रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

'समकालीन रंगमंच' पत्रिका का प्रवेशांक


महोत्सवों में सरकारें आज जिस तरह दखल दे रही हैं वह मेरे विचार से एक खतरनाक प्रवृत्ति है। सरकार को जहां काम करना चाहिए वो है फंडिंग और सब्सिडी। दिक्कत तब होती है जब सरकार सेंसर की तरह काम करने लगती है। अगर वह हमारे काम की काट-छांट करने लगे तो ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक तो नहीं कह सकते। दूसरा एक खतरा यह भी है कि सरकार के पास चूंकि यह अधिकार होता है कि वह लोगों या समूहों को चुन सकती है, तो इसके कारण पक्षपात होने का खतरा रहता है। ऐसे में काम की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता। दूसरी एक बात यह भी है कि सरकार का जो अधिकारी वर्ग है वह महोत्सव पर हावी हो जाता है और यह बिल्कुल गलत है। महोत्सवों के लिये नाटकों का चुनाव लोकतान्त्रिक तरीके से होना चाहिये। एक पूरा पैनल होना चाहिए जो प्रविष्टियों में से कुछ नाटकों को चुने, अलग-अलग जगह के नाटक हों उसमें, उस पर चर्चा हो और फिर चुनाव किया जाये। मतलब कोई एक तरीका हो जिस पर अमल किया जाये। मुझे शक है कि सरकार सच में इस तरह की किसी प्रक्रिया को अपनाती होगी। सरकार के पास काफी फण्ड होता है उदाहरण के तौर पर जैसे एनएसडी के महोत्सव के लिए काफी फंड उपलब्ध रहता है। तो जो नाटक आये होते हैं उन्हें काफी पैसा दिया जाता है जिसे वो अपने बाकी नाटकों में इस्तेमाल कर सकते हैं, उन नाटकों में जिनसे कुछ कम फायदा हुआ हो। इस तरह का एक सिस्टम होना चाहिए। मुझे लगता है इस तरह सरकार अपनी अहम भूमिका निभा सकती है और यह भी कर सकती है कि महोत्सवों को दिल्ली या अन्य मुख्य शहरों के अलावा छोटे शहरों, गांव-कस्बों तक ले जाया जाये। दिल्ली में आयोजन करना काफी आसान है क्योंकि यह केंद्र है। इस तरह का सिस्टम बनाया जाना चाहिए कि अगर एक महोत्सव में 20 नाटक हैं तो 5 नाटक आम लोगों के चुने हुए हों और उन्हें अलग-अलग शहरों और देशों में भी ले जाया जाये। इस तरह सरकार एक बड़ा योगदान कर सकती है। ( ‘समकालीन रंगमंच’ के प्रवेशांक में प्रकाशित अंग्रेज़ी के प्रख्यात नाटककार श्री महेश दत्ताणी के आलेख "सांस्कृतिक नीति का अभाव एक बड़ी समस्या" से। )
निर्देशकों में सामान्यतः ये भ्रम बना रहता है कि उनके अंदर कुछ ऐसा है जिस कारण एक अभिनेता उसके साथ जुड़ कर काम करना और अपना कलात्मक विकास करना चाहता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। अच्छे निर्देशक माने जाने वाले रंगकर्मियों के साथ जुड़ कर काम करने के बजाए, बिहार जैसे पिछड़े समाज में, एक रंगकर्मी संबंधों को, रिश्तों को बात व्यवहार को ज्यादा तरजीह देते हैं। ऐसे में फिर संगठक की भूमिका अहम हो जाती है। कई ऐसे अच्छे निर्देशक अच्छे अभिनेताओं की कमी का रोना रोते नजर आते हैं और मजबूरी में एकल प्रदर्शनों की ओर रूख कर जाते हैं। वैसे भी रंगमंच के अखिल भारतीय बाजार में एकल प्रदर्शन लगातार अपनी जगह बनाता जा रहा है। संगठन बनाने की दुरूहता से बचने का सरल समाधान। किसी एक अभिनेता से समीकरण बिठाकर एक प्रस्तुति तैयार कर ली जाती है और फिर शुरू हो गयी देश भर के प्रायोजित महोत्सवों में भागीदारी निभाने की कवायद। जो हाल पटना रंगमंच का हुआ है वही हाल लगभग पूरे हिंदी रंगमंच में हुआ होगा। लेकिन इन सब बातों पर कोई विमर्श, बहस-मुबाहिसा नहीं है। साहित्य में देखिए कितने विमर्श हैं, तीखी बहसें हैं इस कारण साहित्यकार ज्यादा महत्व भी पाते हैं। इसके बरक्स रंगमंव में खासकर कहीं कोई उद्वेलन नहीं। राजेंद्र यादव, नामवर सिंह एक दूसरे पर भीषण वैचारिक हमला करते हैं, एक-दूसरे के काम की खूब आलोचना-प्रत्यालोचना हुआ करती है।