रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

रविवार, 19 अक्तूबर 2014

नाट्याभिनय – शंभू मित्र

बंगला पुस्तक “प्रसंगः नाट्य” में प्रकाशित ख्याति प्राप्त रंगकर्मी शंभू मित्र द्वारा मूलतः बंगला में लिखित इस महत्वपूर्ण अभिनय चिंतन का हिंदी अनुवाद प्रसिद्द रंग-चिन्तक नेमीचन्द्र जैन ने किया था। जो वर्ष 1976 में “नटरंग” के 25वें अंक में प्रकाशित हुआ था। शंभू दा ने रंगाभिनाय से जुडी जिन सवालों को उठाया है उसकी प्रासंगिकता हर काल में है और रहेगी। - माडरेटर मंडली 
आजकल हमारे यहाँ काफी नाटक होने लगें हैं। वर्ष में किसी न किसी समय बड़े समारोह में यात्रा के उत्सव भी होतें हैं। सरकारी समारोह में फ़िल्में खींची जातीं हैं, दिखाई जातीं हैं। इनके अलावा मूकाभिनय, नृत्य-नाट्य, कठपुतली का तमाशा आदि होतें हैं, पानी में भी पोशाक पहनकर तैरते-तैरते नाटक किये जातें हैं। इस तरह की हलचलों से हम अवश्य हीं अनुमान कर सकतें हैं कि देश की नाट्यकला के लिए एक शुभ मुहूर्त आ पहुंचा है, बल्कि कह सकतें हैं कि देश की धमनियों में नाट्य-प्रेम का ज्वर बह चला है।
इस ज्वर में रंगमंच के कुछ लोग, जिन्होंने नाट्य संस्कृति के लिए आत्मनियोग किया था, जिन्होंने देश में एक सार्थक नाटक की नीव रखने के लिए तन-मन-धन से परिश्रम किया था- वे सब लोग आज जैसे कुछ भौंचके से हैं। उन्हें लगता है कि “नव नाट्य आंदोलन”, “प्रगतिशील नाटक”, “आधुनिक रंगमंच”, “सार्थक रंगमंच” – इन सब शब्दों में जैसे कोई अर्थ ही नहीं रहा। मनमाने आचरण से जिस प्रकार ये सब अवधारणाएँ गडमड हो गई है, उसी तरह इनके पीछे का चिंतन भी गडमडा गया है।
वैसे तो यह विषय इतना गरम है कि उसे न छूना ही ठीक होता। मगर रंगकर्मी की हैसियत से मुझे एक बात का कौतुहल होता है कि इस विवाद की जड की चीज़, यानि नाट्य वस्तु क्या है? रंगमंच के परिपेक्ष में विचार करके देखा जाय कि वह कहाँ निहित है। हम देखतें हैं कि यात्रा, नाटक, सिनेमा से शुरू करके मूकाभिनय, गीति-नाट्य, नृत्य-नाटक आदि सभी इसके घेरे में आतें हैं। पर इन सबके बीच सामान्य तत्व क्या हैं?
एक बात तो यह दिखाई देती है कि इन सबमें कलाकार किसी न किसी चरित्र के अनुरूप वेशभूषा पहनकर अंग-भंगिमाओं द्वारा तरह-तरह के भावाभिव्यक्ति करते हैं। तो क्या यह मान लिया जाय कि अपने अलावा कोई दूसरा व्यक्ति होने की कोशिश में ही नाट्य-वस्तु निहित है?
मगर इससे एक और सवाल उठता है। हमारे देश में अभिनय के ऊपर कथावाचन का असर रहा है। इसके अलावा कथावाचन से संवादबहुल वर्णन में काफी नाटकीयता भी है। इसी तरह चारण-गायन में भी गीति-नाट्य की तरह संवादों को गीतों के रूप में रखा जाता है। या वर्णनात्मक नृत्य, जिसमें कलाकार किसी विशेष चरित्र का रूप धारण किये बिना ही नाट्यशास्त्र में वर्णित मुद्राओं द्वारा किसी एक घटना का वर्णन करता है। उसमें क्या नाटक के लक्षण मौजूद नहीं हैं? इस प्रकार यह अवश्य ही कहा जा सकता है कि कथावाचक तरह-तरह की भंगिमाओं द्वारा अनेक घटनाओं का वर्णन करता है, अनेक चरित्रों के संवाद अकेले बोलकर एक तरह का अभिनय ही करता है, इसलिए यह भी नाट्यकला में ही आता है। ठीक। तो फिर उपन्यासकार को ही क्यों छोड़ दिया जाय? कोई यह कह सकता है कि उपन्यासकार तो कथावाचक की तरह बोलकर या गाकर वर्णन नहीं करता, माध्यम केवल लिखित शब्द ही है। मगर नाटककार का लिखा हुआ नाटक भी तो केवल लिखित शब्द ही होता है, क्या वह भी नाट्यकला से बाहर है? सोफोक्लिज़, शेक्सपियर, रविन्द्रनाथ सब बाहर?
यानी कोई और ठीक परिभाषा फिर से बनाना उचित होगा। हम कह सकतें हैं कि अगर मनुष्य अथवा मनुष्य द्वारा बनाई गई पुतली या तस्वीर, लिखित या बोले गए शब्दों द्वारा (जिसमें संगीत भी आ जाता है), या अंग-भंगिमा द्वारा (जिसमें नृत्य भी आ जाता है), एक या एक से अधिक चरित्रों की अभिव्यक्ति करे तो उसे नाट्यकला कहा जा सकता है।
