रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

सोमवार, 2 जुलाई 2012

क्या "यह" पटना रंगमंच है ?

हिंदी रंग-संसार में पटना रंगमंच का अपना एक इतिहास और पहचान रही है | ये जगह "समझदार" रंगकर्मियों के तेवर के लिए भी चर्चित रहा है | हाँ आलेख और प्रतिक्रियाएं  बिहार खोज खबर से साभार प्रस्तुत है जैसे का तैसा | पढ़ें और स्वं तय करें ...माडरेटर मंडली |

मसाज पार्लर में तब्दील हो चुका है एन.एस.डी.- कुणाल

‘‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अब एक मसाज पार्लर में तब्दील हो चुका है। एन.एस.डी ऐसे कलाकार तैयार कर रही है जो कलाकार कम महज क्राफ्ट व लेबर है। इनमें किसी तरह की सामाजिक जिम्मेवारी का कोई अहसास नही है। इसी समझदारी की वजह से मैं कठोर से कठोर शब्दों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की निन्दा करता हूं। नाट्य विद्यालय आज कलाकार कम क्राफ्ट कर रहा है और जिम्नास्टिक लेबर ज्यादा तैयार कर रहा है। एन.एस.डी अब एक डूबता जहाज है।’’ ये बातें वरिष्ठ रंगकर्मी कुणाल ने रंगकर्मियों-कलाकारों के साझा मंच ‘हिंसा के विरूद्ध संस्कृतिकर्मी’ द्वारा आयोजित बातचीत ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं बिहार रंगमंच’ में बोलते हुए कहा।
यह बातचीत युवा रंगकर्मी विकास की स्मृति में आयोजित किया गया था। कुणाल ने आगे कहा, ‘‘रंगमंच की प्रकृति है कि वो हमेशा स्थानीय होगी। अगर वह स्थानीय होगा तो अपने आस-पास के समाज व उसके संर्घर्षों से अवश्य जुड़ा रहेगा।राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का पूरे थियेटर की समझदारी में ही यह निहित है उसे स्थानीय नहीं राष्ट्रीय होना है।’’ प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित इस कार्यक्रम में सर्वप्रथम आए सभी लोगों ने विकास की तस्वीर पर माल्यार्पण किया। तत्पश्चात् विकास के दोस्त रहे सुभाष ने विकास के बारे में लोगों को बताया। ज्ञातव्य हो कि विकास की मौत 26 जून 2003 को पटना से अपने गाव जाने के दौरान हो गयी थी। विकास की उम्र उस वक्त मात्र 21 साल की थी। विकास थियेटर और समाज के प्रति बेहद प्रतिबद्ध रंगकर्मी था और बहुत कम दिनों में उसने अपनी पहचान और ख्याति अर्जित की थी। विकास के सहपाठी रहे सुभाष, जो खुद भी लंबे समय से रंगकर्म से जुड़े रहे हैं, ने विकास के जीवन के बारे में उपस्थित लोगों क बताया कि कैसे वो थियेटर, छात्र राजनीति,संगीत एवं अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता में एक समन्वय बना कर चलने वाला रंगकर्मी था। उसने हमेशा एक मूल्य को जीने की कोशिश की।
विनोद अनुपम ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा, ‘‘बातचीत का विषय काफी अहम है और काफी दिनो से चला आ रहा है। एक समय बिहार से काफी लड़के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय गये, जिसका दुष्प्रभाव यहा के रंगमंच पर पड़ा. वे दुबारा बिहार से जुड़ नहीं पाये। इसलिए बिहार के लिए ये बड़ी बात नहीं है कि यहां से किसी का एन.एस.डी. में नहीं हुआ ! पर सवाल यह है कि जनता के पैसों से चल रहे इस संस्थान में आखिर बिहार के लड़के क्यों नहीं ? क्या बिहारी प्रतिभा से डर गया है ये संस्थान ? या इसका कोई राजनैतिक कारण है, जो बिहार को जगह नहीं देना चाह रहा है।’’
सर्वप्रथम कुमार अनुपम ने सभा को संबोधित करते हुए विस्तार से बताया, ‘‘एक संस्थान के रूप मे थियेटर का प्रतिनिधित्व करने लायक संस्था नहीं है। अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पूरी तरह भ्रष्ट हो चुका है।’’ प्रो संतोष कुमार ने अपने संबोधन में कहा‘‘ बिहार का रंगमंच हमेशा से विरोध का रंगमच रहा है। जिससे एन.एस.डी डरती रही है। इन्हीं वजहों से एन.एस.डी. बिहार के रंगकर्मियों के साथ इस तरह का व्यवहार करती रही है। अस्सी के दशक में मै भी सक्रिय था और उस समय विरोध का रंगमंच था। विरोध हमेशा सरकार का, व्यवस्था का होता है। यह मामला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के साथ भी है। बिहार के लड़को के साथ गलत हुआ है। विरोध की आवाज मुखर होनी ही चाहिए और हमे अपने हक के लिय खुद लड़ना होगा’’ ज्ञातव्य हो कि 2012 में बिहार से एक भी रंगकर्मी का चयन फाइनल परीक्षा में नहीं हुआ। जानकार बताते हैं कि ऐसा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने जानबूझ कर किया है। क्योकि बिहार के रंगकर्मी हमेशा से उसकी गलत बातों का विरोध करते रहे हैं।
2009 में शशिभूषण वर्मा की मौत के बाद जब पटना के रंगकर्मियों ने शशि की मौत के कारणों पर आवाज उठायी तबसे पूरा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रशासन चिढ़ा हुआ है। इसी चिढ़ के परिणामस्वरूप एन.एस.डी. ने बिहार से किसी का एडमिशन नहीं लिया। एन.एस.डी. के इस रवैये से पूरे पटना रंगमंच में बेहद आक्रोश है। इसी आक्रोश क अभिव्यक्ति देते हुए मनीष महिवाल ने बताया कहा‘‘ रंगकर्मियों के बीच आपसी मतभेद के कारण एकजुटता नहीं हो पाती है।अगर एकजुटता रही तो हमलोग एन.एस.डी. को सबक सिखा सकते हैं। हमारे बीच के ही लोगों की वजह से आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय इस तरह के कदम उठा रहा है।’’ राजीव रंजन श्रीवास्तव ने अपने लंबे अनुभव को शेयर करते हुए बताया‘‘ कि आज तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने पटना में एक भी वर्कशाप का आयोजन नहीं किया है। इसके साथ-साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े लोग प्रदेश के प्रति जिम्मेवारी को नहीं निभाते।’’
राजीव रंजन श्रीवास्तव ने आगे बताया, ‘‘ झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी पट्टी क्षेत्रों में बड़े फलक पर रंगमंच में काम हो रहा है पर इन क्षेत्रों से किसी का ना चुना जाना भारी आश्चर्य में डालता है। वर्कशाप से लगातार खबरें आ रहीं थीं की बिहार के छात्र का काफी अच्छा कर रहें हैं पर अंत में किसी का ना होना राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पर कई सारे सवाल एक साथ खड़ा करता है। इस बात का ताकत से विरोध होना चाहिए।’’ युवा रंगकर्मी अजीत कुमार ने कहा‘‘ मैं भी कल तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जाने की सोचता था। लेकिन आज मेरा मोहभंग हो गया है। बिहार के जो एन.एस.डी के पासआउट हैं उनकी कोई हैसयित एन.एस.डी के भीतर नहीं है। वे सब के सब चुप रहते हैं। बिहार के प्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का पूर्वाग्रह काफी दिनों से है जिसके खिलाफ बोलने का वक्त आ गया है।’’ सहजानंद ने कहा, ‘‘मुझे एन.एस.डी. के लोगों पर कभी भरोसा नही रहा। पटना सिटी से लेकर दानापुर तक के रंगकर्मियों को एक मंच पर लाने की आवश्यकता है अन्यथा हम इस लड़ाई का आगे नहीं ले जा पायेंग। मैं इस लड़ाई में हमेशा आप लोगों के साथ रहूंगा।’’
अनीश अंकुर ने भी कड़े शब्दों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के खिलाफ विरोध दर्ज करते हुए कहा, ‘‘नाट्य विद्यालय एक ऐसा थियेटर ला रहा है जिसका कोई समाजिक सरोकार नहीं है। लाखों रूपय खर्च कर नाटक को डेकोरेशन और सजावट की वस्तु बना दिया है। ऐक्टर को सब्जेक्ट के बजाय आब्जेक्ट में तब्दील कर दिया गया है।’’ अनीश अंकुर ने आगे कहा, ‘‘आज कुछ बिहारी एन.एस.डी. छात्रों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है कि अगर आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का विरोध करते हैं तो इस से बिहार की छवि खराब होगी। मुझे लगता है कि उन्हें यहां आकर देखना चाहिए की विद्यालय की क्या छवि बची है बिहार में? इन्हीं वजहों से एन.एस.डी का अब नाम हो गया है ‘नौट सीरियस अबाउट ड्रामा’।’’
सभा को वरिष्ठ रंगकर्मी ध्रव कुमार ने भी संबोधित किया। सभा में सुरेश कुमार हज्जू, युवा रंगकर्मी गौतम, अभिषेक, कुंदन, आशुतोष, अभिज्ञ, पंकज, मनोज, मोनार्क, सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर, गजेंद्रकांत शर्मा, पत्रकार नवीन रस्तोगी आदि मौजूद थे। सभा का संचालन किया युवा रंगकर्मी जयप्रकाश ने। तमाम उपस्थित लोगों ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के खिलाफ मुहिम को  तेज करने की अपील लोगों से की।
सुभाष पटना के युवा संस्कृतिकर्मी हैं और अभी ईएफएल, हैदराबाद में स्पेनिश के छात्र है

