रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

अभिनेता की डायरी : भाग पांच

जीवन और रंगमंच नित्य नया कुछ सिखने-सिखाने का नाम है। जिस प्रकार प्रकृति नित गतिशील है जड़ नहीं, ठीक उसी प्रकार जीवन भी परिवर्तनशील है और कला भी। जो कोई भी अतीतजीवी है, वो दरअसल अप्राकृतिक है। जीवन कल में नहीं बल्कि आज में चलता है और हमारे आज से ही हमारा कल बनता-बिगड़ता है। हां, हम जो कुछ भी लिखते पढ़ते, बोलते हैं अगर खुद नहीं मानते तो बेकार है क्योंकि वो बट जो केवल विचारों में ही विचरण करता है, उसका कोई ख़ास महत्व नहीं है। बहरहाल, आज हमारे दोस्तों ने अभ्यास में जो अनुभव किया वो कुछ निम्न हैं -   
#आकाश - आज पुंज भैया ने बताया कि अगर आप लोकतंत्र को मानते है तो आप उसे सच में माने, दिखावा ना करे। लड़का और लड़की दोनों की मान्यताएं एक बराबर है और रंगमंच में कोई स्त्री-पुरुष नहीं होता बल्कि सब कलाकार होते हैं।
दूसरा ज्ञान यह मिला की हम सब को युग्म प्रणाली के भाव से चलना चाहिये। मतलब कि बिना किसी को क्षति पहुंचाये खुद भी आगे बढ़ो और दूसरों को भी आगे बढ़ने मे सहयोग करे।
#सुशांत - मुझे ताजुब हो रहा है कि 22 साल के उम्र में आज तक किसी ने मुझे उसके बारे में नही बताया था और नही मैं कभी जानने की कोशिश की थी। वो चीज है (ख़)। मैं थिएटर में वो चीजें सीख रहा हूँ। जो मुझे स्कूल से और अपने घर से या समाज से सीखना चाहिए था। वह सब तालिम मैं यहाँ पा रहा हूँ। किसी भी इंसान की जिंदगी के एक-एक कदम पर जिसकी जरूरत पड़ती है। सच कहुँ तो अब जाकर मैं अपने आप को जाना हूँ। मैं क्या हुँ, मैं क्या कर सकता हूँ, मेरे जिंदगी का मकसद क्या है, और भी ऐसे कई सवाल है जिसका जबाब मुझे अब जा के मिल रहा है। पता नही लोग थिएटर को इतना बुरा क्यों समझते है!
#प्रशांत कुमार - हमलोगों ने आज भी एक खेल खेला, कुछ नये तरह के व्ययाम भी किया। उसके बाद सर ने हमलोगों को ख और ख़ (व्यंजन -2) के बारे में बताया। उसके बाद हमलोगों ने काफी देर तक उसका उच्चारण किया। ख और ख़ के बीच मे जो भी शंका थी। वो आज दूर हो गई।
#निवास – आज ख और ख़ का अभ्यास करते हुए बचपन के स्कुल की याद आ रही थी।
#देवांश ओझा - आज का अभ्यास भी कुछ कष्टदायक था। पर अपने सर की बात से प्रभावित होकर सारा कष्ट कहाँ चला जाता है, मालूम नही चलता। खैर आज हमलोग ने व्यंजन -2 को पढ़ा ख् +अ = ख। अब कुछ सही हुआ है। आप किसी चीज में पूर्णरूप से निपुण है तो आप किसी को अपनी सारी निपुणता नही दे सकते। यह सोचकर कि कहीं यह आगे जाकर मेरे ही गले का कांटा न बन जाए। फिर भी यह सब सभी क्षेत्रों में होता है जैसे कि राजनीति, ज़मींदारी इत्यादि।
# संत रंजन - लैंगिक समानता का क़ानून बच्चे को फुसलाने के लिए खिलौने की तरह दिया गया है। जो कभी भी टूट सकता है और बच्चे के रूठने का कारण बन सकता है। दरअसल हम भी ये भ्रम पाले हैं कि हमारे लिए लड़का - लड़की में कोई फर्क नहीं है। और अगर ये भ्रम नहीं है तो फिर क्यों ऐसा होता है कि अगर 10 लड़के और एक लड़की कोई खेल, खेल रहे हैं। जिसमे एक दूसरे के हिप पर मारना होता है तो उस खेल में सभी लड़के शामिल तो नज़र तो आते हैं मगर लड़की खेल से बाहर नज़र आती है। क्योंकि सभी के दिमाग में सामाज का दिया हुआ वो गन्दा संकोच है कि बेचारे खेल को भी खेल भावना से नहीं खेल पाते।
