हाथी का एक दृश्य |
दस्तावेज़ीकरण के प्रति हिंदी रंगमंच
दृष्टिकोण बड़ा ही उदासीनता भरा रहता है । यह एक आम मान्यता है कि अभिनेता-निर्देशक
लिखतें नहीं हैं । मंडली की कोशिश है कि इस खाई को यथासंभव कम किया जाय । पटना के
युवा रंगकर्मी मो. जहांगीर ने अभी हाल ही में अपना पहला मंच नाटक निर्देशित किया
हैं । मंडली के अनुरोध पर उन्होंने अपने नाटक की रचना प्रक्रिया का दस्तावेज़ीकरण
करने का प्रयास किया है । –
माडरेटर मंडली.
यह आलेख लिखते समय जो उहापोह की मनः
स्थिति है, ठीक इसी तरह का अन्तर्द्वन्द मेरे अंदर उस दिन भी था जब नाटक "हाथी"
का मंचन करना तय हुआ था । क्योंकि ये मेरा पहला मंचीय नाटक था एक निर्देशक की
हैसियत से, ठीक उसी तरह जैसे ये मेरा पहला आलेख है स्व-समीक्षक
के स्तर पर । सच पूछिए तो अच्छा लग रहा है उन स्मृति चित्रों को पुनः याद करके
जिन्होंने उस समय परेशानी में डाला । पूर्वाभ्यास से लेकर मंचन तक थका देने वाली
दिनचर्या, मगर आज जब उन्ही क्षणों को याद करता हूँ तो
आन्नद की अनुभूति होती है । ऐसा लग रहा है जैसे मै एक बार फिर उसी समय काल में
यात्रा कर रहा हूँ । आरम्भ से प्रारम्भ करता हूँ ।
दरअसल पिछले दो वर्षों से सोच रहा था कि
एक नाटक का मंचन करूँ ताकि उसमें अपने मन का रंग भर सकूँ, एक
अभिनेता के तौर पर अब तक के 9-10 सालों
के रंग यात्रा में ये कमी खलती रही, दूसरी तरफ मेरी खाली
जेब हमेशा मेरे इस अंतरउत्सुक्ता को मुँह चिढ़ाती रही और मै एक अनुशासित
आभावग्रस्त युवा रंगकर्मी के पात्र को निभता रहा, मगर युवा
तो युवा होता है ना सो हमने वो तिजोरी खोज ली जहाँ से मेरी जेब को जवाब मिल सके,
जेब को जवाब इसलिए कि मेरा मानना है कि एक रंगकर्मी सारी दुनिया से
लड़कर जीत सकता है मगर अपनी जेब के आगे उसकी एक नहीं चलती, क्योंकि कहने को जेब
उसकी होती है मगर उस जेब से कई ऐसे पेट जुड़े होते है जो कला कि तेज़ आंच के धाह से
कुरूप हो जातें है । बहरहाल मैने वो रास्ता ढूंढ लिया और संस्कृति मंत्रालय कि
कृपा से नाटक करने के लिए अनुदान प्राप्त हो गया यहाँ कृपा शब्द का प्रोयोग रंगकर्मी
संस्कार कि वजह से कर रहा हूँ वरना हमारा ही पैसा कोई हमें दे इसमें कृपा और थैंक
यू कैसा ? जो भी हो मै इस बार अपनी जेब पर भरी पड़ा और नाटक
"हाथी" के मंचन की पहली बाधा पार कर लेने के पश्चात मंचन कि
तैयारी प्रारम्भ कर दी ।
हाथी |
'हाथी' शरद जोशी के नाटक 'अंधों का हाथी' पर आधारित था । यह नाटक 'अंधों का हाथी' से 'हाथी' कैसे हो गया ये भी
एक यात्रा है । नाटक अंधों का हाथी का मंचन पटना और उसके आसपास नुक्कड़ों पर इतनी
बार हो चूका है कि उसकी गिनती भी असम्भव है । इस नाटक की सबसे बड़ी चुनौती है व्यंग
को हास्य में समाहित न होने देना, व्यंग और हास्य में एक