21 Comments


  • Parvez Akhtar wrote on 29 June, 2012
    कुणाल जी के इस वक्तव्य से सहमत नहीं हुआ जा सकता है |
    एनएसडी हमारे ‘सिस्टम’ का ही एक अंग है और यह शुष्क पूँजीवादी रुझान और कई विरोधाभासों का शिकार है | नतीजतन यह कला प्रशिक्षण संस्थान, एक कलावादी और रूपवादी नाट्य ‘मॉडल’ के केंद्र के रूप में परिवर्तित होता जारहा या होगया है | किन्तु फिर भी इसे ‘मसाज पार्लर’ कहना अनुचित है, कुंठित मानसिकता का परिचायक है |
    भारतीय उप-महाद्वीप के रंगमंच के क्षेत्र में एनएसडी के साकारात्मक योगदान को कम करके नहीं आँका जासकता | आवश्यकता है आज उसकी भूमिका की वस्तुनिष्ठ समीक्षा की जाए |
    मुझे स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन के साथ जन-नाट्य की समस्या पर नब्बे के दशक में हुई मुसलसल बहस की याद आरही है | नेमिजी ‘इप्टा’ के प्रारंभिक दौर के संगठनकर्ता थे, किन्तु तब वे उससे अलग होगये थे और उसकी आलोचना किया करते थे | उन्होंने तब कहा था ” इप्टा या पीपुल्स थियेटर से जुड़े नाट्यकर्मियों को ‘क्या करना है’, यह तो पता होता है; किन्तु ‘कैसे करना है’, यह नहीं पता होता | ” दरअसल वे थियेटर में ‘फॉर्म’, ‘क्राफ्ट’ और ‘डिजाइन’ के महत्त्व को रेखांकित करना चाहते थे | उनकी बात एक हद तक प्रासंगिक भी थीं, परन्तु ‘थियेटर सिर्फ ‘फॉर्म’, ‘क्राफ्ट’ या ‘डिजाइन’ नहीं है | अगर पारम्परिक शब्दावली का प्रयोग करें तो, यह (डिजाइन) रंगमंच के केन्द्रीय तत्त्व ‘अभिनय’ का एक अंग ‘आहार्य’ मात्र है | फॉर्म या रूप के प्रति आक्रामक आग्रह का सबसे बड़ा जो नुकसान हुआ है वह है – अभिनेता का महत्त्वहीन होते जाना | ऐसे दौर में, रंगमंच रूपवाद से कैसे बच सकता है |
    हर नाट्य-रचना कथ्य के अनुसार ही अपना रूप या फॉर्म चुनती है और यही दर्शकों की रंगमंच की ज़रुरत के अनुसार, उनकी नाट्य-भाषा में, उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम भी होती है |
  • ramkumar wrote on 30 June, 2012
    मै कुणाल जी के बात से विल्कुल सहमत हू.यह नेशनल स्कूल आफ ड्रामा नही वल्की नेशनल स्कूल आफं दलाल बन गया है.इसमे नामांकन दलाली के अधार पर होता है और यह संस्थान रंगकर्मी नहीं अब सांस्कृतिक दलाल पैदा कर रहा है.परवेज जी आपके भाई तनवीर अख्तर भी आजकल इस दलाल संस्था के आगे पीछे कर रहे है.और रही बात आपकी तो आप भी पता नहीं क्यों एन एस डी के प्रती नरम रुख रखते है क्या आप इसका जबाब देंगे.
  • sonalee wrote on 30 June, 2012
    ठिक कहा रामकुमार भाई आपने यह संस्था अब दलालों का अड्डा बन गई है.इसके जुडे जितने भी रंगकर्मी है इनकों सिर्फ इस संस्था के चमचागिरि करने के अलावे और कोई दूसरा काम नहीं है.जब शशी की मौत के समय जब इन लोगों ने उस दलाल संस्था का साथ दिया तो इन्से और क्या उम्मीद की जा सकती है.एन एस डी से जुडे हुए तमाम लोग शशी की मौत के जिम्मेदार है.और ये दाग इन्से कभी छूट नही सकता.आज इस संस्थान ने किसी बिहारी छात्र का नमांकन नहीं होने दिया और ये लोग कुछ नहीं बोल रहे है इसका मतलब क्या है.इन्कों सच्च का साथ देने में क्या दिक्क्त हो रही है
  • deepak wrote on 30 June, 2012
    साथियों अब समय आ गया है कि एन एस डी की तनाशाही के खिलाफ तमान  हम पटना के रंगकर्मी एकजूट हो.तभी हमलोग इस संस्था को मनमानी करने से रोक सकते है,.मै एन एस डी से जुडे हुए साथियों से आग्रह करता हूं कि वे इस संस्था पर दबाव बनाए जिससे यह संस्था मनमानी नहीं कर सके.बिहार के रंगकर्मियों का नमांकन नहीं होना इसलिए कि वे लोग शशी की सदिग्ध स्थिति में हुई की सही जानकारी माग रहे थे और एन एस डी की क्रियाकलापों पे सवाल खडा कर रहे थे?साथियों यह बिहारी अस्मिता का सवाल है.अब हमलोगों को अपने अधिकार के लिए लंबी लडाई लडनी होगी 
  • rohit wrote on 30 June, 2012
    एन एस डी को अपने बारे में इल्हाम ज्या दा हो गया है उसे एसा लगता है कि उससे जुडे लोग उसको के किए कुछ भी कर देंगे तो यह गलत है.बिहारियों का एडमिशन न लेकर इस संस्थान ने भारी गलती की है.जब बिहारी लोग अपने अधिकार लो लेकर उठेंगे तो इस संस्थान और इसके भाडे के लोंगों को कही छुपने की जगह नहीं मिलेगी 
  • avinash wrote on 30 June, 2012
    kunal ji sahi kaha hai yah ak masaj parlar hai.aaj isake padhne  wale log kabhee rangmanch ko aage nahi badhTE hai.ye log iske sahaare mumbai jaane ki phirak me rahate hai
  • nirbhay wrote on 30 June, 2012
    n s d hay hay,tanasahi nahi chalegi.n s d ke dalaalo hosh me aao
  • ramgopal wrote on 30 June, 2012
    n s d walo sharm karo
  • ranjeet wrote on 30 June, 2012
    मुझे घृणा आती है एन एस डी के एसे क्रियाकलापों पर.ये संस्थान हिन्दी भाषी क्षेत्र में  थियेटर को बढावा नहीं देति है और थियेटर के नाम पर बकवास चीजे परोस रही है.कभी इसने जनता का नाटक नुक्कड नाटक को प्रोत्साहित नहीं किया.यहसिर्फ बजारु और चलताउ किस्म ्के नाटक को आगे बढाति है.इस संस्थान के अन्दर की आत्मा कब की मर चुकी है सिर्फ इसका शरीर बाकी है और सही मायनों में यह संस्थान नांट सिरियस फार ड्रामा के रुप में तब्दील हो चुका है
  • anjan kumar wrote on 30 June, 2012
    थियेटर पर हुइ गंभिर बहस के लिए मै हिंसा के विरुध सांस्कृतिक मंच के लोगों को बधाई देता हु जिन्होने इद दलाल संस्था के खिलाफ अवाज उठाया.साथ ही मै परवेज अख्तर से आग्रह करत हू कि वे एन एस डी के बारे में अपने रुख में कडापन लाए.तथा इस संस्था पर दबाव बनाए जिससे कि बेहतर सांस्कृतिक माहौल बनाया जा सके.
