने में एक अलग भूमिका निभाई। इससे पहले आदिकाल से लेकर प्रसाद तक भारतीय अथवा विश्व रंगमंच में कहीं भी इस तरह के विभाजन की कोई अवधारणा नहीं थी। साहित्य और रंगमंच दोनों भूमियों पर बराबरी के साथ प्रतिष्ठित था, लेकिन प्रसाद के बाद से लेकर आज तक जब भी नाटक और रंगमंच, साहित्य और रंगमंच के आपसी संबंधों की चर्चा होती है तो यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा का केन्द्र बना रहता है कि नाटक को साहित्य का हिस्सा माना जाए अथवा रंगमंच का। यह अलग बात है कि इस परस्पर विरोधी धारणा को पुष्ट करने में जितना योगदान प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन और दूसरे बड़े-बड़े लेकिन निरर्थक शोध-ग्रंथों ने दिया उससे कहीं अधिक वे रंगकर्मी भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने नाटकों को पढ़े या मंचित किए बिना ही उन्हें अनभिनेय घोषित कर दिया। 

प्रसाद के आगे के कम-से-कम बीस साल एक और वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से रेखांकित किए जा सकते हैं जिसकी वज़ह से यदि एक तरफ़ साहित्य और रंगमंच के बीच की दूरी बढ़ती चली गई तो दूसरी तरफ़ अनायास और शायद अनजाने में भी ये दोनों विधाएं एक-दूसरे के बहुत नज़दीक आ गईं। यह वैज्ञानिक विकास था भारतीय समाज में रेडियो जैसे ध्वनि-माध्यम का जन्म और फ़िल्म जैसे आरंभ में मूक और बाद में ध्वनि के जुड़ाव से एक दृश्य के माध्यम के रूप में बोलती फ़िल्मों का प्रादुर्भाव। हुआ यह कि रेडियो के लिए लघु नाटकों, एकांकियों, रूपकों, वार्ताओं और कथा-पाठ की ज़रूरतों ने ज्यादातर साहित्यकारों को अपनी ओर खींच लिया। एक समय तो ऐसा था जब हिन्दी का हर बड़ा लेखक और साहित्यकार किसी-न-किसी रूप में रेडियो से ही जुड़ा हुआ था। ज़ाहिर है कि रेडियो के लिए लिखने की रचना-प्रक्रिया ने उन्हें रंगमंच जैसे दृश्य माध्यम से दूर कर दिया। बाद में यदि वही लोग किसी दृश्य माध्यम से जुड़े भी तो वह रंगमंच की बज़ाय फ़िल्म के रूप में उनके सामने मौजूद था। एक तो फ़िल्म से मिलने वाला ज्यादा मेहनताना और दूसरे एक ही समय में बहुत बड़े जन-समुदाय द्वारा देखे जा सकने की संभावनाओं में सभी बड़े-बड़े लेखकों को अपनी ओर आकर्षित एवं प्रलोभित किया। पारसी नाटकों के अधिकांश अभिनेता और नाटककार, हिन्दी में उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा और यहां तक कि प्रेमचंद भी फ़िल्मों के ज़ादुई आकर्षण से अछूते न रह सके। लेकिन जब बाद में इन सब लोगों का रेडियो और विशेष रूप से फ़िल्मों से मोहभंग हो गया तो ये कहानी, कविता, उपन्यास के साथ-साथ नाटक की ओर भी लौटे। एक तरह से उन्होंने उपर्युक्त दोनों लिखे गए आलेखों को ही रंगमंचीय आलेखों के रूप में परिवर्तित किया। 

सन्‌ 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के साथ-साथ इप्टा के जन्म ने एक बार फिर से साहित्य, रंगमंच और दूसरी कलाओं के बीच की दूरियों को कम करने की कोशिश की। ज़ाहिर है इसके पीछे देश की आज़ादी के लिए किए जाने वाले संघर्ष की भावना भी सब में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिसने सभी विधाओं के लोगों को एक ही मंच पर आने के लिए प्रेरित किया। अतः यह स्वाभाविक ही था कि चालीस-पचास के दशक में साहित्य और रंगमंच एक-दूसरे के बहुत नज़दीक थे। लेकिन जैसे ही आज़ादी मिलने के साथ वह उद्देश्य पूरा हो गया तो सब कला-माध्यमों के लोग अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए। फिर भी 50-70 तक कम-से-कम हिन्दी में दूसरी विधाओं के लेखकों का रंगमंच से गहरा रिश्ता बना रहा। मोहन राकेश इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, जिन्होंने शुरूआत एक कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में की और बाद में पूरी तरह से नाटक और रंगमंच को समर्पित हो गए। उनके साथ सबसे बड़ी सुविधा यह भी रही कि उनके सभी नाटक हिन्दी रंगमंच की लगभग सभी व्यावसायिक और अव्यावसायिक संस्थाओं द्वारा खेले गए। क़मोबेश यही स्थिति सुरेन्द्र वर्मा, बलराज पंडित, मणि मधुकर, शंकर शेष, भीष्म साहनी, असग़र वजाहत और रमेश बक्षी के नाटकों के साथ भी रही कि जैसे ही वे लिखे गए उसके तुरंत बाद उनका मंचन भी होता रहा। 

पिछली शताब्दी के अंतिम बीस वर्षों में दूरदर्शन, वीडियो, फ़िल्म, कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसे संचार माध्यमों के तेज़ी से भारतीय परिवेश में हस्तक्षेप के साथ साहित्य और रंगमंच की परस्पर दूरी बढ़ती गई। यह दूरी सिर्फ़ साहित्य और रंगमंच की दुनिया में ही दिखाई नहीं दी, वरन्‌ स्वयं रंगमंच को भी लगभग छोड़ने की स्थिति आ गई थी। जब एक साथ बहुत से अभिनेताओं ने उपर्युक्त माध्यमों की तरफ़ प्रस्थान किया। 80-90 के बीच एक बार तो ऐसा लगा कि शायद ये अभिनेता अब पुनः रंगमंच की तरफ़ लौटकर नहीं आएंगे, लेकिन बहुत जल्दी ही यह भ्रम टूट गया। उन अभिनेताओं ने दूरदर्शन पर लगातार अभिनय करने से जो अनुभव पाया, उससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आपका चेहरा उस माध्यम में कितने भी दिनों तक दर्शकों के सामने आता रहे, लेकिन अन्ततः उसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। जब कि रंगमंच में अभिनेता बेशक़ सिर्फ़ दो-तीन घंटे के लिए ही मंच पर होता है, लेकिन तब भी उसके जीवंत अभिनय की याद दर्शकों के मन-मस्तिष्क में वर्षों तक अंकित रहती है। ठीक यही बात साहित्य की दुनिया से जुड़े रचनाकारों ने भी महसूस की कि जितना स्थायित्व प्रकाशित शब्द का है उतना संचार माध्यमों में बोले जाने वाले का नहीं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे लोग अपने मूल माध्यम अर्थात साहित्य की तरफ़ लौटकर आएं। पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार और नई-नई पुस्तकों के प्रकाशन से यह तथ्य स्वयंसिद्ध हो जाता है। 

