रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

महेंद्र मिश्र : जीवन एवं सांस्कृतिक परिचय



यह आलेख मुन्ना कुमार पाण्डे  के ब्लॉग जन्नत टॉकिज  से साभार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है | कुछ महीने पहले वहाँ इन्होने इस महत्वपूर्ण आलेख का प्रकाशन कई किश्तों में किया था | आखिरी किश्त का प्रकाशन अभी बाकि है | - माडरेटर मंडली |



[ भोजपुरी समाज में जब भी किसी सांस्कृतिक शख्सियत की बात पूछी जाती है,लोग बड़े गर्व से भिखारी ठाकुर का नाम लेते हैं | यह अच्छी बात है,इससे इनकार नहीं परन्तु यह उतनी ही दुखद बात है कि,भोजपुरी समाज के एक और बड़े रत्न 'महेंद्र मिश्र ' पता नहीं क्यों लोगों को याद नहीं हैं | अगर कुछ लोगों को महेंद्र मिश्र याद भी हैं तो उनका विस्तृत विवरण उन्हें नहीं मालूम | हालांकि रवीन्द्र भारती ने 'कंपनी उस्ताद'नामक नाटक लिख कर और संजय उपाध्याय ने इसे मंचित कर इस अनभिज्ञता को काफी हद तक कम किया है | इस बीच मुझे महेंद्र मिश्र पर एक लेख बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की 'परिषद् पत्रिका '(अप्रैल २००७ से मार्च २००८)में डॉ. सुरेश कुमार मिश्र का 'महेंद्र मिश्र :जीवन एवं सांस्कृतिक परिचय 'नाम से मिला | उस लेख को आप सभी सुधीजनों के लिए ज्यों का त्यों साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ | इस लेख को ब्लॉग जगत में आप पाठकों के समक्ष लाने का कोई व्यावसायिक प्रयोजन नहीं है,अपितु सांस्कृतिक चाहना है ,जो संभवतः एक जागरूक भोजपुरी भाषी होने के नाते ही उपजी है | उम्मीद है डॉ.सुरेश मिश्र जी इस स्थिति को समझेंगे | लेख किस स्तर का है इसे प्रबुद्ध वर्ग देखें पर यहाँ इसे प्रस्तुत करने का उद्देश्य मात्र मिश्र जी के बारे में जानकारी मुहैया करना है |- मोडरेटर जन्नत टाकिज ]

महेंद्र मिश्र या महेंदर मिसिर का नाम बिहार एवं उत्तर प्रदेश के लोकगीतकारों में सर्वोपरि है | वे लोकगीत की दुनिया के सम्मानित बादशाह थे | उनकी रचित'पूरबी'वहाँ-वहाँ तक पहुँची है,जहाँ-जहाँ भोजपुरी सभ्यता,संस्कृति एवं भोजपुरी भाषा पहुँची है |'हद्द छाड़ी बेहद्द भया' | मारीशस,फिजी,सूरीनाम तक उनकी पूरबी तथा अन्य गीत पहुँच चुके हैं | इतनी व्याप्ति का कारण यह रहा है कि,उनका कृतित्व अनेक विरोधी रचना-तत्वों से बना था और वे सिर्फ गायक ही नहीं,अपितु आशुकवि,संगीतकार,कीर्तनकार,प्रवचनकर्ता और धर्मोपदेशक भी थे | अपनी पूरी जिंदगी में उन्होंने कभी दूसरों द्वारा रचित गीत नहीं गया | हमेशा स्वरचित गीत ही गाते रहे | 
जिस समय हिंदी की संत काव्य परंपरा के अंतिम कवि श्रीधर दस,धरनी दास और लक्ष्मी सखी आदि की रचनायें बिहार और उत्तर प्रदेश की भोजपुरी भाषी जनता में गूँज रही थी और भोजपुरी मिट्टी को काव्य और आध्यात्म की सौंधी खुशबू से जीवंत बना रही थी,उसी समय महेंद्र मिश्र की रचनायें भी समाजोद्धार एवं राष्ट्रीयता के आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करा रही थीं | समाज के प्रति एक सजग साहित्यकार की भूमिका का निर्वाह करते हुए श्री मिश्र जी ने हिंदी में भी लिखा,भोजपुरी में भी लिखा और हिंदी-भोजपुरी मिश्रित काव्य-भाषा का निर्माण किया | यह तत्कालीन युग-धर्म की माँग थी | यह उनके लेखन का एक प्रयोगमय पक्ष ही कहा जायेगा कि,उन्होंने सिर्फ भोजपुरी भाषा में नहीं लिखा | संभवतः उनके समक्ष एक विराट क्षेत्र उपस्थित था,जो ना सिर्फ खड़ी बोली जानता था, सिर्फ भोजपुरी बल्कि दोनों भाषाओं का प्रयोग रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में करता था और आज भी करता है |
महेंद्र मिश्र को लिखित-अलिखित भोजपुरी लोकगीतों की एक लम्बी और समृद्ध परंपरा मिली थी, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने एक विशाल वांग्मय की रचना की | मगर भोजपुरी भाषी जनता के भोजपुरिया संस्कारों ने उनके गुणों को कम ही स्वीकृति दी | उनके जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में अनेक अप्रमाणिक घटनाओं को जोड़कर एक मनोहर और रोमांचक वायवीय मिथक का निर्माण किया जाता रहा | इसका परिणाम हुआ कि,उनका वास्तविक जीवन-वृत्त और सम्पूर्ण कवि-कर्म गौण एवं विलुप्त होता गया | कभी-कभी तो कल्पित घटनाओं का इतना सुन्दर,मोहक वितान खड़ा किया गया कि, ऐसा प्रतीत होने लगता है कि,वे ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, कोई मिथकीय पात्र हैं | 