हर समूह का अपना समान्तर रेखा खींचना - यहाँ पर समूह द्वारा समान्तर रेखा खींचने का मतलब विकल्प तैयार करना है। यानि कि अगर समूह का मुखिया किसी कारणवश अनुपस्थित है तो जो वैकल्पिक है वो समूह का संचालन तत्काल करता है। अब विकल्प ऐसा नहीं होना चाहिए जो ख़ुद को ही मुखिया समझ बैठे। बल्कि से तो इतना होनहार होना चाहिए जो मुखिया के कार्यों का क़द्र करते हुए उसी कार्य को और बेहतरीन पूर्वक करे।
#संदेश - आज हमलोगों ने दो अलग तरह का खेल खेला। पहला तो ये था कि हम सभी को एक-दूसरे के कमर के नीचे पर चोट करना है और ख़ुद का बचाना भी है। इस खेल से हमने सीखा की हमारा दिमाग़ और शरीर एक साथ काम कर रहा है कि नही। दूसरे खेल के बारे में मुझे उतना समझ नही आया। आगे हमलोगों ने व्यंजन 2 (ख्+अ =ख) एवं ख़ पढ़ा। और एक खास बात की जो हमलोगों ने पढ़ा कि आज ही नही बल्कि बहुत समय से चला आ रहा है कि आप दूसरे को आगे बढ़ना देना नही चाहते। वो चाहे कोई भी क्षेत्र हो। जैसे आप किसी ग्रुप के मेंबर हो, और जो आप को लीड कर रहें हैं। वो ये सोचे कि जो कुछ भी करूँ मैं ही करूँ इससे से तो आपका जो ग्रुप है, बिखर जाता है क्योंकि जब आप नही रहियेगा या आपको कुछ हो जाय तो आपका ग्रुप तो बिखर जायेगा? क्योकि आपने तो दूसरे को आगे बढ़ना बताया ही नही है? इसलिए आपको दूसरे को आगे बढ़ने में हमेशा मदद करनी चाहिए।
 #अनुज - "एकाग्रता /संकेन्द्रण" एक शब्द ही नही बल्की एक ऐसा वाक्य है जिसमें बहुत सी बातें छिपी हुई है। एकाग्रता मतलब पुर्ण रूप से एक-चित होकर किसी भी कार्य को सावधानी पूर्वक करना।
हमारा अभ्यास सत्र आज एक खेल से शुरू हुआ। इस खेल से हमारे अंदर किसी कार्य के प्रति कितनी एकाग्रता है उसका पता चला। जैसे आपका मन, दिमाग़, शरीर किस तरह से काम करता है, उस पर आपका कितना नियंत्रण है।
कहा जाता है कि किसी भी अभिनेता/अभिनेत्री को अपने शरीर से लेकर मन, दिमाग़ सभी चीज़ पर नियंत्रण होना अति आवश्यक है। इस खेल ने हमें एकाग्र होना सीखा दिया। ख़ैर, यह खेल खेलकर मुझे बहुत मज़ा आया। अभ्यास के दूसरे सत्र में हमने ख और ख़ शब्द का उच्चारण कर अभ्यास किया। वैसे हमारे अभ्यास सत्र में बहुत सी बातें बताई जाती है। लेकिन उसे हम कितना समझ पाते हैं ,क्या-क्या समझते है और हम क्या अनुभव करते है। इस लेख के माध्यम से बताने की कोशिश करते हैं।
#सोनू - आज मैं दो नये व्यायाम से परिचित हुआ। पहला व्यायाम में करना ये था कि दूसरे की बम्प पर मारना है और खुद की बम्प को बचाना। इसके बाद दूसरा व्यायाम में दोनों पैरों को आगे कि ओर खोलकर, बैठे हुए ही बम्प के सहारे चलना था। आज व्यायाम में बहुत मज़ा आया पर मैं सिर्फ पहले वाले ही व्यायाम को समझ पाया दूसरा तो बिल्कुल नहीं। उसके बाद “ ख ” और “ ख़ ” शब्द का उच्चारण करना सीखा।
#एदीप राज - एक नया खेल खेला। मुझे लड़कियों के साथ खेलने में झिझक होती थी। आज खेल ने वह दूर कर दिया। इसके बाद व्यायाम किया। फिर "ख" और "ख़" शब्द का उच्चारण सीखा जिसे मैं पहले ग़लत उच्चारित करता था। आज मैंने एकाग्रचित्त होना भी सीखा जो एक अभिनेता के लिए बहुत ही ज़रूरी होता है।
Dastak, Patna

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