लेकिन इस घर-वापसी के बावजूद साहित्य और रंगमंच के बीच की दूरी को अभी तक पूरी तरह से ख़त्म नहीं किया जा सका है। सच्चाई तो यह है कि इधर वह दूरी और ज्यादा बढ़ती जा रही है। इसका एक कारण तो यह भी हो सकता है कि आज रंगमंच में अव्यावसायिक स्तर पर वह सक्रियता ही पूरी तरह से ग़ायब हो गई है, जो 60-80 तक के बीस वर्षों में कम दिखाई पड़ती थी। आख़िर साहित्यकार नाटक लिखे भी तो किसके लिए ? दूसरा कारण यह भी दिया गया कि जब कहानियों और उपन्यासों का नाट्य-रूपान्तरों के बहाने से अथवा सीधे-सीधे अपने मूलरूप में ही मंचन होना संभव हो गया है तो फिर साहित्यकार अलग से नाट्य-लेखन की तरफ़ क्यों प्रवृत्त हों ? लेकिन यह तर्क अपने आप में बेहद कमज़ोर है। होना तो यह चाहिए था कि अपनी कहानियों और उपन्यासों को मंच पर प्रस्तुत होते देखने के बाद साहित्यकार नाट्य-रचना के लिए आगे आते। जैसा कि पिछले 70-80 सालों में लगातार होता रहा था। रेडियो से जुड़े रहकर भी जगदीशचन्द्र माथुर, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट ने नाटक लिखना बंद नहीं किया। कहानीकार और उपन्यासकार प्रेमचंद, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', अज्ञेय और भुवनेश्वर ने भी नाट्य-रचना की। आज हम भुवनेश्वर को एक कवि और कहानीकार से ज्यादा एक नाटककार के रूप में याद करते हैं। फिर आज वैसी स्थिति क्यों नहीं है ? क्या नाटकों का मंचन नहीं हो पाता इसलिए ? मैं सोचता हूं कि ये सारे सवाल ऐसे हैं जिन पर साहित्य और रंगमंच से जुड़े लोगों को आपस मे मिलकर विचार-विमर्श करना चाहिए, क्योंकि नाटक का जितना संबंध रंगमंच से है उससे कहीं ज्यादा साहित्य से है। कहा तो यहां तक जाना चाहिए कि पहले नाटक को एक साहित्यिक कृति के रूप में ही अपनी पहचान बनानी होती है। उसके प्रस्तुति आलेख की यात्रा तो उसके बाद ही शुरू होती है। यदि कोई नाटक साहित्य के धरातल पर ख़रा, गहरा और जीवन्त उतरता है तो यह निश्चित है कि उसकी रंगमंचीयता भी उतनी ही सशक्त होगी। कहानीकार, उपन्यासकार यदि इस अनुभव को लेकर गहराई से सोच-विचार करें तो कोई कारण नहीं कि वह नाट्य-रचना में प्रवृत्त न हों। इतिहास साक्षी है कि आज कालिदास, भवभूति, जयशंकर प्रसाद, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल, मोहन राकेश आदि साहित्यकारों को भी उन्यासकार से ज्यादा एक नाटककार के रूप में जाना जाता है।"



कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रामगोपाल बजाज ने अपने वक्तव्य में कहा- "रंगमंच नाटक से अधिक व्यापक शब्द है। हम साहित्य, कला, संगीत, अभिनय इसीलिए देखते-सुनते हैं क्योंकि हम मौजूदा समय में बंधकर नहीं रहना चाहते। इच्छा, स्मृति और कल्पना हमें भूत, भविष्य और वर्तमान में आलोड़ित करती रहती है। जुड़ना हमारी प्रकृति का अनिवार्य तत्व है और रंगमंच की बुनियाद भी यही है।'' 


श्री बजाज ने कहा- "जो साहित्यिक नहीं है वह नाटकीय और रंगमंचीय हो ही नहीं सकता। नाटक और साहित्य का आधारभूत सिद्धांत एक ही है। कल्पना करने की स्थिति में जो अभिभूत करता है वह नाटक ही है। संवेदना और अनुभूति साहित्य और रंगमंच के मूल आधार हैं।''

कार्यक्रम के संयोजक हिन्दी भवन के मंत्री डॉ0 गोविन्द व्यास ने अपने आरंभिक वक्तव्य में धर्मवीरजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए तथा साहित्य और रंगमंच को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए विषय की सामयिकता को रेखांकित किया। श्री अंकुर का व्याख्यान सुनने के लिए अनेक नाट्यकर्मी और हिन्दीप्रेमियों के अलावा देश के लब्धप्रतिष्ठ अस्थिरोग सर्जन डॉ0 पी0 के0 दवे की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय थी।

गली गली में नुक्कड़ नाटक


-देवेंद्रराज अंकुर
पूर्व हो या पश्चिम - यों तो नाटक और रंगमंच की शुरुआत ही खुले में हुई अर्थात नुक्कड़ ही वह पहला स्थान था जो नाटकों के खेलने में इस्तेमाल हुआ। आदिम युग में सब लोग दिन भर शिकार करने के बाद शाम को अपने-अपने शिकार के साथ कही खुले में एक घेरा बनाकर बैठ जाते थे और उस घेरे के बीचो-बीच ही उनका भोजन पकता रहता, खान-पान होता और वही बाद में नाचना-गाना होता।