वस्तुतः,महेंद्र मिश्र भोजपुरी भाषा और साहित्य को उर्ध्वमुखी दिशा प्रदान करने वाले, उसमें काव्य और आध्यात्म के माध्यम से गंभीर जीवन दर्शन का पुट भरने वाले और अश्विनी कुमारों की तरह जीवन को जीने वाले एक जागरूक कवि थे | तन-मन से एक समर्पित गायक और प्रसंग तथा अवसर के अनुरूप कविता रच लेने की सारस्वत क्षमता के कारण उनकी कविता में गेयता का स्थान सर्वोपरि है | बिलकुल वैसे ही जैसे तुलसी,सुर,निराला और महादेवी वर्मा में है और जैसे उनके रचनाओं के काव्य और संगीतात्मकता को अलग नहीं किया जा सकता | 
महेंद्र मिश्र का जन्म सारण जिला (बिहार) के मुख्यालय छपरा से १२ किलोमीटर उत्तर स्थित जलालपुर प्रखंड से सटे एक गाँव कांही मिश्रवलिया में १६ मार्च,१८८६ को मंगलवार को हुआ | कांही और मिश्रवलिया दोनों गाँव सटे हैं | बीच में एक नाला अथवा नारा था,जिसके किनारे कांही पर होने के कारण इस गाँव का नाम कांही मिश्रवलिया कहा जाने लगा | इस गाँव में अन्य जातियों के लोग भी थे पर ब्राह्मणों की जनसँख्या अधिक थी,आज भी है | ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण-मिश्र पदवीधारी लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के लगुनही धर्मपुरा से आकर बस गये थे | संभवतः रोज़ी-रोटी और शांति की तलाश में ये लोग पश्चिम से पूर्व की तरफ बढ़े थे | गाँव में आकर बसने वाले प्रथम व्यक्ति का पता नहीं चलता पर महेंद्र मिश्र के छोटे भाई श्री बटेश्वर मिश्र जो आज भी जीवित हैं,की बात मानें तो उस प्रथम व्यक्ति की पाँचवीं पीढ़ी में महेंद्र मिश्र का जन्म हुआ था |
मिश्र जी के परिवार के सदस्य बताते हैं कि महेंद्र मिश्र का जन्म किसी शिवभद्र दास साधु के आशीर्वाद से हुआ था और उसी साधु की इच्छानुसार बालक का नाम महेंद्र हुआ | स्वाभाविक है, ऐसी घटना का कोई प्रमाण नहीं है | महेंद्र मिश्र के पिता का नाम था - शिवशंकर मिश्र | संपन्न परिवार के थे | छपरा के तत्कालीन जमींदार हलिवंत सहाय के वसूली क्षेत्र (असूलात) के एक छोटे जमींदार थे तथा दोनों में गहरी मित्रता थी | शिवशंकर मिश्र हलिवंत सहाय के पुजारी नहीं थे - जैसा कुछ लोगों ने कल्पना कर लिया है | संतान होने की दीर्ध प्रतिक्षोपरांत पत्थर पर दूब की तरह महेंद्र मिश्र का जन्म हुआ |
इस समय मिश्रवलिया में एक संस्कृत पाठशाला चलता था | लेकिन महेंद्र मिश्र के बालमन से उस नियमित और रटंत संस्कृत शिक्षा से विद्रोह करते हुए कभी उसे मन से स्वीकार नहीं किया | उनके आचार्य थे पंडित नान्हू मिश्र जो विद्वान पंडितों की श्रेणी में आते थे | पाठशाला उन्हीं के दरवाजे पर चलता था | गाँव के बीच में एक जोड़ा मंदिर था जहाँ हनुमान जी का अखाड़ा था | मंदिर के प्रांगण में हमेशा रामायण मण्डली द्वारा गायन-वादन होता था | अखाड़े में हमेशा कुश्तियाँ होती रहती थीं | रामायण मण्डली का प्रभाव,संगीत के प्रति आकर्षण और कुश्ती के रोमांच ने महेंद्र मिश्र को शिक्षा के अखाड़े से बाहर कर दिया | रामायण सुनने और गाने की अभिरुचि बढ़ी तो फिर बढती ही गयी | कालान्तर में वे बढ़िया घोड़ा रखने के शौक़ीन बने छरहरे बदन के पहलवान बने और सजीले गठीले बदन वाले कड़क मूँछ के जवान बने |
घर के लोगों की विशेष कोशिश से वे उन्हीं पंडित नान्हूँ मिश्र की पाठशाला में वे जाने लगे | वहाँ अध्ययन कम ही हुआ,श्रवण और मनन अधिक हुआ | जिस समय पंडित जी संस्कृत के जिज्ञासु और शास्त्री-आचार्य के छात्रों को अभिज्ञान शाकुंतलम,रघुवंशम और ऋतु संहारम आदि का प्रबोध कराते उस समय वे चुपचाप सबकुछ सुनते | कुछ समझते,कुछ नहीं समझते | इस तरह संस्कृत साहित्य के भक्ति-काव्य,श्रृंगार-काव्य और प्रकृति-वर्णन की परम्परा से उनका परिचय हुआ | वातावरण ने असर दिखाया | उनके भीतर जो कवि-गीतकार सुषुप्त पड़ा था,आँख मलते अंगड़ाईयाँ लेने लगा | अध्ययन के स्थान पर सरस्वती-पुत्र ने गुनगुनाना सीखा | बुद्धि और भाव देखकर लोगों ने कहना शुरू किया इस बालक की जिह्वा पर सरस्वती का स्थान है | काव्यशास्त्रीय भाषा में जिसे 'प्रतिभा' कहा गया है,वही ईश्वरीय प्रतिभा दृष्टिगोचर होने लगी | विधिवत कोई विद्यालयी उपाधि उन्हें प्राप्त हुई,इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता | उनके सम्पूर्ण लेखन में आये तत्सम शब्दों का प्रयोग,यत्र-तत्र संस्कृत में उद्धृत संस्कृत के श्लोक तथा विधिवत पौराणिक प्रसंग आदि सिद्ध करते हैं कि,किसी किसी रूप में संस्कृत साहित्य से वे परिचित अवश्य थे |
