रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी



सम के अंदर उदालगुड़ी जिले का टेंगला कस्बा कभी उल्फा के आतंकियों की वजह से जाना जाता था। अब इस बात को लंबा समय गुजर चुका है, इस बीच उदालगुड़ी बदला और टेंगला की पहचान भी बदली। टेंगला को एक नयी पहचान देने में थिएटर एक्टिविस्ट पबीत्र राभा का बहुत बड़ा योगदान है। आज एनएसडी के नये-पुराने शिक्षक टेंगला को असम में एनएसडी का एक्सटेंशन ही मानते हैं। इन दिनों पबीत्र टेंगला में नाटे कद के लोगों के साथ मिलकर खास तरह का थिएटर कर रहे हैं। जिसे असम में खूब सराहा जा रहा है।
पबीत्र राभा जब एनएसडी में आये थे, उस वक्त वहां रामगोपाल बजाज निदेशक हुआ करते थे और जब दिल्ली एनएसडी वह छोड़ रहे थे, उस वक्त देवेंद्र राज अंकुर निदेशक बन कर आ चुके थे। पबीत्र अपने साथियों की तरह अपना कॅरियर फिल्म में बनाने की जगह, कुछ अलग करना चाह रहे थे। वह एनएसडी में अपनी एमए की पढ़ाई और बैंक की नौकरी दोनों को बीच में छोड़कर आये थे। शादी हुई तो घर छोड़ दिया। मकसद सिर्फ धारावाहिक और फिल्मों में काम पाना भर नहीं था। चूंकि एनएसडी से आते वक्त तय करके ही आये थे कि यहां सबसे अलग कुछ करना है। इसी उधेड़बुन के साथ जिंदगी भी चल रही थी और नाटक-फिल्मों में काम भी। कई भाषाओं में पबीत्र ने दर्जनों नाटक निर्देशित किये। इसी बीच ‘दपॉन द मिरर’ नाम से एक थिएटर ग्रुप भी शुरू किया। टोक्यो में फिजिकल थिएटर फेस्टिवल से लेकर ‘मुखबिर’ और ‘टेंगो चार्ली’ जैसी हिंदी फिल्मों के अंदर अभिनय में भी हाथ आजमाया।
हाल में जब पबीत्र से गुवाहाटी से एक सौ किलोमीटर दूर उदालगुड़ी जिले के टेंगला मे मुलाकात हुई, तो उस वक्त वह अपने नाटक ‘व्हाट टू से’ के रिहर्सल में व्यस्त थे। व्यस्तता के बीच चेहरे पर प्रसन्नता थी कि उन्हें जो चाहिए था, उसके वे करीब हैं। यह नाटक उन्हीं नाटे कद के लोगों का दर्द बयान करता है, जो इस नाटक के मुख्य आकर्षण हैं। कहानी संक्षेप में दो दोस्तों की है। नाटक की शुरुआत उनके मिलने से होती है। एक दोस्त का दर्द उसका नाटापन है और दूसरे का दर्द उसकी ऊंचाईं। उसका भारी भरकम शरीर। इन दोनों लोगों के दर्द को नाटक में खुबसूरती के साथ संवादों में पिरोया गया है।
वैसे नाटे कद के लोगों की तलाश और उनको थिएटर के साथ जोड़ना बिल्कुल आसान नहीं था। नाटे कद के ये कलाकार अलग-अलग पृष्ठभूमि से हैं और अलग-अलग कामों से जुड़े हैं। इसलिए चुनौती सिर्फ थिएटर से जोड़ने तक ही सीमित नहीं थी, उससे कहीं बड़ी थी। इन सभी कलाकारों को नाटक की प्रस्तुति के लिए तैयार करना।
बकौल पबीत्र – ‘अपने थिएटर के लिए अभी मैं पच्चीस कलाकार जुटा पाया हूं। यह सभी कद में छोटे हैं, लेकिन हुनर में जबर्दस्त। इन्हें एक साथ लाने में पूरे ढाई साल लग गये।’
इन ढाई सालों में इन कलाकारों की तलाश हुई, उसके बाद उन्हें तराशा और निखारा गया। बात यहीं तक नहीं थी, जब तक यह कलाकार राभा के पास रहे, उन्हें एक निश्चित राशि राभा ने उपलब्ध करायी। चूंकि राभा का मानना था कि थिएटर के साथ जुड़ने की वजह से गरीब पृष्ठभूमि से आये कलाकारों के परिवार के जीवन पर किसी प्रकार का प्रभाव न पड़े। एक खास बात यह भी थी कि यदि वे कलाकार अपने परिवार की जरूरतों की चिंता से मुक्त नहीं होते, तो अपना श्रेष्ठ वे थिएटर को कैसे दे पाते? कई बार राभा अपने आयोजनों के लिए प्रायोजक नहीं मिलने पर अपनी जेब से पैसे लगाकर आयोजन कर चुके हैं। एक अच्छी बात यह है कि अब गांव के लोग उनकी प्रतिबद्धता देखकर छोटी-छोटी मदद लेकर सामने आने लगे हैं। मसलन जब थिएटर के लिए पंद्रह-बीस दिनों का कैंप लगता है तो कलाकारों के लिए कोई पचास किलो चावल लेकर आता है और कोई दाल। कई युवक कार्यकर्ता के नाते काम करने के लिए राभा के साथ खड़े होते हैं।
