रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

जगदीप : जिन्हें केवल सुरमा भोपाली नहीं होना था : पुंज प्रकाश

एक अभिनेता के साथ इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है कि उसे एक ख़ास चरित्र में क़ैद कर दिया जाए और बार-बार उसी को दुहराने के लिए उसे अभिशप्त किया जाए। कई अभिनेता भी इस क्रिया का मज़ा लेते हैं क्योंकि इन्हें इसके लिए अलग से कोई ख़ास तैयारी करनी नहीं पड़ती है लेकिन जो असली अभिनेता है उसे असली मज़ा अलग-अलग चरित्र को अलग-अलग तरीक़े से करने में ही आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन सिनेमा एक बाज़ार का नाम भी है, जहां अभिनेताओं की छवि गढ़ी जाती हैं, जिसका भार ताउम्र उस अभिनेता को ढोना ही पड़ता है। इस साजिश में लेखक, निर्देशक, निर्माता ही नहीं बल्कि हम दर्शक भी शामिल हैं। ना लेखक अमूमन किसी अभिनेता के लिए अलग सा चरित्र लिखता है, न निर्देशक उसे कुछ अलग करने को कहता है, निर्माता को तो ज़्यादातर बॉक्स ऑफिस की कमाई से ही मतलब होता है और रहा सवाल हम दर्शकों का तो हममें से भी ज़्यादातर लोग वही वही बार बार देखना चाहते हैं जो अभिनेता पहले से करता रहा है या जो उसकी छवि बना दी गई है। अभिनेता उससे कुछ अलग अगर कोशिश भी करता है तो हम उसे नकारने में तनिक भी देर नहीं करते। इतिहास में ऐसे ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि अभिनेता ने तंग आकर आख़िरकार अपनी छवि से अलग कुछ गढ़ने की चेष्टा की तो हमने उसे घोर असफलता का सामना करना पड़ा और फिर हमने उस अभिनेता के सामने अपनी बनी बनाई खोल में समाहित हो जाने के अलावा अन्य कोई विकल्प छोड़ा ही नहीं। हम चरित्र नहीं बल्कि अभिनेता के दीवाने हैं। इसलिए हमारे यहां आजतक लगभग लकीर के फ़क़ीर वाला सिनेमा का ही प्रचलन है। वैसे समय समय पर कुछ साहसी लोगों ने इस प्रचलन को बदलने की कोशिश की है और अच्छी बात यह है कि थोड़ा बहुत कुछ बदलाव आया भी है। 

हमने जब दिलीप कुमार (ट्रेजडी किंग), अमिताभ बच्चन (एंग्री यंग मैन) तक को नहीं छोड़ा तो बाकी किस खेत की मूली हैं। अभिनेता जगदीप भी ताउम्र सुरमा भोपाली ही बने रहे और कभी बेचैन होकर कुछ अलग किया तो हमने उसे नकार दिया और फिर वो मजबूर हो गए कि वही राग गाएं जो हम सुनना चाहते हैं। 