जिस समय शिवशंकर मिश्र का निधन हुआ उस समय बाबू हलिवंत सहाय का सितारा गर्दिश में था | उनके पट्टीदार लोगों से संपत्ति पर हक़ के लिए उनका मुकदमा चल रहा था | हलिवंत सहाय विधुर थे,इस बीच उनको एक सलाहकार और विश्वस्त व्यक्ति की जरुरत थी | मुजफ्फरपुर की एक प्रसिद्ध गायिका और नर्तकी की बेटी ढेलाबाई का अपहरण कर छपरा लाने में वे महेंद्र मिश्र की भूमिका से परिचित हो चुके थे | फलतः हलिवंत सहाय ने उन्हें अपनी पूरी संपत्ति का ट्रस्टी बना दिया था | असल में महेंद्र मिश्र उनके अन्तरंग सखा,एक मात्र शुभचिंतक अभिभावक और सलाहकार बन चुके थे | हलिवंत सहाय ने ढेलाबाई को अपनी पत्नी का सम्मानित दर्ज़ा प्रदान कर दिया तथा चल बसे | उनके पट्टीदारों ने उनकी नई पत्नी को उनकी पत्नी मानने से इनकार कर दिया तथा उसको भगाकर सारी संपत्ति से बेदखल करना चाहा तो महेंद्र मिश्र ने अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए ढेलाबाई की मदद की | चूँकि न्यायालय द्वारा सारी संपत्ति जब्त कर ली गयी थी,महेंद्र मिश्र अपनी छोटी जमींदारी की आय से उनकी मदद भी करते थे | 
सारे देश में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जा रहा था जमींदारी प्रथा ध्वस्त हो रही थी देश की राजनीति के क्षितिज पर गांधी जी का उदय हो चुका था और वे रामकृष्ण परमहंस,आर्य समाज, ब्रह्म समाज,गोखले और तिलक की समतल की गयी भूमि पर विराट जन जागरण पर आधारित स्वतंत्रता संग्राम की नींव दे चुके थे अधिकाँश उद्योगपति एवं बड़े-बड़े जैम्नदार ऊपर से गांधी के साथ मगर हृदय से साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ हो गए थे
महेंद्र मिश्र भी एक छोटे जमींदार थे उन्हें लगा कि वे तो अपने परिवार के प्रति जिम्मेवार रह गए हैं अपने जमींदार मालिक स्वर्गीय हलिवंत सहाय के प्रति ही और ढेलाबाई की ही ठीक से सहायता कर रहे हैं उनकी प्रथम पत्नी अपने मायके (तेनुआ) की संपत्ति पर ही रहती थी,सुन्दर भी नहीं थी,पारिवारिक जीवन भी तनावपूर्ण ही चल रहा था हालंकि उन्हीं पत्नी परेखा देवी से उनके पुत्र हिकायत मिश्र का जन्म हो चुका था संगी साथियों,गुनी कलाकारों और देश को समर्पित युवा क्रांतिकारियों का सहायता द्वार भी बंद हो रहा था उन्होंने एक निर्णय लिया और चल पड़े कलकत्ता महेंद्र मिश्र ने सिर्फ देना सिखा था,लेना और माँगना उनके शब्दकोष में थे ही नहीं इसका कारण था बचपन से लेकर यौवन तक उन्होंने अभाव तो जाना ही नहीं था पूरा यौवन काल हलिवंत सहाय के दरबार में,दरबारी संस्कृति में,सामंती परिवेश में तथा नजाकत-नफासत से पूर्ण साफ़-सुथरी जीवन शैली में बीता था पहली बार अर्थाभाव महसूस हुआ था शायद यही कारण है कि,उनका सम्पूर्ण कवी-कर्म सामंती-परिवेश और रीतिकालीन दरबारी संस्कृति के प्रभाव से मुक्त होकर आम आदमी के अभाव और संघर्षपूर्ण जीवन से पूरी तरह साहचर्य स्थापित नहीं कर सका
कलकत्ता उस समय राष्ट्र की सभी औद्योगिक,राजनितिक एवं सांस्कृतिक उथल-पुथल का जीवित केंद्र था भोजपुरी क्षेत्र के हजारों लोग कलकत्ता जाते और जीविकोपार्जन करते थे महेंद्र मिश्र का उनसे आमदरफ्त था   बंगाली समाज की सोच और उनके सामाजिक,राजनीतिक जीवन दर्शन से वे पूर्ण परिचित भी थे बंगाली युवकों की रगों में राष्ट्रभक्ति की जो तस्वीर,जो गर्मी और समर्पण की भावना उन्होंने इस यात्रा में महसूस किया तथा विक्टोरिया मैदान में नेताजी का उत्तेजक भाषण सुना उससे उनका मन बेचैन हो गया कि राष्ट्र के लिए कुछ होना चाहिए (*साक्षात्कार - श्री जनार्दन मिश्र,ग्राम-कांही,दिनांक-२०--१९९९)
एक दिन किसी अंग्रेज अफसर ने जो खूब भोजपुरी और बांग्ला भी समझता था,इनको 'देशवाली' समाज में गाते देखा उसने इनको नृत्य-गीत के एक विशेष स्थान पर बुलवाया ये गए बातें हुईं ।वह अँगरेज़ उनसे बहुत प्रभावित हुआ इनके कवि की विवशता,हृदय का हाहाकार,ढेलाबाई के दुखमय जीवन की कथा,घर परिवार की खस्ताहाली तथा राष्ट्र के लिए कुछ करने की ईमानदार तड़प देखकर उसने इनसे कहा- तुम्हारे भीतर कुछ ईमानदार कोशिशें हैं हम लन्दन जा रहे हैं नोट छापने की यह मशीन लो और मुझसे दो-चार दिन काम सीख लो यह सब घटनाएँ १९१५-१९२० के आस-पास की हैं
महेंद्र मिश्र नोट छापने की मशीन लेकर मिश्रवलिया लौट आये नोट बनाने का काम गुप्त रूप से शुरू हुआ अब घर की रईसी लौटने लगी छोटे भाई युवक हो रहे थे पारिवारिक खर्च के अतिरिक्त अब उनकी इतनी सामर्थ्य भी हो चुकी थी कि असहाय ढेलाबाई की मदद भी कर सकें ढेला का मुक़दमा ठीक से देखा जाने लगा रिश्तेदार सम्बन्धियों का सेवा-सत्कार पहले की तरह जमींदारी ठाट से होने लगा दरवाजे पर दो-दो हाथी झूमने लगे सोनपुर मेला से सबसे महंगे घोड़े दरवाजे पर आने लगे (*साक्षात्कार-श्री दारोगा सिंह,ग्राम-मझवलिया ये घोड़ों के शौक़ीन तथा प्रसिद्ध घुड़सवार थे। दिनांक---१९९६) हनुमान जी की पूजा शानदार ढंग से होने लगी पहलवानों के झुण्ड के झुण्ड उतरने लगे तथा ज्ञात-अज्ञात स्थानों के साधू-महंथ आने लगे अनगिनत पहलवान और बदमाश