  • prabhat wrote on 30 June, 2012
    भाई साहब अब एन एस डी के लोगो को अपने अहंकार को खत्म करना होगा जिससे रंगमच को बढावा मिल सके.अगर वह एसा नहीम करती है तो उसे गंभिर परिणामों का सामना करना पडेगा.वैसे भी ये लोग सवालों से भागते है.
  • sonam singh wrote on 30 June, 2012
    परवेज साहब ,कुणाल जी के द्धारा एन एस डी के रंगविरोधी चरित्र को उजागर करना,उसके क्रियाकलापों पे सवालिया निशान लगाना, आलोचना करना अगर उन्के कुंठित मानसिकता का परिचायक है तो एन एस डी के द्धारा लगातार किये किए जा रहे कुकर्मों के खिलाफ आपका कुछ न बोलना और एक हद तक उसका बचाव करना किस मानसिकता का परिचायक आप इसका उतर जरुर दे . जैसा कि हम सब जानते है कि इस संस्थान की लपरवाही से हमारे शशि की मौत हुई और यह संस्थान आज तक उसकी मेडिकल रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया.अभी उसने किसी बिहारी छात्रों क नमांकन नहीं लिया.इस संस्थान कभी बिहारी रंगमंच से कोई लगाव नहीं रहा.अब तो इसके कैंप भी नहीं लगते है.इन सब के कारण अगर इस के खिलाफ कोई अवाज उठाता है तो हमे उसका साथ देना चाहिए न की उसका विरोध करना चाहिए.एन एस डी की यही चाल रहती है कि कैसे पटना रंगमच में फूट डाली जाए.इसके लिए वह समय समय पर अपने मोहरों को आगे बढाति रहती है.परवेज साहब अगर आप एन एस डी के खिलाफ अवाज उठाएगे तो उसे मजबुर होकर सकारत्मक कार्यों को करना पडेगा.
  • prachi sharma wrote on 30 June, 2012
    आजतक पता नही क्यों एन एस डी की तारिफ करते हमने किसी को नहीं सुना है एसा क्यों है साथी.सही मायनों मे देखे तो एन एस डी  के पास एसा कोई डाकुमेंट नही है जिससे वह बिहारी रंगमंच में अपनी उपयोगिता साबित कर सके.जहां तक मुझे जानकारी है यह अगर किसी बिहारी छात्र का नमांकन भी करता है तो वह वह भी सबसे आखरी में लेता है
  • rajesh yadaw wrote on 1 July, 2012
    एन एस डी एक पारदर्शी संस्थान नहीं इसके क्रियाकलाप भी अलोकतांत्रिक है.यह अपने सभी निर्णयों को बिना किसी के राय मशुहरा के अपनी मर्जी से करता.खुद अंकुर जी जैसे नाटकार ने इसके अलोकतांत्रिक चरित्र पर सवाल उठाए है.भारत की कला संस्कृति को बचाने तथा उसे समृद्ध करने के नाम पर इसने देश भर में सांस्कृतिक लूट का माहौल खडा किया है.अब तो इनके नाटकों में भारतिय समाज की प्रगतिशिल संस्कृति भी नहीं दिखती है.आर्ट और क्राफ्ट के नाम पर बकवास चीजे मंच पर् दिखाई पडती है..इतनी अराजक्ता के बाद भी पता नहीं एन एस डी से जुडे लोग इसपर सवाल क्यों नहीं उठाते.ताजुब्ब लगता है कि परवेज साहब जैसे लोग इस भ्रष्ट संस्था की तारीफ कर रहे है.हा एन एस डी की एक खासियत जरुर है वह अपने गुर्गों को अच्छा सम्मान देती है जैसे शशी की मौत के बाद संजय उपाध्याय को भोपाल में एक संस्था का निदेशक बनाया है
  • binit wrote on 1 July, 2012
    अभी हाल में ही इंसेफलाइटिस से बच्चे मर रहे थे और वे जूनियर डाक्टर  हडताल पर थे 
  • Parvez Akhtar wrote on 1 July, 2012
    ……….. मुझे खेद है कि मेरी टिप्पणी को एनएसडी के समर्थन या स्थानीय रंगमंच के विरोध के रूप में देखा गया | अगर मित्रों ने ध्यान से मेरी टिप्पणी पढ़ी होती, तो उन्हें ऐसा नहीं लगता | मैंने एनएसडी की वस्तुनिष्ठ समीक्षा का आग्रह किया है और यह भी कि ‘मसाज पार्लर’ जैसे अपशब्द के प्रयोग से बचा जासकता है | प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले मित्रों को संभवतः पता होगा कि कुणालजी मेरे घनिष्ट मित्र हैं और हमने वर्षों साथ कई नाट्य-परियोजनाओं पर काम किया है | यह भी बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उन्होंने अपना पहला हिंदी नाटक ‘बर्बरीक उवाच’ का लेखन मेरे लिए किया था, जिसकी प्रस्तुति तब काफी चर्चित भी हुई थी और बाद में उसे ‘मोहन राकेश नाट्य लेखन पुरस्कार’ भी मिला | मित्र कुणाल से मैंने सिर्फ भाषा-संयम की अपेक्षा की है |
    अब जहाँ तक मित्रों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का सवाल है – मैंने जहाँ अपनी टिपण्णी का अंत किया है वहीं से अपनी बात शुरू करता हूँ – ” हर नाट्य-रचना कथ्य के अनुसार ही अपना रूप या फॉर्म चुनती है और यही दर्शकों की रंगमंच की ज़रुरत के अनुसार, उनकी नाट्य-भाषा में, उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम भी होती है ” – क्या यह स्पष्ट नहीं है कि ये पंक्तियाँ एनएसडी, जिसे मैंने ‘पूँजीवादी रुझान और कई विरोधाभासों का शिकार, कलावादी-रूपवादी नाट्य केन्द्र’ के रूप में रेखांकित किया है, के लिए हैं और यह भी कि एनएसडी, दर्शकों की नाट्य-भाषा में, उनकी आशाओं-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कर पाने में सक्षम नहीं है ? अब इसे एनएसडी के प्रति मेरे ‘नर्म रुख’ के रूप में देखा जाए, तो इसका मैं क्या जवाब दूँ ?
    एनएसडी ही नहीं लगभग हर सत्ता-संपोषित संस्थान, अपने मूल-उद्देश्य के प्रति लापरवाह है या विरोधाभास का शिकार है | यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि जिस राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को नाट्य-कला के प्रशिक्षण के उद्देश्य से स्थापित किया गया; वह रंगमंच के लिए नहीं, बल्कि सिनेमा और टीवी के लिए मानव-संसाधन जुटाने के केन्द्र के रूप में काम कर रहा है | क्या यह भी सच नहीं है कि एनएसडी में प्रवेश के इच्छुक अधिकांश रंगकर्मी, अंततः सिनेमा में जाने की सीढ़ी के रूप में ही एनएसडी का उपयोग करना चाहते हैं ? ठीक वैसे ही, जैसे आईआईटी या मेडिकल स्नातक, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में प्रवेश के लिए इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं | किन्तु दोष केवल युवकों का नहीं है, बल्कि यह पूरे ‘सिस्टम’ के विरोधाभास का परिचायक है |