बहुत ही बारीक़ लाइन होती है, इसका विशेष ख्याल रखा जाना
चाहिए खास तौर से उन लेखकों के नाटकों में जो व्यंग को एक माध्यम की तरह इस्तेमाल
करते हैं, जोशीजी उन में से एक है और अगर इनके नाटकों में
व्यंग हास्य हो जाये तो नाटक अपने समर्थ और अपनी सार्थकता खो देता है इसलिए मेरे
लिए ये काफी चुनौतीपूर्ण था । एक नएपन के साथ नाटक प्रस्तुति करूँ और वो भी बिना
मूल आलेख में हेर फेर किये हुए । ऐसे हेर फेर करना मना नहीं था मगर ये मेरी अपनी
राय है कि मूल आलेख से बिलकुल न के बराबर छेड़-छाड़ किया जाये मगर दूसरी तरफ उसका
वर्त्तमान परिवेश से सीधा जुड़ना भी अति आवश्यक था, ताकि नाटक के माध्यम से सीधा
संवाद दर्शकों से स्थापित हो पाये । इसी छटपटाहट ने 'अंधों
के हाथी' को 'हाथी" कर दिया अंधों
का हाथी कहने और सुनने से एक समझ यह बनती है कि अन्धो की एक कहानी है जो हाथी के
बारे में है जब कि यह पूरा वाक्य एक व्यंग वाक्य है । इसीलिए नाम को हाथी कर देने
से लोगों में कोतुहल होता था कि हाथी ये क्या नाटक है? नाम
के परिवर्तन मात्र से ही नाटक लोगों में आकर्षण और चर्चा का विषय बन गया और फिर
इसके पोस्टर की परिकल्पना कुछ इस तरह की गई कि लोगों को यह स्पष्ट हो गया कि यह
जंगल वाला हाथी नहीं है । दरअसल पोस्टरों में एक सफ़ेदपोश के हाथों में नोटों के
बण्डल के साथ दिखाया गया जिसमें उसका चेहरा नहीं दीखता था और बैकसाइड में संसद भवन
की तस्वीर थी , जो नाटक को और रहसयमय बनता था । यह हमारे
नाट्य मंचन का एक आवश्यक पहलू है, क्यूँकि पोस्टर ही आपके मंचन का वो सबसे
पहला भाग होता है जो सबसे पहले दर्शकों के बीच जाता है, इसलिए
इसे भी उतनी ही गम्भीरता से लेना चाहिए जितनी गम्भीरता से हम नाटक के दूसरे तत्वों
को लेते हैं, नाटक चुकी व्यंग नाटक था इसलिए मै अपने समझ के अनुसार
नाटक के उस हिस्सों को चिन्हित किया जो नाटक की गम्भीरता को भंग करते थे मै
इस नतीजे पर पहुंचा कि सूत्रधार जो हर बार मंच पर ही रुक जाता है उसे मंच पर
रोकूंगा नहीं बल्कि आवश्यकता अनुसार एग्जिट और इंट्री कराउंगा, जब मै नाटक के कथा शिल्प पर काम कर रहा था तभी कुछ चीजें मेरे जेहन में
आयी थी । मगर उसे हुबहु दर्शकों तक पहुचाना थोडा मुशकिल हो रहा था, अन्तोगत्वा समाधान निकला । नाटक पढ़ते समय मैने पाया था कि नाटक का जो
सूत्रधार है वो हमारे देश का वो अंतिम आदमी है जिसके लिये देश में सारा कुछ होता
है मगर मिलता कुछ नहीं इसलिए दर्शकों को यह समझाना जरुरी था कि सूत्रधार नाटक का हिस्सा
नहीं बल्कि एक आम आदमी है । इसलिए मैंने सूत्रधार की संख्या बढाकर एक से तीन कर दी, जिससे कहानी हर अंतराल के बाद नई लगती थी और प्रत्येक सूत्रधार अपने
पिछले सूत्रधार के संवाद को ही आगे बढ़ाते थे और नाटक के अंत में तीनों एक साथ नज़र
