रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

सोमवार, 28 जनवरी 2013

एकजूट का यार बना बड्डी : नवनीत कुमार


15वें भारत रंग महोत्सव में नाटकों के क्रम में, नादिरा ज़हीर बब्बर निर्देशित नाटकयार बना बड्डीकी प्रस्तुति हुई. यह नाटक तीन दोस्तों के इर्दगिर्द  घूमता है. तीनों दोस्तों में से एक दोस्त के व्यव्हार में रूखापन आने लगता है वह अपनी जड़ो और और पृष्ठभूमि को भूल जाता है, व्यक्तिपरक से वस्तुपरक हो जाता है. उसके दोस्त मिलकर उसे फिर से सही रास्ते पर लाना चाहते है. जिसकी शुरुआत हँसीमजाक के सिलसिले से होती है, जो विचारों को उत्तेजित, भावुक और गंभीर बनाती है. नाटक में पात्र जब आपस में वाद-विवाद करते हैं, सपने देखते है और अपने जीवन को टटोलने का प्रयास करते हैं तो यह दोस्ती, क्षमा, मूल्यों और सबसे जरुरी हमारे हँसने की क्षमता को स्पर्श करती है .जयदीप वानखेड़े पात्र का अभिनय कर रहे सज्जाद खान जापान से एक कलाकृति खरीद लाते हैं वह भी पूरे एक करोड़ रुपये में और उसे अपने दोस्त मिथिलेश (यशपाल शर्मा) को सबसे पहले दिखाते हैं ताकि सही राय जान सके पर मिथिलेश काफी अफ़सोस जाहिर करते हुए उस कलाकृति को बेकार बताता है. तीसरे दोस्त कार्तिक को भी वह अपनी कलाकृति दिखता है पर वह उस कलाकृति को उम्दा बताता है ताकि उसका दोस्त नाराज हो. इस बीच इतने गुदगुदाने वाले सम्वाद पात्र बोलते हैं कि हँसते-हँसते पेट फूल जाता है. मंच पर अनावश्यक चीज़ें नहीं हैं। नाटक की प्रस्तुति में मंच व्यवस्था भरी पूरी थी. घर के कमरे का जो लुक दिया गया था वह किसी हाई फाई क्लास के बड़े लोग के घर से कम नहीं था, डेकोरेशन भी उसमें झलक रही थी. नाटक के अन्दर बैक ग्राउंड म्यूजिक रॉकिंग था उससे अभिनेताओं को काफी उत्साह मिलता था और दर्शक झूम उठते थे, दृश्य आपस में जुड़े थे ,कहीं भी खालीपन का अनुभव नहीं हुआ. अभिनेता पात्र को जीते नजर आये . सबसे ख़ास बात जो इस नाटक की है वह है इसकी कसावट कहीं धीमी या ढीली नहीं होती। ऐसा संभवतः इसलिए हुआ है कि नाटक पर निर्देशकीय पकड़ अच्छी है, संपादन चुस्त है। किसी भी अभिनेता ने कोई अनावश्यक ड्रामा नहीं किया है। इस कारण नाटक स्वतः आगे बढ़ता है। लेकिन जिस एक और चीज़ को यहाँ रेखांकित किया जाना चाहिए वह है इसकी मंच प्रकाश परिकल्पना। मंच प्रबंधक मिथिलेश मैहर ने जिस प्रकार से मंच पर तैयारी की वह तारीफ के काबिल था. सिमित संसाधनों के साथ नाटक के पूरे दृश्य को जीवन्तता प्रदान किये थे. वही दूसरी ओर रवि मिश्र और अकबर खान की प्रकाश परिकल्पना प्रस्तुति को उर्जावान बनाये रही, वस्तुतः ''नाटक और रंगमंच दो ऐसे अनिवार्य तत्व हैं जिनके सामने कोई भी संचार माध्यम अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद कोई मायने नहीं रखता। और वह है नाटक का शब्द और उसको बोलने वाला एक जीवंत अभिनेता। जब तक मंच पर इन दोनों तत्वों की उपस्थिति बराबर बनी रहेगी तब तक रंगमंच जैसे माध्यम के भावी स्वरूप को लेकर ऊहापोह में पड़ने की ज़रूरत नहीं है।'' 
नवनीत कुमार 
अंकुर का यह कथन रंगमंच के प्रति उनकी गहन आस्था को रेखांकित ही नहीं करता बल्कि, इस तरफ़ भी संकेत करता है कि नाट्यालेख के शब्द और अभिनेता दोनों मिलकर रंगमंच बनाते हैं, जिसका दूसरा पक्ष दर्शक होते हैं। दर्शकों की बात करें तो पूरे नाटक के दौरान दर्शकों की उपलब्धि भी खासी पाजिटिव रही और सभी पूरा मजा लेते नजर आये सभी के मुँह से वंस मोरवंस मोर की आवाजे रही थी तो कोई हूटिंग कर रहा था. निर्देशक नादिरा ज़हीर बब्बर से बात की तो उन्होने कहा किमैंने इस नाटक प्रस्तुति से पहले रिहर्सल में पूरी हँसी मजाक से भरपूर थी, अभिनेताओं को अपनी मर्जी से संवादों में कांट छांट कर उसे सुधारने की पूरी आजादी दी”. निर्देशक ज़हीर बब्बर ने इस सफलता की पूरा श्रेय भारत में हिंदी रंगमंच में परिवर्तनों एवं गुणवत्ता के लिए मशहूर एकजुट थिएटर ग्रुप -मुंबई को दिया. जिसकी स्थापना स्वयं नादिरा ज़हीर बब्बर एवं उनके पति ने 1981 में किया था .वर्ष 2012 में इस संस्था ने नाट्यकला को समर्पित अपनी सेवा के 33 वर्ष पूरे किये. नादिरा ज़हीर बब्बर महिला शिरोमणि पुरस्कार, यश भारती पुरस्कार , संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और ग़ालिब अकादमी पुरस्कार तथा कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजी जा चुकी हैं

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