दिन-रात कसरत करते तथा भोजन माँग-माँगकर पड़े रहते अनेक अज्ञात लोग आते और सुबह ही चल देते यह सिर्फ महेंद्र मिश्र को पता होता था कि कौन क्या है,कहाँ से आया है और कहाँ जायेगा तथा उसे क्या देना है जो भी गरीब,असहाय एवं जरूरतमंद आता उसकी मिश्र जी खूब मदद करते दिन-रात गीत-गवनई की महफ़िल गुलजार रहती तथा स्वयं भी छपरा,मुजफ्फरपुर,पटना,कलकत्ता तथा पश्चिम नें बनारस,ग्वालियर और झाँसी तक के गायकों के पास वे पहुँचकर गाते और संगीत में संगत करते उनकी गायन-वादन कला दिन रात निखरती गई संगीत में उनकी रूचि बहुत गहरी थी और उनकी इस रूचि को देखकर कहा जा सकता है कि संगीत और काव्य सृजन उनके रोम-रोम में बसा था तात्पर्य यह कि लक्ष्मी और सरस्वती की साधना चलने लगी अनेक क्रांतिकारी युवक मिश्रवलिया आने लगे तथा मिश्र जी उनकी भरपूर आर्थिक मदद करते गांधी जी के आह्वान पर आयोजित होने वाले धरना,जूलूस-पिकेटिंग आदि कार्यक्रमों में भाग लेने वाले सत्याग्रहियों के भोजन आदि का सम्पूर्ण व्यय भार वहन करते (*साक्षात्कार-श्री नथुनी मिश्र,ग्राम- संवरी बाजार ये महेंद्र मिश्र के अभिन्न मित्र थे दिनांक - --१९९६) गाँव-ज्वार में घूम-घूमकर पंचायती करते दूसरी तरफ,सम्पूर्ण उत्तरी भारत में जाली नोटों की  भरमार हो गयी तब अंग्रेजी सरकार के खुफिया विभाग के कान खड़े हुए उस समय छपरा मुफस्सिल थाना के अंतर्गत ही जलालपुर था थाना को मालूम था कि नोट कहाँ छपते हैं पर थाना की मिलीभगत थी,इसीसे किसी को सीधा पता नहीं चलता था हलिवंत सहाय का मित्र-सहायक जानकार भी थाना चुप लगा जाता था नोट छापने के काम में चिरांद के गंगा पाठक आदि कई लोग शामिल थे इन सबके बीच उनकी संगीत-साधना चलती रही   
इस बात में कोई संदेह नहीं कि कभी महेंद्र मिश्र हलिवंत सहाय के रंगीन मुजरा महफ़िल में भी गाते थे और कभी-कभी नर्तकियों-गायिकाओं के निवास पर भी जाकर गायन वादन  में संगत करते थे पर इस शौक का मूल कारण उनका संगीत प्रेम ही था उनके इस संगीत प्रेम की तुलना उसी प्रकार हो सकती है जैसे जयशंकर प्रसाद संगीत  प्रेम के वशीभूत होकर बनारस की प्रसिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी बाई के पास जाते थे अथवा भारतेंदु हरिश्चंद्र बंगाली विदुषी गायिकाओं मल्लिका और माधवी के कोठे पर जाते तथा कविता लिखने एवं संगीतमय कविता लिखने की प्रेरणा प्राप्त करते थे अथवा जैसे रीतिकाल के महाकवि घनानंद सुजान के साहचर्य अपनी भावयित्री-कारयित्री प्रतिभा के विन्यास के लिए कोमलता,प्रेरणा और गंभीर प्रेम की अभिव्यंजना-शक्ति प्राप्त करते थे
अगर महाकवि प्रसाद के सरस मधुमय गीतों की तरलता और मोहकता के पीछे और भारतेंदु काव्य की मसृणता के पीछे तथा घनानंद की ईमानदारी-भरी प्रेमाकुल कविताओं की रसवता के पीछे उपर्युक्त विदुषी गायिकाओं का अवदान माना जा सकता है तो महेंद्र मिश्र की काव्य की सरसता और पूर्वी गीतों की तरल अनुभूतियों के पीछे कतिपय गायिकाओं के अवदान तथा प्रेरणा-पुष्प को सहज स्वीकार किया जा सकता है
मिश्र जी को बोध था कि एक बुद्धिजीवी और एक साहित्य सर्जक का समाज और राष्ट्र के प्रति क्या कर्तव्य होता है उनका हृदय खीचता था संगीत के महफ़िलों के आरोह-अवरोह और तरन्नुम की तरफ उनका मस्तिष्क खींचता था राष्ट्रीय आन्दोलनों तथा उसमें शरीक हजारों लाखों व्यक्तियों की सेवा और त्याग की तरफ कवि की विवशता थी कि वह इन दोनों में से किसी को छोड़ नहीं सकता था उसके लिए एक श्रद्धा थी,दूसरी इड़ा जिस तरह  दिनकर की पारिवारिक विवशता थी अंग्रेजों की गाडी पर चढ़कर अंग्रेजी अंग्रेजी सरकार की प्रशंसा के गीत गाना,बहुत कुछ वही विवशता महेंद्र मिश्र के साथ भी थी-परिवार,समाज और राष्ट्र की सेवा के समानांतर संगीत एवं कविता का सृजन करना दिनकर और महेंद्र मिश्र की मजबूरी एक-सी थी क्योंकि दोनों देश के लिए कुछ करना तो चाहते थे पर दोनों अपने परिवार की वास्तविक माली हालात से टूटे हुए भी थे महेंद्र मिश्र दोनों कार्य सधे हाथों से करते रहें जो कवि लिख सकता था "एतना बता के जईह कईसे दिन बीती राम"- तथा "केकरा पर छोड़ के जईब टूटही पलानी,केकरा से आग मांगब,केकरा से पानी" वह आदमी समाज की घोर दरिद्रता,घोर संकट और यथार्थ जीवन से खूब परिचित था,इसमें कोई संदेह नहीं
सामाजिक मूल्यों पर कोई दुष्प्रभाव पड़े-ऐसा कोई कार्य महेंद्र मिश्र ने यावज्जीवन नहीं किया महेंद्र मिश्र के परिवार के सदस्य तथा सैकड़ों बुजुर्ग आज भी गर्व के साथ कहते हैं कि महेंद्र मिश्र सम्पूर्ण अंग्रेजी अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने के लिए नोट छापते थे इस कथन पर सहज ही विश्वास हो जाता है क्योंकि उनका एक अधूरा गीत इस आशय को ही ध्वनित करता है-