  • Parvez Akhtar wrote on 1 July, 2012
    पुनश्च
    जहाँ तक एनएसडी के वर्चस्व की बात है, तो इसे क्षेत्रीय स्तर पर नाट्य विद्यालय की स्थापना से निरस्त किया जा सकता है | बिहार में एक उच्च-स्तरीय नाट्य प्रशिक्षण केन्द्र की ज़रूरत से क्या हम इनकार कर सकते हैं ? आईसीसीआर (भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्) की राज्य शाखा पटना में खुल रही है | क्या एनएसडी को बिहार सहित कुछ अन्य राज्यों में अपनी इकाई नहीं शुरू करनी चाहिए ?
  • rajesh yadaw wrote on 1 July, 2012
    परवेज साहब अगर एन एस डी अपने मूल उदेश्यों से भटक गया है तो क्या इसकी कडी शब्दों में आलोचना नहीं होनी चाहिए.परवेज साहब किसी भी तनाशाही संस्थान का हमे पुरजोर ढंग से विरोध करना चाहिए.आप आज के समय मे एन एस डी से जुडे तमाम लोगों के नाटकों को आप देखे और बताए की इन्के नाटकों में कहीं भारतीय गाव समाज की संस्कृति दिखाई पडती है.आज इस संस्था का काम उपभोक्तावादी संस्कृति के संरक्षण देना है.और मुझे तो कुणाल जी बात सही लगति है.यह सही में सांस्कृतिक मसाज पार्लर बन गया है.यहा पर उपभोक्तावादी संस्कृति को थोडा मसाज करके उसे भारतीय परिवेश का मुखौटा लगाकर परोसा जाता है.
  • amitesh wrote on 1 July, 2012
    आलोचना की भाषा कि मर्यादा का संकेत जो परवेज़ जी ने किया है वह बिलकुल वाज़िब है. और रंगकर्मियों का यह कैसा विरोधाभाषी रवैया है कि वह इसे एक चुका हुआ, मृत संस्थान मानती है और इस मृत संस्थानों में कुछ छात्रों के दाखिल अना होने से रोष भी रखती है!
    रा.ना.वि. की आलोचना से इतर एक कार्य मुख्य है कि इन सालों में बिहार के रंगमंच पर कितना महत्त्वपुर्ण काम हुआ? क्या बढ़िया रंगमंच के लिये हम रा.ना.वि. का मूंह जोहते रहेंगे! भारतीय रंगमंच पर आज जो प्रतिभाशाली निर्देशक उभर रहें हैं, जो प्रतिबद्धता से सक्रिय हैं उनमें अधिकांश रा.ना.वि. से नहीं है. मोहित ताकलकर, शंकर, अतुल कुमार, मानव कौल, सुनील शानबाग इत्यादि को देखिये इनमें से कोई रा.ना.वि. से नहीं हि लेकिन हां इनमें से कोई बिहार से भी नहीं है.
    बिहार के रंगमंच के स्तर को बढ़ाने की जिम्मेवारी क्या बिहार के रंगकर्मियों की नहीं है? क्या रा.ना.वि को अप्रासंगिक मानकर राज्य के रंगमंचीय विधाओं के सरंक्षण , संवर्द्धन और प्रशिक्षण की जिम्मेवारी राज्य सरकरा की नहीं है? हमने कितनी बार राज्य सरकार पर दबाव बनाया है.
    आलोचना का एक प्रकार है सर्जना..लफ़्फ़ाज आलोचना खुद को हास्यास्पद बना देती है.
  • विभा रानी wrote on 1 July, 2012
    बात कुणाल  जी के रानावी पर किए गए कमेन्ट पर शुरू हुई है तो पहले रानावी की बात। इस बात में अब कोई टाठी नाही रह गया है की जिस उद्देश्य से एनएसडी की स्थापना की गई था, आज वह उससे विमुख हो चुकी है। वजह कई है^। देश का शहरीकरण, शहर  और शहरी व उनके काम  को ही सबसे बढ़िया मनाने की मानसिकता। हमारे एक मित्र हैं-शेखर सेन। अपने बलबूते एकपात्रीय नाटक  कर रहे है। ढेर सारे एनएसडीय न  उनके मित्र हैं, जिनसे वे कहते हैं- एनएसडी माने not serious about Drama. शेखर सेन  एनएसडी से नाही हैं। आज  गैर एनएसडीयंस भारी संख्या में हैं जो रंगमंच कर रहे हैं और शिद्दत से कर रहे हैं। लेकिन वे सभी चाहते हैं की एनएसडी उनकी ओर देखे। उनकी चाह वाजिब है। मैं स्वयम कई बार कह चुकी हूँ की एनएसडी को गैर एनएसडी की प्रस्तुतियों को अपने यहा^ कराना चाहिए। इसे वे अपने छात्रों^ के लिए एक पाठ्यक्रम के रूप मे रख सकते हैं। ऐसी संस्था का क्या महत्व जो अपने ही उद्देश्य में लगे आँय कर्मियों की पूरी उपेक्षा करे। 
    कोई भी व्यक्ति किसी के प्रति अपशब्द का प्रयोग करता है तो यकीन जानिए की वह उससे उतना ही दुखी है। यह दुख ज़रूरी नहीं की वैयक्तिक हो। कुणाल  के शब्द ओछी मानसिकता के नही, बल्कि खेद और दुख के परिचायक है। नाटक  के साथ यह हो रहा है कि उसे अपने ही लोगों का समर्थन नाही मिल पाता है। परवेज़ ज़ी ने बहुत अच्छी बात उठाई है कि एनएसडी के अवदान को नकारा नाही^ जा सकता। नकार कोई नाही^ रहा है। हर कोई आज की स्थिति को लेकर अपनी बात रख रहा है। नाटक के कैथी और प्रयोग की दिशा को ध्यान में रखकर नाटक किए जा रहे हैं। यह स्वागत योगी है। नाटक पहले भी जीवित था, आज भी है और कल भी रहेगा। लेकिन हमें संयम बरतना होगा और यूं ही किसी को दाखिल खारिज नाही करना होगा, जैसा के आजकल कुछ स्वनयमधानी लोग रंगकर्म के नाम पर कर रहे हैं। 
  • अभिषेक नंदन wrote on 1 July, 2012
    सुपरिचित गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख़्तर के अनुसार बातचीत  की तीन  कोटियां होती है। उनके अनुसार  बातचीत  की पहली कोटि वह है,  जिसमें आत्म महिमा का बखान होता है।  बातचीत  की  दूसरी कोटि में
    परनिंदा के परनाले बहा दिए जातें हैं,  बातचीत  की तीसरी और अंतिम कोटि हीं सबसे अच्छी होती है.  मैं परवेज़ दा की बातों से पुरी तरह सहमत हुं। मुझे लगता है हमारे कुछ  प्रगतिशील  मित्रों को व्यक्तिगत टिप्पणी से बचते हुए,  उनकी सटिक  टिप्पणी फिर से पढ़नी चाहिए।