इस प्रकार शुरू से ही नुक्कड़ नाटकों से जुड़े तीन ज़रूरी तत्वों की उपस्थिति इस प्रक्रिया में भी शामिल थी - प्रदर्शन स्थल के रूप में एक घेरा, दर्शकों और अभिनेताओं का अंतरंग संबंध और सीधे-सीधे दर्शकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े कथानकों, घटनाओं और नाटकों का मंचन। इसी का विकसित रूप हमें तब भी देखने को मिलता है जब आज से लगभग ढ़ाई-तीन हज़ार वर्ष पहले यूनान में थेस्पिस नामक अभिनेता घोड़ागाड़ी या भैसागाड़ी में सामान लादकर, शहर-शहर घूमकर सड़कों पर, चौराहों पर अथवा बाज़ारों में अकेला ही नाटकों का मंचन किया करता था।

स्वयं भारत में भी इसी समय के आस-पास अथवा इससे भी पूर्व से लव और कुश नाम के दो कथावाचकों के माध्यम से रामायण महाकाव्य को जगह-जगह जाकर, गाकर सुनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। ये लव-कुश राम के पुत्रों के रूप में तो प्रसिद्ध हैं ही, बाद में इन्हीं के समांतर नट या अभिनेता को भी हमारे यहां कुशीलव के नाम से ही जाना जाने लगा। संभवत: यही कारण है कि नाटकों के लगातार खुले में मंचित होते रहने के मद्देनज़र भरत ने भी अपने नाट्यशास्त्र में दशरूपक विवेचन के अंतर्गत 'वीथि' नामक रूपक का भी उल्लेख किया है। आज भी आंध्र प्रदेश में लोकनाट्य परंपरा की एक शैली का नाम की 'वीथि नाटकम' मिलता है और आधुनिक नुक्कड़ नाटक अथवा स्ट्रीट थिएटर को भी इसी नाम से जाना जाता है।

मध्यकाल में सही रूप में नुक्कड़ नाटकों से मिलती-जुलती नाट्य-शैली का जन्म और विकास यदि भारत के विभिन्न प्रांतों, क्षेत्रों और बोलियों-भाषाओं में लोक नाटकों के रूप में हुआ तो उसी के समांतर पश्चिम में भी चर्च अथवा धार्मिक नाटकों के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन आदि देशों में ऐसे नाटकों का प्रचलन शुरू हुआ जो बाइबिल की घटनाओं पर आधारित होते थे और मूलत: धर्म के प्रचार के लिए ही खेले जाते थे। ये नाटक भी खुले में, मैदानों, और चौराहों और बाज़ारों में ही मंचित किए जाते थे और दिन की रोशनी में ही, जबकि हमारे यहां नाटक लगभग अपने आरंभ काल से ही ज़्यादातर रात में ही खेले जाते थे। इसके लिए हमारे यहां की तत्कालीन जीवन-व्यवस्था तो ज़िम्मेदार थी ही, अर्थात दिन भर खेतों में काम करने के बाद, रात में ही उन्हें ऐसे मनोरंजन की ज़रूरत पड़ती थी जो उनकी थकान मिटा सके।

इतना ही नहीं, रात के साथ ही इस तरह के प्रदर्शनों, मनोरंजनों का जुड़ना समाज में उपस्थित एक सुरक्षित जीवन-पद्धति की तरफ़ भी इंगित करता है जबकि पश्चिम में स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। वहां मध्यकाल में, दिन में नाटकों के मंचन की आवश्यकता का जन्म ही इसलिए हुआ था कि लोग शाम ढलने से पहले ही सुरक्षित अपने घरों को लौट सकें। मध्यकाल में आविर्भूत इन्हीं धार्मिक नाटकों ने आज के नुक्कड़ नाटकों से जुड़े एक और आवश्यक तत्व को जन्म दिया और वह है प्रचार के लिए नाटक विधा का प्रयोग।

वास्तव में प्रचार ही वह मूल मंत्र है, जो नुक्कड़ नाटकों के वर्तमान स्वरूप, संरचना और इतिहास से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। आज जिस रूप में हम नुक्कड़ नाटकों को जानते है, उनका इतिहास भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान कौमी तरानों, प्रभात फेरियों और विरोध के जुलूसों के रूप में देखा जा सकता है। इसी का एक विधिवत रूप 'इप्टा' जैसी संस्था के जन्म के रूप में सामने आया, जब पूरे भारत में अलग-अलग कला माध्यमों के लोग एक साथ आकर मिले और क्रांतिकारी गीतों, नाटकों व नृत्यों के मंचनों और प्रदर्शनों से विदेशी शासन एवं सत्ता का विरोध आरंभ हुआ। इस प्रकार किसी भी गल़त व्यवस्था का विरोध और उसके समांतर एक आदर्श व्यवस्था क्या हो सकती है - यही वह संरचना है, जिस पर नुक्कड़ नाटक की धुरी टिकी हुई है। कभी वह किस्से-कहानियों का प्रचार था, कभी धर्म और कभी राजनैतिक विचारधारा। किसी भी युग और काल में इस तथ्य को रेखांकित कर सकते हैं। आज तो स्थिति यह हो गई है कि बड़ी-बड़ी व्यावसायिक-व्यापारिक कंपनियाँ अपने उत्पादनों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटकों का प्रयोग कर रही हैं, सरकारी तंत्र अपनी नीतियों-निर्देशों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक जैसे माध्यम का सहारा लेता है और राजनीतिक दल चुनाव के दिनों में अपने दल के प्रचार-प्रसार के लिए इस विधा की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे में नुक्कड़ नाटकों के बहुविध रूप और रंग दिखाई पड़ते है और ऐसे में इस विधा की वह सही पहचान कहीं खो-सी गई है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे क्रिकेट में एक दिवसीय फटाफट क्रिकेट ने पांच दिवसीय शास्त्रीय क्रिकेट को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है, वीडियो-दूरदर्शन जैसे तुरत-फुरत माध्यमों ने फ़िल्मों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है और रोज़ाना पैदा हो रहे खिचड़ी-संगीत ने शुद्ध शास्त्रीय और कर्णप्रिय संगीत की परंपरा को ही नष्ट कर दिया है।

