रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक का नाम भिखारी ठाकुर है.


पुष्पराज 

राउर मालिक आ भगवान से बाँचब तब राउर महफ़िल में नाचब-भिखारी ठाकुर

भिखारी जी को खाद्य -पदार्थ की तरह इस्तेमाल करनेवाले खावकों के प्रति गुस्सा जायज है लेकिन फिलवक्त गुस्से को रचना में बदलने की जरुरत है . आप और हम एक ऐसे गरीब मुल्क में जन्मे -पले बढे, जहाँ की गरीबी चेतना ने अपने समाज के सांस्कृतिक -राजनितिक नायकों ,प्रतीकों का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया है .

देखिये चिली जैसा छोटा सा राष्ट्र अपने प्रतीक नेरुदा का दूसरी ,तीसरी बार अलग -अलग कोण से मूल्यांकन कर रहा है .हमने तो अब तक कबीर का भी ठीक से मूल्यांकन नहीं किया है .

अपने आदरणीय भिखारी ठाकुर को क्या साहित्य -संस्कृति के छड़ीदारो ने उनके जीते जी उन्हें वह सम्मान दिया ,जिसके वे अधिकारी थे . हाल में नामचीन कवि केदारनाथ सिंह को पहली बार मैंने भोजपुरी में भाषण देते हुए सुना . दरअसल वे भिखारी ठाकुर के बारे में बोल रहे थे .आधे घंटे तक उनने जो भिखारी संवाद किया ,वह संवाद अभी कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है . उनने कबीर और भिखारी को सामने रखकर बुझाने की कोशिश की .जैसे एक कबीर हैं ,दूसरे लोक कबीर ,उसी तरह एक भिखारी ठाकुर हैं तो दूसरे लोक भिखारी ठाकुर .

इन भिखारी ठाकुर को हमारे मुल्क ने जीते जी अगर "भिखरिया" से अलग होकर नहीं देखा तो क्या इन चार दशक में हमारे मुल्क के खासकर हिंदी –पट्टी में ऐसा कौन से सामाजिक -राजनितिक आंदोलन हुए कि चेतना के स्तर पर अचानक बदलाव आ जाये . चावल जितना पुराना होता है ,उतना ज्यादा उपयोगी हो जाता है .इसीलिए पुराना चावल पथ्य के कम आता है .

अपने" भिखारी" भारतीय संस्कृति के "पथ्य " हो चुके हें .ये जितने पुराने होंगे ,इनकी चमक उतनी बढती जाएगी .आदरणीय भिखारी ठाकुर पर १८ दिसम्बर को बंगाल के तमाम बांग्ला अखबारों में विशेष खबर छपी थी .कोलकाता से प्रकाशित कुछ हिंदी दैनिको ने भिखारी जी पर केन्द्रित पूरा पन्ना प्रकाशित किया .पटना से प्रकाशित दैनिको में सिर्फ प्रभात खबर ने भिखारी जी पर एक पन्ना प्रकाशित किया .बंगाल के अपने दोस्त मुख में शक्कर जैसा चबाते हुए जब कहते हें कि हजाम भिखारी को लोक भिखारी बंगाल ने बनाया तो सुनकर कान मीठे हो जाते हें .पहला गिरमिटिया के लेखक गिरिराज किशोर ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि मोहनदास को महात्मा बिहार ने बनाया तो उनके कहे को अपने मुख से कहो तो ....? 

हम सीखने के दौर में हैं. बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीक का नाम भिखारी ठाकुर है .

जन प्रतिरोध और जन विद्रोह की लोकसंस्कृति के भारतीय नायक का नाम भिखारी ठाकुर है . जो भिखारी की लीक पर खड़े और खरे हें उन सब का जिंदाबाद .

पुष्पराज - एक घुमक्कड सामाजिक कार्यकर्त्ता. पेंगुइन बुक इंडिया से प्रकाशित नंदीग्राम डायरी के लेखक. उनसे pushpraj06@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .

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