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  1. राष्ट्रीय नाट्य विधालय नयी दिल्ली में इस बार बिहार और उतर प्रदेश से एक भी स्टुडेंट का चयन नहीं हुआ ..इसको लेकर बिहार में काफी हो हल्ला मचा है .वरिष्ट रंगकर्मी से लेकर नए लोग भी इस बहस को गर्म करने में लगे है .आपको बताता चलू की बिहार से जितने N .S D में लोग गए उतना किसी स्टेट से नहीं गए ...और मुझे नहीं लगता की राष्ट्रीय नाट्य विधालय में ऐसा कोई प्रावधान है की प्रत्येक स्टेट का आरक्षण है ..और अगर व्यवहारिक होकर सोचे तो बंगाल और महाराष्ट्र में नाटक सबसे ज्यादा समृद्ध और विकाशशील रहा है ..वहा से कितने nsd गए हमारे अनुपात में... ये समझाने की बात है ..ये बंगाल और महाराष्ट्र के साथ अन्याय नहीं है ..जैसे बिहार में आजकल मुख्यमंत्री नितीश कुमार हर बात में केंद्र की तरफ भीख माँगते अधिकार जताते है ..उसी पोलटिक्स की शुरुआत बिहार रंगमंच में हो रही है ...आज के दौर में बिहार में काम करने वाले रंगकर्मियों से पुछा जाये की आपकी सक्रियता क्या है ..तो जवाव होगा मै एक्टिविस्ट हूँ ...मै देश दुनिया की बहसे कर सकता हूँ ..रतन थियम को नाटक करना नहीं आता ..उन्होंने भारतीय रंगमंच को स्वाहा कर दिया ...nsd वालो ने रंगमंच को बर्बाद कर दिया ...फिर भी ये साथी राष्ट्रीय नाट्य विधालय में प्रवेश चाहते है ..इस बार जितने लोग nsd के final में गए थे शायद ही एकाध को छोड़ कर किसी को भी गंभीर रंगमंच से वास्ता रहा हो ...मै आपको कुछ पुराने छात्रों के बारे में बता दू की पुन्ज्प्रकाश ...रंधीर ....मानवेन्द्र ....और स्वय मै nsd जाने के पहले ग्रुप और कई बहुमूल्य नाटको का मंचन कर के गए थे ...मै उन स्टुडेंट से ही सवाल करता हूँ जो अभी nsd चयन के लिए गए थे ..उन्होंने वहा क्या किया ...आपस में ही उलझे थे ...कोई पागलपन का शिकार था कोई मदहोशी का ...