आख़िर नुक्कड़ नाटक की वह अपनी असली पहचान क्या थी? यह एक ऐसा माध्यम है जो स्वयं लोगों के बीच पहुँचता है, उन्हीं की समस्याओं से रू-ब-रू होता है और उन्हीं की भाषा में संवाद करता है। उसकी भूमिका मुख्यत: विरोध की रहती है क्यों कि उसका उद्देश्य किसी भी तत्कालीन व्यवस्था में ग़लत हो रही बातों की तरफ़ जनमानस का ध्यान आकृष्ट करके उन्हें उसके प्रति जागृत करना है और यदि संभव हो तो उस ग़लत व्यवस्था से लड़ने के लिए तैयार करना है। दूसरे शब्दों में कहे तो नुक्कड़ नाटक की मूल प्रकृति एक उत्प्रेरक की है जो दर्शकों को किसी भी समस्या से साक्षात्कार कराकर यह भी अपेक्षा रखता है कि वे व्यवहार के स्तर पर भी कोई निर्णय लेंगे। एक दूसरे रूप में वह ब्रेख्त के उस महाकाव्यात्मक रंगमंच के 'अलगाव सिद्धांत' से भी मिलता-जुलता है, जहां दर्शक से अपेक्षा की जाति है कि वह कथा के बहाव के साथ न बह जाए वरन उससे दूरी बनाए रखकर उसे देखे और उस पर सोच-विचार कर अपने जीवन में क्रियान्वित करे। नुक्कड़ नाटक की इस मूल प्रकृति ने उसके स्वरूप और संरचना को भी काफ़ी हद तक सुनिश्चित कर दिया-खुले में, चौराहों और बाज़ारों में आती-जाती भीड़ को आकर्षित करना, बहुत कम समय में अपने संदेश को प्रसारित करना और वैयक्तिक चरित्र-चित्रण की बजाय अभिनेताओं की सामूहिक भागीदारी से कथ्य को आगे बढ़ाना। मंचीय तामझाम के मोह को छोड़ते हुए मात्र अभिनेताओं के माध्यम से अथवा अधिक से अधिक एक-आध मंच उपकरणों के प्रयोग से काम चलाना। इस प्रकार नुक्कड़ नाटक सचमुच में एक यायावर मंडली की अपेक्षा रखता है, जो तेजी से क़स्बों, शहरों और गांव-गांव जाकर छोटे-छोटे नाटकों से लोगों की ही अपनी समस्याओं के प्रति उन्हें जागरूक बना सके। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पूरी रचना प्रक्रिया में गीत, संगीत और कभी-कभी नृत्य का भी अपना विशेष योगदान रहता है। यदि ये तत्व अलग से नहीं भी होते तो भी संवादों को बार-बार दोहराने के क्रम से एक शैलीबद्धता अपने आप बनती चली जाती है। कहने का अभिप्राय यही है कि नुक्कड़ नाटक मूलत: एक वैयक्तिक विधा न होकर समूह को अपने साथ लेकर चलती है अर्थात वह अनिवार्य रूप से एक कोरस की अपेक्षा रखती है।

इसलिए नुक्कड़ नाटक एक बहुत ही सशक्त और जीवंत माध्यम है और यह अकारण नहीं कि भारत हो या यूरोप के कुछ पश्चिमी देश - उन्होंने अपनी राजनैतिक विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार के लिए इस विधा को हाथों-हाथ लिया। भारत में अपने वर्तमान रूप में नुक्कड़ नाटकों का इतिहास यदि पचास-साठ साल पुराना है तो पश्चिम में भी तीस साल पहले ही इस तरह की शैली में नाटक खेले जाने लगे। यों भारत में भारतेंदु के 'अंधेर नगरी' को भी इस शैली का पहला आधुनिक नुक्कड़ नाटक माना जा सकता है, जिसका पहला मंचन १८८१ में दशाश्वमेध घाट, बनारस में खुले में हुआ था। बहरहाल, आज़ादी के आंदोलन के दौरान नुक्कड़ नाटकों ने 'इप्टा' के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके बाद भी आज तक कमोबेश उसी रूप में नुक्कड़ नाटकों का मंचन और प्रचलन जारी है।

लेकिन इसके साथ ही नुक्कड़ नाटकों को कुछ सवालों का सामना भी करना पड़ रहा है और वह इस रूप में कि नुक्कड़ नाटक महज़ प्रचार का ही हथकंडा बनकर रह जाए या फिर उसका भी अपना कोई व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र हो सकता है? क्या कारण है कि कथ्य और शिल्प के स्तर पर सभी नुक्कड़ नाटकों का चेहरा एक-सा ही होता जा रहा है? क्या चौराहों, बाज़ारों में लोगों की भीड़ को एकत्रित करके ज़ोर-ज़ोर से एक ही बात को चीख-चिल्ला अथवा गाकर बताने का नाम ही नुक्कड़ नाटक है या कि उसके लिए भी अभिनेताओं की कोई विशेष प्रशिक्षण पद्धति हो सकती है? विरोध और रोज़मर्रा की समस्याओं से अलग भी गहरे व गूढ़ बातों में जाकर क्या नुक्कड़ नाटक उनकी जांच-पड़ताल नहीं कर सकता?

आज से सोलह साल पहले १९८३ में भारत भवन, भोपाल और केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में भोपाल में चार-पांच दिनों का एक नुक्कड़ नाटक महोत्सव हुआ था, जिसमें देश भर से बीस-पच्चीस नुक्कड़ नाट्य मंडलियों ने शिरकत की थी और उपर्युक्त समस्याओं पर भी विचार-विमर्श किया था। उसके बाद फिर कभी नुक्कड़ नाटकों पर ऐसा आयोजन और बहस हुई हो- मेरी जानकारी में नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उस महोत्सव में भी और उसके बाद के कुछ वर्षों में कुछ नाट्य मंडलियों ने निश्चित ही नुक्कड़ नाटकों के बने बनाए ढर्रे को छोड़कर अत्यंत कल्पनाशील मुहावरे में नुक्कड़ नाटकों की रचना और मंचन किए और उनका अपेक्षित असर भी पड़ा। क्या यह अपने आप में एक नाटकीय विडंबना नहीं है कि जहां आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर पर इस शताब्दी के अंतिम दशक में इतनी उथल-पुथल हो रही है, वहां नुक्कड़ नाटकों की वह प्रभावी भूमिका लगभग उदासीन-सी होती जा रही है। अब वह समस्याओं और विचारधारा का वाहक उतना नहीं रह गया है जितना कि बड़ी-बड़ी व्यापारिक कंपनियों के उत्पादनों के प्रचार का एक आकर्षक माध्यम। आज अधिकांश रंगकर्मी नुक्कड़ नाटकों के इसी विकल्प से जुड़े है और बाकायदा अपनी रोज़ी-रोटी पा रहे हैं।