लेकिन रंगमंच में सब जगह सहमति का माहौल है। शायद ही कोई बड़ा रंगकर्मी अपने समानधर्मा दूसरे रंगकर्मी के काम की आलोचना करता है, कि कैसा थियेटर वो कर रहा है? थियेटर के माध्यम से कौन से मूल्य वो परोस रहा है? कैसा रंग-सौदर्य सामने ला रहा है जैसी कहीं कोई बात-चीत नहीं। जो थोड़ी बहुत बातचीत है भी वो इतनी पुरानी व दुहराव से भरी है कि ऊब पैदा होती है। हिंदी रंगमंच का रंगकर्मी सबसे ज्यादा आलोचना, बहस-मुबाहिसे से भागता है। संगठन के अप्रासंगिक होते चले जाने के चारित्रिक लक्षण हैं ये। ( समकालीन रंगमंच के प्रवेशांक में प्रकाशित अनीश अंकुर के आलेख "संगठन की ओर लौटना होगा थियेटर को" का एक अंश। )
इसमें कोई शक नहीं, जब से वर्णवादी व्यवस्था ने समाज को वर्ण के आधार पर बांटा, रंगमंच भी बंट गया। रंगमंच का एक वर्ग सत्ता से जुड़ा तो दूसरा सत्ता के बाहर जो लोग गांवों-देहातों, जंगलों में रहते थे, उनसे। रंगमंच का यह वर्गीय विभाजन आज भी है जिसे होने वाले रंग महोत्सवों में आसानी से देखा जा सकता है। आज देश भर में सालों भर कोई न कोई रंग महोत्सव चलता ही रहता है, और यह केवल महानगरों में ही नहीं, छोटे -छोटे शहरों तक चल रहा हैं। इन रंग महोत्सवों में किस तरह के नाटक हो रहे हैं, इनका मूल उद्वेश्य क्या है, जानना जरूरी है। या कहिए, विश्लेषण करने की जरूरत है कि ये रंग महोत्सव किस मकसद को लेकर किये जा रहे हैं।
मीडिया में अधिकतर जिन रंग महोत्सवों की चर्चा रहती है, वे सत्ता से जुड़ी हुई ही होती हैं। स्थानीय पहलकदमी व जन सरोकारों से जुड़े जो रंग महोत्सव होते हैं, भले वे आम जन मानस में लोकप्रिय होते हैं, तथाकथित मीडिया से दूर ही रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों से, जब से अन्य विधाओं की तरह रंगमंच में प्रतिरोध का स्वर उठा है, सत्ता की तरफ से यह प्रयास होने लगा है कि कैसे प्रतिरोध के स्वर को भोथरा कर दिया जाए, उसका रूप विकृत कर दिया जाए, चरित्र ही बदल दिया जाए। नुक्कड़ नाटक की आज जो दुर्गति है, सत्ता की उसी साजिश का ही परिणाम है। जब से विदेशी पूंजी हमारे मुल्क में बेरोक-टोक आने लगी है, उदारवाद के बहाने बंहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमारे घरों में घुसने लगी हैं, लोग आर्थिक रूप से कमजोर होने लगे हैं, कृषि उद्योग जर्जर होने लगे हैं, मजदूर बेरोजगार होने लगे हैं, किसान जमीन के सवाल को लेकर सड़क पर आ गये हैं। जिस तरह जर-जमीन-जंगल को लूटने का षडयंत्र हो रहा है, उसके प्रतिरोध में केवल संगठन ही नहीं, अब कला व संस्कृति भी आने लगी है। नाटक के इस स्वर को कुंद करने के लिए सत्ता वर्ग पिछले कुछ वर्षों से अनवरत प्रयास में है। विदेशी पूंजी भी इनकी ताल में ताल मिला रही है। ऐसे अनेकों विदेशी फाउन्डेशन के नाम अब तो स्पष्ट सामने आ गये हैं जिनका एक ही मकसद है- बड़े- बड़े रंग महोत्सवों की आड़ में प्रतिरोध की संस्कृति को परम्परा की जड़ की तरफ ढ़केलना। ( समकालीन रंगमंच में प्रकाशित प्रख्यात नाटककार और संस्कृतिकर्मी राजेश कुमार के आलेख "महोत्सवों का वर्गीय चरित्र" से। )

1 टिप्पणी:

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