रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों पर केंद्रित सांस्कृतिक दल "दस्तक" की ब्लॉग पत्रिका.

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

फैज : शानदार शायर जो शानदार इन्सान

जावेद अख्तर



जावेद अख्तर फैज अहमद फैज से हुई अपनी पहली मुलाकात का वाकया अक्सर सुनाया करते हैं। वाकया कुछ ऐसा है कि वो यह कहना भी नहीं भूलते कि इसका कोई यकीन न करे तो हैरत की कोई बात नहीं, लेकिन अच्छी बात यह है कि यह किस्सा मैंने सलीमा (फैज की बेटी सलीमा हाशमी) को तब सुनाया था, जब फैज साहब जिंदा थे दुनिया में और इन्होंने उनसे कन्फर्म कर लिया था।सलीमा भी एक मौके पर इस बात का तस्दीक कर चुकी हैं तो इसे इसे फैज अहमद फैज को समझने में एक मददगार वाकए की तरह ही हमें लेना चाहिए।

हुआ कुछ यूँ था कि जनाब जावेद अख्तर ग्रेजुएट हो चुके थे और मुंबई में अपनी किस्मत आजमानेआ पहुंचे थे। न खाने-पीने के पैसे थे, न रहने का ठौर-ठिकाना था। स्ट्रगलके वैसे बुरे दिनों में एक दिन मालूम हुआ कि फैज साहब वषों के बाद भारत आ रहे हैं। मैरीन लाइन पर एक जगह आज कोई मुशायरा है, जिसमें वो शिरकत करेंगे। उसमें जाने के टिकट भी लगने वाले थे। ये तो कॉलेज के दिनों से उनके फैन थे। मिलने को उतावले हो उठे, लेकिन अंधेरी बड़ी दूर जगह थी वहां से, जहाँ एक स्टूडियो में जैसे-तैसे सोने की जगह मिल गई थी। मुशायरे का टिकट लेना तो दूर की बात, वहाँ तक ट्रेन में जाने के भी पैसे नहीं थे।
इत्तिफाक की बात यह हुई कि शाम को एक कोई असिस्टेंट डाइरेक्टर मिल गया इन्हें। बोला, चलो ठर्रा पीते हैं। गए। 11 -11.30 बजे रात तक पीते रहे उसके साथ और अपना दु:ख सुनाते रहे उसे। जब वहाँ से निकले, तब तक इतना कांफिडेंस आ गया था जनाब में कि बिना टिकट लिए ही ट्रेन पकड़ ली और पहुँच गए मुशायरे में।

वहां मुशायरा अपने सुरूर पर था। इतनी देर भी हो चुकी थी कि कोई टिकट चेक करने वाला भी नहीं था। घुसते चले गए. जाकर पीछे बैठ गए। ठर्रे ने कमाल कर दिखाया था। नशे में ठीक से सुनाई न पड़े। सो मंच तक जैसे-तैसे पहुंचे और पीछे की तरफ एक खाली गावतकिये को ठीक किया। टेक लगाया और सो गए। अचानक जब आँख खुली तो मुशायरा खत्म हो चुका था।
जावेद अख्तर ने तो किसी को सुना ही नहीं! हड़बड़ाहट में देखा कि एक बड़ा सा हुजूम फैज साहब के साथ बढ़ा जा रहा है और एक-दो वोलेन्टियर भी उनके साथ बढ़ रहे हैं। भीड़ घेरे जा रही है फैज को। जनाब मंच से उतर कर लपके और जाकर भीड़ को डांटा, ‘पीछे हटिये आपलोग!और फैज साहब से कहा कि आइये फैज साहब.साथ-साथ गाड़ी तक पहुंचे। लपक कर दरवाजा खोला। वहां खड़े वोलेन्टियर को लोगों को सँभालने के लिए कहा। अपने बैठ गए और फैज से कहा। आइये फैज साहब, आइये, बैठिये।फैज बैठ गए। आगे की सीट पर एक वोलेन्टियर भी बैठ गया।
जावेद मियाँ बोले जा रहे हैं- कितनी खुशी हो रही है हम लोगों को कि आप आए। हम लोग कितना चाहते थे। ..वगैरह-वगैरह। बातें हुई जा रही है। होटल पहुंचे। गाड़ी से उतरे। वोलेन्टियर ने जावेद अख्तर से पूछा कि सर, गाड़ी रखनी है या छोड़ दूँ? इन्होंने कहा कि ठहरो, जरा पूछ लूँ। हाँ, फैज साहब! गाड़ी को रखूं या छोड़ दूँ? उन्होंने कहा, क्या करना है गाड़ी का? कहाँ जाना है? छोड़ दो। इन्होंने वोलेन्टियर से कहा- छोड़ दो। इसके बाद दोनों होटल के अंदर गए।
फैज ने इनसे कहा कि मियाँ, जरा चाबी ले लीजिये। ले आए। ऊपर गए। कमरे में अब फैज और जावेद अख्तर। फैज ने पूछा, कुछ पियेंगे आप? जावेद बोले, पी लेंगे। वो बोले- तो फिर सोड़ा-वोडा मांगा लीजिये। इन्होंने फोन करके मंगा लिया। आ गया। दोनों बैठ गए। साथ में उर्दू और उसके स्क्रिप्ट के बारे में बात चल निकली। फैज साहब आराम से बात किए जा रहे हैं।
थोड़ी देर बाद कुछ शायर और फिल्मों से जुड़े लोग आए। उन्होंने देखा कि बड़ी गंभीर बातचीत चल रही है। उनको लगा कि जानते होंगे फैज साहब। वो लोग बैठे तो जावेद अख्तर ने कहा कि फैज साहब, मैं सोता हूं। ये तो पहले से भी पी के आए थे। यहाँ भी पी लिया। नींद तो आनी ही थी। फैज बोले, सो जाओ। ये बिस्तर पर जाकर सो गए। सुबह हुई। मियाँ जावेद की नींद खुली। इनको समझ में आ गया कि बेडरूम में ही फैज साहब की प्रेस कांफ्रेंस चल रही है।
और ये जनाब पांव से सर तक चादर से ढंके सो रहे हैं। लोग बार-बार फैज साहब से पूछ रहे हैं- ये जनाब?..ये कौन साहब सो रहे हैं?..कौन साहब हैं ये.. फैज साहब इधर-उधर में किसी तरह सवाल को टाले जा रहे हैं। क्योंकि उनको भी मालूम तो था नहीं कि ये जनाब हैं कौन। और इधर जनाब चादर के भीतर सब सुन रहे हैं और सोच रहे हैं कि निकला कैसे जाए यहाँ से। अचानक उठे और बोले, तो फैज साहब, मैं चलूँ? वो बोले, हाँ मियाँ, जाइये। स्ट्रगलर जावेद अख्तर वहां से तुरंत निकल पड़े। -अहमद नदीम कासमी

1 टिप्पणी:

  1. यूं तो हर शायर और नगमानिगार वाकयों को अफसानों में बदल सकता है. पर जावेद साहब की किस्सागोई और अंदाजे-बयाँ के क्या कहने. वो उनकी दिलचस्प शख्सियत का महज एक आइना है जिसमें ज़िन्दगी के हर
    तजुर्बे का अक्स उतना ही बेबाक और शफ्फाक दिखता है जितना कि झील में चाँद. मैं तो मुतमईन हूँ, और जनाब आप?

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