आख़िर ऐसा क्यों हुआ? यदि हम नुक्कड़ नाटकों के संदर्भ में इसका उत्तर खोजने की कोशिश करें तो निश्चित ही कुछ कारण दिए जा सकते हैं। मेरे विचार में नुक्कड़ नाटकों के प्रति बढ़ती उदासीनता का सबसे बड़ा कारण यही है कि शायद आरंभ से ही नुक्कड़ नाट्य विधा को एक बहुत ही सुविधाजनक रास्ता मान लिया गया था। सुविधाजनक इस अर्थ में कि कुछ लोग जुट गए, चौराहे पर पहुँच गए और कुछ भी उछल-कूद, शोर-शराबा करके आगे बढ़ गए। इसी से जुड़ा दूसरा पक्ष यह भी है कि जो लोग इस विधा से विचारधारा के तहत जुड़े थे, उनमें से अधिकांश में उस विचारधारा के प्रति स्वयं में ही कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। और सबसे बड़ा कारण यह भी रहा कि जिस विचारधारा की प्रतिबद्धता के संदर्भ में रंगकर्मियों ने व्यवस्था के विरोध में नुक्कड़ नाटक किए, बाद में उसी विचारधारा की व्यवस्था के स्थापित होने के बाद उनके सामने इस दुविधा ने जन्म लिया कि अब वे किसका विरोध करें? इस उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल और केरल का नाम लिया जा सकता है, जहां वामपंथी विचारधारा के सत्ता में आने के बाद विरोध के रंगमंच की आवश्यकता ही समाप्त हो गई। यदि चाहें तो कह सकते हैं कि कुछ हद तक प्रचार तंत्र के रूप में संचार माध्यमों की बढ़ती लोकप्रियता ने भी नुक्कड़ नाटकों के चलन-प्रचलन को धक्का पहुँचाया है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में यह जिज्ञासा सहज-स्वाभाविक है कि ऐसे में नुक्कड़ नाटकों का भविष्य क्या होगा? यों तो यह प्रश्न नाटक और रंगमंच जैसी विधा को संपूर्ण रूप से भी संबोधित किया जा सकता है क्यों कि रंगमंच स्वयं में ही एक क्षणभंगुर माध्यम है अर्थात वह दिन-प्रतिदिन पैदा होता है और उसी दिन उसकी मृत्यु भी हो जाती है। उस पर नुक्कड़ नाटक के साथ वह ख़तरा तो और भी गहरे रूप से जुड़ा हुआ है क्यों कि एक तो अपने कलेवर में वह बहुत छोटा होता है और दूसरे तात्कालिक समस्याओं पर आधारित होने के कारण उसका प्रभाव उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाता है। इसीलिए यह भी ज़रूरी है कि उसके अस्तित्व को कैसे बचाकर रखा जाए। इस दिशा में ठोस प्रयत्न किए जाने चाहिए। सबसे पहले इसकी शुरुआत स्वयं उन मंडलियों के सदस्यों की तरफ़ से होनी चाहिए, जो नुक्कड़ नाटकों को मंचित करते रहे हैं और अभी भी सक्रिय हैं। उन्हें एक तरह से अपना आत्मालोचन करना होगा कि वे नुक्कड़ नाटक जैसी विधा में क्यों काम कर रहे हैं? यदि कर रहे हैं तो कैसा काम कर रहे हैं? क्या उन्हें इसके लिए किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस नहीं होती? यदि हां, तो उसके लिए क्या किया जाना चाहिए? दूसरी पहल नाटककारों की तरफ़ से होनी चाहिए। देखा गया है कि नुक्कड़ नाटक को बहुत ही हल्की-फुलकी विधा मानकर रचनाकार बहुत जल्दी-जल्दी इस ओर प्रवृत्त नहीं होते। अत: कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि नए और सशक्त आलेख सामने आएँ, जिन्हें मंचित करने में रंगकर्मियों को भी रचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़े। तीसरा और अंतिम विकल्प यह भी हो सकता है कि राज्य और केंद्रिय स्तर पर नुक्कड़ नाटकों के मंचन की नियमित प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएं। आज भी यदा-कदा जब दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में आयोजित ऐसी नुक्कड़ नाट्य प्रतियोगिताओं में जाने का अवसर मिलता है तो प्राय: ऐसे आलेखों से सामना होता है जो सचमुच में आपको बाहर-भीतर से झिंझोड़कर रख देते हैं और सोचने पर विवश करते हैं। यदि ऐसे ताज़े आलेखों की शुरुआत आज के युवा छात्र लेखकों की तरफ़ से हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि हमारे अनुभवी रचनाकार और भी ज़्यादा जटिल, संश्लिष्ट और गहरे नाट्यलेखों का सृजन न करें।

यदि ऐसा संभव हो जाए तो नुक्कड़ नाटक का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा और उनके मंचन के उसी दौर की वापसी होगी, जिसे नुक्कड़ नाटकों का स्वर्ण युग कहा जाता है अर्थात पचास, साठ और सत्तर के तीन दशक वाला दौर।

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

साहित्य और रंगमंच : देवेंद्रराज अंकुर

साहित्य ने ही नाटक और रंगमंच को जन्म दिया था। बहुत दिनों तक नाटककार को ही कवि की संज्ञा से जाना जाता था। यह तो कोई बहुत दूर की बात नहीं है कि साहित्यकार बहुत सी विधाओं में एक साथ रचना-कर्म करते रहते थे। मसलन केवल हिन्दी साहित्य को ही लें तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल, भीष्म साहनी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, अमृतराय, विष्णु प्रभाकर, रमेश बक्षी और गिरिराज किशोर, लेकिन धीरे-धीरे ऐसा क्यों होने लगा कि हिन्दी के लेखक और साहित्यकार नाटक और रंगमंच की दुनिया से कटते चले गए और बहुत से जाने-पहचाने लेखकों ने नाटक लिखना लगभग छोड़ ही दिया। इस उदासी-अलगाव और दूरी के क्या कोई कारण ढूंढ़े जा सकते हैं ?

सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य तो यही है कि पिछले पचास वर्षों में साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ अथवा और कोई भी बड़ा पुरस्कार किसी हिन्दी नाटक और नाटककार को नहीं दिया गया है। हां, अपवाद के रूप में सुरेन्द्र वर्मा और गिरिराज किशोर का नाम ज़रूर लिया जा सकता है, लेकिन उन्हें भी नाटक के लिए नहीं, अपने उपन्यासों सुरेन्द्र वर्मा को 'मुझे चांद चाहिए' के लिए तथा गिरिराज किशोर को 'ढाई घर' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। हिन्दी के नाटक और नाटककार यदि पुरस्कृत हुए भी तो संगीत नाटक अकादमी द्वारा, कि साहित्य अकादमी द्वारा। चाहे वह मोहन राकेश हों, धर्मवीर भारती हों, लक्ष्मीनारायण लाल हों, उपेन्द्रनाथ अश्क हों या फिर दयाप्रकाश सिन्हा हों, क्या इसका अर्थ यह लिया जाए कि हिन्दी में सचमुच कोई ऐसा श्रेष्ठ और सशक्त नाट्य-लेखक अभी भी सामने नहीं आया है, जिसे किसी साहित्यिक पुरस्कार के योग्य माना जा सके ? क्या इसका यह अर्थ लगाया जाए कि नाटक-लेखन को साहित्य का हिस्सा ही नहीं माना जाता और उसे रंगमंच तक ही सीमित कर दिया गया है ? क्या इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि हिन्दी में अच्छे नाटकों के होने अथवा लिखे जाने की जो बात बार-बार की जाती है, वह अच्छे रचनाकारों के नाट्य-लेखन से जुड़े होने की सच्चाई में निहित है ? ज़ाहिर है कि ये सारे सवाल जितने अलग-अलग दीखते हैं उतने ही शायद एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। यदि हम कम-से-कम पिछले 150 सालों के इतिहास की छान-बीन करें तो निश्चय ही हमारे हाथ में कुछ ऐसे सूत्र आएंगे जिनके माध्यम से हमें अपने सवालों के जवाब हासिल करने होंगे।

इस दिशा में सबसे पहली शुरूआत भारतेन्दु से ही की जाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतेन्दु ने नाटकों के अलावा कविता, संस्मरण, यात्रा-विवरण और निबंध भी खूब जमकर लिखे। एक संपादक के रूप में बहुत सी साहित्यिक पत्रिकाओं की शुरूआत की और बहुत सी मंडलियां बनाई, जिनमें साहित्यिक गोष्ठियां हुआ करती थीं। इतना ही नहीं, भारतेन्दु स्वयं भी यायावर प्रकृति के थे और लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण करते रहते थे। इन सारी चीजों के पीछे लगातार एक ही भावना काम कर रही थी कि कैसे हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जाए। साहित्य को समाज के अलग-अलग वर्गों से जोड़ा जाए और सबसे ज्यादा नाटक विधा के माध्यम से ये सारे काम कैसे किए जाएं। उन्होंने बहुत जल्दी पहचान लिया था कि नाटक जैसी विधा के माध्यम से ये सारे काम बहुत आसानी से संपन्न किए जा सकते हैं, क्योंकि नाटक अपने मंचित रूप में सीधे-सीधे समाज से जुड़ता है। अतः यह स्वाभाविक ही था कि उन्होंने मात्र रचनाकार के रूप में ही नहीं, वरन्अभिनेता, व्यवस्थापक और निर्देशक के रूप में भी नाटक और रंगमंच के साथ अपना रिश्ता जोड़ा। इसीलिए यह संभव हुआ, क्योंकि बेशक भारतेन्दु ने बहुत सी विधाओं में रचना-कर्म किया, लेकिन उनकी सही पहचान एक नाटककार के रूप में ही हुई।

यह बात काफ़ी हद तक जयशंकर प्रसाद के बारे में भी कही जा सकती है। वह भी कहानीकार हैं, उपन्यासकार हैं, बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनकी नाटककार के रूप में अलग से कोई पहचान नहीं है। देखा जाए तो कवि और नाटककार, उनके ये दोनों पक्ष एक-दूसरे के समानान्तर हैं। एक ओर यदि छायावादी युग के सबसे बड़े कवि के रूप में जयशंकर प्रसाद को जाना जाता है तो दूसरी ओर भारतीय रंगमंच के उतने ही बड़े नाटककार के रूप में भी। यदि कविता में 'लहर', 'आंसू' और 'कामायनी' जैसी बड़ी काव्य-कृतियां साहित्य में हमेशा अपना निश्चित स्थान बनाए रखेंगी तो उसी तरह से रंगमंच में 'चन्द्रगुप्त', 'स्कन्दगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' भी हमेशा चर्चा के केन्द्र में रहेंगे। इतना ही नहीं, बेशक़ प्रसाद के नाटक उनके अपने समय में बहुत ज्यादा मंचित हुए हों, बेशक़ वह स्वयं एक व्यावहारिक रंगकर्मी के रूप में रंगमंच से जुड़े रहे हों, लेकिन फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जितनी चर्चा, जितना विवाद और जितना प्रचार-प्रसार पिछले 70-75 वर्षों में जयशंकर प्रसाद के नाटकों का हुआ है, उतना शायद ही किसी और नाटककार के नाटकों का हुआ हो। इसके एक-दो कारण और दिए जा सकते हैं- एक तो यही कि उन नाटकों की अनभिनेयता को लेकर विद्वानों, अध्येताओं और रंगकर्मियों के बीच कितनी ही दुविधा क्यों हो, पाठ्य-पुस्तकों के रूप में प्रसाद का लगभग हर नाटक देश के सभी बी..,एम.. के हिन्दी-पाठ्यक्रमों में शुरू से लगा हुआ है। इसीलिए इन नाटकों के लगातार प्रकाशित होने वाले संस्करणों से इस बात की पुष्टि हो जाती है। दूसरी ओर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परिप्रेक्ष्य में प्रसाद जिस तरह से अपने नाटकों के कथानक सुदूर, लेकिन गौरवमय अतीत में से ढूंढ़कर लाए, उसने जनमानस पर बहुत गहरा असर डाला और साहित्य, समाज तथा रंगमंच को एक-दूसरे के बहुत नज़दीक ला दिया। शायद ही कोई ऐसा विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय हो, जहां प्रसाद का 'ध्रुवस्वामिनी' खेला गया हो।