    अब कुनाल जी ...... मसाज पार्लर में तब्दील हो चुका है एन.एस.डी.- कुणाल...क्या कुनाल जी बताएँगे की इन लोगो को (इस बार के nsd के लिए गए बिहारी स्टुडेंट ] को लेकर एक नाटक करेंगे और दर्शको के बीच जाये .,फिर बात करे.. कुनाल जी रावन को मारने के लिए भी राम चाहिए बन्दर नहीं ..... बाबा कारंथ .....रतन थियम ..बंसी कॉल ...एम् के रैना ...प्रसन्ना .....राम गोपाल बजाज ...संजय उपाध्याय .....बहरुल इस्लाम .....अमितेश ग्रोवर .....अभिलाष पिल्लै .... भानु भारती ....देवेन्द्र राज अंकुर ...अनुराधा कपूर .....रोबिन दास .....मोहन महिर्षि ...रूद्र दीप चक्रवर्ती .शांतनु बोस.....ऐसे अनेक नाम है जो भारतीय रंगमंच की सुन्दरता बढ़ाते है .... इन्ही के कामो को देखकर भारतीय रंगमंच में लोग जन्म लेते है ...

    इस बार फर्स्ट चयन प्रक्रिया में बिहार के nsd स्नातक आसिफ अली ने कहा स्टुडेंट बिहार से इतने कमजोर आयेंगे ये मै सोच नहीं सकता था ..

    ऐसे लोग इस मूवमेंट को हवा देने में लगे है जो खुद चूका हुआ माने जा चुके है ......अगर nsd इतनी बुरी है तो वहा जाना क्यों चाहते हो ...