पर अभी एक बात रह गई। कोई अगर पूछे कि नाटक में रेलगाड़ी या बाढ़ का दृश्य दिखाया जाय तो क्या वो सब काम भी नाट्यकला में शामिल नहीं? मगर इसमें तो न कोई शब्द है, न संवाद है, न कोई अंग-भंगिमा है। फिर भी इसमें कोई ऐसी अच्छी लगनेवाली चीज़ ज़रूर होती है, जिससे दर्शक खुश होकर तालियाँ बजता है और पैसा वसूल हो गया समझकर खुश होता है। क्या यह भी नाट्यकला है? या फिल्म में यही चीज़ दिखाई जाय तो क्या यह प्रशंसा के योग्य है? इसी के साथ-साथ यह सवाल भी उठा सकतें हैं कि किसी नाटकीय क्षण में पार्श्व संगीत का कोई छोटा सा टुकड़ा या किसी गीत की कड़ी किसी गहरी भावना की सृष्टि करे, तो क्या उन्हें भी नाट्यकला में शामिल करना चाहिए? यानी आम तौर पर हम सभी जानतें हैं कि संगीत एक अलग कला है, मगर प्रदर्शन में संगीत के उस टुकड़े का क्या स्थान है?
इतने तरह के तर्क-वितर्क से भ्रम पैदा होना अनिवार्य है। इसलिए फिर एक बार, नए सिरे से, नाट्यकला की परिभाषा बनानी चाहिए। जैसे नववधू जब तरह-तरह के गहनों और लाल साड़ी में सारा शरीर ढंककर अपने पति के पास जाती है, तो पति उन गहनों या वस्त्रों को दुलहिन समझाने की भूल नहीं करता। वे सब चीज़ें तो दुलहिन की सजावट मात्र है। नववधू की सजावट अवश्य होती है, इस सब सजावट के बिना भी वह नववधू ही रहती है। प्रकाश, मंच-सज्जा, पार्श्व-संगीत, दृश्य-पट – ये सब नाटक में हों, या विशेष परिस्थितिओं में नहीं भी हों, उससे कुछ नहीं आता-जाता। ठीक उसी तरह जैसे गंघर्व विवाह में दुलहिन के विशेष वस्त्र भी नहीं होते, सोने के गहने भी नहीं होते, पर उससे शकुंतला का विवाह झूठा नहीं हो गया।
मगर फिर भी यह प्रश्न रह ही गया कि नाट्य-वस्तु कहाँ है, और कहाँ से उसकी सजावट की शुरुआत होती है। प्रकाश, मंच-सज्जा, दृश्य-पट आदि को छोड़ते-छोड़ते तो फिर अभिनेताओं को भी छोड़ा जा सकता है। जैसे, यह भी तो कहा जा सकता है कि हम बहुत दिनों से शेक्सपियर के नाटक पढ़कर मुग्ध होते रहें हैं। यानी नाट्यकला इन नाटकों के लिखने पर पूरी हो गई। बाद में उन्हें मंच पर प्रस्तुत किया गया या नहीं, यह हम में से बहुतों के लिए अप्रासंगिक ही है, क्योंकि मंच का प्रस्तुतिकरण तो शेक्सपियर की अपूर्व कलाकीर्ति की सजावट मात्र है। यह बात तो बहुतों को कहते सुना है कि अलग-अलग लोग जब अलग-अलग चरित्र सजकर मंच पर उसकी भावनाओं का अभिनय करतें हैं, तो नाटक को समझने और अनुभव करने मन आसानी होती है और केवल यही मंच-प्रस्तुतिकरण की विशेष उपयोगिता है। मगर बच्चों की किताब में बात को बाल-सुलभ बनाने के लिए पन्ने-पन्ने पर बहुत सी तस्वीरें होतीं हैं। नाट्य-प्रदर्शन क्या उसी तरह का, बच्चों को समझाने के लिए किया जाने वाला प्रयत्न भर है। क्या यह केवल इसलिए किया जाता है कि जिनमें साहित्य को पढ़कर रसोपलब्धि की क्षमता नहीं है वे प्रदर्शन द्वारा उसे उपलब्ध कर सकें? तो फिर इसे कला कहते ही क्यों हैं?
तो फिर नाटक की मूल सत्ता कहाँ है? अगर कहें कि सिर्फ नाटक में ही है तो लगेगा कि वह साहित्य में है, यानी उसकी अलग कोई सत्ता नहीं है। अगर कहें कि सिर्फ नाटक में ही है, तो लगेगा कि वह साहित्य में है, यानि उसकी अलग कोई सत्ता नहीं है। और कहें कि नाटक नहीं अभिनय में ही नाट्य का प्राण है, तो वो भी अवास्तविक जान पड़ता है। मगर इसी बुनियादी प्रश्न के बारे में हमारे मन में स्पष्टता न होने के कारण ही हमारी नाट्य-समालोचना इतनी कमज़ोर है। नाट्य-समीक्षा करते समय आलोचना होती है मुख्यतः नाटक की, नाटक की कहानी की। बस अंत में इतना जोड़ दिया जाता है कि ‘अभिनय उपयुक्त ही था’। मगर किसके उपयुक्त? कहानी के? अभिनय के माध्यम से कहानी ही तो अभिव्यक्त होती है। इसलिए क्या दो फ़ीट ऊँची दीवार के ऊपर दो फ़ीट कि छत उपयुक्त होगी? पर क्या कोई पता लगता है कि सहारा देकर छत को कितना ऊपर उठाया गया है।     

------ क्रमशः 

1 टिप्पणी:

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