प्रसाद के अपने नाटक और रंगमंच संबंधी विचारों ने भी साहित्य और रंगमंच दोनों क्षेत्रों में अच्छा-खासा विवाद पैदा कर दिया था। जब उन्होंने अपनी इस स्थापना को सामने रखा कि "नाटक के लिए रंगमंच होना चाहिए, कि रंगमंच के लिए नाटक" इसी के साथ उनका एक और विचार भी बहुत महत्वपूर्ण है, जिसकी तरफ प्रायः कम ध्यान दिया गया है, उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में लिखा है कि- "यदि हिन्दी भाषा का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है तो वह नाटक जैसे माध्यम से ही संभव हो सकता है। क्योंकि जब तक कोई भाषा ज्यादा-से-ज्यादा व्यवहार में नहीं आती अर्थात बोली नहीं जाती तब तक उसका प्रचार-प्रसार संभव नहीं है और नाटक जैसी विधा यह सुविधा स्वयं ही प्रदान करती है।" उन्होंने इस संदर्भ में पारसी नाटकों की लोकप्रियता का भी यही कारण दिया। इतिहास भी साक्षी है कि जब तक एक हजार . के आसपास तक संस्कृत भाषा बोलचाल का माध्यम रही तब तक वह समाज की मुख्य भाषा रही, लेकिन उसके बाद व्यवहार से कटते जाने के कारण वह मात्र पढ़ने-पढ़ाने तक सीमित होकर रह गई और उसका समाज से गहरा रिश्ता नहीं रह गया।

लेकिन प्रसाद ही वो पहले नाटककार भी हैं, जिन्होंने नाटक को लेकर पाठ्य-नाटक और मंचित नाटक जैसे विभाजन को पैदा होने और बढ़ाने में एक अलग भूमिका निभाई। इससे पहले आदिकाल से लेकर प्रसाद तक भारतीय अथवा विश्व रंगमंच में कहीं भी इस तरह के विभाजन की कोई अवधारणा नहीं थी। साहित्य और रंगमंच दोनों भूमियों पर बराबरी के साथ प्रतिष्ठित था, लेकिन प्रसाद के बाद से लेकर आज तक जब भी नाटक और रंगमंच, साहित्य और रंगमंच के आपसी संबंधों की चर्चा होती है तो यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा का केन्द्र बना रहता है कि नाटक को साहित्य का हिस्सा माना जाए अथवा रंगमंच का। यह अलग बात है कि इस परस्पर विरोधी धारणा को पुष्ट करने में जितना योगदान प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन और दूसरे बड़े-बड़े लेकिन निरर्थक शोध-ग्रंथों ने दिया उससे कहीं अधिक वे रंगकर्मी भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने नाटकों को पढ़े या मंचित किए बिना ही उन्हें अनभिनेय घोषित कर दिया

प्रसाद के आगे के कम-से-कम बीस साल एक और वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से रेखांकित किए जा सकते हैं जिसकी वज़ह से यदि एक तरफ़ साहित्य और रंगमंच के बीच की दूरी बढ़ती चली गई तो दूसरी तरफ़ अनायास और शायद अनजाने में भी ये दोनों विधाएं एक-दूसरे के बहुत नज़दीक गईं। यह वैज्ञानिक विकास था भारतीय समाज में रेडियो जैसे ध्वनि-माध्यम का जन्म और फ़िल्म जैसे आरंभ में मूक और बाद में ध्वनि के जुड़ाव से एक दृश्य के माध्यम के रूप में बोलती फ़िल्मों का प्रादुर्भाव। हुआ यह कि रेडियो के लिए लघु नाटकों, एकांकियों, रूपकों, वार्ताओं और कथा-पाठ की ज़रूरतों ने ज्यादातर साहित्यकारों को अपनी ओर खींच लिया। एक समय तो ऐसा था जब हिन्दी का हर बड़ा लेखक और साहित्यकार किसी--किसी रूप में रेडियो से ही जुड़ा हुआ था। ज़ाहिर है कि रेडियो के लिए लिखने की रचना-प्रक्रिया ने उन्हें रंगमंच जैसे दृश्य माध्यम से दूर कर दिया। बाद में यदि वही लोग किसी दृश्य माध्यम से जुड़े भी तो वह रंगमंच की बज़ाय फ़िल्म के रूप में उनके सामने मौजूद था। एक तो फ़िल्म से मिलने वाला ज्यादा मेहनताना और दूसरे एक ही समय में बहुत बड़े जन-समुदाय द्वारा देखे जा सकने की संभावनाओं में सभी बड़े-बड़े लेखकों को अपनी ओर आकर्षित एवं प्रलोभित किया। पारसी नाटकों के अधिकांश अभिनेता और नाटककार, हिन्दी में उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा और यहां तक कि प्रेमचंद भी फ़िल्मों के ज़ादुई आकर्षण से अछूते रह सके। लेकिन जब बाद में इन सब लोगों का रेडियो और विशेष रूप से फ़िल्मों से मोहभंग हो गया तो ये कहानी, कविता, उपन्यास के साथ-साथ नाटक की ओर भी लौटे। एक तरह से उन्होंने उपर्युक्त दोनों लिखे गए आलेखों को ही रंगमंचीय आलेखों के रूप में परिवर्तित किया।

सन्‌ 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के साथ-साथ इप्टा के जन्म ने एक बार फिर से साहित्य, रंगमंच और दूसरी कलाओं के बीच की दूरियों को कम करने की कोशिश की। ज़ाहिर है इसके पीछे देश की आज़ादी के लिए किए जाने वाले संघर्ष की भावना भी सब में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिसने सभी विधाओं के लोगों को एक ही मंच पर आने के लिए प्रेरित किया। अतः यह स्वाभाविक ही था कि चालीस-पचास के दशक में साहित्य और रंगमंच एक-दूसरे के बहुत नज़दीक थे। लेकिन जैसे ही आज़ादी मिलने के साथ वह उद्देश्य पूरा हो गया तो सब कला-माध्यमों के लोग अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए। फिर भी 50-70 तक कम-से-कम हिन्दी में दूसरी विधाओं के लेखकों का रंगमंच से गहरा रिश्ता बना रहा। मोहन राकेश इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, जिन्होंने शुरूआत एक कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में की और बाद में पूरी तरह से नाटक और रंगमंच को समर्पित हो गए। उनके साथ सबसे बड़ी सुविधा यह भी रही कि उनके सभी नाटक हिन्दी रंगमंच की लगभग सभी व्यावसायिक और अव्यावसायिक संस्थाओं द्वारा खेले गए। क़मोबेश यही स्थिति सुरेन्द्र वर्मा, बलराज पंडित, मणि मधुकर, शंकर शेष, भीष्म साहनी, असग़र वजाहत और रमेश बक्षी के नाटकों के साथ भी रही कि जैसे ही वे लिखे गए उसके तुरंत बाद उनका मंचन भी होता रहा।