आयेंगें जिससे यह पता चलेगा की तीनों अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही हैं, दूसरी चीज जो थी वो नाटक के गाने थे जो नाटक की गम्भीरता को प्रभावित करते
थे, इसीलिए इसको हटाने का निर्णय लिया मगर मुसीबत यह थी कि इनको हटाने से नाटक
काफी छोटा हो जाता था, इसलिए तय किया कि इतनी ही लम्बाई के
फ़ोटोकोलाज प्रोजेक्टर के माध्यम से चलाये जाएं । इन अलग अलग तीन कोलाजों की विषय
वस्तु अलग-अलग तय की गई । पहले कोलाज में उन सरकारी विज्ञापनो पर व्यंग किया गया
जो चुनाव के ठीक पहले टीबी में नजर आते हैं और जिसमे अंतिम आदमी खुशहाल नजर आता है
। वह भी सरकारी योजना के कारण, इससे बड़ा व्यंग क्या हो सकता है? पहले कोलाज में स्क्रीन पर लिखा आता है 'हर सर को छत' और उसके अगले ही पल सड़कों पर नंगे पुंगे सोते लोग नजर आते हैं । फिर नजर
आता है 'स्वछ जल सब का अधिकार' और उसके
बाद नालों के गंदे पानी को पीते लोग सरकारी नालों से आता गन्दा पानी दिखाई देता है
। उसके बाद स्लोगन आता है 'हर हाथ को रोजगार' और अगले ही पल भीख मांगते बच्चे कूड़ा उठाती महिलाएं और बच्चे नजर आतें है
। उसके बाद आता है एक छोटा बच्चा हाथ में तिरंगा लिए नंगे दौड़ रहा है, उसके बाद स्क्रीन पर आता है 'अतुल्य भारत' जो 66 सालों के विकास की पोल खोलता है, दूसरे कोलाज में भारत में आज़ादी के बाद से लेकर 2013 तक हुए हर बड़ी घटना जिसमें जानमाल की क्षति हुई हो, को समेटने की कोशिश की
गई है । 1984 के दंगों से लेके गांधी मैदान पटना के बम
बलास्ट तक के सारे बड़े घटना को दिखने की कोशिश की गई । इनके बीच-बीच में मंहगाई,
गरीबी, भ्रष्टाचार, बिजली,
पानी, रोजगार से सम्बंधित फ़ोटो दिखाए गए । यह
फ़ोटो जब जब आते थे मंच पर उपस्थित अंधे जोर जोर से हंसाने लगते, इससे मुझे दर्शकों को तक यह बात पहुंचानी थी कि मंच पर जो तथाकथित अंधे है
वो हमारे देश के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है जो पिछले 66 सालों से हमारे लिए रोटी, कपडा, बिजली, पानी, शिक्षा, घर और रोजगार का इंतेजाम करने का स्वांग रच रहे है और कभी जाति के नाम पर
तो कभी आतंकवाद, नक्सलवाद के नाम पर हमें बाँटतीं और रौंदती है
। कभी हमारी ज़मीने विकास के नाम पर ले लेती है तो कभी हमारी नदियों का जल बेच देती
है । किसानों के बीज बेच देती है । ये अंधे वही हैं जिन्हें अंतिम आदमी सिर्फ
चुनाव के समय ही याद आते है । दरअसल यही वो 'हाथी' है, यही वो समस्या है जो लगातार बढ़ती जा रही है और अंधे इस पर धयान नहीं
दे रहे, यही सवाल पूछने का दुःसाहस जब सूत्रधार यानि अंतिम आदमी करता है तो ये
अंधे मिलकर सूत्रधार को जान से मार देने की कोशिश करते हैं । मगर एक सूत्रधार मरता