"हमरा नीको ना लागे राम गोरन के करनी 
रुपया ले गईले,पईसा ले गईलें,ले सारा गिन्नी 
ओकरा बदला में दे गईले ढल्ली के दुअन्नी "(*अखिल भारतीय साहित्य सम्मलेन के तीसरे अधिवेशन,सिवान के अवसर पर प्रकाशित ब्रजभूषण तिवारी का निबंध ।पृ-९८)
वहीँ विश्वनाथ सिंह (बिहार स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष ) तथा प्रसिद्ध स्वंत्रता सेनानी श्री तपसी सिंह (चिरांद,सारण ) के एक लेख में भी मिश्र जी द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों की आर्थिक मदद करने की बात कही गयी है (*अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के चौदहवें अधिवेशन,मुबारकपुर,सारण.१९९४ के अवसर पर प्रकाशित लेख 'इयाद के दरपन में' संपादक श्री राजगृही सिंह तथा व्यास मिश्र ) बाबू रामशेखर सिंह(सांसद,छपरा)जो स्वयं भी स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं,बताते हैं कि उनका घर स्वतंत्रता सेनानियों का अड्डा था और महेंद्र मिश्र हमेशा उनके घर पर पहुँचते रहते थे तथा उनके पिता तथा चाचा श्री दईब दयाल सिंह आदि के साथ हमेशा राजनीतिक घटनाओं पर बातचीत करते रहते थे (*साक्षात्कार-श्री रामशेखर सिंह,कांग्रेसी सांसद एवं स्वतंत्रता सेनानी साक्षात्कारकर्ता-अविनाश नागदंश "सारण वाणी"के महेंद्र मिश्र विशेषांक में प्रकाशित सम्पादक श्री शालिग्राम शास्त्री पृ.-७१) मिश्रवलिया के आसपास के अनेक वृद्ध व्यक्ति साक्षात्कार के समय बताते रहे हैं कि महेंद्र मिश्र गुप्त रूप से क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता की बलिवेदी पर शहीद होने वाले परिवारों को मुक्तहस्त सहायता किया करते थे रामनाथ पाण्डेय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास "महेंदर मिसिर"में स्वीकार किया है कि, महेंद्र मिश्र अपने सुख-स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि शोषक ब्रिटिश हुकूमत की अर्थव्यवस्था को धराशायी करने और उसकी अर्थनीति का विरोध करने के उद्देश्य से नोट छापते थे (*'महेंदर मिसिर' उपन्यास लेखन श्री रामनाथ पाण्डेय "आपन सफाई "पृष्ठ- से )
सन १९२०ई. के जुलाई अगस्त माह में पटना के सीआईडी सब-इन्स्पेक्टर जटाधारी प्रसाद को नोट छापने वाले व्यक्ति का पता लगाने की जिम्मेवारी सौंपी गई उनके साथ सुरेन्द्रनाथ घोष भी लगे जटाधारी प्रसाद ने भेष और नाम बदल लिया वे हो गए गोपीचंद और महेंद्र मिश्र के घर नौकर बनकर रहने लगे धीरे-धीरे गोपीचंद उर्फ़ गोपीचनवा महेंद्र मिश्र का परम विश्वस्त नौकर हो गया इसी की रिपोर्ट पर अप्रैल १९२४ . की चैत की अमावस्या की रात में एक बजे महेंद्र मिश्र के घर डीएसपी भुवनेश्वर प्रसाद के नेतृत्व में दानापुर की पुलिस ने छापा मारा पुलिस की गाड़ियाँ उनके घर से एक किलोमीटर की दूरी पर रहीं पाँचों भाई और गोपीचनवां मशीन के साथ नोट छापते पकड़े गए पर गनीमत थी कि महेंद्र मिश्र नोट छापने के समय सोये थे और दूसरे लोग नोट छाप रहे थे महेंद्र मिश्र पकड़े गए उनका मुकद्दमा हाईकोर्ट तक गया लोअर कोर्ट से सात वर्ष की सजा हुई थी महेंद्र मिश्र को,जो बाद में महज तीन वर्ष की रह गई जेल जाते समय गोपीचंद उर्फ़ जटाधारी प्रसाद ने अपनी आँखों में आँसू भरकर मिश्र जी से कहा - बाबा,हम ड्यूटी से मजबूर थे पर हमें इस बात की बड़ी प्रसन्नता हुई है कि,अपने देश के लिए बहुत कुछ किया और देश के लिए ही जेल जा रहे हैं जब मिश्र जी के कंठ से कविता की दो पंक्तियाँ - "पाकल पाकल पनवाँ खियवले गोपीचनवां, पिरतिया लगाके भेजवले जेलखानवां "- निकली तो गोपीचंद ने उनके पाँव पकड़ लिए और उसने भी वही निम्न पंक्तियाँ सुनाई - " नोटवा जे छापी गिनियाँ भजवल हो महेंदर मिसिर,ब्रिटिश के कईलन हलकान हो महेंदर मिसिर,सगरी जहनवाँ में कईल बड़ा नाम हो महेंदर मिसिर,पड़ल बा पुलिसवा से काम हो महेंदर मिसिर " गोपीचंद ने कहा - हमें अफ़सोस है कि,अपने मन में भी देश सेवा का एक सपना था वह पूरा नहीं हो सका,कारण मेरी सरकारी नौकरी थी पर आप महान हैं कि,आपने देश के लिए बहुत कुछ किया महेंद्र मिश्र बक्सर सेन्ट्रल जेल भेजे गए पर वे जेल में बहुत कम दिन ही रहे जेल में भी संगीत और कविता की रसधार बहाते रहते थे और उनके इसी गुण पर मुग्ध होकर तत्कालीन जेलर ने उन्हें अपने डेरे पर रख लिया जेलर की पत्नी एवं बच्चों को वे सरस स्वरचित भजन एवं कविता सुनाते तथा सत्संग करते वहीँ पर भोजपुरी का प्रथम महाकाव्य और उनका गौरव-ग्रन्थ "अपूर्व रामायण" रचा गया