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  3. ये है सुभाष कुमार का फेसबुक स्टेटस

    राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की विशेषताओं को यथार्थ करता प्रवीण कुमार गुंजन
    हमने हमेशा रंगकर्मियों से सुना था कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय कलाकार नहीं दलाल पैदा करता है तो हमेशा लगता था कि ये कुछ ज्यादा बोला जा रहा है लेकिन आज जब प्रवीण कुमार गुंजन का बौखलाया हुआ एन.एस.डी के बचाव में वक्तव्य देखा तो लगा कि नहीं लोग सही बोलते हैं कि एन.एस.डी अधिकांश दलाल ही पैदा करता है.
    वरिष्ठ कलाकारों का ऐसा मानना है कि अपने प्रदेश से काट देना भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की खूबियों में से एक है और इस बात को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रवीण कुमार गुंजन साबित करने पर तुले हुए है. शायद इसी वजह से उन्होंने वर्तमान बिहार रंगमंच से एन.एस.डी के मेंस परीक्षा में जाने वालोंको को पागलों और मदहोश कह कर संबोधित किया है. फेसबुक पर उनका ये status बताता है की उनके अन्दर अपने प्रदेश और अपने लोगो के प्रति कितनी कुंठा है.
    वर्तमान बिहारी रंगकर्मियो को पागल कह कर वो योग्यता की बात कर रहे है जबकि अगर वो अपने इतिहास को देखे तो उनका नाम भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नामांकन के समय merit लिस्ट में नहीं था उनका नाम waiting लिस्ट में था.बेचारा एक लड़्का पागल हो गया तो आप चले गये.भला हो उस पागल का जिसके कारण आप जैसे दूसरे पागल को एन.एस.डी में जगह मिल गयी. अगर उनके इतिहास के एक और पन्ने को उलटे तो कभी वो हबीब तनवीर को जैसे को बड़े रंगकर्मी हमेशा गाली देते दिखते रहते थे दूसरो को अयोग्य, पागल कहने वाले व्यक्ति की ये है योग्ता?कोई पागल ही हबीब जैसे महान रंगक्र्मी को गाली दे सकता है और क्यों क्योंकि वो नाट्क में सामाजिक सरोकार की,समाज को बेहतर बनाने कि बात करते थे जिस्से आप्को चिढ़ थी कि नाटक का सिर्फ़ मनोरंजन करना काम है.
    राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इस बार बिहार एक भी कलाकार कर नामांकन न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है ,लेकिन वहां के administrator द्वारा कह कर (घोषित या अघोषित ) कि बिहार से nsd में एक भी कलाकार को नहीं लिया जायेगा, ये बहुत बुरी बात है.और उससे भी ज्यादा बुरी बात ये है कि गुंजन जी और गुंजन जी जैसे लोग nsd की वकालत कर रहे है. ये लोग nsd की चाटुकारी इस कदर करते है कि एक प्रतिबद्ध रंगकर्मी शशि भूषण की मौत nsd की लापरवाहियों की वजह से हो जाने के बावजूद भी nsd के खिलाफ इनके मुह से एक शब्द नहीं फूटे लेकिन पटना के रंगक्र्मियों पर हमला करना हुअ तो देखिये.अच्छा है एन.एस.डी की खूब दलाली करिये देखते हैं इसके लिये भले ही ना अपने मरे साथियो की लाश से क्यों न गुजरना पड़े. दूसरो को अयोग्य कहने वाले अपने ही साथी कि मौत पर सौदेवाजी करना क्या यही है तुम्हारी योग्यता?

    और तो और बल्कि लोगो के बीच कई तरह का भ्रम और डर फैला रहे थे कि nsd का विरोध मत करो वरना बिहार से किसी का भी nsd में नामांकन नहीं होगा.एन.एस.डी में नामांकन कैसे होता है ये सब लोग जानते हैं अध्कांश लोग परवी और संपर्क के आशार पर जाते हैं किसी से भी पूछिये पटना में वो बता देगा अरे उसका तो एन.एस.डी में अमुक आदमी के परवी पर हुआ.अरे एन.एस.डी का कोई पैमाना है? कोई सिस्टम है कि किस आधार पर होता ह है?कभी एन.एस.डी के लोगो< ने अपने संस्थान की काली और गिरी हुई कारगुजारियों पर उंगली उठाया है ?कभी नहीं लेकिन अपने ही साथियो पर हमला करना हो,उसको कलंकित करना हो तो देखिये गुंजन जी कैसे आगे हो गये?जिनका एन.एस.डी की नंगी धांधली और नाईसाफ़ी के कारण नहीं हुआ वैसे लोगों को पागल और अयोग्य करार दे रहे हैं?हां याद आया आपका नाम भी तो सब पगला ही कह्ता है.कई बार कालिसाद में लोगों को हम सुने हैं कि अरे गंजन कहां है? तो कौन गुंजन? अरे उ पगलवा गुंजन…?ये आपकी तो स्थिति है खुद पागल है और दुसरों को पागल कहते हैं.मुझे तो शर्म आती गंजन जैसे लोगों पर कि खुलेआम अपने शहर के रंगकर्मियों पर हमला करके एन.एस.डी की वकालत कर रहे हैं शर्मनाक!

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  4. ये बिजेंद्र टांक ने पोस्ट क्या था
    इस बात का दुःख है की इस बार रा न वि में किसी भी बिहारी छात्र का चयन नहीं हुआ पर इसके लिए जो हाय तौबा मचा है, वो समझ के परे है !इस बहस मे कुछ भी समझ नहीं परता की लोग रा न वि में चयन न होने का बिरोध कर रहे हैं या रा न वि के पाठ्यकर्म का बिरोध | दोनों ही स्थितियों में मुझे यह उचित प्रतीत नहीं होता| अगर लोग रा न वि में चयन न होने का बिरोध कर रहे हैं, तो शायद वो भूल गए है की मेरी जानकारी में बिहार ही एक ऐसा प्रदेश है जहा से एक सत्र में बिहार से ६ छात्रों का चयन हुआ | क्या उस समय देश के अन्य प्रदेशो के साथ अन्याय नहीं हुआ था ? उस समय हमारे मित्रो की नैतिकता कहाँ गयी थी ? अब मैं अपनी दूसरी बात पे आता हूँ | अगर हमारे मित्रगन ये कहते है की रा न वि का समाज से सरोकार ख़त्म हो गया या वो जिमनास्ट करने वाले लेबर पैदा कर रही है तो बिहार के रंगकर्मीयों में रा न वि जाने की होड़ क्यों मची हैं ? अगर अगले सत्र में बिहार से एक भी छात्र का आवेदन नहीं जाता हैं तब ये माना जा सकता हैं की हमारा रंगमंच एकजुट हैं और रा न वि के क्रियाकलाप गलत हैं |