पिछली शताब्दी के अंतिम बीस वर्षों में दूरदर्शन, वीडियो, फ़िल्म, कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसे संचार माध्यमों के तेज़ी से भारतीय परिवेश में हस्तक्षेप के साथ साहित्य और रंगमंच की परस्पर दूरी बढ़ती गई। यह दूरी सिर्फ़ साहित्य और रंगमंच की दुनिया में ही दिखाई नहीं दी, वरन्स्वयं रंगमंच को भी लगभग छोड़ने की स्थिति गई थी। जब एक साथ बहुत से अभिनेताओं ने उपर्युक्त माध्यमों की तरफ़ प्रस्थान किया। 80-90 के बीच एक बार तो ऐसा लगा कि शायद ये अभिनेता अब पुनः रंगमंच की तरफ़ लौटकर नहीं आएंगे, लेकिन बहुत जल्दी ही यह भ्रम टूट गया। उन अभिनेताओं ने दूरदर्शन पर लगातार अभिनय करने से जो अनुभव पाया, उससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आपका चेहरा उस माध्यम में कितने भी दिनों तक दर्शकों के सामने आता रहे, लेकिन अन्ततः उसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। जब कि रंगमंच में अभिनेता बेशक़ सिर्फ़ दो-तीन घंटे के लिए ही मंच पर होता है, लेकिन तब भी उसके जीवंत अभिनय की याद दर्शकों के मन-मस्तिष्क में वर्षों तक अंकित रहती है। ठीक यही बात साहित्य की दुनिया से जुड़े रचनाकारों ने भी महसूस की कि जितना स्थायित्व प्रकाशित शब्द का है उतना संचार माध्यमों में बोले जाने वाले का नहीं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे लोग अपने मूल माध्यम अर्थात साहित्य की तरफ़ लौटकर आएं। पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार और नई-नई पुस्तकों के प्रकाशन से यह तथ्य स्वयंसिद्ध हो जाता है।

लेकिन इस घर-वापसी के बावजूद साहित्य और रंगमंच के बीच की दूरी को अभी तक पूरी तरह से ख़त्म नहीं किया जा सका है। सच्चाई तो यह है कि इधर वह दूरी और ज्यादा बढ़ती जा रही है। इसका एक कारण तो यह भी हो सकता है कि आज रंगमंच में अव्यावसायिक स्तर पर वह सक्रियता ही पूरी तरह से ग़ायब हो गई है, जो 60-80 तक के बीस वर्षों में कम दिखाई पड़ती थी। आख़िर साहित्यकार नाटक लिखे भी तो किसके लिए ? दूसरा कारण यह भी दिया गया कि जब कहानियों और उपन्यासों का नाट्य-रूपान्तरों के बहाने से अथवा सीधे-सीधे अपने मूलरूप में ही मंचन होना संभव हो गया है तो फिर साहित्यकार अलग से नाट्य-लेखन की तरफ़ क्यों प्रवृत्त हों ? लेकिन यह तर्क अपने आप में बेहद कमज़ोर है। होना तो यह चाहिए था कि अपनी कहानियों और उपन्यासों को मंच पर प्रस्तुत होते देखने के बाद साहित्यकार नाट्य-रचना के लिए आगे आते। जैसा कि पिछले 70-80 सालों में लगातार होता रहा था। रेडियो से जुड़े रहकर भी जगदीशचन्द्र माथुर, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट ने नाटक लिखना बंद नहीं किया। कहानीकार और उपन्यासकार प्रेमचंद, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', अज्ञेय और भुवनेश्वर ने भी नाट्य-रचना की। आज हम भुवनेश्वर को एक कवि और कहानीकार से ज्यादा एक नाटककार के रूप में याद करते हैं। फिर आज वैसी स्थिति क्यों नहीं है ? क्या नाटकों का मंचन नहीं हो पाता इसलिए ? मैं सोचता हूं कि ये सारे सवाल ऐसे हैं जिन पर साहित्य और रंगमंच से जुड़े लोगों को आपस मे मिलकर विचार-विमर्श करना चाहिए, क्योंकि नाटक का जितना संबंध रंगमंच से है उससे कहीं ज्यादा साहित्य से है। कहा तो यहां तक जाना चाहिए कि पहले नाटक को एक साहित्यिक कृति के रूप में ही अपनी पहचान बनानी होती है। उसके प्रस्तुति आलेख की यात्रा तो उसके बाद ही शुरू होती है। यदि कोई नाटक साहित्य के धरातल पर ख़रा, गहरा और जीवन्त उतरता है तो यह निश्चित है कि उसकी रंगमंचीयता भी उतनी ही सशक्त होगी। कहानीकार, उपन्यासकार यदि इस अनुभव को लेकर गहराई से सोच-विचार करें तो कोई कारण नहीं कि वह नाट्य-रचना में प्रवृत्त हों। इतिहास साक्षी है कि आज कालिदास, भवभूति, जयशंकर प्रसाद, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल, मोहन राकेश आदि साहित्यकारों को भी उन्यासकार से ज्यादा एक नाटककार के रूप में जाना जाता है।"

कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रामगोपाल बजाज ने अपने वक्तव्य में कहा- "रंगमंच नाटक से अधिक व्यापक शब्द है। हम साहित्य, कला, संगीत, अभिनय इसीलिए देखते-सुनते हैं क्योंकि हम मौजूदा समय में बंधकर नहीं रहना चाहते। इच्छा, स्मृति और कल्पना हमें भूत, भविष्य और वर्तमान में आलोड़ित करती रहती है। जुड़ना हमारी प्रकृति का अनिवार्य तत्व है और रंगमंच की बुनियाद भी यही है।''

श्री बजाज ने कहा- "जो साहित्यिक नहीं है वह नाटकीय और रंगमंचीय हो ही नहीं सकता। नाटक और साहित्य का आधारभूत सिद्धांत एक ही है। कल्पना करने की स्थिति में जो अभिभूत करता है वह नाटक ही है। संवेदना और अनुभूति साहित्य और रंगमंच के मूल आधार हैं।''

कार्यक्रम के संयोजक हिन्दी भवन के मंत्री डॉ0 गोविन्द व्यास ने अपने आरंभिक वक्तव्य में धर्मवीरजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए तथा साहित्य और रंगमंच को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए विषय की सामयिकता को रेखांकित किया। श्री अंकुर का व्याख्यान सुनने के लिए अनेक नाट्यकर्मी और हिन्दीप्रेमियों के अलावा देश के लब्धप्रतिष्ठ अस्थिरोग सर्जन डॉ0 पी0 के0 दवे की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय थी।