जब ऐसा कुछ होता है तो वहां अभिनय विधा की मौत सबसे पहले हो जाती है क्योंकि अभिनय उस विधा का नाम नहीं है जो बार बार और लगातार एक ही जैसा किया जाए बल्कि अभिनय वह है जो अलग अलग चरित्र को अलग-अलग रूप नें प्रस्तुत किया जाए। अब तर्क देनेवाले यह भी कह सकते हैं कि चार्ली चैप्लिन अपने तमाम फिल्मों में एक ही जैसा रूप रंग धारण करते हैं और लगभग एक ही जैसा उनका व्यवहार भी है तो इसका क्या मतलब हुआ कि वो एक शानदार अभिनेता नहीं हैं। निश्चित ही वो एक शानदार ही नहीं बल्कि अद्भुत और अतुलनीय अभिनेता हैं लेकिन यहां ग़ौर करनेवाली एक अलग बात यह है कि चार्ली की फिल्मों का लेखन ही उनके चरित्र को ध्यान में रखकर किया जाता था और फिर उसे ही अलग-अलग परिस्थितियों में डालकर परखा जाता है जिसमें वो हमेशा खरे उतरते थे लेकिन यहां मामला दूसरा है; और फिर चार्ली का चरित्र किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि एक ख़ास वर्ग का प्रतिनिधि करता है, एक ऐसे वर्ग का जिसके पास खोने के लिए कुछ ख़ास है नहीं जबकि पाने के लिए पूरी दुनियां है। लेकिन यहां चरित्र अलग-अलग होते थे लेकिन अभिनेता उसे एक ही तरह से करने के लिए बाध्य होता है। यह कोई अच्छी बात नहीं है। क्या पता जगदीप अगर अलग-अलग चरित्र को अलग-अलग प्रस्तुत करते तो आज हम उन्हें किसी और तरीके से याद कर रहे होते ना कि केवल सुरमा भोपाली के नाम से। वैसे भी मौत अभिनेता की हुई है उनका अभिनीति चरित्र हमेशा ज़िंदा था, है और रहेगा। 

जगदीप साहब को हम इस रूप में भी याद कर सकते हैं कि वो एक ऐसे अभिनेता थे जिनको एक बार के बाद हम सबने उन्हें भी एक ख़ास लोकप्रिय छवि में क़ैद करके अभिनय करने ही नहीं दिया। यह एक कलाकार के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय है, जिसमें कहीं न कहीं हम सब शामिल हैं। खाना चाहे कितना भी स्वादिष्ट और पौष्टिक क्यों न हो किसी भी इंसान को अगर वही खाना बार-बार खाने को दिया जाए तो वो अंततः उससे बोर ही हो जाएगा और यहां तो मामला कलाकारी का है, जिसमें नवाचारी और सृजनात्मकता ना हो तो उसका व्यर्थ हो जाना उसकी नियति है।

जगदीप अपनी मां से जुड़ा एक क़िस्सा सुनाया करते थे - एक बार बॉम्बे में बहुत तेज तूफान आया था। सब खंभे गिर गए थे। हमें अंधेरी से जाना था। उस तूफान में हम चले जा रहे थे। एक टीन का पतरा आकर गिरा और मेरी मां के पैर में चोट लगी। बहुत खून निकल रहा था। ये देख मैं रोने लगा तो मेरी मां तुरंत अपनी साड़ी फाड़ी और उसे बांध दिया। तूफान चल रहा था। तो मैंने कहा कि यहीं रुक जाते हैं, ऐसे में कहां जाएंगे। तो उन्होंने एक शेर पढ़ा था. उन्होंने कहा था- 
वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो 
वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाए
पूरी जिंदगी मुझे ये ही शेर समझ में आता रहा कि वो राह ही क्या जो थककर बैठ जाए। तो अपने एक-एक कदम को एक मंजिल समझ लेना चाहिए। छलांग नहीं लगानी चाहिए, गिर जाओगे। 

जगदीप ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत 1951 में बी आर चोपड़ा की फिल्म 'अफसाना' से की थी. इस फिल्म में जगदीप ने बतौर बाल कलाकार काम किया था। अबतक लगभग चार सौ फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता जगदीप का असली नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी था। उनका जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ था। साल 1975 में आई मशहूर फिल्म शोले में सूरमा भोपाली के किरदार में वो ऐसे क़ैद हुए कि वही उनकी पहचान बन गई और ऐसा लगता है जैसे वो भी इसे ही भुनाना चाहते थे तभी तो 1988 में उन्होंने एक फिल्म निर्देशित किया और उसका नाम रखा - सुरमा भोपाली लेकिन ख़ुद जगदीप के अलावा धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और रेखा के होने के बाबजूद फिल्म फ्लॉप हो गई। कल रात उनका निधन मुंबई स्थित निवास पर हो गया। वो 81 साल के थे। उनको बहुत बहुत नमन।

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