है तभी दूसरा सूत्रधार आगे आके कहता है कि "मै मारा नहीं हूँ । । ।! मारूंगा
कैसे? मै सूत्रधार जो हूँ ।" सूत्रधार के मरने के दृश्य
के समय फोटोकोलाज में वो दृश्य चल रहे होते है जिसमें पुलिस लाठीचार्ज,
आँसूगैस और पानी के फव्वारे का इस्तेमाल जन आंदोलनों को कुचलने में
करती है, इन फ़ोटो कोलाज का प्रयोग सार्थक रहा, नाटक इस वजह से वर्त्तमान परिवेश की बात कहने में सक्षम दिखा ।
नाटक के शुरुआत में अलग-अलग म्यूजिक
ट्रैक से आज़ादी के पहले की पूरी कहानी कहने की कोशिश थी । आदिवासी संगीत, शंख,
अजान, गुरुवाणी, चर्च का
संगीत इन सब का मिश्रण करके मसालों के माध्यम से यह दृश्य समझाने की कोशिश थी कि
आज़ादी की लड़ाई में सब ने मिल कर भारत को स्वतन्त्र करवाया था । इस म्यूजिक के अंत
में नेहरू जी का वो स्पीच बजता है जो स्वतंत्र भारत के अस्तित्व में आने के
बाद शायद उनका पहला भाषण था, जिसमें उन्होने कहा था कि "अभी जब कि सारी
दुनिया सो रही है भारत अपनी आज़ादी की नई साँस ले रहा है ।" उसके बाद नाटक
शुरू होता है, इसके पीछे मेरा उद्देश्य यह था कि पुरे नाटक
को एक काल-खंड दे दिया जाये कि आज़ादी के ठीक बाद से लेके अब तक कि कहानी है
"हाथी" ।
जहां तक नाटक में अभिनेताओं के अभिनय
का सवाल है तो इस नाटक के मंचन के बाद मै यह समझ गया कि हर अभिनेता की अपनी एक
क्षमता होती है वो उससे आगे जाके चाह कर भी प्रदर्शन नहीं कर सकता, इसलिए
हर अभिनेता के क्षमता के अनुसार ही उसे इस्तेमाल करना नाटक के हित में सकारात्मक
होता है, कुल मिला के मंचन हो चूका है, अच्छा या बुरा यह मै नहीं कह सकता । मै अपनी बात कहने में सफल हुआ कि नहीं
ये थोड़े समय के बाद पता चलेगा, मैंने अब तक यह पढ़ा था कि
थिएटर इज स्ट्रोंगेस्ट मीडियम ऑफ़ कम्युनिकशन उसी को उतारने की हर कोशिश की है । एक
निर्देशक के तौर पर मेरे लिए चुनौतीपूर्ण रहा यह डेढ़ महीने का सफ़र, मगर सफर कि यह शुरुआत है, आगे बहुत से नए प्रयोग करने है, जिसके लिए तैयार हूँ । इधर फिर से जेब मुँह चिढ़ाने लगी है, इस बार साथी कलाकारों की होली संस्कृति मंत्रालय की कृपा से अच्छी रही !
कुल मिला कर एक अंतिम वाक्य कहना है कि
'कब हम समझेंगे कि यह देश हमारा अपना है, इसे लूटना अपने घर को लूटने के जैसा है ।!'
हज़ारों साल नर्गिस
रोती है अपनी बेनूरी पर,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा...!
प्रशंसनीय प्रयास !
जवाब देंहटाएंबधाई !!
धन्यवाद् इस अवसर को प्रदान करने के लिए
जवाब देंहटाएंअपनी प्रक्रियाया पर इतनी बेबाकी से बात करना सहज नहीं होता लेकिन जब लक्ष्य और उद्देश्य साफ हो तो सहज हो जाता है , जमे रहिये नाटक कीजिये और लिखिये भी.
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लिखते हैं जहाँगीर भाई !
जवाब देंहटाएंबधाई !!