यह ध्यातव्य है कि,महेंद्र मिश्र को काव्य-संगीत सृजन की कला किसी विरासत में नहीं मिली थी जो भी उनके द्वारा सृजित हुआ,स्वतःस्फूर्त था वे अति सामाजिक व्यक्ति थे जहाँ रहते विभिन्न दृष्टान्तों एवं घटनाओं से सबको हँसाते रहते और किसी भी समाज पर छा जाते दृष्टांत,चुटकुले,दोहे तथा कहावतों से वातावरण को सजीव बना देते थे हाजिर-जवाबी तथा वाकपटु में वे अद्वितीय थे ज्यादातर वे तबला,हारमोनियम बजाते जेल से छूटकर घर आने के बाद वे कीर्तन तथा रामकथा एवं कृष्णकथा सुनाते राधेश्याम रामायण तथा उसके तर्ज़ उन्हें बहुत प्रिय थे नौटंकी शैली में उनका कीर्तन बहुत प्रभावशाली होता तबला,हारमोनियम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा वाद्य-यन्त्र नहीं था,जिसे वे नहीं बजाते थे तथा पूरे अधिकार से बजाते थे यह भी ध्यान योग्य है कि,उनका कोई भी संगीत गुरु नहीं था,कोई रहा भी हो तो उसकी चर्चा उन्होंने कहीं नहीं की है संभवतः सब कुछ उनकी स्व-साधना से उपलब्ध था प्रारम्भिक दिनों को छोड़ दें तो उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्षपूर्ण एवं करूण रहा था  ऊपर से वह भले ही हास्य-विलासपूर्ण जीवन जीते रहे,उनके भीतर एक कोमल और अत्यंत ही संवेदनशील कवि था मूलतः वे साहित्यप्रेमी और सौहार्दप्रेमी कलाकार थे वैसे भी कहा जाता है कि,जिसने अभाव, संघर्ष और पीड़ा को आत्मसात नहीं किया होजिसके स्वयं के भीतर विरह की बाँसुरी बजी हो,वह कविता तो लिख ही नहीं सकता महेंद्र मिश्र ने प्रेम और सौहार्द को भोगा और जिया था,यही कारण है कि,उनकी श्रृंगारिक कविताओं में एक प्रकार की रोमांटिक संवेदना है प्रेम की कोमलता है काम की भूख और मानसिक द्वंद्व है तो भक्तिपरक रचनाओं में मानव नियति की चिंता भी है
रामचरित मानस और रामायण उन्हें बहुत कंठाग्र था जिस तरह तुलसी ने पांडित्य संस्कृत का त्याग कर अवधी भाषा का प्रयोग किया और रामकथा को जन-जन तक पहुँचाया,उसी प्रकार महेंद्र मिश्र ने भोजपुरी भाषा में कथावाचक शैली में जीवन भर रामकथा का प्रचार-प्रसार किया जब वे रामकथा का कीर्तन करते तो २०-२० हजार श्रोता मन्त्रमुग्ध हो उनको रात भर सुनते रहते यही कारण है कि महेंद्र मिश्र की कविताओं को सुनने जानने की उत्कंठापूर्ण लालसा सुदूर अंचलों प्रान्तों तक की जनता में रही है प्रसाद गुण और माधुर्य गुण से पुष्ट उनकी भाषा मानो आत्मा के लिए प्रकाश की खोज करती रही है रामकथा के इस व्याख्याता सर्जक को राम काव्य परंपरा का प्रमुख कवि माना जाना चाहिए
अंतिम समय में वे मात्र आठ दिन बीमार रहे आँख की रौशनी,मनुष्य को पहचानने की क्षमता तथा कविता से प्रेम उनके अंतिम क्षण तक बने रहे २६ अक्टूबर १९४६ ईस्वी को मंगलवार की सुबह में बिहाग गाना और भैरवी की तान उठाना थम गया छपरा में सम्मानित शिवमंदिर में कवि ने अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर दिया 
महेंद्र मिश्र का रचना काल १९१०-१९३५ हिंदी साहित्य का छायावादी काल था पर संभवतः उन्होंने छायावादी साहित्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखा  यह उनकी कोई सीमा रही होगी सरथ ही यह देखकर भी आश्चर्य होता है कि उनके सम्पूर्ण काव्य में राष्ट्रभक्ति परक अंग्रेज़ विरोधी रचनायें मात्र एक कविता को छोड़कर नहीं मिलती जिस प्रकार छायावादी साहित्य में भी तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलनों की अनूगूंज बहुत कम सुनाई पड़ती है उसी प्रकार महेंद्र मिश्र का काल भी राष्ट्रीयता परक कविताओं से बिल्कुल कटा-कटा है कारण चाहे जो रहे हों
एक तथ्य और विचारणीय है कि महेंद्र मिश्र ने अपने लिए अपना मंच स्वयं निर्मित किया उन्होंने कभी भी नाच,नौटंकी या लोक नाटक से स्वयं को नहीं जोड़ा उनके रचना काल में (१९१०-१९३५ तक) छोकड़ा नृत्य,पुरुष नृत्य या लोक नाटकों को समाज आदर की दृष्टि से नहीं देखता था आम जनता की रूचि और संस्कार का परिष्कार करने हेतु उन्होंने भिखारी ठाकुर को सिखाया कि भजनों,आध्यात्मिक प्रसंगों तथा कीर्तन आदि द्वारा समाजोद्धार करना भी राष्ट्रभक्ति का ही एक रूप है महेंद्र मिश्र के बहुत से मौलिक एवं कल्पित प्रसंगों तथा गीतों की धुन की नींव पर भिखारी ठाकुर ने अपने लोक नाटकों की शानदार ईमारत खड़ी की
तत्कालीन युग की आम जनता की रुग्ण मानसिकता,कलात्मक रूचि के ह्रास,नैतिकता बोध की कमी और सामाजिक मान्यता को ध्यान में रखकर विचार किया जाये तो यह सिद्ध होता है कि मिश्र जी द्वारा गायिकाओं,कलाकारों एवं नर्तकियों आदि से घनिष्ट सम्बन्ध रखने के मूल में उनकी सामाजिक सुधार की तीव्र भावना ही कार्य कर रही थी समाज में फैले कुरीतियों तथा गलत चीजों के प्रति उनके मन में विद्रोह का भाव था कुलटा स्त्री,बेमेल विवाह और भ्रष्ट आचरण से सम्बंधित उनकी अनेक कवितायें इस कथन का प्रमाण हैं अपनी रचनाओं से उन्होंने भोजपुरी भाषा,साहित्य और समाज की जो सेवा की वह अपूर्व है उनकी कविताओं में कहीं भी भदेसपन नहीं है,ठेठपन का आग्रह नहीं है,गंवारूपन नहीं है यही विशेषताएं हैं कि उनकी रचनाओं को लोक कंठ ने कभी विस्मृत नहीं किया उनकी कवितायें पुस्तकाकार नहीं मिलीं,तो वे कंठ से कंठ तक ही विस्तार पाती रहीं इस प्रकार वे संगीत की वाचिक परंपरा को पोषित करती रहीं