इन सभी बातों के साथ साथ यह एक सच्चाई है कि पबीत्र के थिएटर को उसके खास तरह के कलाकार ही सबसे अलग बनाते हैं। इनकी लंबाई कम है लेकिन पबीत्र की मेहनत की वजह से थिएटर के साथ जुड़े किसी भी कलाकार को आप किसी पेशेवर कलाकार से कम करके नहीं आंक सकते। जब राभा ने पहली बार अपने नाटक का मंचन ‘टेंगला’ में किया, उन्हें खुद इस बात का अंदाजा नहीं था कि लगभग पांच हजार लोग उस छोटे से कस्बे में उनके नाटक को देखने आएंगे जबकि उस दिन भारत और पाकिस्तान का मैच था। आयोजन से पहले वे लोग थोड़ा घबराये हुए थे कि दर्शक नहीं आये तो पहला आयोजन ही फीका हो जाएगा। वैसे आयोजन सफल भी क्यों न हो, यह तो पबीत्र की मेहनत का फल था। पबीत्र ने एक-एक कलाकार पर महीनों मेहनत की है। यहां एनएसडी से ली गयी शिक्षा उसके बहुत काम आयी।
जब इन कलाकारों ने गुवाहाटी में ‘व्हाट टू से’ का मंचन किया, पूरे असम में इनके नाटक की खूब चर्चा हुई। यह नाटक उन्हीं लोगों की कहानी कहता है, जो लोग इस थिएटर के साथ जुड़े हैं। छोटे कद के लोगों की कहानी। उनका दर्द। किस तरह समाज में हर तरफ उन्हें दुत्कारा जाता है। वह कहीं भी जाएं, उपहास के पात्र होते हैं। उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की विशेष सहायता भी नहीं मिलती। चूंकि वे विकलांग की श्रेणी में नहीं आते। लेकिन उन्हें अपनी कम लंबाई की वजह से जीवन में जिन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, वह विकलांगता से कम नहीं है। परिवार से लेकर समाज तक में वे लोग समय-असमय उपहास का कारण बनते हैं। उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की विशेष सहायता नहीं मिलती। चूंकि वे विकलांग की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन उन्हें छोटी लंबाई का होने के कारण किन-किन तरह की कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है, यह दपॉन द मिरर की टीम से मिलकर ही जान पाया। एक कलाकार ने बातचीत में बताया कि किस प्रकार उसे और उसी के कद के तीन और साथियों को एक सर्कस के मालिक ने बंधुआ मजदूर बना लिया था। एक दिन उन चारों लोगों ने भागने की योजना बनायी। चारों सर्कस की जीप पर सवार हुए और एक ने स्टेयरिंग संभाली और एक ने ब्रेक और गियर। इस तरह मुश्किल से अपनी जान बचाकर ये लोग भागे। जब सर्कस के मालिक को खबर लगी तो उसने इनके पीछे अपने लोग लगा दिये। इस परिस्थिति में सर्कस से भागे इन चार लोगों ने जीप बीच सड़क पर छोड़कर, एक ट्रक वाले से लिफ्ट ली और अपनी जान बचायी।
वास्तव में छोटे कद के लोगों की तकलीफ को कभी हमारे समाज में गंभीरता से नहीं समझा गया है। आइए प्रार्थना करें कि छोटे कद के लोगों की तकलीफ को समाज के बीच पहुंचाने में यह थिएटर समूह सफल हो।
ashish kumar anshu
(आशीष कुमार अंशु। जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक। सोपान नाम की एक पत्रिका के लिए पूरे देश में घूम-घूम कर रिपोर्टिंग करते हैं। मीडिया के छात्रों के साथ मिल कर मीडिया स्‍कैन नाम का अखबार निकालते हैं। उनसे ashishkumaranshu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
मोहल्ला live से साभार 

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