रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.
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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

मुख्यमंत्री, बिहार के नाम दिल्ली के रंगकर्मियों का ज्ञापन


पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों की सभी मांगें तुरंत मानी जाएं
      Ø बिहार संगीत नाटक अकादमी और कला संस्कृति विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता, अपसंस्कृति और सामंती अफसरशाही के खिलाफ विगत 16 दिनों से पटना के संस्कृतिकर्मी सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। वे संस्कृति और रंगमंच के प्रति सरकार के नकारात्मक और विरोधी रवैये में बदलाव की मांग कर रहे हैं, पर सरकार और उसकी अकादमी ने अब तक अड़ियल रुख अपना रखा है। दिल्ली में रहने वाले और देश के विभिन्न हिस्सों के हम संस्कृतिकर्मी और रंगकर्मी बिहार सरकार और उसके अकादमी की इस निर्लज्ज हठधर्मिता की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना करते हैं और उन्हें आगाह करना चाहते हैं कि वे रंगकर्मियों के इस आंदोलन को सीमित या कमजोर समझने की गलती न करें।
Ø पटना और समूचे बिहार का रंगमंच आज विसंगतियों, विडंबनाओं, अभावों और अंतहीन सरकारी उपेक्षा की गिरफ्त में दम तोड़ता नजर आ रहा है। रंगकर्मियों के पास न तो पूर्वाभ्यास की कोई जगह है, न प्रस्तुति के लिए उपयुक्त रंगशालाएं। नाट्यकला के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था न होने से हजारों प्रतिभाएं महानगरों की ओर पलायन कर रही हैं जहां बड़े पैमाने पर उनकी संभावनाओं का शोषण हो रहा है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से प्रशिक्षण लेने के बाद मुंबई का रुख करने की बजाय यदि कोई रंगकर्मी बिहार में रह कर काम करना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करने की बात तो दूर, हर तरह से अपमानित और प्रताड़ित ही किया जाता है। प्रदेश में आज तक कोई व्यावसायिक रंगमंडली तक बनाने की आवश्यकता नहीं महसूस की गई है, ताकि प्रतिभावान रंगकर्मियों के लिए आजीविका के साथ रंगकर्म करने की कोई व्यवस्था हो सके। इससे सिद्ध होता है कि प्रदेश की सरकार को न तो कला संस्कृति से कोई खास लगाव है, न उनकी कोई समझ है।
Ø पटना के गौरवशाली प्रेमचंद रंगशाला की दुरवस्था, उस पर सरकार की निरंकुश अफसरशाही का कसता शिकंजा, हिन्दी भवन जैसी सांस्कृतिक धरोहर को मुनाफा कमाने वाले उपक्रम में बदलने या कि तमाम सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों से संस्कृतिकर्मियों को दूर रखने और बेदखल करने की सरकार की प्रवृत्ति इस धारणा को पुष्ट करती है कि राज्य का नेतृत्व संस्कृति और कलाकर्म के प्रति नितांत असंवेदनशील है। उसका ध्यान करोड़ों खर्च कर बिहार उत्सव का तमाशा करने और इसके माध्यम से व्यक्तिगत-राजनैतिक लाभ लेने तक ही सीमित है। ऐसा नेतृत्व बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता की हिफाजत भला क्या करेगा?
Ø पटना के रंगकर्मियों ने इस तथ्य का उद्घाटन करके संस्कृति जगत को सकते में डाल दिया है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी मूलतः एक फर्जी संस्था है, जो न तो वैधानिक रूप से पंजीकृत है और न ही उसका कोई संविधान मौजूद है। राज्य की समस्त सांस्कृतिक योजनाओं के क्रियान्वयन, सांस्कृतिक मद की राशियों के आवंटन, अनुदान तथा पुरस्कारों के निर्धारण आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देने वाली इस एजेंसी के बारे में यदि यह तथ्य सही है तो संस्कृति के क्षेत्र में देश में इतने बड़े गोरखधंधे और भ्रष्टाचार की दूसरी कोई मिसाल नहीं हो सकती। आश्चर्य है कि सरकार ने अब तक इस आरोप का खंडन तक नहीं किया है। अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा की नियुक्ति, सोच और व्यवहार पर सवाल उठाते हुए रंगकर्मी लगातार उनकी बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं, पर सरकार इस मामले में भी चुप है।
Ø सवाल उठना जायज है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी आखिर किस आधार पर सरकारी पैसों के वितरण से लेकर सांस्कृतिक संस्थानों का संचालन करती रही है? उसके अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत होती है? सरकार के कला संस्कृति विभाग और अकादमी के पास क्या कोई ऐसी सांस्कृतिक नीति मौजूद है जिसके आधार पर यह तय किया जाता है कि किसे अनुदान दिया जाना है, किसे पुरस्कृत करना है या कि सांस्कृतिक संस्थानों और रंगशालाओं का प्रबंधन किस प्रकार करना है? यदि ऐसी कोई नीति मौजूद होती तो यह असंभव था कि प्रेमचंद रंगशाला में दवा बेचने वाली कंपनी भौंडे नृत्य का आयोजन करे और उसमें अकादमी के सम्मानित सदस्य ठुमके लगाएं! आखिर बिहार संगीत नाटक अकादमी किन मूल्यों के प्रसार और संरक्षण में लिप्त है? कला संस्कृति विभाग मुख्यमंत्री ने स्वयं अपने पास रखा है, तो क्या वे ऐसे कृत्यों की जवाबदेही लेने से बच सकते हैं?
Ø पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों ने सरकार के समक्ष मुख्य रूप से जो चार मांगें रखी हैं, वे इस प्रकार हैं-
  1. बिहार संगीत नाटक अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा को अविलंब बर्खास्त किया जाए।
  2. बिहार संगीत नाटक अकादमी के पुनर्गठन की घोषणा करते हुए उस पर लगे आरोपों एवं उसके अब तक के क्रियाकलापों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। अकादमी के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  3. बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भागीदारी हो और
  4. प्रेमचंद रंगशाला के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
दिल्ली और देश के विभिन्न हिस्सों के हम रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी उपरोक्त मांगों का समर्थन करते हुए इस आंदोलन के साथ एकजुट हैं। बिहार सरकार और उसके कला संस्कृति विभाग ने यदि तत्परता का परिचय देते हुए अविलंब इस आंदोलन की सभी मांगों को नहीं माना तो हम इस आंदोलन को तेज करने के साथ-साथ देश के बाकी हिस्सों में ले जाने के लिए कृतसंकल्प हैं।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

पटना रंगान्दोलन के समर्थन में बिहार भवन पर दिल्ली के संस्कृतिकर्मियों

पटना में रंगकर्मियों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के समर्थन में जुटे दिल्ली के रंगकर्मी दिल्ली के रंगकर्मियों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दिया ज्ञापन. समाचार अमितेश कुमार के वाल से साभार.

दिल्ली, 5 अगस्त 2013। बिहार संगीत नाटक अकादमी और कला संस्कृति विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता, अपसंस्कृति और सामंती अफसरशाही के खिलाफ विगत 18 दिनों से आंदोलन कर रहे पटना के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के समर्थन में आज दिल्ली स्थित बिहार भवन में राजधानी और देश के विभिन्न हिस्सों के लगभग 250 रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी इकट्ठा हुए और उन्होनें विरोध-प्रदर्शन किया। ज्ञात हो कि संस्कृति और रंगमंच के प्रति बिहार सरकार के नकारात्मक और विरोधी रवैये में बदलाव की मांग कर रहे आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार और उसकी अकादमी ने अब तक अड़ियल रुख अपना रखा है। बिहार भवन में जुटे रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों ने बिहार सरकार और उसके अकादमी की इस निर्लज्ज हठधर्मिता की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना की और उन्हें इस बात से आगाह किया कि वे रंगकर्मियों के इस आंदोलन को सीमित या कमजोर समझने और अनदेखा करने की गलती न करें।
बिहार भवन के समक्ष उपस्थित रंगकर्मियों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी और समीक्षक राजेश चन्द्र ने पटना में चल रहे आंदोलन की पृष्ठभूमि पर विस्तार से बात करते हुए आंदोलन की वर्तमान गतिविधियों से भी अवगत कराया। उन्होंने कहा कि पटना और समूचे बिहार का रंगमंच आज विसंगतियों, विडंबनाओं, अभावों और अंतहीन सरकारी उपेक्षा की गिरफ्त में दम तोड़ता नजर आ रहा है। रंगकर्मियों के पास न तो पूर्वाभ्यास की कोई जगह है, न प्रस्तुति के लिए उपयुक्त रंगशालाएं। पटना के गौरवशाली प्रेमचंद रंगशाला की दुरवस्था, उस पर सरकार की निरंकुश अफसरशाही का कसता शिकंजा, हिन्दी भवन जैसी सांस्कृतिक धरोहर को मुनाफा कमाने वाले उपक्रम में बदलने या कि तमाम सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों से संस्कृतिकर्मियों को दूर रखने और बेदखल करने की सरकार की प्रवृत्ति इस धारणा को पुष्ट करती है कि राज्य का नेतृत्व संस्कृति और कलाकर्म के प्रति नितांत असंवेदनशील है। ऐसा नेतृत्व बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता की हिफाजत भला क्या करेगा? उन्होंने पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों की तमाम मांगों को बेहद वाजिब बताते हुए सरकार से अपील की कि वह उन पर अविलंब कार्रवाई करे। 
सभा को संबोधित करते हुए युवा रंगकर्मी और निर्देशक मृत्युंजय प्रभाकर ने कहा कि बिहार के रंगकर्मियों ने संस्कृति और रंगमंच के जिन मुद्दों को अपने आंदोलन के माध्यम से उठाया है उन मुद्दों से देश के हर रंगकर्मी को सरोकार है और इसीलिए आज इतनी बड़ी संख्या में रंगकर्मी यहाँ इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि जिस बिहार संगीत नाटक अकादमी पर राज्य की समस्त सांस्कृतिक योजनाओं के क्रियान्वयन, सांस्कृतिक मद की राशियों के आवंटन, अनुदान तथा पुरस्कारों के निर्धारण आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी है उसके बारे में इस तथ्य के सामने आने से कि वह एक फर्जी संस्था है और उसका कोई संविधान तक मौजूद नहीं है, यह बात साबित हो गयी है कि प्रदेश में संस्कृति के नाम पर कैसा गोरखधंधा चलता रहा है। अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा की नियुक्ति, सोच और व्यवहार पर सवाल उठाते हुए रंगकर्मी लगातार उनकी बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं, पर सरकार इस मामले में भी चुप है। 
प्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक अरविंद गौड़ ने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश में कोई सांस्कृतिक नीति मौजूद नहीं रहने के कारण ही आज समूचे देश का रंगमंच समस्याओं में घिरा हुआ है। इतने बड़े देश में सरकार संस्कृति के ऊपर जो खर्च करती है वह हमारे कुल बजट का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा है जबकि हम अपने देश को एक संस्कृति प्रधान देश कहते नहीं थकते। सारा संसाधन कुछ मुट्ठी भर लोगों और बड़े संस्थानों तक सीमित है जबकि देश भर में काम करने वाले छोटे छोटे समूहों को आज भी भयावह परिस्थितियों में संस्कृतिकर्म करना पड़ रहा है। बिहार का वर्तमान आंदोलन भी इस तथ्य को साबित करने के लिए काफी है कि हमारा सत्ताधारी वर्ग न सिर्फ संस्कृति को हाशिये पर रखने के लिए कृतसंकल्प है बल्कि वह रंगमंच जैसी लोकतान्त्रिक विधाओं को पूरी तरह समाप्त करने के लिए हर संभव उपाय भी करता रहा है। ऐसा इसलिए है कि रंगमंच उन्हें अपने अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा लगता है। 
सभा में जिन अन्य रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों ने अपने विचार रखे उनमें वरिष्ठ रंगकर्मी मनीष मनोजा, सुधीर सुमन, अमितेश कुमार, प्रकाश झा, दिलीप गुप्ता, शिल्पी मारवाह, गौरव मिश्र आदि प्रमुख थे। रंगकर्मियों का एक प्रतिनिधि मण्डल, जिसमें अरविंद गौड़, मनीष मनोजा, राजेश चंद्र, मृत्युंजय प्रभाकर और सुधीर सुमन शामिल थे, बिहार भवन में एडिशनल रेसिडेंट कमिश्नर विपिन कुमार से मिला और उन्हें 300 रंगकर्मियों के हस्ताक्षर से युक्त बिहार के मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन में बिहार सरकार से यह मांग की गई है कि वह पटना के आंदोलनरत रंगकर्मियों की निम्नलिखित सभी मांगों पर अविलंब कार्रवाई करे अन्यथा इस आंदोलन को तेज करते हुए पूरे देश में ले जाया जाएगा- 
1. बिहार संगीत नाटक अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा को अविलंब बर्खास्त किया जाए।
2. बिहार संगीत नाटक अकादमी के पुनर्गठन की घोषणा करते हुए उस पर लगे आरोपों एवं उसके अब तक के क्रियाकलापों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। अकादमी के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। 
3. बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भागीदारी हो और
4. प्रेमचंद रंगशाला के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
आज के इस प्रदर्शन में दिल्ली के अस्मिता, सहर, उत्तर रंग, मैलोरंग, सर्कल थिएटर कंपनी, जन संस्कृति मंच, पलटन आदि नाट्य व सांस्कृतिक संस्थाओं ने शिरकत की। प्रदर्शन में इन संस्थाओं की ओर से जनगीतों और कविताओं की प्रस्तुति भी की गई। 

राजेश चन्द्र (9871223317), दिलीप गुप्ता (9873075824) 

सोमवार, 29 जुलाई 2013

जनता किसी को क्रांति करने का ठेका नहीं देती - मृत्युंजय प्रभाकर

आज पटना में चल रहे रंगकर्मियों-कलाकारों के आन्दोलन को 10 दिन होने को आए। अब जाकर कुछ वरिष्ठों और कनिष्ठों की नींद खुली है और फेसबुक पर आंदोलनरत साथियों और उनके हितैषियों को नसीहत और आईना दिखाने अवतरित हुए हैं। महाभारत में एक पात्र है युयुत्सु का, जो सत्य के पक्ष में अपने ही लोगों पर बाण चलने को अभिशप्त है आज मुझे कुछ कुछ वैसा ही आभास हो रहा है। पर जैसा कि मैं पहले ही लिख चूका हूँ मैं उन लोगों में से नहीं हूँ कि 'बिगाड़ के डर से ईमान की बात न करूँ'. सो अपनी बात जरूर रखूँगा - मेरे अपने इसे पढ़कर नाराज होते हैं तो उन्हें पूरा हक है, जैसा कि मुझे अपनी बात रखने का हक है। मैंने पहले भी कुछ मुद्दे फेसबुक पर उठाये थे लेकिन तब सब मुंह पर चादर डालकर सोये थे या इस उम्मीद में थे कि अपनी चुप्पी से इस आन्दोलन को अपनी मौत मर जाने दें - लेकिन अफ़सोस की दस दिन होने पर भी आन्दोलन बंद नहीं हुआ अतः मजबूरन शायद उन्हें मुंह खोलना पड़ रहा हो- कौन जाने

अब आइये आन्दोलन की मांगों पर गौर करते हैं -

संगीत नाटक अकादमी की सचिव विभा सिन्हा को बर्खास्त करो ! प्रेमचंद रंगशाला के संचालन पर रंगकर्मियों की निगरानी हो। बिहार संगीत नाटक अकादमी का पुनर्गठन और इसके संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित हो। बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भूमिका हो। 

1. संगीत नाटक अकादमी की सचिव विभा सिन्हा को बर्खास्त करो ! 
मेरा पहला सवाल है उन लोगों से जो इस आन्दोलन की हवा निकलना चाहते हैं  - क्या वे विभा सिन्हा को ईमानदार मानकर इसका विरोध कर रहे हैं? दूसरा सवाल उनसे जो अपने आप को प्रगतिशील और वामपंथी मानकर इस आन्दोलन का विरोध कर रहे हैं - क्या विभा सिन्हा उनके लिए कोई प्रगतिशील और वामपंथी व्यक्ति हैं जिनपर सवाल उठाना या बर्खास्तगी की मांग करना वामपंथ पर हमला करने की तरह लिया जा रहा हैमाजरा क्या है यह तो वही बतायेंगे। 

2. प्रेमचंद रंगशाला के संचालन पर रंगकर्मियों की निगरानी हो.
प्रेमचंद रंगशाला में जब विभा सिन्हा जैसे अधिकारियों के होने से अश्लील डांस का आयोजन किया जा रहा हो, वैसे में उसका नियंत्रण रंगकर्मियों के हाथों में सौंपने की मांग कहाँ से गलत है? और कहाँ से गैर-प्रगतिशील मांग है

3. बिहार संगीत नाटक अकादमी का पुनर्गठन और इसके संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित हो
जो संगठन अपने आप में गैर कानूनी हो। जिसका निबंधन तक न हो। और जहाँ भयानक अनिमियात्तायें बरती जा रही हों। मनमाफिक वेतन उठाया जा रहा हो। मनमाने खर्च और कार्यक्रम दिए और दिलाये जा रहे हों, उसके पुनर्गठन की मांग कहाँ से गैर-प्रगतिशील मांग है

4. बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भूमिका हो
बिहार संगीत नाटक अकादेमी के पुनर्गठन होने की सूरत में उसके संविधान बनाने में अगर रंगकर्मियों को शामिल करने की मांग कहाँ से गैर-प्रगतिशील है

यह तो हुई मांगों के आधार पर बात, अब आते हैं अंदरूनी मुद्दों पर जो उन्हें इन मांगों से ज्यादा परेशान कर रहा होगा -

1. उनकी चिंता है की यह आन्दोलन बीजेपी द्वारा प्रायोजित है- 

भाई साहब कोई तथ्य है आपके पास या सिर्फ राजनितिक उल्टी कर रहे हैं। तथ्य है तो प्रस्तुत कीजिये। और वैसे भी आन्दोलन का नेतृत्व आन्दोलन में घुसकर लिया जाता है बाहर से नज़ारा देखकर नहीं, आप मूवमेंट में शामिल होते तो आप भी इसके लीडरशिप में होते पर आप तो बांसुरी बजा रहे हो। है न

दूसरी बात यह कि आप विभाग की बदनामी से, सरकार की बदनामी से डर क्यूँ रहे हो। कहीं जनता दल यूनाइटेड ने बिहार में क्रांति तो नहीं कर दी या अब वही आपके लिए कम्युनिस्ट पार्टी है? या कल्चर डिपार्टमेंट क्रन्तिकारी हो गया है? डिपार्टमेंट आपके सहयोग से राज्य में क्रांति करने में लगा है और हम जैसे लोग उसे क्रांति करने से रोक रहे हैं

2 दूसरी चिंता कि आन्दोलन में शामिल लोग खुद भ्रष्ट और दलाल लोग हैं -

भाई मेरे इसका मतलब तो यह हुआ कि बिहार में संस्कृति मंत्रालय में

i या तो बहुत ईमानदारी से काम हो रहा है इसलिए भ्रष्ट और दलाल टाइप लोग जानबूझकर इसे बदनाम करने में लगे हैं। आपकी बात मान भी लूं तो एक तरह से ये भ्रष्ट और दलाल टाइप लोग विभा सिन्हा और संजय सिंह जैसे भ्रष्ट लोगों को विभाग से अलग करने की मांग करके तो आपका ही भला कर रहे हैं। अगर आप इन्हें क्रन्तिकारी और योग्य और इमानदार मानते हों तो आप ही जानें, हम तो मानने से रहे। 

ii या तो यह की विभाग में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है की भ्रष्ट और दलाल टाइप लोग भी आज़िज आ चुके हैं। अगर ऐसा है तो इससे बुरी बात क्या होगी

3 ऐसा यह लोग इसलिए कर रहे हैं क्यूंकि इन्हें ग्रांट नहीं मिला -

तो इसमें गलत क्या है भाई मेरे? सही बात तो यही है कि मजदूर भी अपने वेज की लड़ाई लड़ता है, किसान अपने हक की। अब रंगकर्मी ग्रांट की लड़ाई ही लड़ेंगे। आपको लगता है की सच में जिन्हें ग्रांट नहीं दिया गया वो इसके काबिल नहीं थे। आप मानते होंगे, मैं नहीं मान सकता। 

इसका मतलब तो यह भी बनता है कि आप इसलिए विरोध नहीं कर रहे कि आपको ग्रांट और लाभ मिल रहे हैं। है की नहीं?

4 यह लोग व्यक्तिगत दुर्भावना से ग्रस्त हैं और व्यक्ति पर हमला कर रहे हैं -

अब भाई मेरे इतना तो आपको भी पता होगा की डिपार्टमेंट अपने आप चलता नहीं। उसे कोई व्यक्ति ही चलाता है। तो ज़ाहिर सी बात है जो लोग डिपार्टमेंट में बड़े पद पर होंगे उनसे ही मांग की जाएगी। जिम्मेदारी भी उन्ही की बनती है। तो उन पर सवाल उठने लाजिमी हैं। ऐसे में चाहिए की जल्द से जल्द वे अपना काम करें। अगर वही रोड़ा अटकाने लगें तब तो हमें भी दिक्कत होगी। 

5 क्रांति करने का ठेका तो हमारे पास है - 

भाई साहब इस भ्रम में न रहें। जनता किसी को क्रांति करने का ठेका नहीं देती। और क्रांति करने के लिए किसी का क्रांतिकारी इतिहास होना जरूरी नहीं होता। हम जिस जनता के लिए लड़ रहे होते हैं वो भी कोई दूध की धूली नहीं होती। जातिवाद, धार्मिक उन्माद और पता नहीं कैसे कैसे दुर्गुणों से लैस होती है इसका मतलब यह नहीं होता की हम उनकी लड़ाई छोड़ दें। आप अगर 100 प्रतिशत शुद्ध लोगों के साथ मिलकर संघर्ष करना चाहते हैं तो ऐसे ही किनारे पर खड़े होकर टीका-टिपण्णी करते रहिये, छींटे तो आपके ऊपर भी पड़ेंगे ही।

रविवार, 28 जुलाई 2013

31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद रंगशाला चलो !

पटना में समस्त संस्कृतिकर्मियों द्वारा वितरित किया जा रहा पर्चा.

बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार व अराजकता के खिलाफ़ 31 जुलाई 2013 ( प्रेमचंद जयंती ) को 10 बजे दिन में 

प्रेमचंद रंगशाला चलो !

मित्रों,

रंगकर्मियों – संस्कृतिकर्मियों की अगुआई में वर्षों तक चलाए गए संघर्ष की बदौलत प्रेमचंद रंगशाला को सीआरपीएफ  के कब्ज़े से मुक्त कराया गया | बाद में इसका जीर्णोद्धार हुआ तथा स्वयं मुख्यमंत्री ने इस राजकीय रंगशाला का उदघाटन किया | रंगकर्मियों को उम्मीद थी कि प्रेमचंद रंगशाला के नवनिर्माण से संस्कृतिकर्म को गति मिलेगी | लेकिन हुआ क्या ? बेहद अफ़सोस व शर्म की बात है कि ‘सुशासन’ के राज में घोषित की गई ‘राजकीय रंगशाला’ आज अश्लीलता की संस्कृति का केन्द्र बनने की ओर अग्रसर है | संस्कृतिकर्मियों के लिए बनी इस रंगशाला को यहाँ के प्रशासकों ने सिर्फ़ मुनाफ़े हेतू दवा इत्यादि बेचनेवाली व्यावसायिक कंपनी के लिए खोल दिया है | ( हाल में ऐसी ही एक कंपनी के कार्यक्रम में सरेआम अश्लीलता का प्रदर्शन हुआ | ) जबकि संस्कृतिकर्मियों के लिए रंगशाला बुक कराना एक बेहद मुश्किल काम बना दिया गया है |
विदित है कि प्रेमचंद रंगशाला भवन में ही बिहार संगीत नाटक अकादमी का कार्यालय भी है | अकादमी की प्रभारी सचिव विभा सिन्हा के आदेश से उपयुक्त करवाईयां बे-रोक-टोक चल रही हैं | संस्कृतिकर्मियों ने जब-जब उनसे शिकायत करनी चाही, उन्होंने अपना तानाशाहपूर्ण रवैया दिखाया | संक्षेप में, संस्कृतिकर्मियों को प्रेमचंद रंगशाला से दूर करने की साजिश साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है | याद रहे, ‘फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी भवन’ को  साहित्यकारों – संस्कृतिकर्मियों से छीनकर इस हुकूमत ने मैनेजरी की पढ़ाई के हवाले कर दिया है | बहरहाल, हमारा मानना है कि  बिहार संगीत नाटक अकादमी घोर अराजकता व भ्रष्टाचार का शिकार बन चुका है तथा इसके पुनर्गठन की तत्काल आवश्यकता है |
दोस्तों, पिछले कई दिनों से यहाँ के रंगकर्मी – संस्कृतिकर्मी उपरोक्त अराजकता व भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लगातार आन्दोलनरत हैं | लेकिन, फिलहाल अनेक मंत्रालयों समेत कला-संस्कृति से जुड़े विभाग भी अपने हाथ में रखनेवाले माननीय मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं | यहाँ तक कि विभाग के सचिव चंचल कुमार ने भी आंदोलनकारियों से मिलाने की जहमत नहीं उठाई | सरकार की तरफ़ से कोई भी सकारात्मक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है | लिहाज़ा, हम तमाम संस्कृतिकर्मी अपने इस आंदोलन को और बड़े दायरे में ले जाने के लिए बाध्य हैं | इसलिये  हम, आप तमाम जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों से अपील करते हैं कि सत्ता की तरफ़ से अप-संस्कृति को बढ़ावा दिए जाने तथा ख़ास तौर पर रंगकर्म-संस्कृतिकर्म की मर्यादा पर हमले के खिलाफ़ ‘प्रेमचंद जयंती’ (31 जुलाई) को ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में प्रेमचंद रंगशाला पहुंचें | पटना समेत राज्य के अन्य हिस्सों से अनेक नाट्य व सांस्कृतिक दल उस दिन वहाँ अपने नाटकों-गीतों अदि का प्रदर्शन तथा अपनी मांगों के समर्थन में प्रतिरोध का स्वर बुलंद करेंगें |

हमारी मांगें 

बिहार संगीत नाटक अकादमी की सचिव विभा सिन्हा को बर्खास्त करो ! 
प्रेमचंद रंगशाला के संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित करो ! 
बिहार संगीत नाटक अकादमी का पुनर्गठन किया जाये  और इसके संचालन में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाये ! 
बिहार संगीत नाटक अकादमी का संविधान बनाने में रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों की सक्रिय भूमिका हो !

निवेदकसमस्त संस्कृतिकर्मी.
   

रविवार, 21 जुलाई 2013

विभा सिन्हा की बहाली ही फर्जी, बिहार संगीत नाटक अकादमी एक सांस्कृतिक घोटाला


lal salaam ke waal se..

जैस की कल रात को ही खबर थी की विभा सिन्हा ने अपने दैनिक कर्मचारी तिवारी जी को ये आदेश दिया था की , कल अहले सुबह से ही मेन गेट पर ताला मार देना ताकि कोई अन्दर जा ही न पाये, हुआ भी यही जब रंगकर्मी सुबह पहुंचे तो ताल बंद मिला, ज्ञात हो की एक ग्रुप वहां पिछले ५ दिन दिन से रिहर्सल कर रहा था , इसकी सूचना ग्रुप ने विभा सिन्हा को लिखित में १० दिन पहले ही दे दी थी , वावजूद इसके ये हुआ , उस ग्रुप का रिहर्सल नहीं हो पाया , रंगकर्मियों ने भी ताले के ऊपर ताल जड़ दिया और लगे जोगीरा गाने, आज सरकारी महकमे को डी० एम्०, एस० पी ० , डी ० एस ० पी ० किसी को रंगकर्मियों याद नहीं आये , मगर जो लोग आये, जो ख़बरें आई और जो तथ्य आये उस ने आन्दोलन की धार तेज कर दी वो इस आन्दोलन के लिए खास थे, आज होसला बढ़ने प्रसिद्ध कवि गोपाल सिंह "नेपाली" जी की भतीजी डाक्टर सबिता सिंह "नेपाली" आयीं , कुमार अनुपम आये, आज ही छत्तीसगढ़ के रंगकर्मी सथियों ने भी अपना समर्थन जताया ,कल प्रवीण कुमार गुंजन भी पटना आके आन्दोलन में सहभागी बनेगें, अब उन तथ्यों पर चर्चा जो आज सामने आये ,जो किसी को भी चोकाने के लोए काफी है ,

दरअसल प्रेमचंद रंगशाला में जिस बिहार संगीत नाटक अकादमी का कार्यालय है, इमानदार विभा सिन्हा जिस की सह - सचिव है और जिस , बिहार संगीत नाटक अकादमी के नियंत्रण में रंगशाला का सञ्चालन होता है वास्तव में इस नाम से कोई संस्था संगठन कही पंजीकृत ही नहीं है , बिहार संगीत नाटक अकादमी का आज तक पंजीकरण हुआ ही नहीं है, नहीं इसकी नियमावली है, और श्री मति विभा सिन्हा की बहाली भी फर्जी है ये किसी कमीशन से नहीं आई है , बल्कि इनकी भली का जो विज्ञापन अख़बार में आया था वो वर्गीकृत कोलम में आया था , जहा सरकारी विज्ञापन नहीं आते , जब किसी तरह का पंजीकरण ही नहीं है तो सरकारी पद कैसा, इसलिए ये पेचीदा मामला है , की आखिर इन पर और बिहार संगीत नाटक अकादमी पर बिहार सरकार पैसे खर्च कैसे करती है, उनका हिसाब कैसे रखा जाता है , इन सब से बड़े सांस्कृतिक घोटाले की बू आती है , आज ही ये बात सामने आये की सुल्तान गंज थाने में इनके खिलाफ कई वर्षों से मामला दर्ज है, इस पोस्ट के साथ विभा सिन्हा की पोल खोलता , उनके अत्याचारों और उनकी ऊँची रुसूख की गवाही देता एक सरकारी चिठी भी पोस्ट कर रहा हूँ जो तत्कालीन मुख्य मंत्री बिहार को लिखा गया है, ऐसे कई दस्तावेज आने बाकि है, ये हमें कानून सिखाते है, रंगशाला में इनका ऑफिस और ये कैसे है, इसका जवाब चंचल जी दें, रंगशाला से किसे बाहर जाना चाहिए श्री मति विभा सिन्हा को या रंगकर्मियों को .....! मित्रों आन्दोलन आन्दोलन जरी है, अपने सारे पूर्व मांग के साथ बिना किसी समझोते के कल फिर सुबह ८.०० बजे से धरना जरी रहेग अपना समर्थन हमें दे 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

...और रंगकर्मियों ने रंगशाला पर ताल जड़ दिया !!

धरना स्थल पर गाते बजाते पटना के रंगकर्मी 
लाल सलाम  के फेसबुक वाल से साभार. 

सुबह से कलाकारों की भीड़ प्रेमचंद रंगशाला के परिसर में इकठा हुई, जैसा की अनुमान था की पुलिस की पूर्वरंग की तैयारी होगी लेकिन ऐसी कोई बात नहीं थी, रंगकर्मियों ने रंगशाला के मुख्य भवन के मुख्य गेट पर ताल जड़ दिया, आज विरिष्ठों की संख्या बढ़ी रंगकर्मियों को ताकत मिली , उनके अनुभव के आधार पर आन्दोलन की रूप रेखा तय करने की बात हुई, एक अति वरिष्ट रंगकर्मी श्री अजीत गांगुली जी ने कहा की " जैसे जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी रूपी बटन को दबाया तो हिंदुस्तान में सत्ता बदल गई, ठीक उसी तरह विभा सिन्हा रूपी बटन दबाने से सारा कल्चरल सिस्टम बदलेगा " और लगभग 12 बजे दिन में ये बात साबित भी हुई, हमें पता चला की जॉइंट सेक्रेटरी के साथ दो सदस्ये जाँच कमिटी बना दी गई है जो विभा सिन्हा मामले की जाँच करेगी, वो टीम बारह बजे रंगशाला पहुंचा, कलाकारों ने अपनी बात बताई, चंचल जी को फिर नेवता भेज गया , रंगकर्मियों ने विभा सिन्हा की सारी कर गुजारी कह सुनाई मांगे दुहराई, विभा सिन्हा की बर्खास्तगी , बिहार संगीत नाटक अकादमी का पुनर्गठन, टीम अस्वाशन देके चली गई , कलाकार डटे रहे, कल फिर तालाबंदी है , मांग जब तक पूरी नहीं होती तबतक.
पार्किंग वाली जगह
आइये थोड़ी बात कल के घटना क्रम पर. कल सारे रंगकर्मी बाहर गेट पर धरना दे रहे थे तो रंगशाला के पिछले गेट से विभा सिन्हा रंगशाला में बारह बजे घुसी और शाम पांच बजे निकली और सारे जरुरी कागजात नृत्यकला मंदिर ले गई खबर है. आज वह वहां मोजूद थी, एक बात और साफ कर देना चाहता हूँ, की रंगकर्मी हो रहे अभिनय कार्यशाला का विरोध नहीं कर रहे है , अगर ऐसा होता तो रंगकर्मी भारतीय नृत्य कला मंदिर में भी तालबंदी करते पर ऐसा नहीं है , इससे साफ पता चलता है की आन्दोलन का रुख एकदम साफ है कि प्रेमचंद रंगशाला को भ्रष्ट विभा सिन्हा के चंगुल से आजाद करना, तो जो रंगकर्मी भाई कार्यशाला में शामिल है , वो कार्यशाला में अपना पीआर  के बनाने के चक्कर में संघर्ष कर रहे साथियों के लिए अनुचित न बोले ( ऐसा निवेदन है ) क्यों की बाते कभी छुपती नहीं , काम तो हमें एक साथ ही करना है, और हाँ इस पोस्ट के साथ एक खाली तस्वीर है, जो रंगशाला की बाये तरफ की दीवाल की है, आज पता चला की विभा सिन्हा इस जगह पर बाहरी लोगों के निजी वाहनों को पार्किंग की सुबिधा उपलब्ध कराती थी , सम्भव है वो इसका टेक्स भी उन्हें देते हों, , इन्होने कलाकारों के पैसे दो -दो सालो तक अपने निजी खाते में रखे हैं , ये अपना कमीशन पहले मांग लेती है तब पैसा देती है , सरकारी नियम के अनुसार 20,000 से बड़ी राशी का भुगतान चेक से करना है, पर मैडम 50,000 रूपये नगद बंटती है और बिना रसीद के टी .डी .एस . भी काटती हैं, राशि कितनी भी बड़ी क्यों न हो मैडम के खाते में जायेगा जरूर , इसको क्या कहेंगे ? अब भ्रष्टाचार कैसा होता है


आज का दिन कल जैसा उतर चढ़ाव भर नहीं रहा, कल 8 बजे से फिर ताल बंदी है, उम्मीद है कल कुछ निर्णायक मोड़ आये ,और उम्मीद पर दुनिया कायम है, पर मांगों से कोई समझोता नहीं होगा .!

रंगमंच पर चलता है चंद लोगों का राज. - मृत्युंजय प्रभाकर.

अपनी मांगों को लेकर धरना पर बैठे पटना के रंगकर्मी 
दुःख होता है जब देखता हूँ कि इस अंधकारमय समय में जहाँ संस्कृति की मशाल जलती रहनी चाहिए, उसी को संस्कृतिकर्मी और संस्कृति मंत्रालय ही बुझाने में लगे होते हैं। देश भर में लोभ-लालच-प्रपंच और स्वार्थ का जो नंगा नाच जारी है, वह जीवन के हर क्षेत्र में है। लेकिन इस बात का अफ़सोस होना लाजिमी है कि जो संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी, साहित्यकार और कलाकार मंच और अपनी रचनाओं से हमेशा देश-दुनिया और समाज बदलाव न सही, समाज सुधार की बात तो करता ही है वह भी ऊपर से नीचे तक उसी लोभ-लालच-प्रपंच और स्वार्थ में आकंठ तक डूबा है। जितना बड़ा नाम, उतने बड़े लोभ-लालच-प्रपंच और स्वार्थ की पोटली। हम जिस दुनिया को छोड़कर कला की दुनिया में आये वह भी वैसी की वैसी निकली। कहीं जैनों, अल्काज़ियों, कपूरों का राज है तो कहीं किसी और खानदान का। नाम बदल जाने से यहाँ चेहरे नहीं बदलते। सब के सब लोभ-लालच-प्रपंच और स्वार्थ में लिप्त। पर संघर्ष बाहरी दुनिया से पहले अपने घर से शुरू होती है। वह चाहे दिल्ली हो या पटना, जयपुर हो या मणिपुर, बेंगलुरु हो या चेन्नई, अब वक़्त आ गया है की संस्कृति की आड़ में छुपे इन तत्वों की पहचान की जाये और इनसे निपटा जाये। पर इसकी यह शर्त होनी चाहिए की मुंहदेखी नहीं चलेगी। बिहार में भ्रष्टाचार पर तो बोलेंगे लेकिन दिल्ली के अपने आकाओं की कारगुजारियों पर चुप्प रहेंगे क्यूंकि यहाँ से लाभ है। यह हद दर्जे का लिजलिजापन है और इससे कुछ नहीं बदलने वाला। पटना में संस्कृति विभाग के विभा सिन्हा, संजय सिंह जैसे लोग अपराधी हैं तो उतना ही बड़ा अपराधी बीइपी में काम करने वाले अशोक तिवारी भी हैं जो कमीशन लेकर रंगकर्मियों को प्रोजेक्ट देते हैं और रंगकर्मी ही उन्हें कमीशन देते भी हैं। वहीँ दिल्ली में बैठे एनएसडी के शूरमा भी उतने ही बड़े अपराधी हैं जो दिन रात पैसे की लूट-खसोट, बाटम-बाँट और अपनों को आगे बढ़ाने में निर्लज्ज तरीके से लगे हैं। संपूर्ण संघर्ष ही रास्ता दे सकता है, वरना सब बेकार की कवायद है।

कार्ल मार्क्स ने 1851 में फ्रांस में लुइस बोनापार्ट के नेतृत्व में हुए सत्ता परिवर्तन को नेपोलेअन बोनापार्ट (लुइस का चाचा जिसने 1799 में यही कम किया था) के सन्दर्भ में रखते हुए लिखा था कि इतिहास हमेशा अपने आप को दुहराता है, पहले त्रासदी के रूप में फिर मजाक के तौर पर! बिहार में प्रेमचंद रंगशाला पर नियंत्रण और संस्कृति मंत्रालय में फैले भ्रष्टाचार को लेकर रंगकर्मियों के आन्दोलन को मैं इसी तौर पर देखता हूँ। 1987 में जिन रंगकर्मियों और संगठनों (खासकर इप्टा) के नेतृत्व में प्रेमचंद रंगशाला को CRPF से मुक्त करवाने के लिए आन्दोलन खड़ा हुआ आज वही रंगकर्मी और संगठन मंत्रालय के कर्ता-धर्ता हैं और रंगकर्मियों का आन्दोलन एक तरीके से उन्हें लक्षित करता है। आज मार्क्स के कथन को अपनी आँखों के सामने चरितार्थ होता देख रहा हूँ। बिहार और बंगाल की राजनीति में तो इसे पहले ही देख चुका हूँ अब बारी संस्कृति में इसके उद्घाटन का है। इतिहास ने यह चक्र बहुत जल्दी पूरा कर लिया है। मार्क्स की ही शब्दावली में कहूँ तो मुझे यह वर्ग परिवर्तन का मसला ज्यादा है। इस पोस्ट के माध्यम से मैं अपने पूर्व क्रांतिकारी वरिष्टों से यह मांग करता हूँ कि यदि उनके ऊपर सीधे-सीधे कुछ आरोप हैं तो उन्हें खुलकर सामने आकर अपनी बात रखनी चाहिए नहीं तो समझा जाएगा कि सच में उनका चारित्रिक पतन हो चुका है। इनमें बहुत सारे मेरे अपने लोग हैं जिनसे सीखकर ही आज जो भी बन सका हूँ, हूँ। उनका यह अवदान मैं ताउम्र मानता रहूँगा लेकिन शायद दिल के किसी कोने में उनका सम्मान न बचाए रख सकूँ। 
                                                                         आलेख मृत्युंजय प्रभाकर के फेसबुक वाल से साभार.

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

पटना के रंगकर्मियों को आवारा मानते हैं संस्कृति विभाग के सचिव !!!

मजिस्ट्रेट साहेब और पटना के रंगकर्मी 
यह पोस्ट लाल सलाम के वाल से साभार.


आज तडके सुबह 8 बजे पटना के रंगकर्मी एकबार फिर भ्रष्ट पदाधिकारी ( सह - सचिव बिहार संगीत नाटक अकादमी ) विभा सिन्हा की बर्खास्तगी के मांग को लेकर इकठा हुए , जैसा की कल ही तय हुआ था, ज्ञात हो की कल ही कला विभाग के निदेशक विनय कुमार के हाथो रंगकर्मियों द्वारा कला सचिव चंचल जी को अपने मांगों और रंगकर्मियों से आके बात करने की जानकारी दी गई थी , परन्तु न विनय जी आये , न चंचल जी आये , न भ्रष्ट विभा सिन्हा आई , रंगकर्मी अपनी मस्ती में गाना बजाना कर रहे थे, वो भी रंगशाला के मुख्य गेट पर और जिन लोगों ने रंगशाला को देखा है वो ये जानते है की रंगशाला का मुख्य गेट मुख्य सड़क से लगभग 30 फिट की दुरी पर है, जहा से लॉ एंड आडर का कोई खतरा नहीं था, तभी पटना के डी.एम् साहब को एक फोन आता है की कुछ सड़क के आवारा लोग लॉ एंड आडर को हाथ में ले रहे है, ये फोन माननीय सचिव चंचल जी का था, फिर क्या था, दनदनाती हुई पुलिस की एक गाड़ी आके रूकती है, उससे बन्दुक धरी उतर के रंगकर्मियों के तरफ लपकते है, अचानक सड़क के लोग हमें ऐसे देखने लगते है की हम अपराधी हों , अधिकारी आ के हमें कहते है , आप लोगों ने डी.एम साहब को सूचना क्योँ नहीं दी ? आप से शहर का लॉ एंड आडर बिगड़ने का खतरा है, आप नहीं हटे तो आप पर लाठी चार्ज होगा, पानी के फव्वारे  छोड़े जाएंगें, मगर रंगकर्मी कब डरने वाले थे जब रंगशाला को सीआरपीएफ से मुक्त करा सकते है तो ये क्या चीज है, वो धमका के चले गए , रंगकर्मियों ने उस पदाधिकारी के हाथों एक ज्ञापन डीएम साहब को भी भेजा, उसके ठीक एक घंटे के बाद पिली बत्ती लगी मजिस्ट्रेट की गाड़ी आके रुकी साथ में डिपुटी डीएसपी मनोज कुमार तिवारी आये और आते ही, बरस पड़े, आपलोग गैर क़ानूनी तरीके से धरना पर बेठे है, आप लोगों को हम गिरफ्तार करेंगे, आपकी मांगें क्या क्या है ? जवाब मिला चंचल जी को हमसे बात करने के लिए आना होगा, इस पर तिवारी जी बोले सचिव सड़क के लोगों से नहीं मिलते है, इस बात पर सरे रंगकर्मी बोले तो फिर आप जो चाहे करें हमें कोई एतराज नहीं है, वो बोले आप पर पहले एफ़आइआर करेंगे फिर गिरफ्तार करेंगे , सारे रंगकर्मी एक सुर में चलने को तैयार हो गये, तिवारी जी सकपका गये सोच के ये आये होंगे की जेल से डरा देंगें , पर चाल उलटी पारी कोई डरा ही नहीं, 13-14 साल के बच्चों ने भी गिरफ्तारी का न्योता दिया , सीन देखने लायक था , अचानक भगत सिंह की याद ताजा हो गई, अधिकारी वही रुक्के अपने आकाओं से बात करते रहे आधे घंटे के बाद वो खुद चले गये, कल फिर 8 बजे सुबह से ताला बंदी की योजना है, ये बात प्रसाशन को पता है तो मुनासिब है हमारे लिए पहले से वह तैयारी होगी और सम्भव है रंगकर्मियों को जाते ही गिरफ्तार कर लिया जाये इस लिए पुरे भारत के रंगकर्म से जुड़े लोगों से निवेदन है की वो हमारी इस लड़ाई में हमारा साथ दें, कल 8 बजे सुबह से फेसबुक के माध्यम से हम से जुड़े रहें,

प्रेमचंद रंगशाला के गेट पर धरना दे रहे पटना के रंगकर्मी 
अब तस्वीर का दूसरा रुख आन्दोलन के दुसरे दिन रंगकर्मियों की संख्या बढ़ी, कुछ बरिष्ट रंगकर्मी आये उनसे हमारा हौसला और बढा वहीँ आपसी परिचर्चा में ये बातें भी सामने आयें की इतनी खलबली के बाद अख्तर बंधू (जावेद अख्तर, परवेज अख्तर , तनवीर अख्तर ) व हज्जू जी, अनिश अंकुर क्यूँ नहीं आये , जब कि उनको पल पल की खबर है, आइये बात की तह में जाए, दरअसल पिछले लगभग 10 वर्षों से विभा सिन्हा, संजय जी ( ये नाम आज सामने आया जो बिहार संगीत नाटक अकादमी के कर्मचारी है जो किसी भी काम के लिए 30 % मांगते है ) जैसे लोग राज कर रहे है , अब तक के हर धरने को (इस को छोड़ के) ये महाशय ही अपनी छत्रछाया में करवाते थे और बड़ी चालाकी से दुसरे दरवाजे से अपना उल्लू सीधा करके सरकारी मसिनारिज का इस्तेमाल करते थे, और सरकारी अमला इनको रंगभाग्त समझ के सारा प्रसाद इनकी जेब में डाल देता था और सारे रंगकर्मी इनकी जय जय करते थे और बाकि रंगकर्मी ये सोंचते थे वह मामला सलट गया ! लेकिन यहाँ तो मैच फिक्स होता था, आज ही ये बात सामने आई है की विभा सिन्हा के खिलाफ दर्जनों आरटीआई. वितीय घोटालों का मामला लंबित है, ऐसी हालत में अख्तर बंधू और शेष दो वरिष्टों का चुप रहना कहीं न कहीं उनकी पोल खोलता है, आज ये भी अहम् फैसला हुआ कि अगर ये पाँचों अपनी स्थिति साफ नहीं करते तो इनका पटना रंगमंच में बहिष्कार होगा , निवेदन ये है की आ के न आने का कारण बताएं या फिर किसी और माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट करें ....................!
कल फिर 8 बजे ताला बंदी है रंगकर्मियों से निवेदन है की वो पहुँच के इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ दें ..!