भोजपुरी के एक विद्वान आलोचक महेश्वराचार्य का यह कथन बिल्कुल उचित लगता है कि "जो महेंदर रहितें  भिखारी ठाकुर ना पनपतें उनकर एक एक कड़ी ले के भिखारी भोजपुरी संगीत रूपक के सृजन कईले बाडन भिखारी के रंगकर्मिता कलाकारिता के मूल बाडन महेंदर मिश्र जेकर कतहीं नाम नईखन लेले महेंदर मिसिर भिखारी ठाकुर के रचना-गुरु,शैली गुरु बाडन लखनऊ से लेके रंगून तक महेंदर मिसिर भोजपुरी के रस माधुरी छींट देले रहलन,उर्वर बना देले रहलन,जवना पर भिखारी ठाकुर पनप गईलन जम गईलन हाँ "(भोजपुरी सम्मलेन पत्रिका में श्री महेश्वराचार्य का निबंध फ़रवरी १९९० ,पृष्ठ-३१.) आज भी महेंदर मिश्र के साथी समकालीन बुजुर्ग  भिखारी ठाकुर के जीवित समाजी लोग बताते हैं कि "पूरी बरसात भिखारी ठाकुर महेंद्र मिश्र के दरवाजे पर बिताते थे तथा महेंद्र मिश्र ने भिखारी ठाकुर को झाल बजाना सिखाया "(भिखारी ठाकुर के समाजी भदई राम,शिवलाल बारी और शिवनाथ बारी से साक्षात्कार साक्षात्कारकर्ता -डॉ.सुरेश कुमार मिश्र एवं डॉ.रवीन्द्र त्रिपाठी दिनांक २३--१९९२ ) महेंद्र मिश्र का "टुटही पलानी" वाला गीत ही भिखारी ठाकुर के "बिदेसिया"की नींव बन गया "(महेश्वराचार्य का वही लेख पृष्ठ-३३)
महेंद्र मिश्र के गीतों में आम जन का प्रेम,आम जन की पीड़ा,संघर्ष भोजपुरी जीवन का इतिहास और भोजपुरी संस्कृति के प्रति सजग दृष्टि मिलती है उनकी एक महान देन है "पुरबी" उनके पहले पुरबी गीत भी था,इसका पता नहीं चलता उनको भोजपुरी भाषी जनता "पुरबी का जनक" मानती है उनके पुरबी गीतों की काफी नकलें करने की कोशिशें हुई,पर असल असल रहा इधर एक विद्वान ने संत साहित्य परम्परा का गहन विश्लेषण कर दिखलाया है कि महेंद्र मिश्र के पहले भी निर्गुणिया संतों ने पुरबी नाम से कई पद लिखा है (महेंद्र मिश्र और पूर्वी लेखन की परंपरा लेखक-डॉ.विनोद कुमार सिंह "सारण वाणी"के महेंद्र मिश्र विशेषांक में प्रकाशित पृष्ठ-१६-२२) पर उनमें और महेंद्र मिश्र के पुरबी गीतों में पर्याप्त अंतर है मिश्र जी के पुरबी गीतों की तासीर ही कुछ अलग है महेंद्र मिश्र के पुरबी गीत तो किसी परंपरा की उपज हैं, नक़ल हैं, उनकी नक़ल ही संभव है ... 
भोजपुरी के किसी कवि गीतकार की तुलना में महेंद्र मिश्र का शास्त्रीय संगीत का ज्ञान अधिक व्यापक एवं गंभीर रहा है | उन्होंने कविता और संगीत के रिश्ते पर विचार किया जैसे सूरदास, निराला एवं प्रसाद ने किया | उनकी कविता सिद्ध करती है कि कविता में संगीत का तत्व होना कितना आवश्यक है | खासकर आज, जब मंचीय कवियों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है और कविता का संगीत अथवा लय से रिश्ता लगभग समाप्त हो रहा है, उनकी कविता का महत्व बहुत बढ़ जाता है | वे जानते थे कि जिस तरह नाटक अभिनेयता के कारण ही सम्पूर्णता को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कविता भी सांगीतिक तत्वों के साहचर्य से ही खिलती है और वास्तविक भावक के हृदय तक संप्रेषित होती है | उन्होंने व्याख्यान तथा कीर्तन का मंच भी अपनाया और जीवन भर कविता लिखते रहे | उनके गीत अर्थ और अनुभव की अनेक धाराओं को खोलने वाले हैं और वे सहज ही अक्षर और ध्वनि के बीच संगीत खोज लेते हैं | यही कला उनको एक समर्थ कवि-गीतकार के रूप में उपस्थापित करती है |
मिश्र जी की चिंता में हैं मानवीय भाव जगत के विभिन्न व्यापार, जिनमें संयोग की चिंता बहुत कम है, वियोग की मार्मिकता अधिक बेधक है | आज वैश्वीकरण और हाई-टेक-संस्कृति की भाषा की आपाधापी में मुख्यतः कविता और उसकी संवेदनशीलता का तेजी से क्षरण हो रहा है | घोर बौद्धिक युग का अवतार हुआ है और मानव की जड़ीभूत हो रही संवेदना उसे मानव रहने देगी,इसमें संशय हो रहा है | महानगरीय संस्कृति और उपभोक्तावादी जीवन-पद्धति के दौर में मानव को मानव बने रहने देना एक भीषण चुनौती है | एक साहित्यकार की संवेदनशीलता ही इस संकट की घड़ी में मानव के साथ है | ऐसी कविता जो छू सके, कहीं चित को शीतलता और शांति प्रदान कर सके - महेंद्र मिश्र की लेखनी से निकलती है | उनकी कविता सहज रूप से कहीं छूती है भीतर कुछ महसूस कराती है और सचमुच कविता कही जाने की अधिकारी है |
मिश्र जी द्वारा प्रणीत गीतों बीसों काव्य-संग्रहों की चर्चा उनके "अपूर्व रामायण" तथा अन्य स्थानों पर आई है | महेंद्र मंजरी, महेंद्र विनोद, महेंद्र दिवाकर, महेंद्र प्रभाकर, महेंद्र रत्नावली, महेंद्र चन्द्रिका, महेंद्र कुसुमावती, अपूर्व रामायण सातों कांड, महेंद्र मयंक, भागवत दशम स्कंध, कृष्ण गीतावली, भीष्म बध नाटक आदि की चर्चा हुई है | पर इनमें से अधिकाँश आज अनुपलब्ध हैं | एकाध प्रकाशित हुए और शेष आज भी अप्रकाशित हैं | मेरा अनुमान है कि ये छोटे-छोटे काव्य-संग्रह रहे होंगे और उनके गायक मित्रों द्वारा ले लिए गए अथवा सम्यक रख-रखाव के अभाव में काल कवलित हो गए | उनके अन्वेषण का कार्य शिथिल ही है | कवि ने अपने अपूर्व रामायण के अंत में अपना परिचय एक स्थल पर दिया है, जो सर्वाधिक प्रामाणिक परिचय है -
"मउजे मिश्रवलिया  जहाँ  विप्रन के ठट्ट बसे,
सुन्दर सोहावन  जहाँ  बहुते  मालिकाना  है |
गाँव के पश्चिम  में विराजे  गंगाधर नाथ ,
सुख  के  स्वरुप  ब्रह्मरूप  के  निधाना  हैं |
गाँव  के  उत्तर  से  दखिन  ले  सघन  बांस ,
पूरब  बहे  नारा  जहाँ  कान्ही  का सिवाना  है |
द्विज  महेंद्र  रामदास पुर के ना  छोड़ो  आस,
सुख दुःख  सब सह  करके  समय  को बिताना  है |"
 (अपूर्व रामायण  तारीख  ०३-०५-१९२९ मंगलवार को  समाप्त  हुआ  |) 
दरबारी संस्कृति एवं सामन्ती वातावरण में रहकर भी महेंद्र मिश्र दरबारीपन से अलग रहे | हलिवंत सहाय जैसे वैभव विलासी के दरबार में रहकर भी उन्होंने अपने आश्रयदाता की प्रशंसा में एक भी कविता नहीं लिखी हैं | रीति काव्य परम्परा का प्रभाव उनके साहित्य पर है तथापि राधा कृष्ण के प्रेम चित्रण के नाम पर नख-शिख-वर्णन, काम-क्रीड़ा-दर्शन, शब्द-चातुरी अथवा दोहरे अर्थ वाले वाक्यों का प्रयोग उन्होंने नहीं किया है | वे मूलतः संस्कारी भक्त थे, जिन पर राम भक्ति काव्य-परंपरा एवं कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा का ही विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है | अगर तुलसी ने राम भक्ति भव्य प्रसाद निर्मित किया है तो महेंद्र मिश्र ने भी शीतल राम मडैया खड़ा करने की कोशिश की है | उनकी कृष्ण भक्ति की कविताओं की अपेक्षा राम भक्ति की कविताओं में भक्ति तत्व अधिक हैं | ऐसा शायद इसलिए भी हुआ है कि वे हनुमान के परम भक्त थे | असल में महेंद्र मिश्र का युग ही ऐसा था | उसके पूर्व भोजपुरी साहित्य का सृजन तो कम हुआ ही था और उस युग का हिंदी साहित्य भक्ति और श्रृंगार की मिली-जुली परंपरा का निर्वाह जिस प्रकार भारतेंदु ने किया उसी प्रकार महेंद्र मिश्र ने भी किया | उनका हृदय भक्ति के रस से डूबा हुआ था पर उनकी संगीत साधना श्रृंगार एवं प्रेम से सिक्त थी | अपने जीवन का अधिकांश उन्होंने अपने सुख-वैभव में व्यतीत किया था, अतएव उनका रस प्रेमी हृदय उनकी रचनाओं में स्वतः अभिव्यक्त हो गया है | यहाँ यह भी स्मरणीय है कि उनकी साधनाओं कहीं भी बौद्धिक आध्यात्मिकपन नहीं है बल्कि आनंद की सरिता में अवगाहन की कोशिश है | उनकी रचनाओं का आधार श्रृंगारिक पर मूल भावना भक्तिमय ही है | उन्होंने भोजपुरी एवं खासकर पूरबी गीतों का अद्भुत परिमार्जन किया है |
महेंद्र मिश्र वस्तुतः इन्द्रधनुषी रचनाकार हैं | उनकी कविताओं ने अगर अपनी पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाई हैं, तो अवश्य ही उनमें कुछ वैशिष्ट्य रहा है | उन्होंने अपनी रचनाओं से भोजपुरी भाषा एवं साहित्य को समृद्धि प्रदान की है | रचनाकार का काम है रचना करना | रचना की सार्थकता और सामर्थ्य तय करना पाठकों का काम है तथा महेंद्र मिश्र की रचनाओं की सामर्थ्य को बेशक आम जनता ने तो तय कर दिया है | संस्कृत के आचार्य मम्मट ने एक स्थल पर लिखा है - " कविता की रस माधुरी तो कोई सहृदय पाठक ही जान पाता है न कि उसका रचयिता कवि | जैसे भवानी के भ्रू-विलास के सौंदर्य को भवानी-भर्ता शंकर ही जानते हैं न कि उनके जनक हिमालय |"(कविता  रसमाधुर्य  कर्विवेति  न  तत् कवि | भवानी  भृकुटीर्भंग  भवो  वेति  न  भूधर : ||"
)  मम्मट का कथन तो यहाँ तक स्वीकारता है कि स्वयं कवि से भी उच्च स्थान है, रसग्राही रसज्ञ पाठक का, जो कितनी ही अर्थ-छटाओं और भाव-भूमियों का तरल स्पर्श करता रस विभोर हो रस प्राप्त करता रहता है.........यही उनका स्थाई मूल्यांकन है | "भोजपुरी-काव्य में उनका वही स्थान है, जो मैथिली-काव्य में विद्यापति का |"(महेंद्र मिश्र की आध्यात्मिक चेतना : रमानाथ पाण्डेय | कविवर महेंद्र मिश्र के गीत संसार पृ.२३,सं.-डॉ.सुरेश कुमार मिश्र )

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