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  5. ये रंजीत कुमार का पोस्ट है
    एकदम सही बोले हैं सुभाष भैया.गुंजन जी तो हद कर दिये हैं जिन लोगों क नहीं हुआ क्या वे लोग पागल और मदहोश थे?ये तो अजीब बात है.क्या मेन परीक्षा में पहुंचने वाले बुल्ल्य भैया,जयप्र्काश भैया, राजू भैया,आशुतोष अभिग्य इन लोगों को तो हम जानते हैं और कोई भी पागल और मदहोश खोने वाला नहीं है.अभी हम्लोग जयप्रकाश भैया के साथ “शंबुक्वध” नाटक किये जिसको कि राकेश भैया डायरेक्ट किये थे उसमे तो बहुत अच्छःआ काम था.राहू भैया के साथ भी हम काम किये हैं इस सब क्लो पागल और मदहोश बोल रहे हैं गुंजन जी.अरे? क्या हुआ हो गया है उनको?इ अल बल काहे बोल रहे हैं वो?
    एक तो पहले से जब पी.टी परीक्षा में इन लोगों क हुआ तभी ये इ बात हवा में चल रहा था कि इस बार किसी का नहीं हो क्योंकि सरकार से शशि भैया की मौत के बारे में जो लेटर चला गया है उससे एन.एस.डी का लोग बैखलाया हुआ है. इस बात पर उस समय कोई भरोसा नहीं किया था लेकिन बाद में तो यही सच निकला. इ कितना गलत बात है कि गुंजन जी को एन.एस.डी के इस गलत बात पर बोलना चाहिये था तो उ सब को पागल और होश खोने वला बता रहे हैं.सुभाष भैया हम न जानते थे गुण्जन जी के बारे में कि ऐसे थे. आजकल एन.एस.डी का विरोध करने पर सब लोग कहने लगता है कि भाषा ठीक रखना चाहिये लेकिन अपने परीक्षा में जाने वाले पटना के लड़कों को कोई अल-बल(पागल,मदहोश) बोलता है तो उसको कोई नहीं कहता है कि आप ठीक से बोलिये. ये तो हद है. इ दो सरेआम दोमुंहापन है..सच्च्मुच ये एन.एस.डी वाले लोग खतम होते हैं.एन.एस.डी वाला लोग शशि के परिवार के साथ जो गलत व्यवहार किया उसके बारे क्या?उस पर कुछ बोलते नहीं देखे लोगों को जो पटना के लोगों को तमीज सिखा रहे हैं.सुभाष भैया एक्दम ठीक किये.और बहुत बात भी पता चला.अजीब है बोलना चाहिये गुंजन जी को आम(एन.एस.डी के गलत बात पर) पर त बोल रहे हैं इमली(पटना के रंग्कर्मी सब पर) पर.एक तो ऐसे ही सब लोग दुखी है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और गुंजन जी इ सब बोल के जले पर नमक छिड़्क रहे हैं.ऐसे न कीजिये गुंजन जी.

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  6. ये अभिषेक नन्दन ने लिखा है
    अपनी टिप्पणी में जिस भाषा का प्रयोग हमारे अग्रज मित्र सुभाष कर रहें हैं, ये कहीं से भी एक रंगकर्मी होने के नाते उनको शोभा नहीं देता। आलोचना होनी चाहिए, विरोध भी होना चाहिए n.s.d का और अगर @ Pravin Kumar Gunjan गलत हैं तो उनका भी पर जिस तरह से भाषाई छिछालेदर सुभाष कर रहें है ये अनैतिक है। हम इसका विरोध करतें हैं।

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  7. रंजीत कुमार लिखतें हैं
    आप पहले ये बताइये कि क्या जो लोग इस बार एन.एस.डी की परीक्षा देने गये थे वे सब पागल थे?मदहोश थे? क्या जेपी भैया,बुल्लु जी,आशुतोष अभिग्य,राजू भैया क्या ये लोग पागल हैं?गुंजन जी के इस बात पर आपको क्या कहना है?पाह्ले उस बात पर बोलिये फ़िर कुछ और शोभा देगा.अचानक देख रहा हूं कि एन.एस.डी जैसे दलाल संस्था का नया,नया शुभ्चिंतक हो रहे हैंकितना खराब बात बोले गुंजन जी उस बात पर न बोल के जो लोग सही बात उठा रहा है उसी पर कमेंट कर रहे हैं?

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  8. ये प्रवीन गुंजन ने लिखा है
    aap ki sanskriti aur vichar aise hi ho sakte hai ..mamla ko vyaktigat bana kar jhutha aarop lagane ke liye thanks ..isi pagal ke sath aapne life ke sabse ache natak kiye hoge .mai aapko bhul gaya tha wahi subhash hai na aap jo KUNTITH AUR JATIYE COMPLEX me hamesha dube rahte the ..are aap bhul gaye.. anish aur atul bhumihaar hai ..aapko bata du ki mujhe sabit karna nahi ..again thanks
    are aap hi hai na pichale 2 saal mere piche padhe rahe ki hydrabaad me aakar ek natak karwa de ..mujh pagal se hi karwana chahte the ...anish se match fix ho gaya kya ...par woh to bhumihaar hai subhash babu ..ha ha ..ha ha

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  9. ये अभिषेक नन्दन लिखतें हैं
    सुभाष भैया बात होनी चाहिए, आलोचना होनी चाहिए, विरोध भी होना चाहिए n.s.d का और अगर @ Pravin Kumar Gunjan गलत हैं तो उनका भी पर इस भाषा में नहीं..........आपनी भाषा का स्तर आपको सुधारनी चाहिए.